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शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

नारायणपेट और गायत्री बॉर्डर साड़ी- एक छोटे से कस्बे की लंबी दास्तान

 

Narayanapet cotton saree, gayetri border

इस बार चलते हैं दक्षिण मध्य भारत में स्थित तेलंगाना राज्य के एक छोटे से कस्बे नारायणपेट, जिला नारायणपेट, राजधानी हैदराबाद। इस बार अपने साथ आपको भी सैर कराने की वजह सिर्फ एक ही है जो हम पहनते-खाते- पीते हैं उसके इतिहास को भी थोड़ा टटोला जाए। नारायणपेट साड़ी की मांग अक्सर मेरे ग्राहक करते हैं।

 नारायणपेट के पारंपरिक 'चौका' (चेक पैटर्न) और इल्कल-शैली के 'गायत्री बॉर्डर' (Gayatri Border) का मिलाजुला रूप  इस  समय फैशन जगत में छाया हुआ है।

नारायणपेट साड़ी की कहानी 400 साल पुरानी

नारायणपेट साड़ी का इतिहास लगभग 400 वर्ष पुराना  है। 17वीं शताब्दी (लगभग 1630 ई.) में जब मराठा सम्राट छत्रपति शिवाजी महाराज इस क्षेत्र से गुजर रहे थे, तब उनके साथ आए कुछ बुनकर यहीं बस गए। इन बुनकरों ने महाराष्ट्र की बुनाई कला को स्थानीय संस्कृति के साथ मिलाया, जिससे नारायणपेट साड़ियों का जन्म हुआ। इस अद्वितीय विरासत के कारण नारायणपेट साड़ियों को भौगोलिक संकेतक (GI Tag) भी प्राप्त हो चुका है।

क्या है गायत्री बॉर्डर

'गायत्री बॉर्डर' जिसे कई क्षेत्रों में 'इल्कल गायत्री बॉर्डर' भी कहा जाता है, मुख्य रूप से धागे के काम (Thread-work) और मंदिर की कलाकृति (Temple Motifs) से सजा है। इसते बॉर्डर में त्रिकोणीय गोपुरम या 'रुद्राक्ष' के डिजाइन बुने जाते हैं, इससे साड़ी में आध्यात्मिक और पारंपरिक लुक दिखता हैं। जहाँ नारायणपेट साड़ी की बॉडी एकदम सरल या छोटे चेक वाली होती है, वहीं इसका गायत्री बॉर्डर बेहद आकर्षक और गहरे विरोधाभासी (Contrast) रंगों में बनाया किया जाता है।

8 साड़ियां बुनी जाती हैं एक साथ

नारायणपेट साड़ियों की बुनाई 'पिट लूम' (Pit Loom) पर की जाती है। इसके निर्माण में 'इंटरलॉक वेफ्ट' (Interlock Weft) तकनीक का उपयोग होता है, जिससे साड़ी का बॉर्डर और बॉडी आपस में मजबूती से जुड़ जाते हैं। इस बुनाई की एक और बड़ी विशेषता यह है कि बुनकर एक बार में करघे पर 8 साड़ियों का ताना सेट करते हैं।

पल्लू है खास

नारायणपेट गायत्री बॉर्डर साड़ियों में रंगों का चयन बेहद गहरा और भारतीय संस्कृति से प्रेरित होता है, जैसे—हल्दी पीला, सिंदूरी लाल, रानी पिंक, बोतल ग्रीन और गहरा मैरून। इसका पल्लू, जिसे 'टोपा-तेन्नी' पल्लू भी कहा जाता है, उसमें लाल और सफेद रंग की चौड़ी पट्टियाँ (Stripes) होती हैं जो इसकी पहचान हैं।

पहनना है आसान

हल्की और ड्रेप करने में बेहद आसान होने के कारण, महिलाएं  बिना किसी परेशानी के पहन सकती हैं। आज की  घरेलू और कामकाजी महिलाएं,  नारायणपेट गायत्री बॉर्डर साड़ी को शालीन और प्रोफेशनल लुक के लिए काफी पसंद कर रही हैं। घर की पूजा में पहनना हो या ऑफिस में पार्टी हो यह साड़ी हर अवसर पर आपके बेहतर बनाती है।

निष्कर्ष:
नारायणपेट गायत्री बॉर्डर साड़ी हमारे बुनकरों की कड़ी मेहनत और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। कम बजट में एक रॉयल और एलिगेंट लुक देने वाली यह साड़ी आज के सस्टेनेबल फैशन (Sustainable Fashion) के दौर में भारतीय महिलाओं की पसंदीदा लिस्ट में शामिल है।

 

मंगलवार, 1 सितंबर 2026

जन्माष्टमी, साड़ियाें में भी समाएं हैं कृष्ण – डा. अनुजा भट्ट

पिछवाई साड़ी और कन्हाई की कहानी


भारत का एक मशहूर राज्य है राजस्थान। मैं यहां से कई तरह के संग्रह आपके लिए लाती हूं। इसी तरह भारत के हर राज्य की कला और कलाकार से जुड़ने का अवसर भी मुझे मिलता है। यह सारा काम काफी श्रमसाध्य है पर मुझे आनंद आता है। मुझे यहां कई कहानियां और किवदंतियां मिलती है। जैसे जैसे राह चलती हूं ईश्वर और फैशन की गलियां पुकारने लगती हैं। आप जब कभी राजस्थान गए होंगे तब आपने नाथद्वारा में श्रीनाथ मंदिर अवश्य देखा होगा। राजस्थान के नाथद्वारा में भगवान श्रीनाथ जी का मंदिर काफी लोकप्रिय जो है ।

श्रीनाथ जी मंदिर राजस्थान के राजसमंद जिले के नाथद्वारा शहर में स्थित है। यह उदयपुर से 50 किमी. और डबोक एयरपोर्ट से 58 किमी. दूरी पर स्थित है।

किंवदंती और इतिहास

श्रीनाथजी के स्वरूप या दिव्य रूप को स्वयं प्रकट कहा गया है। पौराणिक कथा के अनुसार ,

रविवार, 30 अगस्त 2026

दीवार और कील — अनुजा भट्ट



एक दीवार हूँ मैं... जिस पर कील नहीं ठुकती,
ऊपर से एकदम सपाट सी दिखाई देने वाली सड़क,
या फिर कोई पगडंडी,
या यूँ ही कोई बेनाम सा मैदान...
न हरियाली, ना पेड़, एकदम सुनसान!

 नीचे एकदम भुरभुरी थी ज़मीन,
जैसे कोई दीवार हो... जिसकी सीलन बाहर नहीं दिखाई देती,
पर कोई कील उसे भुरभुरा कर, भीतर की रेत फर्श पर उड़ा देती है।
धरती और दीवार पर टंगी कील, जैसे एक स्त्री में बदल जाती है,
और वह स्त्री कोई और नहीं... मैं हूँ!
वेदना से उठी मेरी चीख, दुःख के बादल इकट्ठे करती है,
मैं बुदबुदाती हूँ— अभी ही यह सब होना था?
अभी-अभी ही तो मैंने एक सपना बुना था,
और उसे बादलों में टांग देने की सोच रही थी...
बादल जहाँ-जहाँ उड़ें, मेरे सपने को भी अपने साथ लेते जाएँ,
और जब, जहाँ बारिश होगी...
मेरा सपना भी उस-उस जगह अपनी हकीकत की दास्तान लिख आएगा!
पर यह उदासी जम गई है... मिट्टी दरक गई है,
दरक गई मिट्टी की परतों के साथ, यह उदासी भीतर जम गई है।
जितना मैं इसकी परतों को हटाती हूँ,
यह और ज़्यादा जम जाती है।


गुरुवार, 27 अगस्त 2026

महेश्वर: नर्मदा की लहरों में संस्कृति भी है और आधुनिकता भी





इतिहास, आध्यात्मिकता और कला का अनोखा संगम है महेश्वर, जहां इतिहास भी है, आध्यात्मिकता भी और कला  भी। 
नर्मदा नदी के पावन तट पर बसा यह शहर अपनी ऐतिहासिक इमारतों के साथ ही साथ दुनिया भर में प्रसिद्ध महेश्वरी साड़ियों के लिए भी जाना जाता है।

    कैसी है शहर की खुशबू
महेश्वर भारत के मध्य प्रदेश राज्य के खरगोन  जिले में स्थित है।  इंदौर शहर से लगभग 90 किलोमीटर दक्षिण और खरगोन जिला मुख्यालय से मात्र 56 किलोमीटर दूर है यह शहर। जिसके किनारे बहुत ही सुंदर और भव्य घाट है। पत्रकारिता के काेर्स के लिए जब मैं भोपाल गई तो वहां मेरे सहपाठियों में नीलेश तायल भी थे। वह मेरे साथ नवभारत टाइम्स में प्रशिक्षण के लिए भी आए। साथ काम करते हुए हम बहुत बार अपने घर को याद करते हैं। मैं उसे नैनीताल के बारे में बताती और वह खरगौन के बारे में। उसके पास अपने शहर की यादें थी और मेरे पास अपने शहर की।  उनसे ही जाना मैंने सबसे पहले खरगौन  के बारे में और उस शहर से आसपास की कथाओं के बारे में।
 कथाएं जो हमें जीवन देती हैं
 सहस्रार्जुन से अहिल्याबाई तक महेश्वर का इतिहास  बहुत दिलचस्प लगा मुझे ।  पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह शहर हयवंशी राजा सहस्रार्जुन की राजधानी था। कहा जाता है कि सहस्रार्जुन ने रावण तक को पराजित कर दिया था। बाद में ऋषि जमदग्नि को प्रताड़ित करने के कारण भगवान परशुराम ने सहस्रार्जुन का वध यहीं किया था। शंकराचार्य और पंडित मण्डन मिश्र का विश्व प्रसिद्ध और ऐतिहासिक शास्त्रार्थ इसी पावन भूमि पर हुआ था।
बहुत बाद में यह शहर मराठा साम्राज्य की महान, न्यायप्रिय और कला-प्रेमी शासिका देवी अहिल्याबाई होल्कर की राजधानी बना। उन्होंने ही महेश्वर को अपनी संस्कृति और कला का मुख्य केंद्र बनाया।
आज महेश्वरी साड़ी महिलाओं की पहली पसंद बनी हुई है, आज मैं आपको इसके इतिहास के बारे में बताती हूं। 
सन 1767 के आसपास, रानी अहिल्याबाई होल्कर ने मालवा और सूरत से विशेष शिल्पकारों और बुनकरों को महेश्वर बुलाया। उन्होंने कारीगरों को 9 गज की एक विशेष साड़ी बनाने का आदेश दिया, जिसकी डिजाइन उन्होंने खुद तैयार की थी।
शुरुआत में ये साड़ियाँ केवल शाही मेहमानों और रिश्तेदारों को उपहार में दी जाती थी  लेकिन बाद में रानी को लगा कि यह एक कुटीर उद्योग हो सकता है और इससे  हज़ारों परिवारों को रोज़गार दिया जा सकता है।
महेश्वरी साड़ी की खासियत क्या है?
किलों और घाटों से प्रेरित बॉर्डर: महेश्वरी साड़ियों के बॉर्डर पर बनी डिज़ाइनें महेश्वर के किले की दीवारों, ईंटों और नर्मदा नदी के घाटों की नक्काशी से प्रेरित होती हैं।
चटाई बॉर्डर: चटाई के पैटर्न के अनुसार  बुना गया बॉर्डर।
चमेली बूटा: चमेली के सुंदर फूलों का पैटर्न।
ईंट बॉर्डर: किले की दीवारों की ईंटों जैसी ज्यामितीय (geometric) बनावट।
हीरा बॉर्डर: हीरे के आकार की बारीक डिज़ाइन्स।
रीवर्सिबल बॉर्डर (बुगड़ी बॉर्डर): यह  साड़ी की सबसे अनोखी बात है। इसका बॉर्डर दोनों तरफ एक जैसा होता है, यानी आप इसे सीधा या उल्टा, दोनों तरफ से पहन सकती हैं।
विशिष्ट पल्लू डिज़ाइन: इसके पल्लू में 5 पट्टियाँ होती हैं (3 रंगीन और 2 जरी की लाइनें), जो इसे बहुत ही क्लासी लुक देती हैं।
बॉडी पैटर्न्स: साड़ी का बीच का हिस्सा या तो सादा होता है या फिर उसमें 'चांदतारा' (छोटे चांद-तारे) या महीन धारियां और चेक (घारड़ी) बने होते हैं।
कैटेगिरी - चंद्रकला, बैंगनी चंद्रकला, चंद्रतारा, बेली और पारबी।
फैब्रिक और रंग पारंपरिक रूप से महेश्वरी साड़ियों में केवल लाल, मैरून, काले, हरे और बैंगनी जैसे गहरे रंगों का ही इस्तेमाल होता था। लेकिन आज के मॉडर्न फैशन के साथ इसमें लाइट पेस्टल कलर्स और सोने-चांदी के धागों (Zari) का बेहद खूबसूरत कॉम्बिनेशन मिलने लगा है।
सिल्क और कॉटन (Silk-Cotton) के बेहतरीन ब्लेंड और बेहद हल्के वजन के कारण यह साड़ी हर मौसम के लिए आरामदायक है। आप इसे किसी कैज़ुअल आउटिंग से लेकर शादी-पार्टी जैसे फॉर्मल इवेंट्स में भी शान से कैरी कर सकती हैं।
साड़ी देखभाल भी मांगती है
चूंकि यह एक प्रीमियम हैंडलूम साड़ी है, इसलिए इसके रखरखाव पर थोड़ा ध्यान देना ज़रूरी है: साड़ी को पहली बार हमेशा ड्राई क्लीन (Dry Clean) के लिए ही भेजें। इसके बाद आप इसे घर पर किसी माइल्ड डिटर्जेंट के साथ हाथों से धो सकती हैं। इन साड़ियों को धोने के लिए हमेशा ठंडे पानी का ही इस्तेमाल करें, गर्म पानी से इसके धागे खराब हो सकते हैं।

इस तरह हमने जाना महेश्वर सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास और टेक्सटाइल आर्ट का जीता-जागता संग्रहालय है। यहाँ के राजराजेश्वर मंदिर, अहिल्याेश्वर मंदिर, और नर्मदा के घाट मन को शांति देते हैं, तो वहीं यहाँ की साड़ियाँ भारत की समृद्ध कला का अहसास कराती हैं। 

मंगलवार, 25 अगस्त 2026

लंदन फोर्ट- चांदनी चौक की चमक और ठुलकुड़ा का विरह




चमक सफलताओं की होती है और दर्द में हम ताउम्र भींगते हैं। हमारे भीतर अपनों के आँसू और विरह की चीखें भी दफन हो जाती हैं। हमारे दादाजी का जीवन एक ऐसी ही कहानी है, जहाँ एक तरफ दिल्ली के चांदनी चौक के रसूख दार लोग उनको प्रभावित कर रहे थे तो दूसरी तरफ देश की राजनीति उनको सम्मोहित ।उधर हमारे पुश्तैनी घर 'ठुलकुड़ा' के एक शांत कोने में बिखरा एक गहरा सन्नाटा भी था।
कहानी को थोड़ा सा पीछे ले जाती हूँ। मेरे परदादा त्रिलोचन भट्ट जी की ससुराल छाना गांव में थी और उनकी सास थी ज्योली के पंतों की बेटी। त्रिलोचन जी की 6 संताने थीं: 4 बेटे और 2 बेटियां। मेरे दादाजी भाइयों में सबसे छोटे और बहनों में बीच के थे। पढ़ाई-लिखाई के मामले में वे अपने अन्य भाइयों की तुलना में मध्यम दर्जे के थे। लेकिन उनके भीतर कुछ बड़ा करने की, गाँव की सीमाओं को लांघने की तीव्र और अदम्य महत्वाकांक्षा थी। उनकी बड़ी बहन का विवाह श्री हीरा बल्लभ पंत जी के साथ हुआ था, जिनका एक ही बेटा था— नाम था दीप चंद्र पंत।" मेरे दीप ताऊजी के बेटे दिनेश दद्दा बताते हैं , हम लोगों का गांव नैनीताल के नौकुचियाताल में शिलोटी पंत नाम का है पर हम लोग 250-300 साल पहले खूंट गांव से आए थे और फिर अल्मोड़ा पोखरखाली में बस गये। वर्ष 1958 में हम रानीधारा आ गए। मेरे पिता श्री दीप चंद्र पंत जी के चाचा का नाम घनानंद पंत था, जिन्होंने 'कुमाऊँ मोटर ओनर्स यूनियन लिमिटेड' (KMOU) की शुरुआत में अपना अहम योगदान दिया था; यह बात 1915 के आसपास की है।"
मेरे दादा जी की दूसरी बहन की शादी श्री नित्यानंद पांडे जी के साथ हुई थी, जो ढोली गाँव का एक प्रतिष्ठित पांडे परिवार था। नित्यानंद जी धनी मानी व्यक्ति थे। उनके एक बेटे श्री दया किशन पांडे थे जो मशहूर वकील और विधायक रहे।
मेरे दादा दी बहुत कम उम्र में ही अपना गाँव बिषाड़ छोड़कर दिल्ली आ गए थे और कांग्रेस से जुड़ गए थे। यह वह दौर था जब देश आज़ादी की नई इबारत लिख रहा था। भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने दिल्ली में एक बड़ा राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया था, जिसमें हमारे दादाजी ने सक्रिय भागीदारी की थी। उस सम्मेलन में दादाजी की नेहरू जी के साथ एक ऐतिहासिक तस्वीर खींची गई, जो अगले दिन देश के प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार 'हिंदुस्तान टाइम्स' (Hindustan Times) में प्रमुखता से प्रकाशित हुई।
नियति का खेल देखिए, वक्त का पहिया घूमा और कालांतर में सालों बाद, दादाजी की पोती—यानी मैंने—उसी 'हिंदुस्तान टाइम्स' अखबार में अपनी पेशेवर नौकरी की शुरुआत की। जब मैं दफ्तर की उन मेज़ों को देखती थी, तो मुझे अहसास होता था कि इतिहास की कड़ियाँ किस तरह अदृश्य रूप से हमें अपने पूर्वजों से जोड़ देती हैं।
दिल्ली में दादाजी ने ज्योतिष और कर्मकांड के काम को अपनी आजीविका का मुख्य आधार बनाया। चांदनी चौक के बड़े-बड़े रसूखदार 'मुनार' (स्वर्णकार/सुनार) समाज के लोग उनके मुख्य यजमान बन गए। दादाजी का यह कारोबार बहुत फला-फूला। वे दिल्ली के संभ्रांत समाज के एक जाने-माने ज्योतिषी बन गए, लेकिन इस कारण वे बेहद व्यस्त रहने लगे। उनका गाँव आना-जाना बहुत कम हो गया।
दिल्ली से कमाया हुआ पैसो से गाँव में भी वे अपने उन्हीं सुनार यजमानों की तरह ग्रामीणों को ज़रूरत पड़ने पर कर्ज (पैसे) देते थे या उनके गहने व ज़मीन गिरवी रख लेते थे। बही-खातों और लेन-देन की यह पूरी दास्तान आज भी हमारे पास एक 'पांडुलिपि' (Manuscript) के रूप में महफ़ूज़ है।
लेकिन दिल्ली की इस चमक की एक बहुत भारी और दर्दनाक कीमत हमारे पुश्तैनी घर में चुकाई जा रही थी। दादाजी का रहन-सहन और उनका आर्थिक स्तर ईर्ष्या का भी कारण थे। सन्1930 में जब हमारी बड़ी दादी (हरिप्रिया ) के गर्भ से पहले बेटे (हमारे ताऊजी) का जन्म हुआ, तब दादाजी दिल्ली में ही व्यस्त थे। उन दिनों संचार के साधन नहीं थे। दादाजी को भेजा गया टेलीग्राम (तार) उन्हें बहुत देर से मिला। वे तुरंत गाँव नहीं पहुँच सके।
पति की अनुपस्थिति गाँव की महिलाओं के बीच में शक और संदेहसे उपजी काना फूंसी लगातार मेरी बड़ीदादी को कितना तकलीफ देती होगी यह सोचकर लिखते हुए भी मेरे हाथ कांप रहे हैं। उस समय कम उम्र में ही शादी हो जाती थी। पहला मासिक ससुराल में ही होता था। पहले मासिक के बाद जब 5 दिन पूरे हो जाते तो सत्यनारायण की कथा होती।
इस तरह सोचती हूं तो मेरी बड़ी दादी 14 साल में मां बनी होगी। भीतर से कितना डर रहा होगा, ऊपर से समाज के ताने। कितनी टूट गई होगी। उनकी हर सुबह और हर शाम छींटाकसी के बीच गुज़रती थी—"तेरा पति तो तेरे साथ रहता ही नहीं, वह तो दिल्ली रहता है। इतनी दौलत का क्या फायदा, जब आदमी ही पास न हो"। उनके सीधे-सरल मन में यह बात बैठ गई कि उनका पति उनसे इतना विमुख कैसे हो सकता है? वे अवसाद के उस गहरे दलदल में धंस गईं जहाँ से बाहर निकलने का उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझा।
और फिर वह खौफनाक दिन आया। जिस दिन हमारे ताऊजी ने इस दुनिया में अपनी आँखें खोली थीं, उसके ठीक बाद, बड़ी दादी ने कमरे के एक कोने में रखे एक सुंदर से पालने में उस नवजात शिशु को बहुत दुलार से लिटाया। उन्होंने बच्चे को भरपेट दूध पिलाया, उसे चूमा, और फिर एक गहरे, मौन विलाप के साथ खुद को एक कमरे में बंद कर लिया। अपने अकेलेपन, विरह और समाज के तानों से हारकर, उन्होंने अपने ऊपर आग लगा ली। जब तक लोग दरवाज़ा तोड़कर भीतर पहुँचते, बड़ी दादी इस नश्वर संसार को छोड़कर जा चुकी थीं। पालने में लेटा वह नन्हा बच्चा अपनी माँ के इस दर्दनाक बलिदान से अनजान, चुपचाप सो रहा था।
बड़ी दादी के असमय चले जाने के बाद, ठुलकुड़ा के उस सूने कमरे में एक नवजात शिशु की रोने की आवाज़ गूँज रही थी। हमारे ताऊजी, माँ के आँचल और उनके दूध से महरूम हो चुके थे। माँ की चिता की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि इस नन्हे बच्चे की भूख शांत करने का एक बड़ा संकट पूरे कुटुंब के सामने खड़ा था।
उस दौर में डिब्बे का दूध या आधुनिक विकल्पों का कोई नामोनिशान नहीं था। ऐसे कठिन समय में बिषाड़ गाँव और आस-पास के परिवारों की इंसानियत जाग उठी। गाँव की जिन माताओं के अपने छोटे बच्चे थे, वे आगे आईं। वे बारी-बारी से ठुलकुड़ा आतीं और अनाथ हो चुके हमारे ताऊजी को अपनी गोद में लेकर ममता का दूध पिलाती थीं।
ताऊजी जब बड़े हुए, तो वे बड़े गर्व और भावुकता से अक्सर यह संस्मरण सुनाया करते थे—"मैंने किसी एक माँ का नहीं, बल्कि इस गाँव की सोलह माताओं का दूध पीकर अपना जीवन पाया है"। यह वाक्य कुमाऊँ की उस सांझी लोक-संस्कृति का साक्षात प्रमाण था, जहाँ पूरा गाँव विपत्ति के समय एक परिवार बन जाता था।
लेकिन इस कहानी का एक और पहलू था, जो हमारे दादाजी के अनोखे और स्वाभिमानी चरित्र को उजागर करता है। जब दादाजी दिल्ली से वापस लौटे, तो वे अपनी पत्नी को खोने के गहरे दुख से टूट चुके थे। पर वे एक व्यावहारिक और नफासतपसंद व्यक्ति थे। उन्होंने देखा कि गाँव की महिलाओं ने उनके बेटे को दूध पिलाकर उसका जीवन बचाया है। दादाजी का स्वाभिमानी चरित्र यह बर्दाश्त नहीं कर सकता था कि वे किसी का यह उपकार मुफ़्त में लें या किसी के अहसान तले दबे रहें।
उन्होंने एक बेहद अजीब लेकिन पारदर्शी रास्ता चुना। जिन माताओं ने ताऊजी को अपना दूध पिलाया था, दादाजी उन परिवारों को अपना 'कर्ज़दार' मानने लगे। उन्होंने अपनी उसी पुरानी बही-खाते की पांडुलिपि (Manuscript) को उठाया, जिसमें वे लेन-देन का हिसाब रखते थे। उन्होंने बाकायदा पन्नों पर दर्ज किया कि किस परिवार की महिला ने उनके बच्चे को कितनी बार और कितने समय तक दूध पिलाया है।
दादाजी ने इस ममतामयी उपकार की कीमत चुकाने का फैसला किया। जिन परिवारों ने उनसे पहले से कोई कर्ज ले रखा था, दादाजी ने उनके बही-खाते से कर्ज के धन को काट दिया और उन्हें ऋणमुक्त कर दिया। जिन पर कोई कर्ज नहीं था, उन्हें उन्होंने बाकायदा धन के रूप में पारिश्रमिक या सहायता राशि चुकाई। इस अनूठे लेन-देन का ब्योरा आज भी हमारे परिवार की उस ऐतिहासिक पांडुलिपि के पन्नों पर दर्ज है।
इस जिंदगीनामा में आगे आप पढ़ेंगे और भी कई किस्से जो आपको भावुक कर देंगे।
पापा, कल एकादशी है। आपको गए हुए 4 माह हो जाएंगे पर यह जिंदगीनामा लिखते हुए लगता है ,
आप आराम कुर्सी में बैठे हैं और मैं तख्त पर।
बाहर बारिश हो रही है।
पेड़-पौधे भीग रहे हैं, साथ में भीग रही हूँ मैं भी।
आपको बारिश पसंद थी ना, पापा?
मुझे भी पसंद है।

तख्तियां कविता- डॉ. अनुजा भट्ट


जहां तुम शिखर हो, वहां वह शून्य है,
जहां तुम शून्य हो, वहां वह शिखर है,
और जहां दोनों समतल हैं,
बस वहीं जीवन में समरसता का स्वर है।
पर यह मार्ग कठिन है!
यहाँ खोजनी हैं कुछ विलक्षण बातें—
अंबर में चमकते तारों जैसी,
लहरों पर तैरती किरणों जैसी।

कोशिश करो, इसे एक खेल बना लो,
तुम उसकी खूबियों की सूची सजाओ,
अपनी कमियों का हिसाब उसे सौंप दो।
और फिर बैठ जाना किसी शाख पर—
जिसमें बची है कुछ हरियाली,
या नरमाई से सूख चुकी हो कोई डाल...
बस बैठ जाना, पक्षियों के गीतों और पत्तियों की सरसराहट के बीच।

वहां तुम अपनी बुराइयां सुनना जी भरकर,
दिल खोलकर करना उनका स्वागत।
हर कमी पर ठहाके लगाना, खुलकर हंसना,
और अपने भीतर का मनस्ताप और अंतर्मन का बिखराव—
सब बाहर बहा देना!
किसी भीतर थमी विषैली हवा की तरह...
मालूम है, यह बहुत कड़वा होगा,
होना ही है!
उसके बाद खिलेगा चट्टान के भीतर से अनूठा ब्रह्मकमल!

जिस धरातल पर हम हैं, वहां अब संकोच की गुंजाइश नहीं,
कुछ पलों के ठहराव के बाद, खुलकर लेना प्राणवायु।
यह सब इतना सहज नहीं, जितना कहना,
लिख दिया मैंने जिस तरलता से, उतना आसान नहीं नीलकंठ बनना!
'निंदक नियरे राखिए' से लेकर 'आग का दरिया' तक,
न जाने कितनी उक्तियाँ हैं,
उतनी ही तख्तियां हैं...
और उन तख्तियों पर उकेरे हुए, सदियों पुराने अनाम शब्द।

सोमवार, 24 अगस्त 2026

मटका सिल्क: परंपरा और फैशन का मेल



भारत की समृद्ध हथकरघा (Handloom) विरासत में कई ऐसे वस्त्र हैं जो अपनी बनावट और सादगी से दिल जीत लेते हैं। इन्हीं में से एक है—मटका सिल्क (Matka Silk)। इसे "सिल्क का लिनेन" भी कहा जाता है। अत्यधिक तड़क-भड़क और तेज चमक के बजाय, मटका सिल्क अपनी अनूठी खुरदरी बनावट (Slubbed Texture) और गरिमामयी 'मैट फिनिश' के लिए जाना जाता है। आज यह पारंपरिक साड़ियों के दायरे से बाहर निकलकर मॉडर्न फैशन और लक्ज़री होम इंटीरियर का एक अहम हिस्सा बन चुका है।
मटका सिल्क का जन्म और बनावट
मटका सिल्क मुख्य रूप से शहतूत के रेशम (Mulberry Silk) के वेस्ट या कटे-फटे कोकूनों से तैयार किया जाता है। पश्चिम बंगाल (मालदा और मुर्शिदाबाद) और वाराणसी इसके मुख्य बुनाई केंद्र हैं। इसके धागे को हाथ से काता जाता है, जिसके कारण इसमें जगह-जगह छोटे-छोटे उभार या गांठें (slubs) आ जाती हैं। यही खुरदरापन मटका सिल्क को एक अनूठा और ऑर्गेनिक लुक देता है। यह कपड़ा वजन में हल्का, हवादार और हर मौसम में पहनने के लिए बेहद आरामदायक होता है।
मटका सिल्क के विविध उपयोग (फैशन से लेकर इंटीरियर तक)
मटका सिल्क की सबसे बड़ी खूबी इसका लचीलापन और मजबूती है। यही कारण है कि इसका उपयोग केवल साड़ियों तक सीमित नहीं है। आइए जानते हैं कि आप इसे अपने जीवन में किन अलग-अलग तरीकों से शामिल कर सकते हैं:
1. एथनिक और फॉर्मल वियर (Traditional & Formal Fashion)
  • शाही साड़ियाँ: मटका सिल्क की ज़री बॉर्डर, जमदानी मोटिफ्स या ब्लॉक प्रिंट वाली साड़ियाँ शादियों, त्योहारों और कॉरपोरेट मीटिंग्स के लिए बेहतरीन विकल्प हैं। यह बेहतरीन फॉल (fall) देती हैं और पहनने पर बेहद शालीन लगती हैं।
  • क्लासिक सूट और शेरवानी: पुरुष और महिलाएँ दोनों ही इसके अनस्टिच्ड फैब्रिक (थान के कपड़े) से कुर्ते, नेहरू जैकेट, अचकन और शेरवानी सिलवा सकते हैं। इसकी कड़क बनावट (crisp texture) पुरुषों के एथनिक वियर को एक बेहतरीन और सधा हुआ ढांचा (structure) देती है।
2. फ्यूजन और वेस्टर्न फैशन (Contemporary Fusion)
  • इंडो-वेस्टर्न जैकेट्स और ब्लेजर्स: यदि आप ऑफिस या किसी खास इवेंट के लिए फॉर्मल लुक चाहते हैं, तो मटका सिल्क से बने ट्रेंच कोट, ब्लेजर्स या लॉन्ग केप्स (capes) पहन सकते हैं। यह फॉर्मल कपड़ों को एक खादी जैसा रॉ और रिच लुक देता है।
  • फ्लेयर्ड स्कर्ट्स और ड्रेसेस: मटका सिल्क के थान से बनी अनारकली ड्रेसेस या लॉन्ग स्कर्ट्स अपनी प्राकृतिक वॉल्यूम (घेर) के कारण बेहद खूबसूरत लगती हैं।
3. लक्ज़री होम इंटीरियर (Luxury Home Interiors)
मटका सिल्क अपनी मजबूती और शानदार बनावट के कारण होम डेकोर और इंटीरियर डिजाइनर्स की पहली पसंद बनता जा रहा है:
  • प्रीमियम पर्दे (Drapes & Curtains): मटका सिल्क के पर्दे खिड़कियों और दरवाजों पर बहुत सलीके से गिरते हैं। इसकी मैट फिनिश के कारण यह सूरज की सीधी रोशनी को छानकर कमरे में एक बेहद वॉर्म और एलीट (Elite) माहौल बनाते हैं।
  • कुशन कवर्स और दीवान सेट्स: लिविंग रूम के सोफे या दीवान के लिए मटका सिल्क के कुशन कवर्स (विशेषकर अजरख या ब्लॉक प्रिंट वाले) पूरे कमरे के लुक को पलक झपकते ही फेस्टिव और रॉयल बना देते हैं।
  • टेबल रनर्स और मैट्स: डाइनिंग टेबल को एक एथनिक और सस्टेनेबल लुक देने के लिए मटका सिल्क के रनर्स का उपयोग किया जा सकता है, जो क्रॉकरी के साथ बहुत खूबसूरत कंट्रास्ट बनाते हैं।
  • वॉल पैनल्स और लैंपशेड्स: आजकल इंटीरियर में मटका सिल्क फैब्रिक को लैंपशेड्स पर लपेटा जाता है। जब लैंप जलता है, तो सिल्क के धागों की खुरदरी बनावट से छनकर आने वाली रोशनी कमरे को एक विंटेज लुक देती है।
निष्कर्ष
मटका सिल्क केवल एक कपड़ा नहीं, बल्कि भारतीय कारीगरी की एक कला है। चाहे इसे साड़ी के रूप में बदन पर लपेटा जाए, या फिर पर्दों के रूप में घर की दीवारों पर सजाया जाए—इसकी सादगी और रॉयल्टी हमेशा हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लेती है। यदि आप सस्टेनेबल, टिकाऊ और एवरग्रीन फैशन व इंटीरियर के शौकीन हैं, तो मटका सिल्क आपके कलेक्शन में जरूर होना चाहिए। 

शनिवार, 22 अगस्त 2026

लंदन फोर्ट- क्या है 'एकार धोती' का रहस्य

संस्कृति हमारी भाषा बोली के साथ-साथ गीत संगीत, दीवारों पर बने चित्र और हमारे चूल्हे की आग, भोजन के स्वाद में भी ज़िंदा रहती है। कभी भी कोई त्यौहार आता है, पापा बहुत खुश होते । वे बहुत उत्सवधर्मी थे। उनको पकवान पसंद थे, खासकर सिंगल और बड़े। पहाड़ी रायता, खीर भी उनकी पसंदीदा लिस्ट में शामिल थे। पर उन्हें मीठा बहुत पसंद था।
सोचती हूं जब हमारे पूर्वज विश्वशर्मा इस पहाड़ी धरती में आए होंगे तो कैसे उन्होंने तारतम्य बनाया होगा। कैसे भाषा सीखी होगी? पर उनका अपनी माटी का असर अब भी हमारी माटी की सुगंध में रचा बसा है। मेरे बहुत सारे दक्षिण भारतीय मित्र हैं। उनसे बात करते हुए मैं बार-बार खुद को टटोलने लगती हूँ। अपने भीतर कुछ खास सा महसूस होता है। सबसे बड़ी और हैरान करने वाली समानता है—मोटे अनाजों (Millets) के प्रति अगाध प्रेम। दक्षिण भारत में खाया जाने वाला 'रागी' ही उत्तराखंड में 'मंडुआ' कहलाता है। कर्नाटक का सबसे प्रसिद्ध ग्रामीण भोजन है 'रागी मुद्धे', जिसमें रागी के आटे को उबलते पानी में घोटकर गोल पिंड बनाए जाते हैं। उत्तराखंड में ठीक इसी विधि से मंडुए के आटे से 'बड़ी' (Baadi) बनाई जाती है। दोनों का स्वाद, दोनों का पोषण और बनाने का तरीका बिल्कुल एक जैसे हैं। इसी तरह दक्षिण भारत में उपवास में खाए जाने वाले मिलेट 'कुथिरवल्ली' को हमारे उत्तराखंड में 'झंगोरा' कहा जाता है। दक्षिण भारत में इसका पोंगल बनता है, तो हमारे यहाँ पहाड़ों में दूध और गुड़ के साथ इसकी 'झंगोरे की खीर' बनाई जाती है। दक्षिण भारत का मशहूर 'मेदु वड़ा' हमारे पहाड़ों में शुभ अवसरों पर बनने वाले 'उड़द के बड़ा' के रूप में दिखाई देता है। दोनों में ही बिना छिलके वाली उड़द की दाल को पीसकर मसाले मिलाकर डीप-फ्राई किया जाता है।
एक और महत्वपूर्ण बात हमारे श्री संप्रदाय से जुड़े इस वैष्णव कुल में भोजन को भगवान का 'यज्ञ प्रसाद' माना जाता था। इस सात्विक मर्यादा को बनाए रखने के लिए हमारी रसोई में शुद्धता के नियम बेहद कड़े थे। हमारी दादियाँ और माताएँ स्नान के बाद केवल 'एक वस्त्र' (एक कपड़े में शुद्ध होकर) ही चूल्हे पर बैठती थीं। जब तक खाना बन न जाए, वे किसी अन्य वस्तु या व्यक्ति को स्पर्श नहीं कर सकती थीं। कुमाऊँनी लोक-संस्कृति में इस परम शुद्ध और एकाग्र शारीरिक-मानसिक अवस्था को 'एकार धोती' कहा जाता था।
यह परंपरा शत-प्रतिशत सुदूर दक्षिण भारत के तमिल और कान्नड़ ब्राह्मण परिवारों की प्राचीन 'मड़ी' (Madi) प्रथा जैसी थी। मान्यता है कि स्नान के बाद शरीर में जो सकारात्मक ऊर्जा और शुद्धता आती है, वह किसी अशुद्ध स्पर्श से नष्ट न हो । मैंने माँ-नानी को बहुत लंबे समय तक इस 'एकार धोती' के कठिन नियमों का पालन करते हुए भोजन बनाते देखा है। खाना बनाते समय बात करना तक वर्जित था, ताकि मुँह की सूक्ष्म बूँदें भी भोजन की शुचिता को खंडित न कर सकें। बस मन ही मन लक्ष्मी-नारायण का नाम स्मरण किया जाता था।
पहाड़ी 'आलू के गुटके' और 'गुझिया' व तीखी 'भांग की चटनी' का तो कोई सानी नहीं। लोहे की कढ़ाई में जब शुद्ध सरसों का तेल गरम होता है, तो आलुओं में 'जख्या' का तड़का लगाया जाता है। जख्या के काले दाने गरम तेल में जाते ही 'चट-चट' की तीव्र ध्वनि के साथ चटकने लगते हैं।
भोजन का यह तरीका भी सुदूर दक्षिण भारत (तमिलनाडु और कर्नाटक) की रसोई से मेल खाता है, जहाँ आलू की सूखी सब्जी या सांबर-रसम की शुरुआत हमेशा 'काली राई' (Mustard Seeds) के चटकते हुए तड़के से होती है। जो काम दक्षिण में काली राई करती है, वही काम हमारे पहाड़ों में जख्या करता है।
वहीं, दक्षिण भारत के भोजन में जो स्थान 'नारियल की चटनी' (Coconut Chutney) का है, वही हमारे कुमाऊँ में भुने हुए भांग के दानों और तिल को सिल-बट्टे पर पीसकर बनाई जाने वाली भांग की चटनी का है। सोचती हूं जब हमारे पूर्वज श्री विश्वशर्मा दक्कन को छोड़कर हिमालय की इन ऊँची वादियों में आए, तो यहाँ नारियल मिलना बंद हो गया। लेकिन उनकी स्वाद-ग्रंथियों को भोजन के साथ वह गाढ़ी, खट्टी-तीखी चटनी खाने की आदत थी। हमारे पूर्वजों ने नारियल के विकल्प के रूप में पहाड़ों में मिलने वाले भांग के बीजों को खोज निकाला। अचरज देखिए, दोनों ही चटनी का गाढ़ापन (Texture) और स्वाद का संतुलन आज भी शत-प्रतिशत एक जैसा ही है।

शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

चातुर्मास कहता है आप फिट रहिए

मैं अपराजिता

28 अगस्त को सावन का महीना समाप्त हो जाएगा।  मान्यता है कि सनातन परंपरा में चातुर्मास (आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक की अवधि) को आत्म-साधना, संयम और शुद्धि का सबसे पवित्र समय है। भगवान विष्णु के चार महीने की योग निद्रा में लीन होने की यह अवधि जितनी पौराणिक और आध्यात्मिक है, उतनी ही वैज्ञानिक और तार्किक भी है।
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 भगवान की योग निद्रा बनाम सूर्य-पृथ्वी की स्थिति सनातनी दृष्टिकोण
पौराणिक मान्यता के अनुसार, वामन अवतार में भगवान विष्णु ने दानवीर राजा बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर पाताल लोक में उनके पहरेदार बनने का वचन दिया था। इसलिए, इन चार महीनों में भगवान पाताल लोक में योग निद्रा में रहते हैं। इस समय ब्रह्मांडीय शक्तियों का प्रभाव धीमा होने के कारण विवाह, मुंडन और गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं।  यह काल पूरी तरह से दक्षिणायन (सूर्य के दक्षिण की ओर बढ़ने) का समय होता है। इस दौरान पृथ्वी पर सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं और दिन छोटे होने लगते हैं। सूर्य की ऊर्जा (Solar Energy) कम होने से इंसानों की शारीरिक और मानसिक ऊर्जा का स्तर भी कम होने लगता है। ऐसे में नए और मांगलिक कार्यों की शुरुआत के बजाय ऊर्जा को संचित करने और आंतरिक विकास (Inner Growth) पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह दी जाती है।

कहानी
जब भगवान बने द्वारपाल 
राजा बलि और वामन अवतार से जुड़ी कथा है। वामन देव भगवान विष्णु के अवतार हैं। असुरों के राजा बलि ने देवताओं को युद्ध में पराजित कर दिया था और स्वर्ग अपने कब्जे में ले लिया था।
बलि की वजह से सभी देवता बहुत दुखी थे। दुखी देवता अपनी माता अदिति के पास पहुंचे और अपनी समस्या बताई। इसके बाद अदिति ने पति कश्यप ऋषि के कहने पर एक व्रत किया, जिसके शुभ फल से भगवान विष्णु ने वामन देव के रूप में जन्म लिया।
वामन देव ने छोटी उम्र में ही दैत्यराज बलि को पराजित कर दिया था। बलि अहंकारी था, उसे लगता था कि वह सबसे बड़ा दानी है। विष्णु जी वामन देव के रूप में उसके पास पहुंचे और दान में तीन पग धरती मांगी।
अहंकार बलि ने सोचा कि ये तो छोटा सा काम है। मेरा तो पूरी धरती पर अधिकार है, मैं इसे तीन पग भूमि दान कर देता हूं।
बलि वामन देव को तीन पग भूमि दान देने के लिए संकल्प कर रहे थे, उस समय शुक्राचार्य ने उसे रोकने की कोशिश की। दरअसल, शुक्राचार्य जान गए थे कि वामन के रूप में स्वयं भगवान विष्णु हैं। शुक्राचार्य ने बलि को समझाया कि ये छोटा बच्चा नहीं है, ये स्वयं विष्णु हैं, ये तुम्हें ठगने आए हैं। तुम इन्हें दान मत दो। ये बात सुनकर बलि बोला कि अगर ये भगवान हैं और मेरे द्वार पर दान मांगने आए हैं तो भी मैं इन्हें मना नहीं कर सकता हूं।
ऐसा कहकर बलि ने हाथ में जल का कमंडल लिया तो शुक्राचार्य छोटा रूप धारण करके कमंडल की दंडी में जाकर बैठ गए, ताकि कमंडल से पानी ही बाहर न निकले और राजा बलि संकल्प न ले सके। वामन देव शुक्राचार्य की योजना समझ गए। उन्होंने तुरंत ही एक पतली लकड़ी ली और कमंडल की दंडी में डाल दी, जिससे अंदर बैठे शुक्राचार्य की एक आंख फूट गई और वे तुरंत ही कमंडल से बाहर आ गए। इसके बाद राजा बलि ने वामन देव को तीन पग भूमि दान करने का संकल्प ले लिया। राजा के संकल्प लेने के बाद वामन देव ने अपना आकार बड़ा कर एक पग में पृथ्वी और दूसरे पग में स्वर्ग नाप लिया। इसके बाद उन्होंने राजा से कहा कि अब मैं तीसरा पग कहां रखूँ? ये सुनकर राजा बलि का अहंकार टूट गया। तब बलि ने कहा कि तीसरा पग आप मेरे सिर पर रख सकते हैं।

बलि की दान वीरता देखकर वामन देव प्रसन्न हुए और उसे पाताल लोक का राजा बना दिया और चाह माह तक उनके  द्वारपाल बने।

जठराग्नि का मंद होना और एक समय भोजन का नियमसनातनी दृष्टिकोण
 चातुर्मास में उपवास, व्रत और दिन में केवल एक बार भोजन (एकभुक्त) करने का विशेष महत्व है। इसे ईश्वर की भक्ति और तपस्या का मार्ग माना जाता है। मानसून और शरद ऋतु के इस संधिकाल में वातावरण में अत्यधिक नमी (Humidity) होती है। धूप की कमी के कारण हमारे शरीर की जठराग्नि (Metabolism/पाचन शक्ति) बेहद कमजोर हो जाती है। यदि इस मौसम में भारी या बार-बार भोजन किया जाए, तो वह पचता नहीं है और पेट की बीमारियों का कारण बनता है। उपवास और हल्का भोजन करने से पाचन तंत्र (Digestive System) को आराम मिलता है और शरीर प्राकृतिक रूप से डिटॉक्स (Detoxify) होता है।

 निषेध खाद्य पदार्थ: पाप से मुक्ति या संक्रामक रोगों से बचाव
सनातन धर्म में चातुर्मास के चारों महीनों में कुछ खास चीजों को खाने की सख्त मनाही है। इसका वैज्ञानिक आधार सीधे तौर पर जीव विज्ञान (Biology) से जुड़ा है:
श्रावण (सावन) साग और हरी पत्तेदार सब्जियां वर्जित हैं। बारिश के कारण पत्तों पर कीड़े-मकोड़े, बैक्टीरिया और फंगस सबसे ज्यादा पनपते हैं। इन्हें खाने से पेट में संक्रमण और कीड़े होने का खतरा रहता है।
भाद्रपद (भादों) दही और मट्ठा पीना निषेध है। इस मौसम में दही शरीर में 'वात' और 'कफ' दोष को बढ़ाता है। नमी वाले वातावरण में दही जल्दी दूषित होता है, जिससे जोड़ों में दर्द, गैस और कफ की समस्या हो सकती है।
आश्विन (क्वार) दूध का त्याग करने की सलाह दी जाती है। बारिश में मवेशी (गाय-भैंस) जो चारा चरते हैं, वह अक्सर गीला और संक्रमित होता है। संक्रमित चारा खाने से दूध की गुणवत्ता प्रभावित होती है, जो मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
कार्तिक दालें (उड़द, चना आदि) और द्विदल (दो भाग वाले अनाज) वर्जित हैं। मौसम में ठंडक की शुरुआत होने के कारण इस समय भारी दालें गैस, कब्ज और अपच (Indigestion) पैदा करती हैं।
 मौन, मंत्र जाप और मानसिक स्वास्थ्य चातुर्मास में मौन व्रत रखने, क्रोध न करने और ईश्वर की भक्ति में मन लगाने का विधान है।वै मानसून के मौसम में धूप की कमी के कारण शरीर में 'मेलाटोनिन' और 'सेरोटोनिन' जैसे हार्मोन्स का संतुलन बिगड़ जाता है, जिससे सुस्ती, उदासी और डिप्रेशन (Seasonal Affective Disorder) होने की संभावना बढ़ती है। सुबह जल्दी उठना, ध्यान (Meditation), मौन और कीर्तन करने से मस्तिष्क में सकारात्मक तरंगें (Alpha Waves) पैदा होती हैं, जो मानसिक तनाव को दूर कर मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाती हैं।

निष्कर्ष
 इसलिए चातुर्मास अंधविश्वास नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीने का एक बेहतरीन लाइफस्टाइल गाइड (Lifestyle Guide) है। जहां सनातनी पद्धति मन को ईश्वर से जोड़कर आध्यात्मिक तृप्ति देती है, वहीं इसका वैज्ञानिक आधार शरीर को मौसमी बीमारियों से बचाकर दीर्घायु प्रदान करता है। वास्तव में, यह चार महीने स्वयं को 'रिबूट' और 'रिचार्ज' करने की एक अद्भुत प्राकृतिक चिकित्सा (Naturopathy) है।

Special Post

नारायणपेट और गायत्री बॉर्डर साड़ी- एक छोटे से कस्बे की लंबी दास्तान

  इस बार चलते हैं दक्षिण मध्य भारत में स्थित तेलंगाना राज्य के एक छोटे से कस्बे नारायणपेट, जिला नारायणपेट, राजधानी हैदराबाद। इस बार अपने साथ...