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रविवार, 2 अगस्त 2026

लंदन फोर्ट डायरी-बाम, बम या ब्रह्म से जागीर में मिला गांव है बिषाड़



ज एकादशी है। पापा को गए आज 3 माह हो गए। पर पापा, जैसे हर बार याद दिलाते हो कोई किस्सा-कहानी या फिर घटनाएं। हर किस्सा- कहानी के पीछे छिपा है एक इतिहास। बहुत बार यह खुद को जानने-समझने की कोशिश भी होती है। हमारे समाज में बहुत सारी प्रथाएं और कुप्रथाएं भी है और इन सबके पीछे छिपी हैं कई सदियों की दास्तानें। कभी लोककथा या फिर लोक संगीत की धुन में अपना विरह गाती हैं, कभी अपना वजूद तलाशती हैं।
आखिर हम कौन हैं.. कहां से आए हैं… हमारे पूर्वज, कौन है, ..यह सवाल ही इन कहानियों की तस्दीक करता है। बिषाड़ की कहानी शुरू होती हैं 13 वीं से 15 वीं शताब्दी के आसपास। इस समय कत्यूरी राजवंश का पतन हो चुका था और
उत्तराखंड के इतिहास में बाम (या बम) राजा पिथौरागढ़ की सौर घाटी (सोर क्षेत्र) के मध्ययुगीन शासक के रूप में उभरे थे। यह नाम सुनने में थोड़ा अटपटा से लगता है इसलिए कयास यह भी है कि कहीं यह या ब्रह्म का अपभ्रंश तो नहीं है, जिसका प्रयोग वे खुद को उच्च कुल का या दैवीय शक्तियों से प्रेरित शासक सिद्ध करने के लिए करते हों। कुछ कहते हैं कि पश्चिमी नेपाल के डोटी राजपरिवार व रैका राजाओं के सामंत उनकी ही एक शाखा हैं। तो कुछ इन्हें कत्यूरी राजाओं के वंशजों की एक शाखा भी मानते हैं। जो भी हो, यह राजा मौसम के हिसाब से अपना काम करते थे। ठंड के महीनों में घाटी से नीचे रामेश्वर और बैलोरकोल चले जाते थे। चाहे आम जनता ठंड में ठिठुरती रहे। राजाओं के नाम भी निराले थे जैसे कर्किल बम, काकिल बम, चनारी बम, आर्की बम, ज्ञानी बम, शक्ति बम, विजय बम और हरी बम ।
इन्हीं राजाओं के शासनकाल के दौरान पिथौरागढ़ के सोर क्षेत्र में भट्ट ब्राह्मणों का आगमन होता है। उनका आना एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और ऐतिहासिक घटना बनता है। पहाड़ी शैली में दक्षिण की लोककलाएं और धुन समाने लगते हैं। रहन-सहन और खान-पान बदलता है। धार्मिक अनुष्ठान में रुढ़िवादिता की जगह शास्त्रीय मतमतांतर को व्याख्याकार और टिप्पणीकार एक बड़ा फलक देते हैं। शिक्षा का द्रार खुलता है। श्री विश्व शर्मा तो यूं ही घूमते हुए तीर्थाटन के लिए दक्षिण द्रविड़ देश (दक्षिण भारत) से सोर घाटी (पिथौरागढ़) आए थे। जब वह यहां पहुंचे तो तत्कालीन सोर क्षेत्र के बम राजाओं से उनकी मुलाकात हुई। वह उनकी विद्वत्ता और वेदों के ज्ञान से प्रसन्न हुए और उनको यही ठहरने का न्यौता भी दे डाला। विश्वशर्मा के लिए यह निर्णय लेना आसान नहीं था। सब कुछ उनके लिए अलग था। रहन-सहन, वेशभूषा और भौगोलिक स्थितियाँ भी। उन्होनें समय मांगा परिवार से बात की पर तब तक वह कुमाऊं की सुंदरता में खुद को खो बेठे थे। और फिर यहीं के होकर रह गए। इन्हें उत्तराखंड का एकमात्र दक्षिण भारतीय मूल (दक्षिण द्रविड़ देश) का भट्ट ब्राह्मण माना जाता है, जो मध्यकाल में काशी के रास्ते होते हुए कुमाऊं पहुंचे थे। बम राजाओं ने भट्ट ब्राह्मणों के निर्वाह और सम्मान के लिए पिथौरागढ़ के पास स्थित बिषाड़ गांव उन्हें जागीर (भूमि दान) के रूप में भेंट कर दी। आज भी हमारी बहुत सारी रस्म रिवाज में दक्षिण भारत की झलक है।
हमारे गांव के बारे में जानने के लिए आप इस लिंक को भी देख सकते हैं।
बिषाड़ गांव से शुरू होकर इस कुल की शाखाएं कालांतर में कुमाऊं के पल्लू, खेतीखान, पांडेखोला, रामनगर, काशीपुर और देश के अन्य हिस्सों में विस्तृत हो गईं। आगे की कहानी में हम पाते हैं कि वह दरबार में राज्य कर्मचारी और सलाहकार बनाए गए। इन भृगु वंशी और विश्वामित्र गोत्रीय ब्राह्मणों को क्षेत्र के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों, जैसे रामेश्वर और थल केदार, के आचार्य होने का गौरव भी मिला।
स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार, पिथौरागढ़ क्षेत्र के कई ऐतिहासिक नौले (पारंपरिक जल स्रोत) और किलों का निर्माण इन्हीं बम शासकों द्वारा करवाया गया था। कुछ स्थानीय इतिहासकारों का मानना है कि पिथौरागढ़ शहर में स्थित पुराने किले (जिसका जीर्णोद्धार बाद में गोरखाओं ने किया) की नींव या उसका शुरुआती ढांचा मूल रूप से बम राजाओं के शासनकाल के दौरान ही रक्षात्मक चौक के रूप में तैयार किया गया था।
लेकिन यह बम शासक बहुत क्रूर भी थे। उनके समय में विवादों को सुलझाने के लिए दिव्य परखाओं (जैसे गर्म कुल्हाड़ी छूना या उबलते तेल में हाथ डालना) की प्रथा का प्रचलन था जो उस दौर के सामंती समाज का असली चेहरा दिखाता है। लोक-कथाओं में वर्णन आता है कि उनके दरबार में अपराध सिद्ध करने के लिए वैज्ञानिक साक्ष्यों के बजाय 'दैवीय परीक्षाओं' का सहारा लिया जाता था, जैसे:गोला-दीप: उबलते हुए तेल में हाथ डालकर कड़ाही की तली से सिक्का निकालना। कढ़ाई-दीप: लाल-गर्म लोहे की छड़ या कुल्हाड़ी को नंगे हाथों से छूना। यदि व्यक्ति का हाथ नहीं जलता था, तभी उसे निर्दोष माना जाता था। मैं इसे एक क्रूर और आदिम न्याय प्रणाली के युग के रूप में दर्ज करती हूं। आज भी मुझे ऐसी खबरें पढ़ने को मिलती हैं, विचलित करती हैं। मेरी आस्था पर प्रहार करती हैं।
लंदन फाेर्ट के पिछले अंक आप इस लिंक में पढ़ सकते हैं

बुधवार, 4 सितंबर 2024

उनके टाइम पास से बनते हैं एंटीकपीस.. आपका टाइमपास क्या है दोस्त.. डा अनुजा भट्ट


क्या पैसा कमाना आपकी चाहत है। इस चाहत को अपने हुनर के जरिए हकीकत में बदला जा सकता है। अगर आप समय की नब्ज टटोल पाएं और अपने मन में यह विचार जमा लें कि कोई भी काम छोटा बड़ा नहीं होता हमारी सोच छोटी बड़ी हो सकती है, तो आपको पैसा कमाने से कोई नहीं रोक सकता। मैं हर रोज अलग अलग तरह की महिलाओं से मिलती हूं। उनसे खूब बातें करती हूं। खूब सीखती भी हूं और जीवन में आशावादी रहती हूं।

आज मुझे कुछ गुजराती महिलाएं मिली। जिन्होंने सड़क किनारे पटरी पर अपनी दुकान सजायी हुई थी। वह मुझे आवाज दे रही थी मैडम जी ले लो। मैंने कहा अभी लेना नहीं है, तो एक महिला बोली मत लीजिए पर देख तो लीजिए। मुझे भी टाइम पास करना था तो मैं भी बैठ गई उनके साथ। गजब के आत्मविश्वास के साथ वह अपनी कहानी सुनाने लगी। उनमें से कोई भी गरीब नहीं थी। उनका मूल मंत्र था टाइम मेनेजमेंट.. जब खेती का काम नहीं तब कसीदाकारी और फिर खुद ही बनाए सामान को बेचने की जिम्मेदारी भी। उनके साथ मैंने बिना चीनी की चाय और खास गुजराती नमकीन खाई। और इसी के साथ शुरू हुआ गप गल्प का किस्सा.. जब मैंने कहा, मैं तो आज टाइम पास कर रही हूं आपका टाइमपास क्या है तो एक महिला ने हँसते हुए कहा जो आपके घर को सुंदर बनाता है।

हम सब महिलाएं अपनी संस्कृति और रीतिरिवाज के बारे में जितना जानती हैं उनको क्राफ्ट के रूप में पेश करती हैं। फिर चाहे वह दीवार पर लटकाने वाली वस्तुएँ, रजाई, शादी के कपड़े, स्कर्ट और ब्लाउज़ (घाघरा चोली), बच्चों के कपड़े, अपने पतियों द्वारा पहने जाने वाले शर्ट (कुर्ते), स्कार्फ़...कुछ भी हो । कुछ हस्तनिर्मित वस्तुओं को पूरा करने में महीनों लग जाते हैं क्योंकि हमें घर के काम और खेती भी करनी होती है। हम सब गुजरात के कच्छ इलाके से हैं। यहां सब एक साथ ही रहते हैं। आपको बताऊं मोटे तौर पर कच्छ में 7 तरह की कढ़ाई की जाती है - जाट, सूफ, खारेक, रबारी, अहीर, पक्को।

पक्को का काम गुजरात, उत्तर-पश्चिम भारत के कच्छ क्षेत्र में सोढ़ा, राजपूत और मेघवाल समुदाय की महिलाएं करती हैं ।रूपांकन में आम तौर पर ज्यामितीय और पुष्प होते हैं, कभी-कभी शैलीबद्ध आकृतियां भी बनाई जाती हैं । रूपांकनों को पारंपरिक रूप से पहले चाक से खींचा जाता है, और फिर मैरून या लाल, गहरे हरे, सफेद या पीले रंग से बनाया जाता है। अक्सर बटनहोल सिलाई के साथ काम किया जाता है। चेन स्टिच का उपयोग करके काले, सफेद या पीले रंग में आउटलाइनिंग की जाती है।

इसी तरह मुतवा कसीदाकारी मुतवा जाति की महिलाओं द्वारा की जाने वाली कढ़ाई है। मुतवा एक मुस्लिम जाति है जो सिंध-पाकिस्तान के क्षेत्र से आकर कच्छ के रेगिस्तानी क्षेत्र "बन्नी" में बस गई। उनके एक संप्रदाय को मालधारी भी कहते हैं।
इसी तरह जाट कढ़ाई भी जाट समुदाय की महिलाएं करती हैं। यह एक चरवाहा समुदाय है जो सदियों पहले पश्चिमी एशिया से भारत में आकर बसा था। जाट महिलाएँ आम तौर पर पूरे कपड़े को पूर्व-नियोजित ज्यामितीय डिज़ाइन में कवर करने के लिए क्रॉस स्टिच कढ़ाई का उपयोग करती हैं। वे अपने काम में बड़े पैमाने पर दर्पण का भी उपयोग करती हैं। सूफ़ कढ़ाई कच्छ के सोधा, राजपूत और मेघवाल समुदायों द्वारा की जाती है। उनके द्वारा डिज़ाइन कपड़े के पीछे की तरफ साटन सिलाई का उपयोग करके विकसित किए गए बड़े पैमाने पर ज्यामितीय पैटर्न हैं। सूफ़ काम करने के लिए गहरी नज़र, गणित और ज्यामिति का ज्ञान होना ज़रूरी है। सूफ़ रूपांकनों में मोर, मंडला आदि जैसे कारीगरों के जीवन से लयबद्ध पैटर्न शामिल हैं और इनका उपयोग परिधान, बेडस्प्रेड, वॉल हैंगिंग, रजाई, तोरण और कुशन कवर जैसी चीज़ें बनाने के लिए किया जाता है।

खरेक कढ़ाई सोधा, राजपूत और मेघवाल समुदायों द्वारा की जाती है। कारीगर कपड़े पर ज्यामितीय पैटर्न की रूपरेखा बनाते हैं और फिर साटन सिलाई के बैंड के साथ रिक्त स्थान भरते हैं जो सामने से ताने और बाने के साथ काम किए जाते हैं।

रबारी कढ़ाई कच्छ के रबारी समुदायों द्वारा की जाती है जो मुख्य रूप से पशुपालक खानाबदोश समुदाय हैं जो मवेशी पालते हैं। उनके द्वारा निर्मित डिजाइन बोल्ड हैं और आमतौर पर पौराणिक कथाओं और दैनिक जीवन से प्राप्त होते हैं। कपड़े पर आउटलाइन चेन स्टिच में बनाई जाती है और फिर बटनहोल सिंगल चेन, हेरिंगबोन टांके का उपयोग करके बारीकी से भरी जाती है। आमतौर पर रबारी कढ़ाई के लिए काले रंग का आधार उपयोग किया जाता है। अहीर कढ़ाई एक कपड़े पर चौकोर चेन स्टिच का उपयोग करके फ्रीहैंड डिज़ाइनों की रूपरेखा बनाकर और फिर बंद हेरिंगबोन सिलाई का उपयोग करके भरकर की जाती है। कढ़ाई के इस रूप में दर्पण का भी बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है।

उनसे बातचीत कर लगा सचमुच कितनी बातें हैं जो हम नहीं जानते। समाज जाति धर्म और कर्म हमारी कला को कितना जीवंत बनाता है यह सब इस बात का प्रमाण हैं। वास्तव में, कला संस्कृतियों और जीवन के रंगों का सार दर्शाती हैं। एक सम्मोहन पैदा करती हैं। जैसा आज इन महिलाओं ने किया। धन्यवाद मुकुंदनी सुकुंदनी....अब तुम कब और किस मोड़ पर मिलोगी पता नहीं पर तुम्हारी हँसी चाय पीने का खास अंदाज और नमकीन का चटपटापन याद रहेगा।

शनिवार, 17 अगस्त 2024

गधा नहीं हैं आप जो सारा बोझ आपके कंधे पर हो-डा. अनुजा भट्ट



अगर आप जानते हैं कि आप दवाब में हैं और फिर भी आपके लिए नहीं कहना संभव नहीं, तो जान लीजिए आपका इस्तेमाल किया जाता रहेगा। आप यह महसूस करते हैं कि सामने वाला कितनी चतुराई से अपनी बेबसी और मजबूरी के बहाने गढ़कर आपकी जेब में सेंध लगा रहा है। आप अपना तनाव अपनी हताशा को खुद ओढ़ लेते हैं या फिर आपका बच्चा ही आपका साफ्ट टारगेट हो जाता है। जहां आप अपनी हताशा और निराशा का गुब्बारा फोड़ते हैं। उसे जलील करते हैं। उसके साथ आक्रामक होते हैं। जबकि सबसे ज्यादा जिम्मेदार आपको उसके लिए होना चाहिए क्योंकि आप ही उसके जन्मदाता हैं वह आप पर ही निर्भर है।

जहां आपको ना कहना चाहिए वहां आप हां कहते हैं और जहां हां वहां आप ना कहते हैं। यह विरोधाभास सबसे ज्यादा आपकी सेहत को प्रभावित करता है और आप बीमार हो जाते हैं। गधा नहीं हैं आप जो सारा बोझ आपके कंधे पर हो।

क्या आप अक्सर अपनी क्षमता से ज़्यादा काम अपने ऊपर ले लेते हैं? क्या आप अक्सर उन कामों के लिए सहमत हो जाते हैं जिन्हें आप नहीं करना चाहते? क्या आपके लक्ष्य पीछे छूट रहे हैं।अगर ऐसा है, तो अपने जीवन में लोगों के साथ “नहीं” कहना और सीमाएँ तय करना सीखना होगा।अगर आप लगातार दूसरों के हर अनुरोध को स्वीकार करते हैं, तो आप मानसिक रूप से बर्नआउट का अनुभव कर सकते हैं। 
बर्नआउट के निम्नलिखित लक्षण हो सकते हैं:
आपके जीवन में आनंद की कमी । लगातार काम के दवाब के कारण आराम करने का समय न होना। थकावट, चिड़चिड़ापन, चिंता, खुद की देखभाल की कमी, उत्पादकता में कमी, प्रेरणा की कमी, अवसाद , नकारात्मक ,शीघ्र क्रोध, संबंधों में शुष्कता।

जब आप इतनी सारी परेशानियों से जूझ रहे हैं तो इसका सीधा असर सबसे पहले आपके परिवार और आपकी नौकरी पर पड़ेगा। मन और नाव दोनो एक जैसे हैं, डावाडोल होते देर नहीं लगती।

दूसरों की मदद करने के लिए खुद को बर्नआउट तक पहुँचने देना ठीक नहीं। "नहीं" कहना सीखना और खुद को और अपने मूल्यों को प्राथमिकता देना आपके मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। यह दूसरों के साथ संबंधों को खराब नहीं करता बल्कि बेहतर बना सकता है। आपका यह भ्रम है कि आपके ना कहने से वह नाराज हो जाएगा। आपका ना कहना उसे वैकल्पिक विचार पैदा करेगा। आप पर निर्भरता खत्म करेगा।

'नहीं' कहना सीखना क्यों महत्वपूर्ण है?

प्रत्येक व्यक्ति के पास दिन के 24 घंटे होते हैं, जिनमें से सोने या आराम करने के लिए भी समय चाहिए। यदि आप अक्सर दूसरों के अनुरोधों पर "हाँ" कहते हैं, तो आप शायद खुद से "नहीं" कह रहे हैं। आप थके हैं सोना चाहते हैं पर उस हां के कारण आप फिर से काम पर लग जाते हैं। उदाहरण के लिए, शायद आप अक्सर देर तक रुकते हैं जब आपका बॉस आपको ओवरटाइम करने के लिए कहता है और अपने बच्चे के बास्केटबॉल गेम को मिस कर देता है।

जब आप खुद की कीमत पर दूसरों की मदद करने के लिए सहमत होते हैं, तो आप उनकी इच्छाओं और ज़रूरतों को अपनी ज़रूरतों से ज़्यादा प्राथमिकता देते हैं। हालाँकि कभी-कभी दया, सहानुभूति और सहायता प्रदान करना सकारात्मक हो सकता है, लेकिन यह तब ख़तरनाक हो सकता है जब आप अपनी ज़रूरतों के बावजूद ऐसा करते हैं।

"नहीं" कहने का फ़ायदा यह है कि आप अपनी मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक ज़रूरतों का ख्याल रखने के लिए समय निकाल सकते हैं। इसके अलावा, आप दूसरों को दिखा सकते हैं कि वे आपका फ़ायदा नहीं उठा सकते या आपसे हर समय 100% साथ रहने की उम्मीद नहीं कर सकते, क्योंकि आप भी इंसान हैं।

बर्नआउट, अत्यधिक तनाव और चिंता गंभीर स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को जन्म दे सकती है। इस कारण से, इससे पहले कि यह आपके स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाले, अपने अत्यधिक तनाव को दूर करना आवश्यक हो सकता है।

अगर आपको लोगों के अनुरोध पर मना करने में परेशानी होती है, तो उत्तर देने में देरी करना सीखकर अपने लिए समय खरीदें। अगर किसी को तुरंत जवाब देने की ज़रूरत नहीं है, तो आप कुछ इस तरह का वाक्य इस्तेमाल कर सकते हैं, "मैं जाँच करूँगा और कल आपसे संपर्क करूँगा।" अगर आप अक्सर उसी समय किसी एहसान के लिए सहमत हो जाते हैं, तो यह रणनीति आपको यह सोचने का समय देती है कि क्या आप अनुरोध को स्वीकार करना चाहते हैं। यह आपको अस्वीकार करने या वैकल्पिक व्यवस्था तैयार करने के लिए आत्मविश्वास पैदा करती है।

दूसरों को आपके कार्यों और आपने उनके अनुरोध को क्यों अस्वीकार किया, के बारे में विवरण की आवश्यकता नहीं है। आपको अस्वीकार करने या सीमा निर्धारित करने के लिए किसी कारण के बताने की भी आवश्यकता नहीं है। क्योंकि हां या ना कहना आपका निजी चुनाव है। इसके लिए बिना कोई बहाना बनाए किसी के अनुरोध को अस्वीकार किया जा सकता है।

"मुझे खेद है। मैं कल आपकी मदद करने में असमर्थ हूँ। मेरे पास पाँच अपॉइंटमेंट हैं और मुझे नहीं लगता कि मेरे पास समय होगा।" इस तरह कहकर हम उसे सफाई क्यों दें।

हमें कहना होगा “नहीं, मैं कल ऐसा नहीं कर सकता।”

जब आप अपनी सीमाओं के लिए कोई कारण न बताने का अभ्यास करते हैं, तो यह दूसरों को दिखाता है कि आप एक बहाने के कारण नहीं, बल्कि एक और इंसान होने के नाते सम्मान के पात्र हैं। अगर वे पूछते हैं कि आप मदद क्यों नहीं कर सकते, तो अपनी सीमा दोहराते हुए कहें, “मैं कल मदद नहीं कर सकता।”

अगर उनके लिए अस्वीकृति या अपनी योजनाओं में बदलाव एक चुनौती है, तो यह उनकी जिम्मेदारी है कि वे इससे निपटना सीखें। अगर वे मानसिक रूप से आप पर निर्भर हैं, तो आपको उन्हें बैकअप योजना बनाने में मदद करने की ज़रूरत नहीं है।

माफ़ी मत मांगो

अगर आप लोगों को खुश करने में संघर्ष करते हैं, तो आप किसी के अनुरोध को अस्वीकार करने पर दोषी महसूस कर सकते हैं। आपको डर हो सकता है कि वे अब आपको पसंद नहीं करेंगे या आपसे नाराज़ हो जाएँगे। इस डर के कारण आप किसी अनुरोध को अस्वीकार करने पर माफ़ी माँग सकते हैं। हालाँकि, माफ़ी माँगना उल्टा हो सकता है।

सीमाएँ निर्धारित करना स्वस्थ है और एक इंसान के तौर पर आपके अधिकार में है। अगर आप अपने स्थान, शरीर, सामान और ऊर्जा के लिए सीमाएँ निर्धारित कर रहे हैं और किसी दूसरे व्यक्ति को नियंत्रित करने का प्रयास नहीं कर रहे हैं, तो आपको बिना किसी बहाने के 'नहीं' कहने का अधिकार है। जब आप माफ़ी मांगते हैं, तो आप खुद को और दूसरे व्यक्ति को यह संदेश दे सकते हैं कि 'नहीं' कहना गलत है।

उत्तर देने से पहले खुद को समय देना मददगार हो सकता है, इसका एक और कारण यह है कि इससे आपको यह सोचने का मौका मिलता है कि आप किस बात पर सहमत हो रहे हैं। कुछ मामलों में, कोई व्यक्ति आपसे ऐसी प्रतिबद्धताएँ माँग सकता है जिसके लिए आपके पास जितना समय और ऊर्जा है, उससे ज़्यादा समय और ऊर्जा की ज़रूरत होती है। अगर आपको बहुत जल्दी सहमत होने की आदत है, तो हो सकता है कि आप अनुरोध के हर पहलू को न समझ पाएँ।

अगर आप अनिश्चित हैं, तो सवाल पूछें और सहमत या असहमत होने से पहले ज़्यादा जानकारी जुटाएँ। जानें कि आपसे क्या अपेक्षित हो सकता है। दूसरों को जवाब देने में जल्दबाजी न करने दें। अगर वे आप पर दबाव डाल रहे हैं या ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे कि आप "उनके ऋणी हैं," तो अपने मानसिक स्वास्थ्य को बचाने के लिए मना करना सबसे अच्छा हो सकता है।

किसी अनुरोध को स्वीकार करने से पहले, अपने मूल्यों और प्राथमिकताओं पर विचार करें। प्राथमिकताएं स्थापित करने और केंद्रित रहने से आप उन कुछ क्षेत्रों में अपना सर्वश्रेष्ठ दे पाएंगे, बजाय इसके कि आप हर किसी के लिए सब कुछ बनने की कोशिश में खुद को बहुत अधिक फैला लें।

अगर आप समझौता करने का कोई तरीका अपना सकते हैं, तो आप शायद "नहीं" कहना न चाहें। उदाहरण के लिए, अगर कोई दोस्त आपसे शुक्रवार की रात को अपने बच्चों की देखभाल करने के लिए कहता है ताकि वे बाहर जा सकें, लेकिन आप उपलब्ध नहीं हैं, तो आप शनिवार की रात को उसके बच्चों की देखभाल करने की पेशकश कर सकते हैं। अगर किसी की मदद करना आपके लिए ज़रूरी है और आपको कोई आपत्ति नहीं है, तो कोई विकल्प सुझाकर इसे बेहतर बनाने पर विचार करें।

किसी अनुरोध को अस्वीकार करना या सीमाएँ निर्धारित करना व्यवहार में सिद्धांत से ज़्यादा प्रबंधकीय लग सकता है। इस कारण से, जब आप अकेले हों तो अभ्यास करना मददगार हो सकता है। अपने अलग-अलग उत्तरों का अभ्यास करें। यह कहने का अभ्यास करें, “मुझे इस बारे में आपसे बात करनी होगी,” और “मैं उपलब्ध नहीं हूँ।”

अगर आपका दोस्त आपको “नहीं” कहना सीखने में मदद करता है, तो उनसे अपने साथ रोलप्ले करवाएँ। वे आपसे कुछ ऐसे अनुरोध कर सकते हैं जो आप अक्सर सुनते हैं, और आप विनम्रता से मना करने का अभ्यास कर सकते हैं। जितना अधिक आप अभ्यास करेंगे, यह उतना ही आसान हो जाएगा।

मेरे पास अभी समय नहीं है.

पूछने के लिए धन्यवाद, लेकिन मैं ऐसा करने में असमर्थ हूं।

मैं ऐसा करना पसंद करूंगा, लेकिन अन्य प्रतिबद्धताओं पर भी मुझे ध्यान देने की आवश्यकता है।

नहीं धन्यवाद।

मुझे इसमें कोई रूचि नहीं है।

मैं उस दिन व्यस्त हूं.

चलो किसी और समय के लिए योजना बनाते हैं।

मैं उस दिन कुछ और करने जा रहा हूं।

मेरा शेड्यूल अभी पूरा भरा हुआ है।

इन विचारों को लें और इन्हें तब तक बदलते रहें जब तक आपको ऐसा तरीका न मिल जाए जिससे आप आवश्यकता पड़ने पर आत्मविश्वास के साथ “नहीं” कह सकें।

किसी के अनुरोध को अस्वीकार करना, खासकर यदि आप उनके करीब हैं, तो आपको पहली बार में गलत लग सकता है। इस बात पर विचार करने के लिए समय निकालें कि आप क्यों मानते हैं कि आप अपने जीवन में लोगों के साथ सीमाएँ निर्धारित नहीं कर सकते।

कुछ लोग सीमाएँ निर्धारित करने से डरते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि दूसरे लोग उन्हें पसंद नहीं करेंगे। दूसरों को यह चिंता हो सकती है कि वे अपने दोस्तों या सहकर्मियों को खो देंगे। हालाँकि, स्वस्थ लोग आपकी सीमाओं को स्वीकार करेंगे। यदि वे आपकी सीमाओं को स्वीकार नहीं करते हैं, तो वे आपका अनादर कर रहे होंगे।

याद रखिए गधा नहीं हैं आप जो सारा बोझ आपके कंधे पर हो.

रविवार, 7 अक्टूबर 2018

नादिया मुराद जिनकाे मिला शांति के लिए नाेबेल पुरस्कार

नादिया मुराद
 अगस्त के एक दिन काले झंड़े लगे इराक में आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट के पैर पसारते ही खुशहाली की जिंदगी जी रहे यजीदी समुदाय के लोगों का खराब वक्त शुरू हो गया था। आतंकवादियों के चंगुल से किसी तरह जान बचा कर भागी यजीदी महिला नादिया मुराद को शुक्रवार को शांति के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया है। नोबेल समिति की अध्यक्ष बेरिट रीस एंडरसन ने यहां नामों की घोषणा करते हुए कहा कि मुराद और कांगो के चिकित्सक डेनिस मुकवेगे को यौन हिंसा को युद्ध हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने पर रोक लगाने के इनके प्रयासों के लिए नोबेल शांति पुरस्कार के लिए संयुक्त रूप से चुना गया है।

पतले और पीले पड़ चुके चेहरे वाली मुराद (25) उत्तरी इराक के सिंजर के निकट के गांव में शांतिपूर्वक जीवन जी रहीं थी लेकिन 2014 में इस्लामिक स्टेट के आंतकवादियों के जड़े जमाने के साथ ही उनके बुरे दिन शुरू हो गए। वह उत्तरी इराक में सिंजर के जिस गांव में रह रही थी, उसकी सीमा सीरिया के साथ लगती है। और यह इलाका किसी जमाने में यजीदी समुदाय का गढ़ थाजिहादियों के ट्रक उनके गांव कोचो में धड़धड़ाते हुए घुस आए। इन आंतकवादियों ने पुरूषों की हत्या कर दी, बच्चों को लड़ाई सिखाने के लिए और हजारों महिलाओं को यौन दासी बनाने और बल पूर्वक काम कराने के लिए अपने कब्जे में ले लिया। आज मुराद और उनकी मित्र लामिया हाजी बशर तीन हजार लापता यजीदियों के लिए संघर्ष कर रहीं हैं। माना जा रहा है कि ये अभी भी आईएस के कब्जे में हैं।

दोनों को यूरोपीय संघ का 2016 शाखारोव पुरस्कार दिया जा चुका है। मुराद फिलहाल मानव तस्करी के पीड़ितों के लिए संयुक्त राष्ट्र की गुडविल एंबेसडर हैं। वह कहती हैं, ‘आईएस लड़ाके हमारा सम्मान छीनना चाहते थे लेकिन उन्होंने अपना सम्मान खो दिया।’आईएस की गिरफ्त में रह चुकीं मुराद इसे एक बुराई मानती हैं। पकड़ने के बाद आतंकवादी मुराद को मोसुल ले गए। मोसुल आईएस के स्वघोषित खिलाफत की ‘राजधानी’थी। दरिंदगी की हदें पार करते हुए आतंकवादियों ने उनसे लगातार सामूहिक दुष्कर्म किया, यातानांए दी और मारपीट की।

वह बताती हैं कि जिहादी महिलाओं और बच्चियों को बेचने के लिए दास बाजार लगते हैं और यजीदी महिलाओं को धर्म बदल कर इस्लाम धर्म अपनाने का भी दबाव बनाते हैं। मुराद ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आपबीती सुनाई। हजारों यजीदी महिलाओं की तरह मुराद का एक जिहादी के साथ जबरदस्ती निकाह कराया गया। उन्हें मेकअप करने और चुस्त कपड़े पहनने के लिए मारा पीटा भी गयाअपने ऊपर हुए अत्याचारों से परेशान मुराद लगातार भागने की फिराक में रहती थीं और अंतत:मोसूल के एक मुसलमान परिवार की सहायता से वह भागने में कामयाब रहीं। वह बताती हैं कि गलत पहचान पत्रों के जरिए वह इराकी कुर्दिस्तान पहुंची और वहां शिविरों में रह रहे यजीदियों के साथ रहने लगीं। वहां उन्हें पता चला कि उनके छह भाइयों और मां को कत्ल कर दिया गया है। इसके बाद यजीदियों के लिए काम करने वाले एक संगठन की मदद से वह अपनी बहन के पास जर्मनी चलीं गईं। आज भी वह वहां रह रही हैं। मुराद ने अब अपना जीवन ‘अवर पीपुल्स फाइट’ के लिए समर्पित कर दिया है।
साभार- टाइम्सनाउन्यूज

बुधवार, 1 अगस्त 2018

जरा देख के चलाे आगे भी ,पीछे भी- डा. अनुजा भट्ट

 हर  जगह गंदगी के ढ़ेर बीमारी के न्याैता दे रहे हैं। बाढ़ के साथ प्लास्टिक कचरा और गंदगी  स्वच्छ  भारत की असली तस्वीर दिखा रहे हैं। मैदानाें में ही नहीं पहाड़ाें में भी यही हाल है। पर्यटन के  भी अब कई रूप सामने दिखाई दे रहे हैं। अब सिर्फ घूमने के लिए ही लाेग नहीं जाते। इसके अलावा वह दुरूह जगहाें में भी जाना चाहते हैं।  ट्रैकिंग के लिए युवाआें में सबसे ज्यादा जाेश है। वह अपने ग्रुप में घूमने जाते हैं । उनके लिए घूमने का मततब एडवैंचर से है। वह इससे कई नई बातें भी सीखते हैं। कई कारपाेरेट कंपनियां भी ट्रैंकिंग के लिए अपने इम्प्लाई काे ले जाती हैं।
  एक खबर के मुताबिक बर्फ से ढकी रहने वाली कुल्लू और लाहाैर स्फीति की चाेटियाें पर ट्रैकर और सैलानी भरी मात्रा में कचरा और प्लास्टिक फेंक रहे हैं। पर्यावरण विशेषज्ञ इसे ग्लेशियराें के लिए खतरे की घंटी मान रहे हैं। इससे स्थानीय तापमान पर भी असर पड़ रहा है और ग्लेशियर जल्द पिघल रहे हैं। अभी हाल ही में आेनएनजीसी और इंडियन माउंटेनिंयरिंग फाउंडेशन की टीम ने राेगतांग से कुंजुम दर्रे और चंद्रभागा रेंज तक सफाई अभियान चलाा। टीम ने पूरे इलाके से 150 बाेरी प्लासिटक समेत कूड़ा कचरा निकाला। ट्रैकर चाेटियां पर खानेपीने की चीजाें का उपयाेग  कर वहीं फेंक देते हैं। इतना कचरा मिलना खतरे क घंटी है। जिससे ग्लेशियर पिघलेंगे ताे तापान में असर पड़ेगा।
 सरकार काे चाहिए की वह इसके लिए सख्त कदम उठाए और कड़ी सजा का प्रावधान बने। लेकिन एेसी नाैबत ही क्याें आए। क्या हम सबका अपने पर्यावरण काे लेकर सजग हाेना जरूरी नहीं। क्या हम प्रकृति के विकराल रूप काे देखना चाहेंगे। क्या हम चाहेंगे  कि महामारी फैले. ज्वालामुखी या भूंकप अपना उसर दिखाएं। क्या हम चाहेंगे नदी अपना विकराल रूप ले, या बारिश कहर बरपाए....  अगर इसका उत्तर नहीं है ताे भाई जरा देख के चलाे आगे भी पीछे भी....

शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

राेटी कपड़ा और मकान- डा. अनुजा भट्ट


राेटी, कपड़ा और मकान. मध्यमवर्ग के हसीन सपने में इससे ज्यादा और कुछ नहीं हाेता।  वह अपने जीवनभर की कमाई अपना घर बनाने में लगा देता है। कहते हैंअगर छत का जुगाड़ हाे जाए ताे बाकी और चीजाें का बंदाेबस्त करना आसान हाे जाता है इसलिए लाेग मकान बनाने या खरीदने काे प्राथमिकता देते हैं। किराए के घर में व्यक्ति खुद काे सुरक्षित महसूस महीं करता।  दूसरी महत्वपूर्ण बात यह भी है कि मकानाें का किराया भी लगातार बढ़ताजा रहा है। एेसे में बैंक लुभावने आफर के साथ ग्राहकाें  काे आकर्षित करते हैं। किराया देने से ज्यादा अच्छा ईएमआई देना लगता हैं। यहां कम से कम कल काे घर ताे अपना हो जाएगा। एेसे में लोग घड़ाघड़ मकान खरीदने में लग जाते हैं। हर शहर एक कंकरीटी शहर में तब्दील हाेता जा रहा है। हर जगह इमारतें खड़ी हैं। एक से एक बढ़कर आलीशान इमारतें। घर का रूपरंग भी बदल गया है। अपरार्टमेंट्स में हर तरह की सुविधा है। स्वीमिंग पूल से लेकर रेस्तरां,हाल जैसी सुविधाएं देकर माेटी रकम  वसूली जाती है।
 लेकिन पिछले 2 महीने ले लगातार मकान गिरने, छत गिरने, दीवार गिरने जैसी घटनाएं दहशत पैदा कर रही हैं। मकान कहीं से भी सुरक्षित नहीं हैं। भवन निर्माण में जाे सामग्री का  उपयाेग किया गया है वह बहुत खराब है। लाेगाें की मेहनत की जमापूंजी के साथ  खरीदे गए मकानमालिकाें के सात इस तरह का खिलवाड़ करने वालाें के लिए कठाेर सजा का प्रावधान जब तक नहीं हाेगा इस तरह की घटनाएं हाेती रहेंगी।
 भवन निर्माण  में उपयाेग में लाई जाने वाली  सामग्री की जांच जब तक बना हेराफेरी के  नहीं हाेगी जब तक कट कमीशन का खेल चलता रहेगी तब तक स्थितियां नहीं बदलेंगी।  रेड़ी में समान बेचने वाले से जब आप कहते हैं इतना मंहगा क्याें दे रहे हाे ताे वह तपाक से कहता है मुझे देना भी ताे पड़ता है। मैं अपने बच्चाें का पेट न पालूं।सब्जी बाजार  काे या हफ्ता बाजार हर  जगह पुलिस वाले सुरक्षा के लिए कम हफ्ता बाजारी के लिए ज्यादा घूमते हैं। यह ताे एक छाेटा सा उदाहरण है। बाकी तस्वीर ताे आप देक ही रहे हैं। मकान गिर रहे हैं सड़के टूट रही हैं जमीन धंस रही है....
राेटी कपड़ा और मकान की ख्वाइश भी दम ताेड़ रही है।

गुरुवार, 26 जुलाई 2018

भूखे रहकर भी मुस्कुराती थी लड़कियां- डा.अनुजा भट्ट

गरीब के रुदन के आंसुओ की आग हूँ, भूख के मजार पर जला हुआ चिराग हूँ|
मेरा गीत आरती नही है राज पट की, जगमगाती आत्मा है सोये राज घट की|
मेरा गीत झोपडी के दर्दो की जुबान है, भुखमरी का आइना है, आंसू का बयान है|
भावना का ज्वार भाटा जिये जा रहा हू मै, क्रोध वाले आंसुओ को पिए जा रहा हू मै|
मै स्वयं को आज गुनेहगार पाने लगा हू, इसलिए मै भुखमरी के गीत गाने लगा हू|
मुझे मेरा पूरा देश आज क्रुद्ध चाहिए, झोपडी की भूख के विरुद्ध युद्ध चाहिए|
कवि : हरी ओम पवार की यह कविता आज की घटना पर सीधा हस्तक्षेप करती है। एक तरफ बलात्कार की खबरें, मासूम बच्चियाें की जिंदगी के साथ खिलवाड़ ताे दूसरी तरफ भुखमरी से हुई तीन बच्चियाें की माैत की खबरें।हर खबर के केंद्र में हैं बच्चियां। याैन उत्पीड़न से लेकर खाने न मिलने तक। कैसा समाज है यह जहां लड़कियाें के प्रति इतना निर्मम रवैया है। खाने न मिलने से तड़प तड़प कर हुई इस माैत ने देश की तस्वीर समाने रख दी है। खाने के लिए पैसा नहीं है पर पिता अपन लिए शराब का जुगाड़ कर लेता है। क्या शराब मुफ्त में मिलती है। और अगर एेसा व्यक्ति जाे मुफ्त में शराब पिला सकता है। मुफ्त में खाना नहीं खिला सकता। हताशा के भंवर में शराब का तिलस्म कारगर हाे जाता है ताे हताशा के भंवर में फंसे व्यक्ति की एनजीआे मदद क्याें नहीं करते। उनके लिए उनके हिसाब से राेजगार के अवसर क्याें नहीं मुहैया करवाते।
रिक्शा चलाकर भी घर चलाया जा सकता है। बशर्ते आप खुद काे हताश के भंवर में न जाने दें और एेसे लाेगाें से सावधान रहे जाे आपकाे नशे का आदी बना रहे हैं। नशा आपके पूरे परिवार काे सड़क पर ला देता है और आप कुछ नहीं कर पाते। मैं एेसे बहुत से लाेगों काे जानती हूं जाे किसी फैक्ट्री में मजदूर है और नाैकरी के बाद सुबह शाम 2 घंटा रिक्शा चलाते हैं। बच्चाें काे पब्लिक स्कूल में पढ़ाते हैं और उनकी बीवी भी कामकाज करती हैं।

बहुत बार हम खबराें में देखते हैं कि रिक्शा वाले के बच्चे ने मेडिकल इंजीनियरिंग की परीक्षा पास की।
लेकिन जब हाैंसले ही पस्त हाे जाएं ताे फिर क्या हाे सकता है। इन सारी घटनाआें में शराब का रिश्ता सबसे अहं है। कभी अवसाद में शराब पी जाती है ताे कभी उत्तेजना के लिए। और दाेनाें में ही अपराधी यह कहकर छूटने का प्रयास करता है कि वह हाेश में नहीं था। लेकिन जनाब एेसा कहने से काम नहीं चलेगा। बच्चियां आपकाे कभी माफ नहीं करेंगी। न सरकार काे और न आपकाे। जिम्मेदारी ताे बनती है ना....

मंगलवार, 24 जुलाई 2018

डर्टी अंकल- डा.अनुजा भट्ट

 बच्चियाें के साथ  क्रूरता की सारी  हदें पार हाेती जा रही हैं और हम सिर्फ तमाशा देख रहे हैं। सचमुच एक तमाशा ही तो बन गए हैं हम। हम यानी बच्चियां, हम यानी लड़कियां हम यानी महिलाएं हम यानी मादा हम यानी स्त्री लिंग..
 स्कूल से लेकर कालेज, आफिस से लेकर बाजार, बस स्टेंड, आटाे स्टेंड, रेस्तरां, पब, हाेटल हर  जगह हम पर हमले हाे रहे हैं। हम  इंसान न हाेकर हवस मिटाने का एक साधन बन गए हैं। 6 माह की बच्ची भी इससे अछूती नहीं है। अपराध करने वालों की उम्र 10 साल से लेकर 80 साल तक है। माेबाइल पर अश्लील फिल्म देखकर 10 साल के 3 बच्चाें ने 8 साल की लड़की के साथ घिनाैनी हरकत की। यह खबर अभी हाल की ही है।  आखिर उन बच्चाें काे इतनी हिम्मत किसने दी। किसने दिए अवसर की वह माेबाइल पर फिल्म देखें।
 बच्चे जानते हैं कुछ नहीं हाेने वाला। वह सजा से भी नहीं डरते। उनकाे अपने माता- पिता की इज्जत से भी लेना देना नहीं क्याेंकि वह इज्जत शब्द के मायने ही नहीं जानते। उनकाे इस तरह ज्ञान देने वाले माता-पिता हाेते ताे वह शायद न एेसी फिल्म देखने का साहस कर पाते और न एेसा घिनाैना काम।
 हमारी बच्चियां दिनाेदिन घर में कैद हाेती जा रही हैं। हम उनकाे खेलने से भी वंचित करने लगे हैं। शायद एेसा समय न आ जाए कि हम उनकाे स्कूल भेजने से भी डरने लगे। लेकिन यह रास्ता नहीं है, समाधान नहीं है। आखिर हम अपनी बच्चियाें काे उनकी मंजिल पाने में बाधा कैसे दे सकते हैं।  वह भी एेसे समय में जब खेल से लेकर पढ़ाई हर जगह वह इस तमाम विषमताआेंके बावजूद अपनी शाेहरत कमा रही हैं।
डीपीएस की उस छाेटी सी बच्ची के हाथ में जब एक छाेटी सी गुड़िया और एक कैप वाला गुड़्डा  दिया गया ताे उसने कहा। कैप वाला गुड्डा नहीं हाे सकता वह ताे डर्टी अंकल है। वह डर्टी अंकल लाइफ गार्ड था।  इस घटना ने डीपीएस ग्रेटर नाेएडा काे पूरी दुनिया के सामने रख दिया है। लेकिन न यह स्कूल बंद हाेगा और न हीं कुछ और हाेगा। स्कूल बंद हाे जाने से वहां पढ़ रहे और बच्चाें का क्या हाेगा.. वह कहां जाएंगे। स्कूल बंद करना समाधान नहीं है। साेचना यह है कि इस तरह की घिनाैनी हरकताें पर लगाम कैसे लगाई जाए।  इस तरह के अपराधी काे कड़ी से कड़ी सजा जल्द से जल्द मिले।  मैं ताे चाहती हूं कि जाे भी इस तरह के कृत्य करें उसे नपुंसक बना दिया जाए।
  

सोमवार, 23 जुलाई 2018

मॉब लिंचिंग- खूंखार और बर्बर समाज की तरफ जा रहे हैं हम डा. अनुजा भट्ट


जीवनमूल्याें काे ठेंगा दिखाते हुए जिस तरह का समाज विकसित हाेता जा रहा है सच कहूं ताे डर लगने लगा है। भीड़ द्रारा हिंसा की खबरें लगातार बढ़ती जा रही हैं। सवाल यह है  कि आखिर भीड़ का इतना राैद्र रूप क्याें है। इतनी उत्तेजना और गुस्सा क्याें है. हम मारने पर क्याें तुले हैं। किसी की हत्या कर देना इतनी मामूली सी बात क्याें बनता जा रहा है।
अपराधाें की लिस्ट इतनी लंबी क्याें हाेती जा रही है। अगर आप किसी भी दिन अखबार काे ध्यान से देखें ताे पाएंगे कि अपराध की खबराें के आगे समाज सराेकार से जुड़ी खबरें एकदम हाशिए में हैं। समाज में अपनापन, प्यार, एक दूसरे के प्रति सद्भाव, विश्वास और आदर एकदम खत्म हाेता जा रहा है। क्या हाे सकती हैं इसकी वजहें। कुछ का कहना है कि जैसे जैसे हम तकनीक के रूप में विकसित हाेते जा रहे हैं मानवीय स्तर पर हम कमजाेर हाेते जाते हैं।  हमारे भीतर साझेदारी  समाप्त हाे गई है। हमें किसी की काेई जरूरत नहीं।
पासपड़ाैस शब्द गायब हाे गया है। माैहल्ला नहीं रहा। सब अपने फ्लैट में बंद हैं। आपके हाथ में चाबी और माेबाइल है ताे आप समझते हैं  कि सारी दुनिया आपकी मुट्ठी में है।  अगर यह दाेनाें चीजें आपके हाथ से छीन ली जाएं ताे आप चिल्लाने लगते हैं मारपीट करते है , जान भी ले सकते हैं। आप पड़ाैसी का नाम नहीं जानते। तकलीफ में गार्डरूम मे फाेन करते हैं। आसपास के अस्पताल की काेई एंबुलेंस आपके दरवाजे पर आ जाती है।
 पहले आपके घर में चीनी नमक खत्म हाेता था ताे पड़ाैस याद आता था अब आपकाे माेबाइल याद आता है। मेहमान के घर पहुंचने से पहले सामान घर पर है।
 आपकाे किसी की जरूरत महसूस नहीं हाेती जब तक आपके पास पैसे हैं। आपकाे लगता है सब कुछ खरीदा जा सकता है। एेसे में आपके भीतर ऊर्जा लगातार चार्ज रहती है। क्याेंकि उसका उपयाेग कैसे करना है यह आप भूल गए हैं। यह एक सकारात्मक ऊर्जा हाे सकती थी। किंतु नकारात्मक हाे गई। इसलिए कि इस ऊर्जा के लिए संवेदना साहचर्य और सहयाेग की जरूरत हाेती है। वह आपके भीतर पैदा ही नहीं हुई क्याेंकि आपके घर में अब न नमक ख्नतम हाेता है न चीनी। सच कहूं ताे लाेग आजकल घर में आना जाना पसंद नहीं करते। वह इसे  अपनी प्राइवेसी का हनन मानते हैं।
  आपके भीतर की यही उर्जा आपके गुस्से में तब्दील हाेती जा रही है। और आप इसे एेसे किसी भी जगह निकाल देने पर आमादा हैं, जहां से आपका काेई सराेकार नहीं। आप भीड़ में शामिल है, कभी आप पत्थर मारते हैं कभी जान लेते हैं। और बेकसूर काे मरने के लिए छाेड़ देते हैं।
आप चाहें ताे इस गुस्से काे प्यार में बदल सकते हैं। दुआ सलाम काे आदत में शामिल कर सकते हैं। बिना माेबाइल के कुछ समय जाना सीख सकते हैं। पड़ाैसी का दरवाजा खटखटा सकते हैं। मदद कर सकते हैं मदद मांग सकते हैं। उदारता आपकाे वह खुशी दे सकती है जाे आपकाे न मंहगी गाड़ी दे सकती हैं न मंहगे फाेन और न आपका स्टाइल स्टेट्स.।उदारता आपकाे वह दवा दे सकती है जाे किसी मैडिकल स्टाेर में नहीं मिलती। उदारता से बहुत लाभ है । सबसे पहला कि आपकाे वह कभी अकेला नहीं छाेड़ती।

रविवार, 29 अप्रैल 2018

आप गलत रास्ते में हैं- डा. अनुजा भट्ट


क्या आपकाे लगता है कि साधु संन्यासी आपकी समस्या का हल निकाल सकते हैं। आत्मिक शांति का रास्ता क्या साधु संताें के जरिए ही पाया जा सकता है। आखिर क्या वजह है कि इनके भक्ताें की संख्या कराेड़ाें में है। महिला भक्ताें का आकड़ा सबसे ज्यादा है। क्या यह संत ईश्वर के पर्याय हैं।
यह जाे उपदेश हर राेज देते हैं क्या उसका अंश भर भी खुद पर अमल करते हैं। उपनिषद, महाभारत, रामायण, वेद, गुरुग्रंथ , संतवाणी का सार संदेश जाे यह अपने भक्ताें काे देते हैं क्या भक्त भी उसे स्वीकार करते हैं। अगर एेसा है ताे इतना भ्रष्टाचार, अन्याय और अनैतिकता का माहाैल क्याें सर्वव्याप्त है। हमारा खुद पर क्याें भराेसा उठ गया है।
महिलाएं जिस शांति की शरण के लिए इन के पास जाती है वह असली जगह नहीं हैं। अपने लिए शांति की तलाश वह खुद कर सकती हैं। अपनी समस्याआें का निदान खुद पा सकती हैं। आपकी समस्याएं हैं। बहुत तरह की समस्याएं हैं। पर सबसे पहले हमें समस्या क्याें हैं इसे जानना हाेगा और फिर उसके निदान के लिए सही रास्ता चुनना पड़ेगा।
ईश्वर हमारी आस्था का नाम है। और यह आस्था हमारे भीतर के विश्वास काे मजबूत करती है और आत्मविश्वास से भर देती है। हमें अपने भातर के ईश्वर से खुद साक्षात्कार करना हाेगा। काेई संत ईश्वर के साथ हमारा समागम नहीं करा सकता। दर असल यह सब एक मकड़जाल है। इस मकड़जाल में नेता से लेकर आमजन तक हर आदमी जकड़ा हुआ है जकड़ता जा रहा है। वह बिना मेहनत के सब कुछ हासिल करने का ख्वाब सजा रहा है। इसलिए कभी काला पर्स मशहूर हाे जाता है ताे कभी कुछ।
अगर आप निःसंतान है ताे डाक्टर की राय ही आपके लिए महत्वपूर्ण है। और अगर आप बेराेजगार है ताे आपकाे देखना हाेगा कि आप क्या कर सकते हैं और कैसे कर सकते हैं। अगर पारिवारिक समस्या है ताे उसे सुलझाना भी परिवार के साथ ही है। और अगर बच्चे नालायक हैं ताे उसे सुधारने की चाबी भी आपके पास ही है।
अपने मन में संकीर्तन कीजिए। अपने मन काे साफ कीजिए। अपने भीतर प्यार, उदारता और ईमानदारी पैदा कीजिए। आपके सारे डर छूमंतर हाे जाएंगे। मजबूत बनिए। आज सबसे ज्यादा तकलीफ में महिलाएं ही हैं। उनके साथ उनकी बच्चियाें के साथ बलात्कार हाे रहा है, हिंसा हाे रही है। हत्या हाे रही है। वह शाेषण का शिकार बनती जा रही है। अखबार का हर पन्ना इसी तरह की खबराें से भरा है। सनसनी खेज अपराध के वीडियाे वायरल हाे रहे हैं। अश्लील सीडी पकड़ी जा रही हैं। पर सच और भी कुछ है।
वह मजबूत भी हाे रही हैं। उनके सपनाें का आकाश साफ हाे रहा है। 4 साल की बच्ची के साथ भी पढ़ाई करके वह आईएएस की परीक्षा में दूसरे नंबर पर आती है। पहलवानी से लेकर तीरंदाजी और हाकी से लेकर क्रिकेट तक में उसने मैडल अपने नाम कर लिए हैं।
पर यह आकड़ा अभी बहुत है। हमें इस आकड़े के ग्राफ काे बढ़ाना है। अखबार के हर पन्ने में जब महिलाआें की सफलता की कहानियां हाेगी तभी सच्ची आजादी हाेगी। इसके लिए बस हमें अपनी समस्या और उसके निदान के सही रास्ते पर नजर रखनी हाेगी। साधु समाज का यह रास्ता आपकाे गलत रास्ते पर ले जा रहा है।

रविवार, 15 अप्रैल 2018

पर्दे में रहने दाे पर्दा न उठाआे- अंतिमा सिंह



दोस्तों आज मैं आपसे कुछ ऐसी बाते शेयर कर रही हूं जिसमें आपकी सहमति और असहमति कुछ भी हाे सकती है। हाे सकत है मेरी बातें पुराने जमाने की लगे ... आजकल समाज मे आधुनिकता के नाम पर सब कुछ खुला होता जा रहा है कहीं सोशल मीडिया पर फिल्मी सितारे और हमारे युवा सैनेटरी पैड हाथ मे लेकर सेल्फी पोस्ट कर कर बहुत गर्व महसूस कर रहे है ..
कहीं टीवी पर न्यूज़ चैनल के बीच मे कंडोम के ऐड में उनके तरह तरह के फ्लेवर बता कर मॉडल अपनी बोल्डनेस का परिचय दे रही है ..
.कहीं सीरियल में हनीमून के अंतरंग दृश्यों को बच्चों के सामने परोसा जा रहा है कहीं रियलिटी शो में गर्लफ्रैंड को वैलेंटाइन डे पर कैसे प्रपोज़ किया जाए इसका लाइव प्रसारण हो रहा है ...
कहीं क्रिकेट के बीच मे कोकाकोला पी कर लड़कियों को इम्प्रेस करना दिखाया जा रहा है कहीं परफ्यूम के एड में बैडरूम के सीन को दिखाया जा रहा है ..

..क्या ये सब हमारे समाज के लिए सही है क्या इतना खुलापन हमारे बच्चों पर बुरा असर नही डालता आजकल के बच्चों का दिमाग वैसे भी पुराने जमाने के मुकाबले तेज़ चलता है हर घर मे टीवी , मोबाइल , लैपटॉप है ज्यादातर घरो में अनलिमिटेड इंटरनेट कनेक्शन और केबल टीवी उपलब्ध है हम अपने छोटे बच्चों को इससे दूर नही रख सकते...

पहले ज़माने में तो सिर्फ कुछ समय के लिए दूरदर्शन उपलब्ध होता था उसमें भी केवल ज्ञानवर्द्धक प्रोग्राम और सीरियल आते थे जिसमें बच्चों और बड़ो को केवल पारिवारिक बाते और संस्कार दिखाए जाते थे इसी कारण उस सदी में क्राइम का रेट कम रहा ...
हमारे मातापिता हमसे कुछ बाते छिपा कर रखते थे ऐसा नही की वो हमें ज्ञान से वंचित रखना चाहते थे ,बल्कि हमारे बड़ो का मानना था कि कुछ बाते पर्दे में ही रहनी चाहिए वक़्त आने पर और एक उम्र के बाद ही अगर ये बाते धीरे धीरे सामने आए तो ही समाज के लिए सही है
कुछ लोगो को पढ़कर लग सकता है कि मेरे विचार बहुत पुराने ख्यालो के है लेकिन दोस्तो कुछ बातें एक उम्र के बाद ही सामने लायी जाए तो हमारे लिए और समाज के लिए दोनो के लिए बेहतर है ...
आप ही बताइए क्या एक 4 या 5 साल के बच्चे को कॉन्डोम के बारे में जानना आधुनिकता है? एक 4 साल का बच्चा व्हिस्पर की एड देखकर सवाल करे कि मम्मी ये क्या है ? तो उसको बताना और समझना  मुश्किल होगा ।
अगर वो सैनिटरी पैड के साथ सेल्फी लेने को जिद करे या वो उसे पकड़कर खेले तो क्या ये आपको अच्छा लगेगा ? ...उसका बालमन अभी इतना विकसित नही हुआ कि उसे महिलाओं के पीरियड के बारे में ज्ञान दिया जाए ....
आजकल छोटे छोटे बच्चे टीवी या फिल्मों में अश्लीलता भरे विज्ञापन या गाने देखकर उनकी तरफ आकर्षित होते है क्योंकि उनके मन मे जिज्ञासा होती है कि ये सब क्या होता है तभी तो आजकल स्कूलों में भी 5 या 7 साल के बच्चे अपने ही उम्र के बच्चे के साथ यौन शोषण करते पाए गए है....
इसलिए इतना खुलापन हमारे समाज के बच्चो और युवा पीढ़ी को गलत दिशा की ओर ले जा रहा है इसी खुलेपन और आधुनिकता के कारण आजकल टीनएज लड़के लडकिया सेक्स की तरफ आकर्षित होकर अपनी जिंदगी से खिलवाड कर रहे है छोटी उम्र की लड़कियां गर्भनिरोधक गोलियों का सेवन बेझिझक कर रही है ...
इतने खुलेपन और आजादी के कारण ही समाज मे एक संस्कार विहीन पीढ़ी तैयार हो रही है ...
ये सब आधुनिकता नही बल्कि हमारी संस्कृति और संस्कारो के साथ खिलवाड़ है ...
आप ही बताइए जब सब कुछ एक पर्दे में था तब समाज के लोग ज्यादा संस्कारी और रिश्तों को समझने वाले थे
या अब जब लोग हाथ मे कंडोम और व्हिस्पर के पैकेट लेकर सड़को और कॉलेज कैंपस में घूम रहे है ,सोशल मीडिया पर अपनी सेल्फी पोस्ट कर के मॉडर्न होने का दिखावा कर रहे है ...
जरूरी नही की ये सब बातें चिल्ला चिल्ला कर समाज के सामने लायी जाए इन सब बातों की जानकारी सही उम्र आने पर भी बताई जा सकती है जैसे उनकी उम्र के मुताबिक उनके सिलेबस में ऐसे टॉपिक को शामिल किया जाए, जिस प्रकार सरकार प्लस पोलियो कार्यक्रम चलाती है उसी प्रकार घर घर जाकर महिलाओं और बच्चीयों को मुफ्त सैनेटरी पैड दिए जाएं ..
गली मोहल्लों में मोबाइल वैन द्वारा मासिक धर्म और गर्भ निरोधक उपायों के बारे में शिक्षाप्रद लघु नाटिका दिखाई जाए ...
जब प्लस पोलियो जैसा बड़ा अभियान भारत मे सफलता से चलाया जा सकता है तो फिर मुफ्त सैनेटरी पैड योजना गांव और शहरों में क्यों नही सफलता से चलाई जा सकती ...
केवल आधुनिकता का दिखावा कर समाज के कुछ लोग अपनी पब्लिसिटी के लिए समाज मे अश्लीलता परोस रहे है अब ये आपको सोचना है कि आप के बच्चो के लिए क्या सही है अंत मे मै तो यही कहना चाहूंगी कि
" पर्दे में रहने दो परदा ना उठाओ .....
आपके सकरात्मक और नकरात्मक दोनों कॉमेंट का दिल से स्वागत है .

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बारिश के माैसम में बात करेंगे फैशन की - डा. अनुजा भट्ट

रिमझिम फुहार हाे और पार्टी करने का मन हाे  खाने पीने का सब बंदोबस्त हाे ताे बस एक सवाल परेशान कर देता है । आज पहने क्या। ताे दाेस्ताें जब मा...