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मंगलवार, 25 अगस्त 2026

तख्तियां कविता- डॉ. अनुजा भट्ट


जहां तुम शिखर हो, वहां वह शून्य है,
जहां तुम शून्य हो, वहां वह शिखर है,
और जहां दोनों समतल हैं,
बस वहीं जीवन में समरसता का स्वर है।
पर यह मार्ग कठिन है!
यहाँ खोजनी हैं कुछ विलक्षण बातें—
अंबर में चमकते तारों जैसी,
लहरों पर तैरती किरणों जैसी।

कोशिश करो, इसे एक खेल बना लो,
तुम उसकी खूबियों की सूची सजाओ,
अपनी कमियों का हिसाब उसे सौंप दो।
और फिर बैठ जाना किसी शाख पर—
जिसमें बची है कुछ हरियाली,
या नरमाई से सूख चुकी हो कोई डाल...
बस बैठ जाना, पक्षियों के गीतों और पत्तियों की सरसराहट के बीच।

वहां तुम अपनी बुराइयां सुनना जी भरकर,
दिल खोलकर करना उनका स्वागत।
हर कमी पर ठहाके लगाना, खुलकर हंसना,
और अपने भीतर का मनस्ताप और अंतर्मन का बिखराव—
सब बाहर बहा देना!
किसी भीतर थमी विषैली हवा की तरह...
मालूम है, यह बहुत कड़वा होगा,
होना ही है!
उसके बाद खिलेगा चट्टान के भीतर से अनूठा ब्रह्मकमल!

जिस धरातल पर हम हैं, वहां अब संकोच की गुंजाइश नहीं,
कुछ पलों के ठहराव के बाद, खुलकर लेना प्राणवायु।
यह सब इतना सहज नहीं, जितना कहना,
लिख दिया मैंने जिस तरलता से, उतना आसान नहीं नीलकंठ बनना!
'निंदक नियरे राखिए' से लेकर 'आग का दरिया' तक,
न जाने कितनी उक्तियाँ हैं,
उतनी ही तख्तियां हैं...
और उन तख्तियों पर उकेरे हुए, सदियों पुराने अनाम शब्द।

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

अनुजा काफी दिन बाद तुम्हारा लिखा हुआ पढ़ा , बहुत बढ़िया।

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