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शनिवार, 28 मार्च 2020

बच्चों का बचपन न मुर्झाने दें


हमारे व्यक्तित्व को बनाने में बहुत से कारक काम करते हैं पर इसका असली बीज हमारे बचपन में ही पड़ जाता है। इस रहस्य को जानने के लिए एक चाबी भी आपके पास ही है। ऐसे कई आनुवंशिक और पर्यावरणीय कारक हैं जो बचपन के शुरुआती साल में ही असर डालने लगते हैं। आइए जानते हैं कि एक बच्चे की सामाजिक, आर्थिक स्थिति उसके विकास के विभिन्न क्षेत्रों को कैसे प्रभावित करती है।
सामाजिक आर्थिक स्थिति
इससे पहले कि जब हम पैदा होते हैं, हमारे आसपासएक खास स्थिति होती है उसी के आधार पर हमारा जीवन स्तर निर्धारित होता है।
सामाजिक आर्थिक स्थिति (एसईएस) समाज में व्यक्तियों के सामाजिक और वित्तीय स्तर को बताती है। जन्म से पहले और जीवन के शुरुआती वर्षों से आपकी सामाजिक आर्थिक स्थिति आपके माता-पिता पर निर्भर करती है, क्योंकि वे आपके और आपके शुरुआती विकास के लिए वित्तीय रूप से जिम्मेदार हैं।

आपके माता-पिता की सामाजिक आर्थिक स्थिति आपके शुरुआती विकास के बारे में कई बातें निर्धारित करेगी: आप दुनिया को कैसे देखते हैं; क्या, कितना, और कितनी बार खाते हैं; आपका समग्र स्वास्थ्य, आपके प्रति दूसरों का नजरिया
यह एक प्रकार की बचपन की प्रारंभिक शिक्षा है।
यह जीवन में आपकी बाद की सफलता या विफलता को भी प्रभावित करता है। यकीनन, हमारे जीवन का बहुत सा हिस्सा क्या होता है क्या नहीं द्रारा निर्धारित होता है। दो साल की उम्र से लेकर पांच साल की उम्र तक हम अपनी दुनिया को खोज रहे हैं और समझ रहे होते हैं।
संज्ञानात्मक विकास पर प्रभाव
आइए पहले देखें कि SES कैसे संज्ञानात्मक और भाषा विकास को प्रभावित करता है। संज्ञानात्मक हमारी विभिन्न अवधारणाओं, विषयों और प्रक्रियाओं को सोचने और समझने की क्षमता को संदर्भित करता है। अधिक जटिल विचारों को समझने की हमारी क्षमता इस पर निर्भर करती है कि जीवन के शुरुआती वर्षों में हमने सरल विचारों को कैसे प्रकट किया। अवधारणाओं की एक विस्तृत विविधता को अपने जीवन की प्रारंभिक शिक्षा कार्यक्रम से ही शुरू कर देने से आगे चलकर अपने आप को प्रकट करना सबसे आसान हो जाता है।
एक युवा बच्चे का एसईएस उसकी भाषा और संज्ञानात्मक क्षमताओं दोनों को प्रभावित करता है कि वह अपने माता-पिता से क्या सीख पाता है। एक बच्चे के रूप में हम जो सीखते हैं, उनमें से अधिकांश शब्द हमारे माता-पिता से आते हैं, इसलिए हमारी भाषा के विकास में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। कम एसईएस वाले कई लोग आमतौर पर उच्च एसईएस वाले लोगों की तुलना में कम शिक्षित होते हैं। वे अपने बच्चों को अधिक महत्वपूर्ण स्तर पर सोचने के लिए आवश्यक अवधारणाओं और विषयों को पढ़ाने में सक्षम नहीं हो सकते हैं। वे उन शब्दों का भी ठीक से उपयोग नहीं कर सकते हैं जो उनके बच्चों के भीतर उचित भाषा के विकास की अनुमति देते हैं। बच्चे अक्सर अपने माता-पिता के बोलने के तरीके से प्रभावित होते हैं और उसी तरह बोलते हैं, जिसका अर्थ है कि यदि कोई अभिभावक अनुचित भाषा का उपयोग करता है, तो बच्चे भी वैसी ही भाषा का प्रयोग कर सकते हैं।
एक और तरीका एसईएस बच्चों पर सकारात्मक प्रभाव डालता है और उनके
संज्ञानात्मक कौशल को प्रभावित करता है, जब वे अच्छे स्वास्थ्य में होते हैं तो सोचने की बेहतर क्षमता होती है। एक कम एसईएस का एक नियमित आधार पर स्वस्थ भोजन खाना मुश्किल हो सकता है, जबकि एक उच्च एसईएस नियमित आधार पर स्वस्थ भोजन आसानी से प्राप्त कर लेता है। एक भूखा बच्चा वर्णमाला पर ध्यान केंद्रित करने में सक्षम नहीं होता क्योंकि उसके दिमाग में एकमात्र चीज भूख लगना होता है । आखिरकार, अधिकांश वयस्क समझते हैं कि भूख के बारे में इतना क्या सोचना.. लेकिन स्वस्थ खाद्य पदार्थ नहीं खाने से कुपोषण होता है, पौष्टिक भोजन न मिलने से दिमाग बेहतर तरीके से संचालित नहीं होता।
भावनात्मक विकास पर प्रभाव
अब आइए देखें कि SES बच्चों में भावनात्मक विकास को कैसे प्रभावित करता है। कम SES वाले परिवार में बड़े होने वाले युवा बच्चों में भावनात्मक और व्यवहार संबंधी समस्याएं होने की संभावना अधिक होती है। यह बड़े पैमाने पर तनाव के कारण होता है जो भोजन, कपड़े, आदि जैसे आवश्यक संसाधनों के लिए संघर्ष के साथ आता है। माता-पिता द्वारा लाया गया तनाव, यह प्रभाव डालता है कि वे अपने बच्चों के साथ कैसे बातचीत करते हैं, और इसके परिणामस्वरूप बच्चों को तनाव भी होता है। थोड़े समय के भीतर ही बच्चे के भीतर उच्च स्तर की चिंता के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। क्योंकि बच्चा यह जानने के लिए बहुत छोटा है कि तनाव और चिंता से कैसे निपटें, वह अनुचित व्यवहार प्रदर्शित कर सकता है। माता-पिता यह नहीं समझ सकते हैं कि बच्चा ऐसा क्यों कर रहा है, और उनके पास बच्चे को डॉक्टर या मनोवैज्ञानिक के पास ले जाने का साधन नहीं होता । इसलिए, वे बच्चे को दंडित करते हैं। सजा के बाद, बच्चा संभवतः अधिक निराश और भावनात्मक रूप से अधिक अस्थिर हो जाएगा। जैसा कि आप समझ सकते हैं, इन शुरुआती विकासात्मक वर्षों के माध्यम से एक चक्र शुरू होता है जो अनवरत जारी रहता है। इसलिए भावनात्मक रूप से स्थिर बच्चे ज्यादा अच्छी तरह अपनी प्रतिभा को सामने ला पाते हैं और भावनात्मक रूप से कमजोर बच्चे विकसित होने के बजाय, वे तेजी से अस्थिर हो जाते हैं। छोटी उम्र में भी, बच्चे जानते हैं कि वे कब दूसरों से अलग होते हैं। इस वजह से, वे भावनात्मक रूप से कमजोर हो जाते हैं और वह हीन भावना के शिकार हो जाते हैं। कभी कभी वह अवसाद में भी चले जाते हैं । जबकि उनकी उम्र के बच्चे अपनी मस्ती में रहते हैं।

मंगलवार, 1 जनवरी 2019

परीक्षा की तैयारी और आपका खानपान

परीक्षाओं का दौर शुरू होने वाला है और बच्चों में घबराहट व तनाव का स्तर कई गुणा बढ़ गया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक परीक्षा में अच्छा परफॉर्म करने के लिए इस तनाव से भरे लाइफ स्टाइल को बदलने और खान-पान की आदतों को सुधारने की जरूरत है, क्योंकि घबराहट व तनाव में पढ़ने से परीक्षा परिणाम अनुकूल की बजाय प्रतिकूल होने की अधिक आशंका होती है। आपके बच्चे को पर्याप्त पोषण मिले, तनाव का सामना उसे कम-से-कम करना पड़े और वह अपनी परीक्षा में अपना सबसे अच्छा प्रदर्शन दे सके, इसके लिए जरूरी है कि एक मां के रूप में आप अपनी भूमिका सही तरीके से निभाएं।
तनाव कर सकता है पस्त
परीक्षा के दौरान बच्चे लगभग 12 से 14 घंटे पढ़ाई करते हैं, जल्दी से सिलेबस खत्म कर अधिक से अधिक रिवीजन करने के दबाव में लगातार जागते रहते हैं और आराम भी नहीं कर पाते। परिणामस्वरूप उनका स्ट्रेस लेवल इतना अधिक बढ़ जाता है कि वे लंबे समय तक पढ़ते तो रहते हैं, लेकिन एकाग्रता कम होने की वजह से पढ़ा हुआ याद नहीं रख पाते। अंतत: परीक्षा में अच्छा न कर पाने के डर से हतोत्साहित होने लगते हैं। पढ़ाई के अत्यधिक तनाव का उनके स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
क्या होगी परेशानी : बीएलकपूर अस्पताल में गैस्ट्रोइन्ट्रोलॉजी डिवीजन के प्रमुख डॉ़ दीप गोयल बताते हैं कि तनाव के कारण बच्चे को पेट से संबंधित कई बीमारियां हो सकती हैं, तनाव की वजह से पाचन प्रणाली तक रक्त का संचार अवरुद्ध होने लगता है, इससे डाइजेस्टिव सिस्टम तक ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाता और न्यूट्रिएंट  समाहित करने की शरीर की क्षमता भी कम हो जाती है। शरीर का मेटाबॉलिज्म घटने लगता है।
क्या करें :
परीक्षा के दौरान सबसे जरूरी है कि बच्चे के खानपान व आराम का पूरा ध्यान रखा जाए, साथ ही बच्चे पर पढ़ाई का अत्यधिक दबाव न बनाएं, ताकि बच्चा तनावमुक्त होकर पढ़ाई कर सके।
बच्चे के लिए उपयुक्त भोजन
न्यूट्रीशन थेरेपिस्ट, नीरज मेहता के मुताबिक, पढ़ाई के दौरान सबसे अधिक दिमाग का इस्तेमाल होता है। यूं तो यह हमारे शरीर का सबसे छोटा अंग होता है लेकिन शरीर की कुल ऊर्जा का 20 प्रतिशत दिमाग द्वारा इस्तेमाल होता है। यदि पढ़ाई के दौरान लगातार ऊर्जा मिलती रहे तो दिमाग तंदुरुस्त व उत्साहवर्धक बना रहता है।
क्या है परेशानी
पर्याप्त ऊर्जा न मिलने की स्थिति में, बच्चा थका हुआ महसूस करता है, एकाग्रचित होकर पढ़ाई नहीं कर पाता, इसलिए तनाव में आ जाता है। तनाव की वजह से उसके शरीर का मेटाबॉलिज्म घटने लगता है, साथ ही कई अन्य तरह की समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए परीक्षा के दौरान बच्चे के खानपान का खास ध्यान रखने की जरूरत होती है।
क्या करें
  • दिन की शुरुआत हेल्दी नाश्ते से करनी चाहिए। आप बच्चे को नाश्ते में अंडा, पोहा, ओट्स, उपमा, इडली व खिचड़ी आदि दे सकते हैं, जिनमें ग्लाइसेमिक की मात्रा कम हो और शरीर को पर्याप्त ग्लूकोज मिलता रहे। अधिक तेल में बनने वाली चीजें जैसे कि पूरी, परांठे आदि से परहेज करें तो बेहतर होगा, क्योंकि इसे खाने से बच्चे को थकावट और नींद महसूस होने के कारण पढ़ाई में दिक्कत आ सकती है।
  • अधिक से अधिक आयरन व विटामिन बी युक्त पदार्थ दें, इनमें शारीरिक व मानसिक ऊर्जा बरकरार रखने की क्षमता होती है।
  • पालक में आयरन भरपूर मात्रा में होता है। अनाज, अंडे तथा मेवों में विटामिन बी की भरपूर मात्रा होती है। बच्चे को पोषक तत्वों से भरपूर खाना दें।
  • परीक्षा के दौरान जंक फूड से परहेज कर आयरन, कैल्शियम, जिंक युक्त पौष्टिक भोजन ही दें।
  • कोशिश करें कि हर दो घंटे में बच्चा कुछ न कुछ हेल्दी खाता रहे। इस प्रकार शरीर में लगातार आवश्यक तत्वों की पूर्ति होती रहेगी और बच्चा लंबे समय तक पूरे उत्साह के साथ सचेत होकर पढ़ाई कर सकेगा।
कॉफी-चाय से करें परहेज
ज्यादातर बच्चे लंबे समय तक जागकर पढ़ने के लिए कॉफी व चाय पीते रहते हैं, लेकिन न्यट्रिशन थेरेपिस्ट बताते हैं कि कॉफी व चाय में मौजूद कैफीन में अस्थायी उत्तेजक तत्व होते हैं, जिसका असर बहुत जल्द ही खत्म हो जाता है। यह शरीर के ब्लड शुगर लेवल को प्रभावित करती है। शरीर में कैफीन की मात्रा अधिक होने से तनाव व घबराहट बढ़ सकती है।
क्या करें
  • परीक्षा के दौरान कॉफी के बजाय सीरेल्स वाला दूध पीना बेहतर होता है। इसके अतिरिक्त पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं, क्योंकि डिहाइड्रेशन की वजह से एकाग्रता कम हो जाती है और शारीरिक ऊर्जा जल्दी ही खत्म होने लगती है।
  • खाने में ज्यादा से ज्यादा ताजे फल और सब्जियां बच्चों को दें, खासकर हरी सब्जियां जैसे पालक, लौकी, तोरी में शरीर व मस्तिष्क को तंदुरुस्त रखने के लिए आवश्यक तत्व होते हैं। स्टार्च वाली सब्जियां जैसे आलू, अरबी के सेवन से बचें, क्योंकि इनसे थकावट व नींद महसूस होती है। खाना बार-बार गर्म न करें, क्योंकि ऐसा करने से भोजन के सभी जरूरी पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। बच्चे को ताजा खाना ही दें।
  • बादाम, सेब, अखरोट, किशमिश, अंगूर, संतरा, अंजीर, सोयाबीन व मछली में याददाश्त बढ़ाने की क्षमता होती है। इसके अतिरिक्त शहद, दूध और मेवों से मन व मस्तिष्क को शांति मिलती है।
  • मछली का सेवन करने से दिमाग तेज होता है। इसके अलावा फलों का ठंडा रायता खाने से स्फूर्ति आती है।
  • संतरा, केला और गाजर पढ़ने वाले बच्चों के लिए बेहद जरूरी होते हैं। केला खाने से लंबे समय तक शारीरिक ऊर्जा बनी रहती है।
  • बच्चों को खाना धीरे-धीरे और पूरी तरह चबा कर खाने के लिए कहें।

सोमवार, 8 अक्टूबर 2018

टीचर की सुनते हाे मां की भी सुनाे- डॉ. अनुजा भट्ट

साभार -भूपेश पंत
एक बच्चा संभलते नहीं संभलता ,पता नहीं टीचर कैसे इतने बच्चे को संभालते होंगे ।यह अक्सर ही हम सोचते हैं पर इसका उत्तर टीचर से नहीं पूछ पाते।यह गुत्थी टीचर ही सुलझा सकती है और उनको इसके लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। माओं के लिए फिलहाल ऐसे प्रशिक्षण की व्यवस्था नहीं है इसीलिए वह परेशान हैं।  बच्चे आपकी सुनें तो तेज बोलने की बजाय धीमी आवाज में उनसे कुछ कहें। फुसफुसाएं, बच्चे आपकी बात समझने की कोशिश में आपकी जरूर सुनेंगे।बच्चे की बर्थ डे पार्टी में फुसफुसाएं...यदि तुम लोग खरगोश की तरह उछलोगे तो तुम्हें केक मिलेगा। आप भले ही फुसफुसाए हों, थोड़ी देर में सभी बच्चे आपको उछलते हुए मिलेंगे। यदि बच्चों को कोई काम पसंद न आए तो उन्हें टाइमर लगाकर एक मिनट में वो काम पूरा करने को कहें। घर में आप सभी चीजों के लिए टाइमर सेट नहीं कर सकते। लिहाजा कुछ चीजों के लिए वक्त तय कीजिए। जैसे खाना खाने का, अपना कमरा सही करने का।
जो बच्चे छुट्टियों में स्कूल का कोई काम नहीं करते, स्कूल खुलने पर वे पढ़ाई पर कम ध्यान देने लगते हैं। इसलिए छुट्टियों के दौरान भी हर रोज उन्हें कुछ न कुछ लिखने के लिए प्रेरित करें।यदि आपका बच्चा लिखने में अनाकानी करता है तो आप उसकी पत्र मित्र बन जाएं। हर रोज एक दूसरे को कुछ न कुछ लिखें। ये पत्र तकिए के नीचे, मेज के नीचे आदि जगह पर छोड़ें। एक दूसरे के लिखे पत्र को पढऩे में मजा भी बहुत आएगा।बच्चों के सामने विकल्प न रखें ऐसा करने पर वह शिकायत भी कम करते हैं। जो है उसे खाना है, पहनना है। बच्चों के हाथ में पैसा मत दीजिए। उनमें बचत की आदत डालें चाहे वह पैसे की हो या समय की।जब बच्चों को महत्वपूर्ण बात बतानी हो, तो उनका ध्यान आकर्षित करना काफी मुश्किल होता है। इसलिए उनसे कहें कि मेरे मुंह की तरफ देखो, मुझे तुमसे जरूरी बात करनी है। यदि बच्चे मेरी तरफ देखो कहने से भी न सुनें तो फिर कुछ क्रिएटिव हो जाएं। चलो हम दोनों अपना सिर से सिर भिड़ा कर बैठते हैं या फिर देखो मेरी नाक पर तो कुछ नहीं लगा हुआ। बच्चे जैसे ही आपके चेहरे की तरफ देखेंगे, आपकी सुनेंगे जरूर।बस आपका काम बन गया। अगर आप और भी इस तरह के टिप्स जानना चाहते हैं तो मुझे बताएं।..

मंगलवार, 18 सितंबर 2018

आपके बच्चे क्या आपके दाेस्त नहीं बन सकते- डॉ. अनुजा भट्ट

फाेटाे क्रेडिट-रचना चतुर्वेदी 
हर माता पिता अपने बच्चों के लिए जरूरत से ज्यादा करते हैं। वह यह सुनिश्चित कर लेना चाहते हैं कि उनके बच्चे को कोई असुविधा न हो। वह सिर्फ अपने बच्चों से यही चाहते हैं कि उनका बच्चा उन्हें आदर सम्मान दें। लेकिन यह भी तभी संभव है जबकि आपकी अपने बच्चे के साथ गहरी आत्मीयता हो और इस आत्मीयता के लिए जरूरी है आप दोनों के बीच बेहतर संवाद और एक दूसरे के प्रति अटूट विश्वास।

परफेक्ट पेरेंटिग जैसी कोई चीज नहीं होती है। इसलिए पेरेंटिग के कोई सेट रूल नहीं होते। पेरेंट होना एक फुल टाइम जॉब है और बहुत मुश्किल भी। इस सफर में पेरेंटस और बच्चों दोनों के लिए सीखने का ही दौर चलता है। इसलिए आप अपनी और अपने बच्चे की जरूरत के अनुसार ही रूल सेट कीजिए और उसका पालन करिए और बच्चे से करवाइए भी।

 अपने बच्चे को अपना दोस्त बनाएं। ऐसी एक चीज ढ़ूढ़ने की कोशिश करें जहां पर आपके और बच्चे की पसंद एक हो।

 यदि आपका बच्चा जिद्दी हो तो उसके साथ नरम व्यवहार रखें क्योंकि उसके ऊपर किसी भी तरह की जोर जबरदस्ती नहीं चल सकती। इसके अलावा यह देखें कि समस्या कहां है । उसी के अनुसार कोई युक्ति निकालें कि कैसे आप उसे अपनी बात समझा सकते हैं।

 अपने बच्चे की पसंद नापंसद को ध्यान में रखकर ही कोई भी योजना बनाएं न कि अपनी पसंद उसके ऊपर थोपें।
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 बच्चे को अपने ऊपर हावी न होने दें। कई पेरेंटस यह शिकायत करते हैं कि वह बच्चों को हैंडल नहीं कर पाते और दबाव में आकर झुक जाते हैं। जब बात योजना को क्रियान्वित करने की हो तो अपने इरादे मजबूत रखें। यदि आपको लगता है कि बच्चा किसी भी चीज को पाने की जिद कर रहा है और वह चीज जरूरी नहीं है तो तुरंत मना कर दें।

 बच्चे के अंदर सहनशक्ति लाने की कोशिश करें। यदि आपका बच्चा रोये तो रोने दें। यह उसकी ही भलाई के लिए है। हो सकता है ऐसे में बच्चा आपके बारे में नेगिटिव सोचे लेकिन परेशान न हों यह भी एक नेचुरल प्रोसेस है और बहुत जल्दी खत्म भी हो जाता है। आप इस दीवार को अपने प्यार और बात से आसानी से तोड़ सकते हैं।

 अपने बचपन के साथ अपने बच्चे के बचपन की तुलना मत कीजिए। न ही उसके भाई, बहन या उसके दोस्तों से उसकी तुलना कीजिए। आप यह कभी भी न सोचें कि जैसा आपने अपने बचपन में किया था वैसा ही आपका बच्चा भी करेगा।

 खुद खुशमिजाज बनिए। बच्चों के साथ हंसी मजाक कीजिए। घर का मौहाल खुशनुमा बनायें। इससे आपका बच्चा भी जिंदगी को अलग नजरिए से देखेगा और खुश रहेगा।
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आपके अंदर सहनशक्ति होनी चाहिए। हमेशा कोशिश कीजिए कि आप बच्चे की बात पूरी तरह एकाग्रचित होकर सुनें। बात करने की पहल खुद करें और बातचीत का मौहाल बनाएं। बच्चे को खुद से निर्णय लेने की आजादी देनी चाहिए। ऐसे बात करें कि जैसे कि आप किसी बड़े से बात कर रहे हैं। इस तरह से बच्चा अपनी बातें आपके साथ शेयर कर पाऐगा। उसकी बातों को जज करने की कोशिश न करें क्योंकि ऐसा करने से आप दोनों के संबधों में दूरी आ सकती है।

 अपने बच्चे को एक अलग शख्सियत की तरह देखें। अपनी भावनाएं व्यक्त करने का हर बच्चे का अपना अलग तरीका होता है । लेकिन साथ ही एक बैलेंस बना कर चलें।  यदि कहीं कोई समस्या है तो उसका समाधान तुरंत ढ़ूंढ़े। उसे टालें नहीं। नहीं तो समस्या तो गंभीर होगी ही साथ ही बच्चा भी सही बात नहीं समझ पायेगा।

 अपने बच्चे को यकीन दिलाएं कि उसका परिवार हर हाल में उसके साथ है। जहां जरूरत हो वहां बच्चे को समझाएं । हर बार यह मत सोचें कि बच्चा आपके हाव भाव से आपकी बात समझ जाऐगा। उससे मधुर भाषा में बात करें।

 अपनी गलतियों को स्वीकार करें और उनको सुधारने के लिए प्रयासरत रहें। इस तरह से आप अपने बच्चे के सामने एक उदाहरण बन सकते हैं

 अपने बच्चे को अच्छा इंसान बनने के लिए प्रेरित करें। पेड़ तभी हरा भरा होगा यदि उसकी जड़ मजबूत होगी। आपका बच्चा तभी अच्छे से बढ़ेगा जब आप उसके अंदर सही संस्कार डालेंगें। वह शारीरिक, मानसिक रूप से स्वस्थ हो। वह आर्थिक रूप से भी मजबूत बने। खुद को सुरक्षित महसूस करें। आपको हर दिशा में उसका पथप्रदर्शन करना होगा।
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बच्चे के प्रति रक्षात्मक रूप से बिहेव न करें। अपने बच्चे के लिए कभी झूठ न बोलें। इससे बच्चे पर नकारात्मक असर पड़ता है। उसने जो भी गलत या सही काम किया हो उसे उस काम की जिम्मेदारी लेनी आनी चाहिए।

 आपके बच्चे का न कहना भी उतना ही जरूरी है जितना कि हां कहना। इससे बच्चा कभी भी किसी काम को प्रेशर के चलते नहीं लेगा।

 बच्चों को सिखाएं गलतियों को स्वीकार करना और आत्मशक्ति को बढाना ताकि कोई भी अपनी इच्छाएं या निर्णय उन पर थोप न सके।

आपके बच्चे का भविष्य आपकी पेरेंटिग के तरीकों पर बहुत हद तक निर्भर करता है। आपको इसके लिए बहुत मेहनत करनी होगी। आपके पास सहनशक्ति और तेजी दोनों ही होनी चाहिए। आप अपने बच्चे की नजर में परफेक्ट हों यह जरूरी नहीं है पर आप उसकी नजर में एक सही इंसान बनें यह ज्यादा जरूरी है।

मंगलवार, 11 सितंबर 2018

बच्चाें के दाेस्ताें पर भी रखें नजर- डॉ. अनुजा भट्ट


कई बार बच्चा मारपीटकर घर आता है
, तो उस पर भी अभिभावक गुस्सा करते हैं। 
हर पैरेंट्स चाहते हैं कि उनके बच्चे को अच्छी परवरिश मिले, वह कामयाब हों, लेकिन आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में ये सब किसी चुनौती से कम नहीं है।  अगर उनके व्यवहार मं कुछ गलत दिखाई दे रहा है ताे सावधान हाे जाएं। बच्चे घर से ही नहीं बाहर से भी बहुत कुछ सीखते हैं। यह अच्छा कम हाेता है बुरा ज्यादा हाेता है। देखने में आता है कि पैरेंट्स काम में बिजी रहते हैं, इस वजह से वह बच्चे को समय नहीं दे पाते। ऐसे में बच्चा काफी कुछ गलत करने लगता है। इससे मां-बाप बाद में परेशान होते हैं। बच्चे को सुधारने के लिए गुस्सा भी करते हैं, लेकिन ये सही नहीं है। गुस्से से आपका बच्चा सुधरने की जगह औऱ बिगड़ भी सकता है। आपके गुस्से का आपके बच्चे पर गलत असर भी पड़ सकता है। इसलिए अगर आप भी बच्चे पर गुस्सा करते हैं, तो इसे फौरन बंद कर दें। बच्चे को कई और तरीकों से भी समझाया जा सकता है।

इस तरह बच्चे को करें कंट्रोल

अगर बच्चा गलत व्यवहार कर रहा है, गलत बोल रहा है या गुस्सा कर रहा है, तो आप गुस्सा होने की जगह उससे प्यार से बात करें और उससे इन सबका कारण जानें। उसके परेशान होने का कारण जानने के बाद उस समस्या को दूर करने की कोशिश करें।
दिन भर की थकान के बाद पैरेंट्स खुद मानसिक रूप से इतने थक जाते हैं कि छोटी-छोटी बातों पर भी बच्चों पर गुस्सा करने लगते हैं। ये गलत है। आपको ध्यान रखना चाहिए कि बच्चे जो देखते हैं, वहीं सीखते हैं। ऐसे में आपके गुस्से करने से बच्चे के दिमाग पर गलत असर पड़ेगा और वह भी गुस्सा करने लगेगा।
बच्चे को नजरअंदाज न करें, वह जो भी कहे उसकी हर बात सुनें ताकि वह आपसे हर बात शेयर करे और जिद न करे। बच्चे को ज्यादा से ज्यादा खेलकूद और बाहरी गतिविधियों में बिजी रखें। बच्चे को डांस व आर्ट क्लास में भेज सकते हैं। समय-समय पर उसे आउटडोर गेम्स खेलने के लिए बाहर भी भेज सकते हैं। इससे बच्चे की अतिरिक्त शारीरिक ऊर्जा व्यय होगी और आत्म अभिव्यक्ति व समाजिक व्यवहार की समझ भी आएगी।
गुस्से में बच्चों पर हाथ उठाने से भी बचें। बच्चे के साथ सहानुभूति रखिए। प्यार से बैठकर समझाइए। इसके अलावा हमेशा उसे डराना भी गलत है।
कई बार बच्चा मारपीटकर घर आता है, तो उस पर भी अभिभावक गुस्सा करते हैं। आप गुस्से की जगह बच्चे को बिठाकर समझाएं कि अगर मारपीट करोगे तो कोई भी आपसे दोस्ती व बात नहीं करेगा।
अक्सर ये भी देखने को मिलता है कि बच्चे के महंगी चीज मांगने पर पैरेंट्स गुस्सा हो जाते हैं और उसे डांट देते हैं। ये स्थिति भी ठीक नहीं है। आप बच्चे को पास में बैठाकर प्यार से बताएं कि आपके पास कितना पैसा है और उसे कहां खर्च करना है। इससे उसे आपकी इनकम का आइडिया रहेगा और बेकार की जिद नहीं करेगा।
इसके अलावा बच्चे के झूठ बोलने की स्थिति में भी उस पर गुस्सा न करें। उसे उदाहरण देकर झूठ बोलने के निगेटिव पक्ष बताएं। उसे सही-गलत के बारे में बताएं।

मंगलवार, 4 सितंबर 2018

मम्मी जी थाेड़ा गुस्सा कम करें- डॉ. अनुजा भट्ट

अधिकांश मम्मी, अपने बच्चाें की लापरवाही, ढीले ढाले रवैया और अनुशासनहीनता के कारण परेशान हैं। यह परेशानी बच्चे के स्कूल,जाने से पहले और स्कूल से आने के बाद शुरू हाे जाती है। एक एक बात बच्चे काे कहनी पड़ती है। स्कूल से आने के बाद हर राेज यह कहना पड़ता है, बेटा जूता सही जगह रखाे। बैग बैग की जगह रखाे। कपड़े निकालकर वाशिंग मशीन में डालाे। लेकिन हम देखते हैं बच्चा काेई बात नहीं सुनता। स्कूल में वह 10 मिनट में खा लेता है लेकिन घर में वह आराम से खाता है। मॉल जाने या फिल्म देखने की बात हाे वह फटाफट तैयार हाे जाता है अपने कपड़े खुद ढूंढ लेता है हालांकि वहां भी वह काेई काेशिश नहीं करता, जाे मिल जाए वह पहन लेता है वह ताे बाहर जाने के नाम से ही राेमांचित है। यह सब शिकायतें बहुत आम हैं। हर पेरेंट्स की हैं। अब इसके उलट बच्चाें से पूछे गलती हाेने पर मम्मी का रिएक्शन क्या हाेता है। मम्मी गुस्सा जाती हैं, डांटती हैं और मारती भी हैं। लेकिन अगर वही गलती पापा,  या बड़े करें ताे मम्मी कुछ नहीं कहती उल्टा सॉरी हीे बाेलती हैं। उदाहरण के लिए अगर मेरे कपड़े बिस्तर पर हैं ताे मां नाराज हाेती है गुस्से में कपड़े फैंक देती हैं पर पापा से कुछ नहीं कहतीं हैं, उनके कपड़े सहेजकर रख देती हैं। और अगर कभी पापा जल्दी आ जाएं और बैड पर कपड़े पड़े हाें ताे मम्मी की जगह पापा नाराज हाेते हैं और कहते हैं, कपड़े अभी तक बिस्तर में पड़े हैं तब मां साॉरी कहती हैं। जैसे पापा अ़ॉफिस जाते हैं थक कर आते हैं एेसे ही हम भी स्कूल जाते हैं और थक कर आते हैं। मम्मी का गुस्सा मुझपर ही क्याें है।
यह उदाहरण बताता है कि एक ही बात के लिए हमारे मानदंड  अलग हैं। बात एक ही है। हम हैंडिल अलग अलग तरह से कर रहे हैं ताे अनुशासन ताे बिगड़ेगा ही। अपने कपड़े सबकाे समेटकर रखने चाहिए बड़े और बच्चाें दाेनाें काे। दूसरी बात जैसा बड़े करते हैं बच्चे भी वैसा ही करते हैं। एेसे में गुस्सा करके आप खुद काे ही बीमार कर रही हैं। यह गुस्सा आपके भीतर तनाव काे पैदा कर रहा है और तनाव है कि बच्चा आपकी नहीं सुनता छाेटी छाेटी बात नहीं सुनता। हर वक्त रिलेक्स हाेकर रहता है।
अब बात खाने की करें। बच्चे बड़े हर काेई ऑफिस या स्कूल में ब्रेक में मिले समय पर खाना खाते हैं घर पर यह नियम लागू नहीं हाेता। हम घर में रिलेक्स हाेते हैं। घर का मतलब हमारे लिए आराम करने की जगह है। बच्चे भी एेसे ही साेचते हैं। एेसे में उनका कीमती समय नष्ट हाे जाता है। काेई काम समय पर पूरा नहीं हाेता वह अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाते। उनके पापा काे हर हाल में अपना टारगेट पूरा करना है तभी नाैकरी बची रह सकती है। उनकाे पैसे कमाकर लाने हैं तभी घर का खर्च और पढ़ाई लिखाई हाे सकती है। पापा काे टारगेट पूरा करना है और पापा टारगेट पूरा करते दिखाई नहीं देते क्याेंकि वह ताे घर पर रहते नहीं है। बच्चा इस दृश्य काे नहीं देख पाते इसलिए वह टारगेट काे समझ नहीं पाते। हमें उनको यही समझाना है। पापा अपना टारगेट खत्म करके ही घर आते हैं और रिलेक्स हाेना चाहते हैं और आपकाे अपना टारगेट पूरा करने के लिए स्कूल से आकर भी पढ़ाई करनी है ताकि आप जिंदगी में कुछ हासिल कर पाएं। इस तरह स्कूल से आकर अगर हर समय रिलेक्स हाेकर आप कुछ कर नहीं सकते और फिर जब समय हाथ से निकल जाएगा आपके पास काेई आप्शन नहीं बचेगा।
 आप गुस्सा करने के बजाए काेशिश करें कि किस तरह से वह आपकी बात समझ सकता है। अपने मित्रों की भी मदद लें। समस्या का हल निकालने के लिए प्रयास करें। मायूस न हाे। गुस्सा न करें।
टाइम टेबल सेट करें
रूटीन  बनाने से बच्चों को मदद  मिलती है।  टाइमटेबल स्कूल के साथ साथ घर के लिए भी जरूरी है। उसके खेल और मनोरंजन सहित प्रत्येक गतिविधि के लिए समय स्लॉट सेट करें। 1-1.15 घंटों के लिए अध्ययन करने के लिए समय अवधि निर्धारित करें। इस अवधि में 20 मिनट का अध्ययन, 5 मिनट ब्रेक स्लॉट आवंटित करें।  अपनी बात पर कायम रहें, गुस्सा न करें याद रखें कि उसे दिनचर्या का पालन करवाना है। जब वह पढ़ाई  पूरी करते हैं तो उसे स्टिकर दें। जब उसे 7 स्टिकर मिलते हैं तो उसे  अपनी तरफ से इनाम दें। दिनचर्या करने में धैर्य रखें। धीरे-धीरे यह सब दिनचर्या मदद करेगा।
 खेल खेल में स्पेलिंग और टेबल याद कराएं
 आजकल एेसे बहुत से विकल्प हैं जिनकी मदद ली जा सकती है। स्कूल की पढ़ाई से बच्चों का मन उब जाता है आप वहीं चीजें दूसरी तरह से पढ़ाने की काेशिश करें। अॉडियाे विजुअल का सहारा लें। यह एक कठिन समय है कि आप काे घर संभालने के साथ बच्चे की परवरिश और पढ़ाई पर भी ध्यान देना है। अगर आप कामकाजी हैं ताे आपके लिए थाेड़ा मुश्किल ताे है पर रास्ते बहुत सारे हैं। आप अपने राेजमर्रा के काम के साथ उसके गाेल तय कीजिए। मसलन मैंने इतने समय में यह काम किया आपने इतने समय में क्या किया।  इससे आपका काम भी हाेता जाएगा और वह भी अपना काम समय से करने लगेगा।

मंगलवार, 28 अगस्त 2018

परेशान न हाें अपने हाइपर एक्टिव बच्चे से- डा. अनुजा भट्ट

हाइपर एक्टिव बच्चों को खेलकूद व आउटडोर एक्टिविटी में ज्यादा से ज्यादा व्यस्त रखें
 बहुत ज्यादा बोलने वाला, छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करने वाला, काफी शरारती और जिद्दी  बच्चों को हाइपर एक्टिव कहा जाता है। अभिभावक बच्चे को कंट्रोल में करने के लिए अक्सर डांट-फटकार व मारपीट का सहारा लेते हैं। इससे आपके बच्चे में नकारात्मक सोच आ जाती है और वह पहले से भी ज्यादा गलत व्यवहार करने लगता है। सवाल उठता है कि आखिरकार आजकल बच्चे इतने शैतान और उदंड कैसे बन रहे हैं।
 मनाेवैज्ञानिक भावना बर्मी कहती हैं, मॉडर्न लाइफस्टाइल की वजह से बच्चों का मानसिक व शारीरिक विकास भी प्रभावित हो रहा है। पढ़ाई से लेकर खेलकूद तक हर फील्ड में उन पर कॉम्पिटिशन में आगे निकलने का दबाव बढ़ रहा है। इसके अलावा शहरों में एकल परिवार की वजह से भी बच्चे अकेलेपन से जूझ रहे हैं। इन सब कारणों से बच्चे गुस्सैल, चिड़चिड़े या यूं कहें कि हाइपर एक्टिव हो रहे हैं। हम अपने बच्चे की गलत आदतों की अनदेखी  कर रहे हैं यह  नहीं हाेना चाहिए। इसकी जगह उसके कारणों को जानकर उसे दूर करने की कोशिश करनी चाहिए।  अगर आपका बच्चा भी हाइपर एक्टिव है ताे इन बाताें पर अमल करें।
  •  डीप ब्रीदिंग लेना सिखाएं-उस बच्चे को डीप ब्रीदिंग सिखाई जाए। यह गहरी सांस इस तरीके से हो कि वह नाक से सांस को शरीर के अंदर ले और मुंह से छोड़े। इसका असर यह होगा कि आपको फ्रस्टेटेट बच्चे को डील करने में आसानी होगी। 
  •  बच्चे के साथ ज्यादा समय बिताएं – अगर आप चाहते हैं कि आपका बच्चा अच्छे से व्यवहार करे, तो जरूरी है कि उसके साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताएं। उन्हें ज्यादा प्यार दें। इससे उन्हें अच्छा महसूस होगा। इसके अलावा बच्चे को धैर्य से रहना सिखाइए।
  • दूसरों के सामने न डांटें – अक्सर पैरेंट्स हाइपर एक्टिव बच्चे के स्वभाव को बदतमीजी मानकर बार-बार उसे दोस्तों और रिश्तेदारों के सामने ही डांटने लगते हैं। लंबे समय तक ऐसा करना बच्चे की मानसिकता, आत्मविश्वास और दोस्तों व रिश्तेदारों के साथ उनके व्यवहार पर नकारात्मक असर डालता है। बच्चे के आसपास ऐसा माहौल बनाएं जिससे वह अपनी हाइपर एक्टिविटी से बाहर आ सके। यदि उसे किसी काम से रोकना है, तो दूसरों के सामने डांटकर न रोकें। बेहतर है कि उसे अकेले में समझाएं।
  • बच्चे के मन का विश्लेषण करते रहें - अगर आपका बच्चा ज्यादा हाइपर एक्टिव है, तो उसके मन की स्थिति का विश्लेषण करने के लिए मनोचिकित्सक की सलाह लें। दरअसल हाइपर एक्टिव बच्चों के लक्षण एडीएचडी (अटेंशन डेफिसिट हाइपर एक्टिविटी डिसऑर्डर) से काफी मिलते हैं। इस स्थिति में बच्चे के आत्मसम्मान पर भी प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा आसपास के लोगों के साथ उसके संबंध भी प्रभावित होते हैं। एडीएचडी एक दिमागी जैविक बीमारी है, जिसका इलाज दवाओं द्वारा किया जा सकता है। ऐसे में जरूरी है कि आप बच्चे के ऊपर खास ध्यान दें।
  •  प्यार और समय दें -ऐसे बच्चों को मां-बाप अपने पास बैठाकर सहलाएं। यानी उनके माथे को हाथों से दबाएं, कांधे को हल्का प्रेस करें। माता-पिता का यह टच बच्चों के प्रति बहुत सेंसेटिव होता है। यह उनके लिए रिलेक्सिंग टच होता है।   ऐसे बच्चों को कंट्रोल करने का सबसे बेहतर तरीका ये है कि आप उसे बहुत प्यार दें, इससे वह शांत हो जाएंगे। जब उनका मूड ज्यादा खराब हो तो उन्हें गले लगा लीजिए और फिर समझाइए।
  • सही से बच्चे की बात सुनें – ऐसे बच्चों की बात को सुनना बहुत जरूरी है। कई बार वह ध्यान आकर्षित करने के लिए कुछ कहना चाहते हैं, लेकिन जब कोई उनकी बात नहीं सुनता तो वह और हाइपर हो जाते हैं। ऐसे में जरूरी है कि आप उनकी बात सुनें। इससे वह शांत रहेंगे और आपकी बात भी मानेंगे। 
  • खेलकूद व आउटडोर एक्टिविटी में रखें व्यस्त – हाइपर एक्टिव बच्चों को खेलकूद व आउटडोर एक्टिविटी में ज्यादा से ज्यादा व्यस्त रखें। ऐसे बच्चे को डांस या आर्ट क्लास में भी भेज सकते हैं। इससे उसकी अतिरिक्त शारीरिक ऊर्जा व्यय होगी और साथ ही आत्म अभिव्यक्ति और सामाजिक व्यवहार का विकास होगा।
  • कुछ नया खरीदकर दें - बच्चे का मन बहलाने के लिए कुछ नई चीज खरीदकर गिफ्ट करें। नई चीज को पा कर वह दूसरी बातें भूल जाएगा और खुश रहेगा।
  • पालतू जानवर लाएं – बच्चे को जो भी पालतू जानवर अच्छा लगता है, उसके लिए वह खरीदकर ले आएं। नया दोस्त देखकर व उसके साथ खेलने में उसकी बदमाशियां कम हो जाएंगी।
  • हर गतिविधि पर रखें नजर – हाइपर एक्टिव बच्चे की हर गतिविधि पर नजर रखना जरूरी है। रूटीन से उसके स्कूल टीचर से मिलते रहें। इससे बच्चे के व्यवहार को समझने में मदद मिलेगी। टीचर को वजह बताते हुए उसे आगे वाली सीट पर बिठाने व समय-समय पर कुछ गिफ्ट देने का अनुरोध कर सकते हैं। इससे वह खुश रहेगा।
  • क्रिएटिव बनाएं-एक बॉक्स हमेशा अपने घर में तैयार रहना चाहिए। इस बॉक्स में क्लै आर्ट, कलर्स, पेंसिल्स या अन्य क्रिएटिविटी वाली चीजें रखना चाहिए। ताकि बच्चा इस बक्से के साथ ही लंबे समय तक बिजी रहे।
  •  रिलैक्स प्लेस पर एक्टिविटी कराएं-आपके घर में एक जगह ऐसी होनी चाहिए जिसे हम रिलैक्सेशन की जगह कह सकते हैं। यह कोई छोटी बालकनी हो सकती है, जहां आराम कुर्सी रखी हो। ध्यान रखें यह ऐसी जगह हो जहां एक्टिविटी कम से कम और रिलैक्स ज्यादा मिले। 
  •  टाइम टेबल फॉलो कराएं-ऐसे बच्चों के लिए एक टाइम टेबल को फॉलो करना बहुत जरूरी है। यह मिलिट्री रूल जैसा नहीं होगा, लेकिन उनके सोने, खाने, उठने, नहाने, खेलने का समय निर्धारित रहेगा तो उनसे डील करना आसान होगा। 
  •  शुगर और कोल्ड ड्रिंक्स से दूर रखें-बच्चों की डाइट मॉनीटरिंग और उनका शुगर इनटेक कंट्रोल करना जरूरी है। यदि हम उन्हें ज्यादा स्वीट्स दे रहे हैं तो उनकी एक्टिविटी का लेवल बढ़ने लगता है। शुगर कोटेड सप्लीमेंट्स और कोल्ड ड्रिंक्स से उनको दूर रखें। 
  •  विटामिन दिखाएं असर-हाइपर एक्टिव बच्चाें के लिए 4 तरह के विटामिन बहुत असरदार हाेते हैं  विटामिन बी 3, बी 6, बी 12 और विटामिन सी। विटामिन सी  हमें रसीले फल जैसे नींबू, संतरा, माैसमी में  मिलता है। इसी तरह दूध और अंडे, मक्खन, मछली में हमें विटामिन 12 मिलता है।   मूंगफली, बादाम, अखराेट में हमें विटामिन 6 मिलता है।
  • यह भी पढ़ें https://mainaparajita.blogspot.com/2018/08/blog-post_21.html?spref=

मंगलवार, 21 अगस्त 2018

बच्चाें को सिखाएं अनुशासन- अनुजा भट्ट


शरारत करने पर पेरेंट्स बच्चों को सजा देते है और कारण पूछे जाने पर कहते है ” ऐसा करना जरुरी होता है नहीं तो बच्चे बिगड़ जाऐंगें। जबकि ऐसा नहीं है अगर आप चाहे तो बिना सजा दिए भी बच्चे से सही व्यवहार करने की उम्मीद कर सकते है ।

एक बात का हमेशा ध्यान रखें कि अनुभव उम्र के साथ-साथ होता है। बच्चे के पास उतनी जानकारी नहीं होती जितनी आपके पास अनुभव से आई है इसलिए हो सकता है उन्हें नहीं पता कि किस तरह की स्थिति में किस तरह से पेश आना है ऐसे में अगर आप गुस्से में आकर उन्हें सजा देते है तो आप उन्हें यही सन्देश देते है कि जो कमजोर है और छोटे है उन्हें आदर कम देना चाहिए। बच्चे बड़ी जल्दी सीखते है और अगर इस तरह की गलतफहमी को वो सीखते है तो उनके बड़े होने पर उनका ऐसा व्यवहार आपके लिए शर्मिंदगी की वजह बन सकता है। ऐसे में आप उसे सही और गलत के बीच का फर्क बताएं और उसे सिखाएं कि किसी खास तरह की स्थिति से कैसे निपटा जाये और अगली बार बच्चा जब ये सीख लेता है तो उसे इसके लिए कुछ प्रोत्साहन दें।

सजा देने से अगर कोई सुधरता तो जेल से बाहर आने के बाद कोई भी अपराधी कुख्यात नहीं रह जाता और वो आदर्श होता। इसलिए आप इस बात का हमेशा ध्यान रखें कि बच्चे को सजा देकर आप बस केवल अपना गुस्सा उस पर उतार रहे है।

अगर आप बच्चे को बात बात पर डांटते है और मारते है तो बच्चे और आपके बीच एक दीवार खड़ी हो जाती है “डर की दीवार”। यह आपके बच्चे को आपसे उसके जीवन से जुडी कुछ बातें या उसके अनुभव आपसे शेयर करने से रोकती है इसलिए हमेशा इस बात का ध्यान रखें। हो सकता है आपका बच्चा कोई ऐसी गलती करे जिसके लिए आपको बहुत बुरा लगे लेकिन फिर भी संयम बरतते हुए उसके साथ सही और गलत के बारे में खुल कर बात करें। सजा देने की जल्दबाजी की अपेक्षा आप उसे प्यार से चीजों के बीच में फर्क समझाएं और एक ऐसा रिश्ता कायम करें जिसमे अगर आपका बच्चा कुछ गलत भी करता है तो भी आपको बता पायें।

बड़ो की तरह बच्चांे को बहुत अधिक सिखाने की जरुरत नहीं होती है अगर आप थोडा स्मार्ट तरीके से उनके साथ पेश आते है तो बच्चांे में उनके आस पास के माहौल से सीखने की क्षमता हम बड़ो से कंही अधिक होती है। अगर आप उनके साथ सम्मान से पेश आते है तो वो भी ये सीखते है कि छोटों के साथ भी सम्मान से पेश आना चाहिए। ऐसे में आप बिना किसी अधिक मेहनत के जिन्दगी के कई महत्वपूर्ण पाठ उन्हें सिखा सकते हैं।


रविवार, 12 अगस्त 2018

फन्ने खां ने उठाया बॉडी शेमिंग पर सवाल- डा. अनुजा भट्ट

फन्ने खां  फिल्म अपनी लचर कथा और बिखरती पटकथा के कारण आज के प्रासंगिक सवालाें को सही ढ़ंग से नहीं उठा पाई। कहानी का आइडिया अच्छा था। बॉडी शेमिंग खासकर महिलाआें के लिए एक अहम सवाल है। यह आपकी प्रतिभा काे बाहर निकलने का माैका नहीं देता। समाज  न उनकाे सुंदर मानने काे तैयार है और न  प्रतिभावान। स्कूल हाे या कालेज,घर परिवार हाे या अॉफिस या बाजार। हर जगह स्वागत करती हैं ताे फब्बितयां। जाे उनके आत्मविश्वास काे चूर चूर कर  देती है। इस फिल्म में लता काे भी इसी तरह की सामाजिक विसंगतियाें का सामना करता पड़ता है और वह कभी बहुत इमाेशनल ताे कभी बहुत जिद्दी और बदतमीज हाे जाती है। अपने पिता के  प्रति उसका रूखा व्यवहार आज की नई पीढ़ी के बच्चाें का एेसा अक्स पेश करता है जिसे सही नहीं ठहराया जा सकता। जाे पिता हर समय उसके लिए सपने देखता है और चाहता है  कि उसे उसकी मंजिल मिले एेसे पिता के लिए उसका व्यवहार ठीक नहीं। वह सिर्फ अपने लिए जीती नजर आती है। मां के साथ ट्यूनिंग है पर वह भी एकदम सतही...
 फिल्में संदेश देती हैं एेसे में लता का संदेश एक रूकावट पैदा करता है। आज के दाैर में हाे सकता है यह किसी काे न खटका हाे पर मुझे जरूर खटका। मां पिता के साथ बच्चाें के रिश्ते दाेस्ताना हाेेने के पक्ष में मैं भी हूं पर माता पिता की अवहेलना और उनकी मेहनत काे नजर अंदाज करने के पक्ष में कतई नहीं।  अभिनय की दृष्टि से लता के रूप में पिहू का अभिनय जानदार है। फेक्ट्री में अपहरण की गई बेबी उर्फ एश्वर्या वाला  दृश्य बहुत लंबा है  इस वजह से कहानी के बहुत सारे डिटेल्स खतम हाे जाते हैं। मेहनत के बल पर सबकुछ मिल सकता है बेबी का यह मैसेज भी सार्थक नहीं हाेता। क्याेंकि लता जाे मुकाम हासिल करती है वह मेहनत से नहीं बल्कि जुगाड़ से करती है।  फिल्म में अगर लता काे मेहनत के बल पर अपना लक्ष्य हासिल करते हुए दिखाया जाता  ताे यह एक अच्छी कहानी हाेती।  आजकल हर बच्चा पढ़ाई के साथ साथ कुछ और भी सीख रहा है। उसके सपनाें में कई सेलीब्रिटी है। जैसा वह बनना चाहते हैं। एेसे बच्चाें के लिए यह एक निराशाजनक बात है।
 और अगर इसे कामेडी फिल्म की तरह देखा जाए ताे यह एक बच्ची का मजाक उड़ाती है उसके माेटेपर पर हँसती है। वह लड़की जिसमें प्रतिभा है और सपना भी है अपने पिता की हरकताें पर बेसाख्ता राेना चाहती है, माइक ताेड़कर फैंक देना चाहती है। पर वह चालाक भी है माैके का  फायदा उठाना आता है उसे ,क्याेंकि बाजार भी ताे यही कर रहा है।
 फिर भी फिल्म निराश नहीं करती। कम से कम सवाल ताे उठाती है। 

शुक्रवार, 10 अगस्त 2018

नन्हें काे चाहिए कंफर्ट, मत बनाइए उसे स्टाइलिश-डा. अनुजा भट्ट

फाेटाे क्रेडिट- एलविन गुप्ता
मां बनने के बाद महिलाओं की जिम्मेदारियां दुगनी हाे जाती है। कई महिलाओं को इन दोनों के बीच तालमेल बैठाने में दिक्कत होती है। बच्चे के जीवन में आने के बाद मां का खाना-पीना, सोना-जागना उसकी आदतों पर निर्भर हो जाता है। मातृत्व के इस सफर काे इन टिप्स के जरिए आप आसान बना सकती हैं।

  • शिशु को कम से कम तक पांच से छह महीने तक मां का दूध जरूर दें। इसके अलावा उसे कुछ भी नहीं दें। मां का दूध बच्चे के लिए संपूर्ण आहार होता है। जब आपका शिशु छ: माह का हो जाए तब आप उसे दूध के साथ ही दलिया, खिचड़ी, चावल, फल आदि भी देना शुरू कर दें। बच्चों के नाखून बहुत जल्दी बढ़ते हैं। जिससे वे खुद को चोट पहुंचा सकते हैं साथ ही लंबे नाखूनों में गंदगी जमा होने का भी डर होता है। इसलिए समय समय पर नाखून काटते रहें।
  • गीलेपन से शिशु को इंफेक्शन का खतरा सबसे ज्यादा होता है इसलिए समय समय पर देखते रहें कि शिशु गीले में तो नहीं सो रहा है। उसकी नैपी को बार-बार बदलें व उसकी त्वचा को सुखे मुलायम कपड़े से साफ करें।
  • शिशु को स्वच्छ रखने व बीमारियों से बचाने के लिए उसे रोज स्नान कराएं। इससे उसे नींद भी अच्छी आएगी और वो दिनभर तरोताजा महसूस करेगा। मालिश से शिशु की हड्डियां मजबूत बनती हैं साथ ही शरीर की गतिविधियां भी बढ़ती है। नहलाने से पहले शिशु की मालिश करना सबसे अच्छा है।
  • अगर आपका शिशु सरकने की कोशिश करने लगा है तो फर्श पर कोई भी नुकीली, धारदार, खुरदरी चीज नहीं रखें। बच्चा सहारा लेकर खड़ा होना सीख रहा है तो टेलीफोन या गुलदस्ते इत्यादि उसकी पहुंच से दूर रखें। बच्चे को हमेशा मुलायम व आरामदायक कपड़े पहनाएं। कई बार ऐसा होता है कि बच्चे को स्टाइलिश दिखाने के लिए माता-पिता उन्हें ऐसे कपड़े पहना देते हैं जिससे बच्चों को परेशानी होती है।
  • बच्चों को किचन से दूर रखें क्योंकि दुर्घटना होने की संभावना सबसे ज्यादा किचन में ही होती है। किचन का सारा सामान बच्चों की पहुंच से दूर रखें।
  • कई बार बच्चों को कोई तकलीफ होने पर वे लगातार रोते रहते हैं। अक्सर ऐसा तब होता है जब बच्चे के पेट में दर्द होता है।
  • शिशु के सारे टीके समय पर लगवाएं। ये टीके बच्चों को बीमारियों से बचाते हैं।
  • बच्चों की आदत होती है कि वे जमीन से उठाकर कुछ भी मुंह में डाल लेते हैं। इसलिए घर की ठीक से सफाई करनी चाहिए।




शनिवार, 4 अगस्त 2018

किकी चैलेंज- खतराें के खिलाड़ी मत बनिए आप- डा. अनुजा भट्ट


  पिछले  दिनाें साेशल मीडिया पर किकी चैलेंज ने जबरदस्त धूम मचायी और इसका असर सड़काें पर नजर आया। युवाआें से लेकर उम्रदराज लाेगाें ने इसमें हिस्सा लिया। आनंद के अतिरेक में उनकाे पीछे आ रही गा़ड़ी का हार्न भी नहीं सुनाई दिया। ड़्राइवर से माफी मांगने के बजाय वह उसपर नाराज हाेते नजर आए क्याेंकि उन्हाेंने उनके आनंद में खलल डाला।  डांस  करना आनंदित ताे  करता है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप सड़क जाम कर दें। वैसे भी जब हम किसी भी चीज के साथ चैलेंज शब्द का प्रयाेग कर  देते हैं ताे फिर हर आदमी औरत चाहें वह  किसी भी उम्र का क्याें न हाे जाेरआजमाइश करने लगता है।  फिर इस जोरआजमाइश में उसका पूरा कुनबा टूट पड़ता है। फेसबुक लाइव आते ही उसके रिश्तेदार से लेकर सारे दाेस्त इस मुहिम में शामिल हाे जाते हैं। और हर शहर हर गांव हर कस्बे से एेसी खबरे आने लगती है।  हर क्षेत्र  के लाेग फिल्मी लोग. नाैकरी पेशा लाेग, व्यापारी. बेराेजगार सब  शामिल हाे जाते हैं।
 लेकिन जब यह नशा स्कूली बच्चाें टीनएजर पर पड़ता है ताे फिर वैसा ही नजारा आते देर नहीं लगेगी जैसा  ब्लू व्हैल गेम खेलते समय हुई थी। तब यह फनचैलेंज बनाम एडवैंचर, एक्सीडेंट में बदलने लगेगा और हम हाथ मलते रह जाएंगे। किशाेर मन काे जब एक बार  उकसा दें ताे फिर वह बार बार उस काम काे करता है। फन और उन्माद में फर्क काे महसूस करना सीखना चाहिए। हम सब लाेग एक अंधी दाैड़ में भागते जा रहे हैं।  और मीडिया भी इस तरह की खबराें काे महत्व दे रहा है। आखिर इस तरह के फन का क्या मतलब है जहां सड़के जाम हाे जाए। लाेग समय पर आफिस न पहुंच पाएं। बीमार सड़क पर कसमसाते रहे। सुरक्षा व्यवस्था की धज्जियां  उड़ जाएं और हम हँसते रहे, गुदगुदाते रहे, फाेटाे शेयर करते हैं चाहे हमारे पीछे काेई तड़प तड़प कर मर जाए।
 देस भक्ति की भावना ताे हमारे भीतर से गायब हाेती जा रही है। बच्चाें काे इससे काेई सराेकार नहीं क्याेंकि हम एेसे संस्कार देने में अब काेई रूचि नहीं दिखा रहे। हम फन की तलाश में है चाहे  वह फन कितना भ हिंसक और बेहूदा क्याें न हाे। हम नाचना चाहते हैं, हम मदमस्त हाेना चाहते हैं  दुनिया जाए भाड़ में.. यही हमारी साेच बनती जा रही है। आपके बच्चे भी आपके साथ इस हिंसक खेल में साझेदारी कर रहे हैं। इस खेल में हार या जीत  नहीं है यहां है खुला चैलेंज... मैं कर सकता हूं.. आपमें है दम ताे  काीजिए.. खाेलिए गाड़ी का दरवाजा और बाहर  निकलकर कीजिए किकी डांस.....

मंगलवार, 31 जुलाई 2018

क्या आपका नन्हा शिशु भी रात भर नहीं साेता- डा. अनुजा भट्ट



शिशु को सुलाने के लिए मांएं बहुत सारी तकनीक का प्रयाेग करती हैं। कभी कभी वह रात भर अपने नन्हें शिशु के जागने पर खुद भी नहीं साे पातीं। इससे उनके दूसरे दिन की दिनचर्या पर प्रभाव पड़ता है। जब यह राेज की आदत हाे जाएं ताे मांएं चिड़चिड़ी हाे जाती हैं। यह चिड़चिड़ाहट उनके कामकाज काे भी प्रभावित करती है और उनकी सेहत काे भी। एेसे मांआें के लिए यह लेख लाभदायक हाे सकता है।
अच्छी आदतें सिखाएं- शिशु को शुरुआत से ही सोने की अच्छी आदतें सिखाएं। यह आदत एक दिन की नहीं हाेनी चाहिए। आपकाे इसमें लंबे समय तक टिका रहना हाेगा।
टाइमटेबल बनाएं- अगर आप सारे दिन शिशु की दिनचर्या एक समान रखें तो रात को शिशु के सोने का समय तय करने और उसे सुलाने में ज्यादा मुश्किल नहीं होगी। वह आराम से सो जाएगा। अगर शिशु हर दिन समान समय पर सोए, खाए-पीए, खेले और रात में भी उसे समान समय पर सुलाया जाए, तो पूरी संभावना रहती है कि शिशु बिना किसी परेशानी के आसानी से सो जाएगा।
शिशु से बातें करें और उसके साथ खेलें- दूध पिलाते समय उसके साथ बातें करें। इस समय का आनंद हर मां काे लेना चाहिए। इससे मां और शिशु दाेनाें काे सकारात्मक उर्जा मिलती है। जब आप रात में अपने नन्हें शिशु काे दूध पिलाएं तब एकदम शांति होनी चाहिए। दाेपहर में आपने उससे बातें करनी है और रात काे एकदम शांति। इससे आपके शिशु को अपने शरीर को उसी तरह ढालने में मदद मिलेगी और वह दिन व रात का अंतर समझ सकेगा।
शिशु जब छह से आठ महिने का हो जाए, तो उसे अपने आप सोने का मौका दें। जब शिशु को नींद आने लगे, मगर वह सोया न हो, तब उसे बिस्तर पर पीठ के बल लिटाएं। अगर आप गोद में शिशु को हिलोरे देते हुए या फिर दूध पिलाते हुए सुलाएंगी, तो शिशु को इसकी आदत पड़ जाएगी। वह खुद सोने का प्रयास नहीं करेगा।
सोने से पहले यह जरूर करें- शिशु को नहलाना, नैपी बदलना और फिर उसे नाइट ड्रेस पहनाना इसमें शामिल हो सकता है। आप शिशु की मालिश भी कर सकती हैं। इसके बाद शिशु को गुनगुनाते हुए सुलाएं। शिशु के साेने की जगह हमेशा एक हाे। उसे सुलाने में अधिक्तम30 मिनट का समय रखें। शिशु को सुलाने का सही समय शाम को 7.30 बजे से रात्रि 9 बजे के बीच होता है।
शिशु को दें सुरक्षा कवच- सुलाने के बाद शिशु काे कंबल या चादर जरूर ढक दें। अपने साथ चिपकाकर लिटाएं ताकि आपकी खूशबू उस में रच बस जाए। शिशुओं की सूंघने की क्षमता बहुत तेज होती है। रात में जब वह चौंक कर उठते हैं ताे आपकी इसी खुशबू के कारण आपसे चिपक कर साे जाते हैं। अंधेरे में आपकाे ढूंढ लेते हैं।
शिशु को थोड़ी देर रोने दें- शिशु के चार से पांच माह का हो जाने पर यह तरीका अपनाना उचित है। उसे तब तक रोने दिया जाता है, जब तक वह थककर सो न जाए। मगर, शिशु को रोने देने कि किसी भी प्रक्रिया का मतलब यह है कि शिशु को निश्चित अवधि तक रोने दिया जाए, जो कि दो से लेकर 10 मिनट से लंबी न हों। उसके बाद उसे संभाला जाए। अगर, शिशु को लिटाने के बाद वह रोना शुरु करता है, तो उसके पास जाएं। उसे आराम से थपथपाएं और बताएं कि सब ठीक है, और अब आपके सोने का समय हो गया है। शिशु के साथ सौम्यता से पेश आएं, मगर अटल रहें। कमरे से बाहर आ जाएं। एक निश्चित अवधि तक इंतजार करें, करीब दो से पांच मिनट तक, और इसके बाद फिर से शिशु को देखें। ऐसा बार-बार तब तक करें, जब तक कि शिशु सो न जाए। बस शिशु को एक बार से दूसरी बार देखने का अंतराल बढ़ाती जाएं।
सीने से लगाना- अगर आप शिशु को अपने पलंग पर ही सुलाती हैं, तो उसे आराम और राहत दें, ताकि वह समझ सके कि अब सोने का समय है। शिशु के साथ लेट जाएं और उसे प्यार से सीने से लगाएं। खुद भी कुछ देर आंखें बंद करके लेट जाएं, ताकि शिशु को लगे कि आप भी सो गई हैं।
कभी आप और कभी आपके पति शिशु को सुलाएं, ताकि आप दोनों ही शिशु के सोने में मदद कर सकें। जब आपका शिशु थोड़ा बड़ा हो जाता है और रात के समय दूध पीना बंद कर देता है, तो वह आपके पति के द्वारा सुलाए जाने पर भी सो सकता है। जब शिशु यह समझ जाएगा कि रात के समय उसे दूध नहीं मिलेगा, तो शायद उसे सोने के लिए किसी ओर की जरुरत ही न हो!
इन नियमाें का पालन कीजिए और अपने नन्हें शिशु के साथ का आनंद लीजिए। यह समय लाैट कर नहीं आता।

शनिवार, 28 जुलाई 2018

मांइड बॉडी थेरेपी से दूर हाेगी बेचैनी- डा. अनुजा भट्ट

न्यूयार्क टाइम्स में छपी एक खबर के मुताबिक, काेलंबिया यूनिवर्सिटी के शाेधकर्ताआें का कहना है कि मेडीटेशन करने, आत्मनिरीक्षण करने और प्राणायाम करने से व्यग्रता के शिकार किशाेर बच्चाें में सकारात्मक असर पड़ता है। उनकी स्मृतिदाेश जैसी समस्या का निदान हाेता है। 
अगर आपके बच्चाें में भी बेचैनी की यह समस्या है ताे यहां आपको कुछ उपायों के बारे में बताने जा रहे हैं जिनकी मदद से आप उनकी बेचैनी, व्यग्रता को तुरंत कम कर सकते हैं।

मेडिटेशन करें: मेडिटेशन तुरंत मानसिक शांति प्रदान करने के लिए आवश्यक होता है इसलिए अगर तनाव होता है तो उसे कम करने के लिए योग और मेडिटेशन कर सकते हैं। जब भी  चिंता या बेचैनी महसूस हो, उसे ध्यान केंद्रित करने के लिए कहें। उसे मेडीटेशन की सही तरीका बताएं। जैसे सबसे पहले आप गहरी साँस लेना शुरू करें। गहरी साँसों से दिमाग शांत होता है और हमारे शरीर को आराम मिलता है। एक से पाँच तक गिनते हुए साँस अंदर लें, थोड़ी देर रुकें और फिर धीरे धीरे साँस छोड़े। इसको कई बार करें, इससे आप बेहतर महसूस करेंगे।

अपनी भावनाओं को स्वीकारें: उसे अपनी भावनाओं और चिंता को समझने और स्वीकारने में मदद करें। जैसे  आप उसे समझाएँ की चिंतित होना भी एक मानव स्वभाव का हिस्सा है और यह जल्दी ही ठीक हो जाएगा। ऐसा करने से उसका आत्मविश्वास बढ़ेगा और वह अपनी व्यग्रता से आसानी से निपट सकेंगा।

अपने विचारों को समझें:जब हमें चिंता होती है तब हमारे दिमाग में उल्टे-सीधे विचार आने लगते हैं। इन विचारों से हमारी चिंता और बेचैनी और अधिक बढ़ जाती है। उदाहरण के तौर पर: अगर आपको को कहीं सफर करना है तो आप सोचने लगते हैं की “कहीं मैं ट्रेन या बस मिस न कर दूँ” या “अगर मुझे टैक्सी नहीं मिली तो क्या होगा?” बच्चाें के साथ भी एेसा हाेता है। एेसे समय खुद से कुछ सवाल करने चाहिए जैसे:
क्या ये विचार सही हैं?
क्या ऐसा सच में हो सकता है?
क्या मैं ऐसी स्थिति का सामना कर पाऊँगा?
इन सवालों का जवाब देने से अपने विचारों पर काबू पाया जा सकता है और अत्यधिक चिंता से बचा जा सकता है।

सकारात्मक बातें सोचें:चिंताजनक स्थिति में मन में कई तरह के गलत विचार आते हैं। ऐसे में आशावादी और सकारात्मक बातें सोचने की कोशिश करनी चाहिए। जैसे आप कह सकते हैं“  चिंता के समय बुरे विचार आना स्वभाविक है लेकिन तुम पहले भी ताे एेसी परिस्थिति से बाहर निकल कर आए हाे। अपनी सफलता पर भराेसा रखाे।

वर्तमान पर ध्यान दें: चिंता होती है तो ज़्यादातर हम सब अपने भविष्य के बारे में सोचते हैं। ऐसे में  बच्चाें के लिए जरूरी है कि वह अपनी सोच को वर्तमान में लाएं।  वर्तमान पर ज़्यादा ध्यान देंगे तो स्थिति को अच्छे से संभाल पाएंगे। इन सब बाताें के अलावा यह भी शेयर करें-
किसी से बात करें: चिंताजनक स्थिति में किसी दोस्त,परिजन  से बात करने से मन हल्का होता है और आप बेहतर महसूस करते हैं। अपनी भावनाओं को अपने परिवार और मित्रों से अवश्य बाटें। जब आप चिंतित या बेचैन होते हैं तो आपकी सोचने और समझने की क्षमता कम हो जाती है। ऐसे में कोई दूसरा व्यक्ति आपकी परेशानी को आपसे बेहतर समझ सकता है। कई बार साधारण सी सलाह भी आपकी समस्या का समाधान कर सकती है।

मन को खुश करने वाला कोई काम करें: जब भी आपको बेचैनी या चिंता हो तो उसे कम करने के लिए आपको अपना ध्यान भटकाना चाहिए। ऐसे में आप गाना सुन सकते हैं या फिर ब्रीदिंग एक्सरसाइज कर सकते हैं जिससे आपका ध्यान भटके और आप उन चीजों के बारे में सोचना छोड़ दें जिनसे आपको चिंता होती है।

मीठा ना खाएं: जब लोगों को तनाव होता है तो वे अक्सर अच्छा महसूस करने के लिए मीठा खा लेते हैं। लेकिन मीठा खाने से एंग्जायटी और बढ़ जाती है क्योंकि इससे स्ट्रेस हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है इसलिए मीठा खाने की बजाय पानी पिएं।

खाली ना बैठें: जब आप किसी चीज को लेकर चिंतित होते हैं तो ऐसे में खाली ना बैठें। खाली बैठने पर आपका ध्यान बार-बार उन्हीं बातों पर जाता है जिससे आपको चिंता हो रही होती है इसलिए खाली बैठने की बजाय परिस्थितियों को सुधारने पर ध्यान दें।

मंगलवार, 15 मई 2018

TUESDAY PARENTING - सुपर माँम बनने जा रही हैं ताे..... अनुजा भट्ट

भारत की स्थिति तो विदेशों से भी ज्यादा खराब है। महिलाएं घर परिवार और कामकाज के दबाव में बहुत तरह की दिक्कतों को झेल रही हैं। उनसे यह उम्मीद की जाती है कि वह हर जगह एकदम फिट हो। मानसिक तनाव को दूर करने के लिए उनके पास कोई सटीक रास्ता नहीं है। तनाव को कम करने के लिए सिर्फ एक रास्ता है सच्ची खुशी। पर खुशी क्या होती है इसका अहसास वह खो चुकी हैं। खुलकर हँसे भी कई दिन बीत गए। पति और परिवार के साथ मिलकर अपने मन की बात कहने का वक्त नहीं। परिवार चलाने के लिए पैसे कमाने का दवाब भी है तो बच्चों की सही परवरिश का जिम्मा भी। सबकुछ संभलने के चक्कर में वह खुद को खो रही है और इसलिए वह फ्रस्टेशन में है। भावनात्मक अनुभूति को महसूस करने की शक्ति उसके भीतर से विलुप्त होती जा रही है। वह इससे छुटकारा पाने के लिए नशे की तरफ अपने कदम बढ़ा रही है। भारत में भी महिलाआं द्रारा नशा करने की प्रवृत्ति जोर पकड़ती जा रही है।
 ब्रिटेन की ज्यादात्तर नई माँएं इस कदर दबाव महसूस कर रही हैं कि उन्होंने खूब शराब पीना शुरू कर दिया है। यही नहीं उनके पार्टनर भी खूब पीने लगे हैं यानी सुपर डैड भी। हालत यह हो गई है कि ज्यादातर बच्चे ऐसे मां-बाप के साथ रहने पर मजबूर हैं जो खतरनाक स्तर तक शराब के आदी हो चुके हैं। जहां शराब उनके लिए तनाव से निजात दिलाने वाला माध्यम बन रही है वहीं इससे उनके बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ता जा रहा है। जाहिर है कि भविष्य में इस तरह के परिवारों का समाज पर बहुत बुरा असर पड़ने जा रहा है। यह किसी भी समाज के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता। ऐसा होने का एक कारण एकल परिवारों का बढ़ते चले जाना है। पहले बुजुर्गों के साथ रहने से परिवार का माहौल खासा आत्मीय और सुकूनदेह हुआ करता था लेकिन जब से परिवार में उनके लिए जगह नहीं रही तब से मॉम सीधे-सीधे बच्चों की डिमांड के निशाने पर आ गई। इसके अलावा एफएमसीजी की आक्रामक मार्केटिंग टीवी और पब्लिक स्कूलों का माहौल बच्चों का इस तरह से ब्रेनवाश कर रहा है कि वे साधारण मम्मी-डैडी से संतुष्ट ही नहीं हैं उन्हें सुपर मॉम-डैड ही चाहिए। इन हालात में मॉम पर दबाव और बढ़ जाता है। वे चाह कर भी सहज नहीं रह पातीं और थोड़ी शांति के लिए नशे की शरण में चली जाती हैं। इसका संबंध महिला के कामकाजी होने-नहीं होने से नहीं है।
 संभलिए अभी वक्त है
 भारत में भी पिछले कुछ दशकों में परिवार का आकार छोटा होता गया है। एकल परिवारों की कामकाजी महिलाओं की अपनी परेशानियां हैं। उन पर भी दोहरी जिम्मेदारी है। बड़े शहरों में यह और अधिक है। ऐसे में यह बहुत जरूरी है कि परिवार में पारिवारिकता के भाव को नजरंदाज न किया जाए। इसके लिए सबसे जरूरी चीज है आत्मीय संवाद। जब यह कम होने लगता है तब तनाव की शुरुआत होती है। यह फिर धीरे-धीरे हमें डिप्रेशन की तरफ ले जाता है। एक-दूसरे को उसकी जिम्मेदारियों और सीमाओं के साथ समझने वाला संवाद परिवार को बचा सकता है।

TUESDAY PERENTING बेस्ट मॉम के सुझाव


बेहतर प्रफेशनल हों और करियर में चाहे जिस भी मुकाम पर हों , अपने बच्चे को बेस्ट मॉम बनकर उसे हर खुशी देने की चाहत आपके लिए किसी चैलेंज से कम नहीं। घर और ऑफिस की जद्दोजहद के बीच मां बनते ही वर्किंग वुमन की प्रायॉरिटीज अचानक बदल जाती हैं।
हमेशा खुश रहने की कोशिश करती

चंद्रा निगम एडवोकेट होने के साथ - साथ पांच साल की बेटी की मां भी हैं। मां बनने के साथ ही वर्किंग वुमन की प्रायॉरिटी बदल सी जाती है। आपको चाहे ऑफिस और क्लाइंट्स की जितनी भी टेंशन हो , घर पहुंचने से पहले मूड ठीक करना ही होता है। बल्कि सच कहूं तो नन्ही बिटिया को देखते ही टेंशन काफूर हो जाती है। कोशिश होती है कि घर पर काम न ले जाऊं , पर मेरा प्रफेशन ऐसा है कि स्टडी के लिए फाइलें घर लानी ही पड़ती हैं। लेकिन , बच्ची के सो जाने पर ही मैं अपना काम करती हूं।
अक्सर मन होता कि जॉबछोड़ दूं
कमर्शल टैक्स डिपार्टमेंट में काम करने वाली गीता बिष्ट अपने पहले चाइल्ड बर्थ को याद करते हुए बताती हैं , वह सिर्फ पैरंटहुड की नहीं , मेरे करियर की भी शुरुआत थी। बच्चे से जुड़ी छोटी - छोटी बातें भी तब परेशान कर जाती थीं। घर से ऑफिस और ऑफिस से घर आते - जाते वक्त हमेशा जल्दी रहती कि कब और कैसे उसके पास पहुंचूं। वैसे तो मैंने कभी साइकल छुई तक नहीं थी , लेकिन सिर्फ अपने लाडले को ज्यादा वक्त देने की खातिर स्कूटी चलानी सीखी। उसके बीमार होने पर ऑफिस में मन नहीं लगता था। यह बात मन को सालती रहती कि जॉब न होती , तो बच्चे को शायद ज्यादा प्यार और बेहतर परवरिश दे पाती। उसकी बेस्ट मॉम बनने की चाहत में अक्सर मनहोता कि जॉब छोड़ दूं। पर जॉब छोड़ना हथियार डालने जैसा होता।अपने हर संघर्ष को मैंने डायरी में नोट किया है। उम्मीद करती हूं कि बड़ा होकर बेटा इसे पढ़कर समझेगा।
जरूरी था उन्हें वक्त देना
हायर एजुकेशन ले रहे दो बच्चों की मां संगीता बताती हैं कि बेहतर टाइम मैनेजमेंट मां के लिए बड़ा चैलेंज है। ग्रैजुएशन खत्म होने से पहले ही मेरी शादी हो गई थी ,इसलिए मां बनने के बाद पढ़ाई और फिर करियर को आगे बढ़ाना भी एक चैलेंज था। मैंने प्राइमरी टीचर बनकर काम शुरू किया। कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई भी साथ - साथ चलती रही। नन्हे बच्चे को धूप में बाहर लाना अच्छा नहीं लगता था , पर स्कूल से लौटते वक्त उसे क्रेच से घर लाना पड़ता था। बड़े होते बच्चों के साथ जिम्मेदारियां भी बढ़ीं। शाम को कभी बेटे को स्केटिंग या स्वमिंग क्लास ले जाना होता था , तो कभी बेटी को डांस क्लास। उनकी पढ़ाई और होमवर्क की जिम्मेदारी थी , सो अलग।
उसकी छुट्टियां बनीं मेरी भी छुट्टियां
कमर्शल मैनेजर चंचल बनर्जी ने बेटी को ज्यादा से ज्यादा समय देने के लिए फुल टाइम जॉब छोड़कर पार्ट टाइमजॉब कर ली। वह कहती हैं कि बेटी जब 9 साल की थी , तो अक्सर पूछती कि आप ऑफिस क्यों जाते हो , घर पर ही क्यों नहीं रहते। तब मैंने उसे वक्त और परिवार की जरूरत समझाई। धीरे - धीरे जब वह अपनी पढ़ाई और करियर को लेकर सीरियस होने लगी, तो उसने ही मुझे पार्ट टाइम से फुल टाइम जॉब लेने का प्रेशर बनाया। यहां तक कि अब एक मां की तरह मेरी केयर करती है। मैं उसके लिए सारे साल छुट्टियां नहीं लेती। जब उसके समर वकेशन पड़ते हैं , उन्हीं दिनों मैं भी 15-20 दिन की छुट्टियां लेती हूं और उसे पूरा वक्त देती हूं।

रविवार, 6 मई 2018

सजा देकर नहीं समय देकर संवरेगा भविष्य

 समय परीक्षाओं या परिक्षाओं के परिणाम का है। कहीं विद्यार्थी और उनके माता -पिता संतुष्ट है तो कहीं माता-पिता अपने बच्चों से बेहद अंसतुष्ट।  अपने बच्चों को अच्छे से अच्छे स्कूल में  एडमिशन दिलवाने के लिए भी माता-पिता को कई तरह की प्रतियोगिताओं से गुजरना पड़ता है, पैसा जुटाना पड़ता है। वह सब कुछ करते हैं पर अपने बच्चों के लिए समय नहीं निकाल पाते और इसी का परिणाम है कि बच्चे परीक्षाओं मेें सब कुछ करने के बाद भी अच्छा प्रदर्शन नहीं करते । इसीलिए यदि बच्चों से असंतुष्ट है तो इसके कारण खुद से भी पूछने चाहिए।
 निश्चित तौर पर बच्चों को इस बात का अहसास करना चाहिए कि यह सब जो उनके लिए किया जा रहा है वह आसान नहीं है। बच्चों को यह अहसास होना बहुत जरूरी है कि मातापिता उनके विकास के लिए और अच्छे भविष्य के लिए कितना चिंतित हैं।  हाल ही में एक खबर आई  थी  कि मैसूर में कक्षा 7 में पढऩे वाली एक बेटी जब अच्छे नंबर नहीं लाई तो नाराज पिता ने उसे मंदिर के सामने भीख मांगने की सजा दी। पिता ने पुलिस को बताया कि वह अपनी बेटी को जीवन की कठिनाइयों से रुबरु कराना चाहता था। लेकिन क्या ऐसी सजा कारगर है? निश्चित तौर पर नहीं।  हमें अपने बच्चों को  सजा की जगह समय देना उतना ही जरूरी है जितना  शिक्षा के लिए पैसे का प्रबंधन करना।

मंगलवार, 1 मई 2018

TUESDAY PARENTING सिर्फ प्लीज नहीं कुछ और भी- अनुजा भट्ट

आपको क्या लगता है कि सिर्फ प्लीज और थैंक यू कहना सीखना ही एटीकेट में आता है। सोसाइटी को चलाने के लिए कुछ रूल्स की जरूरत होती है और इन्हें ही गुड मैनर्स भी कहा जाता है। आपकी मुलाकात के शुरू के कुछ सेकंड ही आपके बारे में बहुत कुछ सामने वाले को बता देते हैं। गुड मैनर्स ऐसी लाइफ स्किल हैं जोकि हर एक व्यक्ति के अंदर आदतों में शुमार होनी चाहिए। बच्चों की रोजमर्रा की आदत में यदि अच्छे संस्कार डाल दिए जाएं तो उनकी आने वाली जिंदगी आसान हो जाती है। यदि आपने इसके लिए देर कर दी तो बड़े होने पर इसकी आदत डलवा पाना बहुत मुश्किल होता है। सबसे बढ़िया तरीका यह है कि हर कोई एडल्ट व्यक्ति चाहे वह पेरेंट्स हों या स्कूल के टीचर सभी बच्चे के साथ वैसा ही व्यवहार करें जैसा कि वह चाहते हैं कि बच्चा उनके साथ करे। इससे बच्चे की आदतों में यह सब मैनर्स समाहित हो जाएंगे। यदि हम किसी के साथ अच्छा व्यवहार करते हैं तो दूसरे को तो अच्छा लगता ही है स्वयं भी हमें खुशी और संतोष की प्राप्ति होती है। अपने बच्चों को प्रोत्साहित करें कि वह प्लीज और थैंक्स शब्दों का प्रयोग करें। 
खाने के समय टेबल पर पानी मांगने के लिए प्लीज शब्द का प्रयोग होना चाहिए न कि आॅडर के तौर पर कहा जाए। यदि किन्हीं लोगों के ग्रुप के बीच में से निकलना हो तो एक्सक्यूज मी कहकर रास्ता मांगें। 
बात करते हुए बीच में किसी को न टोकें। यदि टोकना भी पड़े तो पहले उसके लिए माफी मांग लें।
 यदि कोई आपसे पूछे कि आप कैसे हो तो आपको भी जवाब देकर उनके हालचाल के बारे में पूछना चाहिए।
 घर पर भी अपने बच्चों को सिखाएं कि दूसरों को पहले अंदर आने के लिए दरवाजे को होल्ड करके खड़़े हों।
 बच्चे को खाना खाने के सही तरीके सिखाएं।
 यदि कोई व्यक्ति कुछ लेकर जा रहा है और उसे मुश्किल हो रही है तो आप अपनी हेल्प उसे आॅफर करें। बच्चे को सिखाएं कि वह बोलने से पहले जरूर सोचे कि यह बात यहां बोलनी चाहिए या नहीं। 
बच्चे पाॅजिटिव बातचीत करें न कि इधर उधर की बातें करके झगड़ा करें। बच्चे को सिखाएं कि यदि कोई उन्हें काम्पलीमेंट करता है तो अपनी आंखें न झुकाएं बल्कि उसे सहर्ष स्वीकार करें।

सोमवार, 7 अगस्त 2017

बच्चों की पढ़ाई में संगीत नदारद क्यूं


 डा. अनुजा भट्ट
 क्या आप किसी आठवीं क्लास में पढऩे वाले विद्यार्थी से ये उम्मीद कर सकते हैं कि वह तबला वादन में अपनी प्रस्तुति से सबको चौंका दे। क्या छठी क्लास में पढऩे वाला बच्चा रवि वर्मा या अमृता शेरगिल की पेंटिंग में अंतर कर सकता है? क्या ये बच्चे कत्थक और भरतनाट्यम जैसे नृत्य के भेद को बता सकते हैं? इसकी वजह यह है कि बच्चे गणित ,विज्ञान, भूगोल  इतिहास, कंप्यूटर जैसे विषयों  में ही हर समय घिरे रहते हैं। स्कूली शिक्षा में फाइन आर्ट का विशेष महत्व नहीं है। शाीय गायिका शुभा मुद्लग इस विषय को बहुत गंभीरता से उठाती है कि आखिर क्यों कला के प्रति स्कूल बहुत गंभीरता से नहीं लेते और उसको पाठ्यक्रम में शामिल नहीं करते।  वह सिके प्रति गंभीर क्यों नहीं है?  यह विचार एकदम सरल है। बच्चों को नर्सरी क्लास से ही कला की शिक्षा दी जाए  अन्य विषयों की तरह कला का भी मूल्यांकन किया जाए।  इस विषय को जबरदस्ती उन पर थोपा न जाए बल्कि उनकी रुचि विषय पर केंद्रित किया जाए। यह  भी उतने ही महत्व से पढ़ाया जाए जितना गणित और विज्ञान विषय पढ़ाए जाते हैं।   कला के अंतर्गत संगीत, नृत्य, पेंटिंग, रंगमंच, वाद्य यंत्र शामिल हो।  इस अध्य्यन के बाद हमारे सामने अच्छे कलाकार होगें।
 अभी तक कला की शिक्षा लेने वाले बच्च व्यक्गित स्तर पर ही सीखते हैं । फिर चाहे वह  नृत्य हो संगीत हो या फिर वाद्य यंत्र।  उनसे पूछने पर वह अपने स्कूल टीचर का नाम नहीं लेते यह आश्चर्य की बात है कि उनके आर्ट टीचर के रीप में स्कूल के आर्ट टीतर का नाम नहीं है। अधिकांश माता- पिता को भी कला की  विधिवत शिक्षा के बारे में जानकारी नहीं है।  जबकि भारत में कला की परंपरागत शिक्षा का महत्व है लेकिन जबचक बच्चे खुद को एक कलाकार के रूप में नहीं देखना चाहेंगे तब तक वह गुरू परंपरा के बारे में जानने को क्यों उत्सुक होंगे? कला की कक्षा में बारी बारी से हर कला की हर विधा के शिक्षक को पढाने का अवसर मिले। फिर ताहे वह संगीत हो, कला हो रंगमंच हो या  कुछ और? शिक्षकों को प्रशिक्षण देते समय भी यह घ्यान में रखा जाए और कला शिक्षकों को भी प्रशिक्षण के लिए भेजा जबच्चों की पढ़ाई में संगीत नदारद क्यूं

शनिवार, 22 अप्रैल 2017

आपके साथ समय बिताना चाहते हैं बच्चे


 आप किसी भी नाईट क्लब या बार में चले जाएं वहां आपको पार्टी करते स्कूली बच्चे मिल जाएंगें।  सवाल है कि उन्हें यह सब करने के लिए पैसे आखिर कहां से मिलते हैं? पैसे देने वाले उनके पेरेंट्स ही हैं। पेरेंट्स के पास बच्चों को देने के लिए वक्त नहीं हैं जिसकी कमी वह पैसे देकर पूरी करते हैं।

म सब कहते हैं समय बदल रहा है। समय के साथ सभी को बदलना पड़ता है। अगर हम इस बदलाव को स्वीकार नहीं करते तो समय के साथ चल नहीं पाएंगे।  वैसे भी महत्वाकांक्षी होना कोई खराब बात नहीं है क्योंकि बिना महत्वाकांक्षा के हम षिखर पर पहंुच भी नहीं सकते। लेकिन इस महत्वाकांक्षा के लिए हम अपनी जिम्मेदारी से भी मुंह नहीं मोड़ सकते। परिवार के प्रति भी हमारी जिम्मेदारी है। बच्चों के हाथ में एटीएम कार्ड पकड़ाकर या उनको आया के भरोसे छोड़कर  महत्वाकांक्षा की रफ्तार को नहीं पकड़ सकते। अगर आप नियमित अखबार पढ़ते हैं, टीवी देखते हैं तो ऐसी खबरों पर नजर जरूर जाती होगी जिसमें बताया जाता है कि बच्चे अपराध की दुनिया में कितनी तेजी से कदम रख रहे हैं।
नशे की तरफ बढ़ते कदम
बच्चों को पाॅकिट मनी के तौर पर जो पैसे दिए जाते हैं वह उसका इस्तेमाल कैसे कर रहे हैं इस बात पर कोई गौर नहीं करता। टीनएज उम्र का ऐसा पड़ाव होता है जब बच्चा गलत चीज की ओर जल्दी ही आकर्शित हो जाता है। पहले नषा करना बुरी बात मानी जाती थी लेकिन आजकल यह हर खुषी के मौके को सेलीबे्रट करने की षुरूआत माना जाता है।
आक्रामक हो गए हैं बच्चे
आजकल बच्चों के व्यक्तित्व में आक्रामकता भी साफ देखने को मिलती है। यदि पेरेंट्स कहते हैं कि उन्हें बच्चे के इस व्यवहार के बारे में पता नहीं है तो वह सिर्फ बहाना बना रहे हैं।  यह तभी होता है जब पेरेंट्स बच्चों को आजादी दे देते हैं कि वह अब बड़े हो गए है।
बड़े बच्चों पर भी रखिए नजर
यह सोच गलत है कि बच्चा बड़ा हो गया है और उसे अब निगरानी की जरूरत नहीं है बल्कि यही वह समय है जबकि उस कंट्रोल किया जाना जरूरी है।  पेरेंट्स समय की कमी को पैसे से पूरी करते हैं और पैसे से बच्चे नशा करने लगते हैं। जब उनको लत लग जाती है तब पेरेंट्स कंट्रोल करना चाहते हैं तो बच्चे आक्रामक हो जाते हैं। ऐसे में या तो वह दूसरे को नुकसान पहंुचाते हैं या स्वयं को हानि पहुंचाते हैं।
बच्चे चाहते हैं पेरेंट्स का साथ
आज बहुत से बच्चे अपनी इस अवस्था से दुखी भी हैं और इस नशे की लत और आक्रामकता से छुटकारा पाना चाहते हैं। ऐसी स्थिति होने पर आपको ही उनको संभालना है। फिल्म अभिनेता सुनील दत्त और नर्गिस के बेटे संजय दत्त को आप एक उदाहरण के तौर पर देख सकते हैं। वह तो एक सेलीब्रिटी का बेटा है पर हम सब तो मध्यमवर्गीय परिवार से हैं। क्या हम इलाज का खर्च उठा सकेंगें।
ऐसी स्थिति न आए इसके लिए जरूरी है कि आप अपने बच्चे को वक्त दें और उन्हें सही गलत का ज्ञान दें। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कई स्कूलों ने काउंसलिंग क्लासिस भी शुरू की हैं। हर सोसाइटी के भीतर भी काउंसलर होना चाहिए।  उसकी सलाह माननी चाहिए। बच्चा इंटरनेट पर क्या देख रहा है इस पर भी नजर रखी जानी चाहिए।  इसके साथ ही वह अपनी पाॅकिट मनी का इस्तेमाल कैसे कर रहा है उस बात की भी जानकारी होनी चाहिए।

रविवार, 16 अप्रैल 2017

बुर्जुगों के हाथों में नन्हे मुन्हों की डोर- डा. अनुजा भट्ट



बच्चाें के पेरेंट्स काम पर जाते हैं तो बच्चों की देखभाल का जिम्मा ग्रैंड पेरेंट्स पर आ जाता है।  ग्रैंड पेरेंट बच्चों के दोस्त होते हैे, राजदार होते हैं और साथ ही उन्हें इमोषनल सपोर्ट भी देते हैं।  ग्रैंड पेरेंट्स को  घर-परिवार के इतिहास के बारे में, परंपराओं और संस्कारों के बारे में जानकारी होती है जोकि वह अपने ग्रैंड किड्स को विरासत में दे सकते हैं।  सही गाइडलाइन्स और सपोर्ट से वह बच्चों की जिंदगी में एक महत्वपूर्ण छाप छोड़ सकते हैं।
आज के दौर में जब हसबैंड-वाईफ दोनो वर्किंग है तब नन्हे-मुन्नों से लेकर किशोर बच्चों की जिम्मेदारी ग्रैंड पेरेंट्स पर आ जाती है इस जिम्मेदारी के तहत बच्चों के लिए खाना बनाना, उनको खिलाना, उनके कपड़े धोना से लेकर उनकी सेहत का भी ख्याल रखना होता है जबकि यही वह समय होता है जब उनको आराम की जरूरत होती है मिले। उनको अपनी दिनचर्या में, घर में बहुत से एडजेस्टमेंट करने पड़ते हैं।  ग्रैंड पेरेंट्स के अंदर एनर्जी भी नहीं रहती जो कि यंग ऐज में थी लेकिन उनको यह करना ही होता है। जो ग्रैंड पेरेंट्स यह जिम्मेदारी निभाने से मना कर देते हैं या रूचि नहीं दिखाते, सच तो यह है कि वह अपने भीतर इतनी शक्ति, सहनशक्ति और सांमजस्य बिठा पाने के लिए खुद को तैयार नहीं कर पाते और अन्य अपने हमउम्र के साथियों से आजकल के बच्चों के बारे में पता चलता है कि यह इतना भी आसान नहीं है।  इन सब विचारों का मतलब यह कतई नहीं है कि वह अपने ग्रैंड किड्स से प्यार नहीं करते।
उम्र के इस पड़ाव पर ग्रैंड पेरेंट्स होने के नाते आपके पास बच्चों को पालने की जिम्मेदारी है तो यह बहुत जरूरी है कि आप पहले अपनी सेहत का ख्याल रखें और अपने बच्चों से यह कहने में हिचक महसूस न करें कि कि वह सपोर्ट सिस्टम की व्यवस्था करें।  खुद का ख्याल रखना आपकी पहली जरूरत है।  यदि आप खुद ही ठीक नहीं तो बच्चे का ख्याल कैसे रख पाएंगें। अनुभवों से यह बात सामने आई है कि दूसरी जनेरेशन को पालने के बहुत से फायदे भी होते हैं और नुकसान भी।
  • बच्चों के ग्रैंड पेरेंट्स के पास रहने से बच्चों को एक सुरक्षित वातावरण मिलता है। वहीं ग्रैंड पेरेंट्स को बुढ़ापे में साथ और सुरक्षा मिलती है।
  • बच्चों के साथ उनका रिश्ता मजबूत बनता है।  
  • इससे बच्चों को परिवार के साथ मिलजुल के रहने का महत्व पता चलता है।  
  • अक्सर पेरेंट्स अपनेे बच्चों से छोटे-छोटे काम भी नहीं करवाते कि वह कर नहीं पाएंगें लेकिन अपने बुर्जुग माता-पिता से वह हर काम करवाते हैं। जबकि बच्चे बहुत स्मार्ट और एनर्जी से भरपूर होते हैं।  वह छोटे-छोटे काम दौड़दौड़ कर पूरा कर लेतेें हैं और उससे ग्रैंड पेरेंट्स की मदद भी हो जाएगी।
  • यदि आप अन्य छोटे बच्चों के पेरेंट्स से मिलेगें, बात करेंगें तो हो सकता है कुछ समय लगे लेकिन ऐसे पेरेंट्स से दोस्ती फायदेमंद ही रहेगी।  आप आज के बच्चों की समस्याओं के बारे में जान सकेंगें ।
  • ग्रैंड किड्स के साथ सांमजस्य बिठा पाने में जैसी दिक्कत आपको हो रही है वैसे ही ग्रैंड किड्स के लिए भी खुद को नए मौहाल में ढालना आसान नहीं है । जो बच्चे अपने ग्रैंड पेरेंट्स के साथ नहीं रहते हैं उनकी फीलिंग को समझ पाना आसान नहीं है।   बच्चे की फीलिंग बाहर आने के बहुत तरीके होते हैं। आक्रामक रवैया उनमें से एक हैै। आपके सपोर्ट की उनको जरूरत होती है।  आप भी उनके साथ यदि वैसा ही आक्रामक व्यवहार करने लगेंगें तो स्थिति बनने की बजाय बिगड़ने लगती है।
  • कई बार बच्चे जब ग्रैंड पेरेंट्स के घर में आते हैं और शुरू में बहुत अच्छा व्यवहार करते हैं लेकिन कुछ समय के बाद उनका व्यवहार बुरा हो जाता है, वह तुनकमिजाज हो जाते हैं। इसका अर्थ यह है कि वह सुधरे नहीं हैं जैसे पहले थे वैसे ही हैं।  आपको ऐसा लगेगा कि बच्चे आपसे प्यार नहीं करते लेकिन उनका ऐसा बिहेवियर यह दर्शाता है कि वह आपके साथ इतना सुरक्षित महसूस करते हैं कि वह अपनी अंदर की फीलिंग, डर, इमोशन को आपके सामने प्रकट कर सकते हैं।  वह सहज महसूस कर रहे हैं।
  • बच्चों के लिए रूटीन और शेडयूल बनाएं जिसका कि उसे पालन करना हो।  कुछ ऐसे काम रखें जोकि आप और आपके ग्रैंड किड्स वीकएंड या बेडटाइम पर करें।
  • बच्चों के साथ बात करें और उनकी बातों को, उनके सवालों को सुनें।  इससे आप दोनों के बीच भावनात्मक रिश्ता और गहरा होगा।  बच्चों को प्रोत्साहित करें कि वह अपने मन की बात आपसे करें।  उनको जज न करें और न ही उनकी बातों पर हंसें।
  • छोटे बच्चे खुद की भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पाते। कई बार आपको उनके बिहेवियर को देखकर भी अंदाजा लगाना पड़ता है।
  • आपके पास हर सवाल का जवाब नहीं हो सकता। यदि आपको नहीं पता तो आप सच बोलें न कि आप झूठ बोले या सवाल से बचने की कोशिश करें।  बच्चे इन छोटी छोटी बातों से ही रिश्तों में विश्वास और सच्चाई के महत्व को समझ पाएगंे।
  • बच्चे को किस सिचुऐशन के बारे में कितनी जानकारी दी जानी चाहिए यह उसकी उम्र और समझ को ध्यान मंे रखते हुए ही बताना चाहिए।
  • यदि आपकी अपने ग्रैंड किड्स के पेरेंट्स से नहीं बनती है तो भी कभी भी बच्चे के सामने उन बातों का जिक्र न करें।  
  • बच्चे के पेरेंट्स के साथ रिश्ता अच्छा बना कर रखें।  उन्हें बच्चे के स्कूल, हौबी और दोस्तों के बारे में जानकारी देते रहें।  पेरेंट्स के पास बच्चे का शेडयूल और कानटेक्ट की जानकारी होनी चाहिए।
  • ग्रैंड पेरेंट्स और पेरंेट्स के बीच का बांडिग स्ट्रांग होनी चाहिए। 

ग्रैंड किड्स और ग्रैंड पेरेंट्स की जोड़ी के बारे में पहले से ही कहा जाता है कि बच्चा बूढ़ा एक समान। बूढ़े होते माता-पिता के लिए सहारे की लाठी का काम भी ग्रैंड किड्स ही करते हैं। अगर दोनों के बीच की कैमेस्ट्री स्ट्रांग हो जाए तो घर में रौनक भी रहती है और हम आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से मजबूत भी बनते हैं।

Special Post

बारिश के माैसम में बात करेंगे फैशन की - डा. अनुजा भट्ट

रिमझिम फुहार हाे और पार्टी करने का मन हाे  खाने पीने का सब बंदोबस्त हाे ताे बस एक सवाल परेशान कर देता है । आज पहने क्या। ताे दाेस्ताें जब मा...