verification

#fashionwithanuja लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
#fashionwithanuja लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 1 सितंबर 2026

साड़ियाें में भी समाएं हैं कृष्ण – डा. अनुजा भट्ट

पिछवाई साड़ी और कन्हाई की कहानी


भारत का एक मशहूर राज्य है राजस्थान। मैं यहां से कई तरह के संग्रह आपके लिए लाती हूं। इसी तरह भारत के हर राज्य की कला और कलाकार से जुड़ने का अवसर भी मुझे मिलता है। यह सारा काम काफी श्रमसाध्य है पर मुझे आनंद आता है। मुझे यहां कई कहानियां और किवदंतियां मिलती है। जैसे जैसे राह चलती हूं ईश्वर और फैशन की गलियां पुकारने लगती हैं। आप जब कभी राजस्थान गए होंगे तब आपने नाथद्वारा में श्रीनाथ मंदिर अवश्य देखा होगा। राजस्थान के नाथद्वारा में भगवान श्रीनाथ जी का मंदिर काफी लोकप्रिय जो है ।

श्रीनाथ जी मंदिर राजस्थान के राजसमंद जिले के नाथद्वारा शहर में स्थित है। यह उदयपुर से 50 किमी. और डबोक एयरपोर्ट से 58 किमी. दूरी पर स्थित है।

किंवदंती और इतिहास

श्रीनाथजी के स्वरूप या दिव्य रूप को स्वयं प्रकट कहा गया है। पौराणिक कथा के अनुसार ,

सोमवार, 24 अगस्त 2026

मटका सिल्क: परंपरा और फैशन का मेल



भारत की समृद्ध हथकरघा (Handloom) विरासत में कई ऐसे वस्त्र हैं जो अपनी बनावट और सादगी से दिल जीत लेते हैं। इन्हीं में से एक है—मटका सिल्क (Matka Silk)। इसे "सिल्क का लिनेन" भी कहा जाता है। अत्यधिक तड़क-भड़क और तेज चमक के बजाय, मटका सिल्क अपनी अनूठी खुरदरी बनावट (Slubbed Texture) और गरिमामयी 'मैट फिनिश' के लिए जाना जाता है। आज यह पारंपरिक साड़ियों के दायरे से बाहर निकलकर मॉडर्न फैशन और लक्ज़री होम इंटीरियर का एक अहम हिस्सा बन चुका है।
मटका सिल्क का जन्म और बनावट
मटका सिल्क मुख्य रूप से शहतूत के रेशम (Mulberry Silk) के वेस्ट या कटे-फटे कोकूनों से तैयार किया जाता है। पश्चिम बंगाल (मालदा और मुर्शिदाबाद) और वाराणसी इसके मुख्य बुनाई केंद्र हैं। इसके धागे को हाथ से काता जाता है, जिसके कारण इसमें जगह-जगह छोटे-छोटे उभार या गांठें (slubs) आ जाती हैं। यही खुरदरापन मटका सिल्क को एक अनूठा और ऑर्गेनिक लुक देता है। यह कपड़ा वजन में हल्का, हवादार और हर मौसम में पहनने के लिए बेहद आरामदायक होता है।
मटका सिल्क के विविध उपयोग (फैशन से लेकर इंटीरियर तक)
मटका सिल्क की सबसे बड़ी खूबी इसका लचीलापन और मजबूती है। यही कारण है कि इसका उपयोग केवल साड़ियों तक सीमित नहीं है। आइए जानते हैं कि आप इसे अपने जीवन में किन अलग-अलग तरीकों से शामिल कर सकते हैं:
1. एथनिक और फॉर्मल वियर (Traditional & Formal Fashion)
  • शाही साड़ियाँ: मटका सिल्क की ज़री बॉर्डर, जमदानी मोटिफ्स या ब्लॉक प्रिंट वाली साड़ियाँ शादियों, त्योहारों और कॉरपोरेट मीटिंग्स के लिए बेहतरीन विकल्प हैं। यह बेहतरीन फॉल (fall) देती हैं और पहनने पर बेहद शालीन लगती हैं।
  • क्लासिक सूट और शेरवानी: पुरुष और महिलाएँ दोनों ही इसके अनस्टिच्ड फैब्रिक (थान के कपड़े) से कुर्ते, नेहरू जैकेट, अचकन और शेरवानी सिलवा सकते हैं। इसकी कड़क बनावट (crisp texture) पुरुषों के एथनिक वियर को एक बेहतरीन और सधा हुआ ढांचा (structure) देती है।
2. फ्यूजन और वेस्टर्न फैशन (Contemporary Fusion)
  • इंडो-वेस्टर्न जैकेट्स और ब्लेजर्स: यदि आप ऑफिस या किसी खास इवेंट के लिए फॉर्मल लुक चाहते हैं, तो मटका सिल्क से बने ट्रेंच कोट, ब्लेजर्स या लॉन्ग केप्स (capes) पहन सकते हैं। यह फॉर्मल कपड़ों को एक खादी जैसा रॉ और रिच लुक देता है।
  • फ्लेयर्ड स्कर्ट्स और ड्रेसेस: मटका सिल्क के थान से बनी अनारकली ड्रेसेस या लॉन्ग स्कर्ट्स अपनी प्राकृतिक वॉल्यूम (घेर) के कारण बेहद खूबसूरत लगती हैं।
3. लक्ज़री होम इंटीरियर (Luxury Home Interiors)
मटका सिल्क अपनी मजबूती और शानदार बनावट के कारण होम डेकोर और इंटीरियर डिजाइनर्स की पहली पसंद बनता जा रहा है:
  • प्रीमियम पर्दे (Drapes & Curtains): मटका सिल्क के पर्दे खिड़कियों और दरवाजों पर बहुत सलीके से गिरते हैं। इसकी मैट फिनिश के कारण यह सूरज की सीधी रोशनी को छानकर कमरे में एक बेहद वॉर्म और एलीट (Elite) माहौल बनाते हैं।
  • कुशन कवर्स और दीवान सेट्स: लिविंग रूम के सोफे या दीवान के लिए मटका सिल्क के कुशन कवर्स (विशेषकर अजरख या ब्लॉक प्रिंट वाले) पूरे कमरे के लुक को पलक झपकते ही फेस्टिव और रॉयल बना देते हैं।
  • टेबल रनर्स और मैट्स: डाइनिंग टेबल को एक एथनिक और सस्टेनेबल लुक देने के लिए मटका सिल्क के रनर्स का उपयोग किया जा सकता है, जो क्रॉकरी के साथ बहुत खूबसूरत कंट्रास्ट बनाते हैं।
  • वॉल पैनल्स और लैंपशेड्स: आजकल इंटीरियर में मटका सिल्क फैब्रिक को लैंपशेड्स पर लपेटा जाता है। जब लैंप जलता है, तो सिल्क के धागों की खुरदरी बनावट से छनकर आने वाली रोशनी कमरे को एक विंटेज लुक देती है।
निष्कर्ष
मटका सिल्क केवल एक कपड़ा नहीं, बल्कि भारतीय कारीगरी की एक कला है। चाहे इसे साड़ी के रूप में बदन पर लपेटा जाए, या फिर पर्दों के रूप में घर की दीवारों पर सजाया जाए—इसकी सादगी और रॉयल्टी हमेशा हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लेती है। यदि आप सस्टेनेबल, टिकाऊ और एवरग्रीन फैशन व इंटीरियर के शौकीन हैं, तो मटका सिल्क आपके कलेक्शन में जरूर होना चाहिए। 

सोमवार, 17 अगस्त 2026

चंदेरी: शिशुपाल के साम्राज्य से आधुनिक रैंप तक का सफर- डा. अनुजा भट्ट

महाभारत की वह पौराणिक कथा तो आपने सुनी ही होगी, जो चेदिराज शिशुपाल और भगवान श्रीकृष्ण के प्रसंग के बिना अधूरी है। आज जिस चंदेरी को हम दुनिया भर में इसके वैभवशाली फैशन और पर्यटन के लिए जानते हैं, वह कभी महाभारत काल में चेदि राज्य के राजा शिशुपाल की राजधानी 'शुक्तिमती' थी।

इतिहास और भूगोल का संगम

इस प्राचीन साम्राज्य की भौगोलिक सुंदरता को तराशने का काम करती थी यहाँ की जीवनदायिनी 'केन नदी'। आज की केन नदी को प्राचीन समय में कर्णावत, श्वेनी, कैनास और शुक्तिमति जैसे खूबसूरत नामों से जाना जाता था। मध्य प्रदेश के कटनी ज़िले में विंध्याचल की कैमूर पर्वतमाला से निकलने वाली यह नदी पन्ना के जंगलों से कई धाराओं को समेटती हुई, अंत में उत्तर प्रदेश के बांदा ज़िले में यमुना नदी में जाकर मिल जाती है।शिशुपाल की वही ऐतिहासिक राजधानी 'चंदेरी' आज भी भारत के मानचित्र पर एक गौरवशाली स्थान रखती है। लेकिन इतिहास के पन्नों से निकलकर मेरा मन तो शिशुपाल की उस पौराणिक कथा पर अटक सा गया है, जहाँ से इस शहर की किस्मत की बुनावट शुरू हुई थी। चलिए, इतिहास और भूगोल के इस ताने-बाने के बीच, मेरे साथ सुनिए शिशुपाल की अमर गाथा...

नियति का ताना-बाना: एक विचित्र जन्म और आकाशवाणी
रिश्तों के ताने-बाने को देखें तो शिशुपाल भगवान श्रीकृष्ण की बुआ (वासुदेव जी की बहन) और चेदिराज दमघोष का पुत्र था। इस नाते वह रिश्ते में कौरवों और पांडवों का भाई भी लगता था। लेकिन शिशुपाल का जन्म आम बच्चों जैसा नहीं, बल्कि अत्यंत विचित्र और अलौकिक था। जब उसने आँखें खोलीं, तो उसके तीन नेत्र और चार हाथ थे। अपने नवजात शिशु के इस डरावने और असामान्य रूप को देखकर माता-पिता गहरे असमंजस और चिंता में डूब गए। लोक-लाज और भय के कारण उन्होंने भारी मन से इस विचित्र बालक को त्यागने का फैसला कर लिया।
लेकिन नियति को तो कुछ और ही मंजूर था। जैसे ही वे उसे त्यागने बढ़े, तभी एक गूंजती हुई आकाशवाणी हुई—"इस बालक का त्याग मत करो। जब सही समय आएगा, तो इसके ये अतिरिक्त हाथ और आँख अपने आप गायब हो जाएंगे।" मगर इस दिलासे के साथ ही आकाशवाणी ने एक खौफनाक भविष्यवाणी भी कर दी। उसने चेताया कि—"जिस व्यक्ति की गोद में बैठते ही इस बच्चे के अतिरिक्त अंग गायब होंगे, वही व्यक्ति भविष्य में इसका काल (मृत्यु का कारण) बनेगा।"
रिश्तों की बुनावट: 100 अपराधों का दान और सुलगती दुश्मनी
समय का चक्र बीता और एक दिन भगवान श्रीकृष्ण अपनी बुआ के घर चेदी नगरी आए। वहाँ आँगन में नन्हा शिशुपाल खेल रहा था। उसे देखकर श्रीकृष्ण के मन में अगाध स्नेह जागा और उन्होंने मुस्कुराते हुए उस बालक को अपनी गोद में उठा लिया। गोद का स्पर्श पाते ही एक चमत्कार हुआ—शिशुपाल की वह अतिरिक्त तीसरी आँख और दोनों हाथ पल भर में ओझल हो गए।
इस अलौकिक दृश्य को देखकर शिशुपाल के माता-पिता के चेहरे का रंग उड़ गया; उन्हें वह खौफनाक आकाशवाणी याद आ गई कि श्रीकृष्ण ही उनके बेटे का काल हैं। भय से काँपती माँ ने तुरंत श्रीकृष्ण से अपने पुत्र के जीवन की भीख माँगी। अपनी बुआ को गहरा दुःख न देते हुए और विधि के अटूट विधान का सम्मान करते हुए, श्रीकृष्ण ने एक अभूतपूर्व वचन दिया। उन्होंने कहा—"बुआ, मैं शिशुपाल की सौ (100) गलतियों को पूरी तरह क्षमा कर दूँगा, लेकिन याद रहे, 101वाँ अपराध होते ही उसे अपने कर्मों का दंड भोगना होगा।"
प्रेम, प्रतिशोध और राजसूय यज्ञ का मंच
यही शिशुपाल बड़ा होकर विदर्भ देश की राजकुमारी रुक्मिणी से विवाह का स्वप्न देख रहा था। लेकिन इस कहानी में एक और खूबसूरत मोड़ था; रुक्मिणी मन ही मन द्वारकाधीश श्रीकृष्ण को अपना सर्वस्व मान चुकी थीं। रुक्मिणी के भाई, राजकुमार रुक्मी को श्रीकृष्ण का यह रिश्ता स्वीकार नहीं था और वह अपनी बहन की शादी जबरन शिशुपाल से कराना चाहता था। जब प्रेम पर संकट आया, तो श्रीकृष्ण रुक्मिणी की पुकार पर स्वयं विदर्भ पहुँचे और उन्हें उनके ही महल से ससम्मान अपने रथ पर ले आए।
अपनी होने वाली वधू का इस तरह जाना शिशुपाल के अहंकार पर सबसे गहरी चोट थी। इस घटना ने उसके मन में श्रीकृष्ण के प्रति ईर्ष्या और शत्रुता की ऐसी आग सुलगा दी जो कभी ठंडी नहीं हुई। इसी सुलगते प्रतिशोध के बीच, जब हस्तिनापुर में युधिष्ठिर को युवराज घोषित किया गया और इंद्रप्रस्थ में भव्य 'राजसूय यज्ञ' का आयोजन हुआ, तो देश-विदेश के प्रतापी राजाओं को आमंत्रित किया गया। इस ऐतिहासिक और भव्य आयोजन के गवाह बनने के लिए वासुदेव, श्रीकृष्ण और चेदिराज शिशुपाल भी एक ही छत के नीचे एकत्रित हुए, जहाँ नियति अपना अंतिम खेल रचने वाली थी...
अंतिम न्याय: सुदर्शन चक्र और अहंकार का अंत
राजसूय यज्ञ के उस भव्य और गरिमय मंच पर आखिरकार शिशुपाल का सामना भगवान श्रीकृष्ण से हो गया। यज्ञ की परंपरा के अनुसार, जब महाराज युधिष्ठिर ने अग्रपूजा के लिए श्रीकृष्ण का सर्वोच्च आदर-सत्कार किया, तो सभा में बैठे शिशुपाल के भीतर सुलग रही ईर्ष्या की आग भड़क उठी। श्रीकृष्ण को मिला यह सम्मान उसके अहंकार को बर्दाश्त नहीं हुआ और वह भरी सभा में सबके सामने मर्यादा की सारी सीमाएं लांघकर भगवान श्रीकृष्ण को कटु वचन और गालियाँ देने लगा।
पूरी सभा सन्न थी, लेकिन द्वारकाधीश श्रीकृष्ण के चेहरे पर एक असीम शांति थी; वे शांत मन से आयोजन को देखते रहे। शिशुपाल इसे श्रीकृष्ण की कमजोरी समझ बैठा और लगातार उनका घोर अपमान करता रहा। श्रीकृष्ण अपनी बुआ को दिए उस 'सौ अपराधों' के वचन से बंधे थे, इसलिए वे शांत रहकर एक-एक करके उसकी गलतियों को सहते रहे और मन ही मन उसकी गिनती करते रहे।
जैसे ही शिशुपाल के मुख से सौ (100) अपशब्द पूरे हुए और उसके अहंकार ने सीमा पार करते हुए 101वाँ अपशब्द निकाला, वैसे ही क्षमा का समय समाप्त हो गया। श्रीकृष्ण की उंगली से छूटा अलौकिक 'सुदर्शन चक्र' बिजली की गति से हवा में लहराया और पलक झपकते ही शिशुपाल की गर्दन धड़ से अलग हो गई। इस तरह, उस भव्य आयोजन के बीच चंदेरी के राजा शिशुपाल की कहानी और उसकी शत्रुता का हमेशा के लिए अंत हो गया।
साम्राज्यों की बिसात और जौहर की अमर गाथा
चंदेरी का अतीत सिर्फ महाभारत कालीन राजा शिशुपाल की कथा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह शहर सदियों तक महाशक्तियों की रणभूमि रहा है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो यहाँ की रणनीतिक स्थिति के कारण इस मिट्टी पर गुप्त, प्रतिहार, गुलाम, तुगलक, खिलजी, afghan, गौरी, राजपूत और सिंधिया सहित नौ बड़े राजवंशों ने शासन किया और अपनी संस्कृतियों की छाप छोड़ी।
यहाँ के इतिहास का सबसे शौर्यमयी और हृदयविदारक अध्याय तब लिखा गया, जब मुगल शासक बाबर ने चंदेरी पर आक्रमण किया। बाबर की फतह की खबर सुनते ही, चंदेरी के तत्कालीन राजपूत राजा मेदनी राय की पत्नी महारानी मणीमाला के नेतृत्व में 1,600 वीर क्षत्राणियों ने अपने सतीत्व और सम्मान की रक्षा के लिए एक साथ धधकती अग्नि में 'जौहर' कर लिया। चंदेरी के भव्य किले में स्थित जौहर कुंड के पत्थरों का बदला हुआ रंग आज भी उस महान बलिदान और वीरांगनाओं के रक्त-तर्पण की कहानी बयां करता है।
भव्य धरोहरें और पत्थरों पर उकेरा गया सौंदर्य
आज एक सैलानी के रूप में जब आप चंदेरी पहुँचते हैं, तो करीब 70 मीटर ऊँची पहाड़ी पर शान से खड़ा ऐतिहासिक चंदेरी का किला सबसे पहले पर्यटकों को अपनी ओर लुभाता है। इसके अलावा वास्तुकला के बेजोड़ नमूने जैसे कौशक महल, शांत परमेश्वर तालाब, रहस्यमयी बूढ़ी चंदेरी, शहजादी का रोजा (किला), ऐतिहासिक जामा मस्जिद, रामनगर महल, सिंहपुर महल, विशाल बत्तीसी बावड़ी और यहाँ का आधुनिक म्यूजियम इस शहर को जीवंत इतिहास का खुला पन्ना बना देते हैं।
थूबोन जी: 12वीं शताब्दी का आध्यात्मिक वैभव
चंदेरी के इस वस्त्र और ऐतिहासिक वैभव के बीच एक गहरा आध्यात्मिक कोना भी सुरक्षित है। चंदेरी से महज़ 22 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है—'अतिशय तीर्थ क्षेत्र थूबोन जी'। 12वीं शताब्दी में महान दानी पाड़ाशाह द्वारा निर्मित यह पवित्र जैन तीर्थ क्षेत्र अपने आँचल में 26 भव्य जैन मंदिरों का वैभव समेटे हुए है। पाड़ाशाह वही दूरदर्शी पुरुष थे जिन्होंने बजरंगगढ़, सिरोंजी और देवगढ़ के प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण करवाकर वहाँ भी मूर्तियों की प्रतिष्ठा कराई थी। थूबोन जी के इन शांत और अलौकिक मंदिरों में जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ से लेकर चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी तक की अत्यंत प्राचीन और चमत्कारी मूर्तियां विराजित हैं, जो यहाँ आने वाले हर मन को आत्मिक शांति से भर देते हैं।
भूगोल और प्रकृति का घेरा
शिशुपाल के उस गौरवशाली अतीत से निकलकर यदि हम आज के भौगोलिक ताने-बाने को देखें, तो चंदेरी शहर मध्य प्रदेश के अशोकनगर जिले की एक बेहद खूबसूरत तहसील है। चारों ओर से विंध्याचल की हरी-भरी पहाड़ियों से घिरा यह ऐतिहासिक शहर आज भी बेतवा नदी के दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में अपनी सुध-बुध खोए खड़ा है। आज जिसे हम बेतवा कहते हैं, प्राचीन काल में उसे 'वेत्रवती' नाम से पूजा जाता था। मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के कुम्हारागाँव से निकलने वाली और भोपाल, विदिशा, झाँसी, ललितपुर से होती हुई उत्तर प्रदेश में यमुना से मिलने वाली यह नदी सदियों से इस पूरे क्षेत्र के सौंदर्य और संस्कृति को सींचती आई है।
चंदेरी साड़ी: आठ सौ साल पुराना बुनावट का जादू
पहाड़ियों और नदियों के इस संगम के बीच, आज चंदेरी के कण-कण में हथकरघा (Handloom) का संगीत गूंजता है। यह शहर सदियों से अपने हाथ से बुनी अनूठी साड़ियों के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है, जिन्हें आज दुनिया 'चंदेरी साड़ियों' के नाम से जानती है। यहाँ आने वाले पर्यटक आज भी तंग गलियों के पारंपरिक घरों में बुनकरों को जादुई तरीके से ताने-बाने को बुनते देख सकते हैं और अपनी पसंद की साड़ियों की लाइव खरीदारी कर सकते हैं।
चंदेरी के इस वस्त्र-वैभव का इतिहास बेहद राजसी रहा है। एक दौर था जब पूरे मध्य भारत (मालवा, इंदौर, ग्वालियर, बांदा, गढ़ाकोटा, बानपुर, चरखारी, शाहगढ़, रायगढ़) में काशी की बनारसी साड़ियों का चलन बेहद कम था। उस समय ग्वालियर और इंदौर के राजघरानों की आभिजात्य (Elite) महिलाएं सिर्फ और सिर्फ चंदेरी की पारदर्शी, हल्की और चमकदार साड़ियाँ पहनना पसंद करती थीं। यहाँ तक कि स्वयं वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई भी चंदेरी साड़ियों की मुरीद थीं।
चंदेरी की शाही पगड़ी: राष्ट्रभक्ति और शहादत का ताज
लेकिन चंदेरी का हुनर सिर्फ साड़ियों तक सीमित नहीं था; इसकी सबसे बड़ी और हैरान कर देने वाली ख्याति यहाँ बनने वाली 'शाही पगड़ियों' में थी। पिछले 800 सालों से भारत के तमाम राज परिवारों के बीच चंदेरी की पगड़ी आकर्षण और मान-सम्मान का सबसे बड़ा केंद्र रही है। छत्रपति शाहूजी महाराज, ग्वालियर के महाराजा सिंधिया, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और वडोदरा के राजा सहित दक्षिण भारत एवं महाराष्ट्र के तमाम छोटी-बड़ी रियासतों के राजाओं के लिए विशेष पगड़ियाँ इसी चंदेरी की धरती पर तैयार की जाती थीं।
इन पगड़ियों को बनाने और ले जाने की कला भी किसी रहस्य से कम नहीं थी। राजाओं का एक विशेष, बेहद गोपनीय दस्ता कड़ी सुरक्षा और चाक-चौबंद व्यवस्था के बीच इन पगड़ियों को चंदेरी से राजा के महलों तक पहुँचाता था।
इस गौरवमयी इतिहास का सबसे भावुक और वीर प्रसंग भी इसी चंदेरी की पगड़ी से जुड़ा है। देशभक्ति की प्रतिमूर्ति रानी लक्ष्मीबाई चंदेरी की कला पर इतना अटूट विश्वास करती थीं कि वे अपनी एक खास सहेली को विशेष रूप से चंदेरी भेजकर शाही पगड़ी मँगवाती थीं। जब उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ इतिहास का सबसे भीषण युद्ध लड़ा और जब मातृभूमि की रक्षा करते हुए वे शहीद हुईं, तब भी अंग्रेजों की गोलियों और तलवारों के बीच उनके मस्तक को सुशोभित कर रहा था—चंदेरी के बुनकरों के हाथों से बना वही राजसी साफा, वही चंदेरी की पगड़ी...।
इतिहास के कैनवास पर बॉलीवुड का नया रंग
समय का पहिया घूमा और आज चंदेरी का यही रहस्यमयी और खूबसूरत मिजाज देश के सबसे बड़े फिल्म उद्योग यानी बॉलीवुड को भी अपना दीवाना बना रहा है। चंदेरी के प्राचीन मकान, ऐतिहासिक गलियाँ, किले और हथकरघा की आवाज अब दुनिया के सामने बड़े पर्दे पर चमक रही है। यहाँ 'स्त्री', 'सुई धागा' जैसी सुपरहिट फिल्मों के साथ-साथ कई बड़ी वेब सीरीज़ों की शूटिंग भी हो चुकी है। बॉलीवुड के इस ग्लैमर ने चंदेरी के पारंपरिक कपड़ों और पर्यटन को एक वैश्विक पहचान देने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है।
आधुनिक रैंप पर सदियों का गौरव: वैश्विक पहचान का नया दौर
शिशुपाल के पौराणिक साम्राज्य से शुरू हुआ चंदेरी का यह सफर आज दुनिया के सबसे बड़े फैशन रैंप और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुँच चुका है। सदियों पुराना यह ताना-बाना आज सिर्फ एक कपड़ा नहीं, बल्कि भारत की जीवित विरासत का सबसे चमकदार प्रतीक है।
आज देश-विदेश के बड़े-बड़े फैशन डिजाइनर्स चंदेरी सिल्क की इस पारंपरिक बुनावट को आधुनिक वेस्टर्न और इंडो-वेस्टर्न परिधानों के साथ जोड़कर वैश्विक मंचों पर पेश कर रहे हैं। अपनी हल्की बुनावट, राजसी चमक और पारदर्शी लुक के कारण चंदेरी सिल्क आज पेरिस, न्यूयॉर्क और मिलान जैसे अंतरराष्ट्रीय फैशन वीक्स में अपनी धाक जमा रहा है। आज जब कोई आधुनिक महिला या बॉलीवुड की हस्तियाँ गर्व से चंदेरी साड़ी या स्कार्फ पहनती हैं, तो वे अनजाने में ही सही, लेकिन राजा शिशुपाल के इतिहास, वीरांगना लक्ष्मीबाई के शौर्य और चंदेरी के बुनकरों की सदियों पुरानी तपस्या को अपने साथ जीवंत रखती हैं।
समय बदल गया, साम्राज्य बदल गए, लेकिन चंदेरी की हथकरघा की आवाज और उसकी राजसी चमक आज भी उतनी ही अमर है—जो कल भी राजाओं का मान थी और आज भी वैश्विक फैशन का गौरव है।
यात्रा की राह: मालवा-बुंदेलखंड की दहलीज पर बसा चंदेरी
मालवा और बुंदेलखंड की ऐतिहासिक सीमाओं पर स्थित चंदेरी शहर तक पहुँचना बेहद आसान और सुविधाजनक है। यह शहर न केवल मध्य प्रदेश के प्रमुख केंद्रों से सीधे जुड़ा है, बल्कि इसकी सीमाएं उत्तर प्रदेश को भी आपस में जोड़ती हैं।
यदि दूरियों के गणित को देखें, तो चंदेरी की भौगोलिक स्थिति कुछ इस प्रकार है:
    • ललितपुर रेलवे स्टेशन (उत्तर प्रदेश): चंदेरी के किले से महज़ 37 किमी (सबसे नज़दीकी और प्रमुख रेलवे लिंक)
    • भोपाल (मध्य प्रदेश की राजधानी): चंदेरी से करीब 210 किमी
    • ग्वालियर (ऐतिहासिक हवाई अड्डा और शहर): चंदेरी से लगभग 220 किमी
यदि आप देश के किसी भी कोने से चंदेरी आने का मन बना रहे हैं, तो सबसे सुगम रास्ता 'नई दिल्ली - भोपाल मुख्य रेलवे लाइन' है। पर्यटक ट्रेन के माध्यम से उत्तर प्रदेश के प्रमुख व्यापारिक शहर ललितपुर स्टेशन तक आ सकते हैं। ललितपुर से चंदेरी की दूरी महज़ 37 किलोमीटर है, जिसे स्थानीय बसों, टैक्सियों या निजी वाहनों के ज़रिए बेहद आसानी से और कम समय में तय किया जा सकता है।

सोमवार, 3 अगस्त 2026

बारिश के माैसम में बात करेंगे फैशन की - डा. अनुजा भट्ट

पीच शेड पीच एक ऐसा कलर है जो डार्क और लाइट हर तरह के टोन के साथ मैच करता है

रिमझिम फुहार हाे और पार्टी करने का मन हाे  खाने पीने का सब बंदोबस्त हाे ताे बस एक सवाल परेशान कर देता है । आज पहने क्या। ताे दाेस्ताें जब माैसम में इतनी ताजगी हाे और हरियाली बिखरी हो तो ग्रीन कलर फ्रेशनेस का प्रतीक मान लेने में हर्ज ही क्या है। यह वैसे भी मॉनसून के लिए परफेक्ट माना जाता है। साथ ही हर तरह के कॉप्लेक्शन पर यह कलर सूट करता है। अगर आपको वॉर्म टोन वाले कलर्स ज्यादा पसंद हैं तो आप मस्टर्ड ग्रीन, खाकी और डार्क ग्रीन के शेड्स पहन सकती हैं और अगर कूल टोन वाले कलर्स पसंद हैं तो ब्राइट ग्रीन या पैरट ग्रीन कलर के ऑप्शन्स पर जाएं। वाइट या येलो जैसे ब्राइट कलर्स के साथ भी आप ग्रीन को मिलाकर पहन सकती हैं।
पीच शेड पीच एक ऐसा कलर है जो डार्क और लाइट हर तरह के टोन के साथ मैच करता है और मॉनसून के लिहाज से एक क्लासिक शेड है। वैसे तो इस कलर को हर तरह के स्टाइल वाले कपड़ों में पहन सकती हैं लेकिन चूंकि इन दिनों बेल स्लीव्स का फैशन जोरों पर है लिहाजा आप पीच कलर का बेल स्लीव टॉप या शॉर्ट ड्रेस ट्राई कर सकती हैं। साथ ही अपनी ही ड्रेस को हाइलाइट करने के लिए इसे अच्छी तरह से अक्सेसराइज करना न भूलें।
चॉकलेट ब्राउन की बात करूं तो एक वक्त था जब चॉकलेट ब्राउन को सिर्फ ट्रेंच कोट या बूट्स के कलर के तौर पर ही देखा जाता था लेकिन आज के समय में यह कलर यूथ को काफी पसंद आ रहा है। खासकर अगर आप मॉनसून के सीजन में किसी पार्टी में जा रही हैं तो चॉकलेट ब्राउन कलर की मैक्सी पार्टी ड्रेस आपके लिए क्लासी ऑप्शन है।
मॉनसून के दौरान मरून कलर की मैक्सी ड्रेस, जंपसूट, ऑफ शोल्डर टॉप, रफल्स टॉप, कोल्ड शोल्डर टॉप और ड्रेसेज के साथ शॉर्ट ड्रेसेज की भी मांग बढ़ गई है। चूंकि आजकल लोग फैशन में एक्सपेरिमेंट करना ज्यादा पसंद करते हैं लिहाजा आप भी चाहें तो अपने कंफर्ट के हिसाब से चेंज कर सकती हैं।
 तो आपकी क्या राय है।  इस तरह के ढ़ेर सारे आप्शंस के लिए आप हमारे फेसबुक ग्रुप में क्लिक कर सकते हैं।   
https://www.facebook.com/groups/CLUBV/

मंगलवार, 20 अगस्त 2024

बगरू बागोरा में है रंगाे की बहार आप पहनेंगे बारबार-डॉ. अनुजा भट्ट

राजस्थानी रंग और फैशन का संग

 राजस्थान का एक छोटा सा गाँव बगरू जयपुर से 32 किलोमीटर पूर्व में स्थित है। यह ब्लाक प्रिंटिंग की अपनी पारंपरिक प्रक्रिया के लिए जाना जाता है। बगरू के 'छीपा' राजस्थान के सवाई माधोपुर, अलवर, झुंझुनू और सीकर जिलों से यहाँ आकर बसे और लगभग 300 साल पहले इसे अपना घर बना लिया। बगरू शब्द 'बागोरा' से लिया गया है, जो एक झील में एक द्वीप का नाम है । जहाँ मूल रूप से शहर बसाया गया था।

कम से कम 400 वर्षों से बगरू छीपा का घर रहा है - एक कबीला जिसका नाम या तो एक गुजराती शब्द से आया है जिसका अर्थ है "छपना" या नेपाली भाषा के दो शब्दों के संयोजन से आया है 'छी' यानी रंग चढ़ाना और 'पा' यानी थोड़ी देर धूप में रहना। जब आप यहां से गुजरते हैं तो आपको यह परिभाषा सही लगती है। जब आप छीपा मोहल्ला पहुंचते हैं ताे आप एक अलग तरह की भीनी भीनी खुशबू से राेमांचित हाेते हैं। यह खुशबू है कपड़ाें पर तारी हाे चुके रंगाें की। जी हां ,कपड़े की खुशबू से यहाँ की हवा सुर्ख होती है; जमीन और कंक्रीट की दीवारें अलग अलग रंगाें से सजी है जिसमें नारंगी, नीला और गुलाबी ज्यादा से है। यह दृश्य आपको बांध लेता है।

 आइए मिलते हैं विजेंद्र जी से। विजेंद्र, छीपा की इस सामुदायिक परंपरा को जारी रखे हुए है। पांचवीं पीढ़ी के डायर और मास्टर प्रिंटर, विजेंद्र जिनकाे सब प्यार से विजु बुलाते हैं बगरू टेक्सटाइल्स के संस्थापक हैं - एक कंपनी जो कपड़े रंगने और छपाई का व्यवसाय कई पीढ़ियाें से करती आई है। 2007 में अपने पिता की मृत्यु के बाद उन्हाेंने अपने पिता के काम काे संभाला। संभालते समय जाे बात सबसे पहले उनके जेहन में आई वह थी स्थानीय लाेगाें काे पलायन से कैसे राेका जाए। विजू ने स्थानीय परिवारों को रोजगार देने और राजस्थानी ब्लॉक प्रिंटिंग के लिए नया बाजार विकसित करने के लिए एक प्लान तैयार किया। इस प्लान में कई चीजाें काे शामिल किया गया।

सबसे पहले आसापास सागवान (सागौन), शीशम (भारतीय रोज़वुड) के पेड़ लगाए गए। इन पेड़ाें के लगाने की एक खास वजह भी थी। जैसा कि मैंने बताया यहां प्रिटिंग का काम हाेता है और इसके लिए ब्लाक का प्रयाेग किया जाता है। ब्लाक बनाने के लिए खास तरह की लकड़ी के प्रयाेग हाेता है और यह लकड़ी इन पेड़ों से ही मिलती है। किसी भी एक उद्याेग को विकसित करने के लिए उसके साथ और भी बहुत सारी जरूरतें होती हैं। कम से कम सोलह परिवार नियमित रूप से मास्टर प्रिंटर, खरीदार, ब्लॉक कार्वर, धोबीवालों (कपड़े धोने वाले लोगों) के रूप में काम करते हैं। बगरू टेक्सटाइल्स के मुनाफे का एक हिस्सा पूरे छीपा समुदाय के लिए सामुदायिक पहल करता है। ब्लॉक शॉप ने गाँव में फिर से संगठित होने, स्वास्थ्य क्लीनिकों को प्रायोजित करने, परिवारों के लिए फिल्टर पानी प्रदान करने के लिए अपना कार्यक्रम विकसित किया है।

वुडब्लॉक नक्काशी

छीपा प्रिंटर प्रिंट डिजाइन में रंगों और आकृतियों की संख्या के आधार पर कितने ब्लॉक बनाने है यह तय करता है। आम तौर पर, एक प्रिंटर पहले बैकग्राउंड ब्लॉक को स्टैम्प करता है, उसके बाद एक आउटलाइन ब्लॉक (रेख) होता है। औसतन, एक प्रिंटर को हाथ से मुद्रित कपड़े बनाने के लिए कम से कम 4 या 5 ब्लॉक की आवश्यकता होती है। एक ही ब्लॉक को तराशने और तैयार करने में एक या दो दिन का समय लग सकता है क्योंकि स्थानीय लकड़ियों का चयन और मसाला बनाना भी इसी प्रक्रिया में शामिल है। प्रत्येक पैटर्न डिजाइन के लिए ब्लॉक की भूमिका विशिष्ट है।

बगरू में, ब्लॉक बनाते समय सागवान (सागौन), शीशम (भारतीय रोज़वुड), या रोहिड़ा टीक या मारवाड़ टीक जैसी लकड़ियों का उपयोग करते हैं। शीशम की सापेक्ष कठोरता जटिल या विस्तृत रूपांकनों के अनुकूल होती है।
एक बार ब्लॉक के डिज़ाइन को कागज पर स्केच किया जाता है और ब्लॉक को आकार में काट दिया गया है, पैटर्न सीधे लकड़ी पर खींचा जाता है। कार्वर ड्रिल, छेनी, हथौड़े, नाखून से ब्लॉक पर पैटर्न को बनाता है। बगरू में किसी भी छपाई वाले के क्वार्टर में चले जाइए, आप अक्सर एक ही उपकरण देखेंगे: एक लंबी टेबल, ब्लॉक (निश्चित रूप से), और एक रोलिंग ट्रॉली जिसमें एक डाई ट्रे और कुछ अन्य आइटम होते हैं।

पारंपरिक बगरू प्रिंट क्रीम पृष्ठभूमि पर गहरे (या रंगीन) पैटर्न का उपयोग करते हैं। पैटर्न बनाने में, पुष्प, पशु और पक्षी के रूपों के साथ ज्यामितीय रूपों को अपनाया गया  है। ब्लॉक प्रिंटिंग तकनीक  में पैटर्न में व्यवस्थित रूप से
दोहराया जाता है।  इसे पुष्प बूटी कहते हैं। बगरू प्रिंट में आमतौर पर देखे जाने वाले बूटों में गैंदा, गुलाब, बादाम, कमल और बेल शामिल हैं। ये रूपांकन पूरे कपड़े पर अलग-अलग आकार और संयोजन में दिखाई देते हैं जिस पर उन्हें मुद्रित किया जाता है। अन्य डिज़ाइनों में छोटे जाली पैटर्न होते हैं, जो पुष्प रूपांकनों से बने होते हैं।
  आपको बताते चलूं कि बगरू टेक्सटाइल्स के फैब्रिक का उपयोग ब्लॉक शॉप, बीस्टी थ्रेड्स, मौली माहोन, पेनी सेज, और रेख एंड दत्ता जैसे अंतर्राष्ट्रीय ब्रांडों द्वारा किया गया है । भारतीय ब्लॉक प्रिंटिंग एक वैश्विक डिजाइन प्रवृत्ति के रूप में उभर रही है। वोग और न्यूयॉर्क टाइम्स में भी इसकी चर्चा हुई है।

गुरुवार, 8 अगस्त 2024

वारली कला में जीवन और फैशन साथ साथ हैं- डॉ अनुजा भट्ट


लाल गेरू रंग की दीवारों पर सफेद रंग से चित्रित साधारण वारली आकृतियाँ अप्रशिक्षित आँखों को कुछ खास नहीं लग सकती हैं। लेकिन करीब से देखने पर आपको पता चलेगा कि वारली में आँखों से दिखने वाली चीज़ों से कहीं अधिक है। यह केवल एक कला रूप नहीं है, बल्कि महाराष्ट्र और गुजरात की सीमाओं के आसपास के पहाड़ों और तटीय क्षेत्रों से वारली (वरली) जनजातियों के लिए जीवन का एक तरीका है। लगभग 3000 ईसा पूर्व उत्पन्न इस कला रूप में एक रहस्यमय आकर्षण है। अन्य रोजमर्रा की गतिविधियों के जटिल ज्यामितीय पैटर्न फैशन डिजाइनरों और घरेलू सजावट ब्रांडों के बीच काफी लोकप्रिय हैं जिसमें तरह तरह के फूल, शादी की रस्में, शिकार के दृश्य शामिल हैं। गुजरात और महाराष्ट्र राज्यों के लोगों के मन में निश्चित रूप से इस कला के प्रति भावनात्मक लगाव है । उन्हाेंने इसे आघुनिक जीवन शैली के उत्पादों पर लोकप्रिय होने से बहुत पहले ही ग्रामीण स्कूलों और घरों की दीवारों सजाना शुरू कर दिया था। सरल, फिर भी खूबसूरती से नाजुक पैटर्न आधुनिक कला का आधार बने।

बेहद खूबसूरत

यह जनजाति पेंटिंग के लिए चावल के पेस्ट, पानी और गोंद जैसे बुनियादी सामग्रियों का इस्तेमाल करती रही है, जो सफेद रंग के लिए इस्तेमाल की जाती है । बांस की एक लकड़ी को रेशेदार बनाकर ब्रश के रूप में प्रयाेग किया जाता है। यह सरल आकर्षण ही है जिसने अनीता डोंगरे और जेम्स फेरेरा जैसे डिजाइनरों को अपने संग्रह में इन चित्रों का उपयोग करने के लिए आकर्षित किया है। सेल फोन, स्माइली और इमोटिकॉन्स के युग से बहुत पहले आविष्कार की गई, वारली पेंटिंग न केवल अपने देहाती आकर्षण के कारण आपके दिल को छूती हैं, बल्कि वे एक ज्वलंत कहानी भी बताती हैं। इस प्राचीन कला का आकर्षण ऐसा है कि आज यह कई होटलों की लॉबी और कमरों को भी गर्व से सजाती है। इन चित्रों में कुछ ऐसा है जो हमें कला के पीछे के समय और भावना में वापस ले जाता है - चाहे वह अंतिम संस्कार का दृश्य हो या आदिवासी देवताओं की पूजा करने का कार्य। आज, वारली कला न केवल बैंगलोर, चेन्नई और दिल्ली जैसे महानगरों में लोकप्रिय है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लोकप्रिय है।

रोज़मर्रा की ज़िंदगी में वारली

कला प्रेमी जब अपनी जड़ों की ओर वापसी करते हैं तो जीवन के हर हिस्से में गर्व के साथ वारली रूपांकनों का प्रदर्शन करते हैं। परंपरागत रूप से, यह पेंटिंग लाल गेरू की पृष्ठभूमि पर सफ़ेद रंग से की जाती है और ये दो ही रंग इस्तेमाल किए जाते हैं। लेकिन, आजकल, कपड़ों, घर की सजावट या अन्य कलात्मक रूपों पर इन कलात्मक रूपांकनों को दोहराने के लिए कई तरह के रंगों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

इस कला से प्रेरणा लेने वाले सभी लोगों की जीवनशैली में यह इस कदर छायी हुई है कि हम सब इसकी समृद्धि से मोहित है। चमकीले रंग के छाते से लेकर कॉफी मग और चाय के कप, देहाती दीवार घड़ियाँ, दीवारों के लिए सजावट और स्टेशनरी तक - वारली लगभग हर जगह है और यह यहीं नहीं रुकता। वारली की कला हर भारतीय फैशन डिजाइनर की नई पसंदीदा है। रंग-बिरंगे स्कार्फ और कुर्तियों के बॉर्डर को सजाने से लेकर शानदार जूट और रेशम की साड़ियों को सजाने तक, वारली ने रैंप पर हमेशा के लिए अपना दबदबा बना लिया है।

सिर्फ़ कला ही नहीं

वारली कला कुछ हद तक हमें पर्यावरण के प्रति जागरूक होने और जीवन की सरल चीज़ों में आनंद खोजने के बारे में सोचने पर मजबूर करती है। वारली लोग काफ़ी सरल जीवन जीते हैं। पहले, वे प्रकृति की पूजा करते थे और भोजन और रोज़मर्रा की ज़िंदगी के लिए प्रकृति पर निर्भर रहते थे। वे प्रकृति को नुकसान पहुँचाने या ज़रूरत से ज़्यादा लेने में विश्वास नहीं करते थे। वारली लोग प्रकृति और मनुष्य के बीच सामंजस्य में विश्वास करते हैं और ये विश्वास अक्सर उनकी पेंटिंग में झलकता है।

यह विचारधारा आज हमारे जीवन के लिए भी सही है। बहुत से शहरी लोग अब जहाँ तक संभव हो तकनीक से दूर रहकर, स्वच्छ भोजन करके, हथकरघा अपनाकर और प्राचीन रीति-रिवाजों और परंपराओं के पीछे के विज्ञान को करीब से देखकर एक न्यूनतम जीवन शैली अपना रहे हैं। इसलिए, यह बहुत आश्चर्य की बात नहीं है कि वारली जैसी पारंपरिक कलाएँ हमारे समाज में वापस आ रही हैं और हमें जीवन के सरल सुखों की याद दिला रही हैं। जनजातियों ने ज्ञान प्रदान करने के लिए वारली चित्रकला का भी उपयोग किया है। आज, यह चित्रकला के अन्य रूपों के बीच ऊँचा स्थान रखती है, जिसमें जिव्या माशे और उनके बेटे बालू और सदाशिव जैसे महाराष्ट्रीयन कलाकार इस कला रूप को जीवित रखने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। वास्तव में, माशे को इस कला रूप को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाने के लिए 2011 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया था।
हालांकि लोकप्रिय रूप से स्टिक फिगर के रूप में जाना जाता है, यह ध्यान रखना दिलचस्प होगा कि वारली पेंटिंग में कोई सीधी रेखा का उपयोग नहीं किया जाता है। वे आम तौर पर टेढ़ी-मेढ़ी रेखाएँ, बिंदु, वृत्त और त्रिकोण होते हैं। मानव और पशु शरीर को दो त्रिभुजों द्वारा दर्शाया जाता है जो सिरे पर जुड़े होते हैं। उनका अनिश्चित संतुलन ब्रह्मांड के संतुलन का प्रतीक है, अनिवार्य रूप से अनुष्ठानिक, वारली पेंटिंग आमतौर पर विवाहित महिलाओं द्वारा शादी का जश्न मनाने के लिए बनाई जाती थीं। हालाँकि इनमें से बहुत सी पेंटिंग प्रजनन और समृद्धि से जुड़े अनुष्ठानों पर आधारित हैं, लेकिन उनमें हमेशा यथार्थवाद का स्पर्श होता है। चित्रों का उपयोग वारली जनजातियों की झोपड़ियों को सजाने के लिए भी किया जाता था, जो आमतौर पर गाय के गोबर और लाल मिट्टी के मिश्रण से बनाई जाती थीं।

दिलचस्प बात यह है कि इन चित्रों का केंद्रीय रूपांकन शिकार, मछली पकड़ने और खेती, त्योहारों और नृत्यों, पेड़ों और जानवरों के दृश्यों को चित्रित करता है। अनुष्ठानिक चित्रों के अलावा, अन्य वारली चित्र गांव के लोगों की दिन-प्रतिदिन की गतिविधियों को चित्रित करते हैं। अधिकांश वारली चित्रों के महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक "तरपा नृत्य" है - तारपा एक तुरही जैसा वाद्य यंत्र है, जिसे अलग-अलग पुरुषों द्वारा बारी-बारी से बजाया जाता है। जब संगीत बजता है, तो पुरुष और महिलाएं अपने हाथ मिलाते हैं और तारपा वादकों के चारों ओर घेरा बनाकर घूमते हैं। नर्तकियों का यह चक्र जीवन चक्र का भी प्रतीक है। हममें से कई लोग सोच सकते हैं कि एक कला रूप को लेकर इतना हंगामा क्यों है जो खुद को दो रंगों तक सीमित रखता है। लेकिन यह क्लासिक सादगी ही है जो इस कला को अव्यवस्था से अलग करती है।

कला को जीवित रखना

जबकि इस डिजिटल युग में इस तरह की कलाओं का अस्तित्व बचा पाना मुश्किल हो रहा है, कुछ विचारशील लोग परंपरा को जीवित रखने के लिए अपना योगदान दे रहे हैं। ऐसा ही एक प्रेरक स्थल ठाणे जिले का गोवर्धन इको विलेज है जो वारली कलाकारों को अपनी कला प्रदर्शित करने के लिए विभिन्न मंच प्रदान करके इस कला को जीवित रखने का प्रयास करता है।

फरवरी 2016 में, जापानी कलाकारों के एक समूह ने कला को जीवित रखने के प्रयास में पालघर जिले के गंजद गाँव को गोद लिया। जापान के सामाजिक कलाकारों का यह समूह दीवारों पर पेंटिंग को बढ़ावा देने के लिए गाय के गोबर, मिट्टी और बांस की छड़ियों से झोपड़ियाँ भी बना रहा है। दहानू एक और गाँव है जो वारली कला को जीवित रखने में कामयाब रहा है। अतिशयता की दुनिया में, सादगी एक दुर्लभ वस्तु है और यह कला रूप उस विश्वास को जीवित रखता है।

कला से जुडे प्रोडक्ट देखने और खरीदने के लिए आप इस समूह से जुड़िए.

https://www.facebook.com/groups/CLUBV/


Special Post

साड़ियाें में भी समाएं हैं कृष्ण – डा. अनुजा भट्ट

भारत का एक मशहूर राज्य है राजस्थान। मैं यहां से कई तरह के संग्रह आपके लिए लाती हूं। इसी तरह भारत के हर राज्य की कला और कलाकार से जुड़ने का अ...