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रविवार, 27 सितंबर 2026

वारली कला में जीवन और फैशन साथ साथ हैं- डॉ अनुजा भट्ट



लाल गेरू रंग की दीवारों पर सफेद रंग से चित्रित साधारण वारली आकृतियाँ अप्रशिक्षित आँखों को कुछ खास नहीं लग सकती हैं। लेकिन करीब से देखने पर आपको पता चलेगा कि वारली में आँखों से दिखने वाली चीज़ों से कहीं अधिक है। यह केवल एक कला रूप नहीं है, बल्कि महाराष्ट्र और गुजरात की सीमाओं के आसपास के पहाड़ों और तटीय क्षेत्रों से वारली (वरली) जनजातियों के लिए जीवन का एक तरीका है। लगभग 3000 ईसा पूर्व उत्पन्न इस कला रूप में एक रहस्यमय आकर्षण है। अन्य रोजमर्रा की गतिविधियों के जटिल ज्यामितीय पैटर्न फैशन डिजाइनरों और घरेलू सजावट ब्रांडों के बीच काफी लोकप्रिय हैं जिसमें तरह तरह के फूल, शादी की रस्में, शिकार के दृश्य शामिल हैं। गुजरात और महाराष्ट्र राज्यों के लोगों के मन में निश्चित रूप से इस कला के प्रति भावनात्मक लगाव है । उन्हाेंने इसे आघुनिक जीवन शैली के उत्पादों पर लोकप्रिय होने से बहुत पहले ही ग्रामीण स्कूलों और घरों की दीवारों सजाना शुरू कर दिया था। सरल, फिर भी खूबसूरती से नाजुक पैटर्न आधुनिक कला का आधार बने।

बेहद खूबसूरत

यह जनजाति पेंटिंग के लिए चावल के पेस्ट, पानी और गोंद जैसे बुनियादी सामग्रियों का इस्तेमाल करती रही है, जो सफेद रंग के लिए इस्तेमाल की जाती है । बांस की एक लकड़ी को रेशेदार बनाकर ब्रश के रूप में प्रयाेग किया जाता है। यह सरल आकर्षण ही है जिसने अनीता डोंगरे और जेम्स फेरेरा जैसे डिजाइनरों को अपने संग्रह में इन चित्रों का उपयोग करने के लिए आकर्षित किया है। सेल फोन, स्माइली और इमोटिकॉन्स के युग से बहुत पहले आविष्कार की गई, वारली पेंटिंग न केवल अपने देहाती आकर्षण के कारण आपके दिल को छूती हैं, बल्कि वे एक ज्वलंत कहानी भी बताती हैं। इस प्राचीन कला का आकर्षण ऐसा है कि आज यह कई होटलों की लॉबी और कमरों को भी गर्व से सजाती है। इन चित्रों में कुछ ऐसा है जो हमें कला के पीछे के समय और भावना में वापस ले जाता है - चाहे वह अंतिम संस्कार का दृश्य हो या आदिवासी देवताओं की पूजा करने का कार्य। आज, वारली कला न केवल बैंगलोर, चेन्नई और दिल्ली जैसे महानगरों में लोकप्रिय है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लोकप्रिय है।

रोज़मर्रा की ज़िंदगी में वारली

कला प्रेमी जब अपनी जड़ों की ओर वापसी करते हैं तो जीवन के हर हिस्से में गर्व के साथ वारली रूपांकनों का प्रदर्शन करते हैं। परंपरागत रूप से, यह पेंटिंग लाल गेरू की पृष्ठभूमि पर सफ़ेद रंग से की जाती है और ये दो ही रंग इस्तेमाल किए जाते हैं। लेकिन, आजकल, कपड़ों, घर की सजावट या अन्य कलात्मक रूपों पर इन कलात्मक रूपांकनों को दोहराने के लिए कई तरह के रंगों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

इस कला से प्रेरणा लेने वाले सभी लोगों की जीवनशैली में यह इस कदर छायी हुई है कि हम सब इसकी समृद्धि से मोहित है। चमकीले रंग के छाते से लेकर कॉफी मग और चाय के कप, देहाती दीवार घड़ियाँ, दीवारों के लिए सजावट और स्टेशनरी तक - वारली लगभग हर जगह है और यह यहीं नहीं रुकता। वारली की कला हर भारतीय फैशन डिजाइनर की नई पसंदीदा है। रंग-बिरंगे स्कार्फ और कुर्तियों के बॉर्डर को सजाने से लेकर शानदार जूट और रेशम की साड़ियों को सजाने तक, वारली ने रैंप पर हमेशा के लिए अपना दबदबा बना लिया है।

सिर्फ़ कला ही नहीं

वारली कला कुछ हद तक हमें पर्यावरण के प्रति जागरूक होने और जीवन की सरल चीज़ों में आनंद खोजने के बारे में सोचने पर मजबूर करती है। वारली लोग काफ़ी सरल जीवन जीते हैं। पहले, वे प्रकृति की पूजा करते थे और भोजन और रोज़मर्रा की ज़िंदगी के लिए प्रकृति पर निर्भर रहते थे। वे प्रकृति को नुकसान पहुँचाने या ज़रूरत से ज़्यादा लेने में विश्वास नहीं करते थे। वारली लोग प्रकृति और मनुष्य के बीच सामंजस्य में विश्वास करते हैं और ये विश्वास अक्सर उनकी पेंटिंग में झलकता है।

यह विचारधारा आज हमारे जीवन के लिए भी सही है। बहुत से शहरी लोग अब जहाँ तक संभव हो तकनीक से दूर रहकर, स्वच्छ भोजन करके, हथकरघा अपनाकर और प्राचीन रीति-रिवाजों और परंपराओं के पीछे के विज्ञान को करीब से देखकर एक न्यूनतम जीवन शैली अपना रहे हैं। इसलिए, यह बहुत आश्चर्य की बात नहीं है कि वारली जैसी पारंपरिक कलाएँ हमारे समाज में वापस आ रही हैं और हमें जीवन के सरल सुखों की याद दिला रही हैं। जनजातियों ने ज्ञान प्रदान करने के लिए वारली चित्रकला का भी उपयोग किया है। आज, यह चित्रकला के अन्य रूपों के बीच ऊँचा स्थान रखती है, जिसमें जिव्या माशे और उनके बेटे बालू और सदाशिव जैसे महाराष्ट्रीयन कलाकार इस कला रूप को जीवित रखने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। वास्तव में, माशे को इस कला रूप को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाने के लिए 2011 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया था।
हालांकि लोकप्रिय रूप से स्टिक फिगर के रूप में जाना जाता है, यह ध्यान रखना दिलचस्प होगा कि वारली पेंटिंग में कोई सीधी रेखा का उपयोग नहीं किया जाता है। वे आम तौर पर टेढ़ी-मेढ़ी रेखाएँ, बिंदु, वृत्त और त्रिकोण होते हैं। मानव और पशु शरीर को दो त्रिभुजों द्वारा दर्शाया जाता है जो सिरे पर जुड़े होते हैं। उनका अनिश्चित संतुलन ब्रह्मांड के संतुलन का प्रतीक है, अनिवार्य रूप से अनुष्ठानिक, वारली पेंटिंग आमतौर पर विवाहित महिलाओं द्वारा शादी का जश्न मनाने के लिए बनाई जाती थीं। हालाँकि इनमें से बहुत सी पेंटिंग प्रजनन और समृद्धि से जुड़े अनुष्ठानों पर आधारित हैं, लेकिन उनमें हमेशा यथार्थवाद का स्पर्श होता है। चित्रों का उपयोग वारली जनजातियों की झोपड़ियों को सजाने के लिए भी किया जाता था, जो आमतौर पर गाय के गोबर और लाल मिट्टी के मिश्रण से बनाई जाती थीं।

दिलचस्प बात यह है कि इन चित्रों का केंद्रीय रूपांकन शिकार, मछली पकड़ने और खेती, त्योहारों और नृत्यों, पेड़ों और जानवरों के दृश्यों को चित्रित करता है। अनुष्ठानिक चित्रों के अलावा, अन्य वारली चित्र गांव के लोगों की दिन-प्रतिदिन की गतिविधियों को चित्रित करते हैं। अधिकांश वारली चित्रों के महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक "तरपा नृत्य" है - तारपा एक तुरही जैसा वाद्य यंत्र है, जिसे अलग-अलग पुरुषों द्वारा बारी-बारी से बजाया जाता है। जब संगीत बजता है, तो पुरुष और महिलाएं अपने हाथ मिलाते हैं और तारपा वादकों के चारों ओर घेरा बनाकर घूमते हैं। नर्तकियों का यह चक्र जीवन चक्र का भी प्रतीक है। हममें से कई लोग सोच सकते हैं कि एक कला रूप को लेकर इतना हंगामा क्यों है जो खुद को दो रंगों तक सीमित रखता है। लेकिन यह क्लासिक सादगी ही है जो इस कला को अव्यवस्था से अलग करती है।

कला को जीवित रखना

जबकि इस डिजिटल युग में इस तरह की कलाओं का अस्तित्व बचा पाना मुश्किल हो रहा है, कुछ विचारशील लोग परंपरा को जीवित रखने के लिए अपना योगदान दे रहे हैं। ऐसा ही एक प्रेरक स्थल ठाणे जिले का गोवर्धन इको विलेज है जो वारली कलाकारों को अपनी कला प्रदर्शित करने के लिए विभिन्न मंच प्रदान करके इस कला को जीवित रखने का प्रयास करता है।

फरवरी 2016 में, जापानी कलाकारों के एक समूह ने कला को जीवित रखने के प्रयास में पालघर जिले के गंजद गाँव को गोद लिया। जापान के सामाजिक कलाकारों का यह समूह दीवारों पर पेंटिंग को बढ़ावा देने के लिए गाय के गोबर, मिट्टी और बांस की छड़ियों से झोपड़ियाँ भी बना रहा है। दहानू एक और गाँव है जो वारली कला को जीवित रखने में कामयाब रहा है। अतिशयता की दुनिया में, सादगी एक दुर्लभ वस्तु है और यह कला रूप उस विश्वास को जीवित रखता है।

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कालेज लाइफ के साथी है, बैकपैक- अनुजा भट्ट



 युवाओं के लिए बैकपैक उनकी पर्सनैलिटी और स्टाइल स्टेटमेंट से जुड़ गया है, फिर चाहे उनको कालेज जाना हो या आफिस, उनको एक ऐसे बैग की जरूरत होती है जो न केवल दिखने में बेहद आकर्षक और ट्रेंडी हो, बल्कि जिसमें कीमती गैजेट्स जैसे लैपटॉप, टैबलेट और अन्य जरूरी सामान पूरी तरह सुरक्षित रहें।
यदि आप भी अपने कॉलेज या दैनिक उपयोग के लिए एक ऐसे ही ऑल-इन-वन बैग की तलाश में हैं, तो  विंटेज लैपटॉप बैकपैक आपके लिए एक बेहतरीन और प्रीमियम विकल्प साबित हो सकता हैय़

इस बैकपैक की सबसे बड़ी खासियत इसका क्लासिक विंटेज डिज़ाइन है। यह बैग हाई-क्वालिटी मटेरियल और प्रीमियम फिनिश के साथ आता है, जो दिखने में बेहद लक्ज़री और एलीट अहसास कराता है। इसका 'टॉप फ्लैप क्लोज़र' इसे एक पारंपरिक और विंटेज लुक देता है, जो आज के कॉलेज स्टूडेंट्स के बीच काफी ट्रेंड में है। चाहे आप कैजुअल जींस-टीशर्ट में हों या फॉर्मल कपड़ों में, यह बैग हर आउटफिट के साथ आपके लुक को निखारता है। सबसे अच्छी बात यह है कि इसमें पर्यावरण के अनुकूल (Cruelty-Free) रॉ मटेरियल का इस्तेमाल किया गया है।

अक्सर ज्यादा सामान रखने वाले बैग बहुत भारी और फूले हुए दिखाई देते हैं, जिससे आपका लुक खराब हो सकता है। लेकिन HARISSONS Dexter को एक स्लिम बिल्ड (Slim Build) यानी पतली और स्मार्ट बनावट (30 x 43 x 14 सेमी) के साथ डिज़ाइन किया गया है। 2 मुख्य कंपार्टमेंट व 4 पॉकेट्स के साथ आने वाला यह बैग बाहर से देखने में भारी नहीं लगता। इसके अंदर कॉलेज की जरूरी किताबें, नोटपैड और लंच बॉक्स रखने के लिए पर्याप्त जगह मिल जाती है। पानी की बोतल के लिए इसमें एक लचीली एक्सपेंडेबल बॉटल पॉकेट भी दी गई है।

कॉलेज के प्रोजेक्ट्स, असाइनमेंट और कोडिंग के लिए आजकल लैपटॉप सबसे जरूरी गैजेट बन चुका है। इस बैकपैक में 14 इंच तक के लैपटॉप और टैबलेट को सुरक्षित रखने के लिए एक विशेष पैडेड कंपार्टमेंट दिया गया है। यह आपके कीमती गैजेट्स को बाहरी झटकों और खरोंच से बचाता है। इसके अलावा, बैग के अंदर एक स्मार्ट गैजेट ऑर्गनाइज़र मिलता है, जहां आप अपने पेन, ईयरफोन, माउस और चार्जर को बिना उलझाए व्यवस्थित तरीके से रख सकते हैं।

आज के डिजिटल युग में चलते-फिरते कनेक्टेड रहना बहुत जरूरी है। इस बैग में दिए गए एक्सटर्नल USB और ऑडियो पोर्ट (External USB and Audio Port) इस काम को आसान बनाते हैं। आप बैग के अंदर अपने पावरबैंक को कनेक्ट करके बाहर से फोन चार्ज कर सकते हैं, साथ ही सफर के दौरान आसानी से अपने पसंदीदा म्यूजिक का आनंद ले सकते है।
जब आप बैग में लैपटॉप और किताबें रखते हैं, तो वह भारी हो जाता है। छात्रों की सहूलियत के लिए इसमें पैडेड शोल्डर स्ट्रैप्स के साथ-साथ एक क्विक ग्रैब टॉप हैंडल (Quick Grab Top Handle) दिया गया है, जिससे बैग को आसानी से उठाया जा सके। यह बैग पूरी तरह से वाटर रिपेलेंट (Water Repellent) है, जो आपके गैजेट्स को बारिश के पानी से सुरक्षित रखता है। इसके साथ ही, इसके निचले हिस्से में बॉटम प्रोटेक्शन सिस्टम (Bottom Protection System) दिया गया है, जो रोजमर्रा के इस्तेमाल में बैग को नीचे से घिसने और झटकों से बचाता है।

यह बैकपैक अलग-अलग प्राथमिकताओं और स्टाइल स्टेटमेंट के हिसाब से 4 शानदार रंगों में उपलब्ध है:मिडनाइट मरून (Midnight Maroon): विंटेज लुक चाहने वालों के लिए एक बेहद एलीट और पसंदीदा रंग।
ग्रेफाइट ग्रे (Graphite Grey): सोबर, मिनिमलिस्टिक और प्रोफेशनल वाइब्स देने वाला शानदार शेड।
ब्रिक रेड (Brick Red): एक यूनिक और वाइब्रेंट कलर, जो भीड़ में आपको एक अलग पहचान देता है।
कैमो ग्रीन (Camo Green): ट्रेंडी और एडवेंचरस लुक पसंद करने वाले छात्रों के लिए एक परफेक्ट स्टाइल।

निष्कर्ष
 
विंटेज बैकपैक कार्यक्षमता (Functionality) और फैशन का एक बेहतरीन मिश्रण है। भारत में निर्मित (Made in India) यह स्लिम, वॉटर रिपेलेंट और आधुनिक फीचर्स से लैस बैग कॉलेज के छात्रों और कामकाजी पेशेवरों के लिए एक आदर्श विकल्प है। यदि आप एक ऐसा बैग चाहते हैं जो आपके लैपटॉप को सुरक्षा दे, आपके गैजेट्स को व्यवस्थित रखे और आपको एक क्लासी लुक दे, तो यह आपकी पहली पसंद होना चाहिए।






आपका तौलिया भी बन सकता है स्टेटस सिंबल- अनुजा भट्ट

 यह समय स्टाइल, स्टेटस और माडर्न लुक का है। लुक शब्द का अर्थ  भी अब आप तक सीमित नहीं है। होम डेकोर और पर्सनल केयर में भी लुक  मायने रखता है। इसलिए टावल ही तो है, कहकर इग्नोर मत कीजिए।  समय है छोटी-बड़ी चीज़ों में अपनी पसंद और स्टाइल तलाशने का। इसी बदलाव का एक बेहतरीन उदाहरण है प्रिंटेड टावल (Printed Towels)। 

  • आकर्षक लुक: इन पर किए गए बेहतरीन डिज़ाइन्स और रंगों का तालमेल आपके बाथरूम को एक नया और फ्रेश लुक देता है।
  • वैरायटी की भरमार: चाहे आपको क्लासिक लुक पसंद हो या मॉडर्न, हर किसी के लिए बाज़ार में ढेरों विकल्प मौजूद हैं।
  • बच्चों के लिए मजेदार: कार्टून और सुपरहीरो प्रिंट वाले तौलिए बच्चों को बेहद पसंद आते हैं, जिससे उनका नहाने का अनुभव मजेदार बन जाता है।
डिज़ाइन्स और प्रिंट्स के विभिन्न प्रकार
प्रिंटेड तौलियों में आज कला और तकनीक का एक अनोखा संगम देखने को मिलता है। बाज़ार में मुख्य रूप से निम्नलिखित डिज़ाइन्स काफी लोकप्रिय हैं:
  • फ्लोरल और नेचर प्रिंट: फूल, पत्तियां और प्राकृतिक दृश्यों वाले ये प्रिंट्स काफी शांत और रिफ्रेशिंग अहसास देते हैं।
  • जियोमेट्रिक और एब्सट्रैक्ट डिज़ाइन्स: धारियां (Stripes), चेक और आधुनिक कला वाले प्रिंट्स युवाओं और पुरुषों के बीच काफी लोकप्रिय हैं।
  • ट्रेडिशनल ब्लॉक प्रिंट: हाथ से किए जाने वाले राजस्थानी या सांगानेरी ब्लॉक प्रिंट वाले तौलिए एथनिक और लक्ज़री लुक पसंद करने वालों की पहली पसंद होते हैं।
  • थीम-बेस्ड प्रिंट: बीच (Beach) के लिए समंदर और पेड़ों के प्रिंट, या जिम के लिए मोटिवेशनल कोट्स वाले प्रिंट्स भी काफी ट्रेंड में हैं।
सही फैब्रिक का चयन है बेहद ज़रूरी
एक अच्छे प्रिंटेड टावल की पहचान सिर्फ उसके डिज़ाइन से नहीं, बल्कि उसकी क्वालिटी से होती है। खरीदते समय इन फैब्रिक्स को प्राथमिकता दें:
  • 100% शुद्ध सूती (कॉटन): यह त्वचा के लिए सबसे सुरक्षित और मुलायम होता है। कॉटन के तौलिए पानी को बहुत तेजी से सोखते हैं।
  • तुर्किश कॉटन: यदि आप लक्ज़री और प्रीमियम अहसास चाहते हैं, तो तुर्किश कॉटन के प्रिंटेड टावल सबसे बेहतरीन माने जाते हैं। ये काफी घने और रोएंदार होते हैं।
  • माइक्रोफाइबर: अगर आप यात्रा (Travel) या जिम के शौकीन हैं, तो माइक्रोफाइबर प्रिंटेड टावल चुनें। ये बहुत हल्के होते हैं, जगह कम घेरते हैं और मिनटों में सूख जाते हैं।
प्रिंटेड टावल की देखभाल कैसे करें?
चूंकि इन तौलियों पर खूबसूरत रंग और प्रिंट्स होते हैं, इसलिए इनकी सही देखभाल ज़रूरी है ताकि इनका आकर्षण लंबे समय तक बना रहे:
  • माइल्ड डिटर्जेंट: हमेशा हल्के डिटर्जेंट का उपयोग करें और ब्लीच (Bleach) का इस्तेमाल बिल्कुल न करें, अन्यथा रंग फीके पड़ सकते हैं।
  • अलग से धोएं: शुरुआती कुछ वॉश में इन्हें अन्य सफेद कपड़ों से अलग धोएं, ताकि अगर थोड़ा-बहुत रंग निकले भी तो दूसरे कपड़े खराब न हों।
  • छाया में सुखाएं: तौलियों को सीधे तेज धूप में सुखाने के बजाय हवादार और छायादार जगह पर सुखाएं, इससे कपड़े की कोमलता और रंग दोनों सुरक्षित रहते हैं।
प्रिंटेड टावल सिर्फ एक ज़रूरत नहीं, बल्कि आपकी जीवनशैली और व्यक्तिगत पसंद को दर्शाने का एक जरिया हैं। एक सही फैब्रिक और खूबसूरत प्रिंट का तौलिया न केवल आपकी त्वचा का ख्याल रखता है, बल्कि आपके दैनिक जीवन में रंगों और खुशियों का तड़का भी लगाता है।
आप अपराजिता ऑर्गनाइजेशन से भी यह खरीद सकते हैं। 

गुरुवार, 24 सितंबर 2026

मंदिर के पैसे से क्या किया ताऊ जी ने.......


कल परिवर्तनी एकादशी थी —पापा हमसे दूर चले गए। आज पूरे पाँच महीने हो गए हैं। 
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की इस एकादशी को 'परिवर्तनी' कहने के पीछे एक पौराणिक मान्यता है। कहा जाता है कि चातुर्मास में क्षीरसागर में योगनिद्रा में लीन भगवान विष्णु इस पावन दिन अपनी करवट बदलते हैं, इसीलिए इसे 'परिवर्तनी' या 'पार्श्व एकादशी' के नाम से जाना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन स्वरूप की विशेष पूजा की जाती है।वामन अवतार और लक्ष्मी जी की चतुर योजनाकथा के अनुसार, भगवान वामन ने महर्षि कश्यप और माता अदिति के पुत्र के रूप में अवतार लिया था। उस समय असुरराज बलि (भक्त प्रह्लाद के पौत्र) ने अपने अदम्य तप और बाहुबल से तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल) पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया था। देवताओं को विवश होकर भगवान विष्णु की शरण में जाना पड़ा। तब श्रीहरि ने एक बौने ब्राह्मण (वामन) का वेष धारण किया और राजा बलि के पास पहुंचे, जो उस समय नर्मदा तट पर भव्य यज्ञ कर रहे थे।भगवान वामन ने राजा बलि से दान में केवल तीन पग भूमि मांगी। हालांकि, बलि के कुलगुरु शुक्राचार्य ने पहचान लिया था कि यह साक्षात भगवान विष्णु हैं और उन्होंने बलि को सचेत भी किया, लेकिन दानी बलि अपने वचन से पीछे नहीं हटे। जैसे ही दान का संकल्प पूरा हुआ, वामन भगवान ने विराट रूप धारण कर लिया। उन्होंने पहले पग में पूरी पृथ्वी नाप ली और दूसरे पग में अंतरिक्ष व स्वर्गलोक। अब जब तीसरा पैर रखने के लिए कोई स्थान नहीं बचा, तो वचनों के पक्के राजा बलि ने झुककर अपना सिर आगे कर दिया।भगवान ने अपना तीसरा पैर बलि के मस्तक पर रखा, जिससे वे पाताल लोक में चले गए। बलि की इस अटूट वचनबद्धता और दानशीलता से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें पाताल का राजा बनाए रखा और उनसे वर मांगने को कहा। बलि ने वरदान में मांगा कि भगवान स्वयं उनके द्वारपाल बनें और विष्णु जी ने इसे स्वीकार कर लिया।कथा आगे बढ़ती है कि जब माता लक्ष्मी अपने पति को खोजते हुए पाताल लोक पहुंचीं, तो उन्होंने देखा कि सृष्टि के पालनहार वहां राजा बलि के द्वार पर पहरा दे रहे हैं। माता लक्ष्मी ने एक चतुराई भरी योजना बनाई। वे एक साधारण स्त्री का रूप धरकर बलि के महल में पहुंचीं और उनसे सहायता मांगी। राजा बलि ने उन्हें शरण दी और अपने राजमहल में ससम्मान रखा। बाद में माता लक्ष्मी ने राजा बलि को रक्षासूत्र बांधकर उन्हें अपना भाई बना लिया। इस अगाध स्नेह से अभिभूत होकर बलि ने कहा, "बहन! तुम्हें जिस भी चीज की आवश्यकता हो, निसंकोच मांग लो।" तब माता लक्ष्मी ने कहा, "यदि आप देना ही चाहते हैं, तो मेरे पति (द्वारपाल) को इस बंधन से मुक्त कर दीजिए।" एक बहन के लिए इससे बड़ा उपहार और क्या हो सकता है।

यह तो एक पौराणिक गाथा थी, परंतु जीवन के रंगमंच पर जो कथाएं मैं आपसे साझा करती हूं, वे हमारे परिवार की जीवंत और सत्य घटनाएं हैं। पिछली बार मैंने आपको 'ठुलकुड़ा' (बड़ी दादी) के विरह की मर्मस्पर्शी दास्तान सुनाई थी, आइए आज उसी सफर के अगले पड़ाव पर चलते हैं।बड़ी दादी की उस असमय त्रासदी के बाद, नन्हे ताऊजी को संभालने के लिए पापा की बड़ी बुआ आगे आईं। ताऊजी उस समय मात्र छह महीने के थे, जब बुआ उन्हें अपने साथ अल्मोड़ा ले गईं। ताऊजी का शुरुआती बचपन बुआ के घर के आंगन में बड़े दुलार के साथ बीता। बाद में, दादाजी ने दूसरा विवाह किया, जिससे मेरे पापा, मेरी बुआ और मेरे चाचा का जन्म हुआ। हमारे चाचा ने बचपन में ही वैराग्य की राह चुन ली और साधुओं की संगति में चले गए। उन्होंने साधु-वेश में पूरे देश का भ्रमण किया और वे कई भाषाएँ बोल सकते थे। उधर, पापा और बुआ अपनी मां के साथ बिषाड़ गांव में बड़े हो रहे थे। जब पापा महज चार-पांच वर्ष के थे, तब उनके नाना उन्हें अपने साथ ले गए—यह प्रसंग आप पहले  पढ़ चुके हैं। 
आगे चलकर मिडिल स्कूल की पढ़ाई पापा ने अल्मोड़ा से की। चूंकि ताऊजी बचपन से ही बुआ के पास रह रहे थे, इसलिए दोनों बच्चों की पढ़ाई और परवरिश का पूरा भार अपनी बहन पर डालना दादाजी को उचित नहीं लगा। इसलिए उन्होंने पापा की पढ़ाई-लिखाई के लिए अपनी नानी से सहायता मांगी। उनकी नानी की एक भतीजी थीं—हरिप्रिया पंत, जो अल्मोड़ा के ही ज्योली गांव के पंत परिवार की बेटी थीं। उनके पिता का नाम दुर्गा दत्त पंत था। उनके पिता यानी मेरे दादा जी की नानी के भाई..इस प्रकार, अपने ननिहाल के बाद वर्ष 1946-47 के आसपास पापा दादाजी की नानी की उसी भतीजी (हरिप्रिया पंत) के घर आ गए। जो बाशभीरा में रहते थे। (ताऊजी पहले से पोखरखाली में रह ही रहे थे।) यह कुमाऊं का एक अत्यंत प्रतिष्ठित और शिक्षित ब्राह्मण परिवार था, जो समाज में 'बैरती के पांडे' के नाम से विख्यात था।
पापा ने अपनी इंटरमीडिएट (12वीं) तक की शिक्षा इसी घर में रहकर पूरी की। पढ़ाई में इतने मेधावी  होने के कारण गणित और भौतिक विज्ञान में (विशेष योग्यता) प्राप्त की। पापा को जितना लगाव विज्ञान और गणित से था, उतना ही गहरा प्रेम साहित्य और सिनेमा से भी था। सिनेमा का चस्का तो ऐसा था कि कभी-कभी परीक्षा से ठीक एक दिन पहले वे अपनी पुरानी किताबें रद्दी में बेच आते थे ताकि फिल्म का टिकट खरीद सकें। परीक्षा की पूर्व संध्या पर फिल्म देखना उनके लिए तनावमुक्त होने का एक अनूठा तरीका था। जब उनके सहपाठी  पढ़ रहे होते, पापा तब सिनेमाहॉल के अंधेरे में सुकून तलाश रहे होते थे। स्कूली दिनों में तो उन्होंने यह साहस नहीं किया, परंतु कॉलेज पहुंचते-पहुंचते फिल्म देखना उनका एक ऐसा शौक बन गया जिसे 'जुनून' कहा जा सकता है। दिलीप कुमार और वहीदा रहमान की रूपहले पर्दे की जोड़ी उन्हें बेहद प्रिय थी, और चरित्र अभिनेताओं में ए.के. हंगल उनके पसंदीदा थे।
एक बार जब मैंने पापा से उनके बचपन के उस घर और माहौल के बारे में पूछा जहां रहकर उन्होंने पढ़ाई की थी, तो वे मुस्कुराकर बोले, "मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी 'बड़े भाई साहब' पढ़ लो, हमारी कहानी हूबहू वैसी ही थी।" बाद में जब मैंने यही बात हरिप्रिया पंत जी की बहू से पूछी, तो उन्होंने भी इस पर मुहर लगाते हुए कहा, "तुम्हारे पापा ने बिल्कुल सच कहा था।"
बैरती के उस परिवार में जो बड़े भाई (जगदीश जी) थे, वे स्वभाव से बेहद उदार, सरल और स्नेही थे, परंतु पढ़ाई-लिखाई में उनका मन रत्ती भर भी नहीं लगता था। इसके विपरीत, छोटे भाई (शिव दत्त) इतने कुशाग्र बुद्धि थे कि किताब के किसी भी कोने से कुछ भी पूछ लो, उन्हें सब जुबानी याद रहता था। छोटा भाई हमेशा कक्षा में प्रथम आता, पर बड़े भाई को अपने अनुत्तीर्ण (फेल) होने का कोई मलाल नहीं होता था; वे तो छोटे भाई की सफलता में ही अपनी खुशी ढूंढ लेते थे।पढ़ते-पढ़ते एक समय ऐसा आया जब दोनों ने साथ में मिडिल की परीक्षा दी। पूरे परिवार और समाज को विश्वास था कि छोटा भाई कीर्तिमान रचेगा और बड़े भाई का तो परिणाम पहले से तय माना जा रहा था। परंतु, जब परिणाम आया तो सब स्तब्ध रह गए! परिणाम बिल्कुल उलट था। जगदीश जी (बड़े भाई) उत्तीर्ण हो गए और छोटा भाई ... पूरे मोहल्ले में बड़े भाई की सफलता के लड्डू बंटे, परंतु बड़े भाई के चेहरे पर कोई उल्लास नहीं था। छोटे भाई के कारण उनके सहृदय दिल को गहरा आघात लगा था। खैर, अगले वर्ष छोटे भाई ने पूरी परीक्षा में टॉप किया और बड़े भाई की राह भी धीरे-धीरे आसान होती चली गई। आगे चलकर जगदीश जी को लखनऊ सचिवालय में एक अच्छी सरकारी नौकरी मिली, जहां उनका परोपकारी स्वभाव और सामाजिक सेवा की भावना वैसी ही बनी रही जैसी बचपन में थी। उन्होंने वहां न जाने कितने ही प्रवासियों और जरूरतमंदों की नौकरियां लगवाईं और उनके रहने-खाने का प्रबंध किया। छोटे भाई शिवदत्त पांडे जिनको पापा आदर से शिबन दा कहते थे इंजीनियर बने।,, मैं जैसा अक्सर कहती हूं मेरे पापा का गणित बहुत अच्छा था , वह मुंहजुबानी सवाल हल कर लेते थे पर उसकी वजह शिबन दा ही थे वह उनके भाई भी थे और मेंटर भी। पापा जीवनपर्यन्त उनको याद करते रहे।
उन दिनों अल्मोड़ा शहर में पानी की भारी किल्लत हुआ करती थी। पापा अक्सर याद करते थे कि कैसे वे परिवार के अन्य सदस्यों के साथ पानी के लिए मीलों दूर पैदल जाया करते थे। उस दौर में बिजली की चकाचौंध नहीं थी, इसलिए रात के सन्नाटे में लालटेन की मद्धम डिबरी की रोशनी में ही पढ़ाई करनी पड़ती थी। भले ही तब भौतिक सुख-सुविधाएं नगण्य थीं और जीवन अत्यंत कठिन था, परंतु लोगों के आपसी संबंध और जीवन-मूल्य बहुत ऊंचे थे।समय का चक्र ऐसा घूमा कि आगे चलकर बैरती के उन भाइयों में से छोटे भाई की बेटी और मेरे पापा की बड़ी बेटी , दोनों ही डॉक्टर बनीं। दोनों ने केजीएमसी लखनऊ से अपनी शिक्षा पूरी की और आज भी उनके बीच एक अटूट और गहरी मित्रता है। सचमुच, ईश्वर जीवन के ताने-बाने में कुछ ऐसे अदृश्य धागे पिरो देता है, जिससे मनुष्य अपनी जड़ों की सुगंध को ताउम्र महसूस करता रहता है।
हमारे ताऊजी सचमुच एक देवता-स्वरूप पुरुष थे—अत्यंत दयालु, करुणा की प्रतिमूर्ति और अगाध स्नेह बरसाने वाले। वे स्वभाव से बेहद भावुक थे। प्रतिदिन नियम से 'रामचरितमानस' का पाठ करना उनकी दिनचर्या का नहीं, बल्कि उनकी आत्मा का हिस्सा था। वे मानस की प्रत्येक चौपाई को भीतर तक महसूस करते थे। पाठ करते समय जैसे ही श्री राम के वनवास, केवट प्रसंग या त्याग का कोई भी मार्मिक दृश्य आता, ताऊजी की आंखें सजल हो उठतीं और वे बच्चों की तरह सुबकने लगते थे।एक बार मानस-पाठ के दौरान भगवान राम का वह प्रसंग आया, जहां वे पिता की आज्ञा से दूर तपोवन में रहकर अपने दिवंगत पिता का श्राद्ध कर रहे हैं। ताऊजी को इस तरह सुबकता देख मैंने धीरे से पास जाकर पूछा, "ताऊजी! क्या हुआ? आप रो क्यों रहे हैं?" उन्होंने अपनी भीगी आंखें पोंछते हुए बेहद रुंधे गले से कहा, "आज पापा बहुत याद आए..." वे हमारे दादाजी को हमेशा 'पापा' कहकर ही पुकारते थे। जन्म देते ही मां को खो देने वाले और बचपन से पिता के साये से दूर रहने वाले उस बड़े बेटे के सीने में पिता की स्मृति एक स्थायी कसक बनकर धड़कती थी।दोनों भाइयों के बचपन की सबसे हसीन मुलाकातें अल्मोड़ा के प्रसिद्ध कौतिक (मेलों) में हुआ करती थीं। उस समय वे पढ़ाई कर रहे थे, इसलिए जेब अक्सर खाली ही रहती थी। एक बार मेले की रंग-बिरंगी भीड़ के बीच, मेरे पापा ने एक दुकान पर सजी मिठाई को देखकर बड़े चाव से ताऊजी से कहा, "भैया! मुझे यह चीज खानी है।" ताऊजी ने अपने छोटे भाई की आंखों में छिपी उस मासूम लालसा को पढ़ लिया, परंतु उस क्षण उनकी जेब बिल्कुल खाली थी। उन्होंने बहुत भारी मन से छोटे भाई को सहलाते हुए कहा, "इस बार तो नहीं रे प्यारे, पर अगली बार मैं तुम्हें यह जरूर खिलाऊंगा।" [छोटा भाई तो बालक था, कहकर भूल गया, पर बड़े भाई का दिल बेचैन हो उठा। जब वे बुआ के घर लौटे, तो उनका ध्यान घर के भीतर बने छोटे से आलय (मंदिर) पर गया, जहां बुआ ने पूजा और भगवान के चढ़ावे के कुछ पैसे रखे हुए थे। ताऊजी दबे पांव मंदिर में गए और चुपके से वहां रखे कुछ पैसे उठा लाए। सांसारिक दृष्टि से यह एक 'चोरी' थी, लेकिन इस चोरी में कोई लोभ, स्वार्थ या पाप नहीं था; इसमें तो केवल एक बड़े भाई की बेबसी और अपने छोटे भाई के प्रति उमड़ता अगाध वात्सल्य था। उन्होंने मन ही मन ईश्वर से बड़े मासूम भाव से कहा होगा, "हे प्रभु! मुझे अपने 'प्यारे' की इच्छा पूरी करनी है। मेरे छोटे भाई को उसकी मनपसंद चीज मिलनी ही चाहिए।" वे मेरे पापा को लाड से हमेशा 'प्यारे' ही कहते थे।अगली बार जब मेला लगा, तो ताऊजी पूरे अधिकार और गर्व के साथ पापा को उसी दुकान पर ले गए और उन्हें उनकी मनपसंद चीज भरपेट खिलाई। छोटे भाई के चेहरे पर तैरती वह निष्पाप मुस्कान देखकर बड़े भाई का सीना गर्व से चौड़ा हो गया था।परंतु, शाम को जब बुआ ने पूजा करते समय चढ़ावे के पैसे गायब होते देखे, तो वे समझ गईं। उन्होंने ताऊजी से कड़क लेकिन भीतर ही भीतर स्नेह से भीगी आवाज में कुमाऊंनी में पूछताछ की:बुआ: "मन्दिर बटि पैस तुम्ले काड़ छी ना?" (मंदिर से पैसे तुमने ही निकाले ना?) बुआ: "सांच-सांच बता!" (सच-सच बता!) बुआ: "फैल त्यार कमीज में कि लग रौ?" (फिर तेरी कमीज पर यह क्या लगा है?) बुआ: "यो त जलेबी लाग्यो छ।" (यह तो जलेबी का दाग लगा है।) तब ताऊजी ने बिना किसी भय के, सत्य और प्रेम से भरकर उत्तर दिया:ताऊजी: "हाँ मैंलेई काड़ छी। भुल आयो छियो। हमुले मिलबेर जलेबी खा। भगवान क पैस लेण में क्यै पाप नई लाग्द।" (हां, मैंने ही निकाले थे। भाई आया था। हम दोनों ने मिलकर जलेबी खाई। भगवान का पैसा भाई के लिए लेने में कोई पाप नहीं लगता।) [यह कहते हुए ताऊजी ने पलकें झुका लीं, पर उनके चेहरे पर कोई ग्लानि या डर नहीं था, क्योंकि वह 'चोरी' प्रेम के मंदिर की सबसे पवित्र इबादत थी।......
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कफ्तान सूट डिजाइन, देसी रंग विदेशी ढ़ंग

कफ्तान एक प्राचीन परिधान है, जिसकी उत्पत्ति प्राचीन फारस में हुई थी, लेकिन बाद में यह मध्य और पश्चिमी एशिया में फैल गया। यह एक प्रकार का चोला या अंगरखा है जिसे पुरुष और महिलाएं दोनों पहनते थे। कफ्तान आज भी विभिन्न तरीकों से पहने जाते हैं । क्या आप कफ्तान के इतिहास के बारे में जानना चाहेंगे ?
बहुत पहले मैंने एक किताब पढ़ी थी 'द हिस्ट्री ऑफ वर्ल्ड कॉस्ट्यूम एंड फैशन' जिसके लेखक हैं डैनियल डेलिस हिल। इस किताब में  वह लिखते हैं, “इस्लामी साम्राज्य के उदय के समय अरब में, पुरुषों का सबसे आम परिधान कफ्तान नामक लंबा, ढीला-ढाला कुर्ता था। अपने सरलतम रूप में, अरबी कुर्ता संभवतः रोमन ट्यूनिका और मिस्र के कलासिरी की तरह ही टी-कट होता था। कफ्तान अक्सर एक चौड़ी कमरबंद से बांधा जाता था जो कभी-कभी इतनी लंबी होती थी कि उसे कमर में कई बार लपेटा जा सके।”
कफ्तान की उत्पत्ति संभवतः फारस में हुई और धीरे-धीरे यह पूरे अरब जगत में फैलकर लोकप्रिय हो गया। कफ्तान पुरुषों और महिलाओं दोनों द्वारा पहना जाता था, विशेष रूप से मोरक्को के शहरी अभिजात वर्ग के द्वारा। विशेष प्रकार का कफ्तान संभवतः दुल्हन के परिधान के हिस्से के रूप में भी पहना जाता था ”मोरक्को से प्राप्त 20वीं सदी के आरंभ के एक रेशमी कफ्तान में फूलों की कढ़ाई है, जिसमें बटन और एक बेल्ट है। 
शार्लोट जिरोसेक ने बर्ग एनसाइक्लोपीडिया ऑफ वर्ल्ड ड्रेस एंड फैशन: सेंट्रल एंड साउथवेस्ट एशिया (2010) में "द कफ्तान एंड इट्स ओरिजिन" शीर्षक से कफ्तान और इस शब्द की उत्पत्ति का वर्णन अलग तरह से किया है।
“कफ्तान (जिसे कैफ़्टन भी लिखा जाता है) शब्द आमतौर पर तुर्की, फ़ारसी या मध्य एशियाई मूल के लंबे, ढीले-ढाले कोट को संदर्भित करता है। यह पुरुषों और महिलाओं द्वारा पहने जाने वाले कोट और जैकेट की श्रृंखला में सबसे बाहरी परत को भी संदर्भित कर सकता है। कफ्तान शब्द सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अंग्रेजी भाषा में आया, जब इसे ओटोमन दरबार के सदस्यों द्वारा तुर्की शब्द के रूप में पेश किया गया थ। यह शब्द तुर्की, फ़ारसी, रूसी और पूर्वी यूरोपीय भाषाओं के साथ-साथ कई मध्य एशियाई भाषाओं में भी विभिन्न रूपों में शामिल है।” मेट्रोपॉलिटन म्यूजियम ऑफ आर्ट, जिसके संग्रह में कई कफ्तान हैं इस परिधान की उत्पत्ति के बारे में लिखता है:
“कफ्तान नामक वस्त्र मोरक्को में संभवतः 16वीं शताब्दी में आने से पहले फारस और ओटोमन साम्राज्य में प्रचलित था। रेशमी ब्रोकेड या मखमल जैसी उत्तम सामग्री से बने कफ्तान विशेष अवसरों के लिए बनाए जाते थे।” 
राष्ट्रीय पोशाक का विश्वकोश : विश्व भर में पारंपरिक वस्त्र (2013) बताता है, इस्लामी काल में
"शहरी महिलाएं घर में ज्यादातर कफ्तान पहनती थीं, जो चौड़ी आस्तीन का बिना कॉलर का चोला होता है। कफ्तान का प्रचलन प्रारंभिक इस्लामी काल में ईरान से अंडालूस और फिर अंडालूस शरणार्थियों के साथ मोरक्को में हुआ। कफ्तान कीमती रेशमी ब्रोकेड से या फिर सादे और सरल कपड़े से भी बने हो सकते थे।"
सऊदी अरब की 1980 के दशक की महिलाएं की काले और सुनहरे रंग के कफ्तान पहनती थी जिसमें सोने धागे की कढ़ाई का पैटर्न है और गर्दन के चारों ओर और सामने के बीच में एक काली पट्टी है जो वी-आकार बनाती है।
विकिपीडिया की राय में
कफ्तान एक प्रकार का चोगा या ट्यूनिक है; इसकी उत्पत्ति एशिया में हुई है और यह दुनिया भर की कई संस्कृतियों में हजारों वर्षों से पहना जाता रहा है। रूसी भाषा में, कफ्तान पुरुषों के लंबे सूट की एक शैली को संदर्भित करता है जिसमें तंग आस्तीन होती हैं। हालांकि कफ्तान की उत्पत्ति प्राचीन मेसोपोटामिया (आधुनिक इराक) में हुई है, लेकिन इसका उपयोग कई पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम एशियाई जातीय समूहों द्वारा किया जाता रहा है। यह ऊन, कश्मीरी, रेशम या कपास से बना हो सकता है और इसे कमरबंद के साथ पहना जा सकता है। ओटोमन साम्राज्य के समय में लोकप्रिय, डिज़ाइन किए गए वस्त्र राजदूतों और अन्य महत्वपूर्ण मेहमानों को उपहार में दिए जाते थे। कफ्तान के विभिन्न रूप एशिया भर की संस्कृतियों में फैल गए और रूस, दक्षिण-पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका के लोगों द्वारा पहने जाते थे। कफ्तान की शैलियाँ, उपयोग और नाम संस्कृति के अनुसार भिन्न होते हैं। कफ्तान को अक्सर कोट या ओवरड्रेस के रूप में पहना जाता है, जिसमें आमतौर पर लंबी आस्तीन होती हैं और यह टखनों तक पहुँचता है। गर्म जलवायु वाले क्षेत्रों में, कफ्तान एक हल्का और ढीला-ढाला परिधान है। कुछ संस्कृतियों में, कफ्तान राजशाही का प्रतीक रहा है।
उम्मीद है आपको यह लेख पसंद आया होगा।
अपराजिता ऑर्गनाइजेशन के संग्रह में भी आप कफ्तान के डिजाइन देख सकते हैं, और खरीदसकते हैं।

सोमवार, 14 सितंबर 2026

पौधे लगाएं , पेट्स और बच्चों का भी ख्याल रखें-अनुजा भट्ट


 आपने भी अपना आशियाना बना लिया है, तो सबसे पहले मेरी ओर से आपको बहुत-बहुत बधाई। मैं चाहती हूं कि आपका घर हरा-भरा और जीवंत हो। आजकल जिस तरह के घरों में हम रहते हैं, वहां ज़मीन पर गमले रखने के लिए जगह न होती। इसका एक आसान समाधान है: इनडोर हैंगिंग प्लांट्स (घर के अंदर लटकने वाले पौधे)।

पौधे लगाने के तरीके को भी मैं एक स्किल की तरह देखती हूं। हर स्किल सीखने का क्रम बिगिनर, इंटरमीडिएट, एडवांस और एक्सपर्ट होता है। अगर आप बिगनर हैं तो शुरुआत करने के लिए सही पौधे का चुनाव करना मुश्किल हो सकता है। आपके घर के लिए कौन सा पौधा सबसे अच्छा है? उसे कितनी रोशनी की ज़रूरत होगी? किस तरह के गमले का इस्तेमाल करना चाहिए? क्या यह पालतू जानवरों और बच्चों के लिए सुरक्षित है?  
मेरी तरह आपके मन के भीतर भी कई सवाल हो सकते हैं। इन सवालों का उत्तर जानने के लिए मैंने थोड़ी रिसर्च की, कुछ किताबों को टटोला और जो जानकारी मिली उसे आपसे साझा कर रही हूं।

सही इनडोर हैंगिंग प्लांट चुनना

 जब आप घर के अंदर लटकाने के लिए सबसे अच्छे पौधे ढूंढ रहे हों, तो आपको सबसे पहले कुछ बातों का पता लगाना होगा:

आपके पौधे को किस तरह की रोशनी पसंद आएगी?

उसकी ज़रूरतों का ध्यान रखने के लिए आपके पास कितना समय होगा?

जब आप अपनी ज़रूरतों के हिसाब से सही पौधे का चुनाव कर लें, तो आप खरीदारी कर सकते हैं। नीचे दस तरह के पौधों के बारे में बताया गया है जिनसे आप शुरुआत कर सकते हैं।

1. इंग्लिश आइवी (English Ivy)

रोशनी की ज़रूरत: तेज़ अप्रत्यक्ष (bright indirect) से सीधी रोशनी

पानी की ज़रूरत: हफ़्ते में एक बार

पालतू जानवरों के लिए सुरक्षित: नहीं

 वैज्ञानिक रूप से 'हेडेरा हेलिक्स' (Hedera helix) के नाम से जानी जाने वाली यह चमकदार, गहरे हरे रंग की बेल सिर्फ़ स्कूलों के कैंपस को ढंकने के लिए नहीं है। असल में, यह हैंगिंग प्लांट के तौर पर ज़्यादा बेहतर है और इसकी देखभाल करना भी बहुत आसान है। इसे मध्यम मात्रा में पानी और मध्यम रोशनी की ज़रूरत होती है—अगर आप इसे कम रोशनी वाली जगह पर लटकाना चाहते हैं, तो हर कुछ महीनों में इसे किसी दूसरे पौधे के साथ बदलें।

2. बॉस्टन फर्न

रोशनी की ज़रूरत: कम

पानी की ज़रूरत: हफ़्ते में दो बार

पालतू जानवरों के लिए सुरक्षित: हाँ

नेफ्रोलेपिस एक्सल्टेटा, या बॉस्टन फर्न, देखने में पंख जैसा और आकर्षक लगता है, लेकिन कम नमी वाली जगहों पर भी इसकी देखभाल करना काफ़ी आसान है। यह हवा को साफ़ करता है और पालतू जानवरों के लिए सुरक्षित है, इसलिए परिवारों के लिए यह एक बेहतरीन विकल्प है।

3. बर्ड्स नेस्ट फर्न

रोशनी की ज़रूरत: कम से तेज़ इनडायरेक्ट रोशनी

पानी की ज़रूरत: हफ़्ते में दो बार

पालतू जानवरों के लिए सुरक्षित: हाँ

यह हरा-भरा और ट्रॉपिकल पौधा कम से मध्यम रोशनी में अच्छा रहता है। इसकी देखभाल करना आसान है, यह पालतू जानवरों के लिए सुरक्षित है और इसे थोड़ी ज़्यादा नमी पसंद है—इसलिए इसे खिड़की वाले बाथरूम या किचन में रखें। इसे *Asplenium nidus* भी कहा जाता है। इसका नाम इसलिए ऐसा है क्योंकि इसकी नई पत्तियाँ खुलने से पहले छोटे पक्षी के अंडे जैसी दिखती हैं। जितनी ज़्यादा रोशनी इसे मिलेगी, इसकी पत्तियाँ उतनी ही ज़्यादा घुमावदार होंगी। अच्छी बात यह है कि बर्ड्स नेस्ट फर्न कम रोशनी में भी अच्छी तरह पनपता है, इसलिए अगर आप घर के किसी अंधेरे कोने को रोशन करना चाहते हैं, तो इसे चुन सकते हैं। कभी भी इसके बीच में या ऊपरी हिस्से (क्राउन) में पानी न डालें क्योंकि इससे यह सड़ सकता है; पानी हमेशा पत्तियों के नीचे और मिट्टी में डालें।"

 4. स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स

रोशनी की ज़रूरत: तेज़ इनडायरेक्ट रोशनी

पानी की ज़रूरत: हर दो से तीन हफ़्ते में एक बार

पालतू जानवरों के लिए सुरक्षित: नहीं

 इस खूबसूरत सक्यूलेंट पौधे पर गोल-गोल दाने सिर्फ़ दिखने में अच्छे नहीं लगते—असल में इनमें पानी भरा होता है । अच्छी बात यह है कि इन लटकने वाले पौधों की देखभाल करना आसान है और इन्हें घर में बस ऐसी जगह चाहिए जहाँ इनडायरेक्ट धूप आती ​​हो। ये ऊँची छत वाली जगहों के लिए बहुत अच्छे हैं, क्योंकि इनकी बेलों को फैलने के लिए काफ़ी जगह मिल जाती है। लेकिन जानकारी के लिए बता दें कि यह पौधा थोड़ा ज़हरीला होता है, और अगर इंसान या पालतू जानवर इसे खा लें, तो उन्हें थोड़ी-बहुत बीमारी (पेट की तकलीफ़ और त्वचा में जलन) हो सकती है।

 5. स्पाइडर प्लांट

रोशनी की ज़रूरत: कम से तेज़ इनडायरेक्ट रोशनी

पानी की ज़रूरत: हर दो से चार हफ़्ते में एक बार

पालतू जानवरों के लिए सुरक्षित: हाँ

इसकी सुंदर और पतली पत्तियाँ इसे लटकाने के लिए एक बेहतरीन विकल्प बनाती हैं, और कम देखभाल की ज़रूरत के कारण, यह नए लोगों के लिए भी बहुत अच्छा है।  "यह अनोखा पौधा मध्यम से तेज़ इनडायरेक्ट रोशनी में अच्छा रहता है, इसकी देखभाल करना बहुत आसान है और यह पालतू जानवरों के लिए भी सुरक्षित है।" इस पौधे में छोटे-छोटे 'स्पाइडरेट्स' (छोटे स्पाइडर प्लांट) उग सकते हैं। इन्हें काटकर पानी में रखने पर नई जड़ें निकल आती हैं और फिर इन्हें मिट्टी में लगाया जा सकता है। आप इन नए छोटे पौधों को परिवार और दोस्तों के साथ भी बांट सकते हैं! जितने ज़्यादा पौधे, उतनी ज़्यादा खुशी।

 6. फिलोडेंड्रॉन हार्टलीफ

रोशनी की ज़रूरत: कम से लेकर तेज़, लेकिन सीधी धूप नहीं (indirect light)

पानी की ज़रूरत: हफ़्ते में एक बार

पालतू जानवरों के लिए सुरक्षित: नहीं

अगर आप भी एक ऐसा घना लटकने वाला पौधा चाहते हैं जिसकी देखभाल में ज़्यादा मेहनत न लगे, तो 'फिलोडेंड्रॉन कॉर्डेटम ग्रीन' आपके लिए एकदम सही है। "तेज़ी से बढ़ने वाले दिल के आकार के ये पौधे कम से लेकर तेज़, लेकिन सीधी धूप न पड़ने वाली जगहों पर अच्छी तरह पनपते हैं और इनकी देखभाल करना बहुत आसान है।" ये लगभग किसी भी माहौल में अच्छी तरह बढ़ते हैं, इसलिए आप इन्हें कहीं भी (जैसे आपके घर में) लगा सकते हैं। और अच्छी बात यह है  ये पौधे बीच-बीच में मिट्टी के सूख जाने पर भी खराब नहीं होते। "बस अच्छी तरह पानी दें और वापस लटका दें।"

7. बेबीज़ टीयर्स

रोशनी की ज़रूरत: तेज़ लेकिन सीधी नहीं (ब्राइट इनडायरेक्ट)

पानी की ज़रूरत: हफ़्ते में एक बार

पालतू जानवरों के लिए सुरक्षित: हाँ

बेबीज़ टीयर्स (जिसे हेलक्सिन सोलेइरोली भी कहते हैं) टेरारियम में आम तौर पर पाए जाते हैं क्योंकि इनकी पत्तियाँ नाज़ुक और छोटी होती हैं और तने पतले होते हैं। लेकिन अगर आप इसे हैंगिंग प्लांटर में लगाएँ, तो यह बहुत अच्छी तरह बढ़ेगा; इसकी बेलें तेज़ी से फैलती हैं और गमले के किनारे से नीचे लटकती हैं। इसे नमी वाली जगह पसंद है और यह सूखना पसंद नहीं करता, इसलिए इसे ऐसी बाथरूम में रखें जहाँ खिड़की हो।

8. बरोज़ टेल

रोशनी की ज़रूरत: सीधी धूप

पानी की ज़रूरत: हर दो हफ़्ते में एक बार

पालतू जानवरों के लिए सुरक्षित: हाँ

बरोज़ टेल, यानी सेडम मॉर्गनियनम (जिसे कभी-कभी डोंकी टेल भी कहते हैं), 'स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स' की तरह ही एक सक्यूलेंट है। इसकी अनोखी, मोटी पत्तियों की थोड़ी ज़्यादा देखभाल करनी पड़ती है, लेकिन यह मेहनत बेकार नहीं जाती: गर्मियों में इसमें कभी-कभी फूल आते हैं, और इसके सिरों पर गुलाबी से लाल रंग के फूल खिलते हैं। इसे पूरी धूप में उगाना सबसे अच्छा रहता है, इसलिए अच्छी ग्रोथ के लिए इसे बहुत धूप वाली जगह या दक्षिण की ओर खिड़की वाले कमरे में रखें। सर्दियों को छोड़कर, जब इसे कम पानी की ज़रूरत होती है, इसे ठीक-ठाक मात्रा में और नियमित रूप से पानी देना चाहिए। और इसकी पत्तियों के बारे में: ये काफ़ी नाज़ुक होती हैं और आसानी से टूट सकती हैं, इसलिए इसे सही जगह पर रखें।

 9. सिल्वर सैटिन पोथोस

रोशनी की ज़रूरत: कम से तेज़ लेकिन सीधी नहीं (ब्राइट इनडायरेक्ट)

पानी की ज़रूरत: हर दो हफ़्ते में एक बार

पालतू जानवरों के लिए सुरक्षित: नहीं

सिल्वर सैटिन पोथोस (सिंडैप्सस पिक्टस) घर के अंदर लटकाने के लिए एक बेहतरीन विकल्प है—इसकी पत्तियाँ सुंदर और चितकबरी होती हैं और बेलें नीचे लटकती हैं। इसे "कम से तेज़ लेकिन सीधी नहीं रोशनी वाली जगहें पसंद हैं और यह हैंगिंग प्लांट के तौर पर बहुत सुंदर लगता है क्योंकि इसकी पैटर्न वाली सिल्वर-हरी पत्तियाँ नीचे लटकती हैं।" इसे सामान्य से गर्म तापमान और नमी वाली मिट्टी पसंद है, लेकिन मिट्टी बहुत गीली नहीं होनी चाहिए (इसे बहुत ज़्यादा पानी से भरा न रखें)। पोथोस आपको बता देगा कि उसे क्या चाहिए: अगर पत्तियाँ पीली होने लगें, तो समझ जाएँ कि आपने बहुत ज़्यादा पानी दे दिया है, और अगर वे कड़क या भूरी हो जाएँ, तो उसे बहुत ज़्यादा सीधी धूप मिल रही है। हवा साफ़ करने वाले इसके फ़ायदों का लाभ उठाने के लिए, इसे अपने बेडरूम में उस जगह के पास लटकाएँ जहाँ आप सोते हैं। स्पाइडर प्लांट की तरह ही, आप इसे भी दूसरों के साथ बांट सकते हैं:  “इसकी छोटी सी कटिंग लें और दूसरों को भी यह पौधा दें। इन्हें उगाना बहुत आसान है।”

10. एयर प्लांट्स

रोशनी की ज़रूरत: सीधी रोशनी

पानी की ज़रूरत: हफ़्ते में एक या दो बार

पालतू जानवरों के लिए सुरक्षित: हाँ

एयर प्लांट्स शायद घर के अंदर लटकने वाले सभी पौधों में सबसे कम देखभाल वाले होते हैं—इन्हें मिट्टी की भी ज़रूरत नहीं होती। बस हफ़्ते में एक बार पानी दें (चाहे भिगोकर या स्प्रे करके) और इन्हें सूखने न दें, ये आपकी जगह की खूबसूरती बढ़ा देंगे। 

पौधे लाइन भी उपलब्ध हैं। अगर आप आन लाइन पौधे खरीदना चाहते हैं तो हमें बताएं या  फिर आपके घर के आसपास जो नर्सरी हो वहां से भी खरीद सकते हैं। पौधों के बारे में आप किताब पढ़ना चाहते हैं तो भी मुझे बताएं। मैं आपको किताब और उसके प्रकाशक का नाम और पता शेयर कर दूंगी।

 

 

 

 

 

 

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