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गुरुवार, 27 अगस्त 2026

महेश्वर: नर्मदा की लहरों में संस्कृति भी है और आधुनिकता भी





इतिहास, आध्यात्मिकता और कला का अनोखा संगम है महेश्वर, जहां इतिहास भी है, आध्यात्मिकता भी और कला  भी। 
नर्मदा नदी के पावन तट पर बसा यह शहर अपनी ऐतिहासिक इमारतों के साथ ही साथ दुनिया भर में प्रसिद्ध महेश्वरी साड़ियों के लिए भी जाना जाता है।

    कैसी है शहर की खुशबू
महेश्वर भारत के मध्य प्रदेश राज्य के खरगोन  जिले में स्थित है।  इंदौर शहर से लगभग 90 किलोमीटर दक्षिण और खरगोन जिला मुख्यालय से मात्र 56 किलोमीटर दूर है यह शहर। जिसके किनारे बहुत ही सुंदर और भव्य घाट है। पत्रकारिता के काेर्स के लिए जब मैं भोपाल गई तो वहां मेरे सहपाठियों में नीलेश तायल भी थे। वह मेरे साथ नवभारत टाइम्स में प्रशिक्षण के लिए भी आए। साथ काम करते हुए हम बहुत बार अपने घर को याद करते हैं। मैं उसे नैनीताल के बारे में बताती और वह खरगौन के बारे में। उसके पास अपने शहर की यादें थी और मेरे पास अपने शहर की।  उनसे ही जाना मैंने सबसे पहले खरगौन  के बारे में और उस शहर से आसपास की कथाओं के बारे में।
 कथाएं जो हमें जीवन देती हैं
 सहस्रार्जुन से अहिल्याबाई तक महेश्वर का इतिहास  बहुत दिलचस्प लगा मुझे ।  पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह शहर हयवंशी राजा सहस्रार्जुन की राजधानी था। कहा जाता है कि सहस्रार्जुन ने रावण तक को पराजित कर दिया था। बाद में ऋषि जमदग्नि को प्रताड़ित करने के कारण भगवान परशुराम ने सहस्रार्जुन का वध यहीं किया था। शंकराचार्य और पंडित मण्डन मिश्र का विश्व प्रसिद्ध और ऐतिहासिक शास्त्रार्थ इसी पावन भूमि पर हुआ था।
बहुत बाद में यह शहर मराठा साम्राज्य की महान, न्यायप्रिय और कला-प्रेमी शासिका देवी अहिल्याबाई होल्कर की राजधानी बना। उन्होंने ही महेश्वर को अपनी संस्कृति और कला का मुख्य केंद्र बनाया।
आज महेश्वरी साड़ी महिलाओं की पहली पसंद बनी हुई है, आज मैं आपको इसके इतिहास के बारे में बताती हूं। 
सन 1767 के आसपास, रानी अहिल्याबाई होल्कर ने मालवा और सूरत से विशेष शिल्पकारों और बुनकरों को महेश्वर बुलाया। उन्होंने कारीगरों को 9 गज की एक विशेष साड़ी बनाने का आदेश दिया, जिसकी डिजाइन उन्होंने खुद तैयार की थी।
शुरुआत में ये साड़ियाँ केवल शाही मेहमानों और रिश्तेदारों को उपहार में दी जाती थी  लेकिन बाद में रानी को लगा कि यह एक कुटीर उद्योग हो सकता है और इससे  हज़ारों परिवारों को रोज़गार दिया जा सकता है।
महेश्वरी साड़ी की खासियत क्या है?
किलों और घाटों से प्रेरित बॉर्डर: महेश्वरी साड़ियों के बॉर्डर पर बनी डिज़ाइनें महेश्वर के किले की दीवारों, ईंटों और नर्मदा नदी के घाटों की नक्काशी से प्रेरित होती हैं।
चटाई बॉर्डर: चटाई के पैटर्न के अनुसार  बुना गया बॉर्डर।
चमेली बूटा: चमेली के सुंदर फूलों का पैटर्न।
ईंट बॉर्डर: किले की दीवारों की ईंटों जैसी ज्यामितीय (geometric) बनावट।
हीरा बॉर्डर: हीरे के आकार की बारीक डिज़ाइन्स।
रीवर्सिबल बॉर्डर (बुगड़ी बॉर्डर): यह  साड़ी की सबसे अनोखी बात है। इसका बॉर्डर दोनों तरफ एक जैसा होता है, यानी आप इसे सीधा या उल्टा, दोनों तरफ से पहन सकती हैं।
विशिष्ट पल्लू डिज़ाइन: इसके पल्लू में 5 पट्टियाँ होती हैं (3 रंगीन और 2 जरी की लाइनें), जो इसे बहुत ही क्लासी लुक देती हैं।
बॉडी पैटर्न्स: साड़ी का बीच का हिस्सा या तो सादा होता है या फिर उसमें 'चांदतारा' (छोटे चांद-तारे) या महीन धारियां और चेक (घारड़ी) बने होते हैं।
कैटेगिरी - चंद्रकला, बैंगनी चंद्रकला, चंद्रतारा, बेली और पारबी।
फैब्रिक और रंग पारंपरिक रूप से महेश्वरी साड़ियों में केवल लाल, मैरून, काले, हरे और बैंगनी जैसे गहरे रंगों का ही इस्तेमाल होता था। लेकिन आज के मॉडर्न फैशन के साथ इसमें लाइट पेस्टल कलर्स और सोने-चांदी के धागों (Zari) का बेहद खूबसूरत कॉम्बिनेशन मिलने लगा है।
सिल्क और कॉटन (Silk-Cotton) के बेहतरीन ब्लेंड और बेहद हल्के वजन के कारण यह साड़ी हर मौसम के लिए आरामदायक है। आप इसे किसी कैज़ुअल आउटिंग से लेकर शादी-पार्टी जैसे फॉर्मल इवेंट्स में भी शान से कैरी कर सकती हैं।
साड़ी देखभाल भी मांगती है
चूंकि यह एक प्रीमियम हैंडलूम साड़ी है, इसलिए इसके रखरखाव पर थोड़ा ध्यान देना ज़रूरी है: साड़ी को पहली बार हमेशा ड्राई क्लीन (Dry Clean) के लिए ही भेजें। इसके बाद आप इसे घर पर किसी माइल्ड डिटर्जेंट के साथ हाथों से धो सकती हैं। इन साड़ियों को धोने के लिए हमेशा ठंडे पानी का ही इस्तेमाल करें, गर्म पानी से इसके धागे खराब हो सकते हैं।

इस तरह हमने जाना महेश्वर सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास और टेक्सटाइल आर्ट का जीता-जागता संग्रहालय है। यहाँ के राजराजेश्वर मंदिर, अहिल्याेश्वर मंदिर, और नर्मदा के घाट मन को शांति देते हैं, तो वहीं यहाँ की साड़ियाँ भारत की समृद्ध कला का अहसास कराती हैं। 

सोमवार, 17 अगस्त 2026

चंदेरी: शिशुपाल के साम्राज्य से आधुनिक रैंप तक का सफर- डा. अनुजा भट्ट

महाभारत की वह पौराणिक कथा तो आपने सुनी ही होगी, जो चेदिराज शिशुपाल और भगवान श्रीकृष्ण के प्रसंग के बिना अधूरी है। आज जिस चंदेरी को हम दुनिया भर में इसके वैभवशाली फैशन और पर्यटन के लिए जानते हैं, वह कभी महाभारत काल में चेदि राज्य के राजा शिशुपाल की राजधानी 'शुक्तिमती' थी।

इतिहास और भूगोल का संगम

इस प्राचीन साम्राज्य की भौगोलिक सुंदरता को तराशने का काम करती थी यहाँ की जीवनदायिनी 'केन नदी'। आज की केन नदी को प्राचीन समय में कर्णावत, श्वेनी, कैनास और शुक्तिमति जैसे खूबसूरत नामों से जाना जाता था। मध्य प्रदेश के कटनी ज़िले में विंध्याचल की कैमूर पर्वतमाला से निकलने वाली यह नदी पन्ना के जंगलों से कई धाराओं को समेटती हुई, अंत में उत्तर प्रदेश के बांदा ज़िले में यमुना नदी में जाकर मिल जाती है।शिशुपाल की वही ऐतिहासिक राजधानी 'चंदेरी' आज भी भारत के मानचित्र पर एक गौरवशाली स्थान रखती है। लेकिन इतिहास के पन्नों से निकलकर मेरा मन तो शिशुपाल की उस पौराणिक कथा पर अटक सा गया है, जहाँ से इस शहर की किस्मत की बुनावट शुरू हुई थी। चलिए, इतिहास और भूगोल के इस ताने-बाने के बीच, मेरे साथ सुनिए शिशुपाल की अमर गाथा...

नियति का ताना-बाना: एक विचित्र जन्म और आकाशवाणी
रिश्तों के ताने-बाने को देखें तो शिशुपाल भगवान श्रीकृष्ण की बुआ (वासुदेव जी की बहन) और चेदिराज दमघोष का पुत्र था। इस नाते वह रिश्ते में कौरवों और पांडवों का भाई भी लगता था। लेकिन शिशुपाल का जन्म आम बच्चों जैसा नहीं, बल्कि अत्यंत विचित्र और अलौकिक था। जब उसने आँखें खोलीं, तो उसके तीन नेत्र और चार हाथ थे। अपने नवजात शिशु के इस डरावने और असामान्य रूप को देखकर माता-पिता गहरे असमंजस और चिंता में डूब गए। लोक-लाज और भय के कारण उन्होंने भारी मन से इस विचित्र बालक को त्यागने का फैसला कर लिया।
लेकिन नियति को तो कुछ और ही मंजूर था। जैसे ही वे उसे त्यागने बढ़े, तभी एक गूंजती हुई आकाशवाणी हुई—"इस बालक का त्याग मत करो। जब सही समय आएगा, तो इसके ये अतिरिक्त हाथ और आँख अपने आप गायब हो जाएंगे।" मगर इस दिलासे के साथ ही आकाशवाणी ने एक खौफनाक भविष्यवाणी भी कर दी। उसने चेताया कि—"जिस व्यक्ति की गोद में बैठते ही इस बच्चे के अतिरिक्त अंग गायब होंगे, वही व्यक्ति भविष्य में इसका काल (मृत्यु का कारण) बनेगा।"
रिश्तों की बुनावट: 100 अपराधों का दान और सुलगती दुश्मनी
समय का चक्र बीता और एक दिन भगवान श्रीकृष्ण अपनी बुआ के घर चेदी नगरी आए। वहाँ आँगन में नन्हा शिशुपाल खेल रहा था। उसे देखकर श्रीकृष्ण के मन में अगाध स्नेह जागा और उन्होंने मुस्कुराते हुए उस बालक को अपनी गोद में उठा लिया। गोद का स्पर्श पाते ही एक चमत्कार हुआ—शिशुपाल की वह अतिरिक्त तीसरी आँख और दोनों हाथ पल भर में ओझल हो गए।
इस अलौकिक दृश्य को देखकर शिशुपाल के माता-पिता के चेहरे का रंग उड़ गया; उन्हें वह खौफनाक आकाशवाणी याद आ गई कि श्रीकृष्ण ही उनके बेटे का काल हैं। भय से काँपती माँ ने तुरंत श्रीकृष्ण से अपने पुत्र के जीवन की भीख माँगी। अपनी बुआ को गहरा दुःख न देते हुए और विधि के अटूट विधान का सम्मान करते हुए, श्रीकृष्ण ने एक अभूतपूर्व वचन दिया। उन्होंने कहा—"बुआ, मैं शिशुपाल की सौ (100) गलतियों को पूरी तरह क्षमा कर दूँगा, लेकिन याद रहे, 101वाँ अपराध होते ही उसे अपने कर्मों का दंड भोगना होगा।"
प्रेम, प्रतिशोध और राजसूय यज्ञ का मंच
यही शिशुपाल बड़ा होकर विदर्भ देश की राजकुमारी रुक्मिणी से विवाह का स्वप्न देख रहा था। लेकिन इस कहानी में एक और खूबसूरत मोड़ था; रुक्मिणी मन ही मन द्वारकाधीश श्रीकृष्ण को अपना सर्वस्व मान चुकी थीं। रुक्मिणी के भाई, राजकुमार रुक्मी को श्रीकृष्ण का यह रिश्ता स्वीकार नहीं था और वह अपनी बहन की शादी जबरन शिशुपाल से कराना चाहता था। जब प्रेम पर संकट आया, तो श्रीकृष्ण रुक्मिणी की पुकार पर स्वयं विदर्भ पहुँचे और उन्हें उनके ही महल से ससम्मान अपने रथ पर ले आए।
अपनी होने वाली वधू का इस तरह जाना शिशुपाल के अहंकार पर सबसे गहरी चोट थी। इस घटना ने उसके मन में श्रीकृष्ण के प्रति ईर्ष्या और शत्रुता की ऐसी आग सुलगा दी जो कभी ठंडी नहीं हुई। इसी सुलगते प्रतिशोध के बीच, जब हस्तिनापुर में युधिष्ठिर को युवराज घोषित किया गया और इंद्रप्रस्थ में भव्य 'राजसूय यज्ञ' का आयोजन हुआ, तो देश-विदेश के प्रतापी राजाओं को आमंत्रित किया गया। इस ऐतिहासिक और भव्य आयोजन के गवाह बनने के लिए वासुदेव, श्रीकृष्ण और चेदिराज शिशुपाल भी एक ही छत के नीचे एकत्रित हुए, जहाँ नियति अपना अंतिम खेल रचने वाली थी...
अंतिम न्याय: सुदर्शन चक्र और अहंकार का अंत
राजसूय यज्ञ के उस भव्य और गरिमय मंच पर आखिरकार शिशुपाल का सामना भगवान श्रीकृष्ण से हो गया। यज्ञ की परंपरा के अनुसार, जब महाराज युधिष्ठिर ने अग्रपूजा के लिए श्रीकृष्ण का सर्वोच्च आदर-सत्कार किया, तो सभा में बैठे शिशुपाल के भीतर सुलग रही ईर्ष्या की आग भड़क उठी। श्रीकृष्ण को मिला यह सम्मान उसके अहंकार को बर्दाश्त नहीं हुआ और वह भरी सभा में सबके सामने मर्यादा की सारी सीमाएं लांघकर भगवान श्रीकृष्ण को कटु वचन और गालियाँ देने लगा।
पूरी सभा सन्न थी, लेकिन द्वारकाधीश श्रीकृष्ण के चेहरे पर एक असीम शांति थी; वे शांत मन से आयोजन को देखते रहे। शिशुपाल इसे श्रीकृष्ण की कमजोरी समझ बैठा और लगातार उनका घोर अपमान करता रहा। श्रीकृष्ण अपनी बुआ को दिए उस 'सौ अपराधों' के वचन से बंधे थे, इसलिए वे शांत रहकर एक-एक करके उसकी गलतियों को सहते रहे और मन ही मन उसकी गिनती करते रहे।
जैसे ही शिशुपाल के मुख से सौ (100) अपशब्द पूरे हुए और उसके अहंकार ने सीमा पार करते हुए 101वाँ अपशब्द निकाला, वैसे ही क्षमा का समय समाप्त हो गया। श्रीकृष्ण की उंगली से छूटा अलौकिक 'सुदर्शन चक्र' बिजली की गति से हवा में लहराया और पलक झपकते ही शिशुपाल की गर्दन धड़ से अलग हो गई। इस तरह, उस भव्य आयोजन के बीच चंदेरी के राजा शिशुपाल की कहानी और उसकी शत्रुता का हमेशा के लिए अंत हो गया।
साम्राज्यों की बिसात और जौहर की अमर गाथा
चंदेरी का अतीत सिर्फ महाभारत कालीन राजा शिशुपाल की कथा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह शहर सदियों तक महाशक्तियों की रणभूमि रहा है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो यहाँ की रणनीतिक स्थिति के कारण इस मिट्टी पर गुप्त, प्रतिहार, गुलाम, तुगलक, खिलजी, afghan, गौरी, राजपूत और सिंधिया सहित नौ बड़े राजवंशों ने शासन किया और अपनी संस्कृतियों की छाप छोड़ी।
यहाँ के इतिहास का सबसे शौर्यमयी और हृदयविदारक अध्याय तब लिखा गया, जब मुगल शासक बाबर ने चंदेरी पर आक्रमण किया। बाबर की फतह की खबर सुनते ही, चंदेरी के तत्कालीन राजपूत राजा मेदनी राय की पत्नी महारानी मणीमाला के नेतृत्व में 1,600 वीर क्षत्राणियों ने अपने सतीत्व और सम्मान की रक्षा के लिए एक साथ धधकती अग्नि में 'जौहर' कर लिया। चंदेरी के भव्य किले में स्थित जौहर कुंड के पत्थरों का बदला हुआ रंग आज भी उस महान बलिदान और वीरांगनाओं के रक्त-तर्पण की कहानी बयां करता है।
भव्य धरोहरें और पत्थरों पर उकेरा गया सौंदर्य
आज एक सैलानी के रूप में जब आप चंदेरी पहुँचते हैं, तो करीब 70 मीटर ऊँची पहाड़ी पर शान से खड़ा ऐतिहासिक चंदेरी का किला सबसे पहले पर्यटकों को अपनी ओर लुभाता है। इसके अलावा वास्तुकला के बेजोड़ नमूने जैसे कौशक महल, शांत परमेश्वर तालाब, रहस्यमयी बूढ़ी चंदेरी, शहजादी का रोजा (किला), ऐतिहासिक जामा मस्जिद, रामनगर महल, सिंहपुर महल, विशाल बत्तीसी बावड़ी और यहाँ का आधुनिक म्यूजियम इस शहर को जीवंत इतिहास का खुला पन्ना बना देते हैं।
थूबोन जी: 12वीं शताब्दी का आध्यात्मिक वैभव
चंदेरी के इस वस्त्र और ऐतिहासिक वैभव के बीच एक गहरा आध्यात्मिक कोना भी सुरक्षित है। चंदेरी से महज़ 22 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है—'अतिशय तीर्थ क्षेत्र थूबोन जी'। 12वीं शताब्दी में महान दानी पाड़ाशाह द्वारा निर्मित यह पवित्र जैन तीर्थ क्षेत्र अपने आँचल में 26 भव्य जैन मंदिरों का वैभव समेटे हुए है। पाड़ाशाह वही दूरदर्शी पुरुष थे जिन्होंने बजरंगगढ़, सिरोंजी और देवगढ़ के प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण करवाकर वहाँ भी मूर्तियों की प्रतिष्ठा कराई थी। थूबोन जी के इन शांत और अलौकिक मंदिरों में जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ से लेकर चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी तक की अत्यंत प्राचीन और चमत्कारी मूर्तियां विराजित हैं, जो यहाँ आने वाले हर मन को आत्मिक शांति से भर देते हैं।
भूगोल और प्रकृति का घेरा
शिशुपाल के उस गौरवशाली अतीत से निकलकर यदि हम आज के भौगोलिक ताने-बाने को देखें, तो चंदेरी शहर मध्य प्रदेश के अशोकनगर जिले की एक बेहद खूबसूरत तहसील है। चारों ओर से विंध्याचल की हरी-भरी पहाड़ियों से घिरा यह ऐतिहासिक शहर आज भी बेतवा नदी के दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में अपनी सुध-बुध खोए खड़ा है। आज जिसे हम बेतवा कहते हैं, प्राचीन काल में उसे 'वेत्रवती' नाम से पूजा जाता था। मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के कुम्हारागाँव से निकलने वाली और भोपाल, विदिशा, झाँसी, ललितपुर से होती हुई उत्तर प्रदेश में यमुना से मिलने वाली यह नदी सदियों से इस पूरे क्षेत्र के सौंदर्य और संस्कृति को सींचती आई है।
चंदेरी साड़ी: आठ सौ साल पुराना बुनावट का जादू
पहाड़ियों और नदियों के इस संगम के बीच, आज चंदेरी के कण-कण में हथकरघा (Handloom) का संगीत गूंजता है। यह शहर सदियों से अपने हाथ से बुनी अनूठी साड़ियों के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है, जिन्हें आज दुनिया 'चंदेरी साड़ियों' के नाम से जानती है। यहाँ आने वाले पर्यटक आज भी तंग गलियों के पारंपरिक घरों में बुनकरों को जादुई तरीके से ताने-बाने को बुनते देख सकते हैं और अपनी पसंद की साड़ियों की लाइव खरीदारी कर सकते हैं।
चंदेरी के इस वस्त्र-वैभव का इतिहास बेहद राजसी रहा है। एक दौर था जब पूरे मध्य भारत (मालवा, इंदौर, ग्वालियर, बांदा, गढ़ाकोटा, बानपुर, चरखारी, शाहगढ़, रायगढ़) में काशी की बनारसी साड़ियों का चलन बेहद कम था। उस समय ग्वालियर और इंदौर के राजघरानों की आभिजात्य (Elite) महिलाएं सिर्फ और सिर्फ चंदेरी की पारदर्शी, हल्की और चमकदार साड़ियाँ पहनना पसंद करती थीं। यहाँ तक कि स्वयं वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई भी चंदेरी साड़ियों की मुरीद थीं।
चंदेरी की शाही पगड़ी: राष्ट्रभक्ति और शहादत का ताज
लेकिन चंदेरी का हुनर सिर्फ साड़ियों तक सीमित नहीं था; इसकी सबसे बड़ी और हैरान कर देने वाली ख्याति यहाँ बनने वाली 'शाही पगड़ियों' में थी। पिछले 800 सालों से भारत के तमाम राज परिवारों के बीच चंदेरी की पगड़ी आकर्षण और मान-सम्मान का सबसे बड़ा केंद्र रही है। छत्रपति शाहूजी महाराज, ग्वालियर के महाराजा सिंधिया, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और वडोदरा के राजा सहित दक्षिण भारत एवं महाराष्ट्र के तमाम छोटी-बड़ी रियासतों के राजाओं के लिए विशेष पगड़ियाँ इसी चंदेरी की धरती पर तैयार की जाती थीं।
इन पगड़ियों को बनाने और ले जाने की कला भी किसी रहस्य से कम नहीं थी। राजाओं का एक विशेष, बेहद गोपनीय दस्ता कड़ी सुरक्षा और चाक-चौबंद व्यवस्था के बीच इन पगड़ियों को चंदेरी से राजा के महलों तक पहुँचाता था।
इस गौरवमयी इतिहास का सबसे भावुक और वीर प्रसंग भी इसी चंदेरी की पगड़ी से जुड़ा है। देशभक्ति की प्रतिमूर्ति रानी लक्ष्मीबाई चंदेरी की कला पर इतना अटूट विश्वास करती थीं कि वे अपनी एक खास सहेली को विशेष रूप से चंदेरी भेजकर शाही पगड़ी मँगवाती थीं। जब उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ इतिहास का सबसे भीषण युद्ध लड़ा और जब मातृभूमि की रक्षा करते हुए वे शहीद हुईं, तब भी अंग्रेजों की गोलियों और तलवारों के बीच उनके मस्तक को सुशोभित कर रहा था—चंदेरी के बुनकरों के हाथों से बना वही राजसी साफा, वही चंदेरी की पगड़ी...।
इतिहास के कैनवास पर बॉलीवुड का नया रंग
समय का पहिया घूमा और आज चंदेरी का यही रहस्यमयी और खूबसूरत मिजाज देश के सबसे बड़े फिल्म उद्योग यानी बॉलीवुड को भी अपना दीवाना बना रहा है। चंदेरी के प्राचीन मकान, ऐतिहासिक गलियाँ, किले और हथकरघा की आवाज अब दुनिया के सामने बड़े पर्दे पर चमक रही है। यहाँ 'स्त्री', 'सुई धागा' जैसी सुपरहिट फिल्मों के साथ-साथ कई बड़ी वेब सीरीज़ों की शूटिंग भी हो चुकी है। बॉलीवुड के इस ग्लैमर ने चंदेरी के पारंपरिक कपड़ों और पर्यटन को एक वैश्विक पहचान देने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है।
आधुनिक रैंप पर सदियों का गौरव: वैश्विक पहचान का नया दौर
शिशुपाल के पौराणिक साम्राज्य से शुरू हुआ चंदेरी का यह सफर आज दुनिया के सबसे बड़े फैशन रैंप और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुँच चुका है। सदियों पुराना यह ताना-बाना आज सिर्फ एक कपड़ा नहीं, बल्कि भारत की जीवित विरासत का सबसे चमकदार प्रतीक है।
आज देश-विदेश के बड़े-बड़े फैशन डिजाइनर्स चंदेरी सिल्क की इस पारंपरिक बुनावट को आधुनिक वेस्टर्न और इंडो-वेस्टर्न परिधानों के साथ जोड़कर वैश्विक मंचों पर पेश कर रहे हैं। अपनी हल्की बुनावट, राजसी चमक और पारदर्शी लुक के कारण चंदेरी सिल्क आज पेरिस, न्यूयॉर्क और मिलान जैसे अंतरराष्ट्रीय फैशन वीक्स में अपनी धाक जमा रहा है। आज जब कोई आधुनिक महिला या बॉलीवुड की हस्तियाँ गर्व से चंदेरी साड़ी या स्कार्फ पहनती हैं, तो वे अनजाने में ही सही, लेकिन राजा शिशुपाल के इतिहास, वीरांगना लक्ष्मीबाई के शौर्य और चंदेरी के बुनकरों की सदियों पुरानी तपस्या को अपने साथ जीवंत रखती हैं।
समय बदल गया, साम्राज्य बदल गए, लेकिन चंदेरी की हथकरघा की आवाज और उसकी राजसी चमक आज भी उतनी ही अमर है—जो कल भी राजाओं का मान थी और आज भी वैश्विक फैशन का गौरव है।
यात्रा की राह: मालवा-बुंदेलखंड की दहलीज पर बसा चंदेरी
मालवा और बुंदेलखंड की ऐतिहासिक सीमाओं पर स्थित चंदेरी शहर तक पहुँचना बेहद आसान और सुविधाजनक है। यह शहर न केवल मध्य प्रदेश के प्रमुख केंद्रों से सीधे जुड़ा है, बल्कि इसकी सीमाएं उत्तर प्रदेश को भी आपस में जोड़ती हैं।
यदि दूरियों के गणित को देखें, तो चंदेरी की भौगोलिक स्थिति कुछ इस प्रकार है:
    • ललितपुर रेलवे स्टेशन (उत्तर प्रदेश): चंदेरी के किले से महज़ 37 किमी (सबसे नज़दीकी और प्रमुख रेलवे लिंक)
    • भोपाल (मध्य प्रदेश की राजधानी): चंदेरी से करीब 210 किमी
    • ग्वालियर (ऐतिहासिक हवाई अड्डा और शहर): चंदेरी से लगभग 220 किमी
यदि आप देश के किसी भी कोने से चंदेरी आने का मन बना रहे हैं, तो सबसे सुगम रास्ता 'नई दिल्ली - भोपाल मुख्य रेलवे लाइन' है। पर्यटक ट्रेन के माध्यम से उत्तर प्रदेश के प्रमुख व्यापारिक शहर ललितपुर स्टेशन तक आ सकते हैं। ललितपुर से चंदेरी की दूरी महज़ 37 किलोमीटर है, जिसे स्थानीय बसों, टैक्सियों या निजी वाहनों के ज़रिए बेहद आसानी से और कम समय में तय किया जा सकता है।

मंगलवार, 20 अगस्त 2024

बगरू बागोरा में है रंगाे की बहार आप पहनेंगे बारबार-डॉ. अनुजा भट्ट

राजस्थानी रंग और फैशन का संग

 राजस्थान का एक छोटा सा गाँव बगरू जयपुर से 32 किलोमीटर पूर्व में स्थित है। यह ब्लाक प्रिंटिंग की अपनी पारंपरिक प्रक्रिया के लिए जाना जाता है। बगरू के 'छीपा' राजस्थान के सवाई माधोपुर, अलवर, झुंझुनू और सीकर जिलों से यहाँ आकर बसे और लगभग 300 साल पहले इसे अपना घर बना लिया। बगरू शब्द 'बागोरा' से लिया गया है, जो एक झील में एक द्वीप का नाम है । जहाँ मूल रूप से शहर बसाया गया था।

कम से कम 400 वर्षों से बगरू छीपा का घर रहा है - एक कबीला जिसका नाम या तो एक गुजराती शब्द से आया है जिसका अर्थ है "छपना" या नेपाली भाषा के दो शब्दों के संयोजन से आया है 'छी' यानी रंग चढ़ाना और 'पा' यानी थोड़ी देर धूप में रहना। जब आप यहां से गुजरते हैं तो आपको यह परिभाषा सही लगती है। जब आप छीपा मोहल्ला पहुंचते हैं ताे आप एक अलग तरह की भीनी भीनी खुशबू से राेमांचित हाेते हैं। यह खुशबू है कपड़ाें पर तारी हाे चुके रंगाें की। जी हां ,कपड़े की खुशबू से यहाँ की हवा सुर्ख होती है; जमीन और कंक्रीट की दीवारें अलग अलग रंगाें से सजी है जिसमें नारंगी, नीला और गुलाबी ज्यादा से है। यह दृश्य आपको बांध लेता है।

 आइए मिलते हैं विजेंद्र जी से। विजेंद्र, छीपा की इस सामुदायिक परंपरा को जारी रखे हुए है। पांचवीं पीढ़ी के डायर और मास्टर प्रिंटर, विजेंद्र जिनकाे सब प्यार से विजु बुलाते हैं बगरू टेक्सटाइल्स के संस्थापक हैं - एक कंपनी जो कपड़े रंगने और छपाई का व्यवसाय कई पीढ़ियाें से करती आई है। 2007 में अपने पिता की मृत्यु के बाद उन्हाेंने अपने पिता के काम काे संभाला। संभालते समय जाे बात सबसे पहले उनके जेहन में आई वह थी स्थानीय लाेगाें काे पलायन से कैसे राेका जाए। विजू ने स्थानीय परिवारों को रोजगार देने और राजस्थानी ब्लॉक प्रिंटिंग के लिए नया बाजार विकसित करने के लिए एक प्लान तैयार किया। इस प्लान में कई चीजाें काे शामिल किया गया।

सबसे पहले आसापास सागवान (सागौन), शीशम (भारतीय रोज़वुड) के पेड़ लगाए गए। इन पेड़ाें के लगाने की एक खास वजह भी थी। जैसा कि मैंने बताया यहां प्रिटिंग का काम हाेता है और इसके लिए ब्लाक का प्रयाेग किया जाता है। ब्लाक बनाने के लिए खास तरह की लकड़ी के प्रयाेग हाेता है और यह लकड़ी इन पेड़ों से ही मिलती है। किसी भी एक उद्याेग को विकसित करने के लिए उसके साथ और भी बहुत सारी जरूरतें होती हैं। कम से कम सोलह परिवार नियमित रूप से मास्टर प्रिंटर, खरीदार, ब्लॉक कार्वर, धोबीवालों (कपड़े धोने वाले लोगों) के रूप में काम करते हैं। बगरू टेक्सटाइल्स के मुनाफे का एक हिस्सा पूरे छीपा समुदाय के लिए सामुदायिक पहल करता है। ब्लॉक शॉप ने गाँव में फिर से संगठित होने, स्वास्थ्य क्लीनिकों को प्रायोजित करने, परिवारों के लिए फिल्टर पानी प्रदान करने के लिए अपना कार्यक्रम विकसित किया है।

वुडब्लॉक नक्काशी

छीपा प्रिंटर प्रिंट डिजाइन में रंगों और आकृतियों की संख्या के आधार पर कितने ब्लॉक बनाने है यह तय करता है। आम तौर पर, एक प्रिंटर पहले बैकग्राउंड ब्लॉक को स्टैम्प करता है, उसके बाद एक आउटलाइन ब्लॉक (रेख) होता है। औसतन, एक प्रिंटर को हाथ से मुद्रित कपड़े बनाने के लिए कम से कम 4 या 5 ब्लॉक की आवश्यकता होती है। एक ही ब्लॉक को तराशने और तैयार करने में एक या दो दिन का समय लग सकता है क्योंकि स्थानीय लकड़ियों का चयन और मसाला बनाना भी इसी प्रक्रिया में शामिल है। प्रत्येक पैटर्न डिजाइन के लिए ब्लॉक की भूमिका विशिष्ट है।

बगरू में, ब्लॉक बनाते समय सागवान (सागौन), शीशम (भारतीय रोज़वुड), या रोहिड़ा टीक या मारवाड़ टीक जैसी लकड़ियों का उपयोग करते हैं। शीशम की सापेक्ष कठोरता जटिल या विस्तृत रूपांकनों के अनुकूल होती है।
एक बार ब्लॉक के डिज़ाइन को कागज पर स्केच किया जाता है और ब्लॉक को आकार में काट दिया गया है, पैटर्न सीधे लकड़ी पर खींचा जाता है। कार्वर ड्रिल, छेनी, हथौड़े, नाखून से ब्लॉक पर पैटर्न को बनाता है। बगरू में किसी भी छपाई वाले के क्वार्टर में चले जाइए, आप अक्सर एक ही उपकरण देखेंगे: एक लंबी टेबल, ब्लॉक (निश्चित रूप से), और एक रोलिंग ट्रॉली जिसमें एक डाई ट्रे और कुछ अन्य आइटम होते हैं।

पारंपरिक बगरू प्रिंट क्रीम पृष्ठभूमि पर गहरे (या रंगीन) पैटर्न का उपयोग करते हैं। पैटर्न बनाने में, पुष्प, पशु और पक्षी के रूपों के साथ ज्यामितीय रूपों को अपनाया गया  है। ब्लॉक प्रिंटिंग तकनीक  में पैटर्न में व्यवस्थित रूप से
दोहराया जाता है।  इसे पुष्प बूटी कहते हैं। बगरू प्रिंट में आमतौर पर देखे जाने वाले बूटों में गैंदा, गुलाब, बादाम, कमल और बेल शामिल हैं। ये रूपांकन पूरे कपड़े पर अलग-अलग आकार और संयोजन में दिखाई देते हैं जिस पर उन्हें मुद्रित किया जाता है। अन्य डिज़ाइनों में छोटे जाली पैटर्न होते हैं, जो पुष्प रूपांकनों से बने होते हैं।
  आपको बताते चलूं कि बगरू टेक्सटाइल्स के फैब्रिक का उपयोग ब्लॉक शॉप, बीस्टी थ्रेड्स, मौली माहोन, पेनी सेज, और रेख एंड दत्ता जैसे अंतर्राष्ट्रीय ब्रांडों द्वारा किया गया है । भारतीय ब्लॉक प्रिंटिंग एक वैश्विक डिजाइन प्रवृत्ति के रूप में उभर रही है। वोग और न्यूयॉर्क टाइम्स में भी इसकी चर्चा हुई है।

मंगलवार, 6 अगस्त 2024

कन्हाई की लीला से सजी साड़ियां – डा. अनुजा भट्ट

पिछवाई साड़ी और कन्हाई की कहानी


भारत का एक मशहूर राज्य है राजस्थान। मैं यहां से कई तरह के संग्रह आपके लिए लाती हूं। इसी तरह भारत के हर राज्य की कला और कलाकार से जुड़ने का अवसर भी मुझे मिलता है। यह सारा काम काफी श्रमसाध्य है पर मुझे आनंद आता है। मुझे यहां कई कहानियां और किवदंतियां मिलती है। जैसे जैसे राह चलती हूं ईश्वर और फैशन की गलियां पुकारने लगती हैं। आप जब कभी राजस्थान गए होंगे तब आपने नाथद्वारा में श्रीनाथ मंदिर अवश्य देखा होगा। राजस्थान के नाथद्वारा में भगवान श्रीनाथ जी का मंदिर काफी लोकप्रिय जो है ।

श्रीनाथ जी मंदिर राजस्थान के राजसमंद जिले के नाथद्वारा शहर में स्थित है। यह उदयपुर से 50 किमी. और डबोक एयरपोर्ट से 58 किमी. दूरी पर स्थित है।

किंवदंती और इतिहास

श्रीनाथजी के स्वरूप या दिव्य रूप को स्वयं प्रकट कहा गया है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान कृष्ण की मूर्ति पत्थर से स्वयं प्रकट हैं और गोवर्धन पहाड़ियों से निकली हैं। ऐतिहासिक रूप से, श्रीनाथजी की मूर्ति की पूजा सबसे पहले मथुरा के पास गोवर्धन पहाड़ी पर की गई थी। मूर्ति को शुरू में मथुरा से यमुना नदी के किनारे 1672 ईस्वी में स्थानांतरित कर दिया गया था और लगभग छह महीने तक आगरा में रखा गया था, ताकि इसे सुरक्षित रखा जा सके। इसके बाद, मूर्ति को मुगल शासक औरंगजेब द्वारा किए गए बर्बर विनाश से बचाने के लिए रथ पर दक्षिण की ओर एक सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित कर दिया गया। जब मूर्ति गांव सिहाद या सिंहद में पहुंची, तो बैलगाड़ी के पहिये जिसमें मूर्ति को ले जाया जा रहा था, मिट्टी में धंस गए और आगे नहीं ले जाया जा सका। पुजारियों ने महसूस किया कि यही विशेष स्थान भगवान का चुना हुआ स्थान है और तदनुसार, मेवाड़ के तत्कालीन महाराणा राज सिंह के शासन और संरक्षण में एक मंदिर बनाया गया था। श्रीनाथजी मंदिर को 'श्रीनाथजी की हवेली' (हवेली) के रूप में भी जाना जाता है। मंदिर का निर्माण गोस्वामी दामोदर दास बैरागी ने 1672 में करवाया था।

मंदिर की मराठों द्वारा लूट

1802 में, मराठों ने नाथद्वारा पर चढ़ाई की और श्रीनाथजी मंदिर पर हमला किया। मराठा प्रमुख होल्कर ने मंदिर की संपत्ति के 3 लाख रुपये लूट लिए और पैसे वसूलने के लिए उसने मंदिर के कई पुजारियों को गिरफ्तार किया। मुख्य पुजारी (गोसाईं) दामोदर दास बैरागी ने मराठों के बुरे इरादे को महसूस करते हुए महाराणा को एक संदेश भेजा। श्रीनाथजी को मराठों से बचाने और देवता को मंदिर से बाहर निकालने के लिए महाराणा ने अपने कुछ खास लोगों को भेजा। वे श्रीनाथजी को अरावली की पहाड़ियों में मराठों से सुरक्षित स्थान घसियार ले गए। कोठारिया प्रमुख विजय सिंह चौहान को श्रीनाथजी की मूर्ति को बचाने के लिए मराठों से लड़ते हुए अपने आदमियों के साथ अपना जीवन देना पड़ा।

यह जानकारी कितनी रोमांचक है कि पिछवाई कला का विकास भी राजस्थान राज्य के औरंगाबाद गांव और नाथद्वारा में बनास नदी के तट पर अरावली पहाड़ियों में हुई । कलात्मक संदेश के जरिए पिछवाई का उद्देश्य अनपढ़ लोगों को कृष्ण की कहानियाँ सुनाना है। पिछवाई ' शब्द संस्कृत के शब्द ' पिच ' अर्थात पीछे और 'वाई' अर्थात लटकने से उत्पन्न हुआ है। ऐसा माना जाता है कि पिचवाई चित्रकला की उत्पत्ति लगभग 400 वर्ष पहले हुई थी। पिछवाई पेंटिंग प्राकृतिक रंगों का उपयोग करके सूती कपड़े पर बनाई गई बड़ी आकार की पेंटिंग हैं और भगवान श्रीनाथ जी की मूर्ति के पीछे उनकी लीलाओं को दर्शाने के लिए लटकाई जाती हैं। भगवान कृष्ण के जीवन के दृश्यों, विशेष रूप से उनके बचपन की शरारतों को दर्शाती हैं।

पिछवाई साड़ी एक प्रकार की पारंपरिक भारतीय साड़ी है जिसमें पिछवाई पेंटिंग से प्रेरित डिज़ाइन होते हैं। पिचवाई साड़ियाँ अपने जीवंत रंगों, विस्तृत कलाकृति और भगवान कृष्ण और हिंदू पौराणिक कथाओं से संबंधित विषयों के लिए जानी जाती हैं। ये साड़ियाँ अक्सर समृद्ध रेशम या सूती कपड़ों से बनाई जाती हैं और इन्हें हाथ से पेंट किए गए या हाथ से कढ़ाई किए गए बेहतरीन डिज़ाइनों से सजाया जाता है जो पिचवाई कला के सार को दर्शाते हैं। वे अपने सांस्कृतिक महत्व और दृश्य के कारण विशेष अवसरों, त्योहारों और शादियों के लिए लोकप्रिय हैं।

पिचवाई साड़ियाँ कला और फैशन का एक सुंदर मिश्रण हैं, जो भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित करती हैं। वे अपनी जटिल शिल्प कौशल के लिए जानी जाती हैं। पिचवाई पेंटिंग साड़ियों को उनकी सौंदर्य सुंदरता और सांस्कृतिक महत्व के लिए अत्यधिक माना जाता है। जो पिचवाई पेंटिंग में पाई जाने वाली जटिल और विस्तृत कलात्मकता से मिलते जुलते हैं। इन डिज़ाइनों में अक्सर भगवान कृष्ण, राधा और अन्य संबंधित आकृतियों के चित्रण के साथ-साथ मोर, गाय, कमल के फूल और हरे-भरे परिदृश्य जैसे तत्व शामिल होते हैं, जो सभी पिचवाई कला की विशेषता हैं। यह साड़ियां व उन लोगों द्वारा पसंद की जाती हैं जो पारंपरिक भारतीय कला रूपों और फैशन दोनों की सराहना करते हैं।

अगर आप कला प्रेमी है और इस तरह की साड़ी खरीदना चाहते हैं तो मुझसे संपर्क कर सकते हैं। 8826016792
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सोमवार, 29 जुलाई 2024

घर के सजाने के मेरे 5 मंत्र – डॉ. अनुजा भट्ट

घर सजाने के 5 मेरे मंत्र

मैं चाहती हूं मेरा घर मुझे हमेशा जीवंतता का अहसास कराएं। मैं खुद को प्रकृति के नजदीक रखना पसंद करती हूं। बहुत बार ये कर पाती हूं और बहुत बार असफल भी हो जाती हूं। पौधें सूख जाते हैं तो अच्छा नहीं लगता। इस बार इतनी गर्मी पड़ी कि मेरे लगाए पौधें सूख गए। फिर मैंने कुछ और प्रयोग किए।

आज जब ट्रेंड सेटर्स कहते हैं कि घर के अंदरूनी हिस्सों में फूलों की सजावट की वापसी हो रही है, तब मुझे हंसी आती है। मैं मानती हूं कि फूलों की सजावट कभी खत्म नहीं हुई या इसका आकर्षण कभी खत्म नहीं हुआ। समय-समय पर, फूलों ने घर की जगहों को जीवंत करने और उनमें नई जान डालने का मार्ग प्रशस्त किया है। चाहे वह एकल फूलों के गुच्छे हों, या अलग अलग फूलों के गुच्छे आपके घर को ताज़गी और नए रूप से सजाने के लिए उनके साथ बहुत कुछ कर सकते हैं।

अगर आपके पास ताजे फूल नहीं हैं ते आप घर की सजावट के लिए फ्लोरल प्रिंट और पैटर्न का इस्तेमाल कर सकती हैं। विंटेज फ्लोरल का आकर्षण अभी भी एक क्लासिक है और उन लोगों के बीच पसंदीदा है जो मिनिमलिस्टिक सजावट पसंद करते हैं। नए जमाने के, समकालीन फ्लोरल डेकोर में प्रिंट, मिक्स-मैच पैटर्न, शामिल है। मैं आपको यहाँ अपने रूचि और व्यक्तिगत शैली के अनुसार फ्लोरल प्रिंट से सजाने के पाँच शानदार तरीके बता रही हूं, ताकि आप अपने इंटीरियर को नए फ्लोरल मोटिफ, असंख्य रंगों और लुभावने प्रकृति-प्रेरित पैटर्न से सजा सकें।

1. फ्लोरल वॉलपेपर और वॉल आर्ट- फ्लोरल प्रिंट से किसी भी दीवार को नया रूप दिया जा सकता है। अगर आप विंटेज लुक की तलाश में हैं, तो आप अपनी दीवार के फ्लोरल प्रिंट वॉलपेपर का विकल्प चुन सकते हैं। आपके बिस्तर की पिछली दीवार फ्लोरल वॉलपेपर या फ्लोरल वॉल आर्ट के लिए आदर्श है। और, लिविंग स्पेस के लिए, आप अपनी पसंद और मूड के अनुसार कोने की दीवार या बीच की दीवार चुन सकते हैं। हालाँकि, जब आप फ्लोरल वॉलपेपर या वॉल आर्ट के लिए जा रहे हों, तो आपके द्वारा चुने गए रंग और पैटर्न आपके घर की सजावट और व्यक्तिगत पसंद के अनुरूप होने चाहिए। इसलिए, अगर आप गहरे रंग पसंद करने वाले व्यक्ति हैं, तो आप गहरे रंगों में बोल्ड फ्लोरल प्रिंट चुन सकते हैं। लेकिन, अगर आप मिनिमलिज्म में ज़्यादा रुचि रखते हैं, तो पेस्टल शेड्स ज़्यादा उपयुक्त रहेंगे।

2. फ्लोरल फर्निशिंग- फ्लोरल डेकोरेशन आइडियाज़ में, सबसे आसान और सुपर-किफ़ायती तरीका है फर्निशिंग। अगर आप फ्लोरल बेडरूम डेकोर के लिए जा रहे हैं, तो हैंड ब्लॉक प्रिंटेड फ्लोरल बेडशीट क्लासिक हैं जिन्हें आप बिल्कुल भी मिस नहीं कर सकते। आप रजाई, दोहर और दूसरे फ्लोरल लिनेन के साथ फ्लोरल टच को बढ़ा सकते हैं। लिविंग रूम और दूसरी जगहों के लिए, आप फ्लोरल कुशन कवर, टेबल रनर और मैट के साथ प्रयोग कर सकते हैं और यहां तक ​​कि अपने सोफ़ा सिटिंग एरिया में फ्लोरल रग का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। याद रहे फ्लोरल प्रिंट के प्रकार और आकार का चयन करते समय अपनी व्यक्तिगत पसंद न भूलें।

3. फ्लोरल फिक्सचर- अगर आप फ्लोरल प्रिंट और पैटर्न के साथ अपने घर की सजावट चाहते हैं, तो अपने अपहोल्स्ट्री, पर्दों और ब्लाइंड्स में फूलों की खूबसूरती को शामिल करने के कुछ तरीके बताती हूं। समकालीन आधुनिक फ्लोरल प्रिंट और पैटर्न के साथ, फ्लोरल सोफा सेट, डाइनिंग टेबल चेयर और पर्दों में बहुत सारे विकल्प उपलब्ध हैं। हालाँकि, यह फ्लोरल में एक स्थायी और दीर्घकालिक निवेश है, इसलिए आपको कुछ महत्वपूर्ण बातों को ध्यान में रखना चाहिए जैसे कि आप किस तरह के फ्लोरल प्रिंट का उपयोग करना चाहते हैं, कपड़े की स्थायित्व और अनुभव, रंग संयोजन आदि के बारे में गंभीरता से विचार करें।

4. फ्लोरल एक्सेसरीज़- छोटे-छोटे डेकोरेशन जिसमें फ्लोरल प्रिंट हो उनसे भी आप सजावट कर सकती हैं। उदाहरण के लिए, दीवार पर कुछ फूलों की पेंटिंग लगाने से फूलों को महसूस कर सकते हैं, लेकिन यह नियम हर जगह फिट नहीं होता। फूलों की लाइटिंग एक और एक्सेसरी है जो आपके घर की सजावट में एक नाजुक स्पर्श जोड़ देगी और आपके स्थान को जीवंत बना देगी। फूलों की टेबल एक्सेसरीज, मेटल आर्ट आइटम, मिरर, आदि, आपके लिविंग स्पेस में विंटेज फ्लोरल या कंटेम्पररी फ्लोरल एलिगेंस की सही मात्रा जोड़ सकते हैं।

5. कुछ असली फूलों को शामिल करें। अब, फूलों के साथ काम करने का सबसे आसान और ताज़ा तरीका है प्राकृतिक तरीके से काम करना। मेरा कहना है कि आपको केवल फूलों के प्रिंट और पैटर्न की आवश्यकता क्यों है, जब आप उन्हें असली में पा सकते हैं। है न? अपने घर की सजावट में अधिक पौधे शामिल करें और देखें कि यह आपके माहौल को जीवंत बनाने में कितना कमाल करते हैं। यह न केवल आपके घर को ताज़गी प्रदान करते हैं बल्कि इनडोर पौधे हवा को शुद्ध करने, मूड को आराम देने और तनाव को दूर करने का काम भी कर सकते हैं। कुछ इनडोर पौधों के अलावा, आप अपनी बालकनी, बगीचे या छत के बगीचे में कई तरह के फूल खिलने वाले पौधे भी लगा सकती हैं। मेरा विश्वास करें, वे आपके घर की शैली और आपके माहौल को और भी बेहतर बना देंगें। जीवन में निरंतर प्रयोग करें। मेरी आपको सलाह है घर की सजावट में चाहे वह फ्लोरल हो या कुछ और भी, नई चीजों को आजमाने से न डरें। आपको मेरा ब्लाद कैसा लगा यह जरूर बताइएगा। हमारे प्रोडक्ट के लिए हमारे फेसबुक समूह से भी जुड़िए। वहां ढेरों विकल्प आपका इंतजार कर रहे हैं।

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गुरुवार, 25 जुलाई 2024

निर्मला सीतारमन को पंसद है बनारसी साड़ी

 

देश की पहली महिला वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बजट के साथ ही अपने देश की संस्कृति और कला का भी प्रतिनिधित्व करती हैं। कला कारीगरी और फैशन के रूझान पर भी उनकी नजर उतनी ही सक्रिय है जितनी बजट पर।  निर्मला सीतारमण का वित्त मंत्री के रूप में ये लगातार सातवां बजट रहा है. हर बार उनकी साड़ी आकर्षण का केंद्र बनती है। इस बार उन्होंने बनारसी सिल्क  की ऑफ व्हाइट कलर की साड़ी पहनी जिसके साथ डार्क पर्पल कलर का ब्लाउज पहना है. जिसपर गोल्डन जरी का काम  है।

 दरअसल सीतारमन काे काशी और कांची दोनों जगह बहुत पसंद है। कार्यक्रम में शिरकत करते समय अधिक्तर वह साड़ी में ही नजर आती हैं। साड़ी पहनने का तरीका उनका एक जैसा ही रहता है।   बेहतरीन डिजाइन के कारण  बनारसी साड़ी उनकी पसंदीदा साड़ी है। साथ ही गर्मियों में बहुत कंफर्टेबल रहती है. इसकी पहचान इसके मुलायम और चमकदार सिल्क धागों से होती है. साड़ी के पल्लु के किनारों को छुने से इसकी पहचान आसानी से की जा सकती है।
बनारसी सिल्क साड़ी में क्या है खास?
बनारसी सिल्क साड़ी अट्रैक्टिव लुक देती है. साथ ही ये साड़ी तपती गर्मी के दौरान आराम भी देती है. बनारसी सिल्क साड़ी उत्तर-प्रदेश के बनारस, चंदौली, आजमगढ़, जौनपुर, मिर्जापुर और संत रविदास नगर जिले में बनाई जाती हैं. इसे बनाने के लिए कच्चा माल बनारस से आता है. कई साड़ियों को बनाने के लिए शुद्ध सोने की जरी का उपयोग किया जाता है. जिसके कारण उसकी कीमत बहुत बढ़ जाती है. लेकिन आजकल बाजार में नकली चमकदार जरी का काम की हुई साड़ी भी मिल जाती है.
बनारसी साड़ियों की एक और खासियत है कि ये भारतीय संस्कृति की पहचान और शान का प्रतीक मानी जाती है. बनारसी सिल्क साड़ियों का निर्माण उच्च गुणवत्ता और मजबूत कपड़े से होता है. इसे कारीगरों द्वारा हाथ से बनाया जाता है. इसमें कई तरह के माेटिफ और पैटर्न हाेते हैं। बूटी, बूटा, बेल, जाल, जंगला और कोनिया शामिल हैं.
बनारसी सिल्क साड़ी के प्रकार
बनारसी सिल्क बहुत तरह की होती है. जिसमें कॉटन बनारसी साड़ी, बनारसी सिल्क साड़ी, तुस्सर बनारसी साड़ी, काटन बनारसी साड़ी और ऑरंगजा बनारसी साड़ी शामिल है. हर एक साड़ी भी अपनी विशेषता होती है. कृपया हमारे फेसबुक समूह से जुड़े। खरीददारी करें।
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कलमकारी साड़ी और आपका स्टाइल- डॉ अनुजा भट्ट


जब भी हम साड़ी या कोई ड्रेस पहनते हैं ताे सबसे पहले यह सवाल जरूर आता है कि इसके साथ क्या अच्छा लगेगा। खासकर अगर आप काेई कलात्मक साड़ी पहन रही हाें ताे। आज मैं आपकाे कलमकारी साड़ी के साथ आप पर कौन सा स्टाइल जचेंगा इस पर बात करूंगी। सच कहूं तो कलमकारी साड़ी को स्टाइल करना एक मज़ेदार और रचनात्मक प्रक्रिया हो सकती है, क्योंकि ये साड़ियाँ एक्सेसरीज़ के लिए बहुत सारे विकल्प प्रदान करती हैं ।


 आभूषण: कलमकारी साड़ियाँ अक्सर काफी रंगीन और इसके डिजाइन बहुत सघन हाेते हैं इसलिए हलके आभूषण पहनें । आप लुक को पूरा करने के लिए छोटे झुमके या स्टड, एक साधारण हार और एक कंगन या चूड़ी पहन सकती हैं। वैकल्पिक रूप से, आप अपने पहनावे में झुमके या पारंपरिक दक्षिण भारतीय आभूषण भी पहन सकते हैं।

फुटवियर: कलमकारी साड़ी के साथ आप कई तरह के फुटवियर पहन सकती हैं। आजकल डिजाइनर जूतियां बहुत पसंद की जा रही हैं। इसमें राजस्थानी से लेकर पंजाबी तक के कई डिजाइन मिल जाते हैं। इसे माेजरी भी कहते हैं। इसके अलावा स्लाइडर में भी ट्रेंड में है। ज्यादातर फ्लैट-हील, बैकलेस और ओपने टो होते हैं. इस तरह की चप्पल पहनने में बेहद हल्की और दिखने में काफी अट्रैक्टिव होती हैं. स्लाइडर कैजुअल और अट्रैक्टिव लूक देने में मदद करते हैं. हील्स साड़ी काे खास बना देती है। हाई-हील होने के कारण इस तरह के फुटवियर आपको लंबा दिखाने में मदद करते हैं. हालांकि हील्स पहनने में उतने आरामदायक नहीं होते पर पहने जाने पर ये आपके आउटफिट को काफी खूबसूरत बना सकते हैं.

 मेकअप- आप ब्लश, न्यूट्रल लिप कलर और हलका आई मेकअप कर सकती हैं। मेकअप से पहले अपने चेहरे पर मॉइश्चराइजर जरूर लगाएं। इससे आपके चेहरे पर मेकअप का पर्फेक्ट लुक आता है। मॉइश्चराइजर से आपकी त्वचा सॉफ्ट और चमकदार भी बनती है। मॉइश्चराइजर लगाने से पहले चेहरे को पहले अच्छे से साफ जरूर करें। इसके बाद ही मेकअप के आगे के स्टेप्स अपनाएं।
दूसरे स्टेप में सही बेस का प्रयोग करना जरूरी है। इसके लिए आप लाइट फाउन्डेशन, सीसी या बीबीसी क्रीम का इस्तेमाल कर सकते हैं। आजकल मार्किट में इस तरह की कई क्रीम मौजूद है, जिसे लगाने पर एकदम नेचुरल लुक आता है। इसे अपने चेहरे पर ब्यूटी ब्लेंडर की मदद से लगा सकते हैं। ध्यान रहे कि अगर आप किसी गर्म या नमी वाली जगह पर रहती हैं तो हेवी फाउंडेशन का यूज करने से बचें। चेहरे पर हो रहे डार्क सर्कल्स, दाग-धब्बे या पिंपल्स को प्राइमर और कंसीलर लगाकर छुपाया जा सकता है। कंसीलर और प्राइमर को अपने स्किन के टोन से हल्का लाइटर लें। अगर आप किसी ऐसी जगह जा रहे हैं जहां आपको काफी लंबे समय तक रहना है तो इन दोनों का इस्तेमाल करना काफी अच्छा रहेगा।
लाइट मेकअप के लिए फेस टोन का कॉम्पैक्ट लगाना भी जरूरी है। इसके इस्तेमाल से आपका चेहरा नेचुरल लुक का लगता है। इसके अलावा अगर आप ब्लश लगाना पसंद करती हैं तो ज्यादा चमकदार या डार्क रंग का ब्लश का इस्तेमाल न करें। हल्के रंग के ब्लश से लाइट मेकअप लगता है। ध्यान रहे कि ब्लश को सिर्फ चेहरे के एक चीकबोन्स से दूसरे तरफ के चीकबोन्स तक लगाना है। इसके अलावा गर्दन, माथे और नाक के नथुने पर भी आप इसे हल्का सा लगा सकती हैं।
मेकअप में सबसे अहम स्टेप आई मेकअप माना जाता है। आईशैडो, आइ लाइनर और काजल लगाने से आंखों की सुंदरता और बढ़ती है। हालांकि, जब आप लाइट मेकअप कर रही हैं तो इस बात का ध्यान रखें कि आईशैडो के कलर हल्के या न्यूड हो। आजकल बाजारों या ऑनलाइन में आपको आसानी से न्यूड कलर के शैड्स मिल सकते हैं. वहीं, आई लाइनर थोड़ा पतला लगाएं। इससे आपकी आंखे काफी आकर्षक लगेंगी। इसके बाद आंखों पर भी पतला काजल लगाएं. मस्कारा का इस्तेमाल न करें, इससे लाइट की बजाए हैवी लुक लगेगा।
लाइट मेकअप के दौरान डार्क कलर की लिपिस्टिक लगाने की बजाए लाइट शैड या न्यूड शैड की लिपिस्टिक का इस्तेमाल करें। इससे आपका चेहरा काफी अच्छा निखरेगा। अगर आप लिपिस्टिक लगाना पसंद नहीं करती हैं तो लिप ग्लॉस भी लगा सकती हैं, इससे आपके होंठ नेचुरल लगेंगे।
 हेयरस्टाइल: अपनी व्यक्तिगत पसंद और अवसर के आधार पर, आप अपने बालों को कई तरह से स्टाइल कर सकते हैं। एक साधारण लो बन या साइड ब्रेड आपके लुक में एक खूबसूरत टच जोड़ सकता है। आप अपने बालों को ढीले कर्ल या लहरों में भी खुला छोड़ सकती हैं ताकि अधिक कैज़ुअल लुक मिल सके।
ब्लाउज़: आप अपनी कलमकारी साड़ी के साथ जो ब्लाउज़ पहनती हैं, वह प्लेन और डिजाइनर दाेनाे हाे सकते हैं।

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मंगलवार, 23 जुलाई 2024

बायस्कोप से लेकर जादोपटिया की कहानी तक - डा. अनुजा भट्ट

 


अपने बचपन की हल्की सी स्मृतियों में मुझे बायस्कोप की याद है। एक बड़ा सा डिब्बा नुमा यंत्र जो हाथ से चलता था और उसमें कई तरह के रंगीन कागज का प्रयोग होता था। ये रंगीन कागज चमकीले होते थे। उस यंत्र में एक गोलाकार छेद होता था। यह छेद उतना ही बड़ा होता था जिसमें आप अपना चेहरा टिका सकें। उस बक्से के अंदर चित्रों का एक रोल लगा होता था। बक्से के बाहर एक हैंडल होता था। यह हैंडल उसी तरह का था जैसा जूस वाले अंकल के जूसर का था। अंकल जिस तरह जूस निकालकर देते उसी तरह बायस्कोप वाले अंकल भी हमारे चेहरे को फंसाकर बाहर से उसी तरह घुमाते औऱ अंदर चित्र घूमने लगते। इस तरह से चित्र देखने का यह मेरा पहला अनुभव था। तब क्या पता था कि स्क्राल शब्द हमारी जिंदगी में इतना घुलमिल जाएगा कि हमारी उंगलियां सुबह से शाम स्क्राल ही करती रहेंगी।

 मुझे यह देखकर हैरानी हुई कि किस तरह चीजें एक जगह से दूसरी जगह जाकर बदलती तो जरूर है पर स्थायी ढांचा एक ही होता है। जादोपटिया की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। मैं आपको जादोपटिया की कहानी सुनाऊं इससे पहले कुछ बातें करना भी जरूरी है। 'जादोपटिया' शब्द का अर्थ है जादूई चित्रकार। जादोपटिया कला को संथाल समाज का पुश्तैनी पेशा कहा जा सकता है। हरियाणा के सुरजकुंड मेले में जब झारखंड को थीम स्टेट बनाया गया था, वहां जादोपटिया को प्रदर्शित किया गया था। झारक्राफ्ट के माध्यम से इसे बेचा भी जा रहा है।

दरअसल, जादो संथाल में चित्रकार को कहा जाता है. इन्हें पुरोहित भी कहते हैं. ये कपड़े या कागज को जोड़कर एक पट्ट बनाते हैं फिर प्राकृतिक रंगों से उसमें चित्र उकेरते हैं. जादो द्वारा कपड़े या कागज के छोटे–छोटे टुकड़ों को जोड़कर तैयार पट्टों को जोड़ने के लिए बेल की गोंद का प्रयोग किया जाता है। प्राकृतिक रंगों की चमक बनाए रखने के लिए बबूल के गोंद भी मिलाया जाता है। चित्र को उकेरने के लिए लाल, पीला, हरा, काला, नीला आदि रंगों का प्रयोग किया जाता है। खास बात यह कि ये रंग प्राकृतिक होते हैं हरे रंग के लिए सेम के पत्ते, काले रंग के लिए कोयले की राख, पीले रंग के लिए हल्दी, सफेद रंग के लिए पिसा हुआ चावल आदि का प्रयोग किया जाता है. रंगों को भरने के लिए बकरी के बाल से बनी कूची या फिर चिडि़या के पंखों का प्रयोग करने की परंपरा है।  प्रकृति से प्राप्त जल-आधारित रंग जादोपटिया कारीगरों द्वारा अपने स्क्रॉल को चित्रित करने के लिए उपयोग किया जाने वाला माध्यम था। लाल रंग आमतौर पर धार्मिक और पौराणिक चित्रों में प्रयोग किया जाता है। सफेद रंग उपयोग करने के बजाय यह उसे "खाली" के रूप में छोड़ देते हैं।

  आज हम पट्टा पेंटिंग को जादोपतिया पेंटिंग की विविधता के रूप में वर्गीकृत कर सकते हैं। लंबी स्क्रॉल पेंटिंग को पट्टा पेंटिंग या पटचित्र के नाम से जाना जाता है। झारखंड से पैटकर पेंटिंग, पश्चिम बंगाल औऱ उड़ीसा से पट्टचित्र इसी तरह की पेंटिंग का विकास है। पश्चिम बंगाल में, पटचित्र-चित्रकारी समुदायों को पटुआ के नाम से जाना जाता है। इन्हें झारखंड में पाटीदार, पाटेकर या पैटकर के नाम से भी जानते हैं। पद्य, पटचित्र का स्रोत है। पद्य या पद दो पंक्तियों की छंदबद्ध कविता है। पैतकर पेंटिंग की कथात्मक स्क्रॉल शैली पांडुलिपि से ली गई है, जिसका उपयोग राजाओं द्वारा अन्य राजाओं को संदेश देने के लिए किया जाता था।

  चित्रों के जरिए इस कहानी में मिथक, साथ ही आदिवासी जीवन, अनुष्ठान की बातें बतायी जाती हैं। चित्रित विषय की प्रस्तुति कथा या गीत के रूप में लयबद्ध कर की जाती है । चित्रकारी के लिए बनाया जानेवाला यह पट्ट पांच से बीस फीट तक लंबा और डेढ़-दो फीट चौड़ा होता है। इसमें कई चित्रों का संयोजन होता है। चित्रों में बॉर्डर का भी प्रयोग होता है। चित्रकला का विषय सिद्धू-कान्हू, तिलका मांझी, बिरसा मुंडा जैसे शहीदों की शौर्य गाथा के अलावा रामायण, महाभारत, कृष्ण लीला भी होती है।

मृत्यु का शोक औऱ उम्मीद की कहानी है यह

जादोपतिया चित्रकार उन घरों में जाते थे जहाँ पहले किसी की मृत्यु हो गई थी। सभी लोग एक बैठक में जमा हे जाते हैं। गांव समुदाय और बिरादरी के लोग इसमें शामिल होते हैं।  सब लोगो के आसन ग्रहण करने के बाद जादोपतिया चित्रकार अपना आसन ग्रहण करते हैं। उसके बाद एक जादोपतिया चित्रों का एक रोल लेकर उसे घुमाता जाता है एक के बाद एक चित्र आता रहता है और दूसरा कथावाचक कहानी सुनाता है। यह कहानी, एक मृत व्यक्ति की है जिसकी आंखों में पुतली को नहीं चित्रित किया है।  कथावाचक परिवार को उसकी पीड़ा के बारे में बताया है और उसकी मुक्ति के लिए  पुतली (चक्षु दान) दान का अनुरोध करता है। कहानी सुनने के बाद सब उसे दान देते हैं और आत्मा की मुक्ति की प्रार्थना करते हैं। इसके बाद जादोपतिया अपनी एड़ी पर बैठ जाता है और अपने स्क्रॉल खोलता है। वह बताता है कि  मृत व्यक्ति स्वर्ग में खुश है। यह जानकर परिवार संतुष्ट हो जाता है।  इस कथा का या इस तरह  की रीतिनीति का मूलतत्व यह है कि ऐसा करने से शोक मनाने वालों को उनके दुख से उबरने में मदद मिल सके। इस उपाय का जब अच्छा प्रभाव पड़ा तो इन चित्रकारों का नाम जादोपटिया पड़ गया। संथाल मृतक के जले हुए अवशेषों को पवित्र दामोदर नदी में बहाते हैं।  अस्थि चुनने के लिए संथाल जादोपटिया को दामोदर की यात्रा करने के लिए आमंत्रित करते हैं।

 

 

सोमवार, 15 जुलाई 2024

मेरी यादें- हरकाली देवी हरेला सावन और शिव परिवार- डा. अनुजा भट्ट

 

 जैसा की मैं हमेशा कहती हूं अच्छी यादों को संभालकर रखिए। वह आपको उर्जा देती हैं। परिवार समाज और देश से जोड़े रखती हैं। हम सभी के पास यादों का पिटारा होता है जो कभी हमें हमारे बचपन में ले जाता है कभी युवावस्था की याद दिलाता है। हर उम्र की अपनी एक याद होती है। हमारी तरह बुजुर्गों के पास भी उनकी यादों का पिटारा है जिसमें कई रोचक कहानियां और संस्मरण दर्ज हैं। सुनिए कभी...

मैं तो अपनी यादों में बार बार गोते लगाती हूं और मुझे आनंद आता है। इस बार बचपन की उन यादों में पापा और मैं बैठे हैं। अपने बगीचे से मिट्टी ले आए हैं और अब उस मिट्टी को पापा साफ कर रहे हैं। उसे चिकना कर रहे हैं। पास में लकड़ी की टहनियां हैं जिनको भी साफ कर एकसार कर लिया गया है। रूई भी रखी गई है। डिकारे बनने वाले हैं। जिसमें शिव परिवार बनेगा। 

कुमाऊँनी जीवन में भित्तिचित्रों के अतिरिक्त भी अपनी धार्मिक आस्था के आयामों को मिट्टी और रूई के सहारे कलात्मक रुप से निखारा जाता हैं। जिसके लिए अलग अलग नाम है। डिकारे भी ऐसा ही है। क्या है डिकारे... डिकारे शब्द का शाब्दिक अर्थ है - प्राकृतिक वस्तुओं का प्रयोग कर प्रतिमा गढ़ना। स्थानीय भाषा में अव्यवसायिक लोगों द्वारा बनायी गयी विभिन्न देवताओं की अनगढ़ परन्तु संतुलित एवं चारु प्रतिमाओं को डिकारे कहा जाता हैं। डिकारों को मिट्टी से जब बनाया जाता है तो इन्हें आग में पकाया नहीं जाता न ही सांचों का प्रयोग किया जाता है। मिट्टी के अतिरिक्त भी प्राकृतिक वस्तुओं जैसे केले के तने, भृंगराज आदि से जो भी आकृतियाँ बनाई जाती हैं, उन्हें भी डिकारे संबोधन ही दिया जाता है।

 पापा डिकारे बनाने में तल्लीन हैं। मिट्टी में रूई को भी मिलाया गया है।  सबसे पहले लकड़ी का एक तख्ता सा है जिसपर यह बनाए जाएंगे। पापा ने तीन हिस्सों में मिट्टी के गोले बना लिए हैं और अब आकृति बननी हैं। सभी भगवान बैठे हुए ही बनाए जाएंगें इसलिए ढांचा एक सा ही है। शिव की जटा और गणेश की सूंड बनाने में पापा को कमाल हासिल हैं। थोड़ी देर पहले जो मिट्टी थी वह अब ईश्वर का आकार ले चुकी है और अप उसमें रंग भरने की बारी है। मेरा कौतूहल मुझे छेड़छाड़ करने से रोक नहीं रहा है। पापा ने मुझे भी मिट्टी दे दी है। कोमल हाथ मिट्टी से खेल रहे हैं । सूखने  के लिए पापा ने अब उनको हल्की धूप में रख दिया है। अब  सूखने के बाद उस पर चावल का घोल डाला जाएगा। घोल मां मे तैयार कर दिया है। सूखने के बाद  यह हलके पीले रंग के हो गए हैं। डिकारे में शिव को नीलवर्ण और पार्वती को श्वेतवर्ण से रंगा गया है। रंग भरने में दीदी भी पापा की मदद कर रही है। देखते ही देखते शिव परिवार सजधज कर खड़ा हो गया है। पापा ने डिकारों में  जिस शिव परिवार को बनाया है  उसमें चन्द्रमा से शोभित जटाजूटधारी शिव, त्रिशूल एवं नागधारण किये अपनी अद्धार्ंगिनी गौरी के साथ हैं। गणेश भी हैं। चूहा मैंने बना ही लिया। पापा ने बताया पहले ये रंग किलमोड़े के फूल, अखरोट व पांगर के छिलकों से तथा विभिन्न वनस्पतियों के रस के सम्मिश्रण से तैयार किया जाता है।

 कला के प्रति मेरे पापा का भी रूझान रहा पर वह इसे प्रकट नहीं करते है। मां हो या मौसी दोनों के एपण पर ध्यान देते। जब वह पढ़ाई के लिए नैनीताल अपने भाई (बुआ के बेटे के यहां रहे) के यहां रहे तो डिगारे वही बनाते थे। ऐसा ताई जी ने मुझे बताया।

आज सरस्वती पूजा के लिए जब मूर्ति बनने के लिए देती हूं और उस पूरी प्रक्रिया को देखती हूं , अनायास पापा और मैं मिट्टी के साथ यादों के उसी फ्रेंम में दिखने लगते हैं।

कुमाऊं में हरेला से ही श्रावण या सावन माह तथा वर्षा ऋतु का आरंभ माना जाता है। इस दिन प्रकृति पूजन का विधान है। हरेला का अर्थ है "हरित दिवस", और इस क्षेत्र में कृषि -आधारित समुदाय इसे अत्यधिक शुभ मानते हैं, क्योंकि यह उनके खेतों में बुवाई चक्र की शुरुआत का प्रतीक है। हरेला पर्व से नौ दिन पहले ही घर में मिट्टी या फिर बांस की टोकरी में हरेला बोया जाता है। जिसे रिंगाल कहते हैं।

क्या होता है रिंगाल? ( रिंगाल बांस की प्रजाति का एक पौधा होता है, जिसे बौना बांस भी कहते हैं. यह बहुत बारीक होता है और इससे काम करना बहुत मुश्किल होता है. आजकल इससे बहुत सुंदर क्राफ्ट का सामान  बनाया जा रहा है।) फिर नौ दिनों तक इस पात्र को सींचा जाता है। दसवें दिन इस पात्रा में उगे पौधों को काट दिया जाता है।

पुराणों में कथा है कि शिव की अर्धांगिनी सती ने अपने आप से खिन्न होकर हरे अनाज वाले पौधों को अपना रुप देकर पुनः गौरा रुप में जन्म लिया। इस कारण ही सम्भवतः शिव विवाह के इस अवसर पर अन्न के हरे पौधों से शिव पार्वती का पूजन सम्पन्न किया जाता है।

हरेला की परम्परा के अनुसार अनाज ११ दिन पूर्व एपण से लिखी किंरगाल की टोकरी में बोया जाता है। हरेला बोने के लिए पाँच या सात प्रकार के बीज जिनमें कोहूँ, जौ, सरसों, मक्का, गहत, भट्ट तथा उड़द की दाल कौड़ी, झूमरा, धान,  मास आदि मोटा अनाज सम्मिलित हैं, लिये जाते हैं। यह अनाज पाँच या सात की विषम संख्या में ही प्रायः बोये जाते हैं। बीजों को बोने के लिए मंत्रोंच्चार के बीच शंखध्वनि की जाती है। इस अवसर पर हरकाली देवी की आराधना की जाती है।

संक्रान्ति के अवसर पर इन अन्न के पौधों को काटकर देवताओं के चरणों में अर्पित किया जाता है। हरेला पुरुष अपनी टोपियों में, कान में तथा महिलाएँ बालों में लगाती हैं। घर के प्रवेश द्वार में इन अन्न के पौधों को गोबर की सहायता से चिपका दिया जाता है।

  मान्यता है ये रस्म निभाने से परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।  हरेला जितना बड़ा होगा,  किसान को उसकी फसल में उतना ही ज्यादा लाभ मिलेगा। 

 

जी रया ...

जागी रया ....

ये दिन ये बार भेटनै रया...

गंग कै बालू छन जाण क रया....

घ्वाड क सिंघउन जाण क रया....

दूब क जास झाड है जौ....

पाती जस फूल है जौ.....

हिमालय क ह्यूं छन जाण क रया ....

लाख दुति लाख हरेल है जन....

लाग हरयाव...लाग बग्वाव...

जी रे...जाग रे... बच रे..

दूब जौ पली जे..... फूल जौ खिल जे..

स्याव जस बुध्दि.....शेर जस तरान ह जौ..

सब बच रया......खुश रया...!

यै दिन यै मास भेंटन रैया....!

उत्तराखंडी लोक पर्व हरेला की आपको सपरिवार बधाई व शुभकामनाएं!

*शुभ हरेला*

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एक दीवार हूँ मैं... जिस पर कील नहीं ठुकती, ऊपर से एकदम सपाट सी दिखाई देने वाली सड़क, या फिर कोई पगडंडी, या यूँ ही कोई बेनाम सा मैदान... न हर...