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रविवार, 2 अगस्त 2026

साल दर साल और एक अजनबी चेहरा- एक कहानी


अंजलि के लिए वह दिन सबसे खौफनाक था। इस दिन तो वह अपने अरमानों की डोली सजाकर आई थी। कई सपने थे, कई उम्मीदें। पर... वह वक्त जब अंजलि ने अपना मायका, अपने सपने और अपनी पूरी पहचान समेटकर मानव के नाम कर दी थी। उसे लगता था कि वह मानव की सांसों की आहट भी पहचानती है। लेकिन आज लगता है जैसे किसी अजनबी के साथ समय गुजारा।

त्याग, प्यार और अटूट विश्वास की धज्जियां उड़ गईं।

उस रात अंजलि कमरे के फर्श पर बैठकर दीवार घड़ी की सुइयों को टिक-टिक करते देखती रही। समय .. उसका मन एक ऐसे कुरुक्षेत्र की जमीन बन चुका था, जहाँ वह खुद ही से लड़ रही थी। उसका मन उससे चीख-चीखकर सवाल कर रहा था— इतने साल उसने यूं ही बर्बाद कर दिए? उसका हर वादा, उसकी फिक्र... सब एक झूठ था? उसे बस एक पैसा कमाने वाली लड़की चाहिए थी। एटीएम... तुम इतनी अंधी कैसे हो गईं कि उसकी परछाईं तक को नहीं पहचान पाईं?"
सुबह की पहली किरण के साथ, अंजलि ने अपनी आँखों के आँसू पोंछे और घर के मंदिर में जाकर बैठ गई जहाँ उसका अटूट विश्वास था। पर आज वहाँ भी सन्नाटा था। फिर भी उसने अपनी बेटी के लिए दिया जलाया। आखिर वह अपना दर्द किससे कहे, उसने पेशेवर मदद ली। अपनी निजी बातें वह किसी से भी साझा नहीं करना चाहती थी। पेशेवर ने कहा, पहले चाय कापी कुछ पी लो फिर बात करते हैं। उसने कहा, जब कोई मिट्टी का बर्तन टूटता है, तो आवाज होती है। लेकिन जब किसी स्त्री का विश्वास टूटता है, तो भीतर एक गहरा सन्नाटा छा जाता है। तुम इस सन्नाटे को अपने अंदर क्यों छिपाए बैठी हो?"

मुझे दर्द इस बात का नहीं है कि उसने मुझे नहीं समझा... मुझे तकलीफ इस बात की है कि आज भी मैं एक अजनबी के साथ कैसे रह रही हूँ। सुनो...

जब तुम नदी में पूरी शिद्दत से तैरती हो, और अचानक नदी अपना रास्ता बदल ले, तो क्या कसूर तुम्हारा होता है? नहीं! कसूर नदी के स्वभाव का है। स्त्री जब खुद के लिए खड़ी होगी, तो अपना एक नया और मजबूत जहान बना सकती है। अपनी शक्ति को पहचानो।

पेशेवर से बात करने के दौरान उसका फोन बज रहा था। स्क्रीन पर 'माँ' का नाम चमक रहा था। अंजलि ने एक गहरी सांस ली, अपने गले के भारीपन को साफ किया और चेहरे पर एक झूठी मुस्कान ओढ़कर फोन उठाया।

"हाँ माँ, प्रणाम. हाँ, मैं बिल्कुल ठीक हूँ। मानव? हाँ, वह भी ठीक हैं, ऑफिस गए हैं। अरे नहीं माँ, कोई परेशानी नहीं है..."

फोन रखते ही अंजलि का कलेजा मुँह पर आ गया। वह डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर ढह गई और सिसक सिसक कर रोने लगी। माता-पिता के सामने अपनी जिंदगी को 'खुशहाल' दिखाना उसके लिए दुनिया का सबसे मुश्किल काम बनता जा रहा था। वह उन्हें कैसे बताती कि जिस बेटी की खुशहाली की वे दुआएं मांगते हैं, उसकी दुनिया अंदर से पूरी तरह उजड़ चुकी है?

अंजलि को वे दिन याद आने लगे जब उन्होंने अपनी गृहस्थी बसाना शुरू किया था। किराए का घर था और उन्होंने अपना घर भी बुक कर लिया था। अंजलि ने अपनी अच्छी-खासी नौकरी सिर्फ इसलिए छोड़ दी थी ताकि वह मानव के करियर को संभाल सके, घर संभाल सके और उसके सपनों को उड़ान दे सके। उसने अपनी हर छोटी-बड़ी ख्वाहिश का गला घोंटा था। उसने अपनी पसंद के कपड़े नहीं खरीदे, अपनी सहेलियों से मिलना छोड़ दिया, यहाँ तक कि अपनी उन किताबों को भी बक्से में बंद कर दिया जो कभी उसकी जान हुआ करती थीं।

उसने सोचा था—"मानव कामयाब हो जाएगा, तो हमारे सारे सपने पूरे हो जाएंगे।"

अंजलि का मन अब एक नए और गहरे दर्द से चीखने लगा—"मैंने जिसके लिए अपने माता-पिता का घर छोड़ा, अपने सुनहरे सपने कुर्बान किए, उसने मुझे क्या दिया? और मैं आज इतनी बेबस हूँ कि अपनी मां, अपने पिता को अपना यह रोना सुना भी नहीं सकती। अगर उन्हें पता चला कि उनकी लाडली इस हाल में है, तो उनका बूढ़ा दिल यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाएगा।"

अंजलि ने महसूस किया कि वह चारों तरफ से दीवारों में कैद हो चुकी है। एक तरफ वह इंसान था जिसके साथ संघर्ष किया पर वह अजनबी निकला, और दूसरी तरफ वे माता-पिता थे जिनसे वह बेपनाह मोहब्बत करती थी पर उन्हें अपना दर्द बता नहीं सकती थी।

तभी अंजलि की नजर कमरे के कोने में रखे उस धूल भरे बक्से पर पड़ी, जिसमें उसके कॉलेज के दिनों के कलर्स और कैनवास रखे थे। उसने उठकर उस बक्से को खोला। धूल हटाकर जब उसने अपनी पुरानी पेंटिंग्स देखीं, तो उसे लगा जैसे उसकी खुद की खोई हुई पहचान उसे पुकार रही हो।

अंजलि को प्रोफेशनल की बात याद आई—"जब तुम खुद के लिए खड़ी होगी, तो अपना एक नया जहान बना सकती हो।"

उसने अपने आंसू पोंछे। उसने तय किया कि वह अपने माता-पिता को रोकर कमजोर नहीं करेगी, बल्कि खुद को इतना मजबूत बनाएगी कि एक दिन वे उस पर गर्व कर सकें। उसने अपनी छिपी हुई कला को, अपने उन सपनों को जिन्हें दफन कर दिया था, दोबारा जिंदा करने का फैसला किया। दर्द अब भी सीने में था, पर अब उसमें बेबसी नहीं, बल्कि चुपचाप अपनी एक नई दुनिया खड़ी करने की जिद थी।

अंजलि के सामने अब सच का वह सिरा आ चुका था, जो पहले धुंधला था। मानव का वह 'अजनबी' बर्ताव उस साये के कारण था जो शादी के वक्त से आज तक उनके बीच खड़ा रहा—उसकी माँ, प्रमिला जी।

उस शाम, अंजलि रसोई में चाय बना रही थी, तभी उसने लॉबी में प्रमिला जी और मानव की फुसफुसाहट सुनी।

प्रमिला जी रोते हुए कह रही थीं, "मानव, अंजलि का मन अब इस घर में नहीं लगता। वह हर बात पर मुझसे चिढ़ती है। मैं तो गाँव छोड़कर तेरे भरोसे यहाँ आई थी, पर अगर मैं ही इस घर में पराई हूँ, तो मुझे कहीं छोड़ आ।"

मानव ने व्याकुल होकर माँ के पैर पकड़ लिए, "नहीं माँ! तुम कहीं नहीं जाओगी। यह घर तुम्हारा है। अंजलि अगर तुम्हें खुश नहीं रख सकती, तो उसे अपनी गलती माननी होगी। मेरे लिए तुम्हारी खुशी से बढ़कर कुछ नहीं है।"

रसोई के दरवाजे के पीछे खड़ी अंजलि के हाथ से चाय का बर्तन छूटते-छूटते बचा। उसका दिल टूटकर बिखर गया। जिस पति के करियर के लिए उसने अपनी अच्छी-खासी नौकरी छोड़ दी थी, वह आज अपनी माँ के बुने जाल में फंसकर अंजलि को ही कसूरवार मान रहा था।

अंजलि ने अपने आँसू पोंछे। उसे समझ आ गया था कि इस घर में उसका संघर्ष किसी बाहरी विलेन से नहीं, बल्कि 'ममता के इस चक्रव्यूह' से है। वह अपने माता-पिता को यह सब बताकर उन्हें दुखी नहीं कर सकती थी, क्योंकि उनके लिए मानव एक आदर्श दामाद था।

अंजलि अपनी पेंटिंग के बक्से के पास जाकर बैठ गई। उसने कैनवास पर एक ऐसी चिड़िया का चित्र बनाया जो सोने के पिंजरे में बंद थी, लेकिन उसका रुख खुले आसमान की तरफ था। अंजलि ने खुद से कहा, "मैं अब और नहीं रोऊँगी। अगर मानव अपनी माँ के जाल से निकलना नहीं चाहता, तो मैं भी इस जाल में घुट-घुट कर नहीं मरूँगी। मुझे अपने पैरों पर खड़ा होना ही होगा।"

उसने चुपचाप इंटरनेट पर नौकरियों के लिए आवेदन (Apply) करना शुरू कर दिया। अब वह मानव से बहस नहीं करती थी, न ही सास की बातों पर कोई प्रतिक्रिया देती थी। उसका यह मौन, उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसके भीतर सुलग रहे एक नए आत्मसम्मान की शुरुआत थी।

यह मोड़ अंजलि के संघर्ष की पूरी तस्वीर बदल देता है। अब उसे समझ आ गया कि जिस कड़वाहट और अजनबीपन को वह सात साल से झेल रही थी, उसकी जड़ें आज की नहीं, बल्कि बहुत पुरानी और गहरी थीं। यह लड़ाई सिर्फ एक पति-पत्नी के बीच की नहीं थी, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे एक स्वार्थी व्यवहार और चालाकी के चक्रव्यूह की थी।

अंजलि के पैरों तले की जमीन खिसक गई थी, जब उसे प्रमिला जी (उसकी सास) के अतीत का पूरा सच मालूम हुआ। मानव की माँ प्रमिला जी, आज ७५ साल की बुजुर्ग थीं। जब वे केवल १८ साल की थीं, तब उनकी शादी अंजलि के ससुर जी से हुई थी। शादी के तुरंत बाद, उन्होंने बड़ी चतुराई से अपने सीधे-साधे पति को अपने जाल में फंसाया और गाँव से लेकर शहर आ गईं।

शहर आने के बाद प्रमिला जी ने अपने ससुराल, सास-ससुर और किसी भी रिश्तेदार से कोई नाता नहीं रखा। वे अपने पति को भी उनकी खुद की माँ के खिलाफ भड़काकर रखती थीं। अंजलि के ससुर जी इतने सीधे-साधे इंसान थे कि वे अपनी पत्नी की हर बात मानते रहे, अपना गाँव-घर छोड़ दिया और अपने माता-पिता को भी। प्रमिला जी ने पूरी जिंदगी अपने पति को उनके परिवार से अलग रखा और अंत में जब ससुर जी का देहांत हुआ, तब प्रमिला जी ७५ साल की उम्र में विधवा हुईं।

अब अंजलि को पूरा खेल समझ आ गया था। प्रमिला जी को इस बात का कोई पछतावा नहीं था कि उन्होंने एक हंसते-खेलते परिवार को उजाड़ दिया था। बल्कि, अब वे वही पुराना खेल अपने बेटे मानव के साथ खेल रही थीं। जो उन्होंने सालों पहले अपने पति के साथ किया था, वही अब वे मानव के दिमाग में अंजलि के खिलाफ जहर घोलकर कर रही थीं। वे मानव को अंजलि से पूरी तरह अलग कर देना चाहती थीं ताकि मानव सिर्फ उनके नियंत्रण में रहे।

अंजलि ने दीवार पर लगी ससुर जी की पुरानी तस्वीर को देखा। उसे लगा कि अगर वह आज चुप रही, तो मानव की हालत भी उसके सीधे-साधे ससुर जी जैसी हो जाएगी। वह भी पूरी जिंदगी अपनी माँ के झूठे जाल में फँसा रहेगा और अपनी पत्नी की खुशियाँ कभी नहीं देख पाएगा।

उस रात अंजलि कमरे में गई, जहाँ मानव और प्रमिला जी बैठे थे। अंजलि के चेहरे पर अब कोई डर या आंसू नहीं था। उसके कदमों में एक ठोस हिम्मत थी।

उसने मानव के सामने प्रमिला जी के गाँव के कुछ पुराने कागजात और ससुर जी की एक पुरानी डायरी रख दी, जो उसे बक्से की सफाई करते वक्त मिली थी।

अंजलि ने सीधे मानव की आँखों में देखकर कहा, "मानव, तुम कहते हो ना कि मैं तुम्हारी माँ का सम्मान नहीं करती? आज ज़रा अपनी माँ के अतीत का इतिहास पढ़ो। १८ साल की उम्र में शादी करके जो औरत शहर आई, उसने अपने सीधे-साधे पति को उनके माता-पिता के खिलाफ भड़काया। तुम्हारे दादा-दादी तड़प-तड़प कर मर गए, लेकिन तुम्हारी माँ ने तुम्हारे पिता को गाँव नहीं जाने दिया। और आज, ७५ साल की उम्र में भी इनके भीतर का वह लालच और असुरक्षा शांत नहीं हुए हैं। जो खेल इन्होंने तुम्हारे पिता के साथ खेला, वही खेल आज ये मेरे और तुम्हारे साथ खेल रही हैं!"

मानव ने गुस्से में कहा, "अंजलि! तुम मेरी माँ पर..."

"चुप रहो मानव!" अंजलि की आवाज पूरे कमरे में गूँज उठी। "मैंने तुम्हारे लिए अपने सपने, अपनी नौकरी, अपने माता-पिता की खुशियाँ सब कुर्बान कर दीं। तुम्हारे संघर्ष में मैं तुम्हारे साथ खड़ी रही क्योंकि मैं तुमसे सच्चा प्यार करती थी। लेकिन तुम्हारी माँ तुम्हें एक कठपुतली बनाकर रखना चाहती हैं। वे तुम्हें अंजलि का पति नहीं, सिर्फ अपना गुलाम देखना चाहती हैं।"

प्रमिला जी ने हमेशा की तरह रोने का नाटक शुरू किया, "मानव! देख, यह क्या कह रही है..."

लेकिन इस बार अंजलि रुकी नहीं। उसने प्रमिला जी से कहा, "अम्मा, आपने अपनी पूरी जिंदगी नफरत और अलगाव में बिता दी। अपने पति को उनके परिवार से दूर रखा, और अब आप अपने बेटे का घर उजाड़ना चाहती हैं? याद रखिए, इतिहास खुद को दोहराता है, लेकिन मैं आपके इस चक्रव्यूह का हिस्सा नहीं बनूँगी।"

अंजलि ने अपना बैग उठाया, जिसमें उसकी पेंटिंग के ब्रश और कुछ जरूरी कागजात थे। उसने मानव से कहा, "मानव, मैं इस घर को छोड़कर जा रही हूँ। अपने माता-पिता को मैं कभी नहीं बताऊँगी कि तुम्हारी गलती क्या थी। मैं उनसे कहूँगी कि मुझे करियर में आगे बढ़ना था। मैं तुम्हें कोई सजा नहीं दे रही। सजा तो तुम खुद को दे रहे हो। जिस दिन तुम्हारी आँखों से अपनी माँ की इस झूठी ममता का पर्दा हटेगा, उस दिन तुम्हें समझ आएगा कि उस औरत को खो दिया जो तुम्हारे लिए अपनी जान दे सकती थी।"

अंजलि बिना पीछे मुड़े घर से बाहर निकल गई। रात की ठंडी हवा उसके चेहरे को छू रही थी। उसका मन अब पूरी तरह शांत था। खुद से होने वाले सारे सवाल अब खत्म हो चुके थे। उसे समझ आ गया था कि गलती उसकी अच्छाई में नहीं थी, बल्कि सामने वाले की फितरत में थी।

पीछे घर में, पहली बार मानव सन्नाटे में खड़ा अपनी माँ के रोने की आवाज सुन रहा था, लेकिन आज उसके आँसुओं में ममता नहीं, बल्कि एक अजीब सा खोखलापन दिखाई दे रहा था। अंजलि के शब्द मानव के दिमाग में हथौड़े की तरह बज रहे थे।

अंजलि ने रेलवे स्टेशन की तरफ कदम बढ़ा दिए। सुबह की पहली किरण के साथ वह अपने सपनों की एक नई उड़ान भरने वाली थी—एक ऐसी दुनिया जहाँ कोई अजनबी नहीं था, जहाँ सिर्फ उसका आत्मसम्मान और उसकी अपनी पहचान थी।

शनिवार, 7 सितंबर 2024

गजानन के मस्तक पर विराजमान है गजासुर- डा. अनुजा भट्ट

कौन है गजासुर

आपने पिता पुत्र के बहुत से संवाद सुने होंगे। पर आज मैं आपको शिव और गणेश की बातचीत बता रही हूं ।

पिता पुत्र संवाद

भीतर कौन जा रहा है

बाहर कौन खड़ा है

मैं गणेश हूं पार्वती का पुत्र

मैं महादेव हूं पार्वती का पति मुझे जाने दो

मेरी मां स्नान कर रही हैं और भीतर किसी को भी प्रवेश की अनुमति नहीं है आपको प्रतीक्षा करनी होगी

समय मेरी प्रतीक्षा करता है मैं किसी की प्रतीक्षा नहीं करता।

परंतु आप तब तक भीतर नहीं जा सकते जब तक मैं यहां खड़ा हूं

यदि तुम पार्वती के पुत्र हो तो मैं तुम्हारा पिता हूं। तुम आज्ञा का अर्थ नहीं जानते

मैं आपका मार्ग रोककर अपनी मां का आज्ञा का पालन कर रहा हूं

मेरा त्रिशूल तुमको मार सकता है

मेरा दंड आपको चोट पहुंचा सकता है

संवाद लंबा है इसलिए मूल कहानी पर चलते हैं

शिव त्रिशूल से वार कर देते है. दंड अपना असर नहीं दिखा पाता। गणेश का मस्तक धड़ से अलग हो जाता है।

पार्वती चीख पड़ी।

मौत का सन्नाटा पसर गया।

पार्वती यानी प्रकृति का क्रोध चरम पर था। वह हिंसक हो उठी थीं। महादेव आपने गणेश को नहीं मुझे मार डाला है। अब मैं खुद को मार दूंगी

महादेव ने समझाया तुम ऐसा नहीं कर सकती

हुंकार उठी पार्वती क्यों नहीं।

या तो गणेश को जीवन दीजिए या फिर विनाश देखिए

महादेव के गणों ने कहा दक्ष की तरह ही समाधान निकाला जाए।

उत्तर दिशा में मिलने वाले पहले पशु का सिर

उसी से गणेश को जीवनदान मिलेगा पर वह इसके लिए तैयार होना चाहिए

तब विष्णु भगवान बोले वह तैयार हो जाएगा। आपने गजासुर को वरदान दिया था।

आपने गजासुर को वरदान दिया था उसके मस्तक ही हमेशा पूजा की जाएगी। वह सिर गणपति की शोभा बनेगा। जैसे ही गजासुर का मस्तक गणेश के धड़ से लगाया गया अपनी सूड़ से उसने पार्वती के प्रणाम किया।

पछतावा महादेव के चेहरे से दिख रहा था । उन्होंने घोषणा की अब ये गणेश अग्र देवता होंगे और सबसे पहले इनकी पूजा की जाएगी। इनका एक नाम गजानन होगा और दूसरा विनायक....
 कौन है गजासुर
 गजासुर महिषासुर का पुत्र था  जिसका वध मां  दुर्गा  ने किया था। गजासुर भी अपने पिता की तरह अत्याचारी  था। अपने पिता के वध के बदला लेने के लिए उसने घनघोर तपस्या की।  उसे वरदान मिला उसके मस्तक की हमेशा पूजा की जाएगी।




मंगलवार, 23 जुलाई 2024

बायस्कोप से लेकर जादोपटिया की कहानी तक - डा. अनुजा भट्ट

 


अपने बचपन की हल्की सी स्मृतियों में मुझे बायस्कोप की याद है। एक बड़ा सा डिब्बा नुमा यंत्र जो हाथ से चलता था और उसमें कई तरह के रंगीन कागज का प्रयोग होता था। ये रंगीन कागज चमकीले होते थे। उस यंत्र में एक गोलाकार छेद होता था। यह छेद उतना ही बड़ा होता था जिसमें आप अपना चेहरा टिका सकें। उस बक्से के अंदर चित्रों का एक रोल लगा होता था। बक्से के बाहर एक हैंडल होता था। यह हैंडल उसी तरह का था जैसा जूस वाले अंकल के जूसर का था। अंकल जिस तरह जूस निकालकर देते उसी तरह बायस्कोप वाले अंकल भी हमारे चेहरे को फंसाकर बाहर से उसी तरह घुमाते औऱ अंदर चित्र घूमने लगते। इस तरह से चित्र देखने का यह मेरा पहला अनुभव था। तब क्या पता था कि स्क्राल शब्द हमारी जिंदगी में इतना घुलमिल जाएगा कि हमारी उंगलियां सुबह से शाम स्क्राल ही करती रहेंगी।

 मुझे यह देखकर हैरानी हुई कि किस तरह चीजें एक जगह से दूसरी जगह जाकर बदलती तो जरूर है पर स्थायी ढांचा एक ही होता है। जादोपटिया की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। मैं आपको जादोपटिया की कहानी सुनाऊं इससे पहले कुछ बातें करना भी जरूरी है। 'जादोपटिया' शब्द का अर्थ है जादूई चित्रकार। जादोपटिया कला को संथाल समाज का पुश्तैनी पेशा कहा जा सकता है। हरियाणा के सुरजकुंड मेले में जब झारखंड को थीम स्टेट बनाया गया था, वहां जादोपटिया को प्रदर्शित किया गया था। झारक्राफ्ट के माध्यम से इसे बेचा भी जा रहा है।

दरअसल, जादो संथाल में चित्रकार को कहा जाता है. इन्हें पुरोहित भी कहते हैं. ये कपड़े या कागज को जोड़कर एक पट्ट बनाते हैं फिर प्राकृतिक रंगों से उसमें चित्र उकेरते हैं. जादो द्वारा कपड़े या कागज के छोटे–छोटे टुकड़ों को जोड़कर तैयार पट्टों को जोड़ने के लिए बेल की गोंद का प्रयोग किया जाता है। प्राकृतिक रंगों की चमक बनाए रखने के लिए बबूल के गोंद भी मिलाया जाता है। चित्र को उकेरने के लिए लाल, पीला, हरा, काला, नीला आदि रंगों का प्रयोग किया जाता है। खास बात यह कि ये रंग प्राकृतिक होते हैं हरे रंग के लिए सेम के पत्ते, काले रंग के लिए कोयले की राख, पीले रंग के लिए हल्दी, सफेद रंग के लिए पिसा हुआ चावल आदि का प्रयोग किया जाता है. रंगों को भरने के लिए बकरी के बाल से बनी कूची या फिर चिडि़या के पंखों का प्रयोग करने की परंपरा है।  प्रकृति से प्राप्त जल-आधारित रंग जादोपटिया कारीगरों द्वारा अपने स्क्रॉल को चित्रित करने के लिए उपयोग किया जाने वाला माध्यम था। लाल रंग आमतौर पर धार्मिक और पौराणिक चित्रों में प्रयोग किया जाता है। सफेद रंग उपयोग करने के बजाय यह उसे "खाली" के रूप में छोड़ देते हैं।

  आज हम पट्टा पेंटिंग को जादोपतिया पेंटिंग की विविधता के रूप में वर्गीकृत कर सकते हैं। लंबी स्क्रॉल पेंटिंग को पट्टा पेंटिंग या पटचित्र के नाम से जाना जाता है। झारखंड से पैटकर पेंटिंग, पश्चिम बंगाल औऱ उड़ीसा से पट्टचित्र इसी तरह की पेंटिंग का विकास है। पश्चिम बंगाल में, पटचित्र-चित्रकारी समुदायों को पटुआ के नाम से जाना जाता है। इन्हें झारखंड में पाटीदार, पाटेकर या पैटकर के नाम से भी जानते हैं। पद्य, पटचित्र का स्रोत है। पद्य या पद दो पंक्तियों की छंदबद्ध कविता है। पैतकर पेंटिंग की कथात्मक स्क्रॉल शैली पांडुलिपि से ली गई है, जिसका उपयोग राजाओं द्वारा अन्य राजाओं को संदेश देने के लिए किया जाता था।

  चित्रों के जरिए इस कहानी में मिथक, साथ ही आदिवासी जीवन, अनुष्ठान की बातें बतायी जाती हैं। चित्रित विषय की प्रस्तुति कथा या गीत के रूप में लयबद्ध कर की जाती है । चित्रकारी के लिए बनाया जानेवाला यह पट्ट पांच से बीस फीट तक लंबा और डेढ़-दो फीट चौड़ा होता है। इसमें कई चित्रों का संयोजन होता है। चित्रों में बॉर्डर का भी प्रयोग होता है। चित्रकला का विषय सिद्धू-कान्हू, तिलका मांझी, बिरसा मुंडा जैसे शहीदों की शौर्य गाथा के अलावा रामायण, महाभारत, कृष्ण लीला भी होती है।

मृत्यु का शोक औऱ उम्मीद की कहानी है यह

जादोपतिया चित्रकार उन घरों में जाते थे जहाँ पहले किसी की मृत्यु हो गई थी। सभी लोग एक बैठक में जमा हे जाते हैं। गांव समुदाय और बिरादरी के लोग इसमें शामिल होते हैं।  सब लोगो के आसन ग्रहण करने के बाद जादोपतिया चित्रकार अपना आसन ग्रहण करते हैं। उसके बाद एक जादोपतिया चित्रों का एक रोल लेकर उसे घुमाता जाता है एक के बाद एक चित्र आता रहता है और दूसरा कथावाचक कहानी सुनाता है। यह कहानी, एक मृत व्यक्ति की है जिसकी आंखों में पुतली को नहीं चित्रित किया है।  कथावाचक परिवार को उसकी पीड़ा के बारे में बताया है और उसकी मुक्ति के लिए  पुतली (चक्षु दान) दान का अनुरोध करता है। कहानी सुनने के बाद सब उसे दान देते हैं और आत्मा की मुक्ति की प्रार्थना करते हैं। इसके बाद जादोपतिया अपनी एड़ी पर बैठ जाता है और अपने स्क्रॉल खोलता है। वह बताता है कि  मृत व्यक्ति स्वर्ग में खुश है। यह जानकर परिवार संतुष्ट हो जाता है।  इस कथा का या इस तरह  की रीतिनीति का मूलतत्व यह है कि ऐसा करने से शोक मनाने वालों को उनके दुख से उबरने में मदद मिल सके। इस उपाय का जब अच्छा प्रभाव पड़ा तो इन चित्रकारों का नाम जादोपटिया पड़ गया। संथाल मृतक के जले हुए अवशेषों को पवित्र दामोदर नदी में बहाते हैं।  अस्थि चुनने के लिए संथाल जादोपटिया को दामोदर की यात्रा करने के लिए आमंत्रित करते हैं।

 

 

रविवार, 30 सितंबर 2018

लघुकथाएं- पवित्रा अग्रवाल



समर्थ

विपिन के लौटते ही माँ ने रवि से कहा --"रवि तू तो कह रहा था कि तेरा दोस्त विपिन बहुत पैसे वाले घर का लड़का है,उसने कितनी घिसी हुई जीन्स पहन रखी थी,उसमें छेद भी हो रहा था ।''
"हाँ माँ यह सच है वाकई वह बहुत पैसे वाले घर का लड़का है।उसके घर में दो एयर कंडीशन्ड कारें हैं,घर में ए.सी. लगे हैं।इस सब के बावजूद उसे रहीसी दिखाने का शौक नहीं है ,वह बहुत सिम्पिल लड़का है, घमंड तो उस में नाम मात्र को नहीं है।''
"तू भी कुछ सीख उस से ,तेरे तो कितने नखरे हैं।तेरी स्कूल यूनिर्फोम की पेंट कुछ ऊँची हो गई थी मैं ने इतनी मेहनत करके उसे खोल कर लम्बा किया फिर भी तूने उसे नहीं पहना और मुझे दूसरे खर्चो में कटौती कर के नई पेन्ट खरीदनी पड़ी ।''
"अरे माँ वह पैसे वाले घर का लड़का है,उसकी घिसी जीन्स को फैशन या उसकी सादगी कहा जाएगा और हम पहन लें तो उसे हमारी आर्थिक कमजोरी समझा जाएगा।''
'पर बेटा लोग कुछ भी सोचें .हम को अपनी हैसियत और जरुरत के हिसाब से खर्च करना चाहिये '



धमकी 


अस्पताल में कुछ लोगों द्वारा डाक्टर को पीटते देख कर मरीजों के रिश्तेदार परेशान हो गए---
एक व्यक्ति चिल्लाया --"अरे आप डाक्टर को क्यों मार रहे हैं ?'
"मारें नहीं तो क्या करें ..इनकी आरती उतारें ? जाने कहाँ कहाँ से आकर डाक्टर बन गए हैं ,इन्हों ने हमारे इकलौते बेटे की जान ले ली ।'
दूसरे व्यक्ति ने तर्क दिया --"अस्पताल में आने वाला हर मरीज ठीक हो कर ही तो घर नहीं जाता ?'
एक अन्य ने हॉ में हाँ मिलाई --"बिल्कुल,.. कुछ ठीक हो जाते हैं तो कुछ की मौत भी हो जाती है ।'
"आप का बेटा तो चला गया... आप इस तरह मार-पीट करेंगे तो दूसरे बहुत से मरीज बेमौत मारे जाएगे ।'
"वो कैसे ?'
"आप मारपीट और तोड़-फोड़ करेंगे तो सब डाक्टर्स हड़ताल पर चले जाएगे फिर दूसरे मरीजों का क्या होगा ?'
"आप लोग कौन हैं ?'
"हम यहाँ पर भर्ती मरीजों के रिश्तेदार हैं ..दूर हटिए हम आप को डाक्टर से मार-पीट नहीं करने देंगे.. ।'
"हाँ भैया यदि आपका बेटा डाक्टर की गल्ती से मरा है तो आप कम्पलेन्ट कीजिए।पर....
अपने को अकेला पड़ते देख कर वह झुंझला कर बोला ---- "आप मुझे जानते नहीं ,मैं एसे चुप नहीं बैठूँगा, अभी भैया जी को ले कर आता हूँ ।'
साभार लघुकथाब्लागस्पाॅटडाॅटकाॅम

शनिवार, 15 सितंबर 2018

कहानी -भूख- चित्रा मुद् गल



आहट सुन लक्ष्मा ने सूप से गरदन ऊपर उठाई। सावित्री अक्का झोंपड़ी के किवाड़ों से लगी भीतर झांकती दिखी। सूप फटकारना छोड़कर वह उठ खड़ी हुई, ‘‘आ, अंदर कू आ, अक्का।'' उसने साग्रह सावित्री को भीतर बुलाया। फिर झोंपड़ी के एक कोने से टिकी झिरझिरी चटाई कनस्तर के करीब बिछाते हुए उस पर बैठने का आग्रह करती स्वयं सूप के निकट पसर गई।सावित्री ने सूप में पड़ी ज्वार को अँजुरी में भरकर गौर से देखा, ‘‘राशन से लिया?''
‘‘कारड किदर मेरा!''
‘‘नईं?'' सावित्री को विश्वास नहीं हुआ।
‘‘नईं।''
‘‘अब्बी बना ले।''
‘‘मुश्किल न पन।''
‘‘कइसा? अरे, टरमपरेरी बनता न। अपना मुकादम है न परमेश्वरन्, उसका पास जाना। कागद पर नाम-वाम लिख के देने को होता। पिच्छू झोंपड़ी तेरा किसका? गनेसी का न! उसको बोलना कि वो पन तेरे को कागद पे लिख के देने का कि तू उसका भड़ोतरी...ताबड़तोड़ बनेगा तेरा कारड।''
उसने पास ही चीकट गुदड़ी पर पड़े कुनमुनाए छोटू को हाथ लंबा कर थपकी देते हुए गहरा निःश्वास भरा-‘‘जाएगी।''
‘‘जाएगी नईं, कलीच जाना!'' सावित्री ने सयानों-सी ताकीद की। फिर सूप में पड़ी गुलाबी ज्वार की ओर संकेत कर बोली, ‘‘ये दो बीस किल्लो खरीदा न! कारड पे एक साठ मिलता।''
छोटू फिर कुनमुनाया। पर अबकी थपकियाने के बावजूद चौंककर रोने लगा। उसने गोद में लेकर स्तन उसके मुंह में दे दिया। कुछ क्षण चुकरने के बाद बच्चा स्तन छोड़ बिरझाया-सा चीखने लगा-‘‘क्या होना, आताच नई।'' उसने असहाय दृष्टि सावित्री पर डाली।

शनिवार, 1 सितंबर 2018

कहानी- निर्णय - उर्मिल सत्यभूषण

डा. रत्नाकर की कृति
काम्या ने तीनों ड्रामों में बेस्ट परफार्मेंस दी थी। एक ड्रामे में वह स्कूल गर्ल बनी थी। स्कर्ट में सातवीं आठवीं कक्षा के विद्याार्थी का रोल किया था। कपड़े या परिधान पूरा व्यक्तित्व ही बदल देते हैं। दूसरे में वह एक फ्लर्ट युवती का रोल कर रही थी और तीसरी में युवा विधवा का। तीनों अलग अलग तरह के किरदार थे पर बड़ी निपुणता से उसने निभाए थे।
उम्र उसकी होगी कोई तीसक साल पर लगती बहुत कम थी। शरीर बिल्कुल छरहरा था। चेहरा बेरौनक था बेशक उसे सुसज्जित करके रखती थी हालांकि चुलबुलेपन के आवरण में चेहरे के एक्सप्रेशन दबे छुपे रहते थे। नजदीक से बात करने पर आंखों का खालीपन महसूस होता था और शरीर पर भी नवविवाहिता जैसी लुनाई या स्निग्धता दिखाई नहीं देती थी। ऊपर से वह बेपरवाह खिलंदडी हिरणी सी दिखाई देती थी ‐‐‐‐ सारे ड्रामा ग्रुप की एक्टीविटीस में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेती थी। घूमना, माॅल में जाना, पिक्चर देखना, लड़कों के साथ बेबाक बेलौस हो बतियाती, हंसती, मजाक करती, कभी कभी तो फ्लर्ट जैसा व्यवहार करती।
वे लोग खुलकर बातें करते। अपने रिलेशनशिप को भी। ड्रामें के कम्पलीकेटेड चरित्रों को लेकर भी चर्चायें होती कि ऐसे चरित्र भी होते हैं?  तब जाकर थोड़ा सा भेद खुला या बल्कि सभी अभिनेता अभिनेत्रियों के अन्तद्र्वन्द्व और मनोग्रन्थियांे, मनोविकार उजागर होने लगे थे।
पता चला काम्या को भी डिप्रेशन ने ही घेर रखा था कि उसने ड्रामा ग्रुप का विज्ञापन देखकर ही वह ग्रुप ज्वाइन किया था। वह अपनी शादी से संतुष्ट नहीं थी। उसकी शादी हुए दो साल हो गए पर शादीशुदा जीवन का शुभारंभ नहीं हुआ था। सब उससे सहानुभूति रखते थे पर किसी ने उसकी प्यास बुझाने की जाने या अनजाने कोशिश नहीं की थी। सभी खिलाड़ी (अभिनेता लोग) संस्कारी और विचारशील थे। नजदीकियां बढ़ने लगीं तो प्यासे तनमन की पुकारें भी सुनाई देने लगीं। यदाकदा रिहर्सल के दौरान उसकी कामातुर चेष्टायें मर्यादायें पार करने लगी तो उनकी निदेशक को बात करनी पड़ी।
काम्या उन्हंे अपनी स्थिति समझाते समझाते रो पड़ी।  उसका पति अच्छी पोस्ट पर था। सौम्य, सुदर्शन युवक पर पता नहीं क्यों शादी के निकष पर खरा नहीं उतर पा रहा था। उसने पत्नी से संबध नहीं बनाये। उदास सा बना रहता। काम की व्यस्तता भी बहुत थी। कभी खुलकर काम्या ने भी बात नहीं की। संकोच छोड़कर पहल करने की कोशिश काम्या ने की थी पर पति को तो स्त्रीतन से ही शायद एलर्जी थी। वह उसकी छटपटाती देह को छोड़कर चल देता। वह अपमान का घूंट पी कर रह जाती। कैसे बात करे? वह किससे बात करे?
यूं बाहर घूमने के लिए, खाने पर पति उसे ले जाता बल्कि हनीमून पर भी हो लोग गए थे पर ठंडा गोश्त बेजान ही रहा और वे बेजान ही लौट आए।
अब कानाफूसियां होने लगी थीं कि शायद उसका पति गे है। अब उसका पति उसे कहने लगा था कि वह डायर्वोस ले ले, उसकी तो शादी में या सेक्स में कोई रूचि ही नहीं है। अपनी डायरेक्टर के समझाने पर उसने मनोचिकित्सकों से भी संपर्क किया था पर पति उनके पास जाने को राजी ही नहीं हुआ था ‐‐‐
इसी ऊहापोह में दिन बीत रहे थे।
एक दिन वह रात को ड्रामें की पोशाक में ही लौट आई थी, रात बहुत हो चुकी थी, मेकअप नहीं उतरा था। वह दुल्हन के वेश में थी। दरवाजा कुशाग्र ने ही खोला था। काम्या की मांग में सिंदूर की जगरमग रेखा ने कुशाग्र की आंखो में कामना के डोरे खींच दिये। वह बेहद थकी थी। बोली:- मुझे नींद आ रही है:- मैं सोने जा रही हूं। डायवोर्स पेपर्स तैयार करवा दिये हैं। ये रहे पेपर्स - देख लेना - गुड नाइट और वह साड़ी उतारकर बेहोश सी पलंग पर गिर गई।
कुशाग्र बेडरूम में चला आया। उसकी अस्त व्यस्त देह देखकर घबरा सा गया। उसने उसके खुले बालों को धीरे से छुआ, एक पुलकित लहर उसके भीतर दौड़ गई। उसने उसे स्वतःचालित ही सीधा किया एक चित्ताकर्षक सुगंध उसके नासापुटों में भर गई। उसकी नजर उसकी मांग की रेख और नाक की जगमगाती लौ पर ठहर गई जो उसे बार बार विहृल करने लगी।
एक आंसू काम्या के गाल पर रूका हुआ था धीरे से झुककर कुशाग्र ‐ने उसे होंठों में समेट लिया। अधजगी अधसोई काम्या ने उसके गालों में बाहों का हार डाल दिया। वह उत्तेजित होकर उसे चूमने लगा। वह भी सचेत होकर उससे लिपट गई। जाने कैसे उसके ठंडे तन मन में स्पंदन उठ उठकर बिजलियों में परिवर्तित होते चले गए।  समुद्र ठाठें मारता रहा, मर्यादायें पार करता रहा:
वह कामना के ज्वारों में जानें कितनी उम्रों तक डूबती उतराती रही।
‘सुबह की चाय - आवाज देकर कुशाग्र ने उसे जगाया।
एक नशा सा तारी था। चाय पीकर थोड़ा नशा उतरा, होश आया ‐ ‐‐ पेपर्स पर नजर गई।
ये तुम्हारे डायवोर्स पेपरज काम्या - डायवोर्स चाहिए न तुम्हें।
हां हो डायवोर्स: चाहिए चाहिए मुझे डायवोर्स।
ठीक है:- पहले मैं अपना हक तो ले लूं। कुशाग्र ने फिर उसका मुंह हथेलियों में लेकर लौंग पर उंगली रखी। सिंदूर की रेखा पर आंख गडाई: फिर चूम लिया।
‘काम्या, तुम इतनी सुंदर हो। पहले तो कभी सिंदूर नहीं लगाया। कभी नाक में कील क्यों नहीं पहनी। इन्होंने कितना सुंदर बनाया तुम्हें।
‘‘सुहागरात के लिए क्या इन शर्तों की जरूरत थी कुशाग्र, मेरी देह, मेरा व्यक्तित्व अपने आप में पूर्ण नहीं हैं क्या?
काम्या नहीं: मैंने दो साल तक अपना अपमान सहा। आपको पाने का इंतजार करती रही।कुशाग्र: मेरी सुंदरता के पाने के लिए ये उपादान चाहिए? सिंदूर, लौंग, आभूषण। नहीं कुशाग्र मेरी चेतना जाग चुकी है। कामना का ज्वार मेरे जागरण को अब फिर सुला नहीं सकता। दाम्पत्य की जो अनिवार्य शर्त है वह हमारे बीच में नहीं है।
हम निरंतर सुलग सुलग कर नहीं जी सकते। पूर तरह अजनबी बनकर हम नई शुरूआत करेंगें।
काम्या के ठंडे ठीर शब्दों की फुरैरी उसके कामना ज्वारों को भाटों में बदल चुकी थी। वह फिर स्पंदनहीन सन्नाटों से घिर रहा था।  वह उसके पास सरक आई: ठंडा बेगान हाथ अपने हाथ में लेकर काम्या कहने लगी:- कुशाग्र, मुझे समझ आ गई है कि हम एक दूसरे के लिए नहीं बने। मेरी अतृप्त देह को तृप्ति का स्वाद तुमने चखाया मैं आभारी हूं पर ऐसी तृप्ति काम्य नहीं हैं। हम जल्दी ही इक दूजे को भूल जायेंगें। हम डायवोर्स पेपर्स पर साईन करेंगें और एक दूसरे को शुभकामनाएं देंगें।  जब तक यह सारी कार्यवाही पूरी नहीं होती हम वैसे ही मित्रवत रहते रहेंगें: शांत - सन्नाटों से घिरे - चुपचाप।
ठीक है
ठीक
धीरे से उसका हाथ चूमकर उठ गई काम्या।
AJC-6-300

शनिवार, 25 अगस्त 2018

मेला - ममता कालिया

मकर संक्रांति से एक दिन पूर्व पहुँच गईं चरनी मासी। पहले कभी उसके घर आई नहीं थीं। पर उन्होंने पता ठिकाना ढूँढ निकाला। अंकल चिप्स की छोटी-सी डायरी में उनके पोते के हाथ की टेढी-मेढी लिखावट में दर्ज था 'सत्य प्रकाश' २२७ मालवीय नगर इलाहाबाद। उनके साथ चमडे का एक बडा-सा थैला, बिस्तरबंद और कनस्तर उतरा। और उतरीं उन जैसी ही गोलमटोल उनकी सत्संगिन, प्रसन्नी।

स्टेशन से चौक के, रिक्शे वाले ने माँगे चार, मासी ने दे डाले पाँच रुपए। तीरथ पर आई हैं, किसी का दिल दुखी न हो। पुन्न कमा लें। इतनी ठंड में दो सवारी खींच कर लाया है रिक्शेवाला।

चाय पानी के बाद उनके लिए कमरे का एक कोना ठीक किया गया तो बोली 'रहने दे घन्टे भर बाद स्वामी जी के आश्रम में जाना है।'

सत्य ने कहा, ''थोडे दिन घर में रह लो मासी, वहाँ बड़ी ठंड है।''
''तीरथ करने निकली हैं, गृहस्थ विच नहीं रहना।''
''अच्छा मासी यह बताओ आप तीरथ पर क्यों निकली हो?"

''ले मैं क्या पहली बार निकली हूँ। सारे तीरथ कर डाले मैंने-हरद्वार, ऋषिकेश, बद्रीनाथ, केदारनाथ, पुष्करजी, गयाजी, नासिक, उज्जैन। बस प्रयाग का यह कुम्भ रह गया था, वह भी पूरन हो जाएगा।''

''मासी आप इतने तीरथ क्यों करतीं हो?''
''ले पाप जो धोने हुए।''
भानजे की आँखों में शरारत चमकी, ''कौन से पाप आपने ने किए हैं?' सत्ते (सत्य प्रकाश) मासी से सिर्फ़ छह साल छोटा था। नानके में उसका बचपन इसी मासी को छकाते, खिझाते बीता था।

चरनी मासी हँस पडीं, एकदम स्वच्छ दाँतों वाली भोली-भाली निष्पाप हँसी। जब वे निरुत्तर होने लगती हैं तो स्वामी जी की भाषा बोलने लगती हैं, ''पाप सिर्फ़ वही नहीं होता जो जानकर किया जाय। अनजाने भी पाप हो जाता है, उसी को धोने।''

अनजाने पाप में उनके स्वामी जी के अनुसार बुरा बोलना, बुरा देखना, बुरा सुनना जैसे गांधीवादी निषेध हैं।
सत्ते की पत्नी चारू साइंस की टीचर है। उसने कहा, ''मासी आप से भी तो लोग अनजाने में कभी बुरा बोले होंगे। जैसे जीरो से जीरो कट जाता है, पाप से पाप नहीं कट सकता क्या?''
''पाप से पाप और मैल ने मैल नहीं कटता। पाप की काट पुण्य है, जैसे मैल की काट साबुन।''
''मलमल धोऊँ दाग नहीं छूटे'' जैसे भजन के बारे में आप क्या सोचती हैं?''
''छोटे मोटे तीरथ पर यह मुश्किल आती होगी, प्रयाग का महाकुम्भ तो संसार में अनोखा है। तुम गरम पानी से नहाने वाले क्या जानो।'' मासी ने आर्यां दी हट्टी के लड्डुओं का पैकेट पीपे में से निकाला और चारू के हाथ में दिया और कहा,
''तीरथ अमित कोटि सम पावन।
नाम अखिल अध नसावन।''

चारु सोचने लगी 'दसियों बरस तो मैं इन्हें जानती हूँ, जगत मासी हैं ये। हर एक के दुख में कातर, सुख में शामिल! न किसी से बैर न द्वेष, पडोस में सबसे बोलचाल, रिश्तेदारों में मिलनसार, परिवार में आदरणीय, यहाँ तक कि बहुएँ भी कभी इनकी आलोचना नहीं करतीं। ऐसी प्यारी चरनी मासी कुम्भ पर कौन से पाप धोने आई हैं कि घर की सुविधा छोड वहाँ खुले में रहेंगी।''
पर मासी नहीं मानी। सूरज डूबने से पहले चली गईं।

पेशे से पत्रकार है सत्ते मगर दोस्तियाँ उसकी हर महकमें में है। इसलिए जब एस.पी. कुम्भ ने कहा, ''कवरेज'' आपके रिपोर्टर करते रहेंगे, एक दिन खुद आकर छटा तो देख जाएँ तो सबकी बाँछें खिल गईं। अभी मेला क्षेत्र में प्रवेश भी नहीं किया था सत्या और चारू ने कि मेले का समां नजर आने लगा। सोहबतिया बाग से संगम जाने वाले मार्ग पर भगवे रंग की एम्बैसडर गाडियाँ दौड रहीं थीं। पाँच सितारा आध्यात्म पेश करने वाले, विशाल जटाजूट धारण किए साधू संत, फकीर रंग बिरंगे यात्रियों के रेले में अलग नज़र आ रहे थे। दूर से संगम तट पर असंख्य बाँस बल्ली के चंदोवे तने हुए थे। कहीं रजाई में बैठे हुए भी ठिठुर रहे थे लोग, कहीं मेले में ठंडे कपडो में बूढे, जवान, अधेड स्त्री पुरुष और बच्चे एक धुन में चले जा रहे थे। सबसे अच्छा दृश्य था किसी टोले का सड़क पार करने का उपक्रम। सब एक दूसरे की धोती कुरते का छोर पकड़ कर रेलगाडी के डिब्बों की तरह चल रहे थे।

शनिवार, 18 अगस्त 2018

कहां हाे उर्मिला- प्रीति मिश्रा

स्वाति गुप्ता की पेंटिंग.
 प्रकृति और स्त्री दाेनाें ही सुंदर हैं पर समाज इनकी कद्र नहीं करता.

छोटे से कद की, उम्र यही कोई पचास से पचपन साल, चेहरे पर झुर्रियां प्रौढ़ावस्था की कहानी कह रही थीं, बालों पर सफेदी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही थी। पर सक्रिय इतनी कि किशोरवय भी शर्मा जाएं, कभी-कभी हम सबको ये लगता था कि क्या ये कभी थकती नहीं है, बहू के साथ घरेलू कामों में कदम से कदम मिला कर चलती थीं ।

हमने सुना था कि 7 साल की उम्र में ही वह ससुराल आ गई थी, शायद 2-3 साल की थी तभी उनकी माँ का देहावसान हो गया था, पिता ने किसी तरह से उनके हाथ पीले कर अपनी जिम्मेदारियों से मुक्ति पा कर वैराग्य का जीवन धारण कर लिए। मात्र 7 साल की उम्र से ही उनका वो जीवन शुरू हुआ जो इस समय में 25 साल में भी जल्दी लगता है। संयुक्त परिवार छः भाइयों की सबसे बड़ी भाभी थी तो जिम्मेदारियां भी बड़ी थी, सब कुछ सिर झुका कर मानना और चुप रहना उनका जीवन बन चुका था, बोलती भी किसके दम पर माँ ने तो मर कर साथ छोड़ा था, पर पिता ने अपनी जिम्मेदारियों से भागना उचित समझा बिना ये सोचे कि बिटिया पर क्या गुजरेगी। उनका मायका और उनकी ससुराल सब वही थी। स्वभाव से बहुत सरल, खाना ऐसा बनाना कि होटल का शेफ भी फेल हो जाए, पर पता नहीं क्यों ससुराल में लोग उनसे कभी खुश नहीं होते, हमेशा उनकी ही बुराई सबसे पसंदीदा विषय रहता था, देवरों की शादी होती गई, देवरनिया आती गई, और उन पर काम का बोझ बढ़ता गया, अब वो उस घर में बहू ना हो कर एक नौकरानी बन कर रह गयी।

कभी तो हमें लगता था कि ये कुछ बोलती क्यों नहीं। पर उनका चुप तो बस चुप । फेस्टिवल पर अक्सर हमने देखा था कि सबको खिला कर तृप्त करने वाली जब खुद खाने बैठती तो झगड़े शुरू कर दिए जाते और वो भूखे पेट ही सो जाती या फिर बहते हुए अश्रुधारा के साथ कौर को निगल लिया जाता था, पर फिर भी चुप और सास ऐसी कि इस बात को लेकर सुनाने से बाज ना आए कि छोटी बहुओं को समय पर नाश्ता खाना दिया कि नहीं । कभी देवर तो कभी पति द्वारा हाथ उठा दिए जाने पर भी वो हमेशा की तरह चुप और हद तो तब हो गई जब देवर द्वारा डण्डे के प्रहार से रक्तरंजित हुई वो अपने ही परिवार द्वारा दोषी ठहराई गई औऱ महीनों तक किसी भी सदस्य ने उनसे बात नहीं की, एक अंधेरी कोठरी में पड़ी उनका करुण क्रदन ऐसा लग रहा था जैसे वो बड़ी कातरता से अपनी माँ को पुकार रही हों पर फिर भी चुप |

पति भी ऐसा जो कभी बीवी की तरफदारी नहीं करता क्योंकि वह पत्नी का गुलाम नहीं बनना चाहता था । ऐसा लगता था कि जैसे वो बोलना भूल चुकी हैं । दुनिया उनकी तारीफ करता सम्मान देता पर अपने परिवार में ही उपेक्षित । शायद ही उन्हें कभी बाहर जाते हुए देखा हो, क्योंकि सास को पसंद नहीं था कभी चली भी जाती तो घर में बवंडर मच जाता । बस कभी-कभी मन्दिर के सामने उन्हें रोता हुआ पाया, हो सकता है ईश्वर से माँ ना होने का दुःख बयां करती रहीं होंगी अपने आँसुओ के द्वारा ।

उनका संघर्ष उनके अपनों से था, उनके पास वो कोई नहीं था जिससे वो शिकायत करती, जिससे जी भर कर अपना दुःख बयां करती, जी भर कर रोती, ऐसा कोई हाथ नहीं था जो उनके सिर पर फेरा जाता। शायद वो चुप ही रहती जिंदगी भर अगर उनकी बच्ची के साथ इतना बुरा ना हुआ होता, एक दुर्घटना ने उनकी बेटी के पति को उससे छीन लिया शादी के साल भर के अंदर ही बेटी का विधवा हो जाना बहुत बुरा था । 1 साल के अंदर पति की मृत्यु के लिए सब उनकी बेटी को ही जिम्मेदार मानने लगे और उसे अभागिनी, पति को खा गई शब्द बाणों से बेधने लगे, जब उन्होंने देखा कि बेटी भी चुपचाप सारी बातों को सुन लेती है तो उन्होंने सोच लिया कि अब उनकी चुप्पी तोड़ने का समय आ गया है । समाज के द्वारा मारे गए हर ताने का वो बहुत मजबूती से जवाब देती। एक दिन जब परिवार के लोगों ने ही बेटी पर उंगली उठाई तो उनके अंदर जमा हुआ बरसों का लावा निकल पड़ा उन्होंने अपनी बेटी से रोष भरे शब्दों में कहा- "मैं चुप इसलिए थी कि, मेरी माँ नहीं थी, तुम्हारे पास माँ है, मैंने इतना संघर्ष इसलिए किया ताकि तुम मजबूत हो, मैं डरती थी कि अगर मैं बोलूँगी तो कोई मजबूती से मेरे पीछे ना होगा, पर तेरे पीछे मैं हूँ। मैं रिश्तों के चक्रव्यूह में हमेशा अर्थहीन और महत्वहीन रही पर तू अर्थहीन नहीं रहेगी, मैं माँ ना होने के दर्द से सदैव जूझती रही हूँ पर तेरी माँ है तेरे साथ और तेरे संघर्ष में भी । बस - अब दूसरी उर्मिला नहीं, तू सबके सवालों का मुंहतोड़ जबाव दे वो मत कर जो मैंने किया, तभी मेरा संघर्ष पूर्ण होगा |

इसके बाद सबको उनके चुप रहने का आशय समझ में आया । उनका संघर्ष अपने में बेमिसाल था, और उसी में तप कर वो मजबूत हो गयी थी। अब वो बिल्कुल चुप नहीं थी क्योंकि अब उनका संघर्ष उनके लिए नहीं उनकी बेटी के लिए था ।

ऐसी ही है हमारी उर्मिला!!!

शनिवार, 11 अगस्त 2018

संध्या का सूरज- उर्मिल सत्यभूषण

उर्मिल सत्यभूषण
 महामाया ने दो दिन पहले सूचित किया था।
‘‘वरिष्ठ नागरिक गृह में आपको सिटी मॉम्ज के साथ मातृदिवस मनाने जाना है। आप चलेंगी न आपको बहुत अच्छा लगेगा।
महामाया ने कहा था : ‘सिटी मॉम्ज घरेलू महिलाओं का एक एन जी ओ है। ये होममेकरज हैं पर घर में ही कुछ न कुछ उद्यम चला रखे हैं। घर भी उपेक्षित नहीं होता और महिलाओं की आर्थिक और बौद्विक जरूरतें भी पूरी होती रहती हैं। अपने पारिवारिक कार्यों के साथ साथ समाजोपयोगी प्रोजेक्ट भी हाथ में लेती रहती हैं।
श्रीदेवी के मन में वरिष्ठगृह को देखने की उत्सुकता भी जगी और सिटी मॉम्ज एन जी ओ के सदस्यों से मिलने की इच्छा भी। समय के साथ जरूरतें बदलती हैं तो सामाजिक ढांचे भी अपना रूप बदलने लगते हैं। आज के बुजुर्गों की समस्या बहुत गंभीर रूप लेती जा रही है। संताने अपने काम की भागदौड़ के कारण वृ़द्ध मां बाप को अकेले छोड़ते जा रहे हैं। वृद्ध लोग अपनी उम्र की आधियों, व्याधियों से ग्रसित अकेले रह गये हैं बहुत निरीह और असहाय सी जिंदगी हो गई है उनकी। श्रीदेवी कब से ऐसे सांध्यगृहों की खोज में लगी हैं : उनकी जरूरत शिद्दत से महसूस हो रही है।
ठीक समय पर महामाया लेने पहुंची। वह तैयार बैठी थी कुछ किताबें उठाई और चल दी।
‘‘आंटी, थोड़ी देर हो गई है हमें पर वो लोग बड़ी बेसब्री से इन्तजार कर रहे हैं। आपका इन्तजार हो रहा है।
वहां प्रोग्राम क्या है?
‘वहां मदरज डे मनाना हैं ताकि वहां के रहने वालों को भी अपने होने का एहसास हो। आपका काव्यपाठ होगा, उनको प्रेरणा मिलेगी आंटी अभी दो साल पहले ही दो युवा माताओं की पहल पर यह एन जी ओ शुरू किया गया हैैै।
मैं भी उस एन जी ओ का हिस्सा हूं।
‘आप क्या क्या करते हैं उसमें? श्रीदेवी ने पूछा।
तो महामाया बोली : यह घरेलू महिलाओं की सार्थक पहल है। इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि औरतें आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनें। उनके व्यक्त्तिव का विकास हो और सशक्त महिलायें अच्छे समाज का भी निर्माण कर सकें। अब समय के साथ परिवार की चूलें हिल चुकी हैं। काम दौड़भाग में परिवार टूटते जा रहे हैं। बच्चों का पालनपोषण सही नहीं हो पाता। पढ़ी लिखी महिलाओं ने इस बारे में अच्छी तरह सोचा है कि परिवार, व्यक्ति समाज किस तरह से संतुलित किया जाये तो मातृशक्ति ने एक सार्थक पहल की है।
‘श्रीदेवी, सुनकर खुश हुई। वाह महामाया बड़ा अच्छा सोचा है शहरी माताओं ने। मेरी जैसी ग्रैंड मॉम भी आपके मिशन में शामिल होना चाहती हैं।
‘ओ श्योर - आंटी - इसीलिए तो हमने आपको चुना है हमें गाइडकरने के लिए।
‘आधे घंटे में वे लोग वरिष्ट्ठ गृह पहुंच गये।
शहर की सम्पन्न कालोनी में था गृह - सारी सुख सुविधाओं और वाटिकाओं की हरीतिमा से घिरा हुआ। मंदिर का बहुत बड़ा हाल भी था। जिसमे सत्संग के अलावा कई प्रकार के कार्यक्रम होते रहते थे।
लिफ्ट से वे लोग ऊपर हाल में पहुंचे। वहां पर 20-25 लोग सीनियर सिटीजन थे और 15 या 20 सिटी मॉम्ज की सदस्यायें थी। श्रीदेवी जी का परिचय कराया गया। सबने खड़े होकर तालियां बजाकर उनका स्वागत किया। सब लोग बड़े उत्साह और उमंग में दिखाई दे रहे थे। श्रीदेवी जी ने काव्यपाठ आरम्भ किया तो सभी मंत्रमुग्ध हो उठे। सभी कवितायें उमंग और जीवन्तता से भरी थीं। बाद में वरिष्ट्ठ लोगों ने भी अपने अपने अनुभव शेयर किये। सबने कुछ न कुछ सुनाया और अपना अपना परिचय दिया। उन युवा उत्साही मातृशक्तियों ने नृत्य आरम्भ किया तो वे लोग भी झूम झूम कर नाचने लगी। बाद में जलपान कराया गया और हरेक व्यक्ति का तोहफों से अभिनंदन किया गया। श्रीदेवी इस कार्यक्रम से बड़ी प्रफुल्लित थीं। उसने बुजुर्गों के कमरों का निरिक्षण किया। सब के पास अपना अपना खरीदा हुआ एक कमरा था शौचालय सहित। कमरे अच्छे हवादार, रोशन और फर्नीचर से लैस थे। खाना आदि सब फ्री का। रैम्प भी बने हुए थे। काफी अच्छा प्रबंध था। श्रीदेवी बहुत समय से सोच रही थी अपने लिए भी कमरा लेने का ताकि वहां आकर यहां लिख पढ़ सके। जब मन हुआ घर वालों से मिल भी आए।
उसने अपने विचार सिटी मॉम्ज के आगे भी रखे कि ये सांध्य गृहों का विस्तार किया जाए और प्रचार भी। क्योंकि समय की जरूरत है ये पर सभी समाजजसेवा में लगी संस्थायें समय समय पर इनसे मिलने आये। इनके साथ मिलकर कार्यक्रम करें।
ऐसा चल रहा है आंटी -  बहुत से आयोजन यहां होते रहते हैं जिनमें ये लोग भी शामिल होते हैं। दो दिन बाद यहां पर सामूहिक विवाह का कार्यक्रम है जिसमें हमें शामिल होना है। एक महिला ने कहा। उसन कहा ‘दीदी‘ आप चाहो तो कभी आकर रह भी सकते हैं हमारे साथ। कमरे कई खाली रहते हैं जब कई लोग अपने घर चले जाते हैं मिलने।
एक बुजुर्ग ने कहा - मैडम, हमें अपनी पुस्तकें दे जाएं यहां की लाइब्रेरी अभी ठीक नहीं है।
मैं जरूर पुस्तकें लाऊंगी और लाइब्रेरी का प्रबंध भी किया जायेगा। श्रीदेवी ने सिटी मॉम्ज से इस बारे में कहा।
जाते जाते : वो लोग बोले :-
मैडम एक गीत और सुना जाओ। आपके गीत जीवन का संदेश लाये हैं। श्रीदेवी ने कहा - जरूर : यह मेरा गीत आप मेरे साथ गायें
सूखे पत्ते हैं हम तो बिखर जायेंगें
पेड़ को पर हरेपन से भर जायेंगें
जिंदगी की नदी में नहाये बहुत
हंसते गाते ही पार उतर जायेंगें
उसने जीने को दी थी सौगाते उम्र
इसके पल पल को जीवंत कर जायेंगें
हम तपे हैं उम्र भर मगर शाम को
ढलते सूरज की मानिंद बिखर जायेंगें।
छेद करती रही उर्मिला तिमिर में
रोशनी जब मिले अपने घर जायेंगें।
कवियित्री कथाकार।संस्थापक अध्यक्ष परिचय साहित्य परिषद्                                                                                                                               

रविवार, 5 अगस्त 2018

सार्थक अस्तित्व मेरा- उर्मिल सत्यभूषण


राजेश्वरी अकेली रह गई हैं। श्रीवास्तव जी छोड़कर जा चुके हैं। बच्चों के साथ रहना गवारा नहीं। स्वतंत्रता हर हाल में प्यारी है। बच्चे आते जाते हैं। हिदायतों का पुलिंदा साथ में थमा जाते हैं। राजेश्वरी दूर दराज जा नहीं पाती। घर पर एक लैंडलाइन फोन है। उसकी के द्वारा बातचीत करती है। कामचलाऊ। तन्हाइयां काटने को आती हैं। वह समझदार है, तन्हाइयों को इजाजत नहीं देंगी कि वे उन्हें काट दें। वे तन्हाइयों को काटने का ही कुछ इन्तजाम करेंगी बेमौत नहीं मरेंगी। ज्यादा कार्यक्रमां में जाना संभव नहीं। सुबह एक सत्संग में जरूर जाती हैं।
‘‘लाओ, इनके कागज पत्र समेटते हैं। पुस्तकें लिखते थे श्रीवास्तक साहब लिख लिखकर रखते जाते थे कि रिटायर होने के बाद छपवायेंगें। छपवाने की मोहलत नहीं मिली। अब हम ही देखते हैं कुछ छपवाने का प्रबंध करें।
धीरे धीरे उन कागजों को छांटना, संवारना, पढ़ना शुरू किया तो छोटे छोटे जुगनू रोशनी की पकड़ में आने लगे। विषाद अवसाद घुलने लगा। धीरे धीरे महसूस हुआ - ये तो रोशनी के द्वार पर द्वार खुलते जा रहे हैं। कहानियों को अलग किया, कविताओं को अलग। अपनी भी कई पुरानी डायरियाँ, कापियाँ अंधेरे कोनों से नमूदार हुई जिन्हें कब का छुपाकर रख दिया गया था कि अतीत कभी आंखे ही न खोले। जो मिला उसी में सुख प्राप्त कर लें। पति का प्रेम मिल गया तो अपना अस्तित्व अपना व्यक्तित्व उन्हीं में विलीन कर सुख का अनुभव करने लगी थीं वे। औरत को और क्या चाहिए भला?
लेकिन आज आधुनिक युग की खुली आंखों और सिर उठाती महत्वाकांक्षाओं को देखकर महसूस होता है कि औरत को भी अपने अस्तित्व की, अपने व्यक्तित्व की जरूरत है।
किसी की मदद से उसने पति के कार्यों को प्रकाशित करवाने की ठानी। अपनी भी कवितायें चीख पुकार मचाने लगी तो उनके लिए भी प्रयत्न शुरू हुआ। पैसे की कमी न थी।  पैसा लगाकर पुस्तकें सामने आई। राजेश्वरी का हौंसलां बढ़ा तो और भी पुस्तकें लिखने लगी। बातचीत करने लगी। आत्मविश्वास बढ़ा तो कई सम्पर्क सूत्र काम आने लगे।
किताब को नाम मिला :- रोशनी की तलाश में।
भूमिका में सुंदर कविता अवतरित हुईः- रोशनी जुगनू की हो या सूरज की।
रोशनी तो रोशनी है जो विषाद के, अवसाद के अंधेरे दूर करती है। मैं भी निकल पड़ी हूं रोशनी की तलाश में। तुम्हारी हथेली का जुगनू मेरी कलम पर आन बैठा लफ्जों के लिबास में कागज की देह पर उतरता चला गया। कविता के आधार में। गीत के संसार में उजास ही उजास था। रोशनाई से लिखा प्रकाश ही प्रकाश था। इलाही नूर से भरपूर हुआ अस्तित्व मेरा। राह मुझको मिल गई चलने लगी, चलती गई, चलती गई। लीलने को तत्पर थी तन्हाइयां किधर गई, किधर गई? निकल पड़ी अनगिनत रचनायें जुगनू पकड़ने रोशनी की आस में। चल पड़ी मैं चल पड़ी - जुगनुओं की तलाश में
सार्थक प्रयास मेरा दे रहा खुशियां मुझे
चलने लगी अब छोड़कर बैसाखियां। हो रहा है सार्थक
और समर्थ अब अस्तित्व मेरा। तिनका तिनका सुख
मुझको दे रहा संतोष कितना यह मेरा व्यक्तित्व




रविवार, 13 मई 2018

sunday story time अनजानी पहचान गूंथ लो- उर्मिल सत्यभूषण


फेसबुक पर निनाद की टिप्पणी थी - लोग तस्वीरों में ढ़ल गये हैं। दीवारों पर टंग गये। घर है या मकान या मसाज!! ---
देवी ने पढ़ा तो विहृल हो गई। दिल हुआ निनाद से बात करे। संदल को फोन किया --- संदल कैसे हो बेटा? क्या मुझे निनाद का मोबाइल एस एम एस कर दोगे? ‘‘जरूर -  देवी जी - अभी करता हूं : आप ठीक हैं?‘‘ संदल बोला मैं तो ठीक हूं पर निनाद?
हां - देवी जी - आजकल उसके हालात ----
‘आप लोग शेयर करा करो। आओ आओ। बाहर निकालो उसेः
देवी दीदी, मैं तो बातचीत करता रहता हूं पर शायद उसे ही अच्छा न लगे, हमारा ज्यादा दखल देना।
‘‘क्या हुआ है?
‘‘आपको पता हैः निनाद पत्रिका के मामले में काफी व्यस्त रहता है। मां और पत्नी साथ रहती थीं ---- घर को, उसको संभालती थीं। अच्छा मैं फोन नम्बर एस एम एस कर रहा हूं।
ःदेवी निनाद का मोबाइल जानकर आश्वस्त हुई
लगाया :- काफी घंटी बजने के बाद उठायाः
‘‘कौन?
‘‘मैं देवी चौधरी, शायद आप मुझे नहीं जानते? मैं आपको जानती हूं निनाद जीः
‘‘नहीं, मैं भी आपको जानता हूं : आप को कौन नहीं जानता?
‘‘तो फिर मिले क्यों नहीं अब तक? मुझे आपकी पत्रिका को भी प्राप्त करना है। बहुत तारीफ हो रही है। क्या कमाल के होते हैं आपके संपादकीय।
‘जी‘ उधर से मंद स्वर बुझा बुझा सा
‘‘निनाद, आप रहते कहां हो, मैं मिलना चाहती हूं।
‘‘जी, -- मरा मरा सा स्वर --
‘‘बेटे, तुमने अभी तक खाना नहीं खाया, क्यां?
अच्छी बात है क्या? सुबह से भूखे हो?
‘‘आपको कैसे पता मैं भूखा हूं। बताइए कैसे पता‘ स्वर में विहृलता और थोड़ी चंचलता आ गई।
‘बेटे हम औरतें जानीजान हैं। स्वरों को पहचानती हैं।
फूट पड़ा निनाद - ‘‘ मेरी अम्मा चली गईं, छः महीने पहले बीवी चली गई! मैं भी भूतहा मकान में भूत हो गया हूं‘‘।
पर आपको कैसे पता चला मैं भूखा हूं। मुझे बताइए न प्लीज‘‘
देवी बोली :- मैं भी तुम्हारी अम्मा हूं। इसलिए जान गई कि बेटा भूखा है। अम्मा की बात मानों उठो मुंह हाथ धोवो आर पहले खाना खाओ। खाना बना हुआ है क्या ?
‘‘है खाना बना है। मेड आकर बना जाती है। पर खाया नहीं जाता।
मुझे पता है खाया नहीं जाता, पर अब देवी मां रोज आपसे इसरार करेगी - बेटा उठो खाना खा लो - तो खाओगे न ।
‘‘हां‘‘ और वह फूट फूट कर रो उठा।
देवी बोली - बेटा महसूस करो मेरा कंधा, रो लो रो लो खुलकर रो लो -- पांच मिनट उसने रोने दिया फिर फोन पर ही बोली - बेटा मैं दर्द की जुबां समझती हूं। उठो तुम्हें अभी बहुत से काम करने हैं। यह दर्द ही तुम्हारी दवा बन जायेगा। अभी भी कसम दिला रही हूं खाना खाने की। गर्म करो खाना और अपनी पत्नी का नाम लो, अम्मा का नाम लो - एक एक कौर उनका निकाल कर खुद ही खा लो। आंसु बहते हैं तो बहने दो पर शरीर की मट्टी में इंधन डालो जरूर --- मैं एक घंटे बाद फिर फोन करूंगी, ठीक है ठीक उत्तर मिला और फोन बंद हो गया।
ठीक एक घंटे बाद देवी ने फोन किया तो निनाद मुखर लगा ! उसने निनाद से अम्मा का उसकी पत्नी का नाम पूछा : फिर बोली देख निनादः तुम अपनी पत्नी और अम्मा को रोज एक पत्र लिखो जो महसूस करते हो बोलो। तुम्हारी कविता ही तुम्हारा त्राण है, दवाई है, रोशनी है। मेरा पता नोट करो। एस एम एस करूंगीः मुझसे मिलना पड़ेगा, मिलोगे न! जी अम्मा! आपका बहुत बहुत शुक्रियाः
अम्मा का शुक्रिया नहीं किया जाता। अच्छा बाय! उसने मोबाइल पर संदेश दियाः-   
माना जिदगी की राह बीहड़ पर केवल तुम ही हो क्या। अनजानी पहचाने गूंथ लो, पंच सरल बन जायेगा। चट्टानों से टकराये जो राह उसके अनुकूल रही।

शनिवार, 5 मई 2018

रिश्ताें की रंगाेली- कमलेश आहूजा

दीपावली का पर्व नज़दीक था.मीना के घर तैयारियाँ चल रही थीं क्योंकि उसकी बहु नैना की पहली दीवाली थी.
आज दीपावली का दिन था मीना ने तो सुबह से ही सबको जल्दी जल्दी काम निपटाने की हिदायत दे दी थी, क्योंकि एक तो लक्ष्मी पूजन का समय शाम को 6 बजे का था.दूसरा पूजा के बाद बेटी के ससुराल भी जाना था.दो ननदें भी शहर में रहतीं थीं,वो भी आने वाली थीं. मीना ने पति से कहा -" आप बाजार से मिठाई व फल ले आना.पूजा और रेखा (ननद ) के लिए मैं और बहू गिफ़्ट ले आये थे.बेटी के लिए और दामाद जी के लिए भी कपड़े ले लिए थे ".
 दोपहर के खाने के पश्चात, मीना पूजा की तैयारी करने लगी.नैना को ड्रॉइंग पेंटिंग का बहुत शोंक था इसलिए वो मीना के पास जाकर बोली-"माँ मैं बाहर दरवाजे पर रंगोली बना दूँ ".मीना-" हाँ बेटा क्यों नहीं,बल्कि मैं तुमसे कहने ही वाली थी पर सोचा तुम पहले से इतना काम करके थक गई होगी ".नैना ने दरवाजे पर बहुत सुंदर रंगोली बना दी.
शाम को पूजा के समय मीना ने कुछ दिए जलाकर पूजा वाले स्थान पर रख दिये और कुछ दिए एक थाली में रखकर नैना को कहा कि वो बाहर दरवाजे पर दिए जला दे.नैना ने दीपक रखने की लिए दरवाजा खोला, तो देखा कि रंगोली एक तरफ से किसी के पाँव से बिगड़ से गयी थी.
रंगोली को बिगड़ा हुआ देखकर वो बहुत दुःखी हो गई और मीना को आवाज लगाई -" माँ बाहर आओ ".मीना ने सोचा नैना तो दिए जला रही है,फिर उसे क्यों बुला रही है..?.मीना बाहर आई और नैना से पूछा- "क्या हुआ बेटा,मुझे क्यों बुलाया..?".  नैना ने रोते हुए कहा-" माँ देखो किसी ने मेरी रंगोली बिगाड़ दी.इतनी मेहनत से बनायी थी".मीना ने उसे चुप कराया और उसकी बिगड़ी हुई रंगोली को फिर से ठीक कर दिया. मीना ने नैना से कहा-" देख बेटा मैंने भी अपने जीवन में रिश्तों की रंगोली बनाई है और इसे प्रेम,विश्वास और समर्पण रूपी रंगों से सजाया है.जैसे मैंने आज तेरी बिगड़ी हुई रंगोली को ठीक कर दिया है,ऐसे ही जीवन में कभी कोई मेरी रंगोली बिगाड़े या बिगाड़ने की कोशिश करे,तो तू भी उसे ऐसे ही ठीक कर देना ".मीना रंगोली के माध्यम से नैना को ये बात समझा रही थी कि, जिन कार्यों को करने में हम अपने सारे यत्न लगा देते हैं उन्हें कोई बिगाड़ता है तो कितना दुःख होता है.चाहे वो रंगोली बनाना हो या फिर रिश्ते बनाना.अर्थात जिन रिश्तों को बनाने में हमारे बड़ों ने जो यत्न किये हैं,छोटों का भी कर्तव्य बनता है कि वो उन रिश्तों को सदा संजोकर रखें.नैना को मीना की बात समझ आ गयी थी वह बोली-" जी माँ मैं कभी आपकी रंगोली को बिगड़ने नही दूंगी ".
व्यवहारिक ज्ञान सीखने और सीखाने के लिए बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ने की जरूरत नही होती है, हम दैनिक जीवन में होने वाली छोटी-छोटी घटनाओं से भी बहुत कुछ सीख सकते हैं और  अपने से छोटों को सिखा भी सकते हैं. यही इस कहानी का उद्देश्य है..

बुधवार, 2 मई 2018

कहानी- पाचन तंत्र-दर्शना बांठिया

मनीषा नई- नई शादी करके आई ही थी कि सास ने किचन की कमान उसके हाथों सौंप दी,लेकिन उनका रोक-टोक करना कभी बंद नहीं हुआ।शनिवार के दिन मनीषा दोपहर में खाना बना रही थी ,तभी भिक्षुक की आवाज आई -रोटी दे दो माई।मनीषा ने आवाज सुनते ही 2 गर्म रोटी ली और भिक्षुक को देने के लिए जैसे ही दरवाजा खोला तो सास ने तेज स्वर में कहा -'अरे इनको ये गर्म रोटी हजम नहीं होती, वो रात की बासी रोटी पडी है ना ,वो दे दो ' मनीषा तेज आवाज में ऐसी बात सुनकर स्तब्ध रह गयी और उसे रात की पड़ी सूखी रोटी दे दी।मनीषा पढी -लिखी व समझदार थी उसके मन में कई तरह के विचार उमड़ने लगे।
इंसान की जैसे- जैसे उम्र बढ़ती है वैसे- वैसे ही वो हठी प्रकृति का होने लगता है।रविवार के दिन मनीषाा सुबह से ही किचन के कामों में व्यस्त थी,कारण कि आज मनोज(पति) की ऑफिस की छुट्टी है और उनकी पंसद के भोजन की तैयारी करनी थी। खीर,पूरी, सब्जी, कचौरी और मेवे का हल्वा।वो मन ही मन अपनी माँ की बात को याद कर रही थी कि कैसे उसकी माँ हमेंशा कहा करती थी कि "पति के दिल का रास्ता पेट से होकर गुजरता है,इसलिए तू भी अच्छा खाना बनाना सीख लें "मनीषा उनकी बात सुनकर हमेशा मुस्करा देती थी।मनीषा मेवे जरा देखकर डालना और पूरी तेल की ही अच्छी लगती है ,घी मत चढाना अपने सास की आवाज सुनकर मनीषा वर्तमान में लौट आई और कढाही में तेल डालने लगी। मनीषा को उनका रोक-टोक करना हमेशा खराब लगता था पर वो चुप रहती।मनोज किचन में आया और बोला आज बड़ी खुशबू आ रही क्या बनाया है? मनीषा कुछ बताती इतने में ही भिक्षुक की आवाज आई -रोटी दे दे माई। मनीषा ने देखा कि सास दिखाई नहीं दे रही तो उसने गर्म पूरी बनाई व खीर का प्याला भरा और जैसे ही देने लगी कि पीछे से सास ने हाथ पकड़कर कहा 'कल तो समझाया था कि इन लोगों को गर्म खाना पचता नहीं और वैसे भी रोज की आदत हो जाएगी इनकी मांगने की।एक काम कर कल की बची हुई सब्जी और नींबू का अचार दे दे।पर माँ जी वो सब्जी तो कल सुबह की है और अचार में तो फंगस आ चुकी है ,ऐसा देना सही नहीं है ।अरे इनको कुछ फर्क नहीं पड़ता,इनकी, तो आदत हो गई है ऐसा खाने की।मनीषा ऐसी बात सुनकर झल्ला उठी और बोली " क्यों मां जी इन के शरीर का पाचन तंत्र हमारे शरीर से अलग है क्या, जो इनको बासी व खराब खाना ही पचता है ,जो खाना हम नहीं खा सकते, हमारे लिए खराब है तो हम किसी और को क्यों दे?हम लोगों की 1-2 रोटी से ही इनका जीवन यापन चलता है" "माँ जी मनीषा की बातें सुनकर विस्मित हो गई ,पास में खड़ा मनोज भी बोल पड़ा- माँ ये सब क्या है?अगर हमारे पास पुण्याई से इतना है कि हम किसी को दो रोटी दे सकें तो आप क्यों मना कर रही है और जो चीज हमारे स्वयं के खाने योग्य नहीं है उसे दूसरे को नहीं देनी चाहिए।मां जी को आत्मग्लानि होने लगी। वास्तव में ऐसी नःस्थिती कई लोगों की होती है।


इंसान को समय के साथ अपनी प्रवृति बदलनी चाहिए।माना कि हम सम्पूर्ण विश्व को अपनी थाली से आहार नहीं दे सकते लेकिन प्यार व सम्मान तो सबको दे ही सकते है।






रविवार, 29 अप्रैल 2018

रविवार खास कहानी -खत हमारे प्यार का-अनामिका शर्मा

दोपहर 2 बजे । Ting-tong , ting-tong आ रही हूँ पापा ! पापा आ गये !पापा आ गये !( कृति ने दरवाजा खोलते ही पापा को गले लगा लिया ।)हाँ मेरी बेटी! मम्मी कहाँ है? "मम्मी तो अभी बाहर गई है।"अच्छा, कहा गई है? कब आएँगी? कुछ बताया था? "नही भइया । भाभी ने बस इतना कहा था कि वह आपको मैसेज कर देंगी । अच्छा भइया मेरे ट्यूशन का टाईम हो रहा है, इसलिए मैं जा रही हूँ । बाय । "( दीपा ने बाहर जाते हुए कहा)सुबोध ने मोबाइल देखा । अर्चना का मैसेज था, "मैं बाजार जा रही हूँ । आने में देर हो जाएगी ।खाना गर्म करके समय से खा लेना और कृति को भी खिला देना ।दीपा को तो ट्यूशन जाना है, तुम्हारे आते ही वह निकल जाएगी ।तुम घर पर हो तो सारे काम आराम से निपटा कर ही आउंगी ।बाय ।"सुबोध ने मोबाइल एक तरफ रख दिया ।कपड़े बदल कर खाना गर्म किया कृति को खिलाया और खुद खाने की कोशिश करने लगा । आज अपने आप खाना गर्म करके लेना उसे अजीब लग रहा था ।शादी के बाद इन चार सालों में सुबोध ने कभी खुद खाना लेकर नहीं खाया । खाना ही क्या न कभी एक कप चाय बनाई, न कभी अपने कपड़े तह करके रखे ,न कभी प्रेस करी । बाजार का भी बहुत सा काम अर्चना ही करती आई है । सुबह जब वह नहा कर निकलता है तब उसे अपने कपड़े, बेल्ट, लैपटॉप बैग, मोबाइल, चार्जर, गाड़ी की चाभी , लंच बाक्स सभी तैयार मिलता है ।हर काम अर्चना कर देती है ।उसके कहने से पहले ही उसकी हर जरूरत पूरी हो जाती है ।"पापा! यह होमवर्क करवा दो ना प्लीज, मम्मी तो लेट आएगी फिर मेरे खेलने का वक्त हो जाएगा ।"सुबोध ने कृति को होमवर्क करवाया ।फिर कृति खेलने लगी ।सुबोध ने घड़ी देखी ।ओह, अभी तक 3 ही बजा है ।वक्त तो जैसे थम सा गया है ।अर्चना नहीं है तो जैसे घर खाने को दौड़ रहा है ।सुना सुना सा । वर्ना अर्चना इतना बोलती है कि मुझे कहना पड़ता है, "अब तो चुप हो जा देवी । और वह झूठा गुस्सा दिखाते हुए कहती है, हाँ, सही है । अब तो आपको मेरा बोलना भी पसंद नहीं है ।और शादी से पहले कितनी बार फोन करते थे, वह भी सिर्फ मेरी आवाज सुनने के लिए ।" सुबोध के होठों पर प्यार भरी मुस्कान फैल गई ।मुस्कुराते हुए अचानक उसकी मुस्कान फीकी पड़ गई, उसे सुबह हुई घटना याद आ गई । सुबोध को देर हो रही थी और उसकी जरुरी फाइल, जो उसने कार की चाबी के साथ रखी थी नही मिल रही थी ।अर्चना नहाने चली गई थी तो कौन मदद करता ।अर्चना जैसे ही नहा कर आई सुबोध उस पर बरस पड़ा , "पता नही क्या जल्दी रहती है नहा कर तैयार होने की? तुम्हे कौन सा ऑफिस जाना है? पहले मेरा सामान तो सही से रख देती ।अब मेरी फाइल और चाबी लाकर दोगी या ऐसे ही घूरती रहोगी? "अर्चना ने सुबोध के बैग में से फाईल जो कि सुबोध ने ही उसे बैग मे रखने को दी थी और टेबल पर रखी चाबी जो कि वहां रखे फूलदान की ओट से छिप रही थी निकाल कर सुबोध को दे दी और चुपचाप अपने कमरे में चली गई ।अब सुबोध को बुरा लग रहा था ।गलती उसकी थी, उसे अहसास तो था लेकिन उसके अंदर का पति नाम का शख्स उसे माफी न मांगने के लिए उकसा रहा था । ऐसा कभी नही हुआ था कि सुबोध हाफ डे पर घर आया हो और अर्चना बाहर चली जाये । वह उससे नाराज थी इसलिए बिना कुछ कहे चली गई थी । वर्ना अर्चना तो बहाने ढूंढती थी कि सुबोध जल्दी घर आये तो उसके साथ थोड़ा वक्त बिता पाये । सुबोध सोचने लगा कि शादी के पहले यह अहम कभी उनके बीच क्यों नही आया? क्या इसलिए क्योंकि नया नया प्यार था । या इसलिए क्योंकि कोई सामाजिक तमगा नही था । या इसलिए क्योंकि वक्त बहुत कम होता था और उस थोड़े से वक्त मे रूठे हुए को मनाना भी होता था और प्यार भी जताना होता था ।लेकिन अब शादी के बाद कभी भी बात कर सकते है, कभी भी गुस्सा दिखा सकते है और मना सकते है ।लेकिन यह कभी भी, कभी आता ही नही और दोनो मे से कोई एक समझौता कर लेता है अपने आप ।न रूठना, न मनाना । न हँसी, न ठिठोली । अब तो पास भी सिर्फ शरीर की जरूरत के लिए ही आते है और बात भी घर की जरूरतो तक ही सीमित रह जाती है ।अब याद नही कब उसका हाथ अपने हाथ मे लेकर उससे बाते की हो, उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरा हो और वह मेरे कंधे पर सिर रख कर सोई हो । प्यार से गले लगाना तो भूल ही गया हूँ ।आज भी याद है मुझे शादी से पहले जब अर्चना किसी बात पर नाराज हो गई थी और मेरा फोन रिसीव नहीं कर रही थी तब उसे मनाने के लिए और उसकी एक झलक पाने के लिए शहर के इस कोने से दूसरे कोने मे बसे उसके घर तक गया था और घर के बाहर खड़े होकर मैसेज किया था, "बात मत कीजिए पर जरा खिड़की से बाहर तो झांकिये " और मुझे वहां देख कर उसका सारा गुस्सा काफूर हो गया था , बच्चों जैसे खुश हो गई थी और वह पूरी रात हमने फोन पर बात करके काटी थी । पर अब,अब मैं करू भी तो क्या? जब भी समय निकालकर उसके साथ बैठने की, उसके साथ समय बिताने की कोशिश करता हूँ उसे कभी कपड़े प्रेस करने होते है, कभी वह थकी हुई होती है,कभी बच्चो का होमवर्क बीच में आ जाता है और तो और कभी मैडम का फेवरिट सीरियल का टाईम होता है जिसे किसी भी वजह से मिस नही किया जा सकता । गोया सीरियल न हुआ बोर्ड एक्जाम हुआ जिसे मिस नहीं किया जा सकता ।तब तो बड़ा गुस्सा आता है मुझसे ज्यादा महत्वपूर्ण उसके लिए टीवी सीरियल हो गये है ।पर अगले ही पल लगता है मै भी तो यही करता आया हूँ उसके साथ ।जब वह वक्त चाहती है मुझे काम होता है । वह काम से छुट्टी लेने को कहती है और मैं अपनी कीमती छुट्टी बिना वजह बर्बाद नहीं करना चाहता । बिना वजह छुट्टी ले ली और कोई एमरजेंसी हो गई फिर छुट्टी न मिली तो? एक मिडिल क्लास आदमी को कितना डर डर के जीना पड़ता है । हर चीज बचा बचा कर रखनी होती है । चाहे वह पैसा हो या छुट्टी । और समय न दे पाने के कारण वह नाराज हो जाती है । कहती है "तुम्हे हर काम के लिए छुट्टी मिल जाती है, मम्मी जी या पापाजी की तबीयत खराब हो तब भी, या बच्चो का कोई भी काम हो तब भी लेकिन जब मैं चाहती हूँ तब नही और मेरी बिमारी पर भी नही मिलती " सही कहती है अर्चना, वह बिमार होती है और मैं उसे दवाई दे कर काम पर आ जाता हू सिर्फ यह कह के कि शाम तक ठीक नही हुआ तो डाक्टर को दिखा आएंगे । और शाम तक वह ठीक भी हो जाती है क्योंकि शायद बिमार उसका शरीर नही दिल होता है जिसे प्यार और अपनेपन की डोज चाहिए होती है, जिसे मिलने की उम्मीद को मैं हर बार रौंद देता हूँ ।और वह बिना कहे सब समझ जाती है ।यह उम्मीद तो पूरी होने से रही ।कितने अकेले हो गये है हम दोनो । साथ होकर भी साथ नही है । पास हो कर भी दिल से दूर हो गये है । सिर्फ चार साल में ही हमारा प्यार दम तोडने लगा है । पता नही उसके मन मे क्या चल रहा होगा अभी? क्या वह मुझसे नाराज है? क्या इतना परेशान हो गई है कि मुझसे दूर रहना चाहती है? क्या उसे अहसास नही कि मै इन्तजार कर रहा हूँ उसका ।अभी तो सिर्फ दो घंटे ही हुए है उसका इंतजार करते हुए, उससे बात किये हुए और मन बेचैन सा होने लगा है , पर उसने तो कितनी राते काटी है मेरे इंतजार में, कितनी बार भूखी सोई है मेरे साथ खाना खाने के इंतजार में । बेइंतहा प्यार करता हूँ अर्चना से ।कही अपने अहम में मैं उसे खो न दूं । मुझे मेरे अहम को एक तरफ रख कर पहल करनी होगी । आज जब वह आएगी मै उसकी नाराज़गी दूर करने की कोशिश करूंगा । और कुछ समय हमारे प्यार के लिए जरूर दूंगा । पर ऐसा क्या करू जिससे वह खुश हो जाए और सारी नाराज़गी भूल जाए ।सुबोध ने अपना लेपटॉप उठाया और ऑनलाइन एक अच्छा सा बुके ऑर्डर कर दिया ।तभी उसे एक आईडिया आया ।वह अपनी टेबल पर रखा रजिस्टर लेने गया तो उसकी नजर पेपर वेट के नीचे रखे पन्ने पर पड़ी जो हवा के झोंके से हिलते हुए अपनी उपस्थिति का अहसास करवा रहा था ।सुबोध ने उसे देखा उसके उपर लिखा था "ख़त हमारे प्यार का " सुबोध हँस पड़ा क्योंकि वह भी अर्चना को ख़त लिखने की सोच रहा था ।सुबोध ने बड़ी उत्सुकता से उस ख़त को खोला और पढ़ने लगा ।प्यारे सुबु चौक गये न यह नाम देखकर । पर यह नाम देखकर अगर तुम्हारे होठों पर मुस्कान आ गई है तो हमारी आधी परेशानी तो खत्म हुई समझो । (सुबोध मुस्कुराने लगा)याद है ना कि यही कह के बुलाया करती थी मैं तुम्हे शादी से पहले । पर शादी के बाद बड़ो के सामने इस नाम से बुला ही नही पाई । और तुम कब सुबु से कृति के पापा बन गये पता ही नही चला।वैसे भी शादी के बाद प्यार के कितने पल बिता पाये है हम साथ? पर अभी शिकायत नही करनी है कुछ कहना है ।पिछले दो महीने से देख रही हू तुम बहुत परेशान से रहते हो । हो सकता है काम का प्रेशर हो या कोई परेशानी? मै बहुत समय से बात करना चाह रही थी पर कभी मेरा तो कभी तुम्हारा ईगो बीच मे आ जाता है ।कभी तुम अजीब बर्ताव करते हो, मुझ पर गुस्सा होते । यहा तक तो ठीक था लेकिन जो आज सुबह हुआ ।तुम कितना भी परेशान हो पर कभी इस तरह से बात नही करते ।इस तरह के शब्दो का इस्तेमाल तो बिल्कुल भी नही करते ।क्या हम ऐसे थे सुबोध? शादी से पहले सभी हमारे प्यार की मिसाल देते थे ।मुझे आज भी याद है जब तुम MBA करने के लिए दूसरे शहर गये थे तब भी कभी दूरी का अहसास नही होने दिया था तुमने ।कभी-कभी गलतफहमिया हो जाती थी लेकिन हम उसे सुलझा कर फिर से एक दूजे के प्यार मे डूब जाते थे ।साथ ही तुम्हे कोई भी कैसी भी परेशानी होती थी तुम मुझे जरूर बताते थे ।पर अब ऐसा क्या हो गया कि हम पास हो कर दूर हो गये । आज बात करने के लिए ख़त का सहारा लेना पड़ रहा है ।तुम्हे कोई परेशानी है, कोई शिकायत है तो कहो मुझसे । चुप रहने से समस्या बढती ही है ।और एक बात और यह जो वक्त है न सुबु लौट कर नही आएगा ।मै नही चाहती की उम्र की सांझ मे हम यह सोचकर पछतावा करे कि एक-दूसरे को वक्त नही दिया । पता है मुझे तुम बहुत बिजी रहते हो । वक्त तो चुराना पड़ता है जैसे शादी से पहले छुप छुपकर मिलने के लिए चुराते थे ।तो तैयार हो जाओ शादी के बाद की इस पहली डेट के लिए ।आज का डिनर हम बाहर ही करेंगे ।बाकी सब मैनेज हो जायेगा तुम्हे एड्रेस मैसेज कर दिया है ।आ जाना टाईम से ।अब वही मुलाकात होगी हमारी । सुबोध ने भीगी आँखो से लेटर को एक तरफ रखा और सोचने लगा एक अहम हम दोनो के बीच कितनी दूरी ले आया ।अगर आज अर्चना पहल नही करती तो कितनी बाते अनकही रह जाती ।सुबोध ने अपने आँसू पोंछे और तैयार होने लगा ।आज उसे बिल्कुल ऐसा महसूस हो रहा था जैसे शादी से पहले डेट पर जाने पर होता था

रविवार, 22 अप्रैल 2018

एडजेस्टमेंट या दबाव- दर्शना बांठिया

समीरा और नैंना दोनों खास दोस्त है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि दोस्त नहीं सगी बहनें है।नैंना की माँ दोनों में कोई फर्क नहीं करती..समीरा का भी उतना ही ख्याल रखती है ,जितना नैंना का ,क्योंकि समीरा की माँ के पास अपनी बेटी के साथ बैठने ,खेलने व उसकी बातों को सुनने का समय ही नहीं होता।समीरा की माँ मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर है। अपना करियर बनाने की इतनी धुन सवार थी ,कि किसी के साथ कोई संयोजन नहीं करना ,अपने काम से ही मतलब रखना ...., परिणामतः संयुक्त परिवार से ही अलग होना पडा़।संयुक्त परिवार को छोड़ अपने पति व बेटी समीरा के साथ मुंबई चली आई।वहीं पडो़स में नैंना से मुलाकात हुई,और धीरे -धीरे दोनों पक्की सहेलियाँ बन गई।

"समीरा ,तुम और नैंना शादी के लंहगे की मैचिंग चुडियाँ आज ही ले आओ,कल से नैंना बाहर नहीं जा सकेगी"...नैंना की माँ ने कहा।

क्यों आँटी ...समीरा बोली।

'अरे परसों मेंहदी और अगले दिन शादी,अभी भी बाजारों में घूमेगी तो लोग क्या कहेगें? अरे आँटी आप भी लोगों की बातों को सुनकर कुछ भी कहते हो ...समीरा बोली।

समीरा ,माँ सही कह रही है.अभी मेरी सासू माँ भी यही बोल रहे थे कि ,'बेटा अब ज्यादा बाहर न निकलना ,हमारे यहाँ तो शादी के एक हफ्ते पहले से ही लड़कियों का बाहर निकलना बंद हो जाता था'।"क्या तू भी अपनी सास की बातों को सीरियसली लेती है."..चल अब समीरा, नैंना का हाथ पकडकर बोली।

नैंना की शादी खूब धूम-धाम से हुई ,विदाई के समय नैंना की माँ खूब रोई,समीरा ने आँटी को सँभाला और बोली ;'अरे आँटी 2 सोसायटी छोडकर ही तो नैंना का ससुराल है ,जब जी चाहे चले जाना'।समीरा नैंना के ससुराल हर दूसरे -तीसरे दिन पहुँच जाती,और घंटो बतियाती।

नैंना की सास बहुत सरल थी,वो समय के साथ परिवर्तन करना जानती थी।

नैंना -'आज शोपिंग करने चलेंगे .. रोहित के साथ कोई प्लान मत बनाना '..समीरा ने रविवार सुबह ही फोन पर कहा।

ठीक है..वैसे भी आज मम्मी ने रोहित को खाने पर बुलाया है ,सिमू तू भी आ जाना,वही से शोपिंग करने चलेंगे'-नैंना ने कहा। ठीक है... पर जल्दी आना, समीरा बोली।

नैंना तैयार होकर रोहित को आवाज लगाती है,रोहित कितनी देर फोन पर बात करोगें,चलो ना....। आ रहा हूँ.1 मिनट.'सॉरी यार..आज मेरा खास दोस्त कुनाल आया है ,अमेरिका से ..और कल सुबह की फ्लाइट से वापस जा रहा है,तो वो अभी आ रहा है लंच पर ,प्लीज आज मम्मी के यहाँ नहीं चल पाएगें'।नैंना को बहुत बुरा लगा.. ।मम्मी व सिमू मेरा इंतजार कर रही होगी,उन्हें मना तो कर दूँ।। 'सिमू, आज नहीं हो पाएगा...सॉरी यार ' -नैंना ने उदासी से कहा। ''क्या है यार, इतनी मुश्किल से तो प्लान बनाया था ,सारा चौपट कर दिया.....'यार रोहित का दोस्त आ रहा है ,क्या करुँ'?नैंना बुझे मन से बोली। 'तो तू क्यों समझौता कर रही है ,बोल दे तुझे भी जाना है,समीरा ने गुस्से में कहा ।'छोड़ न यार कल मिलते है.'... अभी लंच भी बनाना है,चल बॉय ,नैंना ने फोन रखा और खाने की तैयारी में लग गई।

अगले दिन नैंना एक फूलों का गुलदस्ता और गिफ्ट लेकर समीरा से मिलने गई।

"हैप्पी बर्थ डे,सिमू".....नैंना ने उसे प्यार से गले लगा लिया।

'आ गई ,मैडम....मिल गई फुर्सत...थैंक्यू 'समीरा बोली।

"अरे यार आज तो पूरा दिन तेरे ही साथ हूँ..बता कहाँ चले ..मूवी, मॉल या केफे..सुन एक अच्छी हॉलीवुड मूवी लगी है ,चल वहीं चलते है....तेरी फेवरेट"..... नैंना उत्साह से बोली । ठीक है...मैडम अब आप कह रही है तो चलते है,समीरा की क्या मजाल जो मना करें,और दोनों खिलखिलाकर हँस पडी।

समीरा टिकट बुक हो गई ,तू तैयार हो जा 11 बजे का शो है ,नैंना ने कहा। आ रही हूँ दस मिनट... ...तभी नैंना का फोन बजा, 'बहू तुम अभी आ सकती हो ,मेरे क्लब की कुछ सहेलियाँ आई है ,तुम से मिलने..थोड़ी देर उनसे मिलकर दुबारा पीहर चली जाना..,अगर नहीं आ सकती तो कोई बात नहीं,फिर कभी मिल लेना 'नैंना की सास ने कहा।

नहीं-नहीं ऐसा कुछ नहीं है ,मैं आती हूँ कुछ देर में,नैंना ने कहा।

चल यार...मैं तैयार हूँ...समीरा बोली। "सॉरी सिमू....अभी मम्मी जी का फोन आया ,और बताया कि उनकी कुछ सहेलियाँ आ रही है ,मुझसे मिलने ..मैं मना नहीं कर पाई ",नैंना ने उदासी से कहा।

" नैंना तू हर समय किसी के दबाव में.क्यों आ जाती है,तेरी खुद की भी तो लाइफ है....हर जगह मत झुका कर..पागल..."।समीरा ने आवेश में कहा।

"इसमें झुकना क्या ? दबाव क्या ?मुझ पर उन्होंने कोई दबाव नहीं बनाया ,मैंने अपनी इच्छा से हाँ कहा है ,और थोड़ा बहुत एडजेस्टमेंट करना ही पड़ता है,उसमें क्या" ?नैंना ने कहा।

'अरे...,वो ही तो दबाव है,जब अपने मन का ही कुछ न कर पाएँ और उनके अनुसार चलें..वो जबरदस्ती अपनी बात मनवाएँ,ये सब दबाव नहीं है, तो क्या है..? तू बोल देती,मुवी की टिकट बुक हो गई है .अभी कैसे आऊँ.,समीरा झल्लाकर बोली।

सिमू ."एडजेस्टमेंट और दबाव में बहुत फर्क है,एडजेस्टमेंट सभी की खुशियों का ध्यान रखते हुए ,आपसी सहमति से काम करने को कहते है,जिस में सभी की खुशी शामिल हो,और दबाव जबरन काम करवाने को।"मुझ पर किसी ने कोई दबाव नहीं बनाया ,अभी नई-नई शादी हुई है मेरी, उनकी सहेलियाँ मिलना चाह रही है मुझसे और क्या....तू फालतू ही परेशान हो रही है...तेरी शादी होगी न तब पता चलेगा...चल अब मूड ठीक कर ,और मूवी का क्या ..3बजे का शो है ना वो चलते है ..फिर डिनर साथ में ही करेंगे..ठीक है..,नैंना ने उसके गाल सहलाते हुए कहा।

वास्तव में आजकल लोगों की सोच यहीं है कि हम क्यों समझौता करे,उन लोगों ने एडजेस्टमेंट और समझौता दोनों को समानार्थी शब्द बना दिया।

मेरा मानना है कि हम हवाओं को तो नहीं बदल सकतें,मगर कश्ती की दिशा को तो एडजेस्ट कर ही सकतें है।

आप अपनी राय जरुर दीजिए।

गुरुवार, 19 अप्रैल 2018

शीर्षक - मनाऊं कैसे (कहानी ) -अनामिका शर्मा



सुनो उठो, अरे अब उठ भी जाओ, दो बार तो चाय गर्म कर दी। कहते हुए निशी जाने लगी तो अंकित ने निशी का हाथ पकड़कर उसे अपनी तरफ खींच लिया। ओह अंकित छोड़ो भी देर हो रही है और अपना हाथ छुड़ा कर निशी बाहर आ गई। रसोई मे पहुंच कर जल्दी से उसने सब्जी का छौंक लगाया और आटा लगाने लगी।तभी अंकित ने आकर उसे फिर से बाँहों मे भरने की कोशिश की कि तभी निशी की सासु जी खांसते हुए रसोई में आ गई और अंकित एक कप चाय और बनाने का कह कर तैयार होने चला गया ।


अंकित एक मल्टी नेशनल बैंक में मैनेजर था और निशी से उसकी अरेंज मैरिज हुई थी। लेकिन दोनो ही एक दूसरे को बहुत प्यार करते थे। शादी के बाद दोनो हनीमून मनाने शिमला गये थे। वहां के सर्द मौसम में अंकित ने अपने प्यार की गर्माहट से निशी के दिल में जगह बना ली और अंकित निशी की मासूमियत का कायल हो गया। दोनो एक दूसरे को इस कदर चाहने लगे जैसे दो जिस्म एक जान हो। शादी के दो साल तो आँखो आँखो में ही कट गये। फिर उनकी दुनिया में आई नन्ही परी मीना। अब निशी की जिम्मेदारी बढ गई। घर के काम, सास-ससुर की सेवा और मीना की देखभाल।


"अरे निशी! गाजर धोकर ले आओ तो छील कर हलवे की तैयारी कर लेते है।" सासु जी की आवाज सुनकर निशी को याद आया कि आज तो उसकी ननंद अपने परिवार के साथ आने वाली है। वह जल्दी से गाजर धोने लगी, लेकिन आज उसका मन काम में नहीं लग रहा था। वह बार-बार अंकित के ख्यालों में गुम हो रही थी, उसका हाथ पकड़ कर अपनी तरफ खींचना, और अपनी बाहो में भरने का प्रयास करना यही सब बाते निशी को मन ही मन गुदगुदा रही थी। वह सोचने लगी कितना वक्त हो गया है अंकित के साथ चैन से दो पल बिताये हुए। दिन भर का काम, मीना की पढ़ाई और मेहमानों की आवभगत में ही उसका पूरा दिन निकल जाता है।सासु जी आए दिन किसी न किसी को न्यौता दे आती है खाने का। और कुछ नही तो कभी बड़ी, पापड़ आदि बनवाने लगती है तो पूरा दिन काम और मेहमाननवाजी से वह इतना थक जाती है कि रात को बिस्तर पर लेटते ही उसे ऐसी बेसुध नींद आती है कि फिर वह सीधा सुबह घड़ी के अलार्म से ही खुलती है।


"लो अब तक गाजर पूरी छील भी नही पाई कब हलवा बनेगा और कब बाकी खाने की तैयारी करोगी ?" चलो सब्जी मुझे दो मै काट कर तैयारी कर देती हूँ और आटा गूंथ लेती हूँ ।"कहते हुए सासु जी आटा छानने लगी। निशी ने आँखो ही आँखो में सासु जी को धन्यवाद कहा तो सासु जी भी मुस्कुरा उठी।


हलवा बनाते बनाते निशी फिर ख्यालो में गुम हो गई। उसे याद आया आज अंकित निशी से बिना कुछ कहे ही ऑफिस चला गया था और जब निशी टिफिन तैयार करने के बाद कमरे में गई थी और अंकित को गले लगाना चाहा तो अंकित ने" देर हो रही है "कहते हुए उसे दूर कर दिया और बाहर निकलते हुए धड़ाम से दरवाजा बन्द कर दिया था। वह सब समझ रही थी। अंकित नाराज हो रहा था उससे। उसे तो याद ही नही कितने समय पहले वे एक-दूसरे के करीब आए थे? पर वह करे भी क्या? सुबह जब तक अंकित उठ कर तैयार होता है उस पूरा समय निशी किचन में फंसी रहती है और जब रात को अंकित घर आता है तब भी निशी खाने की तैयारी में लगी रहती है। वह कोशिश करती है की रात को जल्दी खाना बनाकर फ्री हो जाए और वह करती भी है, तो भी वह और अंकित सोने के वक्त से पहले कमरे में नही जा सकते। ऐसा कोई नियम नही है पर हाँ एक झिझक है जो शादी के सात साल बाद भी उसी तरह बरकरार है जो शादी के शुरूआती दिनों में थी कि जब तक सासु जी नही कहती वह सोने नही जाती। कुछ न कुछ काम निपटाने में लगी रहती। यह झिझक शायद हर जॉइंट फैमिली में होती है पर पता नही क्यो पति देव इसे समझते ही नही और रूठ कर बैठ जाते है ।"रूठे रूठे पिया .....",


"मनाउ कैसे? .. " निशी ने पलट कर देखा उसकी ननंद थी जिसने उसकी गाने की अधूरी लाईन को पूरा किया था। वह शर्म से लाल हो गई और ननंद के पैर छूने को झुकी तो उसकी ननंद ने उसे अपने गले लगा लिया जैसा कि वह हमेशा करती थी। " निशी क्या बात है, क्यो नाराज कर लिया अपने पिया को? " "अरे गरिमा दीदी, वह तो मै बस ऐसे ही गुनगुना रही थी "निशी शर्माते हुए बोली ।


"अगर ऐसे ही गुनगुना रही थी तब तो ठीक है लेकिन सच मे नाराज कर दिया है अपने पिया को तो मै बहुत ही रोमांटिक तरीके बता सकती हूँ रूठे हुए पिया को मनाने का "दीदी ने हंसते हुए कहा तो निशी की आँखे नम हो गई। निशी का अपनी ननंद से सहेली जैसा रिश्ता था वह उम्र में उससे बड़ी जरूर थी पर वह अपने मन की हर बात अपनी ननंद से शेयर कर लेती थी और उसकी गरिमा दीदी बिल्कुल सहेली की भांति ही उसकी हर समस्या का फटाफट निपटारा कर देती थी और उस पर बड़ा स्नेह भी लुटाती थी। गरिमा दीदी की स्नेह भरी बातों से उसका दर्द आँखो में छलक आया। और उसने गरिमा दीदी को अंकित की नाराजगी की बात बताई।


"अच्छा तो यह बात है। इसमे घबराने की कोई बात नही है निशी सभी के साथ ऐसा होता है। शादी के शुरूआती दिनों में इतनी जिम्मेदारी नही होती है और सब कुछ नया नया होता है तो उसकी अनुभूति भी अलग ही होती है लेकिन कुछ वक्त गुजर जाने के बाद और बच्चे हो जाने से जिम्मेदारी बढ जाती है और फिर शुरू होती है प्यार की असली परीक्षा। इतनी जिम्मेदारी के बीच और कम समय दे पाने से समस्या तो आती ही है अब यह हमारे हाथ में है की इसे उदास होकर झेला जाये या फिर जरा सी कोशिश से इस रिश्ते मे नयापन बरकरार रखा जाये ।"


"आप सही कह रही है दीदी, यह तो कई बार मुझे सरप्राइज देते है और मेरी मदद करने की कोशिश भी करते है ताकि मै थोड़ा सुकून पा जाऊ लेकिन मैने तो कभी इन्हे ऐसा कुछ फील नही करवाया। कभी-कभी हम सिर्फ सामने वाले में ही कमी ढूंढते रहते है खुद की गलती हमे नजर नही आती। आपका बहुत शुक्रिया दीदी। बस अब अच्छे अच्छे टिप्स बता दो ना दीदी प्लीज! " निशी ने गरिमा का हाथ पकड़ते हुए कहा। तो गरिमा दीदी निशी के बचपने पर मुस्करा उठी और कहने लगी, "मुझसे ज्यादा तुम समझती हो अपने पति को जरा मन को टटोलने की कोशिश करो, सारे टिप्स वही मिल जाएंगे अब उठो और अच्छे से तैयार होकर आओ जैसे नई नई शादी के बाद अंकित को रिझाने के लिए तैयार होती थी। माँ बाउजी कुछ नही सोचेंगे वह भी समझते है क्योंकि वह भी इस दौर से गुज़र चुके है।"


निशी तैयार होने कमरे मे चली गई और बड़ी बेसब्री से अंकित का इंतजार करने लगी उसे अपने रूठे पिया को मनाना जो था ।

बुधवार, 18 अप्रैल 2018

सोशल लव -दर्शना बांठिया

"ज्योति मेरा रूमाल नहीं मिल रहा ,कहाँ रखा कल तुमने"...संजय ने अपनी पत्नी से कहा।"अरे!संजू ,वहीं होगा."..ज्योति ने मोबाइल चलाते हुए कहा..।
"ज्योति ये सब क्या है,तुम्हें दो दिन से कह रहा हूँ,कि मेरी अलमारी साफ कर दो...सारे कपड़े यहाँ -वहाँ फैले पड़े है,शर्ट की जगह पैंट है,एक मोजा कहीं है,तो दूसरा कहीं ओर ..ऐसे कैसे चलेगा"-संजय झल्लाते हुए बोला।
ज्योति फोन चलाते हुए बोली :-"संजू ,मैं कर दूँगी.....,ये देखों ना.....खुशी और मोहित ने कितने अच्छे फोटोज लगाए है...और केप्शन में लिखा है.."I love you my forever".सो,स्वीट, ...कितना प्यार है दोनों में"......और तुम हो कि इन सब चीजों से दूर भागते हो।
"संजू तुम थोड़ा तो सोशल बनो.....अपने पड़ोस की रीटा को देखों कल ही फेसबुक पर स्टेटस डाला है ,"Happily going to goa with my hubby".कितना अच्छा लगता है यार......और तुम बस 10 से 6 की बैंक नौकरी में ही खुश रहते हो। 
ज्योति मेरे पास इन चीजों का समय नहीं है,कल से प्लीज सामान व्यवस्थित रखना"इतना कहकर संजू ऑफिस के लिए निकल गया।
दोपहर में ज्योति ने संजय को फोन किया और कहा," संजू तुमने मेरी प्रोफाइल पिक अभी तक लाइक नहीं कि...दिशा के पति उसकी हर फोटो पर लाइक, कमेंट करते है,वो भी उसके बिना कहे."।
ज्योति अभी काम बहुत है,मैं बाद में कर दूंगा:-संजय ने इतना कहकर फोन रख दिया।
शाम को संजय घर गया तो उसने देखा ज्योति मुंह फूलाए गुस्सें से बैठी।
"ज्योति एक बढ़िया सी चाय तो बनाओ,साथ मैं बैठकर पीते है"..संजय बोला।
"मैं कोई चाय ..वाय नहीं बनाने वाली....खुद बना के पिलो."..ज्योति ने गुस्से से कहा।
क्या हुआ....ज्योति.... इतनी नाराज क्यों हो?संजय ने पूछा।
ज्योति झल्लाते हुए बोली,"नाराज ना हूँ ..तो क्या करूँ....सुबह से शाम होने को है,और आप को इतनी भी फुरसत नहीं कि एक बार मेरी फोटो पर कमेंट ही कर दूँ"..पता है,'सुषमा के पति तो उसके फोटों डालते ही तारीफ के पुल बांधने लगते है ...कितना प्यार करते है उसके पति'।
"भई,प्यार में तो हम भी कम नहीं है ...आओ पास में बैठो...दुनिया को क्या बताना कि मिंया बीवी में कितना प्यार है"....संजय ने ज्योति का हाथ पकड़कर कहा।
"छोडों.... तुम्हें तो प्यार जताना भी नहीं आता .....रहो तुम बुद्द्धू .....,कुछ नहीं आता तुम्हें..... प्यार करना भी नहीं... मेरी किस्मत में ही नहीं है प्यार".. ज्योति ने हाथ झटकातें हुए कहा।
"ज्योति तुम जिसे प्यार कह रही हो वो दिखावा है...मेरे लिये प्यार का मतलब दिखा प्रदर्शन करना नहीं है...,इसे कृत्रिम प्यार कहते है...,मुझसे दिखावा और ये "सोशल लव" नहीं होता.....संजय ने गुस्से मे कहा और घर के बाहर चला गया।
ज्योति ने गुस्से में पूरा घर का सामान बिखेर दिया।
संजय वापस घर आया तो देखा ज्योती सोफे पर ही सो गई,उसे बहुत दुःख हुआ कि "क्यों ज्योति को ऐसा लगता है कि सिर्फ फेसबुक या सोशल साइट्स पर प्यार का प्रदर्शन ही सच्चा प्यार है''...।
अगले दिन संजय ज्योति को बिना उठाऐं ,जल्दी ही ऑफिस चला गया।
शाम को ऑफिस से लौटा तो देखा पूरा घर साफ-सुथरा ,व अनेक खुशबू से युक्त था।कमरे में देखा तो अलमारी के सारे कपड़े व्यवस्थित थे।
"आ गए संजू...... ये लो तुम्हारी पंसदीदा अदरक वाली चाय"-ज्योति ने मुस्कुराकर कहा।
संजय को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ज्योति के सुर अचानक बदल कैसे गए।
"संजू....,सॉरी ....प्लीज मुझे माफ कर दो"।
'क्या हुआ.... ज्योति तबीयत तो ठीक है', सच,सच बताओ हुआ क्या है.?संजय ने हतप्रभ होकर कहा।
"संजू आज मुझे अपनी गलती का एहसास हो गया है ....कि प्यार में दिखावा नहीं होना चाहिए,.... सच्चा प्यार तो वो है,जहाँ कुछ कहने की आवश्यकता नहीं होती....एक -दूसरे को देखकर ही भावनाओं को समझ लेना चाहिए।"
संजय ने मुस्करा के व्यंग्यात्मक ढंग से कहा....,"शुक्र है,मैडम को समझ तो आया,पर ये चमत्कार हुआ कैसे..?सहीं -सहीं बताओ ज्योति"।
"संजू ,दरअसल वो खुशी और मोहित के बारे में बताया था ना ....तो वो मोहित का अफेयर चल रहा है....,आज सुबह कामवाली ने बताया , दोनों में तलाक तक बात पहुंच गई है।सिर्फ दुनिया को दिखाने के लिए... ही .. मोहित मीठी-मीठी तारीफे करता था,...पर हकीकत में तो....उसकी ऑफिस की किसी लड़की के साथ 2साल से अफेयर कर रहा है"
और रीटा गोवा गई ही नहीं ....छूट्टियों मे गांव गई है",
और संजू एक बात बताऊं, पर वादा करो....तुम हँसोगे नहीं...."ज्योति ने नजरे नीची करते हुए कहा।
बोलो तो '......संजय बोला।
"वो दिशा है ना....वो खुद ही अपने पति की फेसबुक आई -डी चलाती है,और खुद की तारीफ खुद ही लिखती है"।
क्या!.....हा हा हा."..संजय जोर से हँसा।
"धन्य है....सोशल मीडिया.... जहाँ सिर्फ दिखावें व कृत्रिमता को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है,...अब समझ आया देवी जी! कि सोशल लव प्रदर्शन कहा तक टिकता है"।
'चलो .....अब छोड़ो ये सब......बाहर चलते है डिनर पर ,तैयार हो जाओ'....और हाँ फेसबुक पर लिखना मत भूलना ,"Happily going to dinner".
क्या ...संजू ....तुम भी️....और दोनों साथ मे हंसने लगे।

वास्तव में दोस्तों आजकल लोगों ने हद से ज्यादा प्रदर्शन को ही प्यार की परिभाषा मान लिया है.ऐसा नहीं कि मैं फेसबुक या सोशल मीडिया के खिलाफ हूँ...पर प्यार केवल सबके सामने, जाहिर करने से ही होता है,
ऐसा मानना गलत है।
आपके क्या विचार है,मुझे जरूर बताइयेगा। आप के विचारों का मुझे इंतजार रहेगा।

शनिवार, 7 अप्रैल 2018

रोक-टोक- रिश्ताें की प्यारी कहानी-दर्शना बांठिया


सुमित और समीरा में बहुत अच्छी दोस्ती थी....और ये दोस्ती कब प्यार में बदल गई, पता ही नहीं चला।
शादी करने में काफी अड़चने आई , क्योंकि अन्तरजातीय विवाह था......पर दोनों ने आपसी समझ से सब सँभाल लिया।
दोनों खुशी से हनीमून मनाने गए। वापसी के समय प्लेन में सुमित ने समीरा को कई हिदायतें दी.....
"सुमी अब तुम्हें बहुत सँभल कर रहना है...मम्मी को शिकायत का एक मौका भी मत देना"....'कैसे रहना.....कब कैसे  कपड़े पहनना.....कब बोलना....वगैरह....-वगैरह  ढेरों अटकलें  सुमित ने बताई।
समीरा हैरानी से सुमित को देखने लगी.....,और बोली..."पता है सुमित..... मैं भी एक जॉन्ट फैमिली से आई हूँ,ये सारी बातें मैं भी जानती हूँ...,तुम ज्यादा ही सोच रहें हो."...।
तभी अनाउंसमेंट हुई और दोनों अपने सीट बेल्ट उतारकर ,बैग लेकर जाने लगे।
"सुमी घर में घुसने से पहले चुन्नी से सर ढ़क लेना....,और जो भी गिफ्टस लाएं है ,वो पहले सबको दे देना".... सुमित बोला।
समीरा समझदार थी,वो चुप-चाप सुन रहीं थी, उसे लगा शायद हमारी लव मैरिज हुई है,इसलिए ज्यादा नर्वस हो रहा है।
"आ गए बच्चों"....सुमित की मम्मी उनको वेलकम करनें के लिए बाहर  लॉन में खड़ी थी,
सुमी ने प्रणाम किया...और सामान अंदर ले जाने लगी..।
अरे!बेटा ये सब छोड़ो ......सुमित ले आएगा.,. सुमित की माँ ,समीरा का हाथ पकड़ कर  अंदर ले गई।
धीरे धीरे समीरा ने सबके दिल में जगह बना ली.....सुमित की मम्मी अपनी बहु से खुश थी।
"सुमी.....तुम मम्मी से हंसी -मजाक मत किया करो.....और कल पापा बैठे थे,फिर भी सर नहीं ढका ,उन्हें बुरा लगा तो."...सुमित बोला।
समीरा हैरानी से देखती है,और बोलती है,"मम्मी ने आपसे कुछ कहा क्या ...वो भी मेरे से हंसते -बोलते है....तो मुझे लगा उन्हें ये सब पसंद है....
'नहीं उन्होंने मुझसे कुछ नहीं कहा'.,पर फिर भी....सुमित बोला।
''तो आप को क्या परेशानी है...घर में चार ही लोग है...आप और पापा ऑफिस चले जाते हो .....तो किससे बातचीत करें",
"सुमित आप बेवजह ही परेशान हो रहे हो.....सब  कुछ ..सही चल रहा है"-समीरा ने नाराजगी से बोला।
【समीरा को बहुत बुरा लगता कि, वो सब का ध्यान रखती है,सब उससे खुश है,फिर भी सुमित क्यों रोक-टोक करता है....शादी से पहलें तो ऐसा  नहीं था....पर अब क्यों?】
अगले दिन समीरा उदास मन से किचन में सब्जी बना रही थी तभी समीरा की सास बोली:-
"क्या हुआ बेटा,आज तबीयत ठीक नहीं है क्या.,या सुमित ने कुछ कहा.....उसकी तो खैर नहीं आज.....सुमित......इधर आ तो."
हाँ ...बोलो माँ.......,सुमित बोला।
"तूने बहु से कुछ कहा.....,झगड़ा किया.....देख ना सुबह से चुप सी है....
जब तक हम दोनों हंसी मजाक न करें,मेरा तो दिन ही शुरू नहीं होता....और ये क्या..... कल तो पापा ने मना किया था ...कि "पल्लू वगैरह कुछ नहीं लेना....शर्म आँखों में होनी चाहिए..., और तू तो हमारी  बेटी जैसी है"....समीरा की सास ने प्यार से उसे गले लगा लिया।
समीरा सुमित को देखने लगी,सुमित नजरें नीची कर किचन से बाहर चला गया।
            सच है दोस्तों,शादी के समय हमें कितनी  हिदायतें दी जाती है , ऐसा करना है....ऐसे बोलना है,कभी-कभी ऐसे लगता है कि हम दूसरे ग्रह से आयीं है ,जो इतनी बातें कर रहें हो,हम भी परिवार के बीच में रहे  है ,सही -गलत सब जानते है,फिर भी  रोक-टोक करना हमेशा चालू रहता है।

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