गुरुवार, 9 जुलाई 2026

लंदन फोर्ट वैष्णव भक्तों और अन्यारी देवी का क्या है रिश्ता



  25 जून ,गुरूवार, एकादशी .दूसरा मासिक

एक माह पहले आज ही के दिन मैंने अपने पापा पर स्मृति लेख लिखा था। जिसे आप सभी ने पढ़ा और मुझे इसे जारी रखने के लिए प्रेरित भी किया। आप सभी का आभार।

 कथा में फिर से ऱाधेश्याम जी उपस्थित हैं। जी हां वही राधेश्याम जी जिन्हें मेरे पापा अपने अंतिम दिनों बहुत याद कर रहे थे। जो उनके मामा भी थे और सखा भी। आखिर वह उनको क्यों याद कर रहे थे इसकी कई वजहें मैंने खोजी पर जो सबसे महत्वपूर्ण थी वह थी, मेरे उस स्मृति लेख पर जाने-माने भाषाविद् डा. सुरेश चंद्र पंत जी की टिप्पणी। जो गौर करने लायक है। उन्होंने लिखा,

 इस विवरण के बहुत से पात्रों को देखने का सौभाग्य मिला है। हरीनाथ ताऊजी गाँव के सबसे शालीन व्यक्तित्व थे। राधेश्याम दा परम वैष्णव भक्त थे। वास्तविक नाम लक्ष्मी दत्त था, राधेश्याम ही प्रसिद्ध हो गया। नित्य सुबह-शाम कुछ घंटे नाम संकीर्तन करते। सौम्य और मृदुल व्यवहार। एक बार कोई व्यक्ति मिल जाए तो भूल न सके। अपने बच्चों का नाम भी नारायण, नारायणी रखा था। मेरे पिताजी बताते थे कि अपने निधन से पहले राधेश्याम दा ने परिवार के कुछ लोगों को पोस्टकार्ड लिख कर बता दिया था कि अमुक दिन राधेश्याम नहीं रहेंगे। और उसी दिन राधेश्याम विदा हो गए। स्व देवेंद्र जी को अपने निधन से पहले वही अविस्मरणीय व्यक्तित्व याद आया जिसकी अमिट छाप बचपन में ही उनके मन में पड़ गई होगी।

 निश्चित ही मेरे पापा इस बात को जानते होंगे और अपने मन ही मन खुद से पूछते होंगे राधेश्याम को पता चल गया मुझे क्यों नहीं यह अहसास हो पा रहा है।

   पापा अब तो आप राधेश्याम जी मिल लिए होंगे। समय अच्छा कट रहा होगा। वह भी वैष्णव थे और आप भी वैष्णव। गए भी तो आप एकादशी को। जहां भी हो खुश रहना पापा। इस बार शादी की सालगिरह भी सूनी-सूनी रही। उसके ठीक दूसरे दिन आपका जन्मदिन होता है। 2 माह और रुक जाते तो 90 साल के हो जाते। कितना खुश होते थे आप, केक खाते हुए। आपकी वह मुस्कान अब मेरी स्मृतियों का हिस्सा है। आप कहते थे कुछ भी हो जाए लिखना मत छोड़ना। मेरे पहले पाठक और आलोचक आप थे। गलतियों पर एकदम पैनी नजर। एक बार आपने कहा था, शब्दों में भी वजन होता है। जब कविता लिखती है तो शब्दों को हल्का और वाक्य छोटे होने चाहिए। वजनी शब्द लेख के लिए रख। कहानी के लिए क्या करूं.... मैंने यूं ही पूछा था। आपने कहा, दृश्य की तरह। उसी कोशिश में हूं पापा। तो सुनो अब आगे की कथा...

 8वीं से 12वीं सदी के मध्य उत्तराखंड में वैष्णव धर्म का व्यापक असर था। कत्यूरी राजाओं ने बैजनाथ, द्वाराहाट और चमोली में मंदिरों की स्थापना शुरू कर दी थी । इन मंदिरों की मूर्तिकला में  वैष्णवी प्रभाव दिखाई देता है। एक समय तो ऐसा भी आया था लगता था वैष्णव धर्म ही मानों राष्ट्र का धर्म बन गया हो। जैसे आजकल हर कोई खुद को सनातनी कह रहा है। उस समय लहर ऐसी थी कि यूनानी राजदूत हेलियोडोरस (ई.पू. २००) ने भेलसा (विदिशा) में गरूड़ स्तम्भ बनवा दिया और वह स्वयं को गर्व के साथ 'परम भागवत्' कहता था। पाणिनि के पूर्व भी तैत्तिरीय आरण्यक में विष्णु गायत्री में विष्णु, नारायण और वासुदेव के बारे में लिखा गया है - 'नारायणाय विद्मेह वायुदेवाय धीमहि तन्नों विष्णु प्रचोदयात्'। तारादत्त जी के बड़े भाई और हमारे वंशज प्रेम बल्लभ जी गायित्री के परम उपासक थे।  

 वैष्णवों के चार प्रमुख सम्प्रदाय हैं। (१) श्री सम्प्रदाय, (२) हंस सम्प्रदाय, (३) ब्रह्म सम्प्रदाय (४) रूद्र सम्प्रदाय। हम श्री सम्प्रदाय को मानते हैं। - यह सम्प्रदाय 'श्री' देवी के द्वारा प्रवर्तित है। इसे आजकल रामानुज सम्प्रदाय के नाम से जाना जाता है। इस सम्प्रदाय के अनुयायी 'श्री वैष्णव' कहलाते हैं। इनका दार्शनिक सिद्धान्त 'विशिष्टाद्वैत' है। ये भगवान् लक्ष्मीनारायण की उपासना करते हैं।

हमारी अपनी कुल देवी भी है जिसका नाम अन्यारी देवी है। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में अन्यारी देवी को समर्पित मंदिर भी है।  अब यह अन्यारी देवी कौन हैं ? और इनका उद्भव कैसे हुआ ? जैसा मुझे बताया गया कि अन्यारी देवी अंधकार की अधिष्ठाती देवी है। इनकी पूजा अँधेरे में की जाती है।

उत्तराखंड की लोकथाओं और शाक्त मान्यता की पौराणिक जानकारी के अनुसार सृष्टि के आरम्भ में माँ आदिशक्ति, परब्रह्म के रूप में प्रकट हुई। और माँ आदिशक्ति से ही सृष्टि का निर्माण शुरू हुआ। माँ अलग -अलग परिस्थितियों समय, विकारों आदि के आधार पर अलग अलग रूप में प्रकट हुई या अवतरित हुई। जिसमे से  माँ का अँधेरे को समर्पित अन्यारी देवी ( अंधेरी देवी ) और उजाले को समर्पित रूप  उज्याली देवी भी एक था।  मन में जिझासा है कि हमने अन्यारी देवी को ही क्यों चुना होगा।

इसके लिए यह जानना जरूरी है कि हमारे पुरखे कब आए और उनका जन्म कब हुआ होगा। मेरे भाई मुझे बताते हैं कि हमारे पुरखे तारादत्त जी का जन्म सन् 1802 में हुआ और सन् 1840 में बिषाड़(पिथौरागढ़) में  उन्होंने अपना घऱ बनवाया। वह अपने समय के कुमाऊं क्षेत्र के जाने माने व्यक्ति थे। तत्कालीन ब्रिटिश सरकार से उनके घनिष्ठ संबंध थे। ठुलकुडा का हमारा यह मकान,चार गांव और अन्य संपत्ति उन्हीं के द्वारा अर्जित की गई थी। इसके डॉक्यूमेंट मेरे परिवार के पास सुरक्षित हैं। तारा भट्ट संभवतः बिषाड़(पिथौरागढ़) गाँव के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने प्रारंभिक ब्रिटिश काल में एक महत्वपूर्ण सरकारी पद संभाला था। यह उनके द्वारा 78 वर्ष की आयु में अल्मोड़ा के झिझाड़ में लिखी गई वसीयत से स्पष्ट है। सरकार के द्रवारा उनको स्थानीय लोगों के विवादों को सुलझाने का अधिकार मिला। वह कमरा जहाँ वे अपने फैसले सुनाते थे, आज भी ठुलकुडा (बड़ा घर) नामक ऐतिहासिक इमारत में मौजूद है और तारा भट्ट की कचहरी के नाम से प्रसिद्ध है।

 हमारी अन्यारी देवी की पूजा यूं  तो रात में होती है परन्तु  इस पूजा में बलि नहीं दी जाती उसकी जगह नारियल से पूजा की जाती है। बलि नहीं देने के पीछे कारण यह है कि हमारे वंशज वैष्णव थे। जो मांसाहार नहीं करते प्याज लहसुन नहीं खाते। इस तरह अन्यारी देवी हमारी कुलदेवी तो है पर पूजा प्रसाद का तरीका वैष्णवी है। हम यह प्रसाद कुटुम्ब के लोग ही ग्रहण करते हैं। 

अन्यारी देवी को लेकर मेरी जिज्ञासा का एक उत्तर यह भी  हो सकता है कि जिस समय हमारे पुरखे ने जन्म लिया वह सन् था 1802। इस समय मुगलों का शासन था। मुगलों ने 1526 से 1857 (लगभग 330 वर्षों) तक भारत पर शासन किया। बाबर द्वारा स्थापित इस साम्राज्य ने अपने चरम पर भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकांश हिस्से पर शासन किया, जो 1857 के विद्रोह और अंग्रेजों के हाथों अंतिम सम्राट बहादुर शाह जफर की हार के साथ समाप्त हुआ। इस समय में हिंदुओं के साथ बहुत अत्याचार भी हुआ। उनके मंदिर तोड़े गए। इसलिए भी संभावना है कि हमारे पुरखों ने रात में पूजा करना प्रारंभ किया हो और अपनी कुल देवी का नाम अन्यारी रखा हो। अन्यारी कुमाऊंनी शब्द है जिसका अर्थ है अंधकार।

एक प्रार्थना के साथ विदा 

 पापा

 मुझे अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलिए।

तमसो मा ज्योतिर्गमय

 बृहदारण्यक उपनिषद

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(इस कथा को कहने में मेरे सहयात्री रहे हैं मेरे बड़े भाई निर्मल भट्ट जी, मदन भट्ट जी और डा. सुरेश चंद्र पंत जी)

शनिवार, 18 जनवरी 2025

मिथक यथार्थ और फेंटेसी का दस्तावेज-डॉ. अनुजा भट्ट

 


(अब पहले की तरह किस्से कहानियों की कल्पनाएं हमें किसी रहस्यमय संसार में नहीं ले जाती क्योंकि हमारी दुनिया में ज्ञान, विज्ञान और समाज विज्ञानों की उपलब्धियों ने इस तरह की घुसपैठ कर ली है कि वे सारी चीजें हमारी जानकारियों आदतों और कल्पनाओं का हिस्सा बन गई हैं। ) यह वाक्य इस किताब का सार कहता है। एक नजर इस किताब पर.

कलबिष्ट खसिया कुल देवता की कहानी एक प्रेमकहानी है। यह कहानी दो जातियों के वर्चस्व और क्षरण की भी कहानी है। इसमें एक और कहानी भी छिपी है जिसमें प्रेम प्रतिदान मांगता है। मुझे इस कहानी में कलबिष्ट के साथ कृष्ण और कमला के साथ राधा भी दिखते है। कलबिष्ट और कृष्ण दोनों ग्वाले हैं और बांसुरी बजाते हैं। राधा और कमला मोहित हैं बांसुरी की तान पर और बांसुरी वाले पर।
दोनो का प्रेम परवान चढ़ता है पर समाज में स्वीकार्य नहीं। कृष्ण और राधा एक दूसरे के पूरक बन जाते हैं पर कलबिष्ट और कमला नहीं। कलबिष्ट अहं, जातिवाद और शोषक और शोषित की भेंट चढ़ जाता है और अंततः एक लोकदेवता के रूप में मूर्ति में निरूपित। क्योंकि वह अजातशत्रु के रूप में जाना जाता है इसलिए वह न्याय का देवता है। जागर उसके बिना अधूरा है।
लोक देवी देवता जो हमारे पुरखे हैं उनको प्रसन्न करने के लिए जागर लगाया जाता है और इस जागर में कलबिष्ट को कई तरह से याद किया जाता है। उसे खुश करने के लिए कई तरह की युक्तियां है संगीत है, आग है और है भयभीत वातावरण। मुक्ति की कामना में उठे हाथ।
कलबिष्ट ग्वाला चरवाहा अपनी बांसुरी के उदास सुरों में समूची बिनसर पहाड़ी में नोमेद संगीत का जादू बिखरेने वाले के रूप में ख्यात हो गया और उस ग्वाले में चंद राजा के दीवान सकाराम पांडे की कलाप्रेमी पत्नी कमला का दिल आ गया। वह पूरा दिन उससे बांसुरी सुना करती।
सकाराम पांडे जिसकी ख्याति नौ लाख का राजस्व उगाहने के कारण नौलखा पांडे के नाम से थी उसके लिए यह सब सुन और देखपाना असहनीय था। जैसा हर पारंपरिक कथा कहानी में होता है वैसा ही यहां भी हुआ कल बिष्ट की बहुत वीभत्स तरीके से हत्या करवा दी गई। उसे मारना आसान नहीं था। उसे सदाशयता का वरदान मिला था इस कारण वह बार बार बच जाता था।
कलबिष्ट मारा जाता है पर उसकी आत्मा विचरती रहती है। अब उसकी पूजा होने लगती है और वह मंदिर में स्थापित हो जाता है। जैसे जैसे प्रसंग आगे बढ़ने लगता है तार्किकता संवेदनशीलता और यथार्थवादी बाजारीकरण की कथा के बीच में आते हैं पुरखे। अन्याय और शोषण सहे पुरखे तथाकथिततौर पर औतरने (नाराज) लगते हैं और फिर धीरे धीरे एक दिन मंदिर में स्थापित हो जाते हैं। उनके बहाने से समाज के पैरोकार एक नया समाजशास्त्र रचते हैं जिसे मानव मन की चाशनी में इस तरह डुबोया जाता है कि यह जानते हुए भी यह सब झूठ है हम सच कहने में डरने लगते है। हमें मानने पर मजबूर किया जाता है कि हमारे पुरखे अपने साथ हुए अन्याय का बदला लेने आ गए हैं वह हमारे सपनों में दस्तक देते हैं और जीवन में जितने भी कष्ट हैं उसके लिए उत्तरदायी है। उनको शांत करने के लिए कुछ किया जाना है। इस कुछ के भीतर एक मायाजाल है। इस मायाजाल में आधुनिक सुखसुविधाओं से लेस यह सामाजिक है जिसे मंहगी गाड़ी फोन जूते घडियां और रत्नों से भरी अंगूठियां से पहचाना जा सकता है। अंगूठियां राशियों पर छाए संकट हरण का प्रतीक हैं। गांव में सौ साल पहले की दादी और ग्वाल्वेकोट की गोपुल्दी जैसे अनेकों किरदार अगल अलग समय में अलग अलग लोगों से रचे जाते हैं। यह किरदार हर बार कहानी में कुछ नया टिवस्ट लाते हैं लिहाजा औतरना (नाराज) भी पहले से ज्यादा भयभीत करता है। कहानी में रोमांच, भविष्य और जिंदगी की ऐसी डोज भरी जाती है कि हर एक के लिए बस यही एक दवा है और इससे मुक्ति के लिए जागर लगता है। वास्तव में जिन जिन को यह पुरखे परेशान कर रहे हैं वास्तव में वह मनोरोगी हैं उनका इलाज किया जाना जाना चाहिए।
पुरखों का डर बिठाना और फिर शांति के लिए एक बड़े इवेंट जागर का आयोजन करना और इस बहाने घर गांव में अपनी पहचान सुरक्षित करना और इस सेल्फी युग में रील बनाना प्रचारित और प्रसारित करना हिट की जद्दोजहद और इसमें भी रार के साथ पुरखा पुराण का पटाक्षेप होता है।
इन सबके खिलाफ बोलने वाला टारगेट किया जाता है और यह टारगेट विश्वव्यापी है। भोज जैसा एक सामान्य सा शिष्टाचार जिसमें परिवार के सब लोग मिलजुलकर हाथ बटाते थे अब केटरर के हाथों में है। मैं उस दौर की प्रत्यक्ष गवाह हूं जिसे मैंने अपने बचपन में जिया। सामूहिकता का अर्थ जहां सृजन था। एपण हो रंग्वाली का पिछौड़ा बनना हो या फिर मिठाई। स्वेटर की बुनाई हो या फिर बहुत कुछ और। सभी के चेहरे पर उल्लास की दीप्ति थी। आधुनिकता और बाजार ने सबसे पहले सामूहिकता पर प्रहार किया। और हमारे भीतर के डर को और मजबूत। कारण यह था कि अपना मन साझा करने के लिए हमारे पास विश्वास के चंद लोग भी नहीं थे। हस्तशिल्प के विकल्प के तौर पर रेडीमेड ने दस्तक दी। तो मोबाइल के मैसेज और स्टेटस ने इन शब्दों का अर्थ पूरी तरह बदल दिया।
इस किताब में लेखक की मनोदशा हमें घर घर की कहानी लगती है। जिस संवेदनशीलता से लेखक ने इस प्रसंग को लिखा है वह साहस और दूरगामी सोच को लक्षित करता है। इतिहास में हम देखते हैं कि जब जब सामाजिक जागरण की बात हुई तब तब ऐसे नायक को समाज ने किस तरह लिया। राजाराम मोहन राय जैसे लोगों की आज भी जरूरत है क्योंकि अधिकांश कहानियों में पात्र स्त्री ही है। वह ही दंडित है वह ही लक्षित।
लेखक भी समाज की इस विसंगति का शिकार होने से बच नहीं पाता। वह लिखता है
अपने ही जीवन में मानो मेरा पुनर्जन्म हो चुका था जिसे मैं महसूस कर रहा था मगर स्वीकार नहीं कर पा रहा था मैं ऐसी विसंगति का हिस्सा बन चुका था जो मेरी वास्तविकता तो थी मगर मैं उससे जल्दी से जल्दी मुक्त होना चाहता था।
इस किताब में कई सवाल है जो साथ साथ चलते हैं जाति का सवाल भी इससे ही जुड़ा है। लेखक जैसे खुद की खोज भी करता है। वह इसके लिए इतिहास मिथक और भूगोल के साथ सामाजिक तानेबाने पर भी नजर रखता है। वह बार बार दोहराता है कि जब सब जातियां एक बराबर है जब सब मनुष्य एक जैसे हैं तो यह वर्ण व्यवस्था कहां से आई। क्यों बनाई गई। मनुष्य के मन में मनुष्य के प्रति सीमाएं क्यों तय की गई। अगर ऐसा न होता तो राधा कृष्ण के बीच में कोई न होता और कमला और कलबिष्ट के बीच में भी।
इस किताब में लोकोक्ति की भी विवेचना है जो कहानी सा रस देती है। कई लेखकों और विचारों को भी लिया गया है। यह इस लिए भी महत्वपूर्ण है कि इससे हमें कथा के नए आयाम भी पता चलते हैं जो एक नया दृष्टिकोण बनाते हैं। मिथकीय कहानियां हमें देवीदेवता के परंपरागत रूप से अलग रूप का भी परिचय देती हैं। यह मूर्तियां उस समय के समाज और उसका मन पढ़ने के लिए काफी है।
कलबिष्ट- खसिया कुलदेवता
लोकदेवता के बहाने उत्तराखंड का सांस्कृतिक आख्यान
लेखक- बटरोही
प्रकाशक -समय साक्ष्य देहरादून
मूल्य- 125 रुपये

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2024

विदा - कविता- डा. अनुजा भट्ट



विदा

मैं , मैं नहीं एक शब्द है

हुंकार है

प्रतिकार है



मैं का मैं में विलय है

इस समय खेल पर कोई बात नहीं

फिर भी...

सच में मुझे क्रिक्रेट में कोई रूचि नहीं

फिर भी

मैं सचिन तंडेलुकर की गेंद की तरह उछलना चाहती हूं

टप्पे पर टप्पे मार कर हवा के उस अंतिम छोर पर पहुंचकर

धरती में गिर जाना चाहती हूं

अनगिनत गेंदों से नहीं असंख्य शब्दों से खेलती और जीती उन क्षणों को

खुद और पूरी कायनात के साथ

मैं लेना चाहती हूं अब विदा

न्यूटन का सिद्धांत मुझे प्रिय है

हालांकि मैं विज्ञान के बारे में ज्यादा जानती नहीं

पर शोध से हर रोज गुजरती हूं

फिर भी

अपनी मुट्ठी में भींचकर कोई रूमाल

सर्द रात और कंपकंपाती ठंड में

पसीने से तरबतर हो

ऐसा है मेरा ख्वाब

मैं उस ख्वाब को अपनी उंगुलियों में

महसूस करते हुए

मुट्ठी में भर लेना चाहती हूं

निचोड़ कर रख देना चाहती हूं रूमाल

रूमाल जिसके चार कोने हैं

चार दिशाएं हैं

और चारों दिशाओं की साझेदार एक पोटली है

पोटली जिसमें सिक्के जमाते हैं कुछ

पोटली जिसमें सुदामा ने जमाए तंडुल

सिक्के जमाने वाले और तंडुल जमाने वाले सुदामा में मेरी कोई रूचि नहीं

मुझे न विपन्नता के गीत पसंद हैं

और न संपन्नता के किस्से

मुझे बस सचिन की तरह

अपने मानिंद एक गेंद चाहिए

जिसके हर टप्पे पर टप्पे पर टप्पे पर टप्पे पर

घूमते हुए वह हवा के साथ उछले

उसी को लपकने के लिए उठे हाथ

पर वह गिरे धरती पर

धरती पर

धरती पर

सचिन ने गेंद चूमी कई कई बार

मैं चूमना चाहती हूं

शब्द कई कई बार

सचिन को गेंद को स्पर्श करते दुलराते कई कई बार देखा मैंने

मैं शब्दों को दुलराना चाहती हूं

ओम ही ओम हैं

जिसे जन्मा था प्रकृति ने

प्रकृति की कोख में पहला नाद ओम है

स्त्री की कोख में पहला नाद मां

उस पहली बार सुने शब्द को

मैं अपनी आत्मा के किसी सूक्ष्म से सूक्ष्म कण में

अपनी ही प्राणवायु से खींचकर गर्भ में पुनःस्थापित कर

मैं विदा लेना चाहती हूं

बाकि उसके बाद के सब निरर्थक संवेदनहीन शब्दों को

मैं पोटली में सिक्के और तंडुल की तरह

खुद से अलग कर देना चाहती हूं

हवा में गूंजते इन शब्दों में

अब आक्सीजन नहीं रही

जो प्राणवायु की उम्मीद दे सके

उम्मीद ही तो आपको कमजोर बनाती है

मैं उम्मीद की उस विपरीत धारा में

नाउम्मीद का शपथपत्र भरना चाहती हूं

मैं विदा लेना चाहती हूं।

गुरुवार, 3 अक्टूबर 2024

नवरात्रि - नाै व्यंजन, भक्ति शक्ति और जायका



साबूदाना वड़ा






सामग्री
साबूदाना- 1/2 कप
उबला आलू- 1
भूनी हुई मूंगफली- 1/3 कप
जीरा- 1/2 चम्मच
कद्दूकस किया अदरक- 1 चम्मच
बारीक कटी हरी मिर्च- 1 चम्मच
बारीक कटी धनिया पत्ती- 2 चम्मच
नीबू का रस- 1 चम्मच
तेल- तलने के लिए

विधिसाबूदाना को धो लें और लगभग एक 1/3 कप पानी में चार से पांच घंटे तक डुबोकर रखें। जब साबूदाना सारा पानी सोख ले तो उसमें तेल के अलावा अन्य सभी सामग्री डालकर मिलाएं। मिश्रण को आठ हिस्सों में बांटें और उसे गोल आकार दें। कड़ाही में तेल गर्म करें और वड़ा को सुनहरा होने तक पकाएं। टिश्यू पेपर पर रखें ताकि अतिरिक्त तेल निकल जाए। हरी चटनी के साथ गर्मागर्म सर्व करें।

नवरात्रि आलू



सामग्रीआलू- 4
तेल- तलने के लिए
ऑरिगेनो- 1 चम्मच
नीबू का रस- 1 चम्मच
सेंधा नमक- स्वादानुसार
लाल मिर्च पाउडर- 1/2 चम्मच
(काली मिर्च पाउडर भी डाल सकते हैं)

विधिआलू को धो लें और आधे इंच लंबे और आधे इंच चौड़े टुकडे़ में काट लें। आलू के इन टुकड़ों को बर्फ वाले पानी में आधे घंटे के लिए डुबोकर रखें। जब आलू को तलना हो, उससे ठीक पहले उन्हें पानी से निकालें और टिश्यू पेपर की मदद से पानी को पूरी तरह से सुखा लें। कड़ाही में तेल गर्म करें और आलू के टुकड़ों को सुनहरा होने तक तलें। आलू के टुकड़ों को लगातार पलटती रहें। आलू को कड़ाही से निकालें और उन्हें टिश्यू पेपर पर रखें ताकि अतिरिक्त तेल निकल जाएं। तले हुए आलू पर ऑरिगेनो, लाल मिर्च पाउडर, नमक और नीबू का रस छिड़कें। सर्व करें।

मोतिया पुलाव



सामग्रीसामक के चावल- 2 कप
टमाटर- 1
हरी मिर्च- 2
कटी हुई धनिया पत्ती- 2 चम्मच
पनीर- 1 कप
खोया- 1/2 कप
सिंघाड़े का आटा- 2 चम्मच
घी- 4 चम्मच
सेंधा नमक- स्वादानुसार

विधिसामक के चावल को धोकर कुछ देर के लिए किसी अखबार पर फैला दें ताकि अतिरिक्त पानी हट जाए। अब एक चम्मच घी गर्म करें और सामक के चावल को हल्का सुनहरा होने तक भूनें। सेंधा नमक और दो कप पानी डालें। पानी में एक उबाल आने के बाद आंच कम करें और चावल पकाएं। गैस ऑफ करें और चावल को 10 से 12 मिनट तक ढककर रखें। टमाटर के बीज निकालें और उसे काट लें। हरी मिर्च भी काट लें। खोया को मैश करें और उसमें एक चम्मच सिंघाड़े का आटा और पनीर डालकर आटे की तरह गूंदें। आटे की बहुत ही छोटी-छोटी लोई बनाएं और उस पर सिंघाड़े का आटा लगाएं। बचे हुए घी को कड़ाही में गर्म करें और उसमें पनीर और खोया बॉल्स को सुनहरा होने तक तलें। पनीर बॉल्स, कटे टमाटर, हरी मिर्च और धनिया पत्ती को तैयार पुलाव में डालकर मिलाएं और खीरे के रायते के साथ सर्व करें।

मखाने की खीर



सामग्रीदूध- 5 कप
मखाना- 1 कप
चीनी-1 चम्मच
जायफल पाउडर- 1/4 चम्मच
केसर- चुटकी भर
घी- 1 चम्मच
कटा हुआ पिस्ता- गार्निशिंग के लिए

विधिपैन में घी गर्म करें और उसमें मखाना डालकर उसे दो से तीन मिनट तक भूनें। गैस ऑफ करें और मखाने को दरदरा पीस लें। नॉनस्टिक पैन में दूध डालें और जब उसमें एक उबाल आ जाए तो मखाना उसमें डालें और दो से तीन मिनट तक पकाएं। चीनी, जायफल पाउडर और केसर डालकर अच्छी तरह से मिलाएं। गैस ऑफ करें। पिस्ता से गार्निश करें और सर्व करें।

फलाहारी पनीर



सामग्री
छोटे टुकड़ों में कटे पनीर- 250 ग्राम
कटी हुई धनिया पत्ती- 4 चम्मच
अदरक- एक गांठ
हरी मिर्च- स्वादानुसार
मलाई- 1 कप
दूध- आधा कप
सेंधा नमक- स्वादानुसार
घी- 1 चम्मच

विधिटमाटर को हल्का-सा उबाल कर छिलका उतार लें और टमाटर, अदरक और मिर्च का पेस्ट तैयार कर लें। मलाई और दूध को एक बर्तन में डालकर अच्छी तरह से फेंट लें। कड़ाही में घी गर्म करें और धीमी आंच पर टमाटर वाले पेस्ट को सुनहरा होने तक भूनें। स्वादानुसार नमक भी मिला दें। अब कड़ाही में फेंटी हुई मलाई को डालें। मलाई का रंग बदलने तक उसे चलाती रहें। जब मलाई और मसाला अच्छी तरह से फ्राई हो जाए, तो उसमें पनीर के टुकड़े डाल दें। अच्छी तरह मिक्स करके गैस ऑफ कर दें। धनिया पत्ती से गार्निश कर सर्व करें।

केले का चिप्स



सामग्रीतेल- तलने के लिए
काली मिर्च पाउडर- 1/2 चम्मच
सेंधा नमक- स्वादानुसार
कच्चा केला- 6

विधिकेले का छिलका उतारें। बर्फ वाले ठंडे पानी में नमक डालें और केले को उसमें 10 मिनट के लिए रखें। केले को पतले-पतले स्लाइस में काटकर पानी में ही डालें। कटे हुए केले को पानी में 10 मिनट और रहने दें। कड़ाही में तेल गर्म करें। केले के टुकड़ों को पानी से निकालकर किसी कपड़े पर रखें ताकि केले से सारा पानी हट जाए। तेज गर्म तेल में केले के टुकड़ों को डालें और तल लें। ऊपर से सेंधा नमक और काली मिर्च पाउडर डाल कर पेश करें।



लौकी की खीर



सामग्रीकद्दूकस किया घीया- 1 कप
दूध- 1 लीटर
चीनी- 1 कप
इलायची पाउडर- 1/2 चम्मच
मेवे- 2 चम्मच

विधिदूध को लगभग 20 मिनट तक धीमी आंच पर बीच-बीच में चलाते हुए उबालें। कद्दूकस किया हुआ घीया डालें और दूध के गाढ़ा होने तक पकाएं। चीनी डालकर मिलाएं और पांच मिनट और पकाएं। इलायची पाउडर और मेवे डालकर मिलाएं। गैस ऑफ करें और सर्व करें।



नारियल बर्फी



सामग्रीघी- 1 चम्मच

कद्दूकस किया नारियल- 3/4 कप

बूरा- 5 चम्मच

खोया- 2 चम्मच

केसर- चुटकी भर

पीला फूड कलर- कुछ बूंद

विधिघी और नारियल को माइक्रोवेव सेफ बर्तन में डालकर माइक्रोवेव में एक मिनट तक पकाएं। बूरा (चीनी का पाउडर) डालकर मिलाएं और माइक्रोवेव में सबसे ऊंचे तापमान पर दो मिनट पकाएं। खोया, दूध, केसर और फूड कलर डालकर मिलाएं और माइक्रोवेव में दो मिनट और पकाएं। मिश्रण को चिकनाई लगी किसी प्लेट में डालें और चम्मच के पीछे वाली साइड की मदद से फैलाएं। जब बर्फी थोड़ी ठंडी हो जाए तो उसे फ्रिज में कम-से-कम एक घंटे के लिए रखें। बर्फी के आकार में काटें और सर्व करें।

कुट्टू के दही बड़े



सामग्री
कुट्टू का आटा- 1 कटोरी
दही- 1 किलो
घी या तेल- आवश्यकतानुसार

हरी चटनी की सामग्री
धनिया पत्ती, हरी मिर्च और सेंधा नमक

मीठी सोंठ की सामग्री
इमली, चीनी, सेंधा नमक, काली या लाल मिर्च

विधिकुट्टू के आटे को एक बर्तन में डालकर उसका घोल तैयार करें और उसे10 मिनट तक छोड़ दें। 10 मिनट बाद उसमें दही डालकर अच्छी तरह से फेंट लें। घोल को उतना ही पतला रखें, जितना दाल के बड़े बनाते वक्त रखते हैं। कड़ाही में घी या तेल गर्म करें और बड़े तैयार करें। सारे बड़े तैयार करने के बाद उन्हें तेज गर्म पानी में डालें। इससे बड़े से अतिरिक्त तेल निकल जाएगा। बाकी आधा किलो दही को एक बर्तन में डालकर अच्छी तरह से फेंट लें और उसमें नमक और मिर्च पाउडर मिला दें। धनिया पत्ती को धोकर उसकी चटनी तैयार करें और उसमें सेंधा नमक और नीबू डालें। हरी चटनी तैयार है। इमली को दो-तीन घंटे पहले पानी में भिगो दें। अब उसको हाथ से मसलकर बीज को निकाल दें। इमली के गूदे को एक पैन में डालकर उसे चीनी, नमक और मिर्च के साथ पकाएं। अब बड़ों को पानी से निकालें। फेंटा हुआ दही उसके ऊपर डालें। उसके ऊपर हरी चटनी और मीठी सोंठ डालकर सर्व करें।

साभार- दैनिक हिंदुस्तान

नवरात्रि का आरंभ जीवन में लयताल का प्रारंभ

शारदीय नवरात्र 3 अक्टूबर दिन गुरुवार से शुरू हो रहे हैं। इस बार नवरात्र 3 से लेकर 11 अक्टूबर तक है और 12 अक्टूबर को दशहरा मनाया जाएगा। हिन्दू पंचांग के अनुसार शरद नवरात्रि अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होते हैं और विजयादशमी के पहले नवमी तक चलते हैं। इन नौ दिनों तक मां दुर्गे के नौ अलग- अलग रूपों - मां शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और मां सिद्धिदात्री की उपासना की जाती है।

इस बार नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना नीचे दीए गई इन तिथियों और दिन को होगी-

किस दिन किसकी पूजा
3 अक्टूबर को प्रतिपदा पर माता शैलपुत्री
4 अक्टूबर को द्वितीया पर ब्रह्मचारिणी
5 अक्टूबर को तृतीया पर चंद्रघंटा का पूजन
6 व 7 अक्टूबर को चतुर्थी पर माता कुष्मांडा का पूजन
8 अक्टूबर को पंचमी तिथि पर स्कंदमाता का पूजन
9 अक्टूबर को षष्ठी तिथि पर मां कात्यायनी का पूजन
10 अक्टूबर को सप्तमी तिथि पर माता कालरात्रि का पूजन
11 अक्टूबर को अष्टमी और नवमी दोनों पर माता महागौरी व सिद्धिदात्री का पूजन किया जाएगा
नवरात्रि का महत्व-
हिन्दू धर्म में किसी शुभ कार्य को शुरू करने और पूजा उपासना के दृष्टि से नवरात्रि का बहुत महत्व है। एक वर्ष में कुल चार नवरात्र आते हैं। चैत्र और आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक पड़ने वाले नवरात्र काफी लोकप्रिय हैं और इन्हीं को मनाया जाता है। इसके अलावा आषाढ़ और माघ महीने में गुप्त नवरात्रि आते हैं जो कि तंत्र साधना करने वाले लोग मनाते हैं। लेकिन सिद्धि साधना के लिए शारदीय नवरात्रि विशेष उपयुक्त माना जाता है। इन नौ दिनों में बहुत से लोग गृह प्रवेश करते हैं, नई गाड़ी खरीदते हैं साथ ही विवाह आदि के लिए भी लोग प्रयास करते हैं। क्योंकि मान्यता है कि नवरात्रि के दिन इतने शुभ होते हैं इस दौरान कोई भी शुभ कार्य करने के लिए लग्न व मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती।

शनिवार, 28 सितंबर 2024

मध्यप्रदेश का शहर चंदेरी चंदेरी साड़ी अथ श्री कथा महाभारत- डा. अनुजा भट्ट


महाभारत में शिशुपाल की कथा आपने पढ़ी होगी। मेरी यह कथा श्रीकृष्ण और शिशुपाल वध के प्रसंग बिना अधूरी है. शिशुपाल चेदि राज्य के राजा थे एवम उनकी राजधानी चन्देरी, सुक्तिमती में थी। आज की केन नदी को प्राचीन समय में कर्णावत, श्वेनी, कैनास और शुक्तिमति नाम से जाना जाता था। केन नदी का उद्गम मध्य प्रदेश के कटनी ज़िले में विंध्याचल की कैमूर पर्वतमाला में होता है, फिर पन्ना में इससे कई धारायें आ जुड़ती हैं और अंत में इसका यमुना से संगम उत्तर प्रदेश के बांदा ज़िले में होता है। शिशुपाल की राजधानी चंदेरी आज भी भारत के मानचित्र में है और इस शहर को आज भी दुनियाभर में जाना जाता है। फैशन और पर्यटन दोनो ही तरह से इसकी ख्याति है। पर मेरा मन तो शिशुपाल पर अटक सा गया है आप भी मेरे साथ शिशुपाल की कथा सुनिए।

शिशुपाल भगवान श्रीकृष्ण की बुआ का पुत्र था और रिश्ते में कौरवों तथा पांडवों का भाई था। शिशुपाल वासुदेव की बहन और छेदी के राजा दमघोष का पुत्र था। शिशुपाल का जन्म जब हुआ तो वह विचित्र था. जन्म के समय शिशुपाल की तीन आंख और चार हाथ थे. शिशुपाल के इस रूप को देखकर माता पिता चिंता में पड़ गए और शिशुपाल को त्यागने का फैसला किया. लेकिन तभी आकाशवाणी हुई कि बच्चे का त्याग न करें, जब सही समय आएगा तो इस बच्चे की अतिरिक्त आंख और हाथ गायब हो जाएंगे. लेकिन इसके साथ ही यह भी आकाशवाणी हुई कि जिस व्यक्ति की गोद में बैठने के बाद इस बच्चे की आंख और हाथ गायब होंगे वही व्यक्ति इसका काल बनेगा.

एक दिन भगवान श्रीकृष्ण अपनी बुआ के घर आए. वहां शिशुपाल भी खेल रहा था. श्रीकृष्ण के मन शिशुपाल को देखकर स्नेह जागा तो उन्होंने उसे गोद में उठा लिया. गोद में उठाते ही शिशुपाल की अतिरिक्त आंख और हाथ गायब हो गए. यह देख शिशुपाल के माता पिता को आकाशवाणी याद आ गयी और वे बहुत भयभीत हो गए. तब श्रीकृष्ण की बुआ ने एक वचन लिया. भगवान अपनी बुआ को दुख नहीं देना चाहते थे, लेकिन विधि के विधान को वे टाल भी नहीं सकते थे. इसलिए उन्होंने अपनी बुआ से कहा कि वे शिशुपाल की 100 गलतियों को माफ कर देंगे लेकिन 101 वीं गलती पर उसे दंड देना ही पड़ेगा.

शिशुपाल रुक्मिणी से विवाह करना चाहता था. लेकिन रुक्मिणी भगवान श्रीकृष्ण से प्रेम करती थीं और उनसे ही विवाह करना चाहती थीं. लेकिन रुक्मणी के भाई राजकुमार रुक्मी को रिश्ता मंजूर नहीं था. तब भगवान श्रीकृष्ण रुक्मिणी को महल से लेकर आ गए थे. इसी बात से शिशुपाल भगवान श्रीकृष्ण को शत्रु मानने लगा था. इसी शत्रुता के कारण जब युधिष्ठिर को युवराज घोषित किया और राजसूय यज्ञ का आयोजन किया गया तो सभी रिश्तेदारों और प्रतापी राजाओं को भी बुलाया गया. इस मौके पर वासुदेव, श्रीकृष्ण और शिशुपाल को भी आमंत्रित किए गया था.

यहीं पर शिशुपाल का सामना भगवान श्रीकृष्ण से हो जाता है. भगवान श्रीकृष्ण का युधिष्ठिर आदर सत्कार करते हैं. यह बात शिशुपाल को पसंद नहीं आई और सभी के सामने भगवान श्रीकृष्ण को बुरा भला कहने लगा. भगवान श्रीकृष्ण शांत मन से आयोजन को देखने लगे लेकिन शिशुपाल लगातार अपमान करने लगा, उन्हें अपशब्द बोलने लगा. श्रीकृष्ण वचन से बंधे थे इसलिए वे शिशुपाल की गलतियों को सहन करते रहे. लेकिन जैसे ही शिशुपाल ने सौ अपशब्द पूर्ण किये और 101 वां अपशब्द कहा, श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र को आदेश दिया. एक पल में ही शिशुपाल की गर्दन धड़ से अलग हो गई।

आज का यह चंदेरी शहर बेतवा नदी के दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में चारों ओर पहाड़ियों से घिरा है। यह नदी प्राचीन काल में वेत्रवती (Vetravati) नाम की नदी थी । भारत के मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश राज्यों में बहने वाली यह नदी यमुना नदी की उपनदी है। यह मध्य प्रदेश में रायसेन ज़िले के कुम्हारागाँव से निकलकर उत्तर-पूर्वी दिशा में बहती हुई भोपाल, विदिशा, झाँसी, ललितपुर आदि ज़िलों से होकर बहती है। बेतवा नदी के दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में चारों ओर पहाड़ियों से घिरा चंदेरी शहर मध्यप्रदेश के अशोकनगर जिले की तहसील है। यह शहर हथकरघा से बनी साड़ियों के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। साड़ियों का नाम भी शहर के नाम से जुड़ गया है यह साड़ियां चंदेरी साड़ियों के नाम से बिकती हैं।

पर्यटक यहां के घरों में साड़ियों को बुनते देख सकते हैं और अपनी पसंद की साड़ियों की खरीदारी कर सकते हैं। चंदेरी की साड़ी रानी लक्ष्मीबाई भी पहनती थी। उस समय मध्य भारत में ( मालवा, इंदौर, ग्वालियर, बांदा, गढा कोटा, बानपुर , चरखारी,चंदेरी, शाहगढ़ ,रायगढ़)काशी की बनारसी साड़ी का चलन बहुत कम था। ग्वालियर औऱ इंदौर की आभिजात्य महिलाएं चंदेरी की साड़ी पहनती थी। आपको जानकर हैरानी होगी छत्रपति शाहूजी महाराज, ग्वालियर के महाराजा सिंधिया, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और वडोदरा के राजा सहित दक्षिण भारत एवं महाराष्ट्र के तमाम छोटी-बड़ी रियासतों के राजा महाराजाओं के लिए पगड़ी चंदेरी में बनाई जाती थी। राजाओं का विशेष दस्ता उनकी पगड़ी लेने के लिए आता था और बड़े ही गोपनीय तरीके से सुरक्षा की चाक-चौबंद व्यवस्था के बीच पगड़ी चंदेरी से संबंधित राजा के महल तक पहुंचाई जाती थी। जिस प्रकार चंदेरी की साड़ी दुनिया भर में प्रसिद्ध है उसी प्रकार चंदेरी की पगड़ी भी 800 सालों से भारत के तमाम राज्य परिवारों में आकर्षण का केंद्र रही है। सबसे अहम बात यह कि वीरागंना लक्ष्मीबाई अपनी एक सहेली को चंदेरी भेजकर शाही पगड़ी मंगाती थीं। जब उन्होंने अंग्रेजों से युद्ध लड़ा और जब वो शहीद हुईं तब भी उनके सिर पर चंदेरी की ही पगड़ी थी जो वीरांगना लक्ष्मीबाई के मस्तक को सुशोभित कर रही थी।

वैसे तो चंदेरी का इतिहास महाभारत काल में राजा शिशुपाल की नगरी के नाम से मिलता है, लेकिन इतिहास के पन्नों में चंदेरी पर गुप्त, प्रतिहार, गुलाम, तुगलक, खिलजी, अफगान, गौरी, राजपूत और सिंधिया वंश के शासन के प्रमाण मिले हैं। यहां पर राजा मेदनी राय की पत्नी मणीमाला के साथ 1600 वीर क्षत्राणियों ने बाबर के चंदेरी फतेह करने पर एक साथ जौहर किया था, जो आज भी यहां के किले में बने कुंड के पत्थरों के रंग से देखा जा सकता है। यहां करीब 70 मीटर ऊंची पहाड़ी पर बना किला पर्यटकों को लुभाता है। इसके अलावा कौशक महल, परमेश्वर तालाब, बूढ़ी चंदेरी, शहजादी का किला, जामा मस्जिद, रामनगर महल, सिंहपुर महल के अलावा यहां का म्यूजियम, बत्तीसी बावड़ी आदि कई धरोहरें प्रमुख आकर्षण के केंद्र बिंदु हैं।

चंदेरी से महज 22 किमी दूरी पर ही 26 जैन मंदिरों का वैभव समेटे हुए 12 वीं शताब्दी में निर्मित अतिशय तीर्थ क्षेत्र थूबोन जी है। इस पवित्र तीर्थ का निर्माण पाड़ाशाह ने करवाया था, जिन्होंने बजरंगगढ़, सिरोंजी, देवगढ़ के मंदिरों का भी निर्माण कराते हुए भगवान की मूर्तियों को प्रतिष्ठित कराया था। यहां पर विभिन्न मंदिरों में सभी तीर्थंकरों की मूर्तियां विराजित हैं, जिनमें भगवान आदिनाथ से लेकर भगवान महावीर तक की मूर्तियां हैं।

चंदेरी की खूबसूरती बालीवुड को भी लुभा रही है। यहां अब तक स्त्री, सुई धागा सहित अन्य फिल्मों की शूटिंग हो चुकी हैं और वेब सीरीज भी बन चुकी हैं।

कहां से कितनी दूरी

मालवा और बुंदेलखण्ड की सीमा पर स्थित चंदेरी तक पहुंचना चारों तरफ से सुगम हैं। यहां से ग्वालियर की दूरी करीब 220 किमी है तो यहां की सीमाएं उत्तरप्रदेश को जोड़ती हैं। उत्तरप्रदेश का प्रमुख व्यापारिक शहर ललितपुर रेलवे स्टेशन चंदेरी के किले से महज 37 किमी दूर है, जबकि राजधानी भोपाल की दूरी यहां से 210 किमी है। पर्यटक नईदिल्ली- भोपाल रेलवे लाइन पर स्थित ललितपुर तक ट्रेन से आने के बाद आसानी से चंदेरी पहुंच सकते हैं।

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