25 जून ,गुरूवार, एकादशी .दूसरा मासिक एक माह पहले आज ही के दिन मैंने अपने पापा पर स्मृति लेख लिखा था। जिसे आप सभी ने पढ़ा और मुझे इसे जारी रखने के लिए प्रेरित भी किया। आप सभी का आभार। कथा में फिर से ऱाधेश्याम जी उपस्थित हैं। जी हां वही राधेश्याम जी जिन्हें मेरे पापा अपने अंतिम दिनों बहुत याद कर रहे थे। जो उनके मामा भी थे और सखा भी। आखिर वह उनको क्यों याद कर रहे थे इसकी कई वजहें मैंने खोजी पर जो सबसे महत्वपूर्ण थी वह थी, मेरे उस स्मृति लेख पर जाने-माने भाषाविद् डा. सुरेश चंद्र पंत जी की टिप्पणी। जो गौर करने लायक है। उन्होंने लिखा, इस विवरण के बहुत से पात्रों को देखने का सौभाग्य मिला है। हरीनाथ ताऊजी गाँव के सबसे शालीन व्यक्तित्व थे। राधेश्याम दा परम वैष्णव भक्त थे। वास्तविक नाम लक्ष्मी दत्त था, राधेश्याम ही प्रसिद्ध हो गया। नित्य सुबह-शाम कुछ घंटे नाम संकीर्तन करते। सौम्य और मृदुल व्यवहार। एक बार कोई व्यक्ति मिल जाए तो भूल न सके। अपने बच्चों का नाम भी नारायण, नारायणी रखा था। मेरे पिताजी बताते थे कि अपने निधन से पहले राधेश्याम दा ने परिवार के कुछ लोगों को पोस्टकार्ड लिख ...
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