सोमवार, 6 अप्रैल 2020

How to Hang Lighting

Lighting has settled into fashion status in recent years especially with the ever-popular pendants. These hanging fixtures can range in size from small globes just inches in diameter to large drum shades suspended on high. One of the freshest, most fashion-forward applications is bunching—grouping a trio or even quintet of pendants all the same or a mix of shapes and materials. Follow our guide to learn how to hang lighting fixtures.
How to Hang Lighting
Benefits of Pendant Lighting
A stylish pendant light can be a focal point in a room and can add sophistication, an artsy element, architectural shape or punch of color. The light it gives off almost seems like a bonus.

Pendant lights play different functional roles. A pair of hanging pendant lights over a kitchen counter is right on task, while a pendant illuminating a foyer is more about spreading the light in an ambient way. Check out resources like design magazines and websites for ideas about how to use pendants in different rooms.

Hanging Pendant Lights
First of all, do consult a professional. This is especially important in older buildings, where wiring may have unforeseen issues. Also, the weight of the lamp (and mounting plates) must be carefully considered, so there’s adequate hardware to secure to the ceiling (like hanging a painting).

Do your homework. With all the new light bulbs, transitioning from incandescent to LEDs, figure how just how much light you need. Make sure you follow a manufacturer’s recommended wattages—especially the upper limits. Overamping can result in overheating, possibly shattering glass shades, for example.

Where to hang pendant lights? That all depends on your needs, as well as the look and style you’re going for.

Over a dining table
Even conventional chandeliers have morphed into tubular modern forms in interesting compositions. And large scale drum shapes add flair. Hang a pair or three to five (odd numbers are pleasing to the eye) along the length of the table. Stagger the heights for interest, say three on one level, two slightly higher. General guidelines are 30 inches above (with an 8-foot ceiling, adding three inches for each additional foot). The outer edge of the lamp should be at least 12 inches from the outer edge of the table (especially with large ones, so your head doesn’t bump into it).

Over a kitchen island.
Clear, ribbed or colored glass as well as metals all can make a statement, especially in multiples. Consider the proportions of your island. Like placement over a dining table, the pieces should neither overpower nor underwhelm. A single four-inch pendant would seem too small and not put out enough light. Hanging a pair of pendants with a 4-foot drop might measure around 42 inches from the surface of a 39-inch tall counter that spans around 72 inches.

Over a cocktail table.
A single lamp in a simple shape can be dramatic, hanging low over the center of a cocktail table. In a living room with an 11 foot ceiling, a lamp with a 75-inch drop might hang just 28 inches above a low, 16 ¾ inch tall cocktail table. For more impact, try hanging a cluster of medium size pendants in staggered heights.

Over a sofa.
Hang a pendant light to one side of a sofa, brought down a little lower, particularly effective in a room with a tall ceiling.

Over a buffet console.
Hanging a pair of pendant lights over a buffet adds ambience. A grouping held to one side works well here, too.

How to Hang Lighting
Final Considerations Before making a purchase, make sure you have measurements of tables and sofas so that you can properly scale pieces. A photo of your room is helpful, so you can imagine how different shapes and materials will play, like open weaves, cages, wire lamps, antiqued metal or on-trend mixed metals. And try to see what the lamp looks like illuminated. Some new layered lamps have sheer outer fabric and diffuses that create a soft haze of ambient light within.

शनिवार, 4 अप्रैल 2020

व्यायाम से ज्यादा जरूरी है सही व्यायाम


एक्सरसाइज आपके मूड को खुश रखती है। आपको शेप में रखती है । इसके लिए फिटनेस प्रोग्राम का चयन कीजिए। प्रोग्राम ऐसा चुनें जो आपकी पर्सनेलिटी और लाइफस्टाइल से मेल खाता हो। आप एक्ससाइज के जरिए क्या पाना चाहती हैं इसको एकदम क्लियर कर लें। क्या आप अपनी बॉडी को टोनअप करना चाहती हैं या फिर कुछ वजन भी कम करना है। इन सबके लिए अलग अलग एक्सरसाइज हैं जैसे- कार्डियोवसकुलरस्ट्रेंथ और  फ्लेसिबल ट्रेनिंग।
   कार्डियोवसकुलर एक्ससराइज में कैलोरी बर्न होती हैं इसके लिए तेज चाल से चलनास्विमिंग और साइक्लिंग की जा सकती है।  स्ट्रेंथ ट्रेनिंग में वेट को कंट्रोल करने की एक्ससाइज की जाती है ताकि आगे चलकर हड्डियों की समस्या न आए। आपकी    बॉडी मजबूत रहे और ठीक से काम कर सके।   फ्लेसिबल ट्रेंनिंग में यह बताया जाता है कि आपका खड़े  होने बैठने का तरीका कैसा है उसे कैसे सुधारा जाए।    इसमें आपको  मांसपेशियों की एक्ससाइज के बारे में बताया जाता है ताकि आपकी बॉडी फ्लेक्सेबल बनी रहे। योगापिलाटेस्ट्रेचिंगताई ची इसी तरह की     एक्सरसाइज हैं। रिलेक्स होने के लिए फुट मसाज बहुत काम आती है इससे आप खुश  महसूस करते हैं।  प्राणायाम आपके दिल के लिए अच्छा है।   सप्ताह में १ दिन तेज चाल से चलें    यह भी आपको ताजगी  देगा। सही खाने-पीने की चीजों का चुनाव करें- ऐसा खाना खाएं जो  स्वाद के साथ आपकी सेहत का भी ख्याल रखें। आपकी डाइट में संतुलन होना  चाहिए। कार्बोहाइड्रेटप्रोटीनफेट और पानी इनका तालमेल जरूरी है।  याद रखें    यदि आपने सेहत पर ध्यान नहीं दिया तो आपके शरीर की  ताकत तो कम होगी और आपके पचाने की शक्ति भी कम हो जाएगी।   स्किन की चमक के लिए खूब पानी पिएं। कम से कम 8-10 गिलास पानी   फल खाएं-    पानी वाले फल जैसे तरबूजखरबूजखीरा,  नारियल   को   डाइट में शामिल करें।   अपने चेहरे को धूल,  और सूरज की तेज किरणों से बचाएं।  अपनी स्किन के बारे में जानें और उसी के हिसाब से क्रीम का  चयन करें। माश्चराइजर का प्रयोग करें।

मंगलवार, 31 मार्च 2020

जेरीएट्रिक केयर प्रोफेशनल्स की जरूरत आपके अपनों काे भी है

जब से कराेना वायरस के संक्रमण के बारे में सुनती जा रही हूं मुझे एक चिंता सी हाे रही है। खासकर बुजुर्गाें काे लेकर। छाेटे शहराें में गांवाें में बहुत से परिवार ऐसे हैं जहां बुजुर्गों की देखभाल के लिए काेई नहीं है। इस कारण वहां कई तरह के विकल्प भी उभरकर आ रहे हैं। जैसे नौकरीपेशा लाेगाें के लिए टिफन सर्विस हुआ करती है वैसे ही अब जिन घराें में बुजुर्ग अकेले रह गए हैं वहां भी टिफिन सर्विस है। घर के बने खाने की मांग ज्यादा है। अक्सर यह खाना घरों पर ही बनता है। जेरीएट्रिक केयर प्रोफेशनल्स की शुरूआत अब भारत के छाेटे छाेटे शहराें में हाे चुकी है। आप जानना चाहेंगे यह क्या हाेता है और इसमें किस तरह की सुविधाएं दी जाती हैं। क्या सिर्फ खाना ही मिलता है या कुछ भी। ताे दाेस्ताें, खाने की बात ताे एक संकेत भर है।

अभी हमारे देश में अभी बुजुर्गों के देखभाल(geriatric care) के लिए कोई प्रबंधन पश्चिमी मुल्कों की तरह तैयार नहीं हो पाया है। सरकारी अस्पतालों में भी ओल्ड एज के लिए अलग से ओपीडी की व्यवस्था नहीं है। हालांकि कई महानगरों में बुजुर्गों के देखभाल के लिए डे केयर सेंटर, ओल्ड एज होम और परामर्श केंद्र खुले हैं, मगर उनके स्वास्थ्य के जरुरतों के लिए अस्पतालों में अलग से ओपीडी नहीं खुली है।

बुढ़ापे में हेल्थ केयर सर्विस की सबसे ज्यादा जरुरत होती है और बुजुर्गों के देखभाल के लिए अलग से हेल्थ प्रोफेशनल की व्यवस्था को ही Geriatric Care Management कहते हैं।

क्या है जेरीएट्रिक केयर? (What is geriatric care?)

वरिष्ठ नागरिकों के जीवन के देखभाल के लिए पूरी तरह समर्पित प्रबंधन प्रणाली को जेरीएट्रिक केयर मैनेजमेंट कहते हैं। किसी भी तरह की इमरजेंसी में इसके प्रोफेशनल और एक्सपर्ट बुजुर्गों की हेल्थकेयर, होम केयर, हाउसिंग, डे केयर खाने-पीने की व्यवस्था से लेकर उनके आर्थिक और कानूनी जरुरतों को भी पूरा करते हैं। घर के सदस्यों के साथ मिल कर हर दिन 3 से 5 घंटे उनके घर में रह कर बुजुर्गों की देखभाल करते हैं। इनके देखभाल करने का तरीका बिल्कुल नियोजित तरीके से होता है और अपने ग्राहक (बुजुर्ग) की हर गतिविधि को लगातार मॉनिटर करते हैं।

हाउसिंग (Housing)

परिवार के लोगों को बुजुर्गों के देखभाल और बेहतर जिंदगी के लिए अच्छे घर खोजने में मदद करना।

होम केयर सर्विस (Home Care Service)

बुजुर्गों को घर में रहने-खाने-पीने से लेकर उनके दिन भर की जरुरतों के लिए क्या-क्या सामान चाहिए उसकी व्यवस्था करना। खास बात यह है कि इसमें उनकी सुविधा और स्वास्थ्य का ख्याल रखा जाता है।

मे़डिकल केयर (Medical Care)

डॉक्टर से मिलने का समय तय करना, डॉक्टर, अपने ग्राहक(बुजुर्ग) और उनके परिवार के बीच संवाद कायम करना और डॉक्टर के निर्देश के मुताबिक अपने ग्राहक को हर मेडिकल जरुरत समय-समय पर उपलब्ध कराना।

संवाद (Discussion)

बुजुर्गों के आदत, खान-पान के तरीके या फिर व्यवहार में हो रहे बदलाव के बारे में परिवार के सदस्यों को समय-समय पर अवगत कराना।

बुजुर्गों का सामाजिक दायरा बढ़ाना (Social Connect)

ये प्रोफेशनल्स बुजुर्गों के अकेलेपन को काफी नजदीक से समझते हैं। ये उनको मानसिक और शारीरिक रुप से सक्रिय करने के लिए समय-समय पर सामाजिक समारोह आयोजित करते हैं और उनको इसमें भागीदारी सुनिश्चित करते हैं। इस तरह के आयोजन में बुजुर्गों के मन बहलाने से लिए कई तरह के सांस्कृतिक और मनोरंजक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।

कानूनी (Legal)

अपने ग्राहक(बुजुर्ग) को जरुरत होने पर मुकदमे की पैरवी करने या वसीयत बनवाने में वकीलों के साथ मिलने का समय फिक्स कराते हैं और एक्सपर्ट सलाह दिलवाते हैं।

वित्तीय (Financial)

बैंक का काम हो या फिर बिजली-पानी, गैस का बिल जमा करना हो ये अपने ग्राहक के हर जरुरत का ख्याल रखते हैं।

सुरक्षा (Security)

यह अपने ग्राहक(बुजुर्ग) के साथ उनके घर में समय बिताते हैं। साथ ही उन्हे अपने घर में चलने-बैठने या गिरने से बचने के लिए किस तरह के सुरक्षा उपकरण की जरुरत होगी इसकी व्यवस्था करते हैं। इतना ही नहीं बुजुर्गो के साथ आए दिन होने वाले हिंसा और उत्पीड़न के बारे में भी उन्हे आगाह करते हैं और इससे बचने के तरीके भी बताते हैं।

ऐसे मरीजों के लिए जरुरी है जेरीएट्रिक केयर प्रोफेशनल्स (For Such patients geriatric care is essential)


शारीरिक रुप से विकलांग
पर्किसंस
अल्जाइमर
डाउन सिंड्रोम
मानसिक अवसाद
ऑटिज्म
गंभीर और पुरानी बीमारी
मस्तिष्क में चोट लगने पर आपकाे यह जानकारी कैसी लगी जरूर बताएं पसंद आए ताे शेयर करें।

सोमवार, 30 मार्च 2020

Warli panting in your drawing room

available#8826016792
India has a rich tradition of folk arts the custodians of which are the many tribes that live in the interiors of various states.
Warli art is a beautiful folk art of Maharashtra, traditionally created by the tribal women's. Tribals are the Warli and Malkhar koli tribes found on the northern outskirts of Mumbai, in Western India. This art was first explored in the early seventies & from then it was named as “Warli art”. Tribal people express themselves in vivid styles through paintings which they execute on the walls of their house. This was the only means of transmitting folklore to a populace not acquainted with the written word. Warli paintings were mainly done by the women folk. The most important aspect of the painting is that it does not depicts mythological characters or images of deities, but depict social life. Pictures of human beings and animals, along with scenes from daily life are created in a loose rhythmic pattern. Warli paintings are painted white on mud walls. The paintings are beautifully executed and resembles pre-historic cave paintings in execution and usually depict scenes of human figures engaged in activities like hunting, dancing, sowing and harvesting.

The tribals are forest-dwellers but have made a gradual transition towards being a pastoral community. They reside in the West coast of Northern Maharastra. A large concentration is found in the Thane district, off Mumbai. A little backward economically, they still maintain their indigenous customs and traditions. The growing popularity and commercialisation of the Warli painting has seen the uplift of many tribals and they are increasingly becoming integrated with the mainstream. Their marriage traditions are unique to their culture.
Colours of the Warli painting background are Henna, indigo, ochre, black, earthy mud, brick red and white made of rice paste to paint, occasionally yellow and red dots accompany white colour.

बुजुर्गों के अनुभव में भी हैं आपकी समस्याओं के हल

 हर घर में बुजुर्ग हाेते हैं। हमारी तरह उनकी भी कई समस्याएं हैं इसलिए उनकी बात काे गौर से सुनें। हो सकता है उनकी सुनाई गई कहानी से आपको अपने जीवन की किसी परेशानी को हल करने का सही जबाव मिल जाए। कहते हैं न बुजुर्गों का अनुभव ज्ञान का खजाना होता है।
 उर्मिल सत्यभूषण, जिन्हाेंने कभी खुद काे बुजुर्ग नहीं माना
 और  अंति समय तक साहित्य की सेवा की.
उनके गुस्से और विरोध को सहने की क्षमता रखें। कभी भी असहमति में बोले गए आपके स्वर इतने तल्ख न हों कि उनके दिल को ठेस पहुंच जाए। बढ़ती जीवन प्रत्याशा की वजह से दुनियाभर में बुजुर्गों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है। बुढ़ापा आने पर हर व्यक्ति में शारीरिक, सामाजिक, बीमारी संबंधी और मनोवैज्ञानिक रूप से कई बदलाव आते हैं, जबकि उनकी जरूरतों, उनकी स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताएं उतनी तेजी से नहीं बदल पाती। हमारी व्यवस्था जीवनपर्यंत चलती रहती है और कभी-कभी इसमें बदलती जीवनचर्या के हिसाब से बदलाव भी लाया जा सकता है। वर्तमान स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर हमारे लक्ष्य अब काफी बदल चुके हैं। संयुक्त परिवार की जगह स्वतंत्र रहन-सहन की व्यवस्था ने ले ली है। इस रहन-सहन की नई व्यवस्था को लाने में जहां एक तरफ हमारे बुजुर्गों की बढ़ी हुई जीवन प्रत्याशा, आजाद ख्याल और स्वाभिमान का योगदान है, वही दूसरी तरफ युवा पीढ़ी का स्वतंत्र और बेरोकटोक जीवन जीने की चाहत भी है। हालांकि बढ़ती उम्र के साथ कई नई तरह की बीमारियां, अव्यवस्था और अक्षमता भी सामने आती हैं,जिनसे अकेले निपटना मुश्किल होता है।
    पिछले कुछ दशकों के दौरान भारतीय बुजुर्गों के असामयिक निधन की बड़ी वजह संक्रामक बीमारियां नहीं बल्कि असंक्रामक बीमारियां और उसके प्रभाव ज्यादा देखे गए। बढ़ती जीवन प्रत्याशा और खराब स्वास्थ्य सुविधाओं की वजह से ही जवानी से बुढ़ापे की ओर कदम रख रहे लोगों और उनकी देखभाल करने वालों के लिए समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। अलग-अलग बीमारियों से जूझ रहे बुजुर्गों को उनकी जरूरत के हिसाब से खास स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराना पूरी दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। इतिहास में पहली बार दुनिया के ज्यादातर शख्स आज 60 साल से ज्यादा उम्र तक जीने की उम्मीद रख सकते हैं। ऐसे में बुजुर्गों की बढ़ती आबादी को सुविधाएं मुहैया कराना विश्व के नीति निर्माताओं के सामने बड़ी चुनौती है।
 साल 1901 में भारत के बुजुर्गों की तादाद सिर्फ 12 मिलियन थी जो कि 1951 में बढ़कर 19 मिलियन हो गईए 2001 आते-आते ये संख्या 77 मिलियन और 2011 में 104 मिलियन पहुंच गई। उम्मीद है कि 2021 तक ये संख्या 137 मिलियन तक पहुंच जाएगी। दुनिया के दूसरे सबसे ज्यादा बुजुर्गों वाले हमारे देश को इनकी संख्या दोगुनी होने में मात्र 25 साल लगे।


रविवार, 29 मार्च 2020

पुराने घर को भी बना सकते हैं इकोफ्रेंडली

खरीदने के लिए कॉल करें#8826016798
नए घर में शिफ्ट करने वालों के लिए तो कोई परेशानी ही नहीं है। वे या तो ग्रीन को चुन सकते हैं या फिर ग्रीन लाइफ स्टाइल से शुरूआत कर सकते हैं। लेकिन अगर आप पहले से ही किसी घर में रह रहे हैं और वह पुराना है, तब भी कोई बात नहीं। आप इसे भी इकोफ्रेंडली या ग्रीन होम में तब्दील कर सकते हैं। इसके लिए आपको कुछ उपाय करने होंगे।

एक्सपर्ट्स की राय में अब भी कुछ नहीं बिगड़ा। आप अपने व्यवहार में बदलाव कर पर्यावरण से तालमेल बैठा सकते हैं।

यह जाहिर सी बात है कि वर्तमान घर को ग्रीन बनाने के लिए तोड़ कर फिर से नहीं बनाया जा सकता है। लेकिन पयार्वरण के ख्याल से आप व्यवहारिक बदलाव तो ला ही सकते हैं। इससे आप पैसे की भी बचत कर सकेंगे। विशेषज्ञों के मुताबिक दीवारों पर इंसुलेशन चढ़वाएं ताकि घर के भीतर गर्मी कम की जा सके। साथ ही, जब घर का रिनोवेशन करा रहे हों, तो डेंस मैटीरियल का कम से इस्तेमाल करें। यानी कि पेंट का इस्तेमाल न करें। यह नुकसान दायक है। इसकी जगह नेचुरल चीजें जैसे चंदन का इस्तेमाल करें। संगमरमर का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें छित्र होते हैं जिस कारण यह काफी इकोफ्रेंडली है। वहीं आप ग्रेनाइट का कम से कम इस्तेमाल करें। किचन में तो यह चलेगा क्योंकि यह काफी डेंस होता है और इस वजह से काफी गर्मी सोखता है। लेकिन घर के अन्य हिस्सों के लिहाज से इसे इस्तेमाल करना ठीक नहीं होगा। जिन घरों में इस पत्थर का ज्यादा इस्तेमाल किया जाएगा, वहां गर्मी ज्यादा महसूस होगी।

जहं तक संभव हो, आप अपने घर को कुदरती तरीके से हवादार बनाने की कोशिश करें। घर में धूप का आना भी उतना ही जरूरी है इसलिए डिजाइन ऐसा हो कि आप को सूर्य की रोशनी भी मिल जाए तो उसकी गर्मी घर में ट्रैप भी न हो। धूप आने से घर में कीटाणु और कीड़े-मकोड़ों की भी कमी रहती है।

घर में एनर्जी बचाने वाले उपकरण इस्तेमाल करें। इससे ऊर्जा के साथ-साथ पैसे की भी बचत होगी। आप अगर घऱ में बल्ब या बड़ी ट्यूबलाइटों की जगह सीएफएल का इस्तेमाल करते हैं तो एनर्जी की कम खपत के साथ गर्मी और पॉकेट ढीला करने से भी राहत मिलेगी।

गर्मी के मौसम में गर्मी से बचाव के लिए यह जरूरी है कि आप खासतौर पर पूर्व और पश्चिम की खिड़कियों पर ब्लाइंड्स लगवाएं। इससे कमरे कूल रहेंगे। एसी वगैरह ज्यादा स्टार रेटिंग वाले ही इस्तेमाल में लाएं। स्टार रेटिंग वाले प्रोजक्ट थोड़े महंगे जरूर पड़ते हैं, लेकिन आप इसका खर्च थोड़े समय में ही वसूल कर लते हैं।

इको-फ्रेंडली होमं सिर्फ कागजी बात नहीं हैं आप इसमें आने वाली लागत को लेकर घबराएं नहीं। इस संबंध में हुए ताजे शोधों के मुताबिक इस तरह के घरों पर पारंपरिक तरीके से बनाए जाने वाले घरों की तुलना में लागत 17 से 30 फीसदी ज्यादा तो बैठती है, लेकिन यह लागत आप 3 से 5 साल के समय में वसूल कर लते हैं। आपके बिजली खर्च में ही 50 फसीदी से ज्यादा की बचत होती है। इमारतों के लिए ग्रीन रेटिंग सिस्टम डिवेलप करने वाली संस्था द एनर्जी रिसर्च इंस्टीट्यूट (टेरी) के मुताबिक ग्रीन बिल्डिंग के सपने को साकार करना कतई मुश्किल नहीं है। बस घर बनाते समय कुछ छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखना होता है। जैसे कि ग्रीन हाउस अगर चाहते हैं तो उसमें खिड़की और दरवाजों का आकार पारंपरिक घरों की तुलना में अलग होता है ताकि कुदरती रोशनी आ सके। सोलर फिटिंग्स से भी बिजली बिल बचाने में काफी मदद मिलती है।

शनिवार, 28 मार्च 2020

बच्चों का बचपन न मुर्झाने दें


हमारे व्यक्तित्व को बनाने में बहुत से कारक काम करते हैं पर इसका असली बीज हमारे बचपन में ही पड़ जाता है। इस रहस्य को जानने के लिए एक चाबी भी आपके पास ही है। ऐसे कई आनुवंशिक और पर्यावरणीय कारक हैं जो बचपन के शुरुआती साल में ही असर डालने लगते हैं। आइए जानते हैं कि एक बच्चे की सामाजिक, आर्थिक स्थिति उसके विकास के विभिन्न क्षेत्रों को कैसे प्रभावित करती है।
सामाजिक आर्थिक स्थिति
इससे पहले कि जब हम पैदा होते हैं, हमारे आसपासएक खास स्थिति होती है उसी के आधार पर हमारा जीवन स्तर निर्धारित होता है।
सामाजिक आर्थिक स्थिति (एसईएस) समाज में व्यक्तियों के सामाजिक और वित्तीय स्तर को बताती है। जन्म से पहले और जीवन के शुरुआती वर्षों से आपकी सामाजिक आर्थिक स्थिति आपके माता-पिता पर निर्भर करती है, क्योंकि वे आपके और आपके शुरुआती विकास के लिए वित्तीय रूप से जिम्मेदार हैं।

आपके माता-पिता की सामाजिक आर्थिक स्थिति आपके शुरुआती विकास के बारे में कई बातें निर्धारित करेगी: आप दुनिया को कैसे देखते हैं; क्या, कितना, और कितनी बार खाते हैं; आपका समग्र स्वास्थ्य, आपके प्रति दूसरों का नजरिया
यह एक प्रकार की बचपन की प्रारंभिक शिक्षा है।
यह जीवन में आपकी बाद की सफलता या विफलता को भी प्रभावित करता है। यकीनन, हमारे जीवन का बहुत सा हिस्सा क्या होता है क्या नहीं द्रारा निर्धारित होता है। दो साल की उम्र से लेकर पांच साल की उम्र तक हम अपनी दुनिया को खोज रहे हैं और समझ रहे होते हैं।
संज्ञानात्मक विकास पर प्रभाव
आइए पहले देखें कि SES कैसे संज्ञानात्मक और भाषा विकास को प्रभावित करता है। संज्ञानात्मक हमारी विभिन्न अवधारणाओं, विषयों और प्रक्रियाओं को सोचने और समझने की क्षमता को संदर्भित करता है। अधिक जटिल विचारों को समझने की हमारी क्षमता इस पर निर्भर करती है कि जीवन के शुरुआती वर्षों में हमने सरल विचारों को कैसे प्रकट किया। अवधारणाओं की एक विस्तृत विविधता को अपने जीवन की प्रारंभिक शिक्षा कार्यक्रम से ही शुरू कर देने से आगे चलकर अपने आप को प्रकट करना सबसे आसान हो जाता है।
एक युवा बच्चे का एसईएस उसकी भाषा और संज्ञानात्मक क्षमताओं दोनों को प्रभावित करता है कि वह अपने माता-पिता से क्या सीख पाता है। एक बच्चे के रूप में हम जो सीखते हैं, उनमें से अधिकांश शब्द हमारे माता-पिता से आते हैं, इसलिए हमारी भाषा के विकास में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। कम एसईएस वाले कई लोग आमतौर पर उच्च एसईएस वाले लोगों की तुलना में कम शिक्षित होते हैं। वे अपने बच्चों को अधिक महत्वपूर्ण स्तर पर सोचने के लिए आवश्यक अवधारणाओं और विषयों को पढ़ाने में सक्षम नहीं हो सकते हैं। वे उन शब्दों का भी ठीक से उपयोग नहीं कर सकते हैं जो उनके बच्चों के भीतर उचित भाषा के विकास की अनुमति देते हैं। बच्चे अक्सर अपने माता-पिता के बोलने के तरीके से प्रभावित होते हैं और उसी तरह बोलते हैं, जिसका अर्थ है कि यदि कोई अभिभावक अनुचित भाषा का उपयोग करता है, तो बच्चे भी वैसी ही भाषा का प्रयोग कर सकते हैं।
एक और तरीका एसईएस बच्चों पर सकारात्मक प्रभाव डालता है और उनके
संज्ञानात्मक कौशल को प्रभावित करता है, जब वे अच्छे स्वास्थ्य में होते हैं तो सोचने की बेहतर क्षमता होती है। एक कम एसईएस का एक नियमित आधार पर स्वस्थ भोजन खाना मुश्किल हो सकता है, जबकि एक उच्च एसईएस नियमित आधार पर स्वस्थ भोजन आसानी से प्राप्त कर लेता है। एक भूखा बच्चा वर्णमाला पर ध्यान केंद्रित करने में सक्षम नहीं होता क्योंकि उसके दिमाग में एकमात्र चीज भूख लगना होता है । आखिरकार, अधिकांश वयस्क समझते हैं कि भूख के बारे में इतना क्या सोचना.. लेकिन स्वस्थ खाद्य पदार्थ नहीं खाने से कुपोषण होता है, पौष्टिक भोजन न मिलने से दिमाग बेहतर तरीके से संचालित नहीं होता।
भावनात्मक विकास पर प्रभाव
अब आइए देखें कि SES बच्चों में भावनात्मक विकास को कैसे प्रभावित करता है। कम SES वाले परिवार में बड़े होने वाले युवा बच्चों में भावनात्मक और व्यवहार संबंधी समस्याएं होने की संभावना अधिक होती है। यह बड़े पैमाने पर तनाव के कारण होता है जो भोजन, कपड़े, आदि जैसे आवश्यक संसाधनों के लिए संघर्ष के साथ आता है। माता-पिता द्वारा लाया गया तनाव, यह प्रभाव डालता है कि वे अपने बच्चों के साथ कैसे बातचीत करते हैं, और इसके परिणामस्वरूप बच्चों को तनाव भी होता है। थोड़े समय के भीतर ही बच्चे के भीतर उच्च स्तर की चिंता के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। क्योंकि बच्चा यह जानने के लिए बहुत छोटा है कि तनाव और चिंता से कैसे निपटें, वह अनुचित व्यवहार प्रदर्शित कर सकता है। माता-पिता यह नहीं समझ सकते हैं कि बच्चा ऐसा क्यों कर रहा है, और उनके पास बच्चे को डॉक्टर या मनोवैज्ञानिक के पास ले जाने का साधन नहीं होता । इसलिए, वे बच्चे को दंडित करते हैं। सजा के बाद, बच्चा संभवतः अधिक निराश और भावनात्मक रूप से अधिक अस्थिर हो जाएगा। जैसा कि आप समझ सकते हैं, इन शुरुआती विकासात्मक वर्षों के माध्यम से एक चक्र शुरू होता है जो अनवरत जारी रहता है। इसलिए भावनात्मक रूप से स्थिर बच्चे ज्यादा अच्छी तरह अपनी प्रतिभा को सामने ला पाते हैं और भावनात्मक रूप से कमजोर बच्चे विकसित होने के बजाय, वे तेजी से अस्थिर हो जाते हैं। छोटी उम्र में भी, बच्चे जानते हैं कि वे कब दूसरों से अलग होते हैं। इस वजह से, वे भावनात्मक रूप से कमजोर हो जाते हैं और वह हीन भावना के शिकार हो जाते हैं। कभी कभी वह अवसाद में भी चले जाते हैं । जबकि उनकी उम्र के बच्चे अपनी मस्ती में रहते हैं।

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