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सोमवार, 19 मार्च 2018

डांस के दीवाने दिल की मानें- डा. अनुजा भट्ट


नृत्य एक आध्यात्मिक कला है जोकि हमारे अंर्तमन को जाग्रत करती है और साथ ही हमें पूर्णता देती है जिससे हमें यह एहसास होता है कि हम ईश्वर
की आराधना कर रहे हैं।
इसीलिए नृत्य को भगवान नटराज (शिवा) के साथ जोड़ा जाता है और पुरूषों द्वारा इसे पहले सिर्फ भगवान की आराधना की कला के रूप में अपनाया जाता था।  मुख्य रूप से नृत्यांगनाएं महिलाएं ही हुआ करती थी और अघोषित रूप से यह उनके लिए व्यवसाय का जरिया भी बन गया था।  हालांकि कुछ पुरूष नर्तक भी होते थे जोकि किसी बड़े घराने से ताल्लुक रखते थे और यक्षागणा/भागवता मेला कत्थकली और मयूरभंज जैसी नृत्य फार्म ही किया करते थे।
जब से ग्लोबिलाईजेशन हुआ है देश-विदेश के डांस फार्म भी पाॅपुलर हो रहे हैं तो इस क्षेत्र में भी कैरियर के आॅप्शन दिखाई दे रहे हैं।  ज्यादा से ज्यादा लड़के अब डांस सीख रहे हैं।  वह आत्मविश्वास के साथ नृत्य  को एक व्यवसाय के रूप में अपना रहे हैं।  इस नए ट्रेंड के साथ ही क्लासिकल और रीजनल डांस भी सेंटर स्टेज पर आ गए हैं। यह यंग आर्टिस्ट सिर्फ अपने रीजन में ही मशहूर नहीं हैं, यह विदेशों में जाकर भी परफाॅरमेंस देते हैं। इस ब्रिगेड में प्रमुख सत्यनारायण राजू कहते हैं, मेरे परिवार का आर्टस से कोई लेना देना नहीं हैं हम किसान परिवार से संबध रखते हैं। हमारे परिवार में कोई भी इस निर्णय से सहमत नहीं था कि मैं नृत्य को अपना व्यवसाय बनाऊं।  सिर्फ मेरी मां ने ही मेरे इस निर्णय में मेरा साथ दिया।  मैंने पढ़ाई छोड़ दी और फुल टाइम डांसर बनने का निर्णय लिया और इतने वर्षों की मेहनत के बाद आज मैं डांस टीचर भी बन गया हूं।  मेरे लिए सबसे बड़ी दुखःद बात यह है कि मेरी मां जोकि मेरी सबसे बड़ी सपोर्ट थी वही मुझे इस मुकाम पर पहुंचा हुआ देखने के लिए जिंदा नहीं रही।  दूसरी तरफ डा‐ एस‐ वासुदेवन अइनगर हैं जोकि बहुत सीनियर डांसर हैं। अपने परिवार की सर्पोट के साथ उन्होंने अपने पैशन नृत्य और गायन के सपने को पंख दिए।  उनकी गुरू वैजंयतीमाला की शिक्षा से उनकी प्रस्तुति में क्लासिकल प्योरिटी और पूर्णतः रिदम का समावेश हुआ।
अनिल अईर और मिथुन श्याम ने अपने पैशन को बहुत ही सहजता और सजगता के साथ निभाया।  मिथुन श्याम डांस में अपनी क्रियेटिविटी और इम्प्रोवाईजेशन के लिए जाने जाते हैं किस्सा सुनाते हुए वह कहते हैं कि वह अपनी बहन को डांस क्लास छोड़ने जाते थे उसी से उनके अंदर भी इसे सीखने की इच्छा जगी।  मेरे पेरेंट्स ने भी इसका विरोध नहीं किया।  मैं एक अमेरिकन कपंनी में नाईट शिफ्ट में नौकरी करता था ताकि दिन में मैं डांस कर सकूं।  लेकिन अब मैं अपना पूरा समय डांस को ही देता हूं।  मैंने अपनी सेविंग को और अपने डांस प्रोफेशन को ऐसा मैनेज किया है कि किसी भी समय पर मुझे पैसों की दिक्कत न हो।  मैं डांस क्लासिस चलाता हूं और प्रोग्राम भी करता हूं।  मैं एक एक्टिव परर्फामर हूं। मेरे डांस स्कूल में 25 लड़के डांस सीखते हैं।
अनिल अय्यर पेशे से एक साईकोलोजिस्ट है और पैशन से डांसर, अब उनकी सुनिए, उनके पिता ने उन्हें हर कदम पर प्रोत्साहित किया।  वह खुद आर्टिस्ट नहीं है लेकिन वह म्यूजिक और डांस परर्फामेंस देखने के शौकीन थे और मैं उनके साथ बचपन से ही जाता था।  इससे मेरे अंदर डांस सीखने की ललक जागना स्वाभाविक ही था।  यह आजकल अपना डांस स्कूल चला रहे हैं साथ में अपनी प्राइवेट प्रेक्टिस भी कर रहे हैं।  पाश्र्वनाथ उपाध्याय की मां ने उन्हें डांस सीखने इसलिए डाला क्योंकि उनको बेटी नहीं थी और वह उस कमी को पूरा करना चाहती थीं। उन्होंने यह कभी नहीं सोचा था कि वह डांस को अपना प्रोफेशन बनाएंगें।  वह बताते हैं कि उन्होंने अपने वैल्यूज से कभी भी काम्प्रोमाईज नहीं किया। आज उनकी खुद की एक डांस कंपनी हैं जिसमें उनके साथ पांच मेल डांसर हैं जोकि मिलकर काम करते हैं।
तो इस तरह से हम कह सकते हैं कि दुनिया बदल रही है, लड़के हों या लड़कियंा उनकी रूचियां उनका पैशन और फिर टेलेंट बनकर स्टेज में दर्शकों की तालियां बटोर रहा है और एवज में उनकी अच्छी खासी कमाई भी हो रही है।






शुक्रवार, 19 मई 2017

महादान है रक्तदान


 पूजा-पाठ के अवसर पर अक्सर हम कभी अन्नदान करते हैं तो कभी वस्त्रदान। मान्यता है दान करने से पुण्य मिलता है। ऐसा हे तो कभी रक्तदान कीजिए और महसूस कीजिए आत्मसंतुष्टि

कभी लंबी ड्राइव पर जाते समय सड़क किनारे आपको कई दुर्घटनाग्रास्त लोग मिलते हैं जो अनजान शहर में अपनों से दूर हैं और मदद मांग रहे हैं। ऐसे में अगर आप रक्तदान करते हैं तो वह जीवन भर आपको याद रखते हैं । रक्तदान से आपकी सेहत पर भी सकारात्मक असर पड़ता है और साथ ही यह एहसास भी होता है कि आप समाज के लिए कुछ कर रहे हैं।
थैलेसीमिया, कैंसर ,सड़क हादसे एवं बड़े ऑपरेशन जैसी कई परिस्थितियों में समय पर खून देकर मरीजों की जान बचायी जाती है।  डोनर के लिए  रक्तदान हृदयाघात और कैंसर समेत कई गंभीर बीमारियों से बचाव और साथ ही मोटापे से भी मुक्ति दिलाने में सहायक होता है।
विशेषज्ञों के अनुसार देश में कुल रक्तदान का केवल 59 फीसदी स्वैच्छिक होता है। ऐसे में आवश्यकता यह है कि स्वेच्छा से खून देने वालों की संख्या बढ़े और यह तभी संभव है जब रक्तदान करने के संबंध में व्याप्त भ्रांतियों को दूर किया जाये।
कई लोग समय-समय पर रक्तदान करते हैं लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो  इच्छा होते हुए भी रक्तदान नहीं कर पाते। इसकी वजह उनके मन में पल रही गलतफहमियां हैं जो वास्तव में निराधार हैं। आइए जानते हैं रक्तदान से जुड़े कुछ भ्रम और कुछ अहम बातें।
रक्तदान को लेकर सबसे बड़ा भ्रम यह है कि  शरीर में खून की कमी हो जाएगी। लेकिन बता दें कि खून देने के 48 घंटे बाद ही रक्त की क्षतिपूर्ति हो जाती है। यदि आप स्वस्थ हैं तो तीन महीने में एक बार आराम से रक्तदान कर सकते हैं।
लोग सोचते हैं कि रक्तदान करने से कमजोरी आ जाती है और सेहत को नुकसान पहुंचता है, लेकिन ऐसा कुछ नहीं है। सच्चाई यह है कि ये दिल की बीमारियों की संभावना कम करता है और शरीर में फालतू आयरन जमने से रोकता है
 कुछ लोग इस वजह से रक्तदान नहीं कर पाते क्योंकि वह सोचते हैं कि ऐसा करने से दर्द होगा। लेकिन इसमें बस सुई चुभने भर का एहसास होता है, इससे ज्यादा कुछ नहीं।
बड़ी उम्र के लोग भी रक्तदान कर सकते हैं लेकिन इसके लिए डॉक्टर पहलेे कुछ मेडिकल टेस्ट करते हैं और रिपोर्ट सामान्य आने पर ही रक्तदान कर सकते हैैंं।
यदि आप रक्तदान करने जा रहे हैं तो कुछ बातों का ध्यान रखें जिससे कि आप सुरक्षित और आराम से रक्तदान कर सकें।
रक्तदान करने से पहले आयरन रिच हैल्दी फूड खाएं।
पूरी नींद लें।
खूब पानी पिएं।
रक्तदान से पहले  फ्राईड फूड और आइसक्रीम न खाएं।
रक्तदान के बाद दिन में खूब पानी पिएं। शराब तथा धूम्रपान से दूर रहें।  लॉन्ग ड्राइव और तेज धूप में न जाएं।
यदि आप प्लेटलेट डोनेट कर रहे हैं तो यह ध्यान रखें कि आपने रक्तदान से दो दिन पहले तक एस्प्रिन टेबलेट का सेवन न किया हो।
अपना डोनर कार्ड और आईडी प्रूफ भी साथ लेकर चलें।
रक्तदान करते समय रिलेक्स रहें, म्यूजिक सुनें, दूसरे डोनर से बातचीत करते रहें।
रक्तदान के बाद रिफरेशमेंट एरिया में स्नैक और ड्रिंक का आनंद लें।

रक्तदान कौन नहीं कर सकता:-

अगर कोई एड्स से ग्रस्त है तो उस व्यक्ति को रक्तदान नहीं करना चाहिए।
कैंसर के मरीजों को रक्तदान नहीं करना चाहिए।
अगर टैटू या कोई कॉस्मेटिक सर्जरी करवाई है तो रक्तदान करने के लिए कम से   कम चार महीने तक इंतजार करना होगा।
प्रेग्नेंट महिलाएं रक्तदान नहीं कर सकती हैं।
17 साल से कम उम्र के लोग रक्तदान नहीं कर सकते।
अगर पिछले 12 महीने में हेपेटाइटिस या पीलिया से ग्रस्त हुए हैं तो भी आप रक्तदान नहीं कर सकते।

डॉक्टर बेहद अनिवार्य परिस्थितियों में किसी मरीज में खून चढ़ाते हैं। खून संक्रमण से लड़ता है और जख्मों को भरने में मदद करता है। इसकी कमी से जान जा सकती है। ऐसे में रक्तदान एक तरफ जहां मरते हुए व्यक्ति के लिए “संजीवनी” है वहीं दानकर्ताओं के लिए सबसे बहुमूल्य वस्तु जिसे देकर वह कई जिंदगियां बचा कर आत्मसंतुष्टि के साथ -साथ बेहतर स्वास्थ्य का ‘हकदार’ बन सकता है।


अब तक कई लीटर खून दान करने वाले दक्षिण अफ्रीका के क्रेसविक और अमेरिका के फ्लोरिडा के मेनडेनहाल आज भी तंदुरुस्त हैं तथा उन्हें एक भी दवा की जरूरत नहीं है।
दक्षिण अफ्रीका के क्रेसविक 18 साल की उम्र में सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हो गये थे। किसी अजनबी के खून से नयी जिन्दगी पाने वाले क्रेसविक नेे कई जिंदगियों में खुशबू और रंग भरने का व्रत लिया।  क्रेसविक को नियमित रूप से सर्वाधिक खून देने वाले व्यक्ति के रूप में वर्ष 2010 में गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड्स में शामिल किया गया। लंबे समय तक खुशमिजाज और स्वस्थ बने रहने का राज क्रेसविक इन शब्दों में व्यक्त करते हैं, “खून का कतरा-कतरा अहमियत रखता है।  मौके पर पहुंच कर मौत को मात देने वाले खून की यह खूबी मेरे स्वस्थ मन का राज है और धूम्रपान से दूरी मेरी सेहत का मंत्र।” 
कैंसर से पत्नी फ्रैनकी की मौत और अपने दो जवान बेटों को भी खोनेे के बाद भी मेनडेनहाल ने रक्तदान करने से मुंह नहीं मोड़ा।  उन्होंने तीन मौतों के गहरे सदमे से उबरने के लिए इस पुण्य काम को अपनी जीवन शैली में शामिल किया। वह प्लेटलेट्स के माध्यम से हर साल छह गैलन खून देकर कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों से जूझ रहे कई लोगों की मदद कर रहे हैं। मेनडेनहाल के शब्दों में “ईश्वर ने मुझे जो कुछ भी दिया है मैं उसका ऋणी हूं और खून दान देकर उसके प्रति अपना दायित्व निभाने का अदना-सा काम कर रहा हूं। 

गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

बनाइए बिजनेस चेन



समय और सुविधा के मुताबिक ट्रेंड्स में हमेशा बदलाव आता है। आज खरीदारी करने का अंदाज बदला है। ई-शापिंग की सफलता के साथ ही साथ घर से कारोबार करने का चलन भी बढ़ रहा है। अपराजिता द्वारा कराए गए सर्वे में यह बात सामने आई है कि आजकल कमोबेश हर घर में कोई न कोई कारोबारी आइडिया हर दिन दिमाग की बत्ती जला रहा है।
इंटरनेट ने आसान की जिंदगी
इंटरनेट के जरिए आर्डर लेने अाैर देने का काम आसान हो गया है। कुरियर सर्विस, स्पीड पोस्ट, पार्सल के माध्यम से सही समय पर सामान भिजवाना  भी आसान है। आप अपनी सुविधा और फंड को ध्यान में रखकर कहीं से भी कुछ भी मंगा सकते हैं। जो काम पहले बड़ी-बड़ी कंपनी करती थी, वह अब स्टार्टअप कंपनी भी करने लगी हैं। सोसायटी में या मोहल्ले में रहने वाले लोग आसपास से ही सामान खरीदना पसंद करते हैं क्योंकि यहां पर अगर सामान में कोई कमी है तो उसे वापस करना आसान है। जूलरी का बिजनेस करने वाली श्रीमती तरविंदर कौर कहती हैं कि मुझे इस व्यवसाय को करने के लिए फेस बुक, वाट्सएप ग्रुप, इंस्टाग्राम, आॅनलाइन शापिंग ग्रुप से बहुत फायदा हुआ। मेलेे में कभी उम्मीद से कई गुना फायदा हुआ तो कई बार हमारी उम्मीदों पर पानी फिर गया।
बड़ी कंपनियां भी दे रही है घर घर में दस्तक
ओरीफ्लेम, एमवे, मोदीकेयर, टपरवेयर कई अनगिनत कंपनियंा महिलाओं को केंद्र में रखकर अपना बिजनेस स्टाइल बना रही है। उनकी नजर ऐसी पढ़ी लिखी स्मार्ट वुमेन पर हैं जो महत्वाकांक्षी हैं और घर के साथ अपना कारोबार करना चाहती हैं। यह कारोबार चेन सिस्टम की तरह काम करता है। दवा, ब्यूटी प्रोडक्ट, डिटरजेंट, किचनवेयर सब घर घर में पहुंचाए जा रहे हैं। इसके लिए कंपनियाँ, वर्कशाॅप, सेमिनार, मीटिंग करती हैं। ओरी फ्लेम से जु़ड़ी रुचि कहती हैं हम लोग नेटवर्किंग पर काम करते हैं। जैसे जैसे काम बढ़ते जाता है आपकी कमीशन भी बढ़ते जाता है। शुरूआत में 3 पर्सेंट से लेकर यह 21 पर्सेंट तक जाता है। मात्र 4000 से आप इस काम को शुरू कर सकते हैं।
कौन महिलाएं हैं आगे
ऐसी पढ़ी लिखी महिलाएं जो घर परिवार की जिम्मेदारी के चलते नौकरी नहीं कर पा रही हैं लेकिन जिनके अंदर कुछ करने की तमन्ना है वह ऐसी कंपनियों से जुड़ रही है और अपनी प्रोफाइल से हटकर काम कर रही है।  प्रोफाइल से अलग हटकर काम करना जहां चुनौतीपूर्ण होता है वहीं यह आपक¢ आत्मविश्वास को भी बढ़ाता है। डाक्टर इंजीनियर या  सिविल सर्वेंट बनने की चाह रखने वाली महिलाएं ट्यूशन पढ़ाकर कई इंजीनियर, डाक्टर अ©र सिविल सर्वेंट समाज को दे चुकी है। आर्ट और म्यूजिक की दुनिया की तरफ भी जनता जागरूक हुई है अ©र पेरेंट्स बच्चों को प्रोत्साहित भी कर रहे हैं। छोटी छोटी चीजों की भी वैल्यू बढ़ी है। मसलन हैंडराइटिंग क¢ लिए भी पेरेंट्स ट्यूशन भेज रहे हैं ताकि वह कैलीग्राफी सीख सकें। खुशी है कि महिलाओं ने अपना कद बड़ा किया है वह उदासीन अ©र अवसाद की शिकार नहीं हुईं। किसी एक करियर क¢ भरोसे भी वह नहीं रही। उन्होंने सही मायने में चुनौतियों को स्वीकार किया।
खुद का बिजनेस भी खड़ा कर रही हैं
महिलाएं कारीगरों के साथ मिलकर अपना फैशन हाउस बना रही हैं जहां वह ग्राहक की रूचि और बजट के आधार पर चीजें तैयार करती हैं। इन चीजों में आपकी ड्रेस, ज्वेलरी, फुटवियर के अलावा आपके घर का इंटीरियर भी शामिल है।
इसके अलावा उनकी नजर स्वाद पर भी है क्योंकि हम सभी जानते हैं कि सबका स्वाद अलग-अलग होता है। कुछ स्वाद में एक्सपेरिमेंट करना पसंद करते हैं कुछ ट्रेडीशनल खाना पसंद करते हैं। फूड एक्सपर्ट के तौर पर महिलाएं खुद की नई जमीन तलाश रही हैं। आज फूड बिजनेस जोरों पर है।
फंड का प्रबंध भी खुद करती है महिलाएं
अपने बिजनेस को आगे बढ़ाने के लिए अपने लिए फंड का प्रबंध भी वह खुद करती हैं इसके लिए स्वयं सहायता समूह भी उनकी मदद करते हैं। वह किटी पार्टी और कमेटी के जरिए भी फंड इक्ट्ठा करती हैं। स्टार्ट ग्रुप का प्रपोजल पसंद आने पर सरकार भी उनकी मदद करती है। स्टार्टअप कंपनी को सरकार कर्ज प्रदान करती है।
मुनाफे का सौदा
महिलाएं अपने सामान को बेचने के लिए मेले में भी हिस्सा लेती हैं। मेले आयोजित करने का काम भी अधिकांश महिलाएं ही करती हैं।  जहां सभी लोग एक साथ एक़ित्रत होते हैं। यह मेले समय-समय पर लगाए जाते हैं। मेले का उद्देश्य सामाजिक जागरूकता के साथ एकजुटता का संदेश देना भी है।
इंवेट मैनेजमेंट में भी महिलाएं
घर पर ही रहकर इवेंट मैनेजमेंट जैसे काम महिलाएं आसानी से कर रही हैं। इसमें बर्थडे, शादी, वर्कशाॅप/सेमिनार, उत्सव मेले, कार्निवाल शामिल है।
निष्कर्ष- कुल मिलाकर कहें तो महिलाओं ने अपने आप को हर सांचे में ढालने की कोशिश की है। यह संस्कार देकर ही बच्चियों को बड़ा किया जाता है। महिलाएं अगर चाहें तो खुद को मोटीवेट कर सकती हैं। जैसे इंजीनियर नहीं बन पाए तो क्या हुआ इंजानियर बनाए तो सही। जिसकी कोई ट्रेनिंग नहीं ली। उसे खुुद से सीखने का साहस तो जुटाया अ©र फिर तेजी से काम किया।  यही है महिलाओं की सफल जिंदगी का राज जिसे उन्होेंने बांटा अपराजिता क¢ साथ। कड़ी दर कड़ी चलते रहो, गले मिलते रहो। आपक¢ कदम खुद बना देंगे रास्ता।

शनिवार, 1 अप्रैल 2017

सिर्फ गप मारती हैं महिलाएं- डा. अनुजा भट्ट


अक्सर लोग यह कहते हैं महिलाओं से सीक्रेट बात शेयर नहीं करनी चाहिए क्योंकि इनके पेट में वो टिकती नहीं या यूं कहें पचती नहीं हैैं। लेकिन क्या पुरुष ऐसा नहीं करते ? क्या पुरुष के पेट में सारी बातें पचती है। 

महिलाओं के प्रति समाज का नजरिया बहुत तंज भरा है। उनकी तरक्की को लेकर शायद ही मुहावरा गड़ा गया होगा, लेकिन उनकी मजाक उड़ाते हुए बहुत सारी उक्तियां आज के दौर में भी प्रचलित हैं जबकि हर क्षेत्र में महिलाओं ने अपनी तरक्की से अपने साहस और हुनर का परिचय दिया है। पेश है महिलाओं के प्रति समाज की सोच और उस सोच पर अपराजिता की प्रतिक्रिया ‐‐‐‐‐
इनके पेट में बात नहीं टिकती 
माॅम डे केयर की मनीषा कहती हैं कि मान्यता के अनुसार युधिष्ठर द्वारा द्रौपदी को दिए गए श्राप के अनुसार ही महिलाएं अपनी बात पचा नहीं पाती। यह सब जानते ही हैं कि द्रौपदी अपने पांचों पति के प्रति समभाव से रहती थी और किसी की कोई बात साझा नहीं करती थी जबकि वह साझा पत्नी थी। एक बार युधिष्ठर ने कुछ जानना चाहा तो द्रौपदी ने मना कर दिया तब क्रोध में युधिष्ठर ने श्राप दिया कि महिलाएं आज के बाद से कोई भी बात छुपा नहीं पाएंगी। हंसते हुए मनीषा कहती हैं कि इस युग में तो महिलाएं टेक्नोसेवी हैं इसलिए वह अपनी उम्र और बहुत सारे रहस्य छुपा लेती हैं।
इनकी तो बातें ही खत्म नहीं होती 
 जरा अपने दिल पर हाथ रख कर सोचिये कि क्या गॉसिप सिर्फ महिलाएं ही करती हैंे? आपने दोपहर के समय किसी पेड़ के नीचेे बैठे हुक्के पीते, चाय की ठेली या पान के खोखे के पास खडे हुए पुरूषों को इधर-उधर की बातें करते हुए नहीं देखा। फिर यह कहना कि केवल महिलाएं ही गॉसिप करती है कहां तक ठीक है।

तैयार होने में देर लगाती है 
ऐसा कहते हैं कि महिलाएं तैयार होने में समय लेती है लेकिन आप यह तो मानेंगे कि महिलाओं के ऊपर घर-परिवार की भी जिम्मेदारी होती है जिन्हें निभाते निभाते उन्हें थोड़ा समय लग जाता है। आप कहते है मुझे तो तैयार होने में इतना समय नहीं लगता है क्योंकि आप को सिर्फ खुद को तैयार करना है लेकिन उन्हें घर भी देखना है, बच्चों को भी तैयार करना है और खुद भी तैयार होना है।  आप ये बताएं क्या आप उनकी जगह होकर उनकी तरह जिम्मेदारियां निभा सकते है । जब आप अपने जीवनसाथी का चुनाव करते के समय उनके सववो और पहनावे को बवदेपकमत करते हैं तो उनके तैयार होने के समय में भी धैर्य रखना सीखना होगा।
गाड़ी अच्छे से नहीं चला सकती 
रश्मि आनंद कहती हैं कि यह आरोप निराधार है। गाड़ी चलाने के लिए आपको नियमित अभ्यास और आत्मविश्वास की जरूरत होती है और यह दोनो गुण महिलाओं में जन्मजात होते हैं। इसलिए ऐसा कहना कि महिलाएं गाड़ी नहीं चला सकती उनके महत्व को कम करता है। होता यह है कि रोजाना के ंबबपकमदज के पीछे की वजह जानना हम लोग पसंद नहीं करते या उन पर चर्चा भी नहीं करते।  अगर  कोई महिला या कोई लड़की कितनी भी ठीक से गाड़ी चलाना जानती हो और ‘खुदा न खास्ता‘ किसी छोटी मोटी दुर्घटना का शिकार हो जाये तो आप उसे एक बहस का विषय बना लेते है कि महिलाओं को गाड़ी ड्राइव नहीं करनी चाहिए उन्हें तो ठीक से वअमतजंाम करना भी नहीं आता। ,जबकि सच्चाई ये है महिलाएं पुरुषों की तुलना में कंही अधिक संयम से गाड़ी को ड्राइव करती है और कम जल्दबाजी दिखाती है। अक्सर वो भीड़-भाड़ वाले इलाके की अपेक्षा जंहा से ड्राइव कर गाड़ी ले जाना आसान हो वंहा से जाना पसंद करती है चाहे वो रास्ता उनके लिए कुछ लम्बा ही क्यों न हो।
घर को समय नहीं देती 
 महिलाएं घर सँभालने के लिए बनी है ऐसे में जॉब के साथ-साथ वो घर को अच्छे से नहीं संभाल सकती है यह आम धारणा है। ऐसे सवाल करने वालों से डा तुलिका कहती हैं कि समाज का यह रवैया गुस्सा दिलाने वाला है।  हम अलग-अलग में ऊँचे पदों पर काम कर रही महिलाओं को पढके सुनके उनके बारे में अच्छी-अच्छी बातें बोलते है और महिला सशक्तिकरण मुद्दे के लिए उनके उदाहरण भी देते हैं लेकिन जब घर परिवार की बात आती है तो महिलाआें के प्रतिं इतने क्रूर क्यों हो जाते हैं । कोई भी महिला करियर या परिवार की जिम्मेदारी में पहले परिवार को चुनती है। परिवार की जिम्मेदारी निभाने के लिए लाखों के पैकेज वाला जॉब छोड़ने का फैसला ले सकती है भले ही कितनी जीनियस क्यों न हो। क्या कोई पुरूष ऐसा कर सकता है?
वो पुरुषों पर नियंत्रण रखती है 
उमा गुप्ता जी कहती हैं आखिर हम महिलाएं अपने पति को क्यों नियंत्रण में रखेंगी लेकिन यदि पति गलत रास्ते पर जा रहा है, परिवार की उपेक्षा कर रहा है तो उसे सही रास्ते पर लाने के लिए यदि कठोर निर्णय लिए जाएं तो फिर अप्रिय संवाद क्यों हो। अगर मां अपने बेटों को सही संस्कार देकर बड़ा करे उसे महिलाओं का सम्मान करना सिखाए तो क्या  किसी महिला के साथ यौन शोषण जैसी घटना हो, कोई महिला दहेज के लिए प्रताड़ित हो? क्या किसी भी महिला के साथ जोर जबरदस्ती होगी ? पुरूषों को चाहे वह बेटे हों, पति हों, दोस्त हों कंट्रोल में रखना जरूरी है पर उसे डोमिनेट करना एकदम गलत। महिलाएं अपने पति को दबाव में रखती हैं यह कहना तर्कहीन है।
वैसे तो महिला उत्थान की बातें की जाती हैं,  लम्बे चाैड़े भाषण दिए जाते हैं,  ज्ञान बांटा जाता है और उसके बाद भी किसी महिला के आचरण पहनावे रहन सहन जैसी बातों का हम मजाक बनाते हैं तो यह कितना सही है।  कृप्या  अपनी सोच बदलिए और एक आदर्श माहौल बनाऐं जिसमें कि उनके लिए भी वही सम्मान और समान स्तर हो जिसकी आप बातें करते हैं।

Special Post

बारिश के माैसम में बात करेंगे फैशन की - डा. अनुजा भट्ट

रिमझिम फुहार हाे और पार्टी करने का मन हाे  खाने पीने का सब बंदोबस्त हाे ताे बस एक सवाल परेशान कर देता है । आज पहने क्या। ताे दाेस्ताें जब मा...