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मंगलवार, 6 अगस्त 2024

कन्हाई की लीला से सजी साड़ियां – डा. अनुजा भट्ट

पिछवाई साड़ी और कन्हाई की कहानी


भारत का एक मशहूर राज्य है राजस्थान। मैं यहां से कई तरह के संग्रह आपके लिए लाती हूं। इसी तरह भारत के हर राज्य की कला और कलाकार से जुड़ने का अवसर भी मुझे मिलता है। यह सारा काम काफी श्रमसाध्य है पर मुझे आनंद आता है। मुझे यहां कई कहानियां और किवदंतियां मिलती है। जैसे जैसे राह चलती हूं ईश्वर और फैशन की गलियां पुकारने लगती हैं। आप जब कभी राजस्थान गए होंगे तब आपने नाथद्वारा में श्रीनाथ मंदिर अवश्य देखा होगा। राजस्थान के नाथद्वारा में भगवान श्रीनाथ जी का मंदिर काफी लोकप्रिय जो है ।

श्रीनाथ जी मंदिर राजस्थान के राजसमंद जिले के नाथद्वारा शहर में स्थित है। यह उदयपुर से 50 किमी. और डबोक एयरपोर्ट से 58 किमी. दूरी पर स्थित है।

किंवदंती और इतिहास

श्रीनाथजी के स्वरूप या दिव्य रूप को स्वयं प्रकट कहा गया है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान कृष्ण की मूर्ति पत्थर से स्वयं प्रकट हैं और गोवर्धन पहाड़ियों से निकली हैं। ऐतिहासिक रूप से, श्रीनाथजी की मूर्ति की पूजा सबसे पहले मथुरा के पास गोवर्धन पहाड़ी पर की गई थी। मूर्ति को शुरू में मथुरा से यमुना नदी के किनारे 1672 ईस्वी में स्थानांतरित कर दिया गया था और लगभग छह महीने तक आगरा में रखा गया था, ताकि इसे सुरक्षित रखा जा सके। इसके बाद, मूर्ति को मुगल शासक औरंगजेब द्वारा किए गए बर्बर विनाश से बचाने के लिए रथ पर दक्षिण की ओर एक सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित कर दिया गया। जब मूर्ति गांव सिहाद या सिंहद में पहुंची, तो बैलगाड़ी के पहिये जिसमें मूर्ति को ले जाया जा रहा था, मिट्टी में धंस गए और आगे नहीं ले जाया जा सका। पुजारियों ने महसूस किया कि यही विशेष स्थान भगवान का चुना हुआ स्थान है और तदनुसार, मेवाड़ के तत्कालीन महाराणा राज सिंह के शासन और संरक्षण में एक मंदिर बनाया गया था। श्रीनाथजी मंदिर को 'श्रीनाथजी की हवेली' (हवेली) के रूप में भी जाना जाता है। मंदिर का निर्माण गोस्वामी दामोदर दास बैरागी ने 1672 में करवाया था।

मंदिर की मराठों द्वारा लूट

1802 में, मराठों ने नाथद्वारा पर चढ़ाई की और श्रीनाथजी मंदिर पर हमला किया। मराठा प्रमुख होल्कर ने मंदिर की संपत्ति के 3 लाख रुपये लूट लिए और पैसे वसूलने के लिए उसने मंदिर के कई पुजारियों को गिरफ्तार किया। मुख्य पुजारी (गोसाईं) दामोदर दास बैरागी ने मराठों के बुरे इरादे को महसूस करते हुए महाराणा को एक संदेश भेजा। श्रीनाथजी को मराठों से बचाने और देवता को मंदिर से बाहर निकालने के लिए महाराणा ने अपने कुछ खास लोगों को भेजा। वे श्रीनाथजी को अरावली की पहाड़ियों में मराठों से सुरक्षित स्थान घसियार ले गए। कोठारिया प्रमुख विजय सिंह चौहान को श्रीनाथजी की मूर्ति को बचाने के लिए मराठों से लड़ते हुए अपने आदमियों के साथ अपना जीवन देना पड़ा।

यह जानकारी कितनी रोमांचक है कि पिछवाई कला का विकास भी राजस्थान राज्य के औरंगाबाद गांव और नाथद्वारा में बनास नदी के तट पर अरावली पहाड़ियों में हुई । कलात्मक संदेश के जरिए पिछवाई का उद्देश्य अनपढ़ लोगों को कृष्ण की कहानियाँ सुनाना है। पिछवाई ' शब्द संस्कृत के शब्द ' पिच ' अर्थात पीछे और 'वाई' अर्थात लटकने से उत्पन्न हुआ है। ऐसा माना जाता है कि पिचवाई चित्रकला की उत्पत्ति लगभग 400 वर्ष पहले हुई थी। पिछवाई पेंटिंग प्राकृतिक रंगों का उपयोग करके सूती कपड़े पर बनाई गई बड़ी आकार की पेंटिंग हैं और भगवान श्रीनाथ जी की मूर्ति के पीछे उनकी लीलाओं को दर्शाने के लिए लटकाई जाती हैं। भगवान कृष्ण के जीवन के दृश्यों, विशेष रूप से उनके बचपन की शरारतों को दर्शाती हैं।

पिछवाई साड़ी एक प्रकार की पारंपरिक भारतीय साड़ी है जिसमें पिछवाई पेंटिंग से प्रेरित डिज़ाइन होते हैं। पिचवाई साड़ियाँ अपने जीवंत रंगों, विस्तृत कलाकृति और भगवान कृष्ण और हिंदू पौराणिक कथाओं से संबंधित विषयों के लिए जानी जाती हैं। ये साड़ियाँ अक्सर समृद्ध रेशम या सूती कपड़ों से बनाई जाती हैं और इन्हें हाथ से पेंट किए गए या हाथ से कढ़ाई किए गए बेहतरीन डिज़ाइनों से सजाया जाता है जो पिचवाई कला के सार को दर्शाते हैं। वे अपने सांस्कृतिक महत्व और दृश्य के कारण विशेष अवसरों, त्योहारों और शादियों के लिए लोकप्रिय हैं।

पिचवाई साड़ियाँ कला और फैशन का एक सुंदर मिश्रण हैं, जो भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित करती हैं। वे अपनी जटिल शिल्प कौशल के लिए जानी जाती हैं। पिचवाई पेंटिंग साड़ियों को उनकी सौंदर्य सुंदरता और सांस्कृतिक महत्व के लिए अत्यधिक माना जाता है। जो पिचवाई पेंटिंग में पाई जाने वाली जटिल और विस्तृत कलात्मकता से मिलते जुलते हैं। इन डिज़ाइनों में अक्सर भगवान कृष्ण, राधा और अन्य संबंधित आकृतियों के चित्रण के साथ-साथ मोर, गाय, कमल के फूल और हरे-भरे परिदृश्य जैसे तत्व शामिल होते हैं, जो सभी पिचवाई कला की विशेषता हैं। यह साड़ियां व उन लोगों द्वारा पसंद की जाती हैं जो पारंपरिक भारतीय कला रूपों और फैशन दोनों की सराहना करते हैं।

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शुक्रवार, 2 अगस्त 2024

शिवरात्रि शिवजी और उनकी सवारी की कहानी- डॉ अनुजा भट्ट

नंदी की कहानी

शिव के एक गण का नाम है नंदी। जिस तरह गायों में कामधेनु श्रेष्ठ है उसी तरह बैलों में नंदी श्रेष्ठ है। आमतौर पर खामोश रहने वाले बैल का चरित्र उत्तम और समर्पण भाव वाला बताया गया है। इसके अलावा वह बल और शक्ति का भी प्रतीक है। बैल को मोह-माया और भौतिक इच्छाओं से परे रहने वाला प्राणी भी माना जाता है। यह सीधा-साधा प्राणी जब क्रोधित होता है तो सिंह से भी भिड़ लेता है। यही सभी कारण रहे हैं जिसके कारण भगवान शिव ने बैल को अपना वाहन बनाया।

पौराणिक कथा अनुसार शिलाद ऋषि ने शिव की तपस्या के बाद नंदी को पुत्र रूप में पाया था। नंदी को उन्हों वेदादि ज्ञान सहित अन्य ज्ञान भी प्रदान किया। एक दिन शिलाद ऋषि के आश्रम में मित्र और वरुण नाम के दो दिव्य संत पधारे और नंदी ने पिता की आज्ञा से उनकी खूब सेवा की। जब वे जाने लगे तो उन्होंने ऋषि को तो लंबी उम्र और खुशहाल जीवन का आशीर्वाद दिया लेकिन नंदी को नहीं। तब शिलाद ऋषि ने उनसे पूछा कि उन्होंने नंदी को आशीर्वाद क्यों नहीं दिया?

तब संतों ने कहा कि नंदी अल्पायु है। यह सुनकर शिलाद ऋषि चिंतित हो गए। पिता की चिंता को नंदी ने भांप कर पूछा क्या बात है तो पिता ने कहा कि तुम्हारी अल्पायु के बारे में संत कह गए हैं इसीलिए चिंतित हूं। यह सुनकर नंदी हंसने लगा और कहने लगा कि आपने मुझे भगवान शिव की कृपा से पाया है तो मेरी उम्र की रक्षा भी वहीं करेंगे आप क्यों नाहक चिंता करते हैं। इतना कहते ही नंदी भुवन नदी के किनारे शिव की तपस्या करने के लिए चले गए। कठोर तप के बाद शिवजी प्रकट हुए और कहा वरदान मांगों वत्स। तब नंदी के कहा कि मैं ताउम्र आपके सानिध्य में रहना चाहता हूं।

नंदी के समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने नंदी को पहले अपने गले लगाया और उन्हें बैल का चेहरा देकर उन्हें अपने वाहन, अपना दोस्त, अपने गणों में सर्वोत्तम के रूप में स्वीकार कर लिया। भगवान शिव के हर मदिर में नंदी जी विराजमान हैं। ऐसा कहा जाता है कि जहां नंदी नहीं होते हैं वहां शिव जी का निवास भी नहीं होता है। वहीं, जब भी हम दर्शन करने के लिए शिवालय जाते हैं तो नंदी की प्रतिमा के कान में अपनी मनोकामना जरूर कहते हैं। यह सदियों से चली आ रही मान्यता भी है और साथ ही, भगवान शिव द्वारा दिया गया नंदी जी को एक वरदान भी, लेकिन क्या आपको पता है कि नंदी के कौन से कान में कहनी चाहिए अपनी इच्छा। भगवान शिव ने नंदी जी को जो वरदान दिया था उसके अनुसार, अगर शिव पूजन करने के बाद मौन रखते हुए नंदी के पास जाकर उनके बाएं कान में जो व्यक्ति अपनी इच्छा कहेगा वह अवश्य पूरी होगी।

चूंकि पवित्र बैल भगवान शिव का वाहन और द्वारपाल है, इसलिए उन्हें उनके मंदिरों में एक मूर्ति के रूप में रखा जाता है। आमतौर पर, आप उन्हें अपने अंगों को मोड़कर बैठे हुए देखेंगे।नंदी ने धर्म रुपी दाहिने पैर को बाहर रखा है। अर्थात धर्म के महत्व को दर्शाता है। जबकि काम और मोक्ष रूपी पैर को अंदर रखते हुए यह संदेश दिया है कि धर्म का जीवन में महत्वपूर्ण स्थान होना चाहिए।  वह घंटी के साथ एक हार पहनता है और रंग में या तो काला या सफेद होता है।  मुकुट और मालाएं उनके सुंदर परिधान और गहनों को सुशोभित करती हैं। 

देवी पार्वती ने नंदी को श्राप दिया था, लेकिन क्यों?
 एक बार, भगवान शिव और देवी पार्वती कैलाश पर्वत पर पासा का खेल खेल रहे थे। अनुमान लगाइए कि अंपायर कौन था? कोई और नहीं बल्कि नंदी। भले ही देवी ने खेल जीत लिया, लेकिन उन्होंने भगवान शिव को विजेता घोषित कर दिया। इससे देवी पार्वती क्रोधित हो गईं और उन्होंने उसे श्राप दे दिया। नंदी ने अनुरोध किया कि श्राप हटा लिया जाए, यह दावा करते हुए कि उसके कार्य भगवान के प्रति उसके प्रेम से प्रेरित थे। फिर उसने कहा कि नंदी श्राप से मुक्त हो सकता है यदि वह अपने पुत्र, भगवान गणेश की उनके जन्मदिन पर पूजा करे। पवित्र हिंदू महीने भाद्रपद की चतुर्दशी को नंदी ने भगवान गणेश की पूजा की और प्रायश्चित के रूप में उन्हें हरी दूब भेंट की। तब से,अधिकांश भक्त हर साल गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश को हरी दूब का प्रसाद चढ़ाते हैं।
आप अपने घर पर छोटे शिवलिंग के साथ नन्हा नंदी भी रख सकते हैं उनकी पूजा कर सकते हैं।
 आपको यह कहानी कैसी लगी ....

  






सोमवार, 15 जुलाई 2024

मेरी यादें- हरकाली देवी हरेला सावन और शिव परिवार- डा. अनुजा भट्ट

 

 जैसा की मैं हमेशा कहती हूं अच्छी यादों को संभालकर रखिए। वह आपको उर्जा देती हैं। परिवार समाज और देश से जोड़े रखती हैं। हम सभी के पास यादों का पिटारा होता है जो कभी हमें हमारे बचपन में ले जाता है कभी युवावस्था की याद दिलाता है। हर उम्र की अपनी एक याद होती है। हमारी तरह बुजुर्गों के पास भी उनकी यादों का पिटारा है जिसमें कई रोचक कहानियां और संस्मरण दर्ज हैं। सुनिए कभी...

मैं तो अपनी यादों में बार बार गोते लगाती हूं और मुझे आनंद आता है। इस बार बचपन की उन यादों में पापा और मैं बैठे हैं। अपने बगीचे से मिट्टी ले आए हैं और अब उस मिट्टी को पापा साफ कर रहे हैं। उसे चिकना कर रहे हैं। पास में लकड़ी की टहनियां हैं जिनको भी साफ कर एकसार कर लिया गया है। रूई भी रखी गई है। डिकारे बनने वाले हैं। जिसमें शिव परिवार बनेगा। 

कुमाऊँनी जीवन में भित्तिचित्रों के अतिरिक्त भी अपनी धार्मिक आस्था के आयामों को मिट्टी और रूई के सहारे कलात्मक रुप से निखारा जाता हैं। जिसके लिए अलग अलग नाम है। डिकारे भी ऐसा ही है। क्या है डिकारे... डिकारे शब्द का शाब्दिक अर्थ है - प्राकृतिक वस्तुओं का प्रयोग कर प्रतिमा गढ़ना। स्थानीय भाषा में अव्यवसायिक लोगों द्वारा बनायी गयी विभिन्न देवताओं की अनगढ़ परन्तु संतुलित एवं चारु प्रतिमाओं को डिकारे कहा जाता हैं। डिकारों को मिट्टी से जब बनाया जाता है तो इन्हें आग में पकाया नहीं जाता न ही सांचों का प्रयोग किया जाता है। मिट्टी के अतिरिक्त भी प्राकृतिक वस्तुओं जैसे केले के तने, भृंगराज आदि से जो भी आकृतियाँ बनाई जाती हैं, उन्हें भी डिकारे संबोधन ही दिया जाता है।

 पापा डिकारे बनाने में तल्लीन हैं। मिट्टी में रूई को भी मिलाया गया है।  सबसे पहले लकड़ी का एक तख्ता सा है जिसपर यह बनाए जाएंगे। पापा ने तीन हिस्सों में मिट्टी के गोले बना लिए हैं और अब आकृति बननी हैं। सभी भगवान बैठे हुए ही बनाए जाएंगें इसलिए ढांचा एक सा ही है। शिव की जटा और गणेश की सूंड बनाने में पापा को कमाल हासिल हैं। थोड़ी देर पहले जो मिट्टी थी वह अब ईश्वर का आकार ले चुकी है और अप उसमें रंग भरने की बारी है। मेरा कौतूहल मुझे छेड़छाड़ करने से रोक नहीं रहा है। पापा ने मुझे भी मिट्टी दे दी है। कोमल हाथ मिट्टी से खेल रहे हैं । सूखने  के लिए पापा ने अब उनको हल्की धूप में रख दिया है। अब  सूखने के बाद उस पर चावल का घोल डाला जाएगा। घोल मां मे तैयार कर दिया है। सूखने के बाद  यह हलके पीले रंग के हो गए हैं। डिकारे में शिव को नीलवर्ण और पार्वती को श्वेतवर्ण से रंगा गया है। रंग भरने में दीदी भी पापा की मदद कर रही है। देखते ही देखते शिव परिवार सजधज कर खड़ा हो गया है। पापा ने डिकारों में  जिस शिव परिवार को बनाया है  उसमें चन्द्रमा से शोभित जटाजूटधारी शिव, त्रिशूल एवं नागधारण किये अपनी अद्धार्ंगिनी गौरी के साथ हैं। गणेश भी हैं। चूहा मैंने बना ही लिया। पापा ने बताया पहले ये रंग किलमोड़े के फूल, अखरोट व पांगर के छिलकों से तथा विभिन्न वनस्पतियों के रस के सम्मिश्रण से तैयार किया जाता है।

 कला के प्रति मेरे पापा का भी रूझान रहा पर वह इसे प्रकट नहीं करते है। मां हो या मौसी दोनों के एपण पर ध्यान देते। जब वह पढ़ाई के लिए नैनीताल अपने भाई (बुआ के बेटे के यहां रहे) के यहां रहे तो डिगारे वही बनाते थे। ऐसा ताई जी ने मुझे बताया।

आज सरस्वती पूजा के लिए जब मूर्ति बनने के लिए देती हूं और उस पूरी प्रक्रिया को देखती हूं , अनायास पापा और मैं मिट्टी के साथ यादों के उसी फ्रेंम में दिखने लगते हैं।

कुमाऊं में हरेला से ही श्रावण या सावन माह तथा वर्षा ऋतु का आरंभ माना जाता है। इस दिन प्रकृति पूजन का विधान है। हरेला का अर्थ है "हरित दिवस", और इस क्षेत्र में कृषि -आधारित समुदाय इसे अत्यधिक शुभ मानते हैं, क्योंकि यह उनके खेतों में बुवाई चक्र की शुरुआत का प्रतीक है। हरेला पर्व से नौ दिन पहले ही घर में मिट्टी या फिर बांस की टोकरी में हरेला बोया जाता है। जिसे रिंगाल कहते हैं।

क्या होता है रिंगाल? ( रिंगाल बांस की प्रजाति का एक पौधा होता है, जिसे बौना बांस भी कहते हैं. यह बहुत बारीक होता है और इससे काम करना बहुत मुश्किल होता है. आजकल इससे बहुत सुंदर क्राफ्ट का सामान  बनाया जा रहा है।) फिर नौ दिनों तक इस पात्र को सींचा जाता है। दसवें दिन इस पात्रा में उगे पौधों को काट दिया जाता है।

पुराणों में कथा है कि शिव की अर्धांगिनी सती ने अपने आप से खिन्न होकर हरे अनाज वाले पौधों को अपना रुप देकर पुनः गौरा रुप में जन्म लिया। इस कारण ही सम्भवतः शिव विवाह के इस अवसर पर अन्न के हरे पौधों से शिव पार्वती का पूजन सम्पन्न किया जाता है।

हरेला की परम्परा के अनुसार अनाज ११ दिन पूर्व एपण से लिखी किंरगाल की टोकरी में बोया जाता है। हरेला बोने के लिए पाँच या सात प्रकार के बीज जिनमें कोहूँ, जौ, सरसों, मक्का, गहत, भट्ट तथा उड़द की दाल कौड़ी, झूमरा, धान,  मास आदि मोटा अनाज सम्मिलित हैं, लिये जाते हैं। यह अनाज पाँच या सात की विषम संख्या में ही प्रायः बोये जाते हैं। बीजों को बोने के लिए मंत्रोंच्चार के बीच शंखध्वनि की जाती है। इस अवसर पर हरकाली देवी की आराधना की जाती है।

संक्रान्ति के अवसर पर इन अन्न के पौधों को काटकर देवताओं के चरणों में अर्पित किया जाता है। हरेला पुरुष अपनी टोपियों में, कान में तथा महिलाएँ बालों में लगाती हैं। घर के प्रवेश द्वार में इन अन्न के पौधों को गोबर की सहायता से चिपका दिया जाता है।

  मान्यता है ये रस्म निभाने से परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।  हरेला जितना बड़ा होगा,  किसान को उसकी फसल में उतना ही ज्यादा लाभ मिलेगा। 

 

जी रया ...

जागी रया ....

ये दिन ये बार भेटनै रया...

गंग कै बालू छन जाण क रया....

घ्वाड क सिंघउन जाण क रया....

दूब क जास झाड है जौ....

पाती जस फूल है जौ.....

हिमालय क ह्यूं छन जाण क रया ....

लाख दुति लाख हरेल है जन....

लाग हरयाव...लाग बग्वाव...

जी रे...जाग रे... बच रे..

दूब जौ पली जे..... फूल जौ खिल जे..

स्याव जस बुध्दि.....शेर जस तरान ह जौ..

सब बच रया......खुश रया...!

यै दिन यै मास भेंटन रैया....!

उत्तराखंडी लोक पर्व हरेला की आपको सपरिवार बधाई व शुभकामनाएं!

*शुभ हरेला*

बुधवार, 10 जुलाई 2024

13 का अंक और मां विपदतारिणी का संग..... क्या है यह रहस्य-डा. अनुजा भट्ट


मेरा संबंध मां दुर्गा से बहुत गहरा है। जहां से मैं हूं वह दुर्गा का मायका है। अब आप यह पता करें मां पार्वती मां दुर्गा का मायका कहां है। मेरे मायके में भी देवी की पूजा होती है पर बलि नहीं होती। इसलिए मेरा संस्कार शाकाहारी है। शादी के बाद मैं बंगाली परिवार की बड़ी बहू बन गई और तीज त्यौहार की पारंपरिक जिम्मेदारी भी मेरे हिस्से आ गई।
यहां परंपरा और रीति नीति के रंग बिलकुल अलग थे। इसलिए स्वाभाविक था कि बहुत ज्यादा असमंजस थी। मैं हर चीज को जानना चाहती थी, समझना चाहती थी पर कई सवाल मन में थे। अपनी सासु मां के कहने पर मैंने भी विपद तारणी का उपवास रखना शुरू किया पर मुझे उसकी कथा कहानी मालूम नहीं थी। मेरे पास उसकी कोई किताब भी नहीं थी। परिवार में पूछा तो पता चला यह पूजा सभी महिलाएं सामूहिक रूप से मंदिर में करती हैं जहां ठाकुर जी पूजा करवाते हैं। सभी अपनी पूजा की सभी सामग्री के साथ वहां जाती हैं और कथा सुनती हैं। विवाहित महिलाएं ही इसे करती हैं।
अपने मायके में भी मैंने सामूहिक पूजा होते देखा है। आठू सातू का उपवास मां करती है। वहां की कथा कहानी के बारे जानती हूं। उस कहानी में मां अपने मायके आती है। यह लगभग उसी तरह है जैसे दुर्गा पूजा में मां अपने परिवार के साथ अपने मायके आती है। लेकिन आज जिस पूजा के बारे में बात कर रही हूं उसे जानने समझने के लिए तब न मुझे बांग्ला समझ आती थी न बोलनी आती थी और न पढ़नी। इसलिए न मैं समझ पाई न पढ़ पाई। किताब भी नहीं मिल पाई। मैं बस जैसा बताया गया वैसे करती रही। हमारी सोसायटी के मंदिर में यह पूजा नहीं होती। इसका कारण यह है कि यहां बंगाली परिवार बहुत कम है जाे हैं भी वह काली बाड़ी चले जाते हैं।
मैं हर पर्व में मां दुर्गा को याद करती थी और पूजा के बाद क्षमा प्रार्थना कर लेती। इस पूजा में जो सबसे अलग बात है वह है 13 का विधान। हर चीज 13 ही चढ़ती है चाहे फल हो मिठाई हो या फिर दूर्वा। प्रसाद में जो भी भोग लगाया जाता है वह 13 के अंक में ही होता है। मेरे मन में यह सवाल आता था कि 13 ही क्यों . इस बारे में बहुत लोगों से जानने की कोशिश की पर उत्तर नहीं मिला।
फिर सोचा दुर्गा सप्तशती में भी 13 ही अध्याय हैं। हो सकता है कथा के अनुसार जब रानी ने मां के याद क्या होगा तो दुर्गा सप्तशती का पाठ किया हो। 13 नंबर के अमूमन अशुभ माना जाता है पर यहां 13 शुभ है। अयोध्या के राम मंदिर में मूर्ति की प्राण- प्रतिष्ठा 22-01-2024 को की गई है। अगर हम अंक ज्योतिष की बात मानें तो प्राण-प्रतिष्ठा के दिन के सभी अंकों का योग 13 है। 22 जनवरी, 2024 को श्री राम मूर्ति के अभिषेक से एक दिलचस्प संख्यात्मक योग प्राप्त हुआ 2 + 2 + 1 + 2 + 0 + 2 + 4 = 13 प्राप्त हुआ है।
अंकज्योतिष में 13 अंक के कई अर्थ हैं। कुछ लोगों द्वारा इसे 'पवित्र अंक' माना जाता है और अंकशास्त्र में इसे एक बहुत ही कर्म कारक अंक माना जाता है। यह संख्या 13 परमात्मा से जुड़ी मानी जाती है और कहा जाता है कि जो लोग इसे अपनाते हैं उनके लिए यह सौभाग्य और समृद्धि लाता है। कई लोगों का मानना है कि संख्या 13 में बदलाव लाने की क्षमता है जो सकारात्मक दृष्टिकोण की ओर ले जा सकती है।मृत्यु के बाद भी 13 दिन का विधान है जहां आत्मा पवित्र हाेकर अपने स्थान चली जाती है। शोक शांति में बदल जाता है।
कुछ संस्कृतियों में इसे 'एंजेल नंबर' के रूप में भी जाना जाता है, यह प्रेम और करुणा के साथ नेतृत्व करने का प्रतीक है। इसका अर्थ नकारात्मकता को सकारात्मकता में बदलना है। सकारात्मक बनाए रखना है।
माता विपद तारिणी देवी दुर्गा के 108 रूपों में से एक हैं। देवी चार भुजाओं वाली हैं, सिंह पर सवार हैं और शंख, चक्र, खड्ग और शूल धारण करती हैं। आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष द्वितिया से दशमी के बीच मंगलवार और शनिवार को उनकी पूजा की जाती है। यह पूजा गुप्त नवरात्रि में हाेती है। पूर्वी भारत में पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम, बिहार, झारखंड, त्रिपुरा और बांग्लादेश के हिंदू समुदायों में यह पूजा की जाती है। ठीक इसी समय उड़ीसा में रथ यात्रा भी हाेती है।
तैयारी-व्रत पर 13 विभिन्न प्रकार के फलों, फूलों और मिठाइयों के प्रसाद से पूजा की जाती है। उन्हें 13 पान, 13 सुपारी और 13 धागा भी चढ़ाया जाता है। धागे में 13 गांठ 13 दूर्वा के साथ लगाई जाती हैं। पूजा के बाद प्रसाद खाया जाता है उपवास की महिलाएं मीठा भोजन ही करती हैं।
कथा- पूजा के अंत में व्रत कथा पढ़ी जाती है। कथा कहती है, कि एक बार देवर्षि नारद ने पृथ्वी पर भ्रमण करते हुए देखा कि नश्वर मनुष्य विभिन्न प्रकार के संकटों में फंसे हुए हैं और उन्हें संकट से निकालने वाला कोई नहीं है। मनुष्यों का ऐसा भाग्य देखकर वे दुखी हुए और कैलाश गए तथा महादेव से मनुष्यों के संकटों को नष्ट करने के लिए कहा। शिव ने उत्तर दिया कि मनुष्य अपने जीवन में किए गए गलत कार्यों और पापों के कारण जीवन में संकटों का सामना करते हैं। और वे पाप ही संकट का रूप लेकर उनके सामने आते हैं। इस स्पष्टीकरण से आश्चर्यचकित नारद ने शंभु से ऐसा उपाय पूछा जिससे लोग स्वयं को ऐसे संकट से बचा सकें। मुस्कुराते हुए महेश्वर ने पास में ही विचरण कर रही नारायणी की ओर इशारा करते हुए कहा कि नारायण की प्रिय कमल नेत्रों वाली नारायणी ही सबका कारण है। जैसे भगवान विष्णु पृथ्वी का संरक्षण करते हैं, वैसे ही वे ही मनुष्यों को आसन्न संकट से बचा सकती हैं। तब नारद नारायणी के पास गए और उन्हें प्रणाम करते हुए उनसे मनुष्यों के सभी संकटों को समाप्त करने की विनती की। उसकी बात सुनकर नारायणी मुस्कुराई और तथास्तु कहकर अंतर्धान हो गई।

वह विदर्भ राज्य में प्रकट हुई, वहां एक बहुत ही धर्मपरायण राजा रहता था जो अत्यंत धर्मपरायण था और अपनी प्रजा और गायों की अत्यंत उत्साह से रक्षा करता था। उसकी पत्नी रानी भी असंख्य खूबियों वाली एक अत्यंत सुंदर महिला थी, लेकिन उसका एकमात्र बुरा गुण उसका अभिमान था। उसका अभिमान नष्ट करने के इरादे से देवी नारायणी ने महामाया का रूप धरा और एक मायाजाल फैलाया। माया के प्रभाव से महल की रानी एक बहिष्कृत समाज की महिला की सबसे अच्छी दोस्त बन गई। वह महिला गुप्त रूप से रानी के साथ मिलकर मादक शराब, जंगली मांस और अन्य वस्तुओं की तस्करी करती थी, जिन्हें धर्मपरायण लोगों द्वारा खाया नहीं जा सकता था। इसके लिए रानी उसे रेशमी वस्त्र और सोने के आभूषण देती थी। एक दिन रानी ने अपनी दोस्त से गोमांस मांगा, गोमांस सबसे अधिक निषिद्ध भोजन है। रानी की वफादार दोस्त ने उसे सावधान किया और कहा कि वह रानी के लिए वर्जित है। अब तक वह जो और भी निरामिष चीजें खाती थी उसे भी उनको नहीं खाना चाहिए पर उनको खाने से पाप नहीं लगता है, लेकिन गोमांस सबसे अधिक पाप है और यदि धर्मपरायण राजा को यह बात पता चल गई, तो वह धर्म की रक्षा के लिए आपका वध भी कर सकते हैं। माया के प्रभाव में आकर रानी ने चेतावनी की परवाह न करते हुए दोस्त को वचन दिया कि यदि वह मुझे वह लाकर देगी तो अत्यंत मूल्यवान रत्न उसे मिलेंगे। दोस्त ने रानी की बात मान ली और उसे गोमांस से भरा बर्तन भेंट किया। रानी ने प्रसन्न होकर दोस्त को उपहार दिए और गोमांस को अपने पलंग के नीचे छिपा दिया। बाद में जब वह स्नान करने चली गई, तो एक सेवक उसके कक्ष में आया और उसे गोमांस का बर्तन मिला, वह भयभीत होकर राजा को बताने के लिए भागा। जब राजा ने इसके बारे में सुना, तो वह अत्यंत क्रोधित हुआ और रानी के कक्ष की ओर दौड़ा। तब तक रानी वापस आ चुकी थी और जब उसने बाहर का शोर सुना, तो वह समझ गई कि वह पकड़ी गई है और उसने डर के मारे अपने कक्ष के दरवाजे बंद कर दिए। जब राजा पहुंचे तो उन्होंने दरवाजे पर जोर से दस्तक दी और रानी को तुरंत दरवाजा खोलने का आदेश दिया और धमकी दी कि अगर अंदर गोमांस मिला तो वह उसे जान से मार देंगे।
कांपते हुए रानी ने जवाब दिया कि उसने कपड़े नहीं उतारे हैं और कपड़े पहनने के बाद दरवाजा खोलेगी, उसने राजा से इंतजार करने का अनुरोध किया और राजा ने प्रतीक्षा की। डर से व्याकुल होकर उसने गोमांस को छिपाने के लिए चारों ओर देखा लेकिन कोई रास्ता नहीं मिला। अफसोस औऱ अपने भाग्य को कोसते हुए उसने नारायणी की शरण ली और पूरे दिल से भक्ति के साथ प्रार्थना की । उनकी स्तुति करके उन्हें इस खतरे से बचाने का अनुरोध किया। तब देवी हरवल्लभी देवी नारायणी देवी लक्ष्मी उनकी भक्ति से प्रसन्न हुईं, माता बिपदतारिणी के रूप में रानी के सामने प्रकट हुईं और उन्हें अभय प्रदान किया और उन्हें खतरे से बचाने का वादा किया। साथ ही उन्होंने कहा , हर साल आषाढ़ माह के गुप्त नवरात्रि के दौरान मंगलवार या शनिवार को 13 आम के पत्तों और नारियल के साथ एक जल भरा घड़ा स्थापित करें और 13 पूड़ियों का भोग लगाकर उसकी पूजा करें। हाथ में 13 गांठ और 13 दूर्वा से सुसजिजत धागा पहने और अपने परिवार के लोगों को भी पहनाएं। यह धागा सालभर तक पहनें। हर साल पूजा के बाद इस दिन इस धागे को बदलें।
तो कैसी लगी आपको यह पर्व कथा।

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