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शुक्रवार, 11 मई 2018

#मैंअपराजिताकहानीप्रतियाेगिता-कमलेश आहूजा

बचपन से पेंटर (चित्रकार ) बनने का सपना था. पर सबका मानना था कि,पेंटिंग हॉबी तक ठीक  है पर कैरियर के लिए नहीं.मन मार कर एम बीए कर लिया.फिर नौकरी की उसके बाद शादी हो गयी.फिर वही घर-गृहस्थी की जिम्मेवारियाँ.अपने मन के करने का कभी मौका ही नहीं मिला.धीरे धीरे मन से कुछ करने की इच्छा ही समाप्त हो गयी.लगता ही नहीं,कि मैंने कभी पेंटिंग प्रतियोगिताओं में इतने पुरुस्कार जीते थे.कैसे रंगों से कैनवास पर खेलती थी.जब चाहे जो भी रंग  भर देती थी..अपने ही द्वारा बनायी तस्वीर में. पेंटिंग कहीं सीखी नहीं थी बस अपनी कल्पनाओं से ही उन्हें साकार किया.
अब तो कुछ पेंटिग करने का सोचती तो लगता, कि ब्रश भी  ठीक से पकड़ना आयेगा या नही.?, रंगों का चयन व संयोजन सही तरीके से कर पाऊँगी या नहीं.?अपने ऊपर विश्वास तो जैसे रहा ही नहीं था.
अंधेरे में छोटे छोटे जुगनुओं को टिमटिमाते हुए देखा तो लगा,कि गहन अंधकार को दूर करने के लिए ये कैसे सतत प्रयत्नशील हैं अर्थात चमक रहें हैं.फिर मैंने क्यों हार मान ली.? मैं भी फिर से प्रयास करूँ तो अपने पेंटर बनने के सपने को पूरा कर सकती हूँ.जिम्मेवारियों का क्या.! वो तो मरते दम तक भी पूरी नहीं होती.
बस इसी सोच के साथ फिर से पेंटिंगस बनाना शुरू कर दिया.समय समय पर प्रतीक की मदद भी ली.रिया (विधायक) की मदद से शहर में होने वाली पेंटिग एक्सिबिशनस में मेरी पेंटिग्स को भी स्थान मिलने लगा.पेंटिग्स को लोग पसंद करने लगे और बड़े बड़े पुरुस्कार मिलने लगे.लोग मेरी बनायी हुई पेंटिंग्स को खरीदने लगे.धीरे- धीरे मेरी पेंटिग्स की माँग बड़ने लगी और मैं भी लोगों के बीच लोकप्रिय होने लगी.
आज मीना,रिया,संज्ञान व प्रतीक सभी मित्र घर आये.बातों ही बातों में मीना मुझसे कहने लगी- "अब तो तुम जानी मानी पेंटर बन गयी हो,मैं एक  कहानी तुम पर भी लिखना चाहती हूँ ".मैंने कहा- "हां क्यो नहीं..? जरूर लिखो और उसका शीर्षक रखना-"जुगनुओं सी चमक".क्योंकि जुगनुओं की इसी चमक ने मुझे फिर से अपने जीवन में रंग भरने की प्रेरणा दी.वरना मैंने तो अपनी ज़िंदगी बेरंग बना रखी थी.इसी चमक को देखकर मेरा खोया हुआ आत्मविश्वास पुनः लौट आया और मैं अपने पेंटर बनने के सपने को पूरा कर सकी.
इस मौके पर शायर संज्ञान कहाँ खामोश रहने वाले थे,एक शायरी उन्होंनें भी सुना ही दी...
       टूटने लगे हौंसला,तो ये याद रखना,
       बिना मेहनत के तख्तो-ताज नहीं मिलते.
       ढूंढ लेते हैं अंधेरों में मंज़िल अपनी,
       क्योंकि जुगनू कभी रोशनी के मोहताज                नही होते..!!

बुधवार, 18 अप्रैल 2018

#अपराजिताकहानीप्रतियाेगिता- निधि घर्ती भंडारी

रात भर आंखों में मानो जैसे नींद का नामोनिशान ही ना था | जुगनुओं को देखते देखते सारी रात कैसे कट गई पता ही ना चला सुबह उठकर मेरे मन में सिर्फ यही ख्याल आया कि जुगनू भले ही चांद की चांदनी का सामना ना कर सके लेकिन रात में चमकते हुए एक भटके हुए मुसाफिर को उसकी राह दिखाने का एक प्रयास तो करते ही हैं तो फिर मैं क्यों नहीं | सुबह उठते ही फोन में से मीना का नंबर ढूंढ कर कॉल किया और ई-मेल आई.डी. ली| लिखते-लिखते शाम हो गयी...जैसे तैसे कुछ शब्द लिख पाई....पढ़कर देखा तो वाह ये तो एक सुंदर सी कविता बन चुकी थी| कई-कई बार मैने वो कविता पढ़ी और खुली आंखो से जैसे सपने देखने लगी थी | अपनी कविता मै मीना को मेल कर चुकी थी, अब तो बस उसकी कॉल का इंतज़ार था जो मेरी जिंदगी बदलने वाला था....मै अपनी कविता को अब भी निहार रही थी, जैसे जन्म देने के बाद मां अपने बच्चे को निहारती है| 
मेरे अंतर्मन के अधूरे स्वप्न हे मेरे अंतर्मन के अधूरे स्वपन!
 तुम क्यूं हो इतने निर्दयी-निष्ठुर?? 
अंखियों में क्या इस तरह बसे हो, या फिर इस अंतर्मन में?
 कि तुम्हें पूर्ण करने की इच्छा कहूं या पिपासा, दिन रात तुम्हें स्मरण करूं| 
झुंझलाऊं- छठपटाऊं मैं कि किस तरह तुम्हें पूर्ण करूं|
 तुम दिवास्वप्न बनकर क्यूं दिनभर मुझे सताते हो?

 रातों को अखियां बंद करूं, तो सामने तुम आ जाते हो 
जब रहना तुम्हें अधूरा ही क्यूं पल-पल आस बंधाते हो?
 तुम क्यों मुझको तड़पाते हो? मुझे सारी रैन जगाते हो| 
 अपनी कविता में मैं बस खोई हुई थी और अपने भविष्य से जुड़े अनगिनत सपने बुन ही रही थी कि अचानक मीना का कॉल आ गया और उसने जो मुझसे कहा वह मेरे मुंह पर एक खामोश तमाचे सा लगा | मेरी कविता उसे बहुत निम्न स्तरीय लगी इसलिये उसने इसे रिजैक्ट कर दिया| अपने ख्वाबों को यूं बिखरते हुए देखना बहुत दुखद था मेरे लिए, पर मुझे एक उम्मीद की किरण दिखाई दी संज्ञान के रूप में| मैंने उसे भी अपनी कविता की एक कॉपी मेल कर दी परंतु वह तो इतना बिजी था कि कभी उस मेल को पढ़ ही ना पाया| 
 उस रात भी मै टिमटिमाते हुये जुगनुओं को ही निहारती रही आखिर वही तो थे जो अभी भी मेरा हौसला बढ़ा रहे थे| अगली सुबह सारा काम निपटाकर जब मैं अपनी खिड़की के सामने बैठी तो सामने की बस्ती में रहने वाले छोटे-छोटे बच्चे बीच सड़क पर क्रिकेट खेलते हुए नजर आए | मन में एक सवाल कौंधा कि दिनभर खेलते रहते हैं तो क्या स्कूल नहीं जाते? तभी खिड़की का शीशा तोड़कर उनकी बॉल अंदर आ गई| पूरी टोली मेरे घर ही पहूंच गई बॉल वापस मांगने| दिखने में थोड़े गंदे जरुर थे पर थे बड़े प्यारे| अब क्या मैने उनकी बॉल के साथ-साथ उन सबको खाने को चॉकलेट भी दी और वो सब मेरे दोस्त बन गये| उनसे बातों के दौरान मुझे पता चला वे लोग स्कूल नही जाते | पास में कोई प्राथमिक विद्यालय नही है और जो प्रतिष्ठित विद्यालय है भी, सोसायिटी के लोग चाहते नही के ये बच्चे वहां पढ़े| समस्या तो वाकई में काफी गंभीर थी| मन में आया दिन भर खाली ही तो रहती हूं क्यूं ना मै ही इन्हें पढ़ा दूं? अपने नन्हें दोस्तों से पूछा तो उन सबने भी हामी भर दी| बस फिर क्या था अगले ही दिन से चल पड़ी अपनी क्लास| धीरे-धीरे मेरी ये नन्ही सी कक्षा छोटी पड़ने लगी, विद्यार्थी अब बढ़ने लगे थे| हां थोड़ा समय जरूर लगा लेकिन मेरी मेहनत अब रंग ला रही थी| मैने प्रतीक से बात की तो वो भी इन बच्चों को निशुल्क वेस्ट मैटिरियल क्राफ्ट ट्रेनिंग देने लगा| 
अब हमारे सामने एक उप्युक्त जगह की समस्या खड़ी थी, जिसके निवारण के लिये हमने अपनी मित्र क्षेत्रीय विधायक रिया से बात की| उन्होने हमें जगह मुहैय्या करवाई और उनकी तरफ से हर प्रकार की मदद का आश्वासन दिया| जिसके लिये मैं हमेशा उनकी आभारी रहूंगी| धीरे-धीरे अन्य शिक्षित लोग भी हमारे इस मिशन में सहयोग हेतु आगे आने लगे| अब मेरा यह छोटा सा प्रयास एक बहुत बडे़ स्तर पर आर्थिक रूप से अशक्त परिवारों के बच्चों को उनके शिक्षा के अधिकार दिलवाने में तब्दील हो चुका था| हम उन्हें बेसिक नॉलेज(इंग्लिश टॉकिंग, बॉडी हाईजीन, पर्सनैलिटी डेवलेपमेंट) देते थे जिसके बाद वो बच्चे प्रतिष्ठित स्कूलों में आराम से एडमिशन ले पाते थे, इसके बाद उनकी पढ़ाई ट्यूशन आदि निशुल्क उपलब्ध करवाई जाती थी|
 सच कहूं तो मैने समय काटने के लिये ये छोटी सी शुरूआत की थी मगर आज यही मेरा जुनून बन चुका था| अब पूरे शहर भर में हमारे तेरह सेंटर खुल चुके हैं और मेरा सपना उस दिन पूरा होगा जब पूरे देशभर में एेसे सेंटर खुल जाएं| कल मीना और संज्ञान मेरे घर पर मेरे प्रयास के लिये मुझे बधाई देने आये थे, हालांकि मैने कुछ कहा तो नही लेकिन मै समझ चुकी थी कि उगते हुये सूरज को हर कोई सलाम करता है| लगे हाथ मीना ने मुझपर कहानी लिखने की अपनी मंशा ज़ाहिर कर दी परंतु मैने भी व्यस्तता का हवाला देते हुये असहमति प्रकट कर दी| जुगनुओं को रातभर निहारने का समय तो अब नहीं मिलता मगर रोज़ रात को कुछ देर खिड़की पर खड़ी होकर मै उनका धन्यवाद करना नहीं भूलती| आखिरकार मुझ भूली-भटकी को रास्ता तो उन्होंने ही दिखाया है| 

सोमवार, 16 अप्रैल 2018

#मैंअपराजिताकहानीप्रतियाेगिता - मंजू सिंह

हाँ सभी फ़र्ज़ पूरे हो गए | बच्चों को उनके पैरों पर खड़ा करने के लिए जितना कर सकी किया| सब के लिए बहुत जी मर ली | सभी ने तो अपनी ज़िन्दगी में जो चाहा वो किया | मैं ही कभी मन की नहीं कर पायी जब भी चाहा अपने लिए कुछ तब परिवार की कोई न कोई ज़िम्मेदारी पाँव की बेड़ी बन गयी | उदय भी तो मंझधार में छोड़ गए मुझे | वो भी ऐसे समय जब मुझे उनकी सबसे ज़्यादा ज़रुरत थी | उन्होंने भी तो मन की करने में कोई कसर नहीं छोड़ी | तब गए तो आज तक मुड कर नहीं देखा | न कभी मेरी न बच्चों की सोची | क्या पैसे से ही सारी ज़िम्मेदारियाँ पूरी हो जाती हैं ? क्या बच्चों की ज़िन्दगी में पिता की कोई अहमियत नहीं होती ? हे भगवान ये सब कहाँ से घूमने लगा दिमाग में ! नहीं अब और नहीं निभा दिन अपनी ज़िम्मेदारियाँ मैंने अकेले ही | उदय भी तो अपनी दुनिया अलग बसाये मस्त हैं | तो फिर मैं ही क्यों ? कल रात ही तो मुझे चमकते जुगनुओं ने राह दिखाई थी नयी | और आज यह सब | नहीं अब नहीं अब मुझे भी जीना है अपने लिए अपनी ख़ुशी के लिए अपने सपनों के लिए | मैंने अपने सर को एक ज़ोरदार झटका दिया मानों ऐसा करने से हर फालतू की बात को दिमाग से झटक कर दूर फेंक दूँगी | कोशिश ज़रूर करूंगी | शादी से पहले फैशन डिजाइनिंग का कोर्स किया था कितने अरमान थे कितने सपने थे कि मैं अपना लेबल लॉन्च करूंगी | लेकिन गृहस्थी में एक बार जकड़ी तो सब सपने धरे के धरे रह गए | अब करूंगी , ज़रूर करुँगी | किसी भी नयी शुरुआत के लिए कभी देर नहीं होती | और फिर रुझान तो मेरा कभी टूटा ही नहीं | इसी चक्कर में कंप्यूटर भी तो सीख लिया था मैंने |
       आज मेरी ज़िन्दगी कि नयी सुबह है | आज से ही नयी ज़िन्दगी कि आगाज़ होगा | सब कुछ बहुत आसान लग रहा था लेकिन अब सोच रही हूँ तो समझ ही नही आ रहा कि कौन सा सिरा कहाँ से पकड़ूँ | अरे हाँ याद आया ऋतु है न | हम दोनों ने एक साथ ही तो ट्रेनिंग ली थी | सोशल मीडिया पर तो उसके डिजाइन देखती ही रहती हूँ फोन नम्बर भी मिल जायेगा कॉल करती हूँ उसे | "हेलो " "कौन पुन्नो ? " उसने हेलो कहते ही मुझे पहचान लिया चार साल पहले ही मिली थी पर ज़्यादा बात नहीं होती थी | "वाह पहचान लिया" "कैसे नहीं पहचानती ,और बता आज इस नाचीज़ को कैसे याद किया ? तुझे तो कभी फुर्सत ही नहीं मिली अपने घर से " "क्या यार ताना मत मार अब छोटी उम्र में शादी हो गयी थी मेरी और फिर न चाहते हुए भी चार बच्चे | क्या करती दो बेटियों के बाद सबको बेटा चाहिए था | मेरी तो चलती ही नहीं थी तुझे पता है |" "हाँ पता है यार फिर तेरे ट्विन्स हो गए " "हम्म अब मैं फ्री हूँ सोच रही हूँ अपने शौक पूरे कर लूँ ।" "अरे वाह मेरी बिल्ली | चल फिर मिलते हैं किसी दिन ।" "किसी दिन क्या इसी संडे मिलते हैं ।" "चल ठीक है कनाट प्लेस मिलते हैं अपनी पुरानी जगह |" "डन,ओके बाय " ऋतु से बात करने के बाद जैसे मेरे सपनों को पंख लग गये । सोचा आज बुधवार है तब तक थोड़ा अपना हुलिया ठीक कर लूँ | ऋतु से मिलना है कहेगी क्या ओल्ड फैशन के कपडे पहने हैं फैशन डिज़ाइनर| हाहाहा | पार्लर भी जाना है | ऋतु से बात करके मैं नयी ऊर्जा से भर गयी थी झट से अपॉइंटमेंट ली और पार्लर गयी | अपना हेयर स्टाइल बदलवाया सबसे पहले नए स्टाइल के बाल अच्छे लगेंगे | फिर उन्हें कह दिया कि मेरा मेकओवर कर दो | मुझे खुद को नए रूप में देखना है | बस फिर क्या था उन्होंने मेरा रंग रूप ही बदल दिया | खुद को आईने में देखा तो देखती ही रह गयी | क्या मैं आज भी इतनी सुन्दर दिख सकती थी कभी सोचा क्यों नहीं मैंने !! अगला दिन मैंने शॉपिंग के लिए रखा | अपने लिए आज के फैशन के हिसाब से कपडे खरीदे | घर आकर सोचा यह सब तो हो गया अब थोड़ा लैपटॉप की सुध लेनी होगी खुद को आज के फैशन ट्रेंड से अपडेट तो कर लूँ न | बस संडे तक कैसे समय निकला पता भी नहीं चला | अपनी पुरानी जगह ठीक समय पर दोनों मिले | खाया पीया मस्ती की और पुराने दिन याद किये | दोस्तों की बातें भी कीं | फिर मुद्दे की बात शुरू की | "अच्छा बाकी छोड़ अब ये बता मैं अपना बिज़नेस कैसे शुरू करूँ ?" वह हंसने लगी और बोली, “ देख जल्दी मत कर इतनी | ऐसा कर पहले मेरे साथ ही आजा | काफी सालों से तू टच में नहीं है तो ठीक रहेगा | फिर कर लेना काम शुरू |” “ठीक है तो बता कब से आऊं ?” “कल से ही आजा |” अरे वाह कल से ही ? चल फिर कल ११ बजे मिलते हैं | घर आकर मैंने सपने बुनना शुरू कर दिया | सोचा नहीं था कि नयी ज़िन्दगी इतनी जल्दी शुरू हो जायेगी | अगले ही दिन से मेरी ठहरी हुई ज़िन्दगी में रवानी आ गयी | काम में मन लगा तो मैं सारे दुःख भूलने लगी | अब तो बस हंसी, ख़ुशी पार्टियों का दौर , मीटिंग्स यही सब रहने लगा | ऋतू के दोस्तों से भी मुलाकात होने लगी फ्रेंड सर्किल अच्छा हो गया | ऋतू के साथ मैंने भी ज़ुम्बा क्लास ज्वाइन कर ली |
       आह ! कहाँ दुखों में डूबी थी मैं ! मेरी ज़िन्दगी इतनी पास थी लेकिन कभी सोचा ही नहीं | सबकी ख़ुशी में ही बिता दिया जीवन | अभी उम्र ही क्या है | १८ की ही तो थी जब शादी हो गई थी | ५२ की उम्र भी कोई उम्र है निराश होने की | पार्टियां अटेंड करते करते ऋतू के और मेरे म्यूच्यूअल फ्रेंड अभिजीत से काफी बातें होने लगीं | वे भी मेरी ही तरह अकेले थे | बच्चे तो कभी थे ही नहीं उनके और पत्नी की असमय मृत्यु हो चुकी थी | एक दिन वे बोले "देखो हम दोनों ही उम्र के उस पड़ाव पर हैं जहाँ शारीरिक से ज़्यादा मानसिक रूप से किसी साथी की ज़रुरत होती है | " मैं समझ रही थी उनका मतलब "आगे आगे उम्र बढ़ेगी और आपस में हम एक दूसरे का दुःख भी बाँट सकेंगे | मन की बात कहने सुनने को कोई चाहिए होगा |" "आपकी बात समझ रही हूँ लेकिन बच्चे ----" "देखो बच्चे अपनी दुनिया में खोये हुए हैं | तुम कब तक अकेली रहोगी । अब अपने लिये सोचो । वैसे बात करके देखो ,आजकल के बच्चे बहुत प्रोग्रेसिव सोच के हैं | मेरे हिसाब से उन्हें कोई ऐतराज़ नहीं होगा |" " मुझे थोड़ा समय चाहिए | बच्चों से ज़रूर बात करूंगी तभी कोई फैसला लूंगी |" |"मुझे कोई जल्दी नहीं है और  तुम इंकार भी कर दोगी तो मुझे बुरा नहीं लगेगा |" मुलाकात के बाद घर लौटने पर मन में अजीब सी हलचल थी | एक अपराध बोध था मन में कि क्या इस उम्र में यह सब---फिर सोचा सारी ज़िन्दगी अकेले ही तो काट दी । उदय ने कब परवाह की मेरी। और फिर दुनिया दो चार दिन बोल कर चुप हो ही जायेगी । जानती हूं यह कोई छोटा कदम नहीं है लेकिन मेरे जुगनू अब भी मुझसे कुछ कह रहे हैं । बहुत सोच समझ कर मन में आया कि अपनी बेटियों से तो मैं बात कर ही सकती थी | मैंने चारों बच्चों को घर बुलाया | और अपनी बात कह डाली | आश्चर्य की बात है कि बेटियां खुश हो गयीं | मुझे लगता नहीं था कि वे मेरे लिए इतनी भावुक हो जाएँगी | पर बच्चे तो बच्चे होते हैं वे व्यस्त ज़रूर हैं पर मुझे बहुत प्यार करते हैं | " मां वी आर वैरी हैप्पी फॉर यू | गो अहेड |" मीना ने कहा | बेटे थोड़े झिझक रहे थे पर बहुओं ने हामी भर दी | सब खुश थे | और अगले ही महीने कोर्ट मेरिज की बात भी तय हो गयी | अभिजीत भी तैयार थे मैंने उन्हें बच्चों से मिलाया | शादी का दिन भी आया सभी बच्चे ऋतु और उसका परिवार और अभिजीत के परिवार के कुछ लोगों कि मौजूदगी में शादी हो गयी | सभी बच्चों ने मिलकर पार्टी अरेंज की | शादी के बाद जब सब चले गए तो बच्चों ने अभिजीत से कहा , “थैंक्यू पापा | सारा जीवन पापा के लिए तरसे अब आप मिल गए हैं | वी आर सो लक्की ! “ अभिजीत भी अपने लिए पहली बार पापा सम्बोधन सुनकर भावुक हो गए | और बच्चों को गले से लगा लिया | माहौल थोड़ा भारी हो गया था तो अभिजीत ने कहा, ”चलो अब मेरे फैशन हाउस को भी मालकिन मिल जायेगी | सब ने ठहाका लगाया |” मुझे आज अपने भीतर किसी तरह का अपराध बोध नहीं होना चाहिए आखिर उदय ने तो मुझे दुखों की आग में इतने बरस पहले झोंक ही दिया था न !
मुझे भी हक़ है , अपने हिस्से का एक मुट्ठी आस्मां मुझे भी तो चाहिए

शनिवार, 14 अप्रैल 2018

#मैंअपराजिताकहानीप्रतियाेगिता-दर्शना बांठिया

#मैंअपराजिताकहानीप्रतियाेगिता
 


जूगुनू को टिमटिमाते हुए देखकर कई विचार उमड़ने लगे ।मन ही मन सोचा कि मैंने अपने जीवन को कितना सार्थक अर्थ दिया है।पहले रिया के पिताजी को कम उम्र में ही हृदय रोग हो गया,इस कारण,उनकी सेवा-सुश्रुषा में अपने लिए कभी समय ही नहीं निकाल पाई, फिर 4 बच्चों की परवरिश करना आसान थोड़ी है,कभी किसी की पढ़ाई का खर्चा आ जाता, किसी को नए कपड़ें चाहिए होते...तो किसी की नई-नई फरमाइशें ,सब को खुश रखना बहुत बडी़ जिम्मेदारी थी।सिलाई-कढाई में इतनी आमदनी भी नहीं होती कि सबकी फरमाइशे पूरी कर सकूँ,जरूरतें पूरी हो जाती,वहीं बहुत है।
खैर अब सब जिम्मेदारी पूरी हो चुकी है,सब अपनी राहें तय कर चुके है।
आज सुबह-सुबह ही वो अपने पति की तस्वीर के आगें खड़ी हो गई,और एकटक निहारते हुए सोचने लगी ,कि उनके पति हमेंशा कहा करते थे,"तुम बहुत अच्छी कविता, कहानी,और नजम लिखती हो,हम तो तुम्हारें लेखन के दीवाने है।"
उन बातों को सोचते हुए ही उनके होंठों पर मुस्कान आ गई।
आज कई दिनों बाद वो मुस्कुराई है.उन्हें लगा कि मेरे बच्चों ने अपनी रूचि,स्वभाव व आदतों को हमेशा सर्वोपरि रखा....और अपने सपने पूरे किए ,भले ही दुनिया ने उनकी प्रतिभा को शुरू-शुरू में नकारा,कभी उन पर हँसे,कभी पीठ पीछे उनकी बुराईयाँ की ....,पर उन्होंने अपनी राहें कभी नहीं बदली..।आज मुझे खुशी है कि सबने अपनी मंजिलें पा ली है।
पर मैंने अपने शौक को हमेशा दबायें रखा.इतना समय हो गया, कुछ भी नहीं लिख पाई । अब मुझे भी अपने शौक व रूचि को आगे बढा़ना है।अपने लेखन को आगे बढा़ने का प्रयास करना है,इससे ही मुझे सच्ची खुशी मिलेगी.
. जीवन में अपनी रूचि को सबके सामने लाना ही ,उनका लक्ष्य बन गया। उनके मन में उम्मीद की नई लहरें उठने लगी,और अपनी पुरानी डायरी खोलकर उसमें नये रंग भरना शुरू कर दिया:-
उम्मीद
" उम्मीद वक़्त का बहुत बड़ा सहारा है "
"है उम्मीद तो हर लहर किनारा है "।।

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