सोमवार, 17 अगस्त 2026

चंदेरी: शिशुपाल के साम्राज्य से आधुनिक रैंप तक का सफर- डा. अनुजा भट्ट

महाभारत की वह पौराणिक कथा तो आपने सुनी ही होगी, जो चेदिराज शिशुपाल और भगवान श्रीकृष्ण के प्रसंग के बिना अधूरी है। आज जिस चंदेरी को हम दुनिया भर में इसके वैभवशाली फैशन और पर्यटन के लिए जानते हैं, वह कभी महाभारत काल में चेदि राज्य के राजा शिशुपाल की राजधानी 'शुक्तिमती' थी।

इतिहास और भूगोल का संगम

इस प्राचीन साम्राज्य की भौगोलिक सुंदरता को तराशने का काम करती थी यहाँ की जीवनदायिनी 'केन नदी'। आज की केन नदी को प्राचीन समय में कर्णावत, श्वेनी, कैनास और शुक्तिमति जैसे खूबसूरत नामों से जाना जाता था। मध्य प्रदेश के कटनी ज़िले में विंध्याचल की कैमूर पर्वतमाला से निकलने वाली यह नदी पन्ना के जंगलों से कई धाराओं को समेटती हुई, अंत में उत्तर प्रदेश के बांदा ज़िले में यमुना नदी में जाकर मिल जाती है।शिशुपाल की वही ऐतिहासिक राजधानी 'चंदेरी' आज भी भारत के मानचित्र पर एक गौरवशाली स्थान रखती है। लेकिन इतिहास के पन्नों से निकलकर मेरा मन तो शिशुपाल की उस पौराणिक कथा पर अटक सा गया है, जहाँ से इस शहर की किस्मत की बुनावट शुरू हुई थी। चलिए, इतिहास और भूगोल के इस ताने-बाने के बीच, मेरे साथ सुनिए शिशुपाल की अमर गाथा...

नियति का ताना-बाना: एक विचित्र जन्म और आकाशवाणी
रिश्तों के ताने-बाने को देखें तो शिशुपाल भगवान श्रीकृष्ण की बुआ (वासुदेव जी की बहन) और चेदिराज दमघोष का पुत्र था। इस नाते वह रिश्ते में कौरवों और पांडवों का भाई भी लगता था। लेकिन शिशुपाल का जन्म आम बच्चों जैसा नहीं, बल्कि अत्यंत विचित्र और अलौकिक था। जब उसने आँखें खोलीं, तो उसके तीन नेत्र और चार हाथ थे। अपने नवजात शिशु के इस डरावने और असामान्य रूप को देखकर माता-पिता गहरे असमंजस और चिंता में डूब गए। लोक-लाज और भय के कारण उन्होंने भारी मन से इस विचित्र बालक को त्यागने का फैसला कर लिया।
लेकिन नियति को तो कुछ और ही मंजूर था। जैसे ही वे उसे त्यागने बढ़े, तभी एक गूंजती हुई आकाशवाणी हुई—"इस बालक का त्याग मत करो। जब सही समय आएगा, तो इसके ये अतिरिक्त हाथ और आँख अपने आप गायब हो जाएंगे।" मगर इस दिलासे के साथ ही आकाशवाणी ने एक खौफनाक भविष्यवाणी भी कर दी। उसने चेताया कि—"जिस व्यक्ति की गोद में बैठते ही इस बच्चे के अतिरिक्त अंग गायब होंगे, वही व्यक्ति भविष्य में इसका काल (मृत्यु का कारण) बनेगा।"
रिश्तों की बुनावट: 100 अपराधों का दान और सुलगती दुश्मनी
समय का चक्र बीता और एक दिन भगवान श्रीकृष्ण अपनी बुआ के घर चेदी नगरी आए। वहाँ आँगन में नन्हा शिशुपाल खेल रहा था। उसे देखकर श्रीकृष्ण के मन में अगाध स्नेह जागा और उन्होंने मुस्कुराते हुए उस बालक को अपनी गोद में उठा लिया। गोद का स्पर्श पाते ही एक चमत्कार हुआ—शिशुपाल की वह अतिरिक्त तीसरी आँख और दोनों हाथ पल भर में ओझल हो गए।
इस अलौकिक दृश्य को देखकर शिशुपाल के माता-पिता के चेहरे का रंग उड़ गया; उन्हें वह खौफनाक आकाशवाणी याद आ गई कि श्रीकृष्ण ही उनके बेटे का काल हैं। भय से काँपती माँ ने तुरंत श्रीकृष्ण से अपने पुत्र के जीवन की भीख माँगी। अपनी बुआ को गहरा दुःख न देते हुए और विधि के अटूट विधान का सम्मान करते हुए, श्रीकृष्ण ने एक अभूतपूर्व वचन दिया। उन्होंने कहा—"बुआ, मैं शिशुपाल की सौ (100) गलतियों को पूरी तरह क्षमा कर दूँगा, लेकिन याद रहे, 101वाँ अपराध होते ही उसे अपने कर्मों का दंड भोगना होगा।"
प्रेम, प्रतिशोध और राजसूय यज्ञ का मंच
यही शिशुपाल बड़ा होकर विदर्भ देश की राजकुमारी रुक्मिणी से विवाह का स्वप्न देख रहा था। लेकिन इस कहानी में एक और खूबसूरत मोड़ था; रुक्मिणी मन ही मन द्वारकाधीश श्रीकृष्ण को अपना सर्वस्व मान चुकी थीं। रुक्मिणी के भाई, राजकुमार रुक्मी को श्रीकृष्ण का यह रिश्ता स्वीकार नहीं था और वह अपनी बहन की शादी जबरन शिशुपाल से कराना चाहता था। जब प्रेम पर संकट आया, तो श्रीकृष्ण रुक्मिणी की पुकार पर स्वयं विदर्भ पहुँचे और उन्हें उनके ही महल से ससम्मान अपने रथ पर ले आए।
अपनी होने वाली वधू का इस तरह जाना शिशुपाल के अहंकार पर सबसे गहरी चोट थी। इस घटना ने उसके मन में श्रीकृष्ण के प्रति ईर्ष्या और शत्रुता की ऐसी आग सुलगा दी जो कभी ठंडी नहीं हुई। इसी सुलगते प्रतिशोध के बीच, जब हस्तिनापुर में युधिष्ठिर को युवराज घोषित किया गया और इंद्रप्रस्थ में भव्य 'राजसूय यज्ञ' का आयोजन हुआ, तो देश-विदेश के प्रतापी राजाओं को आमंत्रित किया गया। इस ऐतिहासिक और भव्य आयोजन के गवाह बनने के लिए वासुदेव, श्रीकृष्ण और चेदिराज शिशुपाल भी एक ही छत के नीचे एकत्रित हुए, जहाँ नियति अपना अंतिम खेल रचने वाली थी...
अंतिम न्याय: सुदर्शन चक्र और अहंकार का अंत
राजसूय यज्ञ के उस भव्य और गरिमय मंच पर आखिरकार शिशुपाल का सामना भगवान श्रीकृष्ण से हो गया। यज्ञ की परंपरा के अनुसार, जब महाराज युधिष्ठिर ने अग्रपूजा के लिए श्रीकृष्ण का सर्वोच्च आदर-सत्कार किया, तो सभा में बैठे शिशुपाल के भीतर सुलग रही ईर्ष्या की आग भड़क उठी। श्रीकृष्ण को मिला यह सम्मान उसके अहंकार को बर्दाश्त नहीं हुआ और वह भरी सभा में सबके सामने मर्यादा की सारी सीमाएं लांघकर भगवान श्रीकृष्ण को कटु वचन और गालियाँ देने लगा।
पूरी सभा सन्न थी, लेकिन द्वारकाधीश श्रीकृष्ण के चेहरे पर एक असीम शांति थी; वे शांत मन से आयोजन को देखते रहे। शिशुपाल इसे श्रीकृष्ण की कमजोरी समझ बैठा और लगातार उनका घोर अपमान करता रहा। श्रीकृष्ण अपनी बुआ को दिए उस 'सौ अपराधों' के वचन से बंधे थे, इसलिए वे शांत रहकर एक-एक करके उसकी गलतियों को सहते रहे और मन ही मन उसकी गिनती करते रहे।
जैसे ही शिशुपाल के मुख से सौ (100) अपशब्द पूरे हुए और उसके अहंकार ने सीमा पार करते हुए 101वाँ अपशब्द निकाला, वैसे ही क्षमा का समय समाप्त हो गया। श्रीकृष्ण की उंगली से छूटा अलौकिक 'सुदर्शन चक्र' बिजली की गति से हवा में लहराया और पलक झपकते ही शिशुपाल की गर्दन धड़ से अलग हो गई। इस तरह, उस भव्य आयोजन के बीच चंदेरी के राजा शिशुपाल की कहानी और उसकी शत्रुता का हमेशा के लिए अंत हो गया।
साम्राज्यों की बिसात और जौहर की अमर गाथा
चंदेरी का अतीत सिर्फ महाभारत कालीन राजा शिशुपाल की कथा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह शहर सदियों तक महाशक्तियों की रणभूमि रहा है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो यहाँ की रणनीतिक स्थिति के कारण इस मिट्टी पर गुप्त, प्रतिहार, गुलाम, तुगलक, खिलजी, afghan, गौरी, राजपूत और सिंधिया सहित नौ बड़े राजवंशों ने शासन किया और अपनी संस्कृतियों की छाप छोड़ी।
यहाँ के इतिहास का सबसे शौर्यमयी और हृदयविदारक अध्याय तब लिखा गया, जब मुगल शासक बाबर ने चंदेरी पर आक्रमण किया। बाबर की फतह की खबर सुनते ही, चंदेरी के तत्कालीन राजपूत राजा मेदनी राय की पत्नी महारानी मणीमाला के नेतृत्व में 1,600 वीर क्षत्राणियों ने अपने सतीत्व और सम्मान की रक्षा के लिए एक साथ धधकती अग्नि में 'जौहर' कर लिया। चंदेरी के भव्य किले में स्थित जौहर कुंड के पत्थरों का बदला हुआ रंग आज भी उस महान बलिदान और वीरांगनाओं के रक्त-तर्पण की कहानी बयां करता है।
भव्य धरोहरें और पत्थरों पर उकेरा गया सौंदर्य
आज एक सैलानी के रूप में जब आप चंदेरी पहुँचते हैं, तो करीब 70 मीटर ऊँची पहाड़ी पर शान से खड़ा ऐतिहासिक चंदेरी का किला सबसे पहले पर्यटकों को अपनी ओर लुभाता है। इसके अलावा वास्तुकला के बेजोड़ नमूने जैसे कौशक महल, शांत परमेश्वर तालाब, रहस्यमयी बूढ़ी चंदेरी, शहजादी का रोजा (किला), ऐतिहासिक जामा मस्जिद, रामनगर महल, सिंहपुर महल, विशाल बत्तीसी बावड़ी और यहाँ का आधुनिक म्यूजियम इस शहर को जीवंत इतिहास का खुला पन्ना बना देते हैं।
थूबोन जी: 12वीं शताब्दी का आध्यात्मिक वैभव
चंदेरी के इस वस्त्र और ऐतिहासिक वैभव के बीच एक गहरा आध्यात्मिक कोना भी सुरक्षित है। चंदेरी से महज़ 22 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है—'अतिशय तीर्थ क्षेत्र थूबोन जी'। 12वीं शताब्दी में महान दानी पाड़ाशाह द्वारा निर्मित यह पवित्र जैन तीर्थ क्षेत्र अपने आँचल में 26 भव्य जैन मंदिरों का वैभव समेटे हुए है। पाड़ाशाह वही दूरदर्शी पुरुष थे जिन्होंने बजरंगगढ़, सिरोंजी और देवगढ़ के प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण करवाकर वहाँ भी मूर्तियों की प्रतिष्ठा कराई थी। थूबोन जी के इन शांत और अलौकिक मंदिरों में जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ से लेकर चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी तक की अत्यंत प्राचीन और चमत्कारी मूर्तियां विराजित हैं, जो यहाँ आने वाले हर मन को आत्मिक शांति से भर देते हैं।
भूगोल और प्रकृति का घेरा
शिशुपाल के उस गौरवशाली अतीत से निकलकर यदि हम आज के भौगोलिक ताने-बाने को देखें, तो चंदेरी शहर मध्य प्रदेश के अशोकनगर जिले की एक बेहद खूबसूरत तहसील है। चारों ओर से विंध्याचल की हरी-भरी पहाड़ियों से घिरा यह ऐतिहासिक शहर आज भी बेतवा नदी के दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में अपनी सुध-बुध खोए खड़ा है। आज जिसे हम बेतवा कहते हैं, प्राचीन काल में उसे 'वेत्रवती' नाम से पूजा जाता था। मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के कुम्हारागाँव से निकलने वाली और भोपाल, विदिशा, झाँसी, ललितपुर से होती हुई उत्तर प्रदेश में यमुना से मिलने वाली यह नदी सदियों से इस पूरे क्षेत्र के सौंदर्य और संस्कृति को सींचती आई है।
चंदेरी साड़ी: आठ सौ साल पुराना बुनावट का जादू
पहाड़ियों और नदियों के इस संगम के बीच, आज चंदेरी के कण-कण में हथकरघा (Handloom) का संगीत गूंजता है। यह शहर सदियों से अपने हाथ से बुनी अनूठी साड़ियों के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है, जिन्हें आज दुनिया 'चंदेरी साड़ियों' के नाम से जानती है। यहाँ आने वाले पर्यटक आज भी तंग गलियों के पारंपरिक घरों में बुनकरों को जादुई तरीके से ताने-बाने को बुनते देख सकते हैं और अपनी पसंद की साड़ियों की लाइव खरीदारी कर सकते हैं।
चंदेरी के इस वस्त्र-वैभव का इतिहास बेहद राजसी रहा है। एक दौर था जब पूरे मध्य भारत (मालवा, इंदौर, ग्वालियर, बांदा, गढ़ाकोटा, बानपुर, चरखारी, शाहगढ़, रायगढ़) में काशी की बनारसी साड़ियों का चलन बेहद कम था। उस समय ग्वालियर और इंदौर के राजघरानों की आभिजात्य (Elite) महिलाएं सिर्फ और सिर्फ चंदेरी की पारदर्शी, हल्की और चमकदार साड़ियाँ पहनना पसंद करती थीं। यहाँ तक कि स्वयं वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई भी चंदेरी साड़ियों की मुरीद थीं।
चंदेरी की शाही पगड़ी: राष्ट्रभक्ति और शहादत का ताज
लेकिन चंदेरी का हुनर सिर्फ साड़ियों तक सीमित नहीं था; इसकी सबसे बड़ी और हैरान कर देने वाली ख्याति यहाँ बनने वाली 'शाही पगड़ियों' में थी। पिछले 800 सालों से भारत के तमाम राज परिवारों के बीच चंदेरी की पगड़ी आकर्षण और मान-सम्मान का सबसे बड़ा केंद्र रही है। छत्रपति शाहूजी महाराज, ग्वालियर के महाराजा सिंधिया, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और वडोदरा के राजा सहित दक्षिण भारत एवं महाराष्ट्र के तमाम छोटी-बड़ी रियासतों के राजाओं के लिए विशेष पगड़ियाँ इसी चंदेरी की धरती पर तैयार की जाती थीं।
इन पगड़ियों को बनाने और ले जाने की कला भी किसी रहस्य से कम नहीं थी। राजाओं का एक विशेष, बेहद गोपनीय दस्ता कड़ी सुरक्षा और चाक-चौबंद व्यवस्था के बीच इन पगड़ियों को चंदेरी से राजा के महलों तक पहुँचाता था।
इस गौरवमयी इतिहास का सबसे भावुक और वीर प्रसंग भी इसी चंदेरी की पगड़ी से जुड़ा है। देशभक्ति की प्रतिमूर्ति रानी लक्ष्मीबाई चंदेरी की कला पर इतना अटूट विश्वास करती थीं कि वे अपनी एक खास सहेली को विशेष रूप से चंदेरी भेजकर शाही पगड़ी मँगवाती थीं। जब उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ इतिहास का सबसे भीषण युद्ध लड़ा और जब मातृभूमि की रक्षा करते हुए वे शहीद हुईं, तब भी अंग्रेजों की गोलियों और तलवारों के बीच उनके मस्तक को सुशोभित कर रहा था—चंदेरी के बुनकरों के हाथों से बना वही राजसी साफा, वही चंदेरी की पगड़ी...।
इतिहास के कैनवास पर बॉलीवुड का नया रंग
समय का पहिया घूमा और आज चंदेरी का यही रहस्यमयी और खूबसूरत मिजाज देश के सबसे बड़े फिल्म उद्योग यानी बॉलीवुड को भी अपना दीवाना बना रहा है। चंदेरी के प्राचीन मकान, ऐतिहासिक गलियाँ, किले और हथकरघा की आवाज अब दुनिया के सामने बड़े पर्दे पर चमक रही है। यहाँ 'स्त्री', 'सुई धागा' जैसी सुपरहिट फिल्मों के साथ-साथ कई बड़ी वेब सीरीज़ों की शूटिंग भी हो चुकी है। बॉलीवुड के इस ग्लैमर ने चंदेरी के पारंपरिक कपड़ों और पर्यटन को एक वैश्विक पहचान देने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है।
आधुनिक रैंप पर सदियों का गौरव: वैश्विक पहचान का नया दौर
शिशुपाल के पौराणिक साम्राज्य से शुरू हुआ चंदेरी का यह सफर आज दुनिया के सबसे बड़े फैशन रैंप और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुँच चुका है। सदियों पुराना यह ताना-बाना आज सिर्फ एक कपड़ा नहीं, बल्कि भारत की जीवित विरासत का सबसे चमकदार प्रतीक है।
आज देश-विदेश के बड़े-बड़े फैशन डिजाइनर्स चंदेरी सिल्क की इस पारंपरिक बुनावट को आधुनिक वेस्टर्न और इंडो-वेस्टर्न परिधानों के साथ जोड़कर वैश्विक मंचों पर पेश कर रहे हैं। अपनी हल्की बुनावट, राजसी चमक और पारदर्शी लुक के कारण चंदेरी सिल्क आज पेरिस, न्यूयॉर्क और मिलान जैसे अंतरराष्ट्रीय फैशन वीक्स में अपनी धाक जमा रहा है। आज जब कोई आधुनिक महिला या बॉलीवुड की हस्तियाँ गर्व से चंदेरी साड़ी या स्कार्फ पहनती हैं, तो वे अनजाने में ही सही, लेकिन राजा शिशुपाल के इतिहास, वीरांगना लक्ष्मीबाई के शौर्य और चंदेरी के बुनकरों की सदियों पुरानी तपस्या को अपने साथ जीवंत रखती हैं।
समय बदल गया, साम्राज्य बदल गए, लेकिन चंदेरी की हथकरघा की आवाज और उसकी राजसी चमक आज भी उतनी ही अमर है—जो कल भी राजाओं का मान थी और आज भी वैश्विक फैशन का गौरव है।
यात्रा की राह: मालवा-बुंदेलखंड की दहलीज पर बसा चंदेरी
मालवा और बुंदेलखंड की ऐतिहासिक सीमाओं पर स्थित चंदेरी शहर तक पहुँचना बेहद आसान और सुविधाजनक है। यह शहर न केवल मध्य प्रदेश के प्रमुख केंद्रों से सीधे जुड़ा है, बल्कि इसकी सीमाएं उत्तर प्रदेश को भी आपस में जोड़ती हैं।
यदि दूरियों के गणित को देखें, तो चंदेरी की भौगोलिक स्थिति कुछ इस प्रकार है:
    • ललितपुर रेलवे स्टेशन (उत्तर प्रदेश): चंदेरी के किले से महज़ 37 किमी (सबसे नज़दीकी और प्रमुख रेलवे लिंक)
    • भोपाल (मध्य प्रदेश की राजधानी): चंदेरी से करीब 210 किमी
    • ग्वालियर (ऐतिहासिक हवाई अड्डा और शहर): चंदेरी से लगभग 220 किमी
यदि आप देश के किसी भी कोने से चंदेरी आने का मन बना रहे हैं, तो सबसे सुगम रास्ता 'नई दिल्ली - भोपाल मुख्य रेलवे लाइन' है। पर्यटक ट्रेन के माध्यम से उत्तर प्रदेश के प्रमुख व्यापारिक शहर ललितपुर स्टेशन तक आ सकते हैं। ललितपुर से चंदेरी की दूरी महज़ 37 किलोमीटर है, जिसे स्थानीय बसों, टैक्सियों या निजी वाहनों के ज़रिए बेहद आसानी से और कम समय में तय किया जा सकता है।

सोमवार, 3 अगस्त 2026

बारिश के माैसम में बात करेंगे फैशन की - डा. अनुजा भट्ट

पीच शेड पीच एक ऐसा कलर है जो डार्क और लाइट हर तरह के टोन के साथ मैच करता है

रिमझिम फुहार हाे और पार्टी करने का मन हाे  खाने पीने का सब बंदोबस्त हाे ताे बस एक सवाल परेशान कर देता है । आज पहने क्या। ताे दाेस्ताें जब माैसम में इतनी ताजगी हाे और हरियाली बिखरी हो तो ग्रीन कलर फ्रेशनेस का प्रतीक मान लेने में हर्ज ही क्या है। यह वैसे भी मॉनसून के लिए परफेक्ट माना जाता है। साथ ही हर तरह के कॉप्लेक्शन पर यह कलर सूट करता है। अगर आपको वॉर्म टोन वाले कलर्स ज्यादा पसंद हैं तो आप मस्टर्ड ग्रीन, खाकी और डार्क ग्रीन के शेड्स पहन सकती हैं और अगर कूल टोन वाले कलर्स पसंद हैं तो ब्राइट ग्रीन या पैरट ग्रीन कलर के ऑप्शन्स पर जाएं। वाइट या येलो जैसे ब्राइट कलर्स के साथ भी आप ग्रीन को मिलाकर पहन सकती हैं।
पीच शेड पीच एक ऐसा कलर है जो डार्क और लाइट हर तरह के टोन के साथ मैच करता है और मॉनसून के लिहाज से एक क्लासिक शेड है। वैसे तो इस कलर को हर तरह के स्टाइल वाले कपड़ों में पहन सकती हैं लेकिन चूंकि इन दिनों बेल स्लीव्स का फैशन जोरों पर है लिहाजा आप पीच कलर का बेल स्लीव टॉप या शॉर्ट ड्रेस ट्राई कर सकती हैं। साथ ही अपनी ही ड्रेस को हाइलाइट करने के लिए इसे अच्छी तरह से अक्सेसराइज करना न भूलें।
चॉकलेट ब्राउन की बात करूं तो एक वक्त था जब चॉकलेट ब्राउन को सिर्फ ट्रेंच कोट या बूट्स के कलर के तौर पर ही देखा जाता था लेकिन आज के समय में यह कलर यूथ को काफी पसंद आ रहा है। खासकर अगर आप मॉनसून के सीजन में किसी पार्टी में जा रही हैं तो चॉकलेट ब्राउन कलर की मैक्सी पार्टी ड्रेस आपके लिए क्लासी ऑप्शन है।
मॉनसून के दौरान मरून कलर की मैक्सी ड्रेस, जंपसूट, ऑफ शोल्डर टॉप, रफल्स टॉप, कोल्ड शोल्डर टॉप और ड्रेसेज के साथ शॉर्ट ड्रेसेज की भी मांग बढ़ गई है। चूंकि आजकल लोग फैशन में एक्सपेरिमेंट करना ज्यादा पसंद करते हैं लिहाजा आप भी चाहें तो अपने कंफर्ट के हिसाब से चेंज कर सकती हैं।
 तो आपकी क्या राय है।  इस तरह के ढ़ेर सारे आप्शंस के लिए आप हमारे फेसबुक ग्रुप में क्लिक कर सकते हैं।   
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रविवार, 2 अगस्त 2026

लंदन फोर्ट डायरी-बिषाड़ की गूँज और दक्षिण का आगमन


आज एकादशी है। पापा को हमसे दूर गए आज पूरे तीन महीने हो गए हैं। लेकिन पापा, आप कहाँ गए? आप तो हर बार की तरह मेरी स्मृतियों में लौट आते हैं—कोई किस्सा, कोई कहानी या कोई ऐतिहासिक घटना बनकर। मुझे अब समझ आता है कि आपकी सुनाई हर कहानी के पीछे सदियों पुराना एक इतिहास छिपा था। यह लेखन महज़ अतीत को खंगालना नहीं, बल्कि खुद को जानने और अपनी जड़ों को समझने की व्याकुल कोशिश है।

हमारे समाज में बहुत सारी सुंदर प्रथाएँ हैं, तो कुछ कुप्रथाएँ भी हैं। इन सबके पीछे कई सदियों की दास्तानें छिपी हैं, जो कभी लोककथाओं में अपना वजूद तलाशती हैं, तो कभी लोक संगीत की विरह-धूनों में पिघलती रहती हैं। आखिर हम कौन हैं? कहाँ से आए हैं? हमारे पूर्वज कौन थे? यह सवाल ही हमारी इस खोज को मुकम्मल बनाता है।

बम राजाओं का क्रूर दौर और सोर घाटी


हमारी कहानी शुरू होती है १३वीं से १५वीं शताब्दी के मध्यकाल के आस-पास। यह वह दौर था जब महान कत्यूरी राजवंश का पतन हो चुका था और उत्तराखंड के इतिहास में 'बाम' (या बम) राजा पिथौरागढ़ की सोर घाटी के मध्ययुगीन शासक के रूप में उभर रहे थे। 'बाम' नाम सुनने में थोड़ा अटपटा ज़रूर लगता है, इसलिए कयास लगाए जाते हैं कि यह शायद 'ब्रह्म' शब्द का अपभ्रंश रहा हो। मुमकिन है कि वे खुद को उच्च कुल का या दैवीय शक्तियों से प्रेरित शासक सिद्ध करने के लिए इस नाम का प्रयोग करते हों। कुछ इतिहासकार इन्हें पश्चिमी नेपाल के डोटी राजपरिवार व रैका राजाओं के सामंतों की शाखा मानते हैं, तो कुछ इन्हें कत्यूरी राजाओं के ही वंशज कहते हैं।

ये राजा पूरी तरह सामंती और विलासी थे, जो मौसम के हिसाब से अपना ठिकाना बदलते थे। जब पहाड़ों में कड़ाके की ठंड पड़ती और आम जनता ठिठुरती रहती, तब ये राजा सुख-सुविधा के लिए घाटी से नीचे रामेश्वर और बैलोरकोल चले जाते थे। इतिहास में इनके नाम भी बड़े निराले दर्ज हैं—कर्किल बम, काकिल बम, चनारी बम, आर्की बम, ज्ञानी बम, शक्ति बम, विजय बम और हरी बम।

ये बम शासक जितने विलासी थे, न्याय प्रणाली में उतने ही क्रूर और आदिम भी थे। उनके दरबार में अपराध सिद्ध करने के लिए वैज्ञानिक साक्ष्यों के बजाय 'दैवीय परीक्षाओं' (दिव्य परखाओं) का सहारा लिया जाता था। 
कुछ उदाहरण

· गोला-दीप: उबलते हुए तेल में नंगे हाथ डालकर कड़ाही की तली से सिक्का निकालना।

· कढ़ाई-दीप: लाल-गर्म लोहे की छड़ या कुल्हाड़ी को नंगे हाथों से छूना।
यदि व्यक्ति का हाथ नहीं जलता था, तभी उसे निर्दोष माना जाता था।
 मैं इसे इतिहास के एक क्रूर और अमानवीय युग के रूप में दर्ज करती हूँ। आज भी जब समाज के किसी कोने से ऐसी दकियानूसी खबरें पढ़ती हूँ, तो मेरा मन विचलित हो जाता है और यह मेरी आधुनिक आस्था पर एक गहरा प्रहार करता है। स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार, पिथौरागढ़ के कई ऐतिहासिक नौले (पारंपरिक जल स्रोत) और पुराने किले की रक्षात्मक चौकियाँ इन्हीं बम राजाओं ने बनवाई थीं, जिसका जीर्णोद्धार बाद में गोरखाओं ने किया।

श्री विश्वशर्मा: दक्षिण से सोर घाटी का ऐतिहासिक सेतु


इसी निरंकुश और सामंती काल के दौरान पिथौरागढ़ के सोर क्षेत्र में भट्ट ब्राह्मणों का आगमन होता है, जो उत्तराखंड के इतिहास की एक युगांतकारी सांस्कृतिक घटना बनती है। इसके साथ ही पहाड़ी शैली में दक्षिण की लोककलाओं (कोल्लम/ऐपण), खान-पान और सुरों का अद्भुत समागम शुरू होता है। धार्मिक अनुष्ठानों में रुढ़िवादिता की जगह शास्त्रार्थ और बौद्धिक टिप्पणियों को एक बड़ा फलक मिलता है और पहाड़ों में शिक्षा का द्वार खुलता है।

इस महान क्रांति के सूत्रधार थे—श्री विश्वशर्मा (विश्व शर्मा)। वे कोई योजना बनाकर नहीं निकले थे, बल्कि तीर्थाटन (तीर्थ यात्रा) के उद्देश्य से घूमते हुए सुदूर दक्षिण द्रविड़ देश (दक्षिण भारत) से काशी के रास्ते होते हुए कुमाऊं की सोर घाटी पहुँचे थे। जब वे यहाँ पहुँचे, तो तत्कालीन बम राजाओं से उनकी भेंट हुई। राजा उनकी अगाध विद्वत्ता और वेदों के गूढ़ ज्ञान से इतने मंत्रमुग्ध हुए कि उन्होंने विश्वशर्मा को यहीं ठहरने का राजकीय न्यौता दे डाला।

विश्वशर्मा के लिए यह निर्णय लेना अत्यंत कठिन था। उनके लिए यहाँ की वेशभूषा, खान-पान, रहन-सहन और बर्फीली भौगोलिक परिस्थितियाँ बिल्कुल नई और अनजानी थीं। उन्होंने विचार करने के लिए समय माँगा, अपने परिवार से संवाद किया, लेकिन तब तक वे कुमाऊं की अलौकिक सुंदरता और हिमालय के शांत वातावरण में अपना दिल हार चुके थे। अंततः उन्होंने यहीं रहने का फैसला किया। वे उत्तराखंड के इतिहास में एकमात्र ऐसे दक्षिण भारतीय मूल के भट्ट ब्राह्मण माने जाते हैं, जो मध्यकाल में यहाँ आकर रचे-बसे थे।

बिषाड़ गाँव: एक कुल की जागीर से वटवृक्ष बनने तक


बाम राजाओं ने श्री विश्वशर्मा की विद्वत्ता के सम्मान और उनके जीवन निर्वाह के लिए पिथौरागढ़ के पास स्थित 'बिषाड़ गाँव' उन्हें जागीर (भूमि दान) के रूप में भेंट कर दिया। यही वह पावन भूमि है जहाँ से हमारे कुल की शुरुआत हुई। बिषाड़ गाँव में बोया गया यह सांस्कृतिक बीज समय के साथ एक विशाल वटवृक्ष में बदल गया। कालांतर में इस कुल की शाखाएं कुमाऊं के पल्लू, खेतीखान, पांडेखोला, रामनगर, काशीपुर से होती हुई आज देश-दुनिया के अन्य हिस्सों तक विस्तृत हो चुकी हैं।

आगे चलकर इस कुल के विद्वान राजदरबारों में प्रतिष्ठित अधिकारी और मुख्य सलाहकार बने। इन भृगुवंशी और विश्वामित्र गोत्रीय ब्राह्मणों को क्षेत्र के सबसे प्रसिद्ध और जागृत धार्मिक स्थलों—रामेश्वर और थलकेदार—के आचार्य (मुख्य पुरोहित) होने का गौरव भी प्राप्त हुआ। आज भी जब मैं अपने परिवार के रहन-सहन और रस्म-रिवाजों को देखती हूँ, तो मुझे स्पष्ट रूप से उनमें सुदूर दक्षिण भारत की वह पवित्र झलक साफ दिखाई देती है, जिसे श्री विश्वशर्मा सदियों पहले अपने साथ लेकर आए थे।


पिछले अंक
https://mainaparajita.blogspot.com/2026/07/blog-post.html

https://mainaparajita.blogspot.com/2026/06/blog-post_04.html

साल दर साल और एक अजनबी चेहरा- एक कहानी


अंजलि के लिए वह दिन सबसे खौफनाक था। इस दिन तो वह अपने अरमानों की डोली सजाकर आई थी। कई सपने थे, कई उम्मीदें। पर... वह वक्त जब अंजलि ने अपना मायका, अपने सपने और अपनी पूरी पहचान समेटकर मानव के नाम कर दी थी। उसे लगता था कि वह मानव की सांसों की आहट भी पहचानती है। लेकिन आज लगता है जैसे किसी अजनबी के साथ समय गुजारा।

त्याग, प्यार और अटूट विश्वास की धज्जियां उड़ गईं।

उस रात अंजलि कमरे के फर्श पर बैठकर दीवार घड़ी की सुइयों को टिक-टिक करते देखती रही। समय .. उसका मन एक ऐसे कुरुक्षेत्र की जमीन बन चुका था, जहाँ वह खुद ही से लड़ रही थी। उसका मन उससे चीख-चीखकर सवाल कर रहा था— इतने साल उसने यूं ही बर्बाद कर दिए? उसका हर वादा, उसकी फिक्र... सब एक झूठ था? उसे बस एक पैसा कमाने वाली लड़की चाहिए थी। एटीएम... तुम इतनी अंधी कैसे हो गईं कि उसकी परछाईं तक को नहीं पहचान पाईं?"
सुबह की पहली किरण के साथ, अंजलि ने अपनी आँखों के आँसू पोंछे और घर के मंदिर में जाकर बैठ गई जहाँ उसका अटूट विश्वास था। पर आज वहाँ भी सन्नाटा था। फिर भी उसने अपनी बेटी के लिए दिया जलाया। आखिर वह अपना दर्द किससे कहे, उसने पेशेवर मदद ली। अपनी निजी बातें वह किसी से भी साझा नहीं करना चाहती थी। पेशेवर ने कहा, पहले चाय कापी कुछ पी लो फिर बात करते हैं। उसने कहा, जब कोई मिट्टी का बर्तन टूटता है, तो आवाज होती है। लेकिन जब किसी स्त्री का विश्वास टूटता है, तो भीतर एक गहरा सन्नाटा छा जाता है। तुम इस सन्नाटे को अपने अंदर क्यों छिपाए बैठी हो?"

मुझे दर्द इस बात का नहीं है कि उसने मुझे नहीं समझा... मुझे तकलीफ इस बात की है कि आज भी मैं एक अजनबी के साथ कैसे रह रही हूँ। सुनो...

जब तुम नदी में पूरी शिद्दत से तैरती हो, और अचानक नदी अपना रास्ता बदल ले, तो क्या कसूर तुम्हारा होता है? नहीं! कसूर नदी के स्वभाव का है। स्त्री जब खुद के लिए खड़ी होगी, तो अपना एक नया और मजबूत जहान बना सकती है। अपनी शक्ति को पहचानो।

पेशेवर से बात करने के दौरान उसका फोन बज रहा था। स्क्रीन पर 'माँ' का नाम चमक रहा था। अंजलि ने एक गहरी सांस ली, अपने गले के भारीपन को साफ किया और चेहरे पर एक झूठी मुस्कान ओढ़कर फोन उठाया।

"हाँ माँ, प्रणाम. हाँ, मैं बिल्कुल ठीक हूँ। मानव? हाँ, वह भी ठीक हैं, ऑफिस गए हैं। अरे नहीं माँ, कोई परेशानी नहीं है..."

फोन रखते ही अंजलि का कलेजा मुँह पर आ गया। वह डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर ढह गई और सिसक सिसक कर रोने लगी। माता-पिता के सामने अपनी जिंदगी को 'खुशहाल' दिखाना उसके लिए दुनिया का सबसे मुश्किल काम बनता जा रहा था। वह उन्हें कैसे बताती कि जिस बेटी की खुशहाली की वे दुआएं मांगते हैं, उसकी दुनिया अंदर से पूरी तरह उजड़ चुकी है?

अंजलि को वे दिन याद आने लगे जब उन्होंने अपनी गृहस्थी बसाना शुरू किया था। किराए का घर था और उन्होंने अपना घर भी बुक कर लिया था। अंजलि ने अपनी अच्छी-खासी नौकरी सिर्फ इसलिए छोड़ दी थी ताकि वह मानव के करियर को संभाल सके, घर संभाल सके और उसके सपनों को उड़ान दे सके। उसने अपनी हर छोटी-बड़ी ख्वाहिश का गला घोंटा था। उसने अपनी पसंद के कपड़े नहीं खरीदे, अपनी सहेलियों से मिलना छोड़ दिया, यहाँ तक कि अपनी उन किताबों को भी बक्से में बंद कर दिया जो कभी उसकी जान हुआ करती थीं।

उसने सोचा था—"मानव कामयाब हो जाएगा, तो हमारे सारे सपने पूरे हो जाएंगे।"

अंजलि का मन अब एक नए और गहरे दर्द से चीखने लगा—"मैंने जिसके लिए अपने माता-पिता का घर छोड़ा, अपने सुनहरे सपने कुर्बान किए, उसने मुझे क्या दिया? और मैं आज इतनी बेबस हूँ कि अपनी मां, अपने पिता को अपना यह रोना सुना भी नहीं सकती। अगर उन्हें पता चला कि उनकी लाडली इस हाल में है, तो उनका बूढ़ा दिल यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाएगा।"

अंजलि ने महसूस किया कि वह चारों तरफ से दीवारों में कैद हो चुकी है। एक तरफ वह इंसान था जिसके साथ संघर्ष किया पर वह अजनबी निकला, और दूसरी तरफ वे माता-पिता थे जिनसे वह बेपनाह मोहब्बत करती थी पर उन्हें अपना दर्द बता नहीं सकती थी।

तभी अंजलि की नजर कमरे के कोने में रखे उस धूल भरे बक्से पर पड़ी, जिसमें उसके कॉलेज के दिनों के कलर्स और कैनवास रखे थे। उसने उठकर उस बक्से को खोला। धूल हटाकर जब उसने अपनी पुरानी पेंटिंग्स देखीं, तो उसे लगा जैसे उसकी खुद की खोई हुई पहचान उसे पुकार रही हो।

अंजलि को प्रोफेशनल की बात याद आई—"जब तुम खुद के लिए खड़ी होगी, तो अपना एक नया जहान बना सकती हो।"

उसने अपने आंसू पोंछे। उसने तय किया कि वह अपने माता-पिता को रोकर कमजोर नहीं करेगी, बल्कि खुद को इतना मजबूत बनाएगी कि एक दिन वे उस पर गर्व कर सकें। उसने अपनी छिपी हुई कला को, अपने उन सपनों को जिन्हें दफन कर दिया था, दोबारा जिंदा करने का फैसला किया। दर्द अब भी सीने में था, पर अब उसमें बेबसी नहीं, बल्कि चुपचाप अपनी एक नई दुनिया खड़ी करने की जिद थी।

अंजलि के सामने अब सच का वह सिरा आ चुका था, जो पहले धुंधला था। मानव का वह 'अजनबी' बर्ताव उस साये के कारण था जो शादी के वक्त से आज तक उनके बीच खड़ा रहा—उसकी माँ, प्रमिला जी।

उस शाम, अंजलि रसोई में चाय बना रही थी, तभी उसने लॉबी में प्रमिला जी और मानव की फुसफुसाहट सुनी।

प्रमिला जी रोते हुए कह रही थीं, "मानव, अंजलि का मन अब इस घर में नहीं लगता। वह हर बात पर मुझसे चिढ़ती है। मैं तो गाँव छोड़कर तेरे भरोसे यहाँ आई थी, पर अगर मैं ही इस घर में पराई हूँ, तो मुझे कहीं छोड़ आ।"

मानव ने व्याकुल होकर माँ के पैर पकड़ लिए, "नहीं माँ! तुम कहीं नहीं जाओगी। यह घर तुम्हारा है। अंजलि अगर तुम्हें खुश नहीं रख सकती, तो उसे अपनी गलती माननी होगी। मेरे लिए तुम्हारी खुशी से बढ़कर कुछ नहीं है।"

रसोई के दरवाजे के पीछे खड़ी अंजलि के हाथ से चाय का बर्तन छूटते-छूटते बचा। उसका दिल टूटकर बिखर गया। जिस पति के करियर के लिए उसने अपनी अच्छी-खासी नौकरी छोड़ दी थी, वह आज अपनी माँ के बुने जाल में फंसकर अंजलि को ही कसूरवार मान रहा था।

अंजलि ने अपने आँसू पोंछे। उसे समझ आ गया था कि इस घर में उसका संघर्ष किसी बाहरी विलेन से नहीं, बल्कि 'ममता के इस चक्रव्यूह' से है। वह अपने माता-पिता को यह सब बताकर उन्हें दुखी नहीं कर सकती थी, क्योंकि उनके लिए मानव एक आदर्श दामाद था।

अंजलि अपनी पेंटिंग के बक्से के पास जाकर बैठ गई। उसने कैनवास पर एक ऐसी चिड़िया का चित्र बनाया जो सोने के पिंजरे में बंद थी, लेकिन उसका रुख खुले आसमान की तरफ था। अंजलि ने खुद से कहा, "मैं अब और नहीं रोऊँगी। अगर मानव अपनी माँ के जाल से निकलना नहीं चाहता, तो मैं भी इस जाल में घुट-घुट कर नहीं मरूँगी। मुझे अपने पैरों पर खड़ा होना ही होगा।"

उसने चुपचाप इंटरनेट पर नौकरियों के लिए आवेदन (Apply) करना शुरू कर दिया। अब वह मानव से बहस नहीं करती थी, न ही सास की बातों पर कोई प्रतिक्रिया देती थी। उसका यह मौन, उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसके भीतर सुलग रहे एक नए आत्मसम्मान की शुरुआत थी।

यह मोड़ अंजलि के संघर्ष की पूरी तस्वीर बदल देता है। अब उसे समझ आ गया कि जिस कड़वाहट और अजनबीपन को वह सात साल से झेल रही थी, उसकी जड़ें आज की नहीं, बल्कि बहुत पुरानी और गहरी थीं। यह लड़ाई सिर्फ एक पति-पत्नी के बीच की नहीं थी, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे एक स्वार्थी व्यवहार और चालाकी के चक्रव्यूह की थी।

अंजलि के पैरों तले की जमीन खिसक गई थी, जब उसे प्रमिला जी (उसकी सास) के अतीत का पूरा सच मालूम हुआ। मानव की माँ प्रमिला जी, आज ७५ साल की बुजुर्ग थीं। जब वे केवल १८ साल की थीं, तब उनकी शादी अंजलि के ससुर जी से हुई थी। शादी के तुरंत बाद, उन्होंने बड़ी चतुराई से अपने सीधे-साधे पति को अपने जाल में फंसाया और गाँव से लेकर शहर आ गईं।

शहर आने के बाद प्रमिला जी ने अपने ससुराल, सास-ससुर और किसी भी रिश्तेदार से कोई नाता नहीं रखा। वे अपने पति को भी उनकी खुद की माँ के खिलाफ भड़काकर रखती थीं। अंजलि के ससुर जी इतने सीधे-साधे इंसान थे कि वे अपनी पत्नी की हर बात मानते रहे, अपना गाँव-घर छोड़ दिया और अपने माता-पिता को भी। प्रमिला जी ने पूरी जिंदगी अपने पति को उनके परिवार से अलग रखा और अंत में जब ससुर जी का देहांत हुआ, तब प्रमिला जी ७५ साल की उम्र में विधवा हुईं।

अब अंजलि को पूरा खेल समझ आ गया था। प्रमिला जी को इस बात का कोई पछतावा नहीं था कि उन्होंने एक हंसते-खेलते परिवार को उजाड़ दिया था। बल्कि, अब वे वही पुराना खेल अपने बेटे मानव के साथ खेल रही थीं। जो उन्होंने सालों पहले अपने पति के साथ किया था, वही अब वे मानव के दिमाग में अंजलि के खिलाफ जहर घोलकर कर रही थीं। वे मानव को अंजलि से पूरी तरह अलग कर देना चाहती थीं ताकि मानव सिर्फ उनके नियंत्रण में रहे।

अंजलि ने दीवार पर लगी ससुर जी की पुरानी तस्वीर को देखा। उसे लगा कि अगर वह आज चुप रही, तो मानव की हालत भी उसके सीधे-साधे ससुर जी जैसी हो जाएगी। वह भी पूरी जिंदगी अपनी माँ के झूठे जाल में फँसा रहेगा और अपनी पत्नी की खुशियाँ कभी नहीं देख पाएगा।

उस रात अंजलि कमरे में गई, जहाँ मानव और प्रमिला जी बैठे थे। अंजलि के चेहरे पर अब कोई डर या आंसू नहीं था। उसके कदमों में एक ठोस हिम्मत थी।

उसने मानव के सामने प्रमिला जी के गाँव के कुछ पुराने कागजात और ससुर जी की एक पुरानी डायरी रख दी, जो उसे बक्से की सफाई करते वक्त मिली थी।

अंजलि ने सीधे मानव की आँखों में देखकर कहा, "मानव, तुम कहते हो ना कि मैं तुम्हारी माँ का सम्मान नहीं करती? आज ज़रा अपनी माँ के अतीत का इतिहास पढ़ो। १८ साल की उम्र में शादी करके जो औरत शहर आई, उसने अपने सीधे-साधे पति को उनके माता-पिता के खिलाफ भड़काया। तुम्हारे दादा-दादी तड़प-तड़प कर मर गए, लेकिन तुम्हारी माँ ने तुम्हारे पिता को गाँव नहीं जाने दिया। और आज, ७५ साल की उम्र में भी इनके भीतर का वह लालच और असुरक्षा शांत नहीं हुए हैं। जो खेल इन्होंने तुम्हारे पिता के साथ खेला, वही खेल आज ये मेरे और तुम्हारे साथ खेल रही हैं!"

मानव ने गुस्से में कहा, "अंजलि! तुम मेरी माँ पर..."

"चुप रहो मानव!" अंजलि की आवाज पूरे कमरे में गूँज उठी। "मैंने तुम्हारे लिए अपने सपने, अपनी नौकरी, अपने माता-पिता की खुशियाँ सब कुर्बान कर दीं। तुम्हारे संघर्ष में मैं तुम्हारे साथ खड़ी रही क्योंकि मैं तुमसे सच्चा प्यार करती थी। लेकिन तुम्हारी माँ तुम्हें एक कठपुतली बनाकर रखना चाहती हैं। वे तुम्हें अंजलि का पति नहीं, सिर्फ अपना गुलाम देखना चाहती हैं।"

प्रमिला जी ने हमेशा की तरह रोने का नाटक शुरू किया, "मानव! देख, यह क्या कह रही है..."

लेकिन इस बार अंजलि रुकी नहीं। उसने प्रमिला जी से कहा, "अम्मा, आपने अपनी पूरी जिंदगी नफरत और अलगाव में बिता दी। अपने पति को उनके परिवार से दूर रखा, और अब आप अपने बेटे का घर उजाड़ना चाहती हैं? याद रखिए, इतिहास खुद को दोहराता है, लेकिन मैं आपके इस चक्रव्यूह का हिस्सा नहीं बनूँगी।"

अंजलि ने अपना बैग उठाया, जिसमें उसकी पेंटिंग के ब्रश और कुछ जरूरी कागजात थे। उसने मानव से कहा, "मानव, मैं इस घर को छोड़कर जा रही हूँ। अपने माता-पिता को मैं कभी नहीं बताऊँगी कि तुम्हारी गलती क्या थी। मैं उनसे कहूँगी कि मुझे करियर में आगे बढ़ना था। मैं तुम्हें कोई सजा नहीं दे रही। सजा तो तुम खुद को दे रहे हो। जिस दिन तुम्हारी आँखों से अपनी माँ की इस झूठी ममता का पर्दा हटेगा, उस दिन तुम्हें समझ आएगा कि उस औरत को खो दिया जो तुम्हारे लिए अपनी जान दे सकती थी।"

अंजलि बिना पीछे मुड़े घर से बाहर निकल गई। रात की ठंडी हवा उसके चेहरे को छू रही थी। उसका मन अब पूरी तरह शांत था। खुद से होने वाले सारे सवाल अब खत्म हो चुके थे। उसे समझ आ गया था कि गलती उसकी अच्छाई में नहीं थी, बल्कि सामने वाले की फितरत में थी।

पीछे घर में, पहली बार मानव सन्नाटे में खड़ा अपनी माँ के रोने की आवाज सुन रहा था, लेकिन आज उसके आँसुओं में ममता नहीं, बल्कि एक अजीब सा खोखलापन दिखाई दे रहा था। अंजलि के शब्द मानव के दिमाग में हथौड़े की तरह बज रहे थे।

अंजलि ने रेलवे स्टेशन की तरफ कदम बढ़ा दिए। सुबह की पहली किरण के साथ वह अपने सपनों की एक नई उड़ान भरने वाली थी—एक ऐसी दुनिया जहाँ कोई अजनबी नहीं था, जहाँ सिर्फ उसका आत्मसम्मान और उसकी अपनी पहचान थी।

गुरुवार, 9 जुलाई 2026

लंदन फोर्ट वैष्णव भक्ति और अन्यारी देवी का रहस्य


२५ जून, गुरुवार। एकादशी। पापा को हमसे दूर गए आज पूरे दो महीने हो गए हैं। ठीक एक महीने पहले मैंने उन पर पहला स्मृति लेख लिखा था, जिसे पढ़कर आप सभी ने मुझे इसे जारी रखने की प्रेरणा दी। आप सभी का हृदय से आभार।

मेरी इस खोज की कथा में आज फिर राधेश्याम जी उपस्थित हैं। जी हाँ, वही राधेश्याम जी, जिन्हें मेरे पापा अपने अंतिम दिनों में बहुत याद कर रहे थे। वे पापा के मामा भी थे और सखा भी। वे उन्हें क्यों याद कर रहे थे, इसकी कई वजहें मैंने खोजीं, पर सबसे महत्वपूर्ण कड़ी मुझे मिली जाने-माने भाषाविद डॉ. सुरेश चंद्र पंत जी की एक टिप्पणी में। उन्होंने लिखा था:

"इस विवरण के बहुत से पात्रों को देखने का सौभाग्य मिला है। हरीनाथ ताऊजी गाँव के सबसे शालीन व्यक्तित्व थे। राधेश्याम दा परम वैष्णव भक्त थे। उनका वास्तविक नाम लक्ष्मी दत्त था, पर वे राधेश्याम नाम से ही प्रसिद्ध हुए। वे नित्य सुबह-शाम कई घंटे नाम संकीर्तन करते थे। सौम्य और मृदुल व्यवहार; जो एक बार मिल ले, कभी भूल न पाए। उन्होंने अपने बच्चों का नाम भी नारायण और नारायणी रखा था। मेरे पिताजी बताते थे कि अपने निधन से पहले राधेश्याम दा ने परिवार के कुछ लोगों को पोस्टकार्ड लिखकर बता दिया था कि अमुक दिन राधेश्याम नहीं रहेंगे। और अचरज देखिए, ठीक उसी दिन वे विदा हो गए। स्व. देवेंद्र जी (आपके पापा) को अपने निधन से पहले वही अविस्मरणीय व्यक्तित्व याद आया होगा, जिसकी अमिट छाप बचपन में ही उनके मन पर पड़ गई थी।"

निश्चित ही, मेरे पापा इस रहस्य को जानते होंगे। वे मन ही मन खुद से पूछते होंगे—"राधेश्याम को अपने अंत का अहसास पहले ही हो गया, मुझे क्यों नहीं हो पा रहा है?"

पापा, अब तो आप राधेश्याम जी से मिल लिए होंगे। वहाँ ऊपर आप दोनों का समय अच्छा कट रहा होगा। वे भी वैष्णव थे और आप भी। और देखिए न, आप गए भी तो एकादशी के ही पवित्र दिन पर। जहाँ भी हो, खुश रहना, पापा। इस बार हमारी शादी की सालगिरह भी बहुत सूनी रही। उसके ठीक अगले दिन आपका जन्मदिन होता है। काश! आप दो महीने और रुक जाते, तो पूरे ९० साल के हो जाते। आप केक खाते हुए कितने खुश होते थे, आपकी वह मासूम मुस्कान अब मेरी स्मृतियों की स्थायी पूँजी है।

आप हमेशा कहते थे—"कुछ भी हो जाए, लिखना मत छोड़ना।" मेरे पहले पाठक और सबसे पैनी नज़र वाले आलोचक आप ही थे। एक बार आपने मुझे शब्दों की गहराई समझाते हुए कहा था—"शब्दों में भी वजन होता है। जब कविता लिखो, तो शब्दों को हल्का और वाक्यों को छोटा रखो। वजनी शब्दों को लेख के लिए बचाकर रखो।" मैंने तब यूँ ही पूछ लिया था—"कहानी के लिए क्या करूँ पापा?" आपने कहा था—"दृश्य की तरह लिखो।" मैं आज आपकी उसी सीख को पन्नों पर उतारने की कोशिश कर रही हूँ, पापा। तो सुनो, अब आगे की कथा...

सोर घाटी में वैष्णव लहर और श्री संप्रदाय का प्रभाव


आठवीं से बारहवीं सदी के मध्यकाल में उत्तराखंड की धरती पर वैष्णव धर्म का व्यापक असर था। कत्यूरी राजाओं ने बैजनाथ, द्वाराहाट और चमोली में भव्य मंदिरों की स्थापना शुरू की थी, जिनकी मूर्तिकला में वैष्णवी प्रभाव साफ झलकता है। एक दौर ऐसा भी आया जब वैष्णव धर्म मानो राष्ट्र का मुख्य धर्म बन गया था। यह लहर वैसी ही थी, जैसे प्राचीन काल में यूनानी राजदूत हेलियोडोरस (ई.पू. २००) ने विदिशा (भेलसा) में गरुड़ स्तंभ बनवाया था और खुद को गर्व से 'परम भागवत' कहा था। पाणिनि के काल से भी पहले, तैत्तिरीय आरण्यक के 'विष्णु गायत्री' मंत्र में विष्णु, नारायण और वासुदेव का स्पष्ट उल्लेख मिलता है:

"नारायणाय विद्महे वासुदेवया धीमहि तन्नो विष्णु प्रचोदयात्।"

हमारे पूर्वज और तारादत्त जी के बड़े भाई, प्रेम बल्लभ जी इसी गायत्री मंत्र के परम उपासक थे। वैष्णवों के चार प्रमुख संप्रदायों (श्री, हंस, ब्रह्म और रुद्र) में से हमारा परिवार 'श्री संप्रदाय' को मानता है, जिसे आज रामानुज संप्रदाय के नाम से जाना जाता है। इस संप्रदाय के अनुयायी 'श्री वैष्णव' कहलाते हैं। इनका दार्शनिक सिद्धांत 'विशिष्टाद्वैत' है और ये भगवान लक्ष्मी-नारायण की सात्विक उपासना करते हैं।

अन्यारी देवी: वैष्णव कुल में शाक्त कुलदेवी का रहस्य


इस परम वैष्णव पृष्ठभूमि के बीच हमारी अपनी एक कुलदेवी भी हैं—माँ अन्यारी देवी। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में माँ को समर्पित प्राचीन थान (मंदिर) हैं। मन में अक्सर यह जिज्ञासा उठती है कि एक शुद्ध शाकाहारी, वैष्णव कुल में, जहाँ लहसुन-प्याज तक वर्जित है, वहाँ अंधकार की अधिष्ठात्री देवी 'अन्यारी' को कुलदेवी के रूप में क्यों चुना गया?

उत्तराखंड की लोककथाओं और शाक्त मान्यताओं के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में माँ आदिशक्ति परब्रह्म के रूप में प्रकट हुईं। समय, विकारों और विपरीत परिस्थितियों के अनुसार माँ ने अलग-अलग रूप धारण किए। इन्हीं में से अंधकार को नियंत्रित करने वाला रूप 'अन्यारी देवी' (अंधेरी देवी) कहलाया और प्रकाश को समर्पित रूप 'उज्याली देवी' बना।

इस रहस्य को समझने के लिए हमें अपने पुरखों के समय और इतिहास को टटोलना होगा। मेरे भाई बताते हैं कि हमारे प्रतापी पूर्वज श्री तारादत्त भट्ट जी का जन्म सन् १८०२ में हुआ था। वे अपने समय में कुमाऊं क्षेत्र की एक अत्यंत सम्मानित और रसूखदार शख्सियत थे। तत्कालीन ब्रिटिश सरकार से उनके घनिष्ठ संबंध थे। प्रारंभिक ब्रिटिश काल में एक महत्वपूर्ण सरकारी पद संभालने वाले वे बिषाड़ गाँव के पहले व्यक्ति थे। सरकार ने उन्हें स्थानीय लोगों के आपसी विवादों को सुलझाने का न्यायिक अधिकार दिया था। उन्होंने ७८ वर्ष की आयु में अल्मोड़ा के झिझाड़ में अपनी वसीयत लिखी थी। पिथौरागढ़ के बिषाड़ में स्थित हमारा पुश्तैनी मकान 'ठुलकुड़ा' (बड़ा घर), चार गाँव की जागीर और अन्य संपत्तियाँ उन्हीं की मेहनत की बदौलत हैं। वह ऐतिहासिक कमरा, जहाँ बैठकर वे अपनी कचहरी लगाते थे और फैसले सुनाते थे, आज भी ठुलकुड़ा की इमारत में 'तारा भट्ट की कचहरी' के नाम से सुरक्षित है।

अंधकार में छिपी आस्था: इतिहास का एक साक्ष्य


तारादत्त जी के जन्म का वह दौर (सन् १८०२) और उससे पहले का समय मुग़ल हुकूमत के उतार-चढ़ाव और अत्याचारों से भरा था। लगभग ३३० वर्षों के उस दौर में देश के कई हिस्सों में हिंदुओं की धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रहार हुए, मंदिर तोड़े गए। इतिहासकारों और पारिवारिक जनश्रुतियों के अनुसार, संभवतः इसी दमनकारी समय में हमारे पुरखों ने अपनी आस्था को सुरक्षित रखने के लिए एक गुप्त मार्ग चुना।

अपने आराध्य की रक्षा के लिए उन्होंने घने जंगलों या एकांत कक्ष के अंधकार में, रात के समय पूजा करना प्रारंभ किया और अपनी कुलदेवी का नाम 'अन्यारी' रखा, जिसका कुमाऊँनी में अर्थ 'अंधकार' होता है।

चूँकि हमारे पूर्वज परम वैष्णव थे, इसलिए उन्होंने माँ अन्यारी की पूजा में पहाड़ों में प्रचलित पशु-बलि की कुप्रथा को कभी स्वीकार नहीं किया। माँ तामसी नाम के साथ पूजी ज़रूर गईं, पर उनकी पूजा पूरी तरह सात्विक रही—जहाँ बलि के स्थान पर आज भी केवल नारियल चढ़ाया जाता है। यह प्रसाद इतना पवित्र और गुप्त होता है कि इसे केवल हमारे कुटुंब के लोग ही ग्रहण करते हैं, बाहरी व्यक्ति को यह नहीं दिया जाता। इस प्रकार, अन्यारी देवी हमारी कुलदेवी तो हैं, पर उनकी पूजा और प्रसाद का तरीका विशुद्ध वैष्णवी है। यह व्यवस्था हमारे पूर्वजों की बुद्धिमत्ता का एक नायाब उदाहरण है, जिन्होंने विपरीत काल में भी अपनी वैष्णव मर्यादा और कुलदेवी की आस्था, दोनों को जीवित रखा।

नौएडा की इस शांत शाम में, अपनी इस डायरी को विराम देते हुए, मैं पापा को याद कर बृहदारण्यक उपनिषद की उसी प्रार्थना को दोहराती हूँ, जो शायद सदियों पहले मेरे पूर्वजों ने भी उस अंधकार भरे दौर में माँ अन्यारी के सामने दोहराई होगी:

"असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय।"
(हे माँ, मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो। मुझे अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो।



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(इस कथा को कहने में मेरे सहयात्री रहे हैं मेरे बड़े भाई निर्मल भट्ट जी, मदन भट्ट जी और डा. सुरेश चंद्र पंत जी)

शनिवार, 18 जनवरी 2025

मिथक यथार्थ और फेंटेसी का दस्तावेज-डॉ. अनुजा भट्ट

 


(अब पहले की तरह किस्से कहानियों की कल्पनाएं हमें किसी रहस्यमय संसार में नहीं ले जाती क्योंकि हमारी दुनिया में ज्ञान, विज्ञान और समाज विज्ञानों की उपलब्धियों ने इस तरह की घुसपैठ कर ली है कि वे सारी चीजें हमारी जानकारियों आदतों और कल्पनाओं का हिस्सा बन गई हैं। ) यह वाक्य इस किताब का सार कहता है। एक नजर इस किताब पर.

कलबिष्ट खसिया कुल देवता की कहानी एक प्रेमकहानी है। यह कहानी दो जातियों के वर्चस्व और क्षरण की भी कहानी है। इसमें एक और कहानी भी छिपी है जिसमें प्रेम प्रतिदान मांगता है। मुझे इस कहानी में कलबिष्ट के साथ कृष्ण और कमला के साथ राधा भी दिखते है। कलबिष्ट और कृष्ण दोनों ग्वाले हैं और बांसुरी बजाते हैं। राधा और कमला मोहित हैं बांसुरी की तान पर और बांसुरी वाले पर।
दोनो का प्रेम परवान चढ़ता है पर समाज में स्वीकार्य नहीं। कृष्ण और राधा एक दूसरे के पूरक बन जाते हैं पर कलबिष्ट और कमला नहीं। कलबिष्ट अहं, जातिवाद और शोषक और शोषित की भेंट चढ़ जाता है और अंततः एक लोकदेवता के रूप में मूर्ति में निरूपित। क्योंकि वह अजातशत्रु के रूप में जाना जाता है इसलिए वह न्याय का देवता है। जागर उसके बिना अधूरा है।
लोक देवी देवता जो हमारे पुरखे हैं उनको प्रसन्न करने के लिए जागर लगाया जाता है और इस जागर में कलबिष्ट को कई तरह से याद किया जाता है। उसे खुश करने के लिए कई तरह की युक्तियां है संगीत है, आग है और है भयभीत वातावरण। मुक्ति की कामना में उठे हाथ।
कलबिष्ट ग्वाला चरवाहा अपनी बांसुरी के उदास सुरों में समूची बिनसर पहाड़ी में नोमेद संगीत का जादू बिखरेने वाले के रूप में ख्यात हो गया और उस ग्वाले में चंद राजा के दीवान सकाराम पांडे की कलाप्रेमी पत्नी कमला का दिल आ गया। वह पूरा दिन उससे बांसुरी सुना करती।
सकाराम पांडे जिसकी ख्याति नौ लाख का राजस्व उगाहने के कारण नौलखा पांडे के नाम से थी उसके लिए यह सब सुन और देखपाना असहनीय था। जैसा हर पारंपरिक कथा कहानी में होता है वैसा ही यहां भी हुआ कल बिष्ट की बहुत वीभत्स तरीके से हत्या करवा दी गई। उसे मारना आसान नहीं था। उसे सदाशयता का वरदान मिला था इस कारण वह बार बार बच जाता था।
कलबिष्ट मारा जाता है पर उसकी आत्मा विचरती रहती है। अब उसकी पूजा होने लगती है और वह मंदिर में स्थापित हो जाता है। जैसे जैसे प्रसंग आगे बढ़ने लगता है तार्किकता संवेदनशीलता और यथार्थवादी बाजारीकरण की कथा के बीच में आते हैं पुरखे। अन्याय और शोषण सहे पुरखे तथाकथिततौर पर औतरने (नाराज) लगते हैं और फिर धीरे धीरे एक दिन मंदिर में स्थापित हो जाते हैं। उनके बहाने से समाज के पैरोकार एक नया समाजशास्त्र रचते हैं जिसे मानव मन की चाशनी में इस तरह डुबोया जाता है कि यह जानते हुए भी यह सब झूठ है हम सच कहने में डरने लगते है। हमें मानने पर मजबूर किया जाता है कि हमारे पुरखे अपने साथ हुए अन्याय का बदला लेने आ गए हैं वह हमारे सपनों में दस्तक देते हैं और जीवन में जितने भी कष्ट हैं उसके लिए उत्तरदायी है। उनको शांत करने के लिए कुछ किया जाना है। इस कुछ के भीतर एक मायाजाल है। इस मायाजाल में आधुनिक सुखसुविधाओं से लेस यह सामाजिक है जिसे मंहगी गाड़ी फोन जूते घडियां और रत्नों से भरी अंगूठियां से पहचाना जा सकता है। अंगूठियां राशियों पर छाए संकट हरण का प्रतीक हैं। गांव में सौ साल पहले की दादी और ग्वाल्वेकोट की गोपुल्दी जैसे अनेकों किरदार अगल अलग समय में अलग अलग लोगों से रचे जाते हैं। यह किरदार हर बार कहानी में कुछ नया टिवस्ट लाते हैं लिहाजा औतरना (नाराज) भी पहले से ज्यादा भयभीत करता है। कहानी में रोमांच, भविष्य और जिंदगी की ऐसी डोज भरी जाती है कि हर एक के लिए बस यही एक दवा है और इससे मुक्ति के लिए जागर लगता है। वास्तव में जिन जिन को यह पुरखे परेशान कर रहे हैं वास्तव में वह मनोरोगी हैं उनका इलाज किया जाना जाना चाहिए।
पुरखों का डर बिठाना और फिर शांति के लिए एक बड़े इवेंट जागर का आयोजन करना और इस बहाने घर गांव में अपनी पहचान सुरक्षित करना और इस सेल्फी युग में रील बनाना प्रचारित और प्रसारित करना हिट की जद्दोजहद और इसमें भी रार के साथ पुरखा पुराण का पटाक्षेप होता है।
इन सबके खिलाफ बोलने वाला टारगेट किया जाता है और यह टारगेट विश्वव्यापी है। भोज जैसा एक सामान्य सा शिष्टाचार जिसमें परिवार के सब लोग मिलजुलकर हाथ बटाते थे अब केटरर के हाथों में है। मैं उस दौर की प्रत्यक्ष गवाह हूं जिसे मैंने अपने बचपन में जिया। सामूहिकता का अर्थ जहां सृजन था। एपण हो रंग्वाली का पिछौड़ा बनना हो या फिर मिठाई। स्वेटर की बुनाई हो या फिर बहुत कुछ और। सभी के चेहरे पर उल्लास की दीप्ति थी। आधुनिकता और बाजार ने सबसे पहले सामूहिकता पर प्रहार किया। और हमारे भीतर के डर को और मजबूत। कारण यह था कि अपना मन साझा करने के लिए हमारे पास विश्वास के चंद लोग भी नहीं थे। हस्तशिल्प के विकल्प के तौर पर रेडीमेड ने दस्तक दी। तो मोबाइल के मैसेज और स्टेटस ने इन शब्दों का अर्थ पूरी तरह बदल दिया।
इस किताब में लेखक की मनोदशा हमें घर घर की कहानी लगती है। जिस संवेदनशीलता से लेखक ने इस प्रसंग को लिखा है वह साहस और दूरगामी सोच को लक्षित करता है। इतिहास में हम देखते हैं कि जब जब सामाजिक जागरण की बात हुई तब तब ऐसे नायक को समाज ने किस तरह लिया। राजाराम मोहन राय जैसे लोगों की आज भी जरूरत है क्योंकि अधिकांश कहानियों में पात्र स्त्री ही है। वह ही दंडित है वह ही लक्षित।
लेखक भी समाज की इस विसंगति का शिकार होने से बच नहीं पाता। वह लिखता है
अपने ही जीवन में मानो मेरा पुनर्जन्म हो चुका था जिसे मैं महसूस कर रहा था मगर स्वीकार नहीं कर पा रहा था मैं ऐसी विसंगति का हिस्सा बन चुका था जो मेरी वास्तविकता तो थी मगर मैं उससे जल्दी से जल्दी मुक्त होना चाहता था।
इस किताब में कई सवाल है जो साथ साथ चलते हैं जाति का सवाल भी इससे ही जुड़ा है। लेखक जैसे खुद की खोज भी करता है। वह इसके लिए इतिहास मिथक और भूगोल के साथ सामाजिक तानेबाने पर भी नजर रखता है। वह बार बार दोहराता है कि जब सब जातियां एक बराबर है जब सब मनुष्य एक जैसे हैं तो यह वर्ण व्यवस्था कहां से आई। क्यों बनाई गई। मनुष्य के मन में मनुष्य के प्रति सीमाएं क्यों तय की गई। अगर ऐसा न होता तो राधा कृष्ण के बीच में कोई न होता और कमला और कलबिष्ट के बीच में भी।
इस किताब में लोकोक्ति की भी विवेचना है जो कहानी सा रस देती है। कई लेखकों और विचारों को भी लिया गया है। यह इस लिए भी महत्वपूर्ण है कि इससे हमें कथा के नए आयाम भी पता चलते हैं जो एक नया दृष्टिकोण बनाते हैं। मिथकीय कहानियां हमें देवीदेवता के परंपरागत रूप से अलग रूप का भी परिचय देती हैं। यह मूर्तियां उस समय के समाज और उसका मन पढ़ने के लिए काफी है।
कलबिष्ट- खसिया कुलदेवता
लोकदेवता के बहाने उत्तराखंड का सांस्कृतिक आख्यान
लेखक- बटरोही
प्रकाशक -समय साक्ष्य देहरादून
मूल्य- 125 रुपये

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2024

विदा - कविता- डा. अनुजा भट्ट



विदा

मैं , मैं नहीं एक शब्द है

हुंकार है

प्रतिकार है



मैं का मैं में विलय है

इस समय खेल पर कोई बात नहीं

फिर भी...

सच में मुझे क्रिक्रेट में कोई रूचि नहीं

फिर भी

मैं सचिन तंडेलुकर की गेंद की तरह उछलना चाहती हूं

टप्पे पर टप्पे मार कर हवा के उस अंतिम छोर पर पहुंचकर

धरती में गिर जाना चाहती हूं

अनगिनत गेंदों से नहीं असंख्य शब्दों से खेलती और जीती उन क्षणों को

खुद और पूरी कायनात के साथ

मैं लेना चाहती हूं अब विदा

न्यूटन का सिद्धांत मुझे प्रिय है

हालांकि मैं विज्ञान के बारे में ज्यादा जानती नहीं

पर शोध से हर रोज गुजरती हूं

फिर भी

अपनी मुट्ठी में भींचकर कोई रूमाल

सर्द रात और कंपकंपाती ठंड में

पसीने से तरबतर हो

ऐसा है मेरा ख्वाब

मैं उस ख्वाब को अपनी उंगुलियों में

महसूस करते हुए

मुट्ठी में भर लेना चाहती हूं

निचोड़ कर रख देना चाहती हूं रूमाल

रूमाल जिसके चार कोने हैं

चार दिशाएं हैं

और चारों दिशाओं की साझेदार एक पोटली है

पोटली जिसमें सिक्के जमाते हैं कुछ

पोटली जिसमें सुदामा ने जमाए तंडुल

सिक्के जमाने वाले और तंडुल जमाने वाले सुदामा में मेरी कोई रूचि नहीं

मुझे न विपन्नता के गीत पसंद हैं

और न संपन्नता के किस्से

मुझे बस सचिन की तरह

अपने मानिंद एक गेंद चाहिए

जिसके हर टप्पे पर टप्पे पर टप्पे पर टप्पे पर

घूमते हुए वह हवा के साथ उछले

उसी को लपकने के लिए उठे हाथ

पर वह गिरे धरती पर

धरती पर

धरती पर

सचिन ने गेंद चूमी कई कई बार

मैं चूमना चाहती हूं

शब्द कई कई बार

सचिन को गेंद को स्पर्श करते दुलराते कई कई बार देखा मैंने

मैं शब्दों को दुलराना चाहती हूं

ओम ही ओम हैं

जिसे जन्मा था प्रकृति ने

प्रकृति की कोख में पहला नाद ओम है

स्त्री की कोख में पहला नाद मां

उस पहली बार सुने शब्द को

मैं अपनी आत्मा के किसी सूक्ष्म से सूक्ष्म कण में

अपनी ही प्राणवायु से खींचकर गर्भ में पुनःस्थापित कर

मैं विदा लेना चाहती हूं

बाकि उसके बाद के सब निरर्थक संवेदनहीन शब्दों को

मैं पोटली में सिक्के और तंडुल की तरह

खुद से अलग कर देना चाहती हूं

हवा में गूंजते इन शब्दों में

अब आक्सीजन नहीं रही

जो प्राणवायु की उम्मीद दे सके

उम्मीद ही तो आपको कमजोर बनाती है

मैं उम्मीद की उस विपरीत धारा में

नाउम्मीद का शपथपत्र भरना चाहती हूं

मैं विदा लेना चाहती हूं।

गुरुवार, 3 अक्टूबर 2024

नवरात्रि - नाै व्यंजन, भक्ति शक्ति और जायका



साबूदाना वड़ा






सामग्री
साबूदाना- 1/2 कप
उबला आलू- 1
भूनी हुई मूंगफली- 1/3 कप
जीरा- 1/2 चम्मच
कद्दूकस किया अदरक- 1 चम्मच
बारीक कटी हरी मिर्च- 1 चम्मच
बारीक कटी धनिया पत्ती- 2 चम्मच
नीबू का रस- 1 चम्मच
तेल- तलने के लिए

विधिसाबूदाना को धो लें और लगभग एक 1/3 कप पानी में चार से पांच घंटे तक डुबोकर रखें। जब साबूदाना सारा पानी सोख ले तो उसमें तेल के अलावा अन्य सभी सामग्री डालकर मिलाएं। मिश्रण को आठ हिस्सों में बांटें और उसे गोल आकार दें। कड़ाही में तेल गर्म करें और वड़ा को सुनहरा होने तक पकाएं। टिश्यू पेपर पर रखें ताकि अतिरिक्त तेल निकल जाए। हरी चटनी के साथ गर्मागर्म सर्व करें।

नवरात्रि आलू



सामग्रीआलू- 4
तेल- तलने के लिए
ऑरिगेनो- 1 चम्मच
नीबू का रस- 1 चम्मच
सेंधा नमक- स्वादानुसार
लाल मिर्च पाउडर- 1/2 चम्मच
(काली मिर्च पाउडर भी डाल सकते हैं)

विधिआलू को धो लें और आधे इंच लंबे और आधे इंच चौड़े टुकडे़ में काट लें। आलू के इन टुकड़ों को बर्फ वाले पानी में आधे घंटे के लिए डुबोकर रखें। जब आलू को तलना हो, उससे ठीक पहले उन्हें पानी से निकालें और टिश्यू पेपर की मदद से पानी को पूरी तरह से सुखा लें। कड़ाही में तेल गर्म करें और आलू के टुकड़ों को सुनहरा होने तक तलें। आलू के टुकड़ों को लगातार पलटती रहें। आलू को कड़ाही से निकालें और उन्हें टिश्यू पेपर पर रखें ताकि अतिरिक्त तेल निकल जाएं। तले हुए आलू पर ऑरिगेनो, लाल मिर्च पाउडर, नमक और नीबू का रस छिड़कें। सर्व करें।

मोतिया पुलाव



सामग्रीसामक के चावल- 2 कप
टमाटर- 1
हरी मिर्च- 2
कटी हुई धनिया पत्ती- 2 चम्मच
पनीर- 1 कप
खोया- 1/2 कप
सिंघाड़े का आटा- 2 चम्मच
घी- 4 चम्मच
सेंधा नमक- स्वादानुसार

विधिसामक के चावल को धोकर कुछ देर के लिए किसी अखबार पर फैला दें ताकि अतिरिक्त पानी हट जाए। अब एक चम्मच घी गर्म करें और सामक के चावल को हल्का सुनहरा होने तक भूनें। सेंधा नमक और दो कप पानी डालें। पानी में एक उबाल आने के बाद आंच कम करें और चावल पकाएं। गैस ऑफ करें और चावल को 10 से 12 मिनट तक ढककर रखें। टमाटर के बीज निकालें और उसे काट लें। हरी मिर्च भी काट लें। खोया को मैश करें और उसमें एक चम्मच सिंघाड़े का आटा और पनीर डालकर आटे की तरह गूंदें। आटे की बहुत ही छोटी-छोटी लोई बनाएं और उस पर सिंघाड़े का आटा लगाएं। बचे हुए घी को कड़ाही में गर्म करें और उसमें पनीर और खोया बॉल्स को सुनहरा होने तक तलें। पनीर बॉल्स, कटे टमाटर, हरी मिर्च और धनिया पत्ती को तैयार पुलाव में डालकर मिलाएं और खीरे के रायते के साथ सर्व करें।

मखाने की खीर



सामग्रीदूध- 5 कप
मखाना- 1 कप
चीनी-1 चम्मच
जायफल पाउडर- 1/4 चम्मच
केसर- चुटकी भर
घी- 1 चम्मच
कटा हुआ पिस्ता- गार्निशिंग के लिए

विधिपैन में घी गर्म करें और उसमें मखाना डालकर उसे दो से तीन मिनट तक भूनें। गैस ऑफ करें और मखाने को दरदरा पीस लें। नॉनस्टिक पैन में दूध डालें और जब उसमें एक उबाल आ जाए तो मखाना उसमें डालें और दो से तीन मिनट तक पकाएं। चीनी, जायफल पाउडर और केसर डालकर अच्छी तरह से मिलाएं। गैस ऑफ करें। पिस्ता से गार्निश करें और सर्व करें।

फलाहारी पनीर



सामग्री
छोटे टुकड़ों में कटे पनीर- 250 ग्राम
कटी हुई धनिया पत्ती- 4 चम्मच
अदरक- एक गांठ
हरी मिर्च- स्वादानुसार
मलाई- 1 कप
दूध- आधा कप
सेंधा नमक- स्वादानुसार
घी- 1 चम्मच

विधिटमाटर को हल्का-सा उबाल कर छिलका उतार लें और टमाटर, अदरक और मिर्च का पेस्ट तैयार कर लें। मलाई और दूध को एक बर्तन में डालकर अच्छी तरह से फेंट लें। कड़ाही में घी गर्म करें और धीमी आंच पर टमाटर वाले पेस्ट को सुनहरा होने तक भूनें। स्वादानुसार नमक भी मिला दें। अब कड़ाही में फेंटी हुई मलाई को डालें। मलाई का रंग बदलने तक उसे चलाती रहें। जब मलाई और मसाला अच्छी तरह से फ्राई हो जाए, तो उसमें पनीर के टुकड़े डाल दें। अच्छी तरह मिक्स करके गैस ऑफ कर दें। धनिया पत्ती से गार्निश कर सर्व करें।

केले का चिप्स



सामग्रीतेल- तलने के लिए
काली मिर्च पाउडर- 1/2 चम्मच
सेंधा नमक- स्वादानुसार
कच्चा केला- 6

विधिकेले का छिलका उतारें। बर्फ वाले ठंडे पानी में नमक डालें और केले को उसमें 10 मिनट के लिए रखें। केले को पतले-पतले स्लाइस में काटकर पानी में ही डालें। कटे हुए केले को पानी में 10 मिनट और रहने दें। कड़ाही में तेल गर्म करें। केले के टुकड़ों को पानी से निकालकर किसी कपड़े पर रखें ताकि केले से सारा पानी हट जाए। तेज गर्म तेल में केले के टुकड़ों को डालें और तल लें। ऊपर से सेंधा नमक और काली मिर्च पाउडर डाल कर पेश करें।



लौकी की खीर



सामग्रीकद्दूकस किया घीया- 1 कप
दूध- 1 लीटर
चीनी- 1 कप
इलायची पाउडर- 1/2 चम्मच
मेवे- 2 चम्मच

विधिदूध को लगभग 20 मिनट तक धीमी आंच पर बीच-बीच में चलाते हुए उबालें। कद्दूकस किया हुआ घीया डालें और दूध के गाढ़ा होने तक पकाएं। चीनी डालकर मिलाएं और पांच मिनट और पकाएं। इलायची पाउडर और मेवे डालकर मिलाएं। गैस ऑफ करें और सर्व करें।



नारियल बर्फी



सामग्रीघी- 1 चम्मच

कद्दूकस किया नारियल- 3/4 कप

बूरा- 5 चम्मच

खोया- 2 चम्मच

केसर- चुटकी भर

पीला फूड कलर- कुछ बूंद

विधिघी और नारियल को माइक्रोवेव सेफ बर्तन में डालकर माइक्रोवेव में एक मिनट तक पकाएं। बूरा (चीनी का पाउडर) डालकर मिलाएं और माइक्रोवेव में सबसे ऊंचे तापमान पर दो मिनट पकाएं। खोया, दूध, केसर और फूड कलर डालकर मिलाएं और माइक्रोवेव में दो मिनट और पकाएं। मिश्रण को चिकनाई लगी किसी प्लेट में डालें और चम्मच के पीछे वाली साइड की मदद से फैलाएं। जब बर्फी थोड़ी ठंडी हो जाए तो उसे फ्रिज में कम-से-कम एक घंटे के लिए रखें। बर्फी के आकार में काटें और सर्व करें।

कुट्टू के दही बड़े



सामग्री
कुट्टू का आटा- 1 कटोरी
दही- 1 किलो
घी या तेल- आवश्यकतानुसार

हरी चटनी की सामग्री
धनिया पत्ती, हरी मिर्च और सेंधा नमक

मीठी सोंठ की सामग्री
इमली, चीनी, सेंधा नमक, काली या लाल मिर्च

विधिकुट्टू के आटे को एक बर्तन में डालकर उसका घोल तैयार करें और उसे10 मिनट तक छोड़ दें। 10 मिनट बाद उसमें दही डालकर अच्छी तरह से फेंट लें। घोल को उतना ही पतला रखें, जितना दाल के बड़े बनाते वक्त रखते हैं। कड़ाही में घी या तेल गर्म करें और बड़े तैयार करें। सारे बड़े तैयार करने के बाद उन्हें तेज गर्म पानी में डालें। इससे बड़े से अतिरिक्त तेल निकल जाएगा। बाकी आधा किलो दही को एक बर्तन में डालकर अच्छी तरह से फेंट लें और उसमें नमक और मिर्च पाउडर मिला दें। धनिया पत्ती को धोकर उसकी चटनी तैयार करें और उसमें सेंधा नमक और नीबू डालें। हरी चटनी तैयार है। इमली को दो-तीन घंटे पहले पानी में भिगो दें। अब उसको हाथ से मसलकर बीज को निकाल दें। इमली के गूदे को एक पैन में डालकर उसे चीनी, नमक और मिर्च के साथ पकाएं। अब बड़ों को पानी से निकालें। फेंटा हुआ दही उसके ऊपर डालें। उसके ऊपर हरी चटनी और मीठी सोंठ डालकर सर्व करें।

साभार- दैनिक हिंदुस्तान

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