बुधवार, 12 दिसंबर 2018

प्लाजो को करें विदा और सरारा गरारा को करें नमस्ते अनुजा भट्ट



फैशन में हर बार कुछ ऐसा होता है जिसे हर कोई अपनाता है। अभी पिछले साल पामपाम फैशन में था। पहनावे से लेकर चप्पलों तक, घर की सजावट ले लेकर जूड़े तक। हर जगह यह अपनी खास अदा के साथ मौजूद था। अब पाम पाम की जगह चुन्नटों ने ले ली है। यह चुन्नटें कई तरह से है। कहीं यह परत दर परत है तो कहीं आड़े तिरछे। कहीं चुन्नटें अलग अलग किस्म की आकृतियां बनाती हैं ते कहीं एकदम सादा। कहीं भड़कीलें रंगों के साथ सजती हैं तो कहीं हलके रंगों के साथ मेल करती हैं। कभी कुर्ते में, तो कभी साड़ी में, कभी लंहगे में, कभी ब्लाउज में तो कभी बैग या पर्स में भी...
लंबी कुर्ती हो या ब्लाउज इनके आकर्षण का मुख्य केंद्र है अलग अलग तरह से चुन्नटों का प्रयोग। गले के डिजाइन से ज्यादा जोर इस बार कंधों को आकर्षक बनाने में किया जा रहा है। चूड़ीदार पजामा और अंगरखा स्टाइल के कुर्ता की मांग इस मौसम में सबसे ज्यादा है।

उत्सव और शादी ब्याह के इस मौसम की जानकारी सभी के पास है और सभी इस मौके पर सुंदर दिखना चाहते हैं। अपनी अलमारी को सहजने का यह सुंदर मौका है। और आप भी चाहेंगे कि आपके पहनावे में नयापन हो। लेकिन, जब आपकी नजर पुरानी कढ़ाई वाले लंहगे और नीरस सी दिखने वाली शेरवानी पर पड़ती है तो आप मायूस हो जाते हैं। यह बहुत स्वभाविक है। यह सब आपके साथ ही नहीं हो रहा है। कहने का अर्थ यह है कि इस तरह की परेशानी आपकी अकेले की नहीं है। लेकिन मैं आपको बताऊं आजकल के युवा लोग पहले से अधिक प्रयोग करने के इच्छुक हैं।

बदलाव के लिए सबसे पहला प्रयोग हम रंगें के साथ ही करते हैं। फैशन में रंगों का महत्व हमेशा रहा है। रंग और पहनावे के शिल्प में थोड़ा बहुत परिवर्तन करके आप अपने परिधान को नयी सजधज के साथ पहन सकते हैं जिसे लोग पसंद भी कर रहे हैं। अभी भी शादी ब्याह के मौके पर लोग परंपरागत परिधान के ही महत्व देते हैं। इसलिए, एक तरफ, शरारा और गरारा जैसी पोशाक दुबारा से फैशन में छायी हुई है पर देखने वाली बात यह है कि शरारा गरारा के चमकीले रंगों की जगह अब गैर परंपरागत रंग पसंद किए जा रहे है। चमकीले की जगह हलके रंगों ने ले ली है। पहनावे में कई तरह के शिल्प और कलाकारी का प्रयोग एक साथ है। घेरदार पहनावे में चुन्नटों का प्रयोग भी है।

कंधा है खास

डिजाइनर प्रिया कटारिया पुरी कंधों पर ध्यान आकर्षित करने के लिए धनुष, कपड़े के फूल, पंख, फ्रिंज और पफ आस्तीन जैसे सजावट चुनने का सुझाव देती हैं, जबकि ब्लॉगर ब्रिंडा शाह कंधों के डिजाइन के लिए कढ़ाई, पैड और अन्य सजावट की पेशकश करती हैं।




फैशन डिजाइनर बर्बर कहती हैं कि शादी के इस मौसम में बहुत ज्यादा कसीदाकारी वाली शेरवानी पसंद किए जाने की उम्मीद कम ही है। कुर्ता और स्लिमकट शेरवानी इस मौसम में खास है।अलीगड़ी शेरवानी और अलीगड़ी पैंट फैशन में है। शेरवानी की उंचाई पहले से कम है।

इसकी वजह यह है कि कोई भी खुद को बोरियत भरे अहसास के साथ नहीं देखना चाहता। नए रंग, नयी सजधज का दिवाना हर कोई है चाहे वह पुरूष हो या स्त्री।

डिज़ाइनर अर्पिता मेहता कहती हैं ,अपने लंहगे को आकर्षक बनाने एक और आसान तरीका है अपने चोली या ब्लाउज के ऊपर एक केप या पोंचो को पहन लें। केप और पेंचों दोनो ही इस समय खूब पसंद किए जा रहे है।



चुन्नटदार लंहगे के साथ स्कर्ट भी खूब चल रही है। साड़ी पहनने का अंदाज अब पूरी तरह बदला है। स्कर्ट, और ढीले ढ़ाले पैजामे के पसंद करने वालोंकी संख्या में इजाफा हुआ तो साड़ी को भी आरामदायक बनाने की कोशिशें तेज हुईं। फैशन में चुन्नदार साड़ी आई जो काफी लोकप्रिय हो रही है। चुन्नटों का प्रयोग सिर्फ परंपरागत परिधानों में ही नहीं हुआ आधुनिक परिधान भी इससे खूब सजे। 1990 में भी यह फैशन में आया था पर तब लोगों ने इसे ज्यादा पसंद नहीं किया। पर इस बार इसके कद्रदानों में फिल्मी हस्तियां भी शामिल है। पल्लू में छोटी चुन्नट और प्लेट्स के सामने वाले हिस्से में बड़ी चुन्नटों का प्रयोग इसे अभिनव बना रहा है। इस तरह की साड़ी जार्जेट औक शिफान में पसंद की जा रही है।



लंबी आस्तीन

साड़ी के साथ अब लंबी बाजू वाले ब्लाउज का फैशन है। कह सकते है 1990 के दशक का फैशन नई सजधज के साथ लौटा है। लेकिन यह आस्तीन सादी नहीं है। इसमें भी चुन्नटों का प्रयोग है और ऊपर से यह फूली हुई है। इसे पफ स्टाइल कहा जाता है।

चूड़ीदार पैंट के साथ साड़ी

साड़ी अभी भी लोकप्रिय हैं बस इसे अब पेटीकोट के बजाय चूड़ीदार पैंट के साथ पहना जा रहा है। यह पेंट साड़ी के साथ दिखाई देती है। इसके साथ आप आर्टिफिशियल ज्वैलरी पहन सकती हैं। जिस साड़ी का चुनाव करें वह हलके कपड़े में होनी चाहिए। पीला लाल और नीला रंग इस बार फैशन में हैं इसके हलके और गहरे शेड में से आप कुछ भी चुन सकते हैं।

यदि भारी, अत्यधिक सजावट वाले लहंगे के देखकर आप अटपटा महसूस कर रहे है और आपको नवंबर की सर्दी में भी गर्मी का अहसास हो रहा है तो आप अपने लिए गहरे रंग के लंहगे का प्रयोग करें और उसके साथ फूलों के प्रिंटवाली जैकेट पहनें। पुरूष भी फूल प्रिंट वाली जैकेट पहन सकते हैं। चुन्नटों वाले लंहगे और साड़ी इस समय का नवीनतम फैशन है एक बार आप भी आजमाएं।

प्लाजो को करें विदा और सरारा गरारा के करें नमस्ते. जी हां यह चलन है इन दिनों। इसके साथ ही आप लंबी या छोटी जैकेट जैकेट भी पहन सकती हैं। साड़ी के साथ कोट ब्लैजर या जैकेट भी इन दिनों खूब पसंद की जा रही है।

तो आप भी इस त्यौहार में सजने संवरने के लिए तैयार हो जाइए। क्रिसमस से लेकर शादी तक के निमंत्रणपत्र तैयार हो चुके हैं। बस आप अपने निमंत्रण पत्र का इंतजार कीजिए।

फैशन ये कहता है यारा तुझमें मैं, मुझमें तू.. अनुजा भट्ट


फैशन में यह समय जड़ों की तरफ लौटने का है। हम अपने प्राचीन संगीत नृत्य और ताल को खोज रहे हैं। परंपरागत पहनावे और संस्कृति को महत्व दे रहे हैं। हमारी बोली बानी में भले ही अंग्रेजियत रच बस गई हो पर जब बात उत्सव की आती है तो हम अपनी संस्कृति को याद करते हैं। परंपरा के अनुसार पहले शादी के अवसर पर परिवार के सभी सदस्य एक जैसी पगड़ी या साफा पहनते थे और परिवार की महिलाएं दुप्पटा या ओढ़नी. फिर सब कुछ बदल गया था. लेकिन अब हम वापसी कर रहे हैं...
शादियों में फैशन हर साल एक नया ट्रेंड लेकर आता है जिसे सब महसूस करते हैं। पिछले साल तक शादियों में थीम को बहुत महत्व मिला। थीम के मुताबिक शादी के मंडप सजाए गए। कहीं ताजमहल ते कहीं लाल किला नजर आए। पर इस बार जो शादियां हो रही हैं वहां संस्कृति रचबस रही हैं। शादी के कार्ड के साथ मिठाई देने की पुरानी परंपरा थोड़े फैशन के साथ और ज्यादा ताजी हो गई है । शादी का कार्ड और मिठाई का डिब्बा अब साथ है। दूल्हा दुल्हन का जोड़ा ही अब डिजाइनर नहीं है बल्कि परिवार के अन्य लोगों के परिधान भी डिजाइनर हो गए हैं। फिल्मी सेलिब्रिटी शादियों का यह माहौल अब मध्यमवर्ग को भी प्रभावित कर रहा है। यह मौका शादियों में किसी थीम को दिखाने का नहीं रहा बल्कि अब तो हम अपनी संस्कृति में फैशन को घोल रहे हैं।


यह समय हॉलीवुड- वॉलीवुड और उद्योगपतियों की शादियों का है। दीपिका पादुकोण- रणवीर सिंह तो प्रियंका निक की जोड़ी के साथ उद्योगपति मुकेश अंबानी की बेटी ईशा आनंद की शादी की सुर्खिया सभी जगह छाई हुई हैं। इन सुर्खियों में जिस पर सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है वह है पहनावा और संस्कृति। शादी के संगीत में जिस तरह से डीजे धमाल मचा रहा था और कुछ खास गानों पर लोग थिरक रहे थे। वहां से हम वापस हे लिए हैं अब हमें वहीं पुराने लोकगीत, शास्त्रीय संगीत, नृत्य, सूफी और कब्बाली याद आ रही है। नीता अंबानी का नृत्य इसी परंपरा का फैशनबल रूप है। अपने को पहचानने की ललक और प्रेम, शादी का मूल मंत्र भी यही है।


इन शादियों में मेहमानें के साथ ही साथ उनका पहनावा भी कई मायनों में महत्वपूर्ण रहा। महत्वपूर्ण इसलिए भी क्योंकि यह अलग अलग संस्कृतियों के मिलन का भी प्रतीक था और विविधता का भी। विभिन्न संस्कृतियों का पहनावा, सजधज, आभूषण और अलंकार साथ ही रीति नीति के जरिए हमने बहुत सारी विविधताएं देखी। यह विवधताएं फैशन के गलियारों से होते हुए जब हम तक पहुंची तो उसमें ग्लैमर का तड़का भी था। दीपिका ने कोंकणी रिवाज के अनुसार पहले सफेद रंग का लंहगा पहना तो रणवीर ने भी सफेद रंग का कुर्ता, चूड़ीदार और पगड़ी पहनी। सफेद रंग के बाद दीपिका ने नारंगी रंग का लंहगा पहना। कोंकणी शादी के बाद उनकी शादी सिंधी और पंजाबी रीतिनीति से भी हुई जिसमें उन्होंने सलवार कुर्ता पहना। इस तरह कोंकणी गहनों के साथ ही दीपिका ने पंजाबी चूड़ा भी पहना। प्रियंका की शादी भी दो तरह से हुई। इसाई रीति रिवाज और पंजाबी संस्कृति की झलक हर जगह दिखाई दी। प्रियंका ने भी ईसाई शादी में लंबा गाउन पहना तो लंहगा और साड़ी भी पहनी।


इन दिनों फैशन में जो ट्रेंड सामने दिखाई दिया वह है जोड़े का एक जैसा पहनावा, सिर्फ रंग में ही नहीं स्टाइल में भी..आइए पहले बात करते हैं हाल ही में शादी के बंधन में बंधे रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण की। शादी से पहले भी कई बार और शादी के बाद तो लगातार यह जोड़ा साथ में एक दूसरे से मेल खाते पहनावे में नजर आ रहे हैं।


दुनिया की सबसे खूबसूरत अभिनेत्रियों में से एक ऐश्वर्या और उनके पति अभिषेक बच्चन भी कई बार एक ही तरह के पहनावे में नजर आ चुके हैं । इनकी अंतरंगता लोगों के बीच सफल जोड़े की पहचान विकसित करती है। क्रिकेट कप्तान विराट कोहली और बॉलीवुड अभिनेत्री अनुष्का शर्मा पिछले ही साल शादी के बंधन में बंधे हैं। अक्सर हाथों में हाथ डाले ये जोड़ा एकजैसे पहनावे में नजर आ चुका है।


देसी गर्ल प्रियंका चोपड़ा और हॉलिवुड के चर्चित गायक निक जोनस को भी कई बार एकजैसे पहनावे में एकसाथ कभी साइकिल चलाते हुए तो कभी एयरपोर्ट पर देखा गया है।


दिव्यंका विवेक-छोटे पर्दे का ये खूबसूरत और मशहूर जोड़ा शादी करके अपने प्यार को नाम दे चुका है। चाहे परंपरागत परिधान हों या पाश्चात्य शैली में बने परिधान.. दोनों कई मौकों पर एकजैसे पहनावे में नजर आ चुके हैं।


इसी साल शादी के बंधन में बंधे युविका और प्रिंस ने हाल ही में एक फोटो शेयर की है जिसमें दोनों एक जैसी टी-शर्ट पहने हैं। बिपाशा और करण भी कई बार एक साथ रंग में रंगे नजर आते हैं।


वैसे तो मीरा बॉलिवुड से नहीं है लेकिन वो किसी बॉलिवुड की अभिनेत्री से कम नहीं लगतीं। दोनों अपने रोमांटिक अंदाज से लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचते नजर आते हैं। इन दोनों को भी कई बार एक जैसे पहनावे में में देखा गया है।


क्या है यह ट्रेंड


इस ट्रेंड का सीधा सा मतलब यह है कि लोग जोड़े में हो या समूह में वह एक जैसा दिखना और महसूस करना चाहते हैं। पहले यह मैचिंग यानी समरूपता वाला फैशन हर कोई अपने लिए करता था । मैचिंग यानी समरूपता पहले परिधान औरर आभूषणें तक ही सीमित थी फिर उसके साथ अन्य चीजें भी जुड़ी जैसे पर्स चप्पल जूते आदि. फिर जमाना आया कंट्रास्ट यानी विरोधाभासी रंगों का। लेकिन अब यह मैचिंग वाला फैशन व्यक्तिगत न होकर सामूहिक हे गया है। जोड़े कई तरह के हो सकते हैं।


पतिपत्नी


सिर्फ सेलीब्रिटी पति पत्नी ही नहीं आम पतिपत्नी भी आजकल किसी कार्यक्रम में जाते हैं तो कोशिश होती है एक तरह के परिधान पहनने की। पहनावा एक जैसा न हो तो बात रंग पर आ जाती है। एक ही रंग..


दोस्ती में भी यह चलन में है। दोस्त भी पार्टी में यह ट्रेंड अपनाते हैं यहां पर वह एक जैसी एक्सेसरीज पर जोर देते हैं लड़किया हैं तो एक जैसी इयररिंग ,पर्स और लड़के हैं तो एक जैसे मफलर. कुछ न कुछ मैचिंग जरूर होना चाहिए।


मां बेटी और पिता पुत्र


मां बेटी और पिता पुत्र भी इस ट्रेंड में पीछे नहीं हैं। वह भी एक जैसा फील चाहते हैं कभी टीशर्ट में तो कभी एक जैसे कुर्ते में वह फैशन का यह बदलाव महसूस करते हैं। अलग अलग साइज में एक ही प्रिंट या डिजाइन की सहूलियत भी है। ब्रांड अलग अलग साइज में एक ही डिजाइन के कई परिधान बनाती हैं। परिधान सब तरह के डिजाइन में हैं आप चाहें तो पाश्चात्य शैली से लेकर भारतीय शैली तक किसी से भी कुछ भी चुन सकते हैं।


एक जैसा दिखने और महसूस करने के लिए जरूरी नहीं कि पहनावा परंपरागत ही हो। भारतीय और पाश्चात्य शैली में बने किसी भी परिधान के साथ यह प्रयोग किया जा सकता है। यह बहुत खर्चीला भी नहीं है। आप सीमित बजट में भी इसे अपना सकते हैं।


संक्षेप में कहूं तो फैशन में यह समय समरूपता, एकाग्रता और संस्कृतियों के मिलन का है। फिर चाहे वह संगीत हो खानपान हो या हो पहनावा.. आप भी इस ट्रेंड को अपनाएं और कुछ खास महसूस करें।

शनिवार, 24 नवंबर 2018

क्याें पिछड़ गई भारतीय महिलाएं- रामचंद्र गुहा. प्रसिद्ध इतिहासकार

सरोजिनी नायडू 1925 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनी थीं। उनके नाम का प्रस्ताव महात्मा गांधी ने किया, जो ‘हिंदू-मुस्लिम एका की पक्षधर' होने के नाते नायडू के प्रशंसक थे। गांधी की नजर में सरोजिनी नायडू का चयन ‘हमारी भारतीय बहनों की प्रशंसा का सबसे माकूल तरीका था, जिसकी लंबे समय से दरकार थी।' 1925 में तो पश्चिम में भी किसी बड़े राजनीतिक दल के मुखिया पद पर महिला का आना असंभव सी बात थी। हाल ही में जब मैंने बेंगलुरु में आयोजित एक कार्यक्रम में इस सच को रेखांकित किया तो इसका जबर्दस्त स्वागत हुआ। इतना कि मुझे दर्शकों को रोकना पड़ा। क्योंकि 1925 से अब तक पश्चिम तो राजनीति के शीर्ष पर महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने में तेजी से आगे बढ़ा, लेकिन हमारी प्रगति कमजोर रही है। .


आज के नारीवादी मानकों से तो शायद गांधी भी हतप्रभ होते। उन्होंने तो अपनी पत्नी को हमेशा खुद से आगे देखा। उन्हें अपने समय के अन्य विश्व नेताओं की अपेक्षा ज्यादा महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में लाने का श्रेय है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में भी सरोजिनी नायडू ही नहीं, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, राजकुमारी अमृतकौर और विजयलक्ष्मी पंडित भी पहले से थीं। इसके विपरीत उसी दौर के फ्रैंकलिन रूजवेल्ट और विंस्टन चर्चिल जैसे नेताओं की पार्टी में कोई वरिष्ठ महिला सहयोगी नहीं दिखती। चार्ल्स द गॉल, माओत्से तुंग या हो ची मिन्ह भी अपवाद नहीं हैं।.


अमेरिकी राज्यों में भी महिलाएं ठीक-ठाक संख्या में हैं, जहां विधायिका में उनकी 25 फीसदी भागीदारी है। अरिजोना और वरमांट जैसे राज्यों में तो यह प्रतिशत 40 तक पहुंच गया है, जबकि हमारी विधानसभाओं में यह अनुपात संसद से भी कम महज नौ फीसदी है।.

1925 में गांधी, राजनीति में महिला हिस्सेदारी के सवाल पर रूजवेल्ट और चर्चिल से भले आगे रहे हों, लेकिन उन देशों के स्त्रीवादी आंदोलनों ने पुरुष सत्ता को पीछे धकेलते हुए महिलाओं को अच्छी-खासी भागीदारी दिला दी, जबकि भारत पितृसत्ता की छाया से नहीं निकला। यही हमें आरक्षण के सवाल से टकराने को मजबूर करता है। .

भारत जैसे पिछड़े समाज वाले देश में हमें महिलाओं के लिए कानूनी तौर पर आरक्षण की सख्त जरूरत है। यहा पंचायत व नगर पालिका स्तर पर तो आरक्षण मौजूद है, विधानसभाओं और संसद के स्तर पर नदारद। जबकि यह कहीं ज्यादा जरूरी था, क्योंकि विधायकों-सांसदों के पास पंचायत सदस्यों की अपेक्षा कहीं ज्यादा फंड तो होता ही है, नीति-निर्धारण में भी इनकी प्रत्यक्ष भूमिका होती है। .

यूपीए सरकार के दौरान महिला आरक्षण विधेयक लाया जरूर गया, जिसमें लोकसभा व विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण की बात थी, लेकिन अफसोस कि कांग्रेस ने इसे पास कराने में अपनी पूरी ऊर्जा नहीं लगाई। उस वक्त तो लोकसभा में विपक्ष की नेता भी एक महिला सुषमा स्वराज थीं, लेकिन फिर भी यूपीए अध्यक्ष भाजपा को इस मुद्दे पर साथ लाने में कामयाब नहीं हुईं। विधेयक राज्यसभा में पारित हो गया, लेकिन लोकसभा में अटक गया। बाद में कांग्रेस ने भी इसे बीच राह छोड़ दिया। .

वर्ल्ड इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट इकोनॉमिक्स रिसर्च का हालिया अध्ययन कहता है कि विधायिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ना भारतीय लोकतंत्र को मजबूती देगा। विधानसभाओं में विधायकों के कामकाज की लिंग आधारित पड़ताल का यह विश्लेषण बताता है कि महिला विधायकों की अपेक्षा पुरुषों पर आपराधिक आरोप होने की गुंजाइश तीन गुना ज्यादा है और पुरुषों की अपेक्षा महिला विधायकों की संपत्ति में भी दस प्रतिशत कम ही इजाफा हुआ है। सड़क निर्माण पर महिला और पुरुष, दोनों समान रूप से उत्साहित दिखे, लेकिन महिला विधायक के क्षेत्र में इसकी प्रगति खासी बेहतर दिखी। व्यापक तौर पर देखें, तो यह अध्ययन जमीनी हकीकत दिखाता है। .

विधानसभाओं और संसद में महिलाओं की ज्यादा भागीदारी के पीछे मूल रूप से नैतिकता और न्याय की भावना थी, लेकिन अब ऐसा लगता है कि इसके लिए पर्याप्त आर्थिक आधार भी मौजूद हैं। इस व्यापक अध्ययन के नतीजे देखकर किसी को भी महिला आरक्षण कानून बनवाने में यूपीए की विफलता पर अफसोस होगा। लेकिन अब चूंकि कांग्रेस और भाजपा, दोनों से ही इस मामले में कोई उम्मीद नहीं है, इसलिए सारी उम्मीदें उस सामाजिक दबाव पर ही निर्भर हैं कि वहां से दलों और नेताओं पर दबाव बढ़े, ताकि इस जरूरी कानून की राह फिर से खुल सके।.

जिस वक्त यह आलेख अंतिम रूप ले चुका था, ओडिशा विधानसभा ने विधायिका में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण का प्रस्ताव पारित किया है, पर राज्य के अन्य दलों ने इसे बीजू जनता दल का पाखंड व अवसरवादिता बताते हुए निंदा की है। वे इसी आरोप में एक बार फिर दोषी साबित होंगे, अगर लोकसभा में भी वे ऐसे किसी विधेयक के पक्ष में और मजबूती से नहीं खड़े होंगे।. .

(दैनिक हिंदुस्तान से साभार)

मंगलवार, 20 नवंबर 2018

स्वस्थ आँखें हजार नियामत- डॉ. दीपिका शर्मा

आज के इलेक्ट्रानिक युग में सबसे ज्यादा स्वास्थ्य आँखों का प्रभावित होता है। छोटे छोटे बच्चों की आँखों में चश्मा चढ़ा होता है। जिनको पढ़ाई तो करनी ही है साथ ही टीवी, वीडियो गेम, कंप्यूटर, मोबाइल के कारण आँखें ज्यादा खराब होती है। कंप्यूटर पर लगातार काम करने के कारण आँखों में जो समस्या उत्पन्न होती है उसे कंप्यूटर विजन सिंड्रोम सीवीएस कहते हैं। जिसके लक्षण हैं आँखों में दर्द, सिरदर्द, ड्राई आँख, थकी और लाल आँखें, धुंधला और दो दिखाई देना,गर्दन और पीठ में दर्द आदि।

इससे बचने के उपाय

  • आँखों को बीच बीच में झपकाएं इससे आप आँखों की ड्राई समस्या से बचेंगे. 
  • बीच बीच में खिड़की के बाहर किसी दूर चीज पर नजर टिकाएं. फिर थोड़ी देर के लिए आखें बंद करें, इससे आराम मिलेगा. 
  • 20-20 का रूल अपनाएं- हर बीस मिनट पर आँखों को बीस फिट दूर रखी चीज पर 20 सैकेंड तक टिकाएं. 
  • कंप्यूटर का मानीटर आपसे 20 या 26 इंच की दूरी पर रहे। जिसकी स्क्रीन का ट़ॉप आई लेवल पर रहे. 
  • जो लोग कंप्यूटर पर जॉब नहीं करते वह भी मोबाइल पर गेम खेलने में अपना समय खर्च करते हैं। जबकि समझदारी इसी में है कि इसमें अपना कम से कम समय बिताएं. 
  • इन सबके अलावा आँखों का व्यायाम अवश्य करें। जैसे गर्दन स्थिर रखकर आँखों को ऊपर नीचे दाएं बाएं घुमाना. 
  • क्लॉक वाइज और एंटी क्लॉक वाइज 10 बार घुमाना 
  • नाक के टिप को देखना, फिर सामने देखना. 
  • पामिंग अवश्य करें.किसी आँखों के डाक्टर स सीखकर अवश्य करें. 
  • पेंसिल की टिप के पास लाना और जब एक के दे दिखाई दें तो दूर ले जाना. 
  • आँखों में ठंडे पानी के छींटे अवश्य मारने चाहिए. आँखों के स्वास्थ्य के लिए हरी सब्जियां और पीले फल अवश्य खाने चाहिए. 
  • बादाम भिगोकर खाने और काली मिर्च से आँखों के बहुत फायदा होता है। 
  • सौंफ, नारियल का बुरादा और मिश्री मिलाकर रख लें और एक चम्मच हर रोज खाएं, आराम मिलेगा. 
  • सुबह नंगे पांव घास में चलना भी फायदेमंद है. 
उपरोक्त सभी बातों को ध्यान में रखकर आप अपनी आँखों को स्वस्थ रख सकते हैं। ज्यादा समस्या होने पर आप आँखों के डाक्टर से परामर्श अवश्य लें।
डा. दीपिका शर्मा अपाेलाे  फेमिली क्लीनिक नौएडा, उत्तरप्रदेश, सेक्टर 110 में  फेमिली फिजिशियन हैं।
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