verification

मैं अपराजिता- कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मैं अपराजिता- कविता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 30 अगस्त 2026

दीवार और कील — अनुजा भट्ट



एक दीवार हूँ मैं... जिस पर कील नहीं ठुकती,
ऊपर से एकदम सपाट सी दिखाई देने वाली सड़क,
या फिर कोई पगडंडी,
या यूँ ही कोई बेनाम सा मैदान...
न हरियाली, ना पेड़, एकदम सुनसान!

 नीचे एकदम भुरभुरी थी ज़मीन,
जैसे कोई दीवार हो... जिसकी सीलन बाहर नहीं दिखाई देती,
पर कोई कील उसे भुरभुरा कर, भीतर की रेत फर्श पर उड़ा देती है।
धरती और दीवार पर टंगी कील, जैसे एक स्त्री में बदल जाती है,
और वह स्त्री कोई और नहीं... मैं हूँ!
वेदना से उठी मेरी चीख, दुःख के बादल इकट्ठे करती है,
मैं बुदबुदाती हूँ— अभी ही यह सब होना था?
अभी-अभी ही तो मैंने एक सपना बुना था,
और उसे बादलों में टांग देने की सोच रही थी...
बादल जहाँ-जहाँ उड़ें, मेरे सपने को भी अपने साथ लेते जाएँ,
और जब, जहाँ बारिश होगी...
मेरा सपना भी उस-उस जगह अपनी हकीकत की दास्तान लिख आएगा!
पर यह उदासी जम गई है... मिट्टी दरक गई है,
दरक गई मिट्टी की परतों के साथ, यह उदासी भीतर जम गई है।
जितना मैं इसकी परतों को हटाती हूँ,
यह और ज़्यादा जम जाती है।


मंगलवार, 25 अगस्त 2026

तख्तियां कविता- डॉ. अनुजा भट्ट


जहां तुम शिखर हो, वहां वह शून्य है,
जहां तुम शून्य हो, वहां वह शिखर है,
और जहां दोनों समतल हैं,
बस वहीं जीवन में समरसता का स्वर है।
पर यह मार्ग कठिन है!
यहाँ खोजनी हैं कुछ विलक्षण बातें—
अंबर में चमकते तारों जैसी,
लहरों पर तैरती किरणों जैसी।

कोशिश करो, इसे एक खेल बना लो,
तुम उसकी खूबियों की सूची सजाओ,
अपनी कमियों का हिसाब उसे सौंप दो।
और फिर बैठ जाना किसी शाख पर—
जिसमें बची है कुछ हरियाली,
या नरमाई से सूख चुकी हो कोई डाल...
बस बैठ जाना, पक्षियों के गीतों और पत्तियों की सरसराहट के बीच।

वहां तुम अपनी बुराइयां सुनना जी भरकर,
दिल खोलकर करना उनका स्वागत।
हर कमी पर ठहाके लगाना, खुलकर हंसना,
और अपने भीतर का मनस्ताप और अंतर्मन का बिखराव—
सब बाहर बहा देना!
किसी भीतर थमी विषैली हवा की तरह...
मालूम है, यह बहुत कड़वा होगा,
होना ही है!
उसके बाद खिलेगा चट्टान के भीतर से अनूठा ब्रह्मकमल!

जिस धरातल पर हम हैं, वहां अब संकोच की गुंजाइश नहीं,
कुछ पलों के ठहराव के बाद, खुलकर लेना प्राणवायु।
यह सब इतना सहज नहीं, जितना कहना,
लिख दिया मैंने जिस तरलता से, उतना आसान नहीं नीलकंठ बनना!
'निंदक नियरे राखिए' से लेकर 'आग का दरिया' तक,
न जाने कितनी उक्तियाँ हैं,
उतनी ही तख्तियां हैं...
और उन तख्तियों पर उकेरे हुए, सदियों पुराने अनाम शब्द।

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2024

विदा - कविता- डा. अनुजा भट्ट



विदा

मैं , मैं नहीं एक शब्द है

हुंकार है

प्रतिकार है



मैं का मैं में विलय है

इस समय खेल पर कोई बात नहीं

फिर भी...

सच में मुझे क्रिक्रेट में कोई रूचि नहीं

फिर भी

मैं सचिन तंडेलुकर की गेंद की तरह उछलना चाहती हूं

टप्पे पर टप्पे मार कर हवा के उस अंतिम छोर पर पहुंचकर

धरती में गिर जाना चाहती हूं

अनगिनत गेंदों से नहीं असंख्य शब्दों से खेलती और जीती उन क्षणों को

खुद और पूरी कायनात के साथ

मैं लेना चाहती हूं अब विदा

न्यूटन का सिद्धांत मुझे प्रिय है

हालांकि मैं विज्ञान के बारे में ज्यादा जानती नहीं

पर शोध से हर रोज गुजरती हूं

फिर भी

अपनी मुट्ठी में भींचकर कोई रूमाल

सर्द रात और कंपकंपाती ठंड में

पसीने से तरबतर हो

ऐसा है मेरा ख्वाब

मैं उस ख्वाब को अपनी उंगुलियों में

महसूस करते हुए

मुट्ठी में भर लेना चाहती हूं

निचोड़ कर रख देना चाहती हूं रूमाल

रूमाल जिसके चार कोने हैं

चार दिशाएं हैं

और चारों दिशाओं की साझेदार एक पोटली है

पोटली जिसमें सिक्के जमाते हैं कुछ

पोटली जिसमें सुदामा ने जमाए तंडुल

सिक्के जमाने वाले और तंडुल जमाने वाले सुदामा में मेरी कोई रूचि नहीं

मुझे न विपन्नता के गीत पसंद हैं

और न संपन्नता के किस्से

मुझे बस सचिन की तरह

अपने मानिंद एक गेंद चाहिए

जिसके हर टप्पे पर टप्पे पर टप्पे पर टप्पे पर

घूमते हुए वह हवा के साथ उछले

उसी को लपकने के लिए उठे हाथ

पर वह गिरे धरती पर

धरती पर

धरती पर

सचिन ने गेंद चूमी कई कई बार

मैं चूमना चाहती हूं

शब्द कई कई बार

सचिन को गेंद को स्पर्श करते दुलराते कई कई बार देखा मैंने

मैं शब्दों को दुलराना चाहती हूं

ओम ही ओम हैं

जिसे जन्मा था प्रकृति ने

प्रकृति की कोख में पहला नाद ओम है

स्त्री की कोख में पहला नाद मां

उस पहली बार सुने शब्द को

मैं अपनी आत्मा के किसी सूक्ष्म से सूक्ष्म कण में

अपनी ही प्राणवायु से खींचकर गर्भ में पुनःस्थापित कर

मैं विदा लेना चाहती हूं

बाकि उसके बाद के सब निरर्थक संवेदनहीन शब्दों को

मैं पोटली में सिक्के और तंडुल की तरह

खुद से अलग कर देना चाहती हूं

हवा में गूंजते इन शब्दों में

अब आक्सीजन नहीं रही

जो प्राणवायु की उम्मीद दे सके

उम्मीद ही तो आपको कमजोर बनाती है

मैं उम्मीद की उस विपरीत धारा में

नाउम्मीद का शपथपत्र भरना चाहती हूं

मैं विदा लेना चाहती हूं।

मंगलवार, 30 जुलाई 2024

कविता-दहलीज पर कदमों का क्रास-डॉ अनुजा भट्ट



दहलीज पर कदमाें का क्रास
एक पांव दहलीज के बाहर जा रहा है
सपनाें की उड़ान और कशमकश के बीच
आसमान में उड़ती पतंग काे देख रही 
हाथ में डोर लिए एक।
 युवा और किशाेराें के बीच स्वतंत्रता दिवस की परेड
खुद काे रील बनते देख बेबस है
उधर माझा और पतंग
चीन और भारत
उम्मीद और हादसा में बदल रहा है। 
 इस बीच यह कविता लिखी जा रही है।
 दूसरा  पांव दहलीज के भीतर आ रहा है
अपने भीतक दर्द और बेबसी के छींटे लिए 
 अपनी जिद और शर्ताें के बीच
समन्वयविहीन रिक्त स्थान की तलाश में
 वक्त कहता है 
 अब इस रिक्तता काे
 मन के कोने में
 मंदिर के दिये में
 ईश्वर को अर्पित पुष्प में
गरीब की झोली में
 आंखों में काजल की जगह बसा लाे।
दाेनाे पांव आपस में टकरा रहे हैं
दाेनाे पांव अपनी यात्रा में डगमग हैं
दाेनाें की साेच में जमीन आसमान का अंतर है
एक के लिए मुखर हाेना
 असंसदीय और अमानवीय भाषा है
दूसरे के लिए विश्वधरती पर सृजित 
एक नई स्त्री का आगमन है।
एक कदम और दूसरा कदम
कदमताल मिलाती पंद्रह अगस्त की उस झांकी से
 जा मिला है जहां यह दाेनाें की  निर्थक हैं।
रील में तो हैं रियल में नहीं।


शनिवार, 22 सितंबर 2018

स्मृति शेष- विष्णु खरे की दो कविताएं

हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि और हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष विष्णु खरे अब हमारे बीच नहीं रहे। उनका निधन साहित्य जगत में एक अपूरणीय क्षति है। अपने विशद अध्ययन और विपुल साहित्य से हिंदी जगत को अनमोल संपदा देने वाले खरे की ये हैं 2 प्रमुुख कविताएं...

कहो तो डरो...
कहो तो डरो कि हाय यह क्यों कह दिया
न कहो तो डरो कि पूछेंगे चुप क्यों हो

सुनो तो डरो कि अपना कान क्यों दिया
न सुनो तो डरो कि सुनना लाजिमी तो नहीं था

देखो तो डरो कि एक दिन तुम पर भी यह न हो
न देखो तो डरो कि गवाही में बयान क्या दोगे

सोचो तो डरो कि वह चेहरे पर न झलक आया हो
न सोचो तो डरो कि सोचने को कुछ दे न दें

पढ़ो तो डरो कि पीछे से झाँकने वाला कौन है
न पढ़ो तो डरो कि तलाशेंगे क्या पढ़ते हो

लिखो तो डरो कि उसके कई मतलब लग सकते हैं
न लिखो तो डरो कि नई इबारत सिखाई जाएगी

डरो तो डरो कि कहेंगे डर किस बात का है
न डरो तो डरो कि हुक़्म होगा कि डर

अक्स.....

आईने में देखते हुए
इस तरह इतनी देर तक देखना
कि शीशा चकनाचूर हो जाये-
फिर भी इतना मुश्किल नहीं

वह शीशे में
यूँ और इतना देखना चाहता है
कि बिल्लौर में तिड़कन तक न आये
सिर्फ़ जो दिख रहा है वह पुर्जा-पुर्जा हो जाए
और जो देख रहा है वह भी
फिर भी एक अक्स बचा रहे
जिसका वह है उसे जाने कैसे देखता हुआ
अमर उजाला से साभार.

रविवार, 13 मई 2018

माँ - सविता शुक्ला



माँ ,तुम प्यार का सागर हो ,
ममता की अप्रतिम गागर हो ,
तुम त्याग की प्रतिमूर्ति हो ,
सद्भाव की जीवंत कृति हो ,
कभी कोमल हो तुम, कभी ज्वाला
बच्चों की हो तुम प्रथम पाठशाला
भावुक दिल और नाजुक हाथों से
बच्चों का भविष्य संवारती हो,
कठिन परिश्रम करवाकर
तुम शूरवीर उन्हें बनाती हो,
खुद संघर्ष करके भी
बच्चों का किस्मत चमकाती हो,
अपना वजूद भूला कर
सर्वस्व उनपर  लूटाती हो,
तुम जननी हो,तुम धात्रृ हो,
ईश्वर का प्रतिरुप माँ,तुम सबसे प्यारी हो.

बुधवार, 18 अप्रैल 2018

कविताएं/ चुका नहीं है आदमी ,शायद - चर्चित कवि सुबोध श्रीवास्तव


चुका नहीं है आदमी...

बस,

थोड़ा थका हुआ है

अभी

चुका नहीं है

आदमी!

इत्मिनान रहे

वो उठेगा

कुछ देर बाद ही

नई ऊर्जा के साथ,

बुनेगा नए सिरे से

सपनों को,

गति देगा

निर्जीव से पड़े हल को

फिर, जल्दी ही

खेतों से फूटेंगे

किल्ले

और/चल निकलेगी

ज़िन्दगी

दूने उत्साह से|

हां, सचमुच

जीवन के लिए

जितना ज़रूरी है

पृथ्वी/जल/नभ

अग्नि और वायु

उतनी ही ज़रूरी है

गतिमयता,

जड़ता-

बिलकुल गैरज़रूरी है

सृष्टि के लिए..!

सोमवार, 19 मार्च 2018

आे मेरी उदास पृथ्वी- केदार नाथ सिंह


घोड़े को चाहिए जई

फुलसुँघनी को फूल
टिटिहिरी को चमकता हुआ पानी
बिच्छू को विष
और मुझे ?

गाय को चाहिए बछड़ा
                                 बछड़े को दूध
                               दूध को कटोरा
                               कटोरे को चाँद
                                और मुझे ?

मुखौटे को चेहरा
चेहरे को छिपने की जगह
आँखों को आँखें
हाथों को हाथ
और मुझे ?

ओ मेरी घूमती हुई 
उदास पृथ्वी
मुझे सिर्फ़ तुम...
तुम...तुम...


रविवार, 18 मार्च 2018

चाहने लगी हूं मैं-अनन्या सिंह


तुम सोचते तो होगे,
कि सोचती क्यों हूँ तुम्हे
शायद खुश भी होते होगे
मन ही मन।
ये मन ही तो है जो
बेपरवाह सभी बातों से
बस लग जाता है यूँ ही किसी से
बिना सोचे समझे।।
मुझे भी नहीं पता कि
तुम क्यों उतरते जा रहे हो
रगों में मेरी
धीरे धीरे बेतहाशा
मगर तुम्हारा ना होना
विचलित करता है
तुम्हारा जवाब ना देना भी
परेशां करता है
तुम्हारी बेरुखी बेचैन
और तुम्हारा ना समझ पाना,
निराश करता है
पर जब तुम बात कर ते हो
तो मेरे होंठ ही केवल नही मुस्कुराते
मुस्कुराता है मेरा अंतर्मन
एक अरसे बाद कुछ गीत फिर गुनगुनाने लगी हूँ मैं
आईने में खुद को देख मुस्कुराने लगी हूँ मै
शायद बता दूं शब्दो मे तुम्हे किसी दिन
तुम्हारी प्रतिक्रिया से डरते रहूं कितने दिन
सच है कि तुम्हे चाहने लगी हूँ मैं।

शुक्रवार, 2 जून 2017

नमन डॉ.आराधना चतुर्वेदी


जिसने मुझे
उँगली पकड़कर
चलना नहीं सिखाया
कहा कि खुद चलो
गिरो तो खुद उठो,
जिसने राह नहीं दिखाई मुझे
कहा कि चलती रहो
राह बनती जायेगी,
जिसने नहीं डाँटा कभी
मेरी ग़लती पर
लेकिन किया मजबूर
सोचने के लिये
कि मैंने ग़लत किया,
जिसने कभी नहीं फेरा
मेरे सिर पर हाथ
दुलार से
पर उसकी छाँव को मैंने
प्रतिपल महसूस किया,
जिसने खर्च कर दी
अपनी पूरी उम्र
और जमापूँजी सारी
मुझे पढ़ाने में
दहेज के लिये
कुछ भी नहीं बचाया,
आज नमन करता है मन
उस पिता को
जिसने मुझे
स्त्री या पुरुष नहीं
इन्सान बनकर
जीना सिखाया.



Special Post

दीवार और कील — अनुजा भट्ट

एक दीवार हूँ मैं... जिस पर कील नहीं ठुकती, ऊपर से एकदम सपाट सी दिखाई देने वाली सड़क, या फिर कोई पगडंडी, या यूँ ही कोई बेनाम सा मैदान... न हर...