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मंगलवार, 14 अगस्त 2018

हँसिए और हँसाइए- डा. हरीश भल्ला

क्या आपको मालूम है कि बहुत सी बीमारियों का निदान स्वयं आपके पास है जिनका प्रयोग करने से जहां एक ओर आप गंभीर बीमारी से बच सकते हैं वहीं दूसरी ओर व्यर्थ की दौड़-भाग, मानसिक तनाव से भी मुक्ति पा सकते हैं। हँसना एक प्राकृतिक दवा है।

हँसना एक मनोभाव है, ठीक वैसे ही जैसे रोना। मनुष्य जन्म लेने के बाद इन भावों को अभिव्यक्ति प्रदान करता है। चिकित्सकीय दृष्टिकोण से हँसना क्या है?

मनोभाव के साथ-साथ हँसना एक यौगिक प्रक्रिया है जिसमंे मनुष्य के शरीर ओर मन दोनों का व्यायाम होता है। हँसी के दो चरण होते हैं। उतार ओर चढ़ाव। ठहाका मारकर हंसना चढ़ाव है और फिर धीरे-धीरे हंसना संतुलित हो जाना है इसे ही उतार कहा जाता है। यह प्रकिया रोज की जिंदगीं में आए तनाव को कम करती है। हंसने से केटेकोलेमेनाइज एड्रर्लिन और नान एड्रर्लिन का रिसाव होता है जिससे ठीक होने की प्रक्रिया तेज हो जाती है और आप स्वयं को स्वस्थ अनुभव करते हैं।

हँसने से क्या लाभ हो सकता है?

चिकित्सकीय विज्ञान में हुए अनुसंधानों से यह सिद्ध हो चुका है कि हँसने का प्रभाव हमारे शरीर पर पड़ता है। हँसी एक तरह की दर्द निवारक दवा है। लेकिन यह योग क्रिया के माध्यम से प्रयोग की जाती है। हँसने की इस प्रक्रिया से ब्लडप्रेशर, दिल की बीमारी, डायबिटीज, जोड़ों का दर्द, कमर का दर्द, मासंपेशियों का दर्द ठीक हो जाता है। इसके अतिरिक्त तनाव, उदासी और उतेजना को कम करने में भी यह सहायक सिद्ध हुआ है।

आपने बताया कि हंसने से जोड़ों का दर्द आदि ठीक हो जाता है। लेकिन यह कैसे संभव हैं?हंसी एक दर्द निवारक दवा है। हँसते समय हमारे शरीर से दो न्यूरो पेप्टीडाइज उनडारफिन और उनकेलेफिन नामक पदार्थ निकलते हैं जिससे शरीर में स्वयं ही दर्द कम हो जाता हे। जब हम हँसते हैं तो खून का संचरण तेज हो जाता है जिससे दर्द भी कम महसूस होता है। यदि आप 10 मिनट तक खुल कर हँसे तो उसका असर दो घंटे तक आपके शरीर में रहता है और बीमारियों से लड़ने की प्रतिरोधी शक्ति पैदा हो जाती है। 100 बार ठहाका मार कर हंसी 10 मिनट की तेज दौड़ के बराबर होती है। हंसने से पुरानी बीमारियों जैसे खांसीं, जुकाम, गठिया, एलर्जी आदि भी ठीक होती देखी गई है।

हँसने के लिए कैसा वातावरण होना चाहिए?यह प्रश्न स्वयं में महत्वपूर्ण हैं। हँसना तभी संभव है जब वातावरण भी वैसा ही हो। हँसना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, हर बात में या हर समय हँसी नहीं आ सकती। हँसी भीतर से पैदा होती है पर यहां जिस हँसने की बात हम कर रहे हैं वह एक तरह का योग है। ठीक वैसे ही जैसे दौड़ना, टहलना आदि। अतः यहां हँसना एक यौगिक क्रिया की तरह है जिसमें हम अपने दोनों हाथ ऊपर ले जाते हैं और फिर हँसत हैंै धीरे-धीरे हंसी की आवृति को कम करते हुए हम अपने दोनों हाथ नीचे ले आते हैं। जब हम व्यायाम करें तो हवा शुद्व होनी चाहिए ताकि हमारे फेफड़ों में आक्सीजन की मात्रा बढें़ और शुद्व रक्त संचार हो।

बीमारियों के निदान के अतिरिक्त व्यक्ति को अन्य क्या लाभ हो सकते हैं?यदि हम प्रतिदिन हँसे तो एकाग्रता बढ़ सकती है। साथ ही कार्य करने की शक्ति में भी गुणात्मक परिवर्तन होता है जिससे वह कम समय में अधिक काम कर सकता है साथ ही उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। दम्पति यदि मिलकर हँसें तो परिवार में जहां हँसी-खुशी का वातावरण होगा वहीं उसके संबंध भी मधुर होंगें। लेकिन यदि वे एक दूसरे की कमियों पर हँसेंगे तो माहौल तनावपूर्ण होगा और संबंध कटु बन जाएंगे।

आपकी दृष्टि में क्या ऐसी संस्थाएं हैं जो इस तरह के योगासन कराते हैं?जिस तरह महानगरों में ’हेल्थ क्लब’ या लाफटर क्लब होते हैं। विदेशों में तो इनकी संख्या काफी है पर भारत में यह अपेक्षाकृत कम हैं। लोगों का ध्यान अब इस ओर जा रहा हैं। धीरे-धीरे यहां भी इस तरह के केन्द्र विकसित हो जाएंगे। पश्चिमी देशों में तो प्रत्येक अस्पताल में एक लाफटर क्लब चलाया जाता है जहां चुटकले, कार्टून फिल्मों, पुस्तकों आदि के माध्यम से हँसाया जाता है।

क्या आप मानते हैं कि अब हँसनेे के लिए भी लाफ्टर क्लब जाया जाए।मैंने ऐसा कब कहा कि आप हँसने के लिए लाफ्टर क्लब का इंतजार कीजिए। भारत में इन सब की कोई जरुरत नहीं हैं। ऋषि मुनियों के समय से ही हँसने को एक दवा के रुप में मान्यता मिली है जो व्यक्ति को हँसाने का कार्य करता था उसे विदूषक कहा जाता था। उसके पहनावे, हरकतों से व्यक्ति बिना हँसे नहीं रह पाता था। यह भी एक तरह की कला थी। प्राचीन काल के कोई भी नाटक आप पढें़ उसमें विदूषक का पात्र अवश्य होता था। फिल्मों में यही किरदार जोकर कहलाता है। हँसी हमारे जीवन में शामिल है। कभी हम स्वयं की मूर्खता पर हँसते हैं। अतः हँसने के लिए लाफ्टर क्लब जाना भी एक हँसी का मुहावरा हो सकता है। यह याद रखें कि जब आप हँसे तो दिल खोलकर हँसे, आपकी हँसी गूंजनी चाहिए। सिर्फ मुस्कुरा कर काम नहीं चलेगा। अब वह जमाना गया जब खुल कर हँसना अभद्रता माना जाता था। आज की दुनिया में संस्कार भी वैज्ञानिक होने चाहिए।
दंपति की समस्याएं डा. हरीश भल्ला, संपादन- डा. अनुजा भट्ट
 प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक से

मंगलवार, 7 अगस्त 2018

पति-पत्नी अपने संबंधों में शुष्कता न आने दें-डा. हरीश भल्ला

 यदि दंपति जीवन में प्रेम की उदात्ता को महसूस करना चाहें तो उनके लिए उनको अपनी जरुरतों और बच्चों की जरुरतों के बीच संतुलन पैदा करना होगा।
संतान प्राप्ति के बाद अक्सर पति-पत्नी को यह शिकायत रहती है कि वह अपनी अंतरंग जिंदगी ठीक से नहीं बिता पाते। इसके क्या कारण है?
आप आसानी से अपनी सेक्सुअल लाइफ जी सकते हैं । यह ठीक है कि संतान के आने से जीवन में खुशियां और बदलाव आते हैं लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि आप अपनी आत्मीयता और अंतरंग व्यक्तिगत जीवन को नीरस बना दें। आपको अपने संबधों पर भी ध्यान देना चाहिए।
यह किस तरह संभव है?
ज्ीवन में प्रेम की उदातता और गहन अनुभूति शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से प्राप्त की जा सकती है। अधिक समस्याएं संतुलन न होने के कारण ही होती हैं। यह न भूलें कि वह प्रेमी-प्रेमिका भी हैं और पेरेंट्स भी। पति-पत्नी एक दूसरे के प्रेमी बने रहें, यह बहुत जरुरी है। प्रेम, रोमांस यह सब इंसान की जरुरतों में एक है। यह ठीक है कि यह खाने, रहने जितना महत्वपूर्ण नहीं, लेकिन उससे कम भी नहीं है। यह वह चीज है जिससे हम जिंदा रहते हैं।
पति-पत्नी को इसके लिए क्या करना चाहिए?
अक्सर पेरेंट्स बनने के बाद पति-पत्नी एक गंभीर आवरण ओढ़ लेते हैं। वह चुहुलबाजी, शरारतें या बेवकूफियां करना भूल जाते हैं। इस तरह धीरे-धीरे एक निष्क्रियता पैदा होने लगती है। सरप्राइज का गुण इस निष्क्रियता को समाप्त करने में सहायक होता है। यदि आपके पति/पत्नी काम से बाहर गए हैं और आपको मालूम हैं कि वह वहां किस होटल में ठहरे हैं तो आजकल यह सुविधा उपलब्ध है कि आप उन तक अपनी स्नेह भावना पहुंचा सकें, जैसे फोन के माध्यम सें, अथवा एजेंन्ट के माध्यम से फूल आदि भिजवा कर। इसका बहुत मादक अहसास होता है। शादी की सालगिरह, जन्मदिन आदि ऐसे मौके होते हैं जो आपको एक दूसरे का सामीप्य तो प्रदान करते ही हैं, साथ ही जीवन में आ रही नीरसता को भी दूर करते हैं। अमूनन पेरेंट्स पेरेंट्स मीटिंग में ही साथ जा पाते हैं।
क्या इसके लिए कुछ टिप्स दिए जा सकते हैं?
क्यों नहीं। सर्वप्रथम ऐसा मौहाल पैदा करें जहां बच्चों की देखभाल के साथ-साथ रोमांटिक व्यवहार भी हो। यह एक बहुत बडा सच है कि प्रत्येक दंपति को यह अहसास होता है कि अन्य दम्पतियों की तुलना मे उनका जीवन बड़ा नीरस है। वह आपस में एक दूसरे को दोषी ठहराते है जबकि वास्तव में कोई भी दम्पति ऐसे नही है जो इस तरह की समस्याओं से न गुजरें हां, एक दूसरे की कमियां निकालने से कहीं अच्छा है स्वयं की गलतियों को स्वीकार करने का साहस पैदा करें। एक दूसरे का इंतजार न करके स्वयं पहल करें जिससे नीरसता टूटे। पति-पत्नी दोनों एक दूसरे के पूरक हैं अतः अपनी इच्छा जाहिर करने में संकोच न करें। आंखों में आंखे डालकर अपने मन की बात करें। निश्चित तौर पर पत्नी/पति खुश होंगे। प्रत्येक युगल के मन में प्रेम की एक फंतासी अवश्य होती है। वह अपने कल्पना लोक में कई सपने देखते हैं लेकिन कह पाने में उसे यह डर होता है कि कहीं वह उपहास का पात्र न बन जाए। ऐसी स्थिति में दिल की बात दिल में ही रह जाती है। हो सकता है कि आपकी कल्पना को साकार करने में आपके साथी को विशेष प्रसन्नता हो और आप दोनों आनंद का अनुभव करें। शादी के बाद पति-पत्नी अपनी देह और सौंदर्य आदि पर ध्यान नहीं देते। पत्नी को लगता है कि अब किसके लिए तैयार हों जो मिलना था वह तो मिल गया। पति का भाव भी ऐसा ही होता है। यह एक गलत एप्रोच है। और यहीं से प्रारम्भ होते हैं विवाहेतर संबंध। क्योंकि आकर्षण ही वह पहली श्रेणी है जो पुरुष को बांधती है। संबंधों में आकर्षण का बहुत महत्व होता है। इसी तरह हमेशा स्वयं को चुस्त बनाए रखें। आलसी पुरुष और स्त्री किसी को पसंद नही होते। इसके साथ प्रेम के संकेत भी पति-पत्नी एक दूसरे को देते रहें। चाहे वह शरारत भरे ही क्यों न हों। जो आपके प्रेम को दर्शाएं साथ ही जिसके पीछे आमंत्रण का भाव छुपा हो। याद रहे प्रेम की ऊष्मा से ही आपके संबंध प्रगाढ हो सकते हैं।
एकल परिवारों में इस समस्या से कैसे निपटा जा सकता है?
हम आपकी बात से सहमत है कि एकल परिवारों में दंपति के सामने एक चुनौती होती है। वह पेरेंट्स भी हैं, अतः वह दायित्व भी उन्हें निभाना है। घर में और कोई नहीं होता जिसके सहारे वह बच्चों को छोड़ सकें। बच्चों को अकेला छोड़कर स्वयं रोमानी जिंदगी जीना कोई तर्कपूर्ण बात नहीं है। लेकिन हम जिस बात पर जोर दे रहे हैं, वह यह है कि पति-पत्नी पेरेंट्स का रोल माडल अपनाते हुए एक तरह से स्वयं की इच्छाओं पर अंकुश लगा देते हैं। और यह दमित इच्छाएं बच्चों के लिए खतरनाक होती हैं और स्वयं उनके लिए भी। अतः कोई ऐसा रास्ता निकाला जाना चाहिए जिससे संबंधों में संतुलन रहे। संतुलन ही संबंधों में स्थायित्व लाता है।
दंपति की समस्याएं डा. हरीश भल्ला, संपादन- डा. अनुजा भट्ट
 प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक से

शनिवार, 12 मई 2018

SATURDAY RELATIONSHIP पचास पार जब टूटे जीवनसाथी से तार-अनुजा भट्ट


आप सप्तसदी के साथ फेरे लें, निकाहनामा पढ़ें या फिर कोर्ट में हलफनामा पेश करें लेकिन इस बात की गारंटी नहीं है कि जीवनसाथी के साथ आपके रिश्ते की डोर पूरी उम्र मजबूत ही रहेगी।
  रिश्तों की मजबूती के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता।  आज पचास साल की परिपक्व उम्र में तलाक के मामले सामने आ रहे हैं और बीते 20 वर्षों में यह आंकड़ें लगभग दोगुने से भी ज्यादा हो गए हैं। अग्रेंजी में इसके लिए ग्रे डायवोर्स शब्द का इस्तेमाल किया जाता है।
तलाक की स्थिति किसी के लिए भी खुशी देने वाली नहीं होती।  क्या आपकी शादी भी ऐसे किसी दोराहे पर खड़ी है? शायद आपके जीवन-साथी ने आपके भरोसे को तोड़ा हो या फिर बार-बार होने वाले झगड़ों की वजह से आपके रिश्ते में पहले जैसी मिठास नहीं रही।  आपके मन में यह भी खयाल आता होगा, ‘शायद हमें तलाक ले लेना चाहिए।’
तलाक का फैसला जल्दबाजी में नहीं करना चाहिए। पहले इस बारे में अच्छी तरह सोच-विचार कर लीजिए। यह जरूरी नहीं कि तलाक लेने से आपकी जिंदगी में छाए परेशानी के काले बादल छँट जाएँगे। तलाक से एक समस्या तो हल हो जाती है, लेकिन उसकी जगह एक नयी समस्या खड़ी हो जाती है।
1 पैसे की समस्या
माया को अपनी शादी के 25 साल बाद पता चला की उसके पति का ऑफिस में साथ काम करनेवाली किसी महिला के साथ नाजायज संबंध है। वह कहती है, “जब मुझे यह बात पता चली तो कुछ समय अलग रहने के बाद, माया ने आखिरकार तलाक लेने का फैसला किया। जैसे ही हम एक-दूसरे से अलग हुए, मेरी आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गयी। शादी टूटने पर अक्सर पत्नी को भयंकर आर्थिक समस्या से जूझना पड़ता है। कुछ महिलाओं के लिए यह वाकई मुश्किल होता है, क्योंकि उन्हें बच्चों की देखभाल करनी होती है, नौकरी ढूँढ़नी होती है, साथ ही तलाक की वजह से मानसिक तनाव से भी गुजरना होता है।
2 माता-पिता की जिम्मेदारी
नीलू कहती हंै, “जब मुझे पता चला कि मेरे पति का किसी के साथ संबध हैं तो उसने अपने पति को तलाक दे दिया। वह यह नहीं कहती कि उसने गलत फैसला लिया, मगर वह कबूल करती है, “अपने बच्चों के लिए माँ-बाप दोनों की भूमिका निभाना मेरे लिए सबसे बड़ी मुश्किल थी। “कोर्ट ने मुझे अपने 16 साल के बेटे को अपने साथ रखने की इजाजत दी। मगर जब एक बच्चा जवानी की दहलीज पर कदम रखता है तो वह बड़ा मुश्किल समय होता है और मेरे लिए अकेले अपने बेटे की परवरिश करना बहुत मुश्किल था। मुझे अकेले ही सारे फैसले लेने पड़ते थे।
जो तलाकशुदा माता-पिता अलग-अलग रहते हैं, लेकिन बारी-बारी से अपने बच्चों की परवरिश करते हैं, तो  उन्हें अपने पूर्व पति या पत्नी के साथ मिलकर कुछ नाजुक मामलों पर फैसला करना होता है। अपने पूर्व पति के साथ एक अच्छा रिश्ता बनाए रखना आसान नहीं होता।
3 तलाक का असर आप पर
जीवन को जब पता चला कि उसकी पत्नी उसे धोखा दे  रही है तो उसे ऐसा लगा कि दुनिया उजड़ गयी हो। वह कहता है, “पहले-पहल तो मुझे इस बात पर बिलकुल यकीन नहीं हुआ। मैं वाकई अपनी जिंदगी का हर दिन अपनी पत्नी और बच्चों के साथ बिताना चाहता था।”  मगर पत्नी की बेवफाई की वजह से मैं ऐसी उलझन में पड़ गया।  जीवन कहता है “जब लोग उसके बारे में उल्टी-सीधी बातें करते हैं तो उन्हें लगता है कि इससे मेरे दिल को सुकून मिलेगा। पर ऐसा बिलकुल नहीं होता। प्यार इतनी जल्दी नहीं मिटता।”
तलाक के बाद एक इंसान कई तरह की भावनाओं से गुजरता है। अगर आपका तलाक हो चुका है, तो आप भी जरूर इस दौर से गुजरे होंगे। जो हसीन पल आपने साथ बिताए थे वे आपको रह-रहकर याद आते हैं और आप सोचते हैं ‘वह मुझसे कहता था कि वह मेरे बगैर नहीं जी सकता। क्या वह मुझसे हमेशा झूठ बोलता था? आखिर यह सब क्यों हुआ?’”
4 तलाक का असर बच्चों पर
 रितेश एक तलाकशुदा पिता है। वह कहता हैै, “जिस घड़ी मुझे पता चला कि मेरी पत्नी का संबंध मेरी बहन के पति के साथ है, तो मेरे पैरों तले जमीन खिसक गयी। मैं बस मरना चाहता था।” मैंने देखा कि मेरे दोनों लड़कें जिनकी उम्र दो और चार साल की थी, उन पर भी उनकी माँ की इस हरकत का असर हो रहा था। वह कहता है, “वे कुछ समझ नहीं पा रहे थे और न ही वे इस हालात का सामना कर पा रहे थे।
लोग तलाक तो ले लेते हैं, पर अक्सर यह नहीं सोचते कि इसका बच्चों पर क्या असर होगा। यह बात सच है कि अक्सर बच्चों को पता होता है कि उनके मम्मी-पापा के बीच झगड़ा चल रहा है और इसका बच्चों के कोमल दिल और दिमाग पर बुरा असर हो सकता है। मगर यह सोचना कि तलाक लेना बच्चों के लिए अच्छा रहेगा बिल्कुल गलत है। अगर आप तलाक लेने की सोच रहे हैं, तो इस लेख में दिए चार मुद्दों पर जरूर गौर कीजिएगा। आखिर फैसला आप ही को करना है। चाहे आप कोई भी रास्ता अपनाएँ, आपको उसके अंजामों के बारे में पता होना चाहिए। आपको यह भी पता होना चाहिए कि कौन-सी परेशानियाँ खड़ी हो सकती हैं और उनका सामना करने के लिए तैयार रहिए।
इस मामले पर अच्छी तरह सोचने के बाद शायद आपको लगे कि इससे बेहतर होगा आप अपनी शादीशुदा जिंदगी को सुधारें। मगर क्या यह वाकई मुमकिन है?

बुधवार, 2 मई 2018

WEDNESDAY RELATIONSHIP-रिश्ता मां बेटी का पार्ट 2 अनुजा भट्ट

  बेटी ने मां काे टेक्नाेसेवी बना दिया है। अब लाइन पर नहीं खड़ी रहती मां। मोबाइल के जरिए या फिर इंटरनेट से घर से ही बिल जमा करती है, गैस बुक करती है, ट्रेन और एयरलाइंस का टिकट बुक करती है। बैंक का सारा कामकाज घर से ही करती है। पहले उनको यह असुविधाजनक लगता था पर धीरे धीरे अब उनको मजा आने लगा है वह नए से नए गैजट्स के बारे में जानना चाहती हैं। शापिंग माल में घूमने से पहले वह वेबसाइट्स में जाकर नए प्रोडक्ट के बारे में जानकारी ले रही हैं। ताकि खरीददारी करने में समय की बचत हो। इधर उधर न भटकना पड़े। फ्री होम डिलीवरी पर भी वह यकीन करने लगी है। हर जानकारी के लिए मां बेटी को फोन करती है। फिर चाहे वह गाड़ी चलाना हो या फिर कंप्यूटर।
मां के लिए एस एम एस एक रिश्ते का नाम है
आज के दौर में रिश्ते की परिभाषा को कहने के लिए एक नया शब्द आ गया है जिससे हम सभी परिचित है और वह है एस एम एस। एस एम एस का फुल फार्म है शार्ट मैसेज सर्विस। आप अपना संदेष इसके जरिए पूरी दुनिया में कही भी भेज सकते हैं। औरमां को तो मिनट मिनट में मैसेज भेजना है, नहीं तो वह चिंता करती रहेगी। पर जब मां घर से बाहर होती है तो वह भी हमें मैसेज करती रहती है। इसलिए रिश्ते का नाम है एसएमएस।बेटियां जब एसएमएस कहती हैं तो उसका अर्थ होता है श्योर मां श्योर।

WEDNESDAY RELATIONSHIP-रिश्ता मां बेटी का पार्ट 1 अनुजा भट्ट


मां और बेटी की भूमिका अब बदल गई है। फिर चाहे वह समाज हो, टीवी में दिखलाए जा रहे सीरियल हों या फिर विज्ञापन। सभी जगह बेटियां अपनी मां के साथ दिखाई दे रही हैं। इस बदलाव की वजह जहां आज का परिवेश है वहीं पूरी दुनिया का तकनीकी के जरिए एक मंच पर आ जाना भी है। एक दौर में मां अपनी बेटी को शिक्षा दीक्षा के  अलावा पाककला, सिलाई-कढ़ाई, संगीत, आचार-व्यवहार और सुरक्षा के बारे में सीख देती थी और यह सीख पीढ़ी दर पीढ़ी चलती जाती थी। आज भी कई पत्रिकाओं में दादी मां की रसोई जैसे कालम छपते हैं जो बहुत लोकप्रिय है। पर आज की ग्लोबल दुनिया में बेटी मां को दुनिया दिखा रही है और उसे पहले से ज्यादा दुनियादार बना रही है। टीवी, इंटरनेट और मोबाइल के जरिए जहां मां बेटी लगातार संपर्क में हैं वहीं मां अपनी बेटी से टेक्नोलाजी के गुर सीख रही है। प्रेशरकुकर ने दी थी उम्मीद
 कभी एक छोटे से प्रेशरकुकर ने  कई उम्मीदों से भर दिया था और आज रसोई में कई ऐसी चीजें आ गई है जिससे उसकी गृहस्थी की गाड़ी सरपट दौड़ रही है और वह अपने लिए समय निकाल रही है। बेटी उसे हर नए गेजेट्स के बारे में बताती है और उसका उपयोग करना भी सिखा रही है। मिक्सी, जूसर, गैसस्टोव, रेफ्रिजरेटर, माइक्रोवेव, ओवन, गीजर, वाशिंग मशीन, बर्तन धोने की मशीन, कपड़े सिलने की मशीन, मोबाइल, कंप्यूटर, लैपटाप, इनवर्टर यह सब ऐसी चीजें हैं जिसने मां की दुनिया को बदला है।
मां के और करीब हैं बेटियां
 गांव औरकस्बों में भी माएं अब स्कूटी से लेकर टैक्टर तक चला रही हैं। आज की बेटियों अपनी मां को नई से नई तकनीक से परिचित करा रही है ताकि वह अपनी मां के हमेशा करीब रह सकें। मां के भीतर भी उक्सुकता कम नहीं हैं। कंप्यूटर अब उनके लिए हौवा नहीं है वह मजे में अपने बच्चों से चैट करती है, मेल करती है। मां और बेटी की गपशप में भी टैक्नो का असर है। मां कम शब्दों में अपनी बात कहना सीख गई है। अब उसकी बेटी देश में रहे या विदेश में, उसे कोई चिंता नहीं क्योंकि वह हर रोज इंटरनेट के जरिए उससे मिलती है, गपशप करती है। पहले वह कहा इतनी बात कर पाती थी।अब तो बेटी कहीं भी हो वह उससे बात कर लेती है।पहले तो उसे तो घर के काम से ही फुर्सत नहीं थी।
खेल रही है ब्लाग का खेल
बेटी ने मां को ब्लाग चलाना सिखा दिया है । मां ने भी बचपन में शरो शायरी खूब लिखीं, कहानी कविताएं लिखीं।शादी के बाद मौका नहीं मिला। अब मां अपना ब्लाग लिख रही है, कहानी-कविता लिख रही है अपने बारे में लिख रही है। जो मन में है कह रही है। लोग पढ़ भी रहे हैं और सराहना भी कर रहे हैं। इससे मां बेटी दोनो का उत्साह बढ़ा है।
हुनर बन रहा है रोजगार
इस तरह के ब्लाग में अ्चार बनाने से लेकर कई ऐसे टिप्स हैं जो बड़े काम आते हैं अब माओं की कई ऐसी सहेलियां बन गई है जिनसे कभी मिले तो नहीं पर फिर भी वह दिल के करीब हैं।वह आपस में रेसिपी से लेकर बुनाई औरकढ़ाई भी शेयर करती हैं। घर का बना अचार मुरब्बा अब वह खुद बेच रही है। स्वयं सहायता समूह से जुड़कर उनको आर्थिक मदद मिली है। और वह अपने पांव पर खड़ी हो रही है। महिला शशक्तिकरण में टेक्नोलाजी के विकास ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

रविवार, 12 नवंबर 2017

कैसी हो,आपकी बहू। कैसा हो,आपका दामाद।--कविता नागर




जीवन पथ अनवरत है।हम जीवनयात्री नये पढ़ावों से गुजरते है।फिर हमारे बच्चों की बारी आती है।हम चाहते है,कभी कभी कुछ पीड़ाएँ अगर हमने झेली हो..तो वे हमारे बच्चें न झेलें।ये हमारे जीवन के हर पड़ाव अलग अलग मौसम की तरह ही होते है।
: शीत,बसंत, पतझड़, गर्मी सब तरह के मौसम देखते है..हमारे जीवन में भी।

शैशवावस्था से लेकर वयोवृद्ध अवस्था तक हम अलग अलग अनुभव प्राप्त करते है।अपने बच्चों को लेकर भी काफी सपने संजोए जाते है,उन्हें क्या पढ़ना है, क्या बनना है,किससे शादी करनी है,कब उनके बच्चों को गोद में खिलाना है।कितने ही सपने संजोए जाते है,भावी बहू या दामाद को लेकर।जैसे शैशवावस्था में हम अपने शिशु को फूंक फूंक कर खाना खिलाते है,कि उनका मुंह ना जल जाए।वैसे ही चाहते है,कि जिंदगी के फैसले भी फूंक फूंक कर लिए जाए।अतिरिक्त सतर्कता बरती जाती है,कि कहीं किसी फैसले पर पछताना ना पड़े।

अगर हमारी बेटी है,तो हम चाहेंगे कि दामाद सुशील, मिलनसार, सुस्थापित व्यवसाय या एक सुनिश्चित आय वाला हो।पारिवारिक पृष्ठभूमि अच्छी रही हो।वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जहाँ कहीं कही परिवारों मे एकलौती संतान पुत्री होती है,वे चाहते है कि दामाद बेटे की तरह उनका साथ निभाएं।बेटी को कामकाजी होने से ना रोके।

अगर बहू की तलाश कर रहे है,तो अपेक्षाएं सामान्यतः और ज्यादा रहती है,क्योंकि अधिकांश परिवार बहू को अपने परिवेश के अनुसार ढालना चाहते है।कार्यकुशलता आज भी क ई घरों की प्राथमिक आवश्यकता है। फिर भी वक्त के साथ साथ मानसिकता में बदलाव भी आया है,संस्कारी ,सुशिक्षित, कामकाजी बहू अधिकांशतः हर घर की प्राथमिकता बन गई है,पहले के मापदंड कुछ बदल गए है।

पहले के समय में लोग अधिक मर्यादा में रह लेते थे,जो कि आजकल असंभव है,आजकल बच्चे थोड़ी स्वच्छंदता चाहते है।कभी कभी मां बाप को बच्चों की पसंद को स्वीकारना पड़ता है,तब उनके मापदंड भी अमान्य हो जाते है।ऐसे में परिस्थिति के अनुसार खुद को ढालने के लिए भी तैयार रहना पड़ता है।

देखा जाए तो वर्तमान समय में ज्यादा अपेक्षाएं रखना सही नहीं है,उपेक्षित होने पर आप निराश हो जाते है।
माता पिता को अपने कर्तव्य का निर्वहन उचित तरीके से करना चाहिए, बच्चों को उचित संस्कार दे,ताकि वे जीवनमूल्यों की महत्ता समझे,व अपने जीवनसाथी में भी वही योग्यता खोजें।संवेदनशीलता का पाठ जरूर पढ़ाए,ये बहुत आवश्यक है।ऐसा होगा तो आने वाली बहू या दामाद भी आपकी अपेक्षाओं के अनुरूप ही होगा।
   .         धन्यवाद।https://www.facebook.com/anujabhat/videos/10203837925305512/

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