आज पापा को गए एक माह हो गया ।
दैहिक लीला समाप्त हो गई पर वह हर समय हर जगह मौजूद हैं । उनकी मुस्कान हवा में सुगंध की तरह तैरती है। मुझे छूती है । अपने अंतिम दिनों में पापा राधेश्याम का नाम अक्सर लेते रहते। मन में यह जिज्ञासा हुई कि कौन थे राधेश्याम। जिसे पापा इतना पुकारते हैं। कभी लगता कि शायद ईश्वर को याद करते हों, पर नहीं वह कृष्ण के इतने भी भक्त नहों थे। वह पूजा अवश्य करते पर किसी खास देवता को अपना आराध्य नहीं मानते थे। हां सूर्य को प्रणाम करना वह कभी नहीं भूले।
यहीं से शुरू हुई राधेश्याम जी की खोज।
यह जानकर आश्चर्य हुआ कि जीवन के अंतिम पड़ाव पर हम अपने बचपन को फिर से जीने लगते हैं वह विचार हमारे दिमाग पर असर डालते हैं। बचपन का जो हिस्सा सबसे ज्यादा जहां बीता हो वह हमारी याद में चुंबक का काम करता है। पापा तब बहुत छोटे रहे होंगे जब एकबार उनके नाना उन सबसे मिलने उनके घर आए । घर यानी बिषाड़। पिथौरागढ जिले का एक गांव । पापा घर पर नहीं थे। अपने दोस्तों के साथ बाहर खेल रहे थे। उन्होंने अपनी बेटी लीलावती से कुशल क्षेम पूछी। लीलावती उनकी सबसे बड़ी बेटी थी। दो और बेटियां थीं जिनके नाम थे घंटी और भगवती। लीलावती अपने बच्चे की शरारतों से चिंतित थी क्योंकि उनके पास घर गृहस्थी के भी बहुत सारे काम थे । उनके पति दिल्ली में चांदनी चौक में लालाओं के राज पुरोहित और राज ज्योतिषी का काम करते थे। स्वर्ण कार उनके यजमान थे। वह वहां पूरी तरह व्यस्त थे और बीच-बीच में गांव आया करते थे। घर की पूरी जिम्मेदारी लीलावती पर थी।
निराश होकर उन्होंने कहा दिनभर इसका यही काम है।
अच्छा
नाना ने कहा
थोड़ी देर में पापा घर आए। नाना ने उनसे दो का पहाड़ा सुनाने को कहा।
उन्होंने सुना दिया . नाना की परीक्षा में वो पास हो गए उनके नाना नाम था हरी नाथ पंत जो मशहूर वैद्य थे और पिथौरागढ़ के ही एक गांव उप्राणा में ही रहते थे।उपराड़ा (सं उपराट् > उपराड़्)। मणिकोटी राजा के द्वारा सम्मानित होने के कारण। एक अन्य मत के अनुसार यह पहले उप्रेतियों का गांव, "उपरेत्यूड़" था। उन्हें अन्यत्र बस कर पंतों को यहां बसाया गया।
उपराड़ा में उनका मोहल्ला ही वैद्यूड़ (वैद्यों की बस्ती) कहलाता है, क्योंकि पूर्वजों का मुख्य व्यवसाय वैद्यक था। नेपाल दरबार में राजवैद्य के रूप में मान्यता थी।
उनके बारे में कहा जाता है कि वह नेपाल नरेश के राज वैद्य थे। कुमाऊनी के पहले कवि गुमानी पंत इसी परिवार से थे। उनके . नाना 17-18वीं सदी के रहे होंगे। उस समय वहां गोरखों का शासन था।भौगोलिक दृष्टि से भी देखें तो पिथौरागढ़ नेपाल की सीमा से एकदम सटा हुआ है। गोरखों के बाद ही ईस्ट इंडिया कंपनी का आविर्भाव हुआ था।
उनके नाना उनको अपने साथ अपने गांव ले गए और उनकी विधिवत शिक्षा आरंभ हुई।
पापा के दाहिने हाथ में एक गहरा निशान था। उनके हाथ का यह निशान ही मेरे लिए उनके बचपन की पोटली थी। जिसकी चर्चा करते ही मौज में आते ही वह कई कथाएं कहते। वह बहुत अच्छे किस्सा गो थे। वह बताते थे एमबार ननिहाल में पतीले में गाय के भोजन लिए दौ उबालने के लिए रखा था। मेरी इच्छा यह जानने की हुई क्या पक रहा है । आग एकदम तेज थी।जैसे ही मैंने पतीले का ढक्कन उठाया गर्म खौलता पानी मेरे हाथ में गिर गया। मेरे नाना वैद्य थे। उनके उपचार और नानी की देखभाल से ही मेरा हाथ ठीक हो पाया । सचमुच वह जख्म बहुत गहरा था। और उतना ही गहरा था उनका अपने ननिहाल से प्रेम। पापा के मामा नहीं थे ।राधेश्याम उनके नाना के भतीजे थे। जिनको वह पुत्रवत स्नेह करते थे। इस तरह मामा राधेश्याम के साथ उनका गहरा लगाव था। राधेश्याम उनके सखा भी थे। उनकी जिंदगी के खूबसूरत लम्हों के साझीदार । जैसा मुझे बताया गया राधेश्याम जी ईश्वर को बहुत मानते थे। पापा ने अपने अवसान से पहले उनको बहुत याद किया। अपनी मृत्यु से कुछ दिन पूर्व उन्होंने अपनी मां को आवाज़ लगाई और कहा ,
ईजा
यह आवाज़ सभी ने सुनी ।
ईजा ने भी।
