आधुनिक लाइफस्टाइल ब्लॉग: फैशन, संस्कृति, कहानियों और संस्मरणों का अनूठा संगम।भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हम अक्सर अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और उन छोटी-छोटी खुशियों को भूल जाते हैं जो हमारे जीवन को खूबसूरत बनाती हैं। लाइफस्टाइल का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि हम क्या पहनते हैं या हम कहाँ घूमते हैं, बल्कि इसका गहरा संबंध हमारी सोच, हमारे साहित्य और हमारी विरासत से भी है। यदि आप भी एक ऐसे मंच की तलाश में हैं जहाँ आधुनिकता और परंपरा का एक खूबसूरत संतुलन देखने को मिले, तो यह आपके लिए है।
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बुधवार, 4 सितंबर 2024
उनके टाइम पास से बनते हैं एंटीकपीस.. आपका टाइमपास क्या है दोस्त.. डा अनुजा भट्ट
क्या पैसा कमाना आपकी चाहत है। इस चाहत को अपने हुनर के जरिए हकीकत में बदला जा सकता है। अगर आप समय की नब्ज टटोल पाएं और अपने मन में यह विचार जमा लें कि कोई भी काम छोटा बड़ा नहीं होता हमारी सोच छोटी बड़ी हो सकती है, तो आपको पैसा कमाने से कोई नहीं रोक सकता। मैं हर रोज अलग अलग तरह की महिलाओं से मिलती हूं। उनसे खूब बातें करती हूं। खूब सीखती भी हूं और जीवन में आशावादी रहती हूं।
आज मुझे कुछ गुजराती महिलाएं मिली। जिन्होंने सड़क किनारे पटरी पर अपनी दुकान सजायी हुई थी। वह मुझे आवाज दे रही थी मैडम जी ले लो। मैंने कहा अभी लेना नहीं है, तो एक महिला बोली मत लीजिए पर देख तो लीजिए। मुझे भी टाइम पास करना था तो मैं भी बैठ गई उनके साथ। गजब के आत्मविश्वास के साथ वह अपनी कहानी सुनाने लगी। उनमें से कोई भी गरीब नहीं थी। उनका मूल मंत्र था टाइम मेनेजमेंट.. जब खेती का काम नहीं तब कसीदाकारी और फिर खुद ही बनाए सामान को बेचने की जिम्मेदारी भी। उनके साथ मैंने बिना चीनी की चाय और खास गुजराती नमकीन खाई। और इसी के साथ शुरू हुआ गप गल्प का किस्सा.. जब मैंने कहा, मैं तो आज टाइम पास कर रही हूं आपका टाइमपास क्या है तो एक महिला ने हँसते हुए कहा जो आपके घर को सुंदर बनाता है।
हम सब महिलाएं अपनी संस्कृति और रीतिरिवाज के बारे में जितना जानती हैं उनको क्राफ्ट के रूप में पेश करती हैं। फिर चाहे वह दीवार पर लटकाने वाली वस्तुएँ, रजाई, शादी के कपड़े, स्कर्ट और ब्लाउज़ (घाघरा चोली), बच्चों के कपड़े, अपने पतियों द्वारा पहने जाने वाले शर्ट (कुर्ते), स्कार्फ़...कुछ भी हो । कुछ हस्तनिर्मित वस्तुओं को पूरा करने में महीनों लग जाते हैं क्योंकि हमें घर के काम और खेती भी करनी होती है। हम सब गुजरात के कच्छ इलाके से हैं। यहां सब एक साथ ही रहते हैं। आपको बताऊं मोटे तौर पर कच्छ में 7 तरह की कढ़ाई की जाती है - जाट, सूफ, खारेक, रबारी, अहीर, पक्को।
पक्को का काम गुजरात, उत्तर-पश्चिम भारत के कच्छ क्षेत्र में सोढ़ा, राजपूत और मेघवाल समुदाय की महिलाएं करती हैं ।रूपांकन में आम तौर पर ज्यामितीय और पुष्प होते हैं, कभी-कभी शैलीबद्ध आकृतियां भी बनाई जाती हैं । रूपांकनों को पारंपरिक रूप से पहले चाक से खींचा जाता है, और फिर मैरून या लाल, गहरे हरे, सफेद या पीले रंग से बनाया जाता है। अक्सर बटनहोल सिलाई के साथ काम किया जाता है। चेन स्टिच का उपयोग करके काले, सफेद या पीले रंग में आउटलाइनिंग की जाती है।
इसी तरह मुतवा कसीदाकारी मुतवा जाति की महिलाओं द्वारा की जाने वाली कढ़ाई है। मुतवा एक मुस्लिम जाति है जो सिंध-पाकिस्तान के क्षेत्र से आकर कच्छ के रेगिस्तानी क्षेत्र "बन्नी" में बस गई। उनके एक संप्रदाय को मालधारी भी कहते हैं।
इसी तरह जाट कढ़ाई भी जाट समुदाय की महिलाएं करती हैं। यह एक चरवाहा समुदाय है जो सदियों पहले पश्चिमी एशिया से भारत में आकर बसा था। जाट महिलाएँ आम तौर पर पूरे कपड़े को पूर्व-नियोजित ज्यामितीय डिज़ाइन में कवर करने के लिए क्रॉस स्टिच कढ़ाई का उपयोग करती हैं। वे अपने काम में बड़े पैमाने पर दर्पण का भी उपयोग करती हैं। सूफ़ कढ़ाई कच्छ के सोधा, राजपूत और मेघवाल समुदायों द्वारा की जाती है। उनके द्वारा डिज़ाइन कपड़े के पीछे की तरफ साटन सिलाई का उपयोग करके विकसित किए गए बड़े पैमाने पर ज्यामितीय पैटर्न हैं। सूफ़ काम करने के लिए गहरी नज़र, गणित और ज्यामिति का ज्ञान होना ज़रूरी है। सूफ़ रूपांकनों में मोर, मंडला आदि जैसे कारीगरों के जीवन से लयबद्ध पैटर्न शामिल हैं और इनका उपयोग परिधान, बेडस्प्रेड, वॉल हैंगिंग, रजाई, तोरण और कुशन कवर जैसी चीज़ें बनाने के लिए किया जाता है।
खरेक कढ़ाई सोधा, राजपूत और मेघवाल समुदायों द्वारा की जाती है। कारीगर कपड़े पर ज्यामितीय पैटर्न की रूपरेखा बनाते हैं और फिर साटन सिलाई के बैंड के साथ रिक्त स्थान भरते हैं जो सामने से ताने और बाने के साथ काम किए जाते हैं।
रबारी कढ़ाई कच्छ के रबारी समुदायों द्वारा की जाती है जो मुख्य रूप से पशुपालक खानाबदोश समुदाय हैं जो मवेशी पालते हैं। उनके द्वारा निर्मित डिजाइन बोल्ड हैं और आमतौर पर पौराणिक कथाओं और दैनिक जीवन से प्राप्त होते हैं। कपड़े पर आउटलाइन चेन स्टिच में बनाई जाती है और फिर बटनहोल सिंगल चेन, हेरिंगबोन टांके का उपयोग करके बारीकी से भरी जाती है। आमतौर पर रबारी कढ़ाई के लिए काले रंग का आधार उपयोग किया जाता है। अहीर कढ़ाई एक कपड़े पर चौकोर चेन स्टिच का उपयोग करके फ्रीहैंड डिज़ाइनों की रूपरेखा बनाकर और फिर बंद हेरिंगबोन सिलाई का उपयोग करके भरकर की जाती है। कढ़ाई के इस रूप में दर्पण का भी बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है।
उनसे बातचीत कर लगा सचमुच कितनी बातें हैं जो हम नहीं जानते। समाज जाति धर्म और कर्म हमारी कला को कितना जीवंत बनाता है यह सब इस बात का प्रमाण हैं। वास्तव में, कला संस्कृतियों और जीवन के रंगों का सार दर्शाती हैं। एक सम्मोहन पैदा करती हैं। जैसा आज इन महिलाओं ने किया। धन्यवाद मुकुंदनी सुकुंदनी....अब तुम कब और किस मोड़ पर मिलोगी पता नहीं पर तुम्हारी हँसी चाय पीने का खास अंदाज और नमकीन का चटपटापन याद रहेगा।
बुधवार, 16 मई 2018
कुछ इस तरह मिले दाेस्त- अनुजा भट्ट
मेरी अपने बिछड़े दाेस्ताें से मुलाकात बहुत अलग अलग तरीके से हुई। कभी काेई रेलवेस्टेशन में मिला ताे कभी काेई बाजार में। किसी ने अखबार या मैग्जीन में मेरे लेख पढ़कर मुझे खाेजा। कुछ मिले ताे कुछ फिर से खाे गए क्याेंकि उनका नंबर कभी खाे गया ताे कभी पता। लेकिन यादाें में वह हमेशा दस्तक देते रहे। इसी तरह कुछ दाेस्ताें काे मैं हमेशा याद रही। शुक्रिया.. फेसबुक ने ताे कमाल किया। नर्सरी के दाेस्ताें से भी मिलवा दिया।
हर दाेस्त मेरे साथ अपने जीवन के कई तरह के पन्ने लेकर खड़ा था। हर पन्ने में एक अलग तरह की दास्तान थी। दुःख थे ताे सुख भी थे। सभी ने अपने लिए रास्ते बनाए। इन सब दाेस्ताें में जिसके जीवन संघर्ष नें मुझे सबसे ज्यादा प्रेरित किया है उनमें एक नाम नूतन शर्मा का भी है।
बात स्कूली दिनाें की है। हम सब सरकारी स्कूल में पढ़ते। राजकीय बालिका इंटर कालेज। आसमानी कुर्ता और सफेद सलवार कुर्ता हमारी ड्रेस थी। जूनियर सेक्शन में हम फ्राक पहनते थे। हमारी एक शिक्षका थी देवयानी जाेशी। वह अंग्रेजी पढ़ाती थीं। अपने विषय की वह विद्वान महिला थी। कायदे से उनकाे किसी विश्व विद्यालय में प्राेफेसर हाेना चाहिए था। वह इसकी एकदम उपयुक्त पात्र थीं। हमारे शहर में हाई स्कूल तक ही कांवेंट स्कूल था। उसके बाद वहां के विद्यार्थी सरकारी स्कूल में आ जाते थे। एक तरफ हम सरकारी स्कूल के बच्चे जाे हिंदी हमारी माता है के साथ बढ़े हाे रहे थे और दूसरी तरफ अचानक से आए ये विद्यार्थी। इनकी फाेज से हमारी अध्यापिका बहुत प्रभावित थी और उनकाे पढ़ाने में मजा आ रहा था। उनके सवाल पर आधे बच्चे दाएं बाएं देखते और आधे बच्चे अपने लंबे लंबे हाथ खड़े करते। आधे बच्चे डरे और सहमें रहते । अंग्रेजी की कापी एकदम लाल रहती। 33 नंबर लाना भी बड़ी बात। सरकारी बच्चे 45 से ज्यादा ला ही नहीं पाते... हर बच्चा सिर्फ अंग्रे जी पढ़ता। कभी सीढ़ियाें पर कभी मैदान पर। हर समय हर वक्त। पास जाे हाेना था। कुछ ने ताे अंग्रेजी विषय ही नहीं लिया। अंग्रेजी विषय ही छाे़ड़ दिया।
अब बात करू नूतन की। नूतन का परिवार लड़कियाें काे पढ़ाने का हिमायती नहीं था। फिर भी नूतन काे पढ़ने की ललक थी। क्लास 6 से जहां अंग्रेजी पढ़ाई जाती हाे वहां 11 वीं शेक्सपियर का मर्चेंट आफ वेनिस दिमाग में साय साय करता था। भरत काे पढ़ते हुए भी... हमारे भीतर अंग्रेजी साहित्य के प्रति एक खाैंफ था। नूतन उससे लगातार जूझ रही थी। वह पढ़ना चाहती थी। पर अंग्रेजी में मेहनत करके भी वह 32 नंबर पाई। और फेल हाे गई। देवयानी मैडम ने उसका 1 नंबर नहीं बढ़ाया। बस इसी के साथ उसकी पढ़ाई भी बंद हाे गई। उसने स्कूल आना बंद कर दिया।
नूतन ने मुझे फेसबुक से खाेजा.. और उसके बाद की कहानी सुनाई। स्कूल छाेड़नेके बाद ही उसकी शादी हाे गई। 18 साल में। उसके पति काे पढ़ने लिखने का शाैक है। उसने भी अपने मन की बात साझा की और हिचकी हिचकी भर राेई। उसके पति ने कहा काेई बात नहीं अब पढ़ाे। और उसकी पढ़ाई-लिखाई और टीचर्स ट्रेनिंग की व्यवस्था की। वह हास्टिल में रहकर पढ़ी। बहुत मेहनत की और आज अंग्रेजी की ही टीचर है। सरकार द्वारा उसे बेस्ट शिक्षक का अवार्ड भी मिला है।
भरे गले से उसने कहा मेरे पास अभी भी अपनी वह मार्कशीट है। जिसमें मैं फेल हाे गई थी। इस बार मैं अपनी उन टीचर से मिलने जा रही हूं अपनी मार्कशीट के साथ। जीं हा देवयानी जाेशी बहनजी से..इन छुट्टियाें में..
शनिवार, 18 मई 2013
पिता से दूरी पर गुरू भी पिता ही
एक अजीब कशमकश से भरा रिश्ता जहां पिता- पुत्र के रिश्ते में एक दूरी है लेकिन मामा को गुरू के रूप में स्वीकार्य है तो वह नाना ही। वह नाना के शिष्य है एक ऐसे शिष्य जो अपने गुरू की कही बात टालता नहीं। अभ्यास का कोई भी क्षण वह गंवाता नहीं। लेकिन एक पुत्र की तरह कोई जिद वह करता नहीं। जो चाहिए उसके लिए मां है। मां तो सबकुछ है पर एक उम्र में आने के बाद मां से भी हिचकिचाहट है। मां समझती है और धीरे धीरे समझाती है। किशोर होते बच्चे के कई सारे सवालों के उत्तर भी मां ही देती है और साथ में बड़ा हो रहा छोटा भाई, जिसे चचेरा भाई उसने जाना ही नहीं, उसकी मदद करता है। वह जानने लगा है कि मैं बड़ा हो रहा हूं। त्रिलोकी की तरह मेरी भी दाड़ी मूंछ उग आई हैं। एक गौरव उसे महसूस होता है पर वह मदद तो नहीं कर सकता अपने भाई को पिटने से बचा नहीं सकता, फिर वह कैसा बड़ा भाई है? अकेले में वह सोचता त्रिलोकी कह रहा है हम बड़े हो रहे हैं, अब हम अकेले बाहर जा सकते हैं, सिनेमा देख सकते हैं।
क्या होता है सिनेमा? वह अचरज से पूछता है क्या तूने सिनेमा देखा है। त्रिलोकी उसे विश्वास में लेता है। वह उसका प्यारा भाई है वह ही उसे साइकिल से ले जाता है । उसके लिए सभी सामान ले आता है। उसने ही तो उसे सबसे पहले वह सब सिखाया जिसे मां करने में हिचकिचाती थी, नहाना धोना, पानी डालना..
त्रिलोकी के जरिए ही तो मैं दुनिया का वह हिस्सा देख पाता हूं जिसे मैं खुद नहीं देख पाता। इन छुट्टियों में पिता जी की ड्यूटी कॉपी जांचने के लिए लगेगी। वहां तो 6 बजे के बाद छुट्टी होती है। तब मुझे त्रिलोकी साइकिल में बिठाकर सिनेमा दिखाने ले जाएगा।
सिनेमा देखकर लौटा हूं। अद्भुत अनुभव है। गीत, संगीत, सौंदर्य, दृश्य का अद्भुत मेल है। मां से कहकर अन्नपूर्णा को संगीत सीखना चाहिए। मुन्नी भी नाटक में भाग ले सकती है। त्रिलोकी नाथ भी हीरो में खूब जमेगा। वैसे श्रीनिवास भी कम नहीं है पर अभी वह बच्चा है। सोचसोचकर वह आप ही हँसने लगा। पर क्या करें यह सारे रास्ते उसके लिए बंद है। पर संगीत वह महसूस कर सकता है।
जिस दोपहर उसने न जाने कितने ख्वाब बुने वह शाम इतनी खतरनाक होगी उसे नहीं पता था। उसे यह भी नहीं पता था कि जिस रिक्शेवाले से त्रिलोकी नाथ का झगड़ा हुआ था वह स्कूल में जाकर शिकायत कर देगा। नाना ने पहले तो त्रिलोकी नाथ को बुलाया तो उसने अपना सिर एकदम झुका लिया। अगर श्रीधर गिर जाता तो?
त्रिलोकी कोई उत्तर दे या न दे न जाने क्या हुआ कि वह किशोर श्रीधर एकदम सामने खड़ा हो गया। अगर ऐसा हो जाता तो बचाता भी वही। इतना यकीन है मुझे कि यह मुझे मरने नहीं देगा। हमने तय कर लिया है कि हम सिनेमा देखने जाएंगे। बस फर्क इतना है कि अब अम्मा, अन्नपूर्णा, मुन्नी भी साथ जाएंगे। इस बार सुना है धार्मिक फिल्म आने वाली है। अम्मा ने हां कर दी है।
चलो त्रिलोकी तुम्हारा बड़ा भाई बोल रहा है, चलो। एक किशोर किस तरह खुद को बड़ा महसूस करने लगता है यह उस उम्र में अपने पिता से मेरा पहला विद्रोह था।
नाना जानते थे। श्रीधर को महसूस हो रहा है कि वह बड़ा भाई है। शरीर से नहीं सही शब्दों के जरिए तो वह उसकी रक्षा कर सकता है आज श्रीधर ने त्रिलोकी को मार खाने से बचा लिया, उसने संरक्षण करना सीखा। नाना भीतर ही भीतर खुश थे पर यह उन्होंने जाहिर नहीं किया। बस खुद रात को जब अम्मा खाना खिला रही थी तो नाना ने कहा कि कोई धार्मिक फिल्म आए तो देख आना। इस सप्ताह रानी साहिबा आएंगी कुछ अच्छा सा बना लेना। तेरे बनाए खाने की तो वह बहुत तारीफ करती हैं और सुन श्रीधर को संभाल यह बड़ा हो रहा है। मुझे मालूम है त्रिलोकी नाथ उसकी बहुत मदद करता है।
रविवार है आज रानी साहिबा आई हैं इस बार बहुत सारी किताबे लेकर आई हैं लेकिन न जाने क्यों मुझे गुनाहों के देवता बहुत पसंद आ रही है।
गुरुवार, 16 मई 2013
मुक्ति की प्रार्थना
जब मेरे मामा की मृत्यु हुई तब मेरे नाना जिंदा थे। वह लोगों से कह रहे थे अच्छा हुआ उसे मुझसे पहले इसे मुक्ति मिल गई। किसी भी समाज का पिता यह चाहता है कि मेरे शव को मेरा पुत्र कंधा दे, मुझे मुखा िग ्न देकर विदा करे। पर मेरे नाना का यह उलट व्यवहार लोगों के लिए कानाफूंसी का विषय बनता जा रहा था।
जब मामा की मृत्यु हुई उस समय हम दीदी की शादी में लखनऊ गए हुए थे। पर मामा की डोली हमारे आने पर ही उठी। मैंने सुना मेरे कई रिश्तेदारों कह रहे थे, कैसे पिता हैं यह। बेटे का शोक होना चाहिए और यह .. ..
मैंने नाना के पास बैठते हुए उनकी हथेली मे अपनी हथेली टिकाई। वह कान कम सुनते थे इसलिए उनसे बात करने का मेरा यही तरीका था अन्य दिनों वह हासपरिहास में कहा करते मेरा हाथ मत तोड़ देना पर यह बेला हास परिहास की नहीं थी। वह लिखकर बात करते थे। मैंने लिखा आप यह सब क्या बोल रहे हैं लोग आपकी बात नहीं समझ रहे हैं। वह मेरी ओर देखने लगे। मैंने अपने होंठां पर उंगली रख ली। उन्होंने कहा अच्छा. और चुप हो गए। मैंने लिखा बाद में बात करेंगे। फिर मैंने लिखा आखिर आप ऐसा क्यों कह रहे हैं लोग आपकी बात का गलत अर्थ निकाल रहे हैं । नाना ने क्या लिखा आप भी पढि़ए -
मैं इसलिए ऐसा कह रहा हूं कि अगर वह जिंदा रहता और मैं मर जाता तो कौन उसकी देखभाल करता। मैं उसकी सेवा तो नहीं कर सकता और न उस तरह की देखभाल पर उसे देख तो सकता था। उसकी तकलीफ पर किसी को बुला तो सकता था। उसकी सेवा करवा सकता था। पर अब मैं ही कितने दिन रहूंगा इसका पता नहीं फिर मैं अपने बेटे को इस हाल में देखकर मर भी तो नहीं पाता उसे मुक्ति मिली और अब मुझे भी मुक्ति मिल जाएगी।
मैंने उसे बहुत तकलीफ दी वह इसलिए कि वह लाचार न बनें। और तेरे मामा ने वह सब कर दिखाया जो एक सामान्य आदमी भी नहीं कर सकता। उनकी बूढ़ी आंखों में अपने बेटे के लिए पहली बार आँसू थे। वह क्षमायाचना कर रहे थे। अपने बेटे के लिए प्रार्थना कर रहे थे। अपने बेटे के जीवट को सराह रहे थे। बिना पतझड़ के भी मेरे नाना बिखर रहे थे उनके मन के तार एक विषाद संगीत सुना रहे थे जिसके तार आज पहली बार बज रहे थे। नाना की कठोरता का कवच एक हिम पिंड बन गया था जहां वह पक्षाघात से अवसन्न पड़े बेटे की मुक्ति की प्रार्थना कर रहे थे।
जब मामा की मृत्यु हुई उस समय हम दीदी की शादी में लखनऊ गए हुए थे। पर मामा की डोली हमारे आने पर ही उठी। मैंने सुना मेरे कई रिश्तेदारों कह रहे थे, कैसे पिता हैं यह। बेटे का शोक होना चाहिए और यह .. ..
मैंने नाना के पास बैठते हुए उनकी हथेली मे अपनी हथेली टिकाई। वह कान कम सुनते थे इसलिए उनसे बात करने का मेरा यही तरीका था अन्य दिनों वह हासपरिहास में कहा करते मेरा हाथ मत तोड़ देना पर यह बेला हास परिहास की नहीं थी। वह लिखकर बात करते थे। मैंने लिखा आप यह सब क्या बोल रहे हैं लोग आपकी बात नहीं समझ रहे हैं। वह मेरी ओर देखने लगे। मैंने अपने होंठां पर उंगली रख ली। उन्होंने कहा अच्छा. और चुप हो गए। मैंने लिखा बाद में बात करेंगे। फिर मैंने लिखा आखिर आप ऐसा क्यों कह रहे हैं लोग आपकी बात का गलत अर्थ निकाल रहे हैं । नाना ने क्या लिखा आप भी पढि़ए -
मैं इसलिए ऐसा कह रहा हूं कि अगर वह जिंदा रहता और मैं मर जाता तो कौन उसकी देखभाल करता। मैं उसकी सेवा तो नहीं कर सकता और न उस तरह की देखभाल पर उसे देख तो सकता था। उसकी तकलीफ पर किसी को बुला तो सकता था। उसकी सेवा करवा सकता था। पर अब मैं ही कितने दिन रहूंगा इसका पता नहीं फिर मैं अपने बेटे को इस हाल में देखकर मर भी तो नहीं पाता उसे मुक्ति मिली और अब मुझे भी मुक्ति मिल जाएगी।
मैंने उसे बहुत तकलीफ दी वह इसलिए कि वह लाचार न बनें। और तेरे मामा ने वह सब कर दिखाया जो एक सामान्य आदमी भी नहीं कर सकता। उनकी बूढ़ी आंखों में अपने बेटे के लिए पहली बार आँसू थे। वह क्षमायाचना कर रहे थे। अपने बेटे के लिए प्रार्थना कर रहे थे। अपने बेटे के जीवट को सराह रहे थे। बिना पतझड़ के भी मेरे नाना बिखर रहे थे उनके मन के तार एक विषाद संगीत सुना रहे थे जिसके तार आज पहली बार बज रहे थे। नाना की कठोरता का कवच एक हिम पिंड बन गया था जहां वह पक्षाघात से अवसन्न पड़े बेटे की मुक्ति की प्रार्थना कर रहे थे।
सपनों की उड़ान 1
3- 4 साल की उम्र में ही वह पक्षाघात के शिकार हो गए थे और उनका एक पैर बिलकुल टेढ़़ा हो गया। उस उम्र में जब उनके साथी बाहर मैदान में खेला करते आपस में झगड़ा करते मारते पीटते वह बस उनको देखता रहता और अचानक से उसका ध्यान अपने पैर पर जाता। वह अपनी अम्मा पूछता कि क्या मेरे पैदा होते समय से ही मेरा पैर ऐसा है। वह कहता मेरा पैर टेढ़ा क्यों है? देखो ना अम्मा अन्नपूर्णा
कितना इठला इठलाकर डांस कर रही हैं, कितनी सुंदर लग रही है और मुन्नी अपनी सहेलियों के साथ दौड़ती भागती रहती है। इनका पैर तो टेढ़ा नहीं है फिर मेरा क्यों है। अपनी ही संतान द्रारा पूछे गए मासूम सवालों का मां क्या उत्तर दे। पास ही खड़े पिता ने उत्तर दिया एक शिक्षक होने के नाते वह महसूस करते थे कि बच्चो के हर सवाल का उत्तर दिया जाए।
तुमको पक्षाघात हुआ है श्रीधर। यह किसी को भी हो सकता है और जरूरी नहीं कि हर किसी को हो। यह क्यों होता है यह मुझे मालूम नहीं है। बस तुम यह जान लो कि शायद तुम्हारी किस्मत में खेलना -कूदना नहीं है। पर तुम पढ़ाई कर सकते हो और अपने भाई- बहन में सबसे ज्यादा आगे निकल सकते हो। तुमको सिर्फ पढऩे का ही काम है वैसे भी घर के किसी काम में तुम मदद नहीं कर सकते इसलिए अपना ध्यान पढ़ाई- लिखाई में लगाओ। रामरक्षा याद करो। हो सकता है रामरक्षा पढक़र तुम्हारे पांव भी सीधे हो जाए। ऐसे चमत्कार हुए हैं। यह देवीय प्रकोप भी हो सकता है जिसे पूजा- पाठ से ही ठीक किया सकता है। कल से रामरक्षा याद करना शुरू कर दो।
एक तरफ रामरक्षा उसके सबक और दूसरी तरफ वह नन्हा बालक। बचपन से ही उसे इस कर्मकांड से चिड़ हो गई और वह दर्शन की तरफ मुड़ गया । ईश्वर में विश्वास था पर कर्मकांड में नहीं।
मेरे नाना ने उनको सख्त अनुशासन में रखा और खुद भी उस अनुशासन में बंधे। परिवार में सभी को अनुशासन में रहना होता था इसे मजबूरी भी कह सकते है। इस कठोर अनुशासन की एक वजह यह भी थी कि उन्होंने भविष्य को देख लिया था और वर्तमान उनके सामने था। वह नहीं चाहते थे कि कोई उनके बच्चे को बेचारा कहे। वह हमेशा दूसरों पर निर्भर रहे। मेरी नानी मेरे नाना के इस कठोर व्यवहार से दु:खी रहती। जब कभी वह उनको गोदी में पकड़़ दुलार के समुंदर में ले जाना चाहती। सामने खड़े नाना को देखकर वह रूक जाती। पूरे जीवन भर गोदी में उठाकर नहीं रख पाएगी। नीचे छोड़ दे और चलना सीखने दे। यह दृश्य बच्चा अपनी आंखों से ओझल नहीं कर पाया और अपनी मां के और करीब होता गया साथ ही पिता के साथ एक दूरी बनती गई। यह दूरी विचारों की भी थी।
एक मां के लिए इससे अनमोल दौलत क्या होगी कि जब उसके बच्चे को कोई प्यार करे उसके लिए उसकी आंखों में आँसू हो। अपने पति द्रारा अपने बेटे की उपेक्षा भला किस मां को पसंद आएगी। पर एक पिता होने के नाते मेरे नाना जानते थे कि अगर इसे हर समय इसी तरह गोदी में रखा जाएगा तो कभी यह चल नहीं पाएगा। और फिर हमारे न रहने पर इसका क्या होगा। यह सोचकर उनकी रुह कांप जाती। आसपास के लोगों की बेचारगी भरी बातें उनके दर्द को कम करने के बजाए और ज्यादा बढ़ा देती पर वह यह सब नानी से नहीं कहते क्योंकि नानी को तो वह सब लोग बहुत भले लगते । सपनों की उड़ान यहीं से शु रू होती है..
सपनों की उड़ान- ऐसे विक्लांगों की कहानियां जिन्होंने सफलता का शिखर छुआ
कितना इठला इठलाकर डांस कर रही हैं, कितनी सुंदर लग रही है और मुन्नी अपनी सहेलियों के साथ दौड़ती भागती रहती है। इनका पैर तो टेढ़ा नहीं है फिर मेरा क्यों है। अपनी ही संतान द्रारा पूछे गए मासूम सवालों का मां क्या उत्तर दे। पास ही खड़े पिता ने उत्तर दिया एक शिक्षक होने के नाते वह महसूस करते थे कि बच्चो के हर सवाल का उत्तर दिया जाए।
तुमको पक्षाघात हुआ है श्रीधर। यह किसी को भी हो सकता है और जरूरी नहीं कि हर किसी को हो। यह क्यों होता है यह मुझे मालूम नहीं है। बस तुम यह जान लो कि शायद तुम्हारी किस्मत में खेलना -कूदना नहीं है। पर तुम पढ़ाई कर सकते हो और अपने भाई- बहन में सबसे ज्यादा आगे निकल सकते हो। तुमको सिर्फ पढऩे का ही काम है वैसे भी घर के किसी काम में तुम मदद नहीं कर सकते इसलिए अपना ध्यान पढ़ाई- लिखाई में लगाओ। रामरक्षा याद करो। हो सकता है रामरक्षा पढक़र तुम्हारे पांव भी सीधे हो जाए। ऐसे चमत्कार हुए हैं। यह देवीय प्रकोप भी हो सकता है जिसे पूजा- पाठ से ही ठीक किया सकता है। कल से रामरक्षा याद करना शुरू कर दो।
एक तरफ रामरक्षा उसके सबक और दूसरी तरफ वह नन्हा बालक। बचपन से ही उसे इस कर्मकांड से चिड़ हो गई और वह दर्शन की तरफ मुड़ गया । ईश्वर में विश्वास था पर कर्मकांड में नहीं।
मेरे नाना ने उनको सख्त अनुशासन में रखा और खुद भी उस अनुशासन में बंधे। परिवार में सभी को अनुशासन में रहना होता था इसे मजबूरी भी कह सकते है। इस कठोर अनुशासन की एक वजह यह भी थी कि उन्होंने भविष्य को देख लिया था और वर्तमान उनके सामने था। वह नहीं चाहते थे कि कोई उनके बच्चे को बेचारा कहे। वह हमेशा दूसरों पर निर्भर रहे। मेरी नानी मेरे नाना के इस कठोर व्यवहार से दु:खी रहती। जब कभी वह उनको गोदी में पकड़़ दुलार के समुंदर में ले जाना चाहती। सामने खड़े नाना को देखकर वह रूक जाती। पूरे जीवन भर गोदी में उठाकर नहीं रख पाएगी। नीचे छोड़ दे और चलना सीखने दे। यह दृश्य बच्चा अपनी आंखों से ओझल नहीं कर पाया और अपनी मां के और करीब होता गया साथ ही पिता के साथ एक दूरी बनती गई। यह दूरी विचारों की भी थी।
एक मां के लिए इससे अनमोल दौलत क्या होगी कि जब उसके बच्चे को कोई प्यार करे उसके लिए उसकी आंखों में आँसू हो। अपने पति द्रारा अपने बेटे की उपेक्षा भला किस मां को पसंद आएगी। पर एक पिता होने के नाते मेरे नाना जानते थे कि अगर इसे हर समय इसी तरह गोदी में रखा जाएगा तो कभी यह चल नहीं पाएगा। और फिर हमारे न रहने पर इसका क्या होगा। यह सोचकर उनकी रुह कांप जाती। आसपास के लोगों की बेचारगी भरी बातें उनके दर्द को कम करने के बजाए और ज्यादा बढ़ा देती पर वह यह सब नानी से नहीं कहते क्योंकि नानी को तो वह सब लोग बहुत भले लगते । सपनों की उड़ान यहीं से शु रू होती है..
सपनों की उड़ान- ऐसे विक्लांगों की कहानियां जिन्होंने सफलता का शिखर छुआ
बुधवार, 15 मई 2013
सपनों की उड़ान
गर्मियों की छुट्टियां बहुत बार ननिहल में गुजारी। यूं तो ननिहाल पिथौरागढ़ के एक छोटे से गांव पभ्या में हुआ पर हमारे लिए हमारा ननिहाल पीलीभीत था क्योंकि नाना वहीं संस्कृत के अध्यापक थे। ममरे भाई-बहनों के साथ बचपन की वह यादें अभी भी कई बार हँसाती हैं या फिर मेरी किरस्सागोई का हिस्सा बन मेरी बेटी के लिए एक तिलिस्म रचती हैं। तब हम सब तितलियों को पकडऩे के लिए न जाने कितनी दूर तक दौड़ जाते थे। पत्थर के ढेले से आम गिराने के लिए तब हम न धूप देखते थे और न कुछ और। गिरे आम को खोजने के लिए हम अपनी पूरी ऊर्जा खर्च कर देते। ऐसे होते थे हमारे समरकैंप। इन समर कैप में एक प्रिसिंपल भी छुट्टियों में घर आते थे और वह थे हमारे मामा। उनकी छड़ी उनके सिहराने रहती। बाहर बरामदे में जिसमें चिक लगी होती थी उनकी एकमात्र जगह थी। वहीं वह पढ़ते और आराम करते। हम में से सबसे छोटा भाई बहन नीचे लेटकर देखता कि उनका चश्मा क्या र ्रखा हुआ है? यदि हां तो फिर हम धीरे धीर सरक सरक कर निकल जाते। चश्मा नहींं होने का मतलब था कि वह पढ़ रहे हैं और हम सब उनकी गिरफ्त में आ सकते हैं। हम सब बच्चों को उनका डर था।
जबकि कभी वह हमें मारते नहीं थे पर एक अजीब सा डर सभी बच्चों के भीतर तारी था। एक बार मां ने कहा था उनका सारा गुस्सा छड़ी में है, जान लो। अगर बदमाशी करी और दादा को गुस्सा आया तो फिर दीदी जैसी पिटाई होगी। मालूम है। पाठकों, दीदी वाली बात आपको बतानी पड़ेगी क्योंकि तभी आप उस डर को जस्टीफाई कर पाएंगे। एक बारा मामा और मौसी घर आए। तब आजकल की तरह फ्रिज तो नहीं थे कि घर पर ही आइसक्रीम जमाने का जमाने का आइडिया क्लिक किया जाए। इसीलिए आइसक्रीम या तो लोग ठेले पर खाते या फिर रेस्तरां में जाकर। मेरे मामा सडक़ पर खा नहीं सकते थे लिहाजा मामा और मौसी के साथ मेरे दीदी कुल्फी खाने गई। खाकर घर लौटेने लगे तो रास्ते में एक बर्फ कि सिल्ली ले जाता ठेला दिखाई दिया। उसके कोमल मन ने सोचा कि बर्फ खाकर देखी जाए। आखिर बर्फ से ही तो कुल्फी बनी दी। वह जिद करने लगी मामा बर्फ खिलाओ। मामा ने समझाया पर वह तो अड़ गई। फिर मामा को गुस्सा आया और उन्होमे उसी छड़ी से उसकी पिटाई कर दी। मौसी तो रोने लगी ..
मामा की वह मार ऐसी पड़ी कि दीदी ने जिद करना तो छोड़ ही दिया इसके साथ ही अपने मन की बात कहना भी हमेशा के लिए छोड़ दिया। उसकी क्या इच्छा है, वह क्या चाहती है या नहीं चाहती है, यह किसी को पता नहीं। ंसिर्फ उसके मन के। मामा के हाथों दीदी की पिटाई वाली यह बात इतनी बार दुहराई गई कि मन में यह विश्वास पैदा हो गया कि उनका गुस्सा उनकी छड़ी में रहता है। फिर उस उम्र में हम बेताल कहानियां और पंचत्रंत की कहानी भी खूब पढ़ते थे? चमत्कार या रहस्य तो घर में भी हो सकते हैं।
आखिर मामा ने छडी से क्यों पीटा? थप्पड़ क्यों नहीं मारा? और ऐसा क्या कारण था कि वह सडक़ पर ठेले में मिलने वाली आइसक्रीम या कुल्फी नहीं खा सकते थे। इसके लिए उनको हल्दानी शहर में बसे भोटिया पड़ाव से शहर के दूसरे छोर में बने नानक स्वीट हाउस जाना पड़ा।
मैं बताती हूं
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सपनों की उड़ान- ऐसे विक्लांगों की कहानियां जिन्होंने सफलता का शिखर छुआ
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