शनिवार, 31 मार्च 2018

आज फिर जीने की तमन्ना है-झंखना प्रजापति

ये कहानी मेरे बहुत ही परिचित और निकटतम परिवार की सच्चाई है। 
प्रकाशभाई और स्मिताबेन एक आम भारतीय पतिपत्नी की तरह एक दूसरे के लिए जीते थे। स्मिताबेन एक कुशल गृहिणी थी और प्रकाशभाई का ऑटो पार्ट्स का बड़ा कारोबार था। दोनों ही जन्म से गुजराती थे पर प्रकाशभाई के बिज़नेस की वजह से दिल्ली में रहते थे। उनके दो बच्चे थे, निष्ठा और अक्षित। अक्षित बड़ा था, इंजीनियरिंग करके ऑस्ट्रेलिया में जॉब करता था। निष्ठा दिल्ली में ही इंजीनियरिंग के फाइनल ईयर में थी। 
आशुतोष जी प्रकाशभाई के अच्छे दोस्त थे। कम्युनिटी के फंक्शन में अकसर दोनों मिलते रहते थे। पेशे से आशुतोष जी डॉक्टर थे और उनकी पत्नी विनीता भी स्मिताबेन की अच्छी सहेली थी। उनका एक बेटा था, विशाल...जो कि बैंगलोर में डेन्सटिस्ट की पढ़ाई कर रहा था।
निष्ठा, अक्षित और विशाल तीनों साथ ही अपने पेरेंट्स की वजह से दोस्त थे। हालांकि पढ़ाई की वजह से उनका मिलना मिलाना बहोत ही कम होता था। उस में भी अक्षित के ऑस्ट्रेलिया जाने के बाद निष्ठा बहोत अकेली पड़ गई थी। ऐसे में सोशल नेटवर्किंग साइट पर उसे विशाल मिला। पहले से ही एक दूसरे को जानते तो थे ही। दोनों में बातें होने लगी। दोस्ती धीरे धीरे प्यार में तबदील हुई।
विशाल और निष्ठा दोनों ने ही अपने पेरेंट्स को बताया। उनके माता पिता को तो कोई दिक्कत थी ही नहीं इस रिश्ते से। प्रकाशभाई ने रिश्ता तो तय कर दिया पर अक्षित के भारत आने के बाद ही सगाई और शादी साथ ही करने के लिए कहा। आशुतोष जी को भी इस बात से कोई एतराज़ नहीं था। वैसे भी विशाल का पोस्ट ग्रेजुएशन का फाइनल यर चल रहा था।
विशाल बंगलोर में था पर निष्ठा विशाल के परिवार के साथ अच्छे से घुलमिल गई थी। विनीता जी को घर में मदद कर देती। हालांकि सिमताबेन को निष्ठा का शादी से पहले विशाल के घर पर आना जाना अच्छा नहीं लगता था। पर आजकल के बच्चे किसी की सुनते कहाँ है? उन्होंने प्रकाशभाई से भी इस बारे में बात की, पर प्रकाशभाई ने उन्हें समझाया कि आजकल शादी से पहले ससुराल में आनाजाना बहोत ही आम बात है। वैसे तो स्मिताबेन भी काफी आधुनिक और खुले विचारों की थी पर फिर भी उन्हें कुछ बातें अपने दायरे में ही अच्छी लगती थी।
निष्ठा की विशाल से लगातार बात होती रहती। विशाल निष्ठा को बताता की वो कभी कभार हॉस्पिटल भी जाया करे, पाप यानी कि आशुतोषजी की मदद के लिए। निष्ठा ग्रेजुएशन के बाद वैसे भी फ्री थी और शादी से पहले कोई जॉब जॉइन करना नहीं चाहती थी, तो उसने आशुतोषजी के हॉस्पिटल जाना शुरू किया। दिन का काफी वक़्त वो अपने होनेवाले ससुराल में ही रहती।
अक्षित को आने में अभी 6 महीने थे इसलिए प्रकाशभाई ने शादी की तैयारियां शुरू कर दी। सबसे पहले निष्ठा के कपड़ो से शुरुआत हुई। निष्ठा ने अपनी होनेवाली सास विनिताजी को ये बात ऐसे ही बताई की कल हम शादी की शॉपिंग के लिए जानेवाले हैं। विनिताजी ने निष्ठा से कहा कि "मैं भी साथ चलूंगी। हमें भी तो तुम्हारे लिए खरीदारी करनी होगी।"
निष्ठा ने घर आकर ये बात स्मिताबेन को बताई। उन्हें ये ठीक नहीं लगा कि बेटी की सास को लेकर शादी की खरीदारी पर जाना। पर उन्होंने ने सोचा पहेली बार में ही मना करेंगे तो बात बेकार में बिगड़ जाएगी। और कौनसा एक दिन में सब जो जाएगा!!! अगली बार थोड़े ना साथ जाएंगे। 
दूसरे दिन स्मिताबेन, निष्ठा और प्रकाशभाई विनिताजी को लेकर शॉपिंग के लिए गए। स्मिताबेन ने साड़ियां निकलवाई। जैसे ही कोई साड़ी स्मिताबेन को पसंद आती विनिताजी तुरंत ही कुछ ना कुछ कमी निकालकर रिजेक्ट कर देती। 4 दुकानें और 5 घंटे बिताने के बाद सिर्फ 2 साड़ियां लेकर सब वापस आये। उसमें विनिताजी ने अपनी तरफ से लेनेवाली साड़ियों का तो जिक्र भी नहीं किया। स्मिताबेन को ये बात बहोत ही खटक रही थी कि निष्ठा की शॉपिंग में विनिताजी की क्या ज़रूरत और उसमें भी आज उन्होंने जो किया उससे तो उन्हें और गुस्सा आया। पर अगली बार का सोचकर उन्होंने किसी से कुछ नहीं कहा।
नेक्स्ट टाइम जब शॉपिंग का प्लान बना तो निष्ठा ने वैसे ही अपनी सास को बताया। इस बार भी विनिताजी निष्ठा से कहलवाकर साथ आई। ना चाहते हुए भी निष्ठा की ज़िद की वज़ह से स्मिताबेन मना नहीं कर पाई। इस बार भी विनीत जी ने अपनी पसंद की महंगी महंगी साड़ियां स्मिताबेन से ख़रीदवाई। इस बार निष्ठा को भी थोड़ा अजीब लगा पर वो कुछ नहीं बोली।
शाम को ये बात उसने विशाल को बताई। विशाल ने भी अपनी माँ का पक्ष लेते हुए कहा " अब देखो निष्ठा शादी के बाद तुम्हें हमारे घर के हिसाब से कपड़े पहनने होंगे। तो इसीलिए शायद मम्मी तुम्हें साथ रहकर शॉपिंग करवा रही है।" निष्ठा कुछ बोल नहीं पाई। 
एक दिन आशुतोषजी और विनिताजी आकर शादी में देनेवाले गिफ्ट्स की लिस्ट दे गए। काफी लंबी लिस्ट थी। स्मिताबेन ने प्रकाशभाई से कहा " कितने सारे गिफ्ट्स लिखे हैं.. वैसे तो कहते थे हमें तो सिर्फ निष्ठा ही चाहिए। पर अब देखो कुछ भी छोड़ा नहीं है" प्रकाशभाई ने ये कहते हुए स्मिताबेन को समझाया कि "वैसे भी हमारी एक ही बेटी है। उसे नहीं देंगे तो किसे देंगे।" 
जैसे जैसे शादी का दिन नज़दीक आ रहा था विनीत जी की बारातियों की लिस्ट और गिफ्ट्स की लिस्ट लंबी ही होती जा रही थी। शादी का वेन्यू भी उन्होंने अपने हिसाब से रखवाया। निष्ठा के ससुरालवालों रिवाज़ के तौर पर दी जानेवाली साड़ियां भी विनिताजी ने मेंहगी मेंहगी और अपने हिसाब से सिमताबेन से ख़रीदवाई। 3 महीनों में एक भी बार प्रकाशभाई और स्मिताबेन को निष्ठा के ससुराल वालों ने नहीं बुलाया था पर वो हफ्ते में एक बार ज़रूर आ धमकते। और जब भी आते ये जताना नहीं चूकते की वो लड़केवाले हैं।
स्मिताबेन को ये सब देख अपनी बेटी का भविष्य लालची लोगों के हाथों में जाता दिखाई दे रहा था। उन्होंने निष्ठा को ये सब समझाने की कोशिश की पर वो विशाल के प्यार में इतनी पागल या कहो कि अंधी हो चुकी थी कि उसे ना अपना आनेवाला कल दिखाई दे रहा था ना ही अपनी माँ की आज की तकलीफ। स्मिताबेन अनजाने में ही डिप्रेशन का शिकार होती जा रही थी।
अक्षित निष्ठा के शादी के 2 महीनें पहले ही इंडिया आ गया था। प्रकाशभाई और स्मिताबेन का विचार था कि निष्ठा की शादी के साथ साथ लगे हाथ अक्षित की भी सगाई हो जाये। लड़की देखने के लिए प्रकाशभाई पूरे परिवार के साथ अहमदाबाद आये। 4-5 परिवारों से मिलने के बाद अक्षित को निशा पसंद आई। पर निशा के परिवारवालों की शर्त थी कि पहले वो दिल्ली जाकर प्रकाशभाई का घर परिवार देखेंगे, उन्हें ठीक लगा तो ही रिश्ते के लिए हाँ कहेंगे। क्योंकि उन्हें इतनी दूर अपनी बेटी ब्याहनी है तो उसके परिवार के बारे में जानना अति आवश्यक है। प्रकाशभाई ने खुशी खुशी ये बात मंजूर की।
एक हफ्ते बाद निशा अपने मम्मी पापा के साथ दिल्ली आयी और प्रकाशभाई क आग्रह की वजह से वो उनके घर ही एक हफ्ते के लिए रुके। निष्ठा ये सब देख रही थी की कैसे निशा के पेरेंट्स बेटी के होनेवाले ससुराल में रह रहे हैं। कैसे उसके प्रकाशभाई और स्मिताबेन निशा के पेरेंट्स को इज़्ज़त दे रहे थे। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि लड़की के माँ बाप को भी उतना ही सम्मान मिलना चाहिए जितना कि लड़के के माँ बाप को। उसे अपनी माँ की कही एक एक बात याद आ रही थी। उसे अब एहसास हुआ कि विनिताजी और विशाल की तानाशाही वो और उसका परिवार इतने महीनों से बर्दाश्त कर रहे थे, पर वो ही विशाल के प्यार में अंधी होकर कुंए में गिरने जा रही थी।
निशा के पेरेंट्स को अक्षित और प्रकाशभाई का परिवार दोनों ही अच्छे लगे। रिश्ते के लिए हाँ बोलकर, शादी में आने का वादा कर वो अहमदाबाद वापस लौट गए। 
निष्ठा ने उसी शाम अपने पापा से रिश्ते के लिए मना कर देने को कहा। शादी में सिर्फ महीना बचा था, कार्ड्स बंट चुके थे और बाकी सारी तैयारियां हो चुकी थी। फिर भी देर आये दुरस्त आये देखकर प्रकाशभाई ने विशाल के परिवार को शादी के लिए ना बोल दिया। स्मिताबेन को लगा दिल से सबसे बड़ा बोझ एक झटके में उतर गया। विशाल ने निष्ठा को मनाने के बहोत प्रयन्त किये पर अब उसकी आँखों से वो अंधकार के घने बादल हट चुके थे और आनेवाला कल नई रौशनी लिए खड़ा था।
अक्षित सगाई करके ऑस्ट्रेलिया वापस चला गया और निष्ठा ने पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए पढ़ाई शुरू की। पढ़ाई के दौरान ही उसे अभिषेक दोस्त के रूप में मिला। फाइनल प्लेसमेंट हो जाने के बाद निष्ठा ने प्रकाशभाई और स्मिताबेन को अभिषेक के बारे में बताया। इस बार प्रकाशभाई ने अभिषेक के पेरेंट्स को पहले से ही बता दिया कि वो शादी अपने हिसाब से करेंगे और सारे रीति रिवाज़ लेनदेन भी अपने हिसाब से ही करेंगे। अभिषेक के परिवार को भी उसमें कोई आपत्ति नहीं थी। 
विशाल स छुटकारा पाने के ढाई साल बाद निष्ठा की शादी बड़े ही धामधुम से अभिषेक के साथ हुई। प्रकाशभाई और सिमताबेन भी उसे दामाद के रूप में पयकर खुश है। आज निष्ठा और अभिषेक पुणे में अपने कैरियर के साथ सुखी दाम्पत्यजीवन बिता रहे हैं।
सारांश :- 
कोई भी रिश्ता जिंदगी में आखरी नहीं होता और प्यार सिर्फ एक बार नहीं होता। अपने आप को दूसरा मौका दीजिये। 

लड़कियों के लिए खास ऐसे लालची लोगों को पहचानिए और बेकार में ही शादी के नाम पर पेरेंट्स से बेशुमार खर्चे ना करवाएं। समय रहते उससे बाहर निकल जाये।

पेरेंट्स के लिए भी लोग क्या कहेंगे उसकी परवाह किये बिना अपने बच्चों के भविष्य के बारे में सोचे। आज दुनिया के डर से रिश्ते में बंध भी गए तो कल को कोई मुसीबत आयी तो दुनियावाले बचाने नहीं आएंगे। इसलिए अपने बच्चों का साथ दीजिये। जिंदगी के आखरी वक़्त तक वही आपके साथ रहेंगे फिर चाहे वो बेटा हो या बेटी।

कैसी लगी मेरी ये रचना उस विषय में अपने प्रतिभाव हमसे ज़रूर बांटिए।





आईना- भारत


बे - मौसम वो बारिश का सबब बनाते हैं l
हिज़ाब में चाँद छुपाके धूप में निकल जाते है ||

तबस्सुम होठों को छूके निकल जाती है |
वो बेवजह खुद को साजिंदा दिखाते है ||

तल्खियां -इ- इश्क की अब परवाह नहीं |
हवाओं के झोकें भी नश्तर चुभाते है ||

उन्हें आदत नहीं प्यार जताने की |
हम तग़ाफ़ुल के डर से छुपाते है ||

जो प्यार की चाह में दर दर चकते रहे  |
वो आज हमें नमक का स्वाद बताते है ||

मोहब्बत का असर उनके चेहरे पे दिखता है |
वो आईने के सामने खुद से छुपाते है ||






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'me too' (मैं भी)-खयालात- सदन झा


आजकल वैश्विक स्तर पर 'me too' (मैं भी) अभियान चल रहा है। लड़कियां, महिलाएं, यौन अल्पसंख्यक तथा यौनउत्पीड़ित पुरुष हर कोई अपने साथ हुई यौन हिंसा को बेबाकी से, सार्वजनिक रुप में दर्ज कर रहे हैं। अपने ऊपर हुए हिंसा की स्वीकृति दरअसल एक सार्वभौमिक समुदाय का रुप अख्तियार कर रहा है।
अन्य प्रगतिशील कदमों की ही तरह यह पहल भी स्त्रियों की तरफ से ही आया है। परन्तु जैसा कि इस मुहिम में शामिल लिख भी रहे हैं कि यौन हिंसा के शिकार स्त्री पुरुष दोनो ही हुआ करते हैं। ऐसे में एक बेहतर और सुरक्षित समाज के निर्माण के लिये यह आवश्यक है कि हमारा लिंग चाहे जो भी हो, हमारी इच्छाओं का रंग जो भी, हम चाहे जिस सामाजिक पायदान पर हो और जिस किसी भौगोलिक धरातल पर खड़े हों वहीं से इस मुहिम में शामिल हों।
इस मुहिम का हिस्सा बनने से अपने ऊपर हुई हिंसा की आत्म स्वीकृति से इतना तो तय है कि हममें उस हिंसा से उपजे डर का सामना करने की हिम्मत जगती है। चुपचाप सहते जाने से जो अंधकार का माहौल बनता है वह टूटता है।हम दुनिया के साथ अपने आत्म को यह संदेश देते हैं कि हमारे साथ जो हुआ वह गलत तो था ही पर, साथ ही वहीं उस लम्हे जिंदगी खत्म नहीं हो जाती। कि हम वहीं अटक कर, थमकर नहीं रह गये। कि हमारे यौन हत्यारे हमारी हत्या करने की तमाम घिनौनी करतुतों के बाद भी हमारे वजूद को नेस्तनाबूत करने में नाकामयाब रहे। कि उनके तमाम मंशाओं को मटियामेट करता मेरा देह और मेरा मन मेरा ही है। इस आत्म अभियक्ति और मुहिम का हिस्सा बनने से इतनी उम्मीद तो की ही जा सकती है कि हमारा चेतन भविष्य में दूसरे के प्रति यौन हिंसा का पाप करने से हमें रोके।
जैसा कि मैंने ऊपर भी लिखा 'मी टू' हमें अपनी जिंदगी के अंधकार का सामना करने में मदद करता है। हम उन शक्तियों के खिलाफ एकजूट होते हैं जो इस अंधेरे का निर्माण करते हैं। जो अंधकार को संजोये रखना चाहते। ये अंधेरे के पुजारी हमारे चारो तरफ पसरे होते हैं। इनकी शक्तियां कुछ कदर संक्रामक हुआ करती है कि हमें पता भी नहीं चलता और कि कब यह हिंसा हमारे भीतर उग आता है। हम शोषित से शोषक हो जाते हैं। इस कायांतरण से बचने के लिये भी 'मी टू' मददगार हो सकता है।
आजकल हम भारत में दीपों का उत्सब मना रहे हैं। तमसो मा ज्योर्तिगमय कहते हमारी जिह्वा कभी थकती नहीं। पर, क्या हमें अहसास है कि ऐसे त्योहारों और खुशियों के मौके पर कितने ही हिंसक पशु अपने शिकार की तलाश में जुगत लगाये रहते हैं? हमें देह, नेह और गेह को इनसे सुरक्षित रखने की जरुरत है। इस दीपाबली और उसके परे भी हमें अपने अंदर उग आये अंधकार का प्रतिकार करने की जरुरत है।
यह दुखद है कि जहां वैश्विक स्तर पर इतना कुछ हो रहा है हिंदी जगत और मीडिया की दुनिया इसको तबज्जो नहीं दे रहा। पर, हम औरों की परबाह करे क्यों? वहां जो अंधकार के पुजारियों का कब्जा है उनसे उम्मीद भी कितनी रखें? हम खुद ही तो सक्षम हैं यह कहने को कि 'मी टू'।

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