इतिहास, आध्यात्मिकता और कला का अनोखा संगम है महेश्वर, जहां इतिहास भी है, आध्यात्मिकता भी और कला भी।
नर्मदा नदी के पावन तट पर बसा यह शहर अपनी ऐतिहासिक इमारतों के साथ ही साथ दुनिया भर में प्रसिद्ध महेश्वरी साड़ियों के लिए भी जाना जाता है।
कैसी है शहर की खुशबू
महेश्वर भारत के मध्य प्रदेश राज्य के खरगोन जिले में स्थित है। इंदौर शहर से लगभग 90 किलोमीटर दक्षिण और खरगोन जिला मुख्यालय से मात्र 56 किलोमीटर दूर है यह शहर। जिसके किनारे बहुत ही सुंदर और भव्य घाट है। पत्रकारिता के काेर्स के लिए जब मैं भोपाल गई तो वहां मेरे सहपाठियों में नीलेश तायल भी थे। वह मेरे साथ नवभारत टाइम्स में प्रशिक्षण के लिए भी आए। साथ काम करते हुए हम बहुत बार अपने घर को याद करते हैं। मैं उसे नैनीताल के बारे में बताती और वह खरगौन के बारे में। उसके पास अपने शहर की यादें थी और मेरे पास अपने शहर की। उनसे ही जाना मैंने सबसे पहले खरगौन के बारे में और उस शहर से आसपास की कथाओं के बारे में।
कथाएं जो हमें जीवन देती हैं
सहस्रार्जुन से अहिल्याबाई तक महेश्वर का इतिहास बहुत दिलचस्प लगा मुझे । पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह शहर हयवंशी राजा सहस्रार्जुन की राजधानी था। कहा जाता है कि सहस्रार्जुन ने रावण तक को पराजित कर दिया था। बाद में ऋषि जमदग्नि को प्रताड़ित करने के कारण भगवान परशुराम ने सहस्रार्जुन का वध यहीं किया था। शंकराचार्य और पंडित मण्डन मिश्र का विश्व प्रसिद्ध और ऐतिहासिक शास्त्रार्थ इसी पावन भूमि पर हुआ था।
बहुत बाद में यह शहर मराठा साम्राज्य की महान, न्यायप्रिय और कला-प्रेमी शासिका देवी अहिल्याबाई होल्कर की राजधानी बना। उन्होंने ही महेश्वर को अपनी संस्कृति और कला का मुख्य केंद्र बनाया।
आज महेश्वरी साड़ी महिलाओं की पहली पसंद बनी हुई है, आज मैं आपको इसके इतिहास के बारे में बताती हूं।
सन 1767 के आसपास, रानी अहिल्याबाई होल्कर ने मालवा और सूरत से विशेष शिल्पकारों और बुनकरों को महेश्वर बुलाया। उन्होंने कारीगरों को 9 गज की एक विशेष साड़ी बनाने का आदेश दिया, जिसकी डिजाइन उन्होंने खुद तैयार की थी।
शुरुआत में ये साड़ियाँ केवल शाही मेहमानों और रिश्तेदारों को उपहार में दी जाती थी लेकिन बाद में रानी को लगा कि यह एक कुटीर उद्योग हो सकता है और इससे हज़ारों परिवारों को रोज़गार दिया जा सकता है।
महेश्वरी साड़ी की खासियत क्या है?
किलों और घाटों से प्रेरित बॉर्डर: महेश्वरी साड़ियों के बॉर्डर पर बनी डिज़ाइनें महेश्वर के किले की दीवारों, ईंटों और नर्मदा नदी के घाटों की नक्काशी से प्रेरित होती हैं।
चमेली बूटा: चमेली के सुंदर फूलों का पैटर्न।
ईंट बॉर्डर: किले की दीवारों की ईंटों जैसी ज्यामितीय (geometric) बनावट।
हीरा बॉर्डर: हीरे के आकार की बारीक डिज़ाइन्स।
रीवर्सिबल बॉर्डर (बुगड़ी बॉर्डर): यह साड़ी की सबसे अनोखी बात है। इसका बॉर्डर दोनों तरफ एक जैसा होता है, यानी आप इसे सीधा या उल्टा, दोनों तरफ से पहन सकती हैं।
विशिष्ट पल्लू डिज़ाइन: इसके पल्लू में 5 पट्टियाँ होती हैं (3 रंगीन और 2 जरी की लाइनें), जो इसे बहुत ही क्लासी लुक देती हैं।
बॉडी पैटर्न्स: साड़ी का बीच का हिस्सा या तो सादा होता है या फिर उसमें 'चांदतारा' (छोटे चांद-तारे) या महीन धारियां और चेक (घारड़ी) बने होते हैं।
कैटेगिरी - चंद्रकला, बैंगनी चंद्रकला, चंद्रतारा, बेली और पारबी।
फैब्रिक और रंग पारंपरिक रूप से महेश्वरी साड़ियों में केवल लाल, मैरून, काले, हरे और बैंगनी जैसे गहरे रंगों का ही इस्तेमाल होता था। लेकिन आज के मॉडर्न फैशन के साथ इसमें लाइट पेस्टल कलर्स और सोने-चांदी के धागों (Zari) का बेहद खूबसूरत कॉम्बिनेशन मिलने लगा है।
सिल्क और कॉटन (Silk-Cotton) के बेहतरीन ब्लेंड और बेहद हल्के वजन के कारण यह साड़ी हर मौसम के लिए आरामदायक है। आप इसे किसी कैज़ुअल आउटिंग से लेकर शादी-पार्टी जैसे फॉर्मल इवेंट्स में भी शान से कैरी कर सकती हैं।
साड़ी देखभाल भी मांगती है
चूंकि यह एक प्रीमियम हैंडलूम साड़ी है, इसलिए इसके रखरखाव पर थोड़ा ध्यान देना ज़रूरी है: साड़ी को पहली बार हमेशा ड्राई क्लीन (Dry Clean) के लिए ही भेजें। इसके बाद आप इसे घर पर किसी माइल्ड डिटर्जेंट के साथ हाथों से धो सकती हैं। इन साड़ियों को धोने के लिए हमेशा ठंडे पानी का ही इस्तेमाल करें, गर्म पानी से इसके धागे खराब हो सकते हैं।
इस तरह हमने जाना महेश्वर सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास और टेक्सटाइल आर्ट का जीता-जागता संग्रहालय है। यहाँ के राजराजेश्वर मंदिर, अहिल्याेश्वर मंदिर, और नर्मदा के घाट मन को शांति देते हैं, तो वहीं यहाँ की साड़ियाँ भारत की समृद्ध कला का अहसास कराती हैं।





