आधुनिक लाइफस्टाइल ब्लॉग: फैशन, संस्कृति, कहानियों और संस्मरणों का अनूठा संगमआज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हम अक्सर अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और उन छोटी-छोटी खुशियों को भूल जाते हैं जो हमारे जीवन को असल मायने में खूबसूरत बनाती हैं। लाइफस्टाइल का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि हम क्या पहनते हैं या हम कहाँ घूमते हैं, बल्कि इसका गहरा संबंध हमारी सोच, हमारे साहित्य और हमारी विरासत से भी है। यदि आप भी एक ऐसे मंच की तलाश में हैं जहाँ आधुनिकता और परंपरा का एक खूबसूरत संतुलन देखने को मिले, तो यह आपके लिए है।
शनिवार, 30 मई 2026
लंदन फोर्ट: स्मृतियों का चुंबक और ननिहाल की वह पोटली
आज एकादशी है। पापा को हमसे दूर गए पूरा 1 महीना हो गया। उनकी दैहिक लीला भले ही समाप्त हो गई हो, पर वे हर समय, हर जगह मेरे आस-पास मौजूद हैं। उनकी मुस्कान आज भी हवा में किसी मीठी सुगंध की तरह तैरती है और मुझे छूकर गुज़र जाती है।
अपने अंतिम दिनों में पापा अक्सर एक नाम पुकारते रहते थे—'राधेश्याम'। मेरे मन में यह जिज्ञासा हुई कि आखिर कौन थे ये राधेश्याम, जिन्हें पापा अपने जीवन के आखिरी पड़ाव पर इतनी व्याकुलता से पुकार रहे हैं? कभी लगता कि शायद वे ईश्वर का स्मरण कर रहे हों, पर पापा कृष्ण के इतने बड़े भक्त भी नहीं थे। वे दैनिक पूजा अवश्य करते थे, लेकिन किसी एक खास देवता को अपना आराध्य नहीं मानते थे—हाँ, सुबह उठकर सूर्य को अर्घ्य देना और प्रणाम करना वे कभी नहीं भूलते थे।
यहीं से शुरू हुई मेरे द्वारा राधेश्याम जी की खोज।
यह जानकर मुझे गहरा आश्चर्य हुआ कि जीवन के अंतिम पड़ाव पर हम लौटकर फिर से अपने बचपन को जीने लगते हैं। बचपन का जो हिस्सा जहाँ सबसे ज़्यादा बीता हो, वह बुढ़ापे की यादों में एक चुंबक का काम करता है। पापा तब बहुत छोटे रहे होंगे। एक बार उनके नाना उनसे मिलने उनके घर बिषाड़ आए। बिषाड़ यानी पिथौरागढ़ जिले का हमारा वह पुश्तैनी गाँव। पापा तब घर पर नहीं थे, बाहर अपने दोस्तों के साथ खेल रहे थे।
नाना ने अपनी सबसे बड़ी बेटी लीलावती (मेरी दादी) से घर-परिवार का कुशल-क्षेम पूछा। लीलावती की दो और बहनें थीं—घंटी और भगवती। उस समय मेरी दादी अपने इकलौते बच्चे की शरारतों से बेहद चिंतित और परेशान रहती थीं, क्योंकि उनके पास घर-गृहस्थी के भी ढेरों काम थे। उनके पति (मेरे दादाजी) दिल्ली के चाँदनी चौक में लालाओं के राज-पुरोहित और राज-ज्योतिषी का काम करते थे, जहाँ स्वर्णकार समाज उनका मुख्य यजमान था। वे दिल्ली में पूरी तरह व्यस्त रहते थे और बीच-बीच में ही गाँव आया करते थे। ऐसे में पहाड़ के घर की पूरी ज़िम्मेदारी अकेले लीलावती के कंधों पर थी।
परेशान होकर उन्होंने अपने पिता से कहा—"दिनभर इसका यही काम है, बस खेलता रहता है।"
नाना ने मुस्कुराकर कहा—"अच्छा! आने दो उसे।"
थोड़ी देर में पापा खेलते हुए घर आए। नाना ने उन्हें अपने पास बुलाया और सीधे 'दो का पहाड़ा' सुनाने को कहा। पापा ने बिना झिझके पूरा पहाड़ा सुना दिया। वे नाना की परीक्षा में सौ फीसदी पास हो चुके थे।
पापा के इन नाना का नाम था—श्री हरी नाथ पंत जी। वे अपने समय के एक अत्यंत मशहूर और सिद्ध वैद्य थे, जो पिथौरागढ़ के ही एक ऐतिहासिक गाँव 'उपराड़ा' में रहते थे। उपराड़ा (जो संस्कृत के उपराट् से अपभ्रंश होकर उपराड़ बना) के बारे में कहा जाता है कि कभी यह मणिकोटी राजाओं द्वारा पंतों को सम्मानित कर बसाया गया था। एक अन्य लोकश्रुति के अनुसार, यह पहले उप्रेतियों का गाँव 'उपरेत्यूड़' था, जिन्हें अन्यत्र बसाकर यहाँ पंतों को स्थापित किया गया। उपराड़ा का वह विशिष्ट मोहल्ला आज भी 'वैद्यूड़' (वैद्यों की बस्ती) कहलाता है, क्योंकि यहाँ के पूर्वजों का मुख्य व्यवसाय ही वैद्यक (आयुर्वेद) था। इस परिवार को नेपाल दरबार में 'राजवैद्य' के रूप में उच्च मान्यता प्राप्त थी। कुमाऊँनी भाषा के आदि-कवि गुमानी पंत भी इसी गौरवशाली परिवार से थे।
पापा के ये नाना १७वीं-१८वीं शताब्दी के रहे होंगे, जब पहाड़ों पर गोरखाओं का कड़ा शासन था। भौगोलिक दृष्टि से भी पिथौरागढ़ नेपाल की सीमा से एकदम सटा हुआ है, इसलिए यहाँ नेपाल दरबार का सीधा प्रभाव था। गोरखा शासन के इसी दौर के बाद ही यहाँ ईस्ट इंडिया कंपनी का आगमन हुआ था।
नाना हरी नाथ पंत पापा की कुशाग्र बुद्धि से इतने प्रभावित हुए कि वे उन्हें अपने साथ अपने गाँव 'उपराड़ा' ले गए। वहीं पापा की विधिवत शिक्षा आरंभ हुई। नाना ने पापा के साथ ही अपनी सबसे छोटी बेटी (मेरे पापा की मौसी भगवती) का नाम भी स्कूल में लिखवा दिया। इस तरह मौसी और भांजे आपस में सहपाठी बन गए और दोनों ने कक्षा ५ तक की पढ़ाई एक साथ पूरी की।
पापा के दाहिने हाथ में एक बहुत गहरा और पुराना निशान था। उनके हाथ का यही निशान मेरे लिए उनके बचपन की वह 'पोटली' थी, जिसकी चर्चा छिड़ते ही वे मखमली मौज में आ जाते थे और ढेरों किस्से सुनाने लगते थे। वे सचमुच एक अद्भुत किस्सागो थे।
वे हाथ का निशान दिखाते हुए बताते थे—"एक बार ननिहाल में चूल्हे पर बड़े पतीले में गाय के भोजन के लिए 'दौ' (एक प्रकार का पहाड़ी अनाज/दाल) उबलने के लिए रखी हुई थी। आग एकदम तेज़ थी। मेरे बाल-मन में यह जानने की तीव्र इच्छा हुई कि आखिर इसके भीतर क्या पक रहा है? जैसे ही मैंने लपककर पतीले का भारी ढक्कन उठाया, खौलता हुआ गर्म पानी सीधे मेरे दाहिने हाथ पर आ गिरा。" वह जख्म बहुत गहरा और डरावना था। लेकिन नाना के अचूक वैद्यकीय उपचार और नानी की ममतामयी देखभाल से ही पापा का वह हाथ पूरी तरह ठीक हो पाया था।
शायद जितना गहरा वह जख्म था, उतना ही गहरा और अमिट था पापा का अपने ननिहाल से प्रेम। पापा के सगे मामा नहीं थे। राधेश्याम जी दरअसल उनके नाना के सगे भतीजे थे, जिन्हें नाना पुत्रवत स्नेह देते थे। इस नाते, मामा राधेश्याम के साथ पापा का लगाव सगे भाइयों जैसा हो गया था। राधेश्याम उनके केवल मामा नहीं, बल्कि उनके बचपन के सखा और उनकी जिंदगी के सबसे खूबसूरत लम्हों के साझीदार थे।
जैसा कि परिवार में बताया जाता है, राधेश्याम जी अध्यात्म में गहरे डूबे रहने वाले व्यक्ति थे और ईश्वर को बहुत मानते थे। यही कारण था कि पापा ने अपने महाप्रयाण (अवसान) से ठीक पहले उन्हें इतनी शिद्दत से याद किया। अपनी मृत्यु से कुछ दिन पूर्व, पापा ने अचानक शून्य में देखते हुए अपनी माँ को पुकारा था—
"ईजा..."
वह आवाज़ इतनी साफ़ और गहरी थी कि कमरे में मौजूद सभी लोगों ने उसे स्पष्ट सुना। मुमकिन है, ऊपर स्वर्ग के झरोखे से उनकी 'ईजा' ने भी अपने बच्चे की इस पुकार को सुन लिया होगा.
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