आधुनिक लाइफस्टाइल ब्लॉग: फैशन, संस्कृति, कहानियों और संस्मरणों का अनूठा संगम।भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हम अक्सर अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और उन छोटी-छोटी खुशियों को भूल जाते हैं जो हमारे जीवन को खूबसूरत बनाती हैं। लाइफस्टाइल का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि हम क्या पहनते हैं या हम कहाँ घूमते हैं, बल्कि इसका गहरा संबंध हमारी सोच, हमारे साहित्य और हमारी विरासत से भी है। यदि आप भी एक ऐसे मंच की तलाश में हैं जहाँ आधुनिकता और परंपरा का एक खूबसूरत संतुलन देखने को मिले, तो यह आपके लिए है।
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गुरुवार, 10 अक्टूबर 2024
विदा - कविता- डा. अनुजा भट्ट
विदा
मैं , मैं नहीं एक शब्द है
हुंकार है
प्रतिकार है
मैं का मैं में विलय है
इस समय खेल पर कोई बात नहीं
फिर भी...
सच में मुझे क्रिक्रेट में कोई रूचि नहीं
फिर भी
मैं सचिन तंडेलुकर की गेंद की तरह उछलना चाहती हूं
टप्पे पर टप्पे मार कर हवा के उस अंतिम छोर पर पहुंचकर
धरती में गिर जाना चाहती हूं
अनगिनत गेंदों से नहीं असंख्य शब्दों से खेलती और जीती उन क्षणों को
खुद और पूरी कायनात के साथ
मैं लेना चाहती हूं अब विदा
न्यूटन का सिद्धांत मुझे प्रिय है
हालांकि मैं विज्ञान के बारे में ज्यादा जानती नहीं
पर शोध से हर रोज गुजरती हूं
फिर भी
अपनी मुट्ठी में भींचकर कोई रूमाल
सर्द रात और कंपकंपाती ठंड में
पसीने से तरबतर हो
ऐसा है मेरा ख्वाब
मैं उस ख्वाब को अपनी उंगुलियों में
महसूस करते हुए
मुट्ठी में भर लेना चाहती हूं
निचोड़ कर रख देना चाहती हूं रूमाल
रूमाल जिसके चार कोने हैं
चार दिशाएं हैं
और चारों दिशाओं की साझेदार एक पोटली है
पोटली जिसमें सिक्के जमाते हैं कुछ
पोटली जिसमें सुदामा ने जमाए तंडुल
सिक्के जमाने वाले और तंडुल जमाने वाले सुदामा में मेरी कोई रूचि नहीं
मुझे न विपन्नता के गीत पसंद हैं
और न संपन्नता के किस्से
मुझे बस सचिन की तरह
अपने मानिंद एक गेंद चाहिए
जिसके हर टप्पे पर टप्पे पर टप्पे पर टप्पे पर
घूमते हुए वह हवा के साथ उछले
उसी को लपकने के लिए उठे हाथ
पर वह गिरे धरती पर
धरती पर
धरती पर
सचिन ने गेंद चूमी कई कई बार
मैं चूमना चाहती हूं
शब्द कई कई बार
सचिन को गेंद को स्पर्श करते दुलराते कई कई बार देखा मैंने
मैं शब्दों को दुलराना चाहती हूं
ओम ही ओम हैं
जिसे जन्मा था प्रकृति ने
प्रकृति की कोख में पहला नाद ओम है
स्त्री की कोख में पहला नाद मां
उस पहली बार सुने शब्द को
मैं अपनी आत्मा के किसी सूक्ष्म से सूक्ष्म कण में
अपनी ही प्राणवायु से खींचकर गर्भ में पुनःस्थापित कर
मैं विदा लेना चाहती हूं
बाकि उसके बाद के सब निरर्थक संवेदनहीन शब्दों को
मैं पोटली में सिक्के और तंडुल की तरह
खुद से अलग कर देना चाहती हूं
हवा में गूंजते इन शब्दों में
अब आक्सीजन नहीं रही
जो प्राणवायु की उम्मीद दे सके
उम्मीद ही तो आपको कमजोर बनाती है
मैं उम्मीद की उस विपरीत धारा में
नाउम्मीद का शपथपत्र भरना चाहती हूं
मैं विदा लेना चाहती हूं।
मंगलवार, 30 जुलाई 2024
कविता-दहलीज पर कदमों का क्रास-डॉ अनुजा भट्ट
शनिवार, 22 सितंबर 2018
स्मृति शेष- विष्णु खरे की दो कविताएं
हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि और हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष विष्णु खरे अब हमारे बीच नहीं रहे। उनका निधन साहित्य जगत में एक अपूरणीय क्षति है। अपने विशद अध्ययन और विपुल साहित्य से हिंदी जगत को अनमोल संपदा देने वाले खरे की ये हैं 2 प्रमुुख कविताएं...
कहो तो डरो...
कहो तो डरो कि हाय यह क्यों कह दिया
न कहो तो डरो कि पूछेंगे चुप क्यों हो
सुनो तो डरो कि अपना कान क्यों दिया
न सुनो तो डरो कि सुनना लाजिमी तो नहीं था
देखो तो डरो कि एक दिन तुम पर भी यह न हो
न देखो तो डरो कि गवाही में बयान क्या दोगे
सोचो तो डरो कि वह चेहरे पर न झलक आया हो
न सोचो तो डरो कि सोचने को कुछ दे न दें
पढ़ो तो डरो कि पीछे से झाँकने वाला कौन है
न पढ़ो तो डरो कि तलाशेंगे क्या पढ़ते हो
लिखो तो डरो कि उसके कई मतलब लग सकते हैं
न लिखो तो डरो कि नई इबारत सिखाई जाएगी
डरो तो डरो कि कहेंगे डर किस बात का है
न डरो तो डरो कि हुक़्म होगा कि डर
अक्स.....
आईने में देखते हुए
इस तरह इतनी देर तक देखना
कि शीशा चकनाचूर हो जाये-
फिर भी इतना मुश्किल नहीं
वह शीशे में
यूँ और इतना देखना चाहता है
कि बिल्लौर में तिड़कन तक न आये
सिर्फ़ जो दिख रहा है वह पुर्जा-पुर्जा हो जाए
और जो देख रहा है वह भी
फिर भी एक अक्स बचा रहे
जिसका वह है उसे जाने कैसे देखता हुआ
कहो तो डरो...
कहो तो डरो कि हाय यह क्यों कह दिया
न कहो तो डरो कि पूछेंगे चुप क्यों हो
सुनो तो डरो कि अपना कान क्यों दिया
न सुनो तो डरो कि सुनना लाजिमी तो नहीं था
देखो तो डरो कि एक दिन तुम पर भी यह न हो
न देखो तो डरो कि गवाही में बयान क्या दोगे
सोचो तो डरो कि वह चेहरे पर न झलक आया हो
न सोचो तो डरो कि सोचने को कुछ दे न दें
पढ़ो तो डरो कि पीछे से झाँकने वाला कौन है
न पढ़ो तो डरो कि तलाशेंगे क्या पढ़ते हो
लिखो तो डरो कि उसके कई मतलब लग सकते हैं
न लिखो तो डरो कि नई इबारत सिखाई जाएगी
डरो तो डरो कि कहेंगे डर किस बात का है
न डरो तो डरो कि हुक़्म होगा कि डर
अक्स.....
आईने में देखते हुए
इस तरह इतनी देर तक देखना
कि शीशा चकनाचूर हो जाये-
फिर भी इतना मुश्किल नहीं
वह शीशे में
यूँ और इतना देखना चाहता है
कि बिल्लौर में तिड़कन तक न आये
सिर्फ़ जो दिख रहा है वह पुर्जा-पुर्जा हो जाए
और जो देख रहा है वह भी
फिर भी एक अक्स बचा रहे
जिसका वह है उसे जाने कैसे देखता हुआ
अमर उजाला से साभार.
रविवार, 13 मई 2018
माँ - सविता शुक्ला
माँ ,तुम प्यार का सागर हो ,
ममता की अप्रतिम गागर हो ,
तुम त्याग की प्रतिमूर्ति हो ,
सद्भाव की जीवंत कृति हो ,
कभी कोमल हो तुम, कभी ज्वाला
बच्चों की हो तुम प्रथम पाठशाला
भावुक दिल और नाजुक हाथों से
बच्चों का भविष्य संवारती हो,
कठिन परिश्रम करवाकर
तुम शूरवीर उन्हें बनाती हो,
खुद संघर्ष करके भी
बच्चों का किस्मत चमकाती हो,
अपना वजूद भूला कर
सर्वस्व उनपर लूटाती हो,
तुम जननी हो,तुम धात्रृ हो,
ईश्वर का प्रतिरुप माँ,तुम सबसे प्यारी हो.
बुधवार, 18 अप्रैल 2018
कविताएं/ चुका नहीं है आदमी ,शायद - चर्चित कवि सुबोध श्रीवास्तव

चुका नहीं है आदमी...
बस,
थोड़ा थका हुआ है
अभी
चुका नहीं है
आदमी!
इत्मिनान रहे
वो उठेगा
कुछ देर बाद ही
नई ऊर्जा के साथ,
बुनेगा नए सिरे से
सपनों को,
गति देगा
निर्जीव से पड़े हल को
फिर, जल्दी ही
खेतों से फूटेंगे
किल्ले
और/चल निकलेगी
ज़िन्दगी
दूने उत्साह से|
हां, सचमुच
जीवन के लिए
जितना ज़रूरी है
पृथ्वी/जल/नभ
अग्नि और वायु
उतनी ही ज़रूरी है
गतिमयता,
जड़ता-
बिलकुल गैरज़रूरी है
सृष्टि के लिए..!
सोमवार, 19 मार्च 2018
रविवार, 18 मार्च 2018
चाहने लगी हूं मैं-अनन्या सिंह

तुम सोचते तो होगे,
कि सोचती क्यों हूँ तुम्हे
शायद खुश भी होते होगे
मन ही मन।
कि सोचती क्यों हूँ तुम्हे
शायद खुश भी होते होगे
मन ही मन।
ये मन ही तो है जो
बेपरवाह सभी बातों से
बस लग जाता है यूँ ही किसी से
बिना सोचे समझे।।
बेपरवाह सभी बातों से
बस लग जाता है यूँ ही किसी से
बिना सोचे समझे।।
मुझे भी नहीं पता कि
तुम क्यों उतरते जा रहे हो
रगों में मेरी
धीरे धीरे बेतहाशा
तुम क्यों उतरते जा रहे हो
रगों में मेरी
धीरे धीरे बेतहाशा
मगर तुम्हारा ना होना
विचलित करता है
तुम्हारा जवाब ना देना भी
परेशां करता है
तुम्हारी बेरुखी बेचैन
और तुम्हारा ना समझ पाना,
निराश करता है
विचलित करता है
तुम्हारा जवाब ना देना भी
परेशां करता है
तुम्हारी बेरुखी बेचैन
और तुम्हारा ना समझ पाना,
निराश करता है
पर जब तुम बात कर ते हो
तो मेरे होंठ ही केवल नही मुस्कुराते
मुस्कुराता है मेरा अंतर्मन
तो मेरे होंठ ही केवल नही मुस्कुराते
मुस्कुराता है मेरा अंतर्मन
एक अरसे बाद कुछ गीत फिर गुनगुनाने लगी हूँ मैं
आईने में खुद को देख मुस्कुराने लगी हूँ मै
आईने में खुद को देख मुस्कुराने लगी हूँ मै
शायद बता दूं शब्दो मे तुम्हे किसी दिन
तुम्हारी प्रतिक्रिया से डरते रहूं कितने दिन
तुम्हारी प्रतिक्रिया से डरते रहूं कितने दिन
सच है कि तुम्हे चाहने लगी हूँ मैं।
शुक्रवार, 2 जून 2017
नमन डॉ.आराधना चतुर्वेदी
जिसने मुझे
उँगली पकड़कर
चलना नहीं सिखाया
कहा कि खुद चलो
गिरो तो खुद उठो,
जिसने राह नहीं दिखाई मुझे
कहा कि चलती रहो
राह बनती जायेगी,
जिसने नहीं डाँटा कभी
मेरी ग़लती पर
लेकिन किया मजबूर
सोचने के लिये
कि मैंने ग़लत किया,
जिसने कभी नहीं फेरा
मेरे सिर पर हाथ
दुलार से
पर उसकी छाँव को मैंने
प्रतिपल महसूस किया,
जिसने खर्च कर दी
अपनी पूरी उम्र
और जमापूँजी सारी
मुझे पढ़ाने में
दहेज के लिये
कुछ भी नहीं बचाया,
आज नमन करता है मन
उस पिता को
जिसने मुझे
स्त्री या पुरुष नहीं
इन्सान बनकर
जीना सिखाया.
उँगली पकड़कर
चलना नहीं सिखाया
कहा कि खुद चलो
गिरो तो खुद उठो,
जिसने राह नहीं दिखाई मुझे
कहा कि चलती रहो
राह बनती जायेगी,
जिसने नहीं डाँटा कभी
मेरी ग़लती पर
लेकिन किया मजबूर
सोचने के लिये
कि मैंने ग़लत किया,
जिसने कभी नहीं फेरा
मेरे सिर पर हाथ
दुलार से
पर उसकी छाँव को मैंने
प्रतिपल महसूस किया,
जिसने खर्च कर दी
अपनी पूरी उम्र
और जमापूँजी सारी
मुझे पढ़ाने में
दहेज के लिये
कुछ भी नहीं बचाया,
आज नमन करता है मन
उस पिता को
जिसने मुझे
स्त्री या पुरुष नहीं
इन्सान बनकर
जीना सिखाया.
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