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शनिवार, 18 जनवरी 2025

मिथक यथार्थ और फेंटेसी का दस्तावेज-डॉ. अनुजा भट्ट

 


(अब पहले की तरह किस्से कहानियों की कल्पनाएं हमें किसी रहस्यमय संसार में नहीं ले जाती क्योंकि हमारी दुनिया में ज्ञान, विज्ञान और समाज विज्ञानों की उपलब्धियों ने इस तरह की घुसपैठ कर ली है कि वे सारी चीजें हमारी जानकारियों आदतों और कल्पनाओं का हिस्सा बन गई हैं। ) यह वाक्य इस किताब का सार कहता है। एक नजर इस किताब पर.

कलबिष्ट खसिया कुल देवता की कहानी एक प्रेमकहानी है। यह कहानी दो जातियों के वर्चस्व और क्षरण की भी कहानी है। इसमें एक और कहानी भी छिपी है जिसमें प्रेम प्रतिदान मांगता है। मुझे इस कहानी में कलबिष्ट के साथ कृष्ण और कमला के साथ राधा भी दिखते है। कलबिष्ट और कृष्ण दोनों ग्वाले हैं और बांसुरी बजाते हैं। राधा और कमला मोहित हैं बांसुरी की तान पर और बांसुरी वाले पर।
दोनो का प्रेम परवान चढ़ता है पर समाज में स्वीकार्य नहीं। कृष्ण और राधा एक दूसरे के पूरक बन जाते हैं पर कलबिष्ट और कमला नहीं। कलबिष्ट अहं, जातिवाद और शोषक और शोषित की भेंट चढ़ जाता है और अंततः एक लोकदेवता के रूप में मूर्ति में निरूपित। क्योंकि वह अजातशत्रु के रूप में जाना जाता है इसलिए वह न्याय का देवता है। जागर उसके बिना अधूरा है।
लोक देवी देवता जो हमारे पुरखे हैं उनको प्रसन्न करने के लिए जागर लगाया जाता है और इस जागर में कलबिष्ट को कई तरह से याद किया जाता है। उसे खुश करने के लिए कई तरह की युक्तियां है संगीत है, आग है और है भयभीत वातावरण। मुक्ति की कामना में उठे हाथ।
कलबिष्ट ग्वाला चरवाहा अपनी बांसुरी के उदास सुरों में समूची बिनसर पहाड़ी में नोमेद संगीत का जादू बिखरेने वाले के रूप में ख्यात हो गया और उस ग्वाले में चंद राजा के दीवान सकाराम पांडे की कलाप्रेमी पत्नी कमला का दिल आ गया। वह पूरा दिन उससे बांसुरी सुना करती।
सकाराम पांडे जिसकी ख्याति नौ लाख का राजस्व उगाहने के कारण नौलखा पांडे के नाम से थी उसके लिए यह सब सुन और देखपाना असहनीय था। जैसा हर पारंपरिक कथा कहानी में होता है वैसा ही यहां भी हुआ कल बिष्ट की बहुत वीभत्स तरीके से हत्या करवा दी गई। उसे मारना आसान नहीं था। उसे सदाशयता का वरदान मिला था इस कारण वह बार बार बच जाता था।
कलबिष्ट मारा जाता है पर उसकी आत्मा विचरती रहती है। अब उसकी पूजा होने लगती है और वह मंदिर में स्थापित हो जाता है। जैसे जैसे प्रसंग आगे बढ़ने लगता है तार्किकता संवेदनशीलता और यथार्थवादी बाजारीकरण की कथा के बीच में आते हैं पुरखे। अन्याय और शोषण सहे पुरखे तथाकथिततौर पर औतरने (नाराज) लगते हैं और फिर धीरे धीरे एक दिन मंदिर में स्थापित हो जाते हैं। उनके बहाने से समाज के पैरोकार एक नया समाजशास्त्र रचते हैं जिसे मानव मन की चाशनी में इस तरह डुबोया जाता है कि यह जानते हुए भी यह सब झूठ है हम सच कहने में डरने लगते है। हमें मानने पर मजबूर किया जाता है कि हमारे पुरखे अपने साथ हुए अन्याय का बदला लेने आ गए हैं वह हमारे सपनों में दस्तक देते हैं और जीवन में जितने भी कष्ट हैं उसके लिए उत्तरदायी है। उनको शांत करने के लिए कुछ किया जाना है। इस कुछ के भीतर एक मायाजाल है। इस मायाजाल में आधुनिक सुखसुविधाओं से लेस यह सामाजिक है जिसे मंहगी गाड़ी फोन जूते घडियां और रत्नों से भरी अंगूठियां से पहचाना जा सकता है। अंगूठियां राशियों पर छाए संकट हरण का प्रतीक हैं। गांव में सौ साल पहले की दादी और ग्वाल्वेकोट की गोपुल्दी जैसे अनेकों किरदार अगल अलग समय में अलग अलग लोगों से रचे जाते हैं। यह किरदार हर बार कहानी में कुछ नया टिवस्ट लाते हैं लिहाजा औतरना (नाराज) भी पहले से ज्यादा भयभीत करता है। कहानी में रोमांच, भविष्य और जिंदगी की ऐसी डोज भरी जाती है कि हर एक के लिए बस यही एक दवा है और इससे मुक्ति के लिए जागर लगता है। वास्तव में जिन जिन को यह पुरखे परेशान कर रहे हैं वास्तव में वह मनोरोगी हैं उनका इलाज किया जाना जाना चाहिए।
पुरखों का डर बिठाना और फिर शांति के लिए एक बड़े इवेंट जागर का आयोजन करना और इस बहाने घर गांव में अपनी पहचान सुरक्षित करना और इस सेल्फी युग में रील बनाना प्रचारित और प्रसारित करना हिट की जद्दोजहद और इसमें भी रार के साथ पुरखा पुराण का पटाक्षेप होता है।
इन सबके खिलाफ बोलने वाला टारगेट किया जाता है और यह टारगेट विश्वव्यापी है। भोज जैसा एक सामान्य सा शिष्टाचार जिसमें परिवार के सब लोग मिलजुलकर हाथ बटाते थे अब केटरर के हाथों में है। मैं उस दौर की प्रत्यक्ष गवाह हूं जिसे मैंने अपने बचपन में जिया। सामूहिकता का अर्थ जहां सृजन था। एपण हो रंग्वाली का पिछौड़ा बनना हो या फिर मिठाई। स्वेटर की बुनाई हो या फिर बहुत कुछ और। सभी के चेहरे पर उल्लास की दीप्ति थी। आधुनिकता और बाजार ने सबसे पहले सामूहिकता पर प्रहार किया। और हमारे भीतर के डर को और मजबूत। कारण यह था कि अपना मन साझा करने के लिए हमारे पास विश्वास के चंद लोग भी नहीं थे। हस्तशिल्प के विकल्प के तौर पर रेडीमेड ने दस्तक दी। तो मोबाइल के मैसेज और स्टेटस ने इन शब्दों का अर्थ पूरी तरह बदल दिया।
इस किताब में लेखक की मनोदशा हमें घर घर की कहानी लगती है। जिस संवेदनशीलता से लेखक ने इस प्रसंग को लिखा है वह साहस और दूरगामी सोच को लक्षित करता है। इतिहास में हम देखते हैं कि जब जब सामाजिक जागरण की बात हुई तब तब ऐसे नायक को समाज ने किस तरह लिया। राजाराम मोहन राय जैसे लोगों की आज भी जरूरत है क्योंकि अधिकांश कहानियों में पात्र स्त्री ही है। वह ही दंडित है वह ही लक्षित।
लेखक भी समाज की इस विसंगति का शिकार होने से बच नहीं पाता। वह लिखता है
अपने ही जीवन में मानो मेरा पुनर्जन्म हो चुका था जिसे मैं महसूस कर रहा था मगर स्वीकार नहीं कर पा रहा था मैं ऐसी विसंगति का हिस्सा बन चुका था जो मेरी वास्तविकता तो थी मगर मैं उससे जल्दी से जल्दी मुक्त होना चाहता था।
इस किताब में कई सवाल है जो साथ साथ चलते हैं जाति का सवाल भी इससे ही जुड़ा है। लेखक जैसे खुद की खोज भी करता है। वह इसके लिए इतिहास मिथक और भूगोल के साथ सामाजिक तानेबाने पर भी नजर रखता है। वह बार बार दोहराता है कि जब सब जातियां एक बराबर है जब सब मनुष्य एक जैसे हैं तो यह वर्ण व्यवस्था कहां से आई। क्यों बनाई गई। मनुष्य के मन में मनुष्य के प्रति सीमाएं क्यों तय की गई। अगर ऐसा न होता तो राधा कृष्ण के बीच में कोई न होता और कमला और कलबिष्ट के बीच में भी।
इस किताब में लोकोक्ति की भी विवेचना है जो कहानी सा रस देती है। कई लेखकों और विचारों को भी लिया गया है। यह इस लिए भी महत्वपूर्ण है कि इससे हमें कथा के नए आयाम भी पता चलते हैं जो एक नया दृष्टिकोण बनाते हैं। मिथकीय कहानियां हमें देवीदेवता के परंपरागत रूप से अलग रूप का भी परिचय देती हैं। यह मूर्तियां उस समय के समाज और उसका मन पढ़ने के लिए काफी है।
कलबिष्ट- खसिया कुलदेवता
लोकदेवता के बहाने उत्तराखंड का सांस्कृतिक आख्यान
लेखक- बटरोही
प्रकाशक -समय साक्ष्य देहरादून
मूल्य- 125 रुपये

रविवार, 28 जुलाई 2024

नील छवि एक रिश्ता दर्द भरा- महाश्वेता देवी- समीक्षा डॉ अनुजा भट्ट

सुप्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी जी की पुण्य तिथि पर                                  जी पुण्यतिथि

महाश्वेता देवी का उपन्यास नील छवि आज के समाज की विसंगति को दर्शाता है । इस विसंगति की मुख्य वजह है ऐसी महत्वाकांक्षा जिसे बिना पैसे के हासिल किया जा सके और उसके लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहा जाए। ऐसी महत्वाकांक्षी लोग फिर न रिश्तों को देखते हैं और न ही व्यक्ति की संवेदना को। सिर्फ पैसों की खनक सुनाई देती है और जब यह पैसों की खनक न सुनाई दे तो सारे रिश्ते खतम हो जाते है। नील छवि में ऐसी दो विचारधाराएं हैं। एक के लिए रिश्तों का अर्थ है और वह उनको बनाए रखने के लिए कुछ भी कर सकता है और दूसरी विचारधारा में पैसे के लिए किसी से भी कभी भी रिश्ता जोड़ा या तोड़ा जा सकता है। महत्वाकांक्षा के लिए स्त्री किसी भी हद तक जाती है तो अपनी पहचान को बनाने के लिए जोखिम भरे काम को करने वाला पुरुष भी है। इन दोनों के बीच में संतान है जिसका किसी भी तरह का कोई भी संस्कार विकसित नहीं हो पाता और वह दिशाविहीन जीवन की ओर कदम बढ़ाते बढ़ाते लडख़ड़ाने लगती है और एक दिन गायब हो जाती है। तब जाकर स्त्री पुरूष यानी उसके माता पिता को अहसास होता है।
पुरूष स्वाबलंबी है पर महत्वाकांक्षी नहीं पर समाज के लोग उसे महच्वाकांक्षी बनाने पर तुले है और उसके बहाने कई तरह के व्यापार कर रहे हैं। लेकिन वह हमेशा हाशिए में खड़े लोगों की मदद करता है चाहे वह कोई भी क्यों न हों। उसका स्वभाव खोजी है और वह हर रोज कुछ नया खोजने के लिए कई तरह की सुरंगों से गुजरता है। पर जब खोजी पत्रकारिता के जरिए वह अपनी बेटी को ढूंढ रहा होता है जो ब्लू फिल्म बनाने वाले गिरोह में फंस गई है तब वह सवाल करता है कि हम सब अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए या अपने सपनों को पूरा करने की जिद में अपने बच्चों से कितने दूर हो गए है हमारे पास उनके लिए समय नहीं है और वह भटक रहे हैं। हम उनको पैसा दे रहे हैं उनके मंहगे शौक पूरे कर रहे हैं, उनको पूरी आजादी दे रहे हैं पर क्या परवरिश का यह तरीका ठीक है?
कहानी के ताने बाने इतने सघन है कि पढ़ते हुए लगता है जैसे आप कोई फिल्म देख रहे हैं। कहीं भी लोच नहीं एकदम कसी हुई कहानी।
यर्थाथवादी और भावुकतावादी दो व्यक्तित्व जब मिलते हैं तो किस तरह का जीवन होता है यह इस उपन्यास को पढक़र जाना जा सकता है जहां एक व्यक्ति रिश्तों को असहमति के बाद भी महसूस करता है और दूसरा व्यक्ति रिश्ते का अर्थ समझ ही नहीं पाता और जब समझ आती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। संतान के लिए माता पिता दोनो के कर्तव्य हैं पर कानून संतान को मां के हवाले करता है और पिता संतान से दूर हो जाती है। रह जाती है सिर्फ मां । ऐसे में पिता अपनी भावनात्मक मजबूती को कैसे बनाए यह सवाल भी बड़ी शिद्दत के साथ उठाया गया है। क्या पिता का अपनी संतान पर कोई हक नहीं कि वह उसकी परवरिश के बारे में सोचे। इस उपन्यास में पिता अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करता है और अपनी जान को जोखिम में डालकर अपनी बेटी को उस गिरोह से निकाल लाता है। वह अपनी बेटी की सुरक्षा, उसकी भावनाओं के लिए इतना ज्यादा संवेदनशील है कि वह वहां से सारी सीडी भी लेकर आता है जिसमें उसकी बेटी है। वह अपनी पत्नी से किसी से भी इन बातों का जिक्र करने से मना करता है। घर के मान, बेटी की इज्जत की उसको परवाह है। वह उसे मुख्यधारा में लाने की कोशिश करता है उसका इलाज करवाता है। उससे मुक्त नहीं होना चाहता। वह अपनी बेटी से नाराज नहीं बल्कि उसे ग्लानि है कि उसके कदम अगर बहके तो उसके लिए यह समाज जिम्मेदार है जो भौतिकतावादी रहन सहन को महत्व देता है जहां भावनाओं का नहीं पैसे का असर है। इसकी वजह से उसकी पत्नी प्रभावित हुई और उसे लगा कि पैसा ही सबकुछ है। इसके लिए उसने अपने पति को छोड़ दिया। जिन लोगों का साथ उसने चुना उन्हीं लोगों ने उसकी बेटी को अपना निशाना बनाया। वह यह सब समझ नहीं पाई क्योंकि उसे बस पैसे कमाने थे। उसने बहुत पैसे कमाएं। बेटी को उसने बहुत सारे पैसे दिए पर समय नहीं। इच्छाएं उसके मन में भरी पर प्रेम नहीं। इसी प्रेम की तलाश में उसकी संतान भटक गई।
यह उपन्यास वस्तुतः हमारे आधुनिक नगरीय समाज की खोखली होती नैतिक मान्यताओं और बीभत्स स्थितियों का बड़ा ही मार्मिक चित्रण प्रस्तुत करता है। ‘ड्रग्स’ और ‘ब्लू फ़िल्म’ किस तरह हमारे आधुनिक समाज की जड़ों को खोखला कर रहे हैं, इसका बेहद तीखा और यथार्थपरक चित्रण इस रचना में किया गया है। इसके अलावा पत्रकारिता, कला-जगत, और तथाकथित उच्चवर्गीय जीवन की विषमताओं और विडम्बनाओं का साक्षात्कार है ।
कथा में उत्तेजना, जिज्ञासा और आतंक का वातावरण अन्तिम पृष्ठ तक व्याप्त रहता है। एक अत्यन्त पठनीय, रोचक तथा विचारोत्तेजक कृति। आपको मौका लगे तो इस उपन्यास को जरूर पढ़ें।
नील छवि
महाश्वेता देवी राधाकृष्ण प्रकाशन

रविवार, 20 मार्च 2022

वह साल बयालीस था एक पठनीय उपन्यास

रश्मि भारद्वाज का उपन्यास वह साल बयालीस था एक पठनीय उपन्यास है। उपन्यास की कथावस्तु, संवेदनशीलता के उस चरम बिंदु को छूती है जहां मानवीयता और संवेदनशीलता के बीच गहरा द्वंद भी है और सामंजस्य भी। अंततः कहानी अपने रास्ते से होते हुए दोनों को एकाकार कर देती है। इतिहास, दर्शन कला, साहित्य, प्रकृति को रंगों शब्दों और भावों से एकाकार कर जब वह गद्य रचती हैं तो उसका सुंदर बनना स्वभाविक ही है।

 प्रेम को महसूस करना, प्रेम का छूट जाना, प्रेम में डूब जाना, प्रेम की दीवानगी, प्रेम का अतिरेक, प्रेम से विराग, प्रेम से राग, प्रेम से आसक्ति अनासक्ति से लेकर यह कहानी देशप्रेम के लिए न्यौछावर हो जाने वाले प्रेम की भी कहानी है ।

 यहां लेखिका ने प्रेम शाश्वत है, की अवधारणा को बहुत मजबूती से अपने कथ्य का हिस्सा बनाया है। वह उसे  अलौकिक दिव्य सा महसूस कराती हैं । यह कैसी विडंबना है कि इन सबके बावजूद यह शाश्वत प्रेम भी एक बक्से में बंद है और अपनी मुक्ति चाहता है।

 इस उपन्यास में स्त्री की संवेदनशीलता एकरूप है चाहें वह भारतीय है या विदेशी। प्रेम का कोई रूप रंग नहीं होता उसे महसूस किया जा सकता है। कहानी की सूत्रधार अना भी यह महसूस करती है, उसकी दादी रुप भी है और अंग्रेजन... भी।

प्रेम, समर्पण, कर्तव्य, दायित्व, देय, प्रदेय की इस अद्बभुत कहानी में देश और समाज के सरोकार भी है। जानेमाने लेखकों के कोट्स, कविताएं रचना की गतिशीलता को और मधुर और सांगेतिक बनाते हैं।

  यह उपन्यास, कला के उन सभी औजारों से निर्मित है जो आज की रचनाशीलता के लिए बहुत जरूरी है। इस उपन्यास में शैली के रूप में भी कई प्रयोग हैं। कभी यह आत्मकथा है, कभी संस्मरण, कभी यात्रावृतांत, कभी डायरी तो कभी रिपोर्ट।  रचनाकार ने छोटे छोटे नोट्स का इस्तेमाल भी बहुत खूबसूरती से किया है ब्रश के स्ट्रोक की तरह।

  इस उपन्यास को पढ़ते हुए ऐसा लगा जैसे पीछे एक धुन लगातार बज रही हो अपने पूरे माधुर्य के साथ ऊधौ मन न भए दसबीस.. मुझे क़ृष्ण राधा और ऱूकमणि से जुड़ी पौराणिक कथाएं भी बरबस ही याद आई ।  इन सबके बावजूद भी उपन्यास में कुछ छूटा सा लगा। जैसे हाथ में आई गैंद अचानक टप्पा खाकर गिर जाए। मैं तो प्रेम के सरलीकृत रूप पर मुग्ध थी और सोच रही थी काश प्रेम इतना सहज स्वीकार्य होता जैसा यहां दिखाया गया है। इसका उत्तर मुझे फिर अना की दादी के बक्से की तरफ ले जाता है जिसकी चाबी दादाजी ने कभी किसी को नहीं सौंपी। अपने अंत समय में अना को छोड़कर...

 एक सवाल जरूर उठा कि वह दादा जी जिन्होंने अपनी पत्नी रूप के  इस सच को स्वीकार किया कि वह उनसे प्रेम नहीं करती और इसके बावजूद वह पूरे जीवन उससे प्रेम करते रहे औऱ समर्पित रहे। समर्पण तो उनकी पत्नी रूप ने भी किया, दांपत्य को भी जिया पर प्रेम को नहीं। इस गुत्थी भरे जीवन को जीने वाले दादा जी ने अना की मां को क्यों नहीं स्वीकार किया। जबकि वह जानते थे कि उनका बेटा फातिमा से कितना प्यार करता है। उन्होंने अपने बेटे को जीवन भर माफ नहीं किया। यह विरोधाभास खटकता है।

कुल मिलाकर उपन्यास पठनीय है और ताजगी से भरपूर भी।

किताबों की दुनिया   

वह साल बयालीस था

रचनाकार रश्मि भारद्वाज

सेतु प्रकाशन

 

शनिवार, 19 फ़रवरी 2022

तारीख में औरतें एक जरूरी किताब है डॉ. अनुजा भट्ट


 

तारीख में औरतें

अशोक पांडे

 स्त्रियों की कहानियां कहने के लिए अशोक पांडे एक बड़ा कैनवास रचते हैं। एक ऐसा कैनवास जिसमें कई रंग है और रंगों में घुली हुई है महक। यह सारी कहानियां जिस कोमलता, संजीदगी, अपनेपन की हकदार हैं इनको शब्दों में वैसे ही उतारा गया है। पढ़ते हुए कई बार आंखें नम हो जाती है और इन किरदारों के बीच हर आम स्त्री की झलक दिखाई देने लगती है। एक आम स्त्री के नाते मैं भी इसे महसूस करती हूं। विश्व भर की नायिकाएं जिंदगी में जिस मुश्किल दौर से गुजरती हैं, वह चौंकाने वाला है। लेकिन इन कहानियाें का निष्कर्ष यह है कि आखिरकार आदमियों के दबदबे वाली इस दुनिया में वह अपनी मजबूती से अपना हक पा लेती हैं। हालांकि इसके लिए उनको बहुत कुछ खोना पड़ता है। जिस दिन वह इस सच्चाई से रूबरू हाे जाती है कि जिंदगी न मिलेगी दोबारा, इसलिए इसे अपनी खुशी और अपने आसमान के लिए जी लेना एक अच्छी बात है उस दिन से ही उसके सही सफर की शुरूआत हो जाती है। इतिहास के पन्नों में उसका नाम दर्ज हो जाता है। वह यादगार तारीख बन जाती है। बात बात पर उसकाे उसकी औकात और  ठेंगा दिखाने वाले पुरुष को पता ही नहीं चलता कि उसने ऐसा करके क्या खोया है। 

 उसके अहसानाें काे अपने अहसासों में बदलती, संवेदना के हर तंतु को संवारती, संभालती वह बिखरते हुए भी संवरती जाती है। स्त्री की यही ताकत है जो उसे असीम शक्ति देती है। जिसके साथ चमकीले सपनाें का आसमान लेकर आई थी  उसी से दुःख, पीड़ा, अपमान सहती एक दिन पाती है वह ताे कब की जिंदगी के पन्ने में  हाशिए से भी बाहर है जिसकी उसे खबर नहीं। तब दो ही स्थितियां बनती है या तो वह बिखर जाती है या उसके भीतर की सजग स्त्री जाग जाती है। सवाल पूछने वाली स्त्री, विराेध करने वाली स्त्री किसी को पसंद नहीं आती। लेकिन एक दिन वही सवाल पूछने वाली स्त्री समाज की केंद्रबिंदु बन जाती है।

      अपनी चोटी में बीज टांगकर वह पूरी दुनिया को खेती के गुर सिखा देती है तो कहीं वह चित्रकार बनती है कहीं फोटोग्राफर । कहीं दौड़ती स्त्री है तो कहीं गजल और कविता कहती स्त्री। कहीं अभिनेत्री है तो कहीं गायिका  कहीं अपने बच्चे की मेधा  को पहचान कर उसे वैज्ञानिक बनाने की साध है तो कहीं सुर की मखमली आवाज।

 स्त्री के हर रूप की झलक यहां है। एक मजबूत स्त्री की, एक संवेदनशील स्त्री की।

 मेरी रंगीन पेंसिलों में

 सिर्फ हरी वाली हो गई है छोटी

दिखाती हुई

किस रंग की कमी है मेरे भीतर

माची तवारा की ये पंक्तियां जैसे भीतर तक असर कर गई है।

    

सोमवार, 20 दिसंबर 2010

स्त्री के बोल्ड स्टेटमेंट्स की फोटोकॉपी- नेम प्लेट



डॉ. अनुजा भट्ट

चर्चित कथाकार क्षमा शर्मा का कहानी संग्रह नेम प्लेट स्त्री के मन की खिड़कियां खोलता है। यह स्त्री के मन के बदलाव, उसके भीतर की उथल पुथल और धीरे धीरे साहसी हो जाने की अविरल कथा है। दादी मां के बटुए में जहां लडक़ी के दुनिया में न आने के लिए तमाम तरह के प्रयोजन हैं, छद्म हैं, वह अगली सदी की एक लडक़ी तक आते आते समाप्त हो जाते हैं। आदर्शवाद और उपयोगितावाद की छड़ी बहस में आदर्शवादी अपना मूल्यांकन करता है। वह यह सोचता है कि हर किसी व्यक्ति के लिए आदर्श की अपनी परंपरा है आपके विचार से किसी का प्रभावित होना जरूरी नहीं है।
इन कहानियों में एक बात बार बार रेखांकित होती है वह है पुरूष द्रारा स्त्री को बार बार ठगा जाना। उसे अपनी वस्तु समझना। और ऐसा एकाधिकार रखना जैसे वह उसके पिंजरे में बंद हो वह चाहे तो फडफ़ड़ाए, वह चाहे तो आवाज करे। और अगर वह न चाहे तो उसके होने तक का अहसास न हो। जैसे स्त्री उसके कोट में लगा रुमाल हो जिसे सब देखें। कहानियों में पुरुष का यह अहं भाव स्त्री के बार-बार आड़े आता है पर हर बार स्त्री उसे ऐसे झटक देती है जैसे उसकी साड़ी पर अभी अभी कोई कीड़ा गिरा हो। हंसी शब्द को लेखिका बहुत ही प्रतीकात्मक तरीके से व्यक्त करती हैं। जोर से हंसी में कई दंभ ध्वस्त हो जाते हैं। यह हंसी हर कहानी में है। हंसकर बात टाल दी जैसी अभिव्यंजना तो कई बार पढऩे को मिलती है पर हंसकर किसी के दंभ को चकनाचूर कर देना और रिश्ते के अर्थ और गरिमा के साथ न्याय करना अपने आप में एक नया प्रयोग है। छद्मधारी पुरुष को कहानी में आई नायिकाएं ऐसी पट्खनी देती हैं कि दूध का जला छांछ को भी फूंकफूंक कर पीने लगे। प्रेम की कोमल भावनाओं के अलावा गंदगी जैसी कहानियां भी है जो कामकाजी और गैरकामकाजी स्त्री की सोच के अंतर को प्रकट करती हैं। बूढ़ी औरत का दर्द है तो फादर जैसी कहानी में पिता के न होने के क्या अर्थ हो सकते हैं इसका भी विश्लेषण है। यह बहुत सुंदर कहानी है। इस संग्रह की सबसे खूबसूरत कहानी है बेघर। एक तरफ प्रेम की भावना जो किसी भी बंधन को नहीं मानती और उसको पाने के लिए हर रिश्ते को झुठला देती है। हर किसी से मुंह मोड़ लेती है पर प्रेम को नहीं खोती। लेकिन उसको पा लेने के बाद वह खुद को इतने सारे बंधनों में जकड़ लेती है अपने भीतर इतने सारे बदलाव लाती है कि यह सोच पाना कठिन हो जाता है कि इसका असली रूप यह है या फिर वह जो 25 साल तक उसने जिया। असली रूप कौन सा है। प्रेम को बचाए रखने और मेरा निर्णय सही था को दूसरों के सामने साबित करने के लिए आखिरकार कितना बदलाव लाती है एक स्त्री । सिर्फ इसीलिए ताकि यह समाज मुंह न खोल सके। न उस स्त्री के सामने और न ही उसके परिजनों के सामने। कितने सारे डर समा जाते हैं एक स्त्री के मन में। पर पुरुष.. उसका प्रेम, उसकी भावनाएं सिर्फ और सिर्फ स्त्री की देह टटोलती हैं। और उस देह के लिए वह फिर से अपना संसार बसा लेता है।
नेम प्लेट इस संग्रह की महत्वपूर्ण कहानी है। यह एक ऐसे लडक़े की कहानी है जिसकी दोस्त बनने के लिए हर लडक़ी एक मुकाबला करती है। वह हर समय लड़कियों से घिरा रहता है और लड़कियों को उससे कोई डर नहीं है। उसे भी मालूम है कि वह लड़कियों में कितना चर्चित है। इसीलिए वह किसी लडक़ी की किसी बात को गंभीरता से नहीं लेता पर वह यह जताने की कोशिश करता है कि वह उनके प्रति बहुत गंभीर है। लेकिन कहानी अंत में आकर निर्मला पर ऐसे टिकती है कि बस आप हैरान रह सकते हैं एक अजीब सी हंसी आपको पूरे दिन गुदगुदा सकती है।
स्त्री के अलग अलग रूपों को व्यक्त करती और कुछ नया सोचने को विवश करती यह कहानियां एक ताजगी लिए हुए हैं। एक लडक़ी से लेकर प्रौढ़ होती स्त्री के मन के खिड़कियों पर यह एकाएक प्रवेश कर जाती है। जिसमें विराधोभास भी है, पर प्रेम भी है। नानी और पोती हो या सास बहू विचारों में भले अलग हो और हो सकता है कि विचार के स्तर पर दोनों एक दूसरे को पसंद न करते हो पर संवेदना के स्तर पर इतना जुड़े हैं कि पोती कमरे में सिर्फ इसीलिए ताला लगा देती है कि कहीं उसकी नानी फिर से खो न जाए। बहू अपनी सारी बातें कह देने के बाद भी अपनी भावी सास को चुंबन देती है। बच्ची अपने पागल दोस्त के लिए रोटी रखती है। और एक मां कभी नहीं चाहती कि उसके बच्चे को कोई कहे न्यूड का बच्चा। एक बुजुर्ग को परिवार से बेदखल कर देने के बाद एक लडक़ी ही अपने घर ले आती है उसके लिए वह अनमोल है जो न उसका पति है न बाप। न कोई रिश्ता। फिर भी एक चीज है वह है संवेदना।
हमें इसी संवेदना की तलाश है यह संवेदना चाहे आदर्श की चाशनी में डूबी हो या फिर आधुनिकता की चम्मचों में लिपटी हो। क्योंकि संवेदना विहीन समाज से किसी को कुछ भी नहीं मिलेगा।
लेखिका- क्षमा शर्मा, कहानी संग्रह- नेम प्लेट, मूल्य -80 रु। प्रकाशक- राजकमल प्रकाशक, नई दिल्ली।



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बारिश के माैसम में बात करेंगे फैशन की - डा. अनुजा भट्ट

रिमझिम फुहार हाे और पार्टी करने का मन हाे  खाने पीने का सब बंदोबस्त हाे ताे बस एक सवाल परेशान कर देता है । आज पहने क्या। ताे दाेस्ताें जब मा...