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रविवार, 7 अक्टूबर 2018

नादिया मुराद जिनकाे मिला शांति के लिए नाेबेल पुरस्कार

नादिया मुराद
 अगस्त के एक दिन काले झंड़े लगे इराक में आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट के पैर पसारते ही खुशहाली की जिंदगी जी रहे यजीदी समुदाय के लोगों का खराब वक्त शुरू हो गया था। आतंकवादियों के चंगुल से किसी तरह जान बचा कर भागी यजीदी महिला नादिया मुराद को शुक्रवार को शांति के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया है। नोबेल समिति की अध्यक्ष बेरिट रीस एंडरसन ने यहां नामों की घोषणा करते हुए कहा कि मुराद और कांगो के चिकित्सक डेनिस मुकवेगे को यौन हिंसा को युद्ध हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने पर रोक लगाने के इनके प्रयासों के लिए नोबेल शांति पुरस्कार के लिए संयुक्त रूप से चुना गया है।

पतले और पीले पड़ चुके चेहरे वाली मुराद (25) उत्तरी इराक के सिंजर के निकट के गांव में शांतिपूर्वक जीवन जी रहीं थी लेकिन 2014 में इस्लामिक स्टेट के आंतकवादियों के जड़े जमाने के साथ ही उनके बुरे दिन शुरू हो गए। वह उत्तरी इराक में सिंजर के जिस गांव में रह रही थी, उसकी सीमा सीरिया के साथ लगती है। और यह इलाका किसी जमाने में यजीदी समुदाय का गढ़ थाजिहादियों के ट्रक उनके गांव कोचो में धड़धड़ाते हुए घुस आए। इन आंतकवादियों ने पुरूषों की हत्या कर दी, बच्चों को लड़ाई सिखाने के लिए और हजारों महिलाओं को यौन दासी बनाने और बल पूर्वक काम कराने के लिए अपने कब्जे में ले लिया। आज मुराद और उनकी मित्र लामिया हाजी बशर तीन हजार लापता यजीदियों के लिए संघर्ष कर रहीं हैं। माना जा रहा है कि ये अभी भी आईएस के कब्जे में हैं।

दोनों को यूरोपीय संघ का 2016 शाखारोव पुरस्कार दिया जा चुका है। मुराद फिलहाल मानव तस्करी के पीड़ितों के लिए संयुक्त राष्ट्र की गुडविल एंबेसडर हैं। वह कहती हैं, ‘आईएस लड़ाके हमारा सम्मान छीनना चाहते थे लेकिन उन्होंने अपना सम्मान खो दिया।’आईएस की गिरफ्त में रह चुकीं मुराद इसे एक बुराई मानती हैं। पकड़ने के बाद आतंकवादी मुराद को मोसुल ले गए। मोसुल आईएस के स्वघोषित खिलाफत की ‘राजधानी’थी। दरिंदगी की हदें पार करते हुए आतंकवादियों ने उनसे लगातार सामूहिक दुष्कर्म किया, यातानांए दी और मारपीट की।

वह बताती हैं कि जिहादी महिलाओं और बच्चियों को बेचने के लिए दास बाजार लगते हैं और यजीदी महिलाओं को धर्म बदल कर इस्लाम धर्म अपनाने का भी दबाव बनाते हैं। मुराद ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आपबीती सुनाई। हजारों यजीदी महिलाओं की तरह मुराद का एक जिहादी के साथ जबरदस्ती निकाह कराया गया। उन्हें मेकअप करने और चुस्त कपड़े पहनने के लिए मारा पीटा भी गयाअपने ऊपर हुए अत्याचारों से परेशान मुराद लगातार भागने की फिराक में रहती थीं और अंतत:मोसूल के एक मुसलमान परिवार की सहायता से वह भागने में कामयाब रहीं। वह बताती हैं कि गलत पहचान पत्रों के जरिए वह इराकी कुर्दिस्तान पहुंची और वहां शिविरों में रह रहे यजीदियों के साथ रहने लगीं। वहां उन्हें पता चला कि उनके छह भाइयों और मां को कत्ल कर दिया गया है। इसके बाद यजीदियों के लिए काम करने वाले एक संगठन की मदद से वह अपनी बहन के पास जर्मनी चलीं गईं। आज भी वह वहां रह रही हैं। मुराद ने अब अपना जीवन ‘अवर पीपुल्स फाइट’ के लिए समर्पित कर दिया है।
साभार- टाइम्सनाउन्यूज

रविवार, 16 सितंबर 2018

मिलिए इल्मा अफराेज से-शाकिर चाैधरी

कुंदरकी (मुरादाबाद) : इल्मा अफ़रोज़ से हमारी बातचीत के दौरान तेज़ आंधी आती है और एक लकड़ी का बोर्ड उड़कर उनके भाई अराफ़ात (24) के दाहिने हाथ पर गिर जाता है. इससे उनके हाथ से खून निकलने लगता है और हड्डी में गहरी चोट लगती है.

अचानक से इल्मा बेहद तनाव में आ जाती हैं. वहां मौजूद लोग उन्हें समझाते हैं कि घबराइए मत, हड्डी नहीं टूटी है. मगर वो बदहवास हैं और तेज़ आंधी-तूफ़ान के बीच ही मुरादाबाद (कुंदरकी में हड्डी का डॉक्टर नहीं है) जाने की ज़िद करती हैं. कमरे में दौड़कर जाती हैं. अपना पर्स लाती हैं. पैसे कम देखकर चाचा से मांगती हैं. तभी अराफ़ात अपनी उंगलियां चलाकर दिखाता है, जिससे यह पता चलता है कि हड्डी सलामत है.

इल्मा को सामान्य होने में वक़्त लगता है. उनकी आंखें लाल हो जाती हैं और आंसू बाहर आ जाते हैं.

इल्मा कहती हैं, अब इसके सिवा मेरा कौन है. आज पहली बार इसको चोट लगी है.

मुरादाबाद के कुंदरकी की इल्मा अफ़रोज़ हाल ही में आए यूपीएससी के परिणाम में 217 रैंक पाकर भारत की सिविल सर्विस का हक़दार बन चुकी हैं और उनका आईपीएस बनना तय है.

32 बीघा ज़मीन (5 एकड़) पर खुद खेती करने वाले इल्मा अफ़रोज़ के पिता अफ़रोज़ 14 साल पहले उनके परिवार को बेसहारा छोड़कर चले गए तो घर बड़ी बेटी होने के नाते इल्मा ने परिवार संभाल लिया.

इल्मा के घर में किचन एक तख्त के ऊपर चलता है. उसके ड्राइंग रूम की छत पर फूस का छप्पर है. उसका ड्रेसिंग टेबल उनकी अम्मी को दहेज़ में मिला था, जो गल चुका है.

इल्मा के घर के दो कमरों में कोई बेड नहीं है. चारपाई टूटी हुई है. कुर्सियां पड़ोस से मांगकर लाई गई है. इल्मा के पास बेहद सस्ता स्मार्ट फोन है, जिसकी स्क्रीन टूट चुकी है.

अब से पहले भले ही कोई इन्हें पूछने वाला न हो, मगर जबसे उनके आईपीएस बनने की आहट हुई है, अचानक से रिश्तेदारों की आमद बढ़ गई है, इसलिए कुछ दिन से घर में खाना अच्छा बन रहा है.

इल्मा की कहानी में इतना दर्द है कि आपका कलेजा बाहर उछाल मारने की यक़ीनन कोशिश करेगा. इल्मा पेरिस, लंदन, न्यूयॉर्क और जकार्ता तक में पढ़ाई कर चुकी हैं. इनकी पढ़ाई ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी तक में हुई है. यूएन और क्लिंटन फॉउंडेशन के लिए भी काम किया है. बावजूद इसके इल्मा बिल्कुल साधारण कपड़े पहनती हैं और साधारण तरीक़े से ही रहती हैं.

अद्भुत प्रतिभा की मालकिन इल्मा हिम्मत न हारने की मिसाल हैं. अपने जीवन के संघर्षों को बताते हुए बिल्कुल हिचकती नहीं हैं.

वो कहती हैं, 9वीं में सबकुछ ठीक था. उसके बाद अब्बू नहीं रहे. मैं तब 14 साल की थी. भाई 12 का था. अब्बू मेरे बाल में कंघी करते थे. मैंने बाल ही कटवा दिए. उनकी जगह खेती संभाल ली. अब सवाल पढ़ाई का था. पहले 12वीं तक पढ़ाई स्कॉलरशिप के आधार पर हुई. फिर दिल्ली स्टीफ़न कॉलेज में दाख़िला मिल गया. वहां भी स्कॉलरशिप से पढ़ी. इसके बाद पेरिस, न्यूयॉर्क, ऑक्सफोर्ड सब जगह स्कॉलरशिप मिलती रही और मैं पढ़ती रही.

वो आगे कहती हैं कि, स्कॉलरशिप से मेरी पढ़ाई तो हो रही थी. लेकिन खुद का खर्च चलाना मुश्किल काम था. इसके लिए मैंने लोगों के घरों में काम किया. बर्तन साफ़ किए. झाड़ू-पोछा किया. बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया.

इल्मा कहती हैं कि, पिछले साल अपने भाई के कहने पर मैंने सिविल सर्विस का एक्ज़ाम दिया. पहले मैं आईएएस बनना चाहती थी, मगर मुझे लगा कि मेरे लिए आईपीएस होना ज़्यादा ज़रूरी है.

बेहद प्रतिकूल परिस्थितियों में हौसलों की मिसाल लिखने वाली इल्मा खेत में पानी चलाने, गेंहू काटने, जानवरों का चारा बनाने जैसे काम भी करती रही हैं.

इल्मा कहती हैं, लोग कहते थे लौंडिया है, क्या कर लेगी. अब कर दिया लौंडिया ने. मगर मेरी ज़िन्दगी में मुस्क़ान नाम की चीज़ अब आई है.

इल्मा के आईपीएस बनने के बाद स्थानीय लड़कियों में ज़बरदस्त क्रेज पैदा हो गया है. वो इल्मा से मिलने आती हैं. पिछले 3 दिन से उन्हें लगातार स्कूल कॉलेज में बोलने के लिए बुलाया जा रहा है.

इल्मा बताती हैं, डिबेट तो मेरी ज़िन्दगी का अहम हिस्सा रही है. दिल्ली में डिबेट में प्राईज मनी के तौर पर जो पैसा मिलता था, उसी से मेरा ख़र्च चलता था. उस पैसे के लिए मुझे हर हाल में जीतना होता था. लेकिन अब बोलने के पैसे नहीं मिल रहे हैं, तसल्ली मिल रही है.

कुंदरकी के नबील अहमद (45) इल्मा की कामयाबी को चमत्कार मानते हैं. वो हमसे कहते हैं, अब तक कुंदरकी को विश्वास ही नहीं हो रहा है, यह कैसे हो गया. जिस दिन इल्मा नीली बत्ती में वर्दी पहने गांव में आएगी, उस दिन कुंदरकी झूम उठेगी. इस लड़की ने वाक़ई कमाल कर दिया है.

मगर इल्मा की मां सुहेला अफ़रोज़ अभी से झूम रही हैं. वो कहती हैं, मेरी बेटी ने बहुत तकलीफ़ झेली है, उसका रब खुश हो गया है ।
साकिर चाैधरी की फेसबुक बॉल से साभार

रविवार, 9 सितंबर 2018

कोरा कागज से कलाकार तक का सफर- शकीला शेख


शकीला शेख कोलकाता से 30 किलोमीटर दूरी पर 24 परगना जिले के सूरजपुर गांव में रहती हैं। वह अपना एक प्राइवेट स्टूडियो चलाती हैं जहां वे अपनी कलाकारी करती रहती हैं। अपने कॉलाज आर्ट के लिए दुनियाभर में प्रसिद्धि हासिल कर चुकीं शकीला एक गृहिणी भी हैं। उनकी कला को भारत के अलावा अमेरिका, यूरोप, नॉर्वे, फ्रांस में सराहा जा चुका है। एक सब्जी बेचने वाली मां की बेटी शकीला ने 1990 में अपना पहला एग्जिबिशन लगाया था जिसमें उन्हें 90,000 रुपये मिले थे।

शकीला का बचपन अभावों और मुश्किल हालात में बीता। अपने 6 भाई बहनों में वह सबसे छोटी थीं। जब वे महज एक साल की थीं तो उनके पिता उन्हें छोड़कर घर से चले गए। इसके बाद घर चलाने की जिम्मेदारी उनकी मां जेहरान बीबी पर आ गई। जेहरान हर रोज मोगराघाट से 40 किलोमीटर दूर तालताला मार्केट सब्जी बेचने जाती थीं। अपने बचपन को याद करते हुए शकीला ने #मैंअपराजिता को बताया कि वह काफी छोटी थीं इसलिए उनकी मां उन्हें काम नहीं करवाती थीं। हालांकि वह उन्हें घुमाने के लिए शहर जरूर ले जाती थीं।
वह बताती हैं, 'जब मेरी मां मुझे घुमाने ले जाती थीं तो सड़कों पर चल रहीं ट्रॉम और बस देखकर मुझे काफी खुशी होती थी। जब मेरी मां सब्जी बेच रही होतीं तो मैं उनके बगल में ही सो जाती।' कला के क्षेत्र में आने के बारे में वह कहती हैं कि यह शहर में ही रहने वाले बलदेव राज पनेसर की बदौलत संभव हो पाया जो कि एक सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी और एक कलाकार भी हैं। वे सब्जी लेने के लिए शकीला की मां की दुकान पर आया करते थे और खाली समय मिलने पर आसपास के बच्चों को खाने पीने की चीजें बांटा करते थे। सारे बच्चे उन्हें डिंबाबू कहकर बुलाते थे।

शकीला कहती हैं, 'बाबा मुझसे काफी प्रभावित हुए उन्होंने मेरा नाम स्कूल में लिखवाया। मैं तोलता में कक्षा 3 तक पढ़ी लेकिन इसके लिए मुझे काफी दूर का सफर करना पड़ता था। इतनी दूर का सफर करना उस वक्त किसी लड़की के लिए सुरक्षित नहीं था इसलिए बाबा ने मुझे गांव में ही पढ़ाने का फैसला किया।' हालांकि शकीला की मां हमेशा चिंता में रहती थीं क्योंकि उन्हें लगता था कि उनकी बेटी के साथ कहीं कुछ गलत न हो जाए।

12 वर्ष की उम्र में उनकी शादी करवा दी गई। उनके पति का नाम अकबर शेख है। शकीला की हालत खराब हो चली थी इसलिए उन्होंने फिर से बाबा से संपर्क किया। उन्होंने शकीला को कागज के थैले बनाने का आइडिया दिया। शकीला बलदेव राज की कलाकारी से काफी प्रभावित थीं और ऐसे ही उन्होंने अपना पहला कोलाज बनाया, जिसमें सब्जियां और फलों का प्रतिरूपण था। इसे काफी सराहना मिली और फिर 1991 में उन्होंने अपना पहला कोलाज एग्जिबिशन लगाया।

शकीला को इससे 70,000 रुपये मिले जो कि उस वक्त के हिसाब से काफी बड़ी रकम थी। इससे शकीला के घर की हालत तो सुधरी ही साथ ही उन्होंने आर्ट पर ही अपना ध्यान केंद्रित किया। उन्हें बीआर पनेसर से काफी मदद मिली। पनेसर ने शकीला को सेंटर ऑफ इंटरनेशनल मॉडर्न आर्ट से रूबरू करवाया। यह आर्ट गैलरी अब शकीला के काम को मैनेज करती है और उनकी कलाकृतियों को विदेशों में बेचने का काम भी करती है। शकीला को ललित कला अकादमी, पश्चिम बंगाल आर्ट अकादमी समेत कई सारे अवॉर्ड मिल चुके हैं।
mainaparajita@gmail.com

रविवार, 2 सितंबर 2018

मैं पुरुष नहीं हूं, औरत हूं- उड़न परी दुती चंद

आज जिस दुती चंद काे हम उड़नपरी के नाम से जान रहे हैं क्या आपकाे मालूम है कि उनकाे यहां तक पहुंचने से पहले किन किन आराेपाें का सामना करना पड़ा। ईएएएफ ने दुती के शरीर में हाइपरैंड्रोजेनिज्म की अधिक मात्रा में पाए जाने के चलते उनपर प्रतिबंध लगा दिया था। यह हार्मोन पुरुषों वाले गुण विकसित करता है। जिसके कारण दुती पर पुरुष होने का आरोप लगाया गया था। प्रतिबंध के खिलाफ भारतीय धाविका दुती ने कैश में अपील दायर की थी। जिसके बाद कैस ने आईएएफ के नियमों के खिलाफ दुती की अपील को आंशिक तौर पर सही पाया। कैस ने हाइपरैंड्रोजेनिज्म नियम को निलंबित किए जाने के बाद दुती को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक्स प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने की छूट दे दी।

मेडिकल भाषा हाइपरैंड्रोजेनिज्म में वह स्थिति है जब शरीर में एंड्रोजेनिज्म हार्मोस की मात्रा बढ़ जाती है। यह हार्मोन ही इंसान में पुरुषों वाले गुण विकसित करता है। सबसे कॉमन एंड्रोजेनिज्म हार्मोन टेस्टोस्टेरोन है। दुती के शरीर में इस हार्मोन की मात्रा ज्यादा पाई गई थी। ऐसा हार्मोन की वजह से होता है और महिला में सामान्य से अधिक टेस्टोस्टेरोन बनता है। इसके बाद दुती ने आईएएएफ के लिंग परीक्षण से जुड़े नियम के खिलाफ कैस में अपील की थी।

दुती ने आईएएएफ के फैसले को कैस में चुनौती दी और फैसला भी इस एथलीट के पक्ष में आया। कैस ने कहा कि हार्मोन की वजह से किसी महिला में सामान्य से अधिक मात्रा में टेस्टोस्टेरान बनता है तो ऐसे में उसे पुरुष करार देना गलत है।

कैस से राहत मिलने के बाद इस प्रतिभावान एथलीट ने अपना अगला लक्ष्य रियो ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने का बनाया है। दुती कहती हैं कि, ”यह मेरे जीवन का सबसे खुशी का पल है। कोर्ट के निर्णय आने तक मैं नहीं जानती थी कि भविष्य में क्या होने वाला है। जैसे ही मुझे कैस के निर्णय के बारे में पता चला मैंने बहुत राहत महसूस की। मुझे लगा कि अब मैं फिर अपनी पुरानी जिंदगी में लौट सकती हूं। प्रतिबंध के बाद ट्रैक से दूर रहना मेरे लिए बेहद मुश्किल दौर था। मेरा भविष्य अनिश्चित सा हो गया था लेकिन अब मुझे राहत है।



दुनिया के सबसे तेज धावक जमैका के उसैन बोल्ट को अपना आदर्श मानने वाली दुती चंद का जन्म 3 फरवरी 1996 को ओडिशा के चक्र गोपालपुर गांव के एक गरीब जुलाहे के यहां हुआ। 19 वर्षीय दुती पहली बार तब सुर्खियों में आयी जब 2012 में इस धाविका ने राष्ट्रीय चैंपियनशिप के अंडर-18 वर्ग में महज 11.8 सेकेंड में 100 मीटर की दूरी तय कर ली। इसके बाद दुती ने पुणो में आयोजित एशियन चैंपियनशिप में 200 मीटर का फासला 23.811 सेकेंड में तय कर ब्रांज मेडल जीता। इसी साल दुती ग्लोबल एथलेटिक्स की फर्राटा रेस के फाइनल्स में स्थान बनाने वाली पहली भारतीय महिला एथलीट बनीं। 2013 में वह भारतीय एथलीट वल्र्ड यूथ चैंपियनशिप के 100 मीटर रेस के फाइनल्स में पहुंचने में सफल रही। इसी साल दुती ने रांची में आयोजित सीनियर राष्ट्रीय एथलेयिक्स चैंपियनशिप में 11.73 सेकेंड में 100 मीटर और 23.73 सेकेंड में 200 मीटर रेस जीतकर गोल्ड मेडल जीता था।

दुती चंद ने जकार्ता में चल रहे एशियाई खेलों में महिलाओं की 200 मीटर दौड़ और 100 मीटर में रजत पदक अपने नाम किया. वह इन दोनों स्पर्धाओं में बहरीन की एडिडियोंग ओडियोंग से पिछड़ गईं.दुती ने स्वदेश लौटने के बाद कहा, उनकी लंबाई थोड़ी कम जरूर है, लेकिन रफ्तार ज्यादा है. प्रशिक्षण में मैं इस चीज पर ध्यान दूंगी.'रजत पदक जीतने वाली फर्राटा धाविका दुती चंद ने का अगला लक्ष्य ओलंपिक खेलों में देश के लिए पदक जीतना है. एशियाई खेलों की व्यक्तिगत स्पर्धा में दो पदक जीतकर पीटी उषा, ज्योर्तिमय सिकदर जैसी एथलीटों की श्रेणी में शामिल होने वाली दुती ने कहा कि इस जीत के बाद अब वह और कड़ा अभ्यास करेंगी, ताकि ओलंपिक में पदक जीतने का सपना पूरा हो सके.

उन्होंने कहा, ‘इस साल अब कोई बड़ी प्रतियोगिता नहीं है और ओलंपिक के लिए मेरे पास दो साल का समय है. ओलंपिक से पहले अगले साल एशियाई चैंपियनशिप में भी भाग लेना है. इन दो वर्षों में मैं जी जान से अभ्यास करूंगी, ताकि देश का नाम ओलंपिक में भी ऊंचा कर सकूं.’ उन्होंने कहा, ‘मुझे कड़ा प्रशिक्षण करना है और उसके लिए जरूरी चीजें मुझे मुहैया कराई जा रही है, ऐसे में जाहिर है प्रदर्शन अच्छा होगा.’
दुती की इस सफलता पर राज्य सरकार ने उन्हें तीन करोड़ रुपये (एक पदक के लिए डेढ़ करोड़ रुपये) नकद पुरस्कार और अभ्यास तथा प्रशिक्षण का खर्च उठाने की घोषणा की है.उन्होंने कहा, ‘अब इस घोषणा के बाद मैं खुले दिमाग से अभ्यास कर सकूंगी.’

रविवार, 19 अगस्त 2018

गाेल्ड बनाने वाली महिला आखिर काैन है... डा. अनुजा भट्ट


भारतीय सिनेमा के इतिहास पर गौर करें तो पाएंगे कि पहले नाममात्र की कुछ महिला निर्देशक हुआ करती थीं। इनमें अपर्णा सेन और दीपा मेहता जैसी फिल्मकारों का नाम लिया जा सकता है। लेकिन आज इस लिस्ट में नई पीढ़ी की महिला फिल्मकारों की लिस्ट थोड़ी लंबी हो चुकी है। मेघना गुलजार, गाैरी शिंदे,जाेया अख्तर, काेंकणा सेन, अलंकृता श्रीवास्तव, गुरिंदर चढ्ढा केबाद ये गाेल्ड बनाने वाली महिला के बारे में आइए जानते हैं...


इन दिनाें हर जगह गाेल्ड फिल्म की चर्चा है।   एेसे में  हर काेई यह जानना चाहता है  कि आखिर गाेल्ड बनाने वाली यह महिला काैन है. इस महिला का नाम है रीमा कागती। इनका जन्म गुवाहटी, असम में हुआ था।उन्होंने मुंबई स्थित सोफिया कॉलेज से इंग्लिश लिट्रेचेर में स्नातक की डिग्री हासिल की है। साथ ही उन्होंने सोफिया कॉलेज से सोशल कम्युनिकेशन में परा-स्नातक की डिग्री ली है।
आज  रीमा कागती एक भारतीय फिल्म निर्देशक और स्क्रीनराइटर हैं। रीमा कागती ने अपने करियर की शुरुआत बतौर सहायक निर्देशक की। इस दौरान उन्होंने हिंदी सिनेमा के कई दिग्गज निर्देशकों के साथ काम किया, जिसमे फरहान अखतर(दिल चाहता है), आशुतोष गोविरकर (लगान)हनी इरानी (अरमान), मीरा नायर (वैनिटी फेयर) शामिल हैं।
  हिंदी सिनेमा में उन्हाेंने बताैर  निर्देशक फिल्म हनीमून ट्रेवल्स प्राइवेट लिमिटेड से डेब्यू किया था। इसके बाद रीमा ने फिल्म तलाश निर्देशित की, इस फिल्म में मुख्य भूमिका में आमिर खान, करीना कपूर और रानी मुखर्जी नजर आयीं थी, फिल्म बॉक्स-ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुई थी। वर्ष 2016 में रीमा ने फिल्म गोल्ड पर काम करना शुरू किया। फिल्म में मुख्य भूमिका में अक्षय कुमार, फरहान अख्तर, कुनाल कपूर और मौनी रॉय मुख्य भूमिका में हैं।फिल्म में खिलाड़ियों को हॉकी की ट्रेनिंग भारतीय हॉकी कप्तान संदीप सिंह द्वारा दी गयी है।





गुरुवार, 2 अगस्त 2018

अनुष्ठान में अब पंडिताइन ने दी दस्तक- मिलिए नंदनी भाैमिक से

हमारे पितृसत्तात्मक समाज में सारे अनुष्ठान के कार्य पुरुष पुजारी ही पूरा करवाते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि कोई महिला पुजारी शादी क्यों नहीं करवा सकती, महिला पंडित संस्कार संपन्न क्यों नहीं करवा सकती? अगर नहीं सोचा है तो सोच लीजिए कि समाज में ऐसी महिलाएं हैं जो पुरुष वर्चस्व को चुनौती देते हुए अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही हैं। कोलकाता की नंदिनी भौमिक उन्हीं महिलाओं में से एक हैं। वह कन्यादान और पिरी घोरानो जैसी रस्मों के बगैर ही शादी संपन्न करवाती हैं। नंदिनी पेशे से संस्कृत प्रोफेसर और ड्रामा आर्टिस्ट भी हैं। वह अपने काम से समाज की पितृसत्तात्मक सोच को चुनौती दे रही हैं।

ऐसा करने वाली वह पश्चिम बंगाल की पहली महिला पुजारी हैं। वह कहती हैं, 'मैं उस सोच से इत्तेफाक नहीं रखती जहां बेटी को धन समझा जाता है और शादी के वक्त उसे दान कर दिया जाता है। स्त्रियां भी पुरुषों की तरह ही इंसान हैं, इसलिए उन्हें वस्तु की तरह नहीं समझा जाना चाहिए।' नंदिनी जिस तरह से शादी संपन्न करवाती हैं वह बाकी बंगाली शादियों से बिलकुल अलग होता है। उन्होंने संस्कृत के कठिन श्लोकों को बंगाली और अंग्रेजी में पढ़ती हैं, ताकि दुल्हन और दूल्हा उसके मतलब समझ सकें। उनके द्वारा कराई जाने वाली शादी में बैकग्राउंड में रबींद्र संगीत बजता रहता

यह रबींद्र संगीत नंदिनी की टीम के लोग ही बजाते हैं। आमतौर पर शादी में पूरी रात बीत जाती है, लेकिन नंदिनी सिर्फ एक घंटे में ही शादी संपन्न करवा देती हैं। वह कहती हैं, 'मैं कन्यादान नहीं करवाती जिससे काफी समय बच जाता है। इसके अलावा मुझे यह परंपरा काफी पिछड़े सोच की भी लगती है।' अपने आप को समाज सुधारक मानने वाली नंदिनी की राह में थोड़ी मुश्किलें भी हैं। बंगाल में बढ़ते राजनीतिक हिंदुत्व के प्रभुत्व के बीच नंदिनी को कई तरह का डर भी सताता रहता है। वह कहती हैं, 'मैं बाकी पुजारियों का सम्मान करती हूं और मेरी उनसे कोई लड़ाई नहीं है। यद्यपि मेरे पति को कई बार खतरे का अहसास हुआ लेकिन मुझे अभी तक किसी भी तरह का डर नहीं लगा है।'

नंदिनी पिछले 10 सालों से इस काम को अंजाम दे रही हैं। वह अब तक 40 से भी ज्यादा शादियां करवा चुकी हैं। यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर होने की वजह से वह काफी व्यस्त रहती हैं। इसके अलावा वह कोलकाता के 10 थियेटर ग्रुप से भी जुड़ी हुई हैं। लेकिन इसके बावजूद वह शादी करवाने के लिए वक्त निकाल लेती हैं। उन्होंने कोलकाता और आसपास के इलाकों में कई अंतरजातीय, अंतरधार्मिक विवाह करवाए हैं।



नंदिनी का शादी कराने का यह तरीका युवाओं को काफी भा रहा है। बीते शनिवार को नंदिनी अपनी साथी पुजारी रूमा राय और रबींद्र संगीत गाने वाली सीमांती बनर्जी और पॉलमी चक्रबर्ती के साथ ऐसी ही एक शादी संपन्न करवाई। सोशल मीडिया पर भी नंदिनी की खूब चर्चा है। नंदिनी बताती हैं, 'मैंने कई सारे पंडितों को शादी के वक्त गलत मंत्र पढ़ते देखा है। इसलिए इन मंत्रों को मैंने बंगाली और अंग्रेजी में लिखा।' नंदिनी की दो बेटियां हैं। उन्होंने अपनी बेटी की शादी भी ऐसे ही संपन्न कराई। वह अपनी गुरु गौरी धर्मपाल को अपना प्रेरणास्रोच मानती हैं। जादवपुर यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाली भौमिक अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा अनाथालयों में दान कर देती हैं।

मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

खुद पढ़लिखकर बदली समाज की किस्मत



एक किताब ने जिंदगी बदल दी
सावित्रीबाई फूले का नाम समाज में लड़कियों को शिक्षा का अधिकार दिलाने, बहिष्कृत और निराश्रित महिलाओं को समानाधिकार दिलाने के लिए लिया जाता है।  भारतीय समाज में उनकी जिंदगी और उनका काम सामाजिक कल्याण और महिला सशक्तिकरण का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। वह देश की पहली महिला शिक्षिका बनीं।
सावित्रीबाई का जन्म महाराष्ट्र राज्य के एक छोटे से गांव नईगांव में हुआ।  बचपन से ही वह  महत्वाकांक्षी और जिज्ञासु प्रवृति की थी। सावित्रीबाई का विवाह सन् 1840 में 9 वर्ष की आयु में श्री ज्योतीराव फुले से हो गया और वह उनके साथ पुणे आ गईं।
 जब ज्योतिराव ने देखा कि सावित्रीबाई ने अपने पास एक किताब जो उन्हें क्रिशचन मिशिनरी ने दी थी वह बहुत संभालकर रखी हुई थी। यह सब देखकर ज्योतिराव को अहसास हुआ कि उनकी पत्नी को शिक्षा के प्रति असीम लगाव है। वह उनके सीखने की प्रबल इच्छा को देखकर बहुत खुश हुए और उन्हें पढ़ना-लिखना सिखाना शुरू किया। सावित्रीबाई ने अपनी टीचर ट्रेनिंग अहमदनगर और पुणे में की।  सन् 1847 में वह परीक्षा पास करके पूर्णतः शिक्षित शिक्षिका बन गई।
समाज में महिलाओं की दशा सुधारने को प्रतिबद्ध श्री ज्योतिराव फूले के साथ मिलकर सन् 1848 में लड़कियांे के लिए स्कूल खोला।  उनकी यह यात्रा आसान नहीं थी। इस वजह से उन्हें सोसाईटी में रोष और गालियांे का शिकार भी बनना पड़ा। इतना ही नहीं उन पर रास्ते में गोबर भी फेंका जाता। सावित्रीबाई बिना कुछ कहे अपने साथ रास्ते में एक साड़ी साथ रखती जिससे कि वह स्कूल जाकर अपने कपड़़े बदल सकें।  पर उन्होंने अपनी राह नहीं छोड़ी। सन् 1853 में सावित्रीबाई और ज्योतिराव ने आसपास के गावों में और स्कूल खोले।
देश में विधवा एंव निराश्रित महिलाओं की दुर्दशा देखकर उन्होंने सन् 1854 में उनके लिए एक शेल्टर होम खोला।  दस वर्ष तक लगातार संघर्ष करने के बाद उन्हांेने सन् 1864 में एक बड़ा शेल्टर होम खोला।  विधवा स्त्रियांे और बालिका वधुओं को उन्होंने अपने शेल्टर में आसरा दिया और साथ में उन्हें पढ़ाया।  उन्होंने एक विधवा स्त्री के पुत्र यशवंतराव  को गोद भी लिया।
निचली जाति के लोगों को ऊंची जाति के लोग गांव के कॉमन कुंए से पानी नहीं पीने देते थे।  इसके लिए ज्योतिराव और सावित्रीबाई ने अपने घर के पीछे उनके लिए कुंआ बनवाया जहां से वह लोग पानी ले सकते थे।  उनके इस कदम ने भी ऊंची जाति के समाज में बहुत रोष उत्पन्न हो गया। सत्यशोधक समाज नाम से श्री ज्योतिराव ने एक संस्था का निर्माण किया इसका मुख्य उद्देश्य समाज से भेदभाव को समाप्त करना था और सबके लिए समानाधिकार वाले समाज की स्थापना करना था। इस समानाधिकार की लड़ाई में सावित्रीबाई ने अपने पति का भरपूर सहयोग किया।
सन् 1873 में सावित्रीबाई ने सत्यशोधक विवाह की शुरूआत की जिसके तहत दंपत्ति समान अधिकार और समान शिक्षा की शपथ लेते थे।
उनके यह सभी प्रयास अनदेखे नहीं रहे।  सन् 1852 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें बेस्ट टीचर की उपाधि से सम्मानित किया।  सन् 1853 में शिक्षा के क्षेत्र में किए गए उनके प्रयासों के लिए उन्हें सम्मानित किया गया।
सन् 1890 में ज्योतिराव के निधन के बाद उन्हांेने सभी मान्यताओं को दरकिनार करते हुए उन्हें मुखग्नि थी। उन्होंने उनकी विरासत को आगे बढ़ाते हुए सत्यशोधक समाज की बागडोर संभाली।
सन् 1897 में महाराष्ट्र में एक बार बहुत भयानक प्लेग बीमारी फैली।  वह सिर्फ मूकदर्शक नहीं बनी बल्कि वह प्रभावित क्षेत्रों में लोगों की मदद करने के लिए चली गईं।  उन्होंने हदाप्सर, पुणे में एक क्लिनिक खोला।  जब वह एक 10 वर्षीय प्लेग से पीड़ित बच्चे को क्लीनिक ला रहीं थी तब वह भी इस बीमारी के किटाणु से संक्रमित हो गईं और 10 मार्च 1897 को उनका देहांत हो गया। उनकी पूरी जिंदगी महिलाओं के लिए प्रकाश का óोत थी।  उनका जीवन हमेशा उन महिलाओं को प्रेरणा देता रहेगा जोकि पिछड़े वर्ग की महिलाओं के लिए कुछ करना चाहती हैं।


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