गुरुवार, 9 जुलाई 2026

लंदन फोर्ट वैष्णव भक्ति और अन्यारी देवी का रहस्य


२५ जून, गुरुवार। एकादशी। पापा को हमसे दूर गए आज पूरे दो महीने हो गए हैं। ठीक एक महीने पहले मैंने उन पर पहला स्मृति लेख लिखा था, जिसे पढ़कर आप सभी ने मुझे इसे जारी रखने की प्रेरणा दी। आप सभी का हृदय से आभार।

मेरी इस खोज की कथा में आज फिर राधेश्याम जी उपस्थित हैं। जी हाँ, वही राधेश्याम जी, जिन्हें मेरे पापा अपने अंतिम दिनों में बहुत याद कर रहे थे। वे पापा के मामा भी थे और सखा भी। वे उन्हें क्यों याद कर रहे थे, इसकी कई वजहें मैंने खोजीं, पर सबसे महत्वपूर्ण कड़ी मुझे मिली जाने-माने भाषाविद डॉ. सुरेश चंद्र पंत जी की एक टिप्पणी में। उन्होंने लिखा था:

"इस विवरण के बहुत से पात्रों को देखने का सौभाग्य मिला है। हरीनाथ ताऊजी गाँव के सबसे शालीन व्यक्तित्व थे। राधेश्याम दा परम वैष्णव भक्त थे। उनका वास्तविक नाम लक्ष्मी दत्त था, पर वे राधेश्याम नाम से ही प्रसिद्ध हुए। वे नित्य सुबह-शाम कई घंटे नाम संकीर्तन करते थे। सौम्य और मृदुल व्यवहार; जो एक बार मिल ले, कभी भूल न पाए। उन्होंने अपने बच्चों का नाम भी नारायण और नारायणी रखा था। मेरे पिताजी बताते थे कि अपने निधन से पहले राधेश्याम दा ने परिवार के कुछ लोगों को पोस्टकार्ड लिखकर बता दिया था कि अमुक दिन राधेश्याम नहीं रहेंगे। और अचरज देखिए, ठीक उसी दिन वे विदा हो गए। स्व. देवेंद्र जी (आपके पापा) को अपने निधन से पहले वही अविस्मरणीय व्यक्तित्व याद आया होगा, जिसकी अमिट छाप बचपन में ही उनके मन पर पड़ गई थी।"

निश्चित ही, मेरे पापा इस रहस्य को जानते होंगे। वे मन ही मन खुद से पूछते होंगे—"राधेश्याम को अपने अंत का अहसास पहले ही हो गया, मुझे क्यों नहीं हो पा रहा है?"

पापा, अब तो आप राधेश्याम जी से मिल लिए होंगे। वहाँ ऊपर आप दोनों का समय अच्छा कट रहा होगा। वे भी वैष्णव थे और आप भी। और देखिए न, आप गए भी तो एकादशी के ही पवित्र दिन पर। जहाँ भी हो, खुश रहना, पापा। इस बार हमारी शादी की सालगिरह भी बहुत सूनी रही। उसके ठीक अगले दिन आपका जन्मदिन होता है। काश! आप दो महीने और रुक जाते, तो पूरे ९० साल के हो जाते। आप केक खाते हुए कितने खुश होते थे, आपकी वह मासूम मुस्कान अब मेरी स्मृतियों की स्थायी पूँजी है।

आप हमेशा कहते थे—"कुछ भी हो जाए, लिखना मत छोड़ना।" मेरे पहले पाठक और सबसे पैनी नज़र वाले आलोचक आप ही थे। एक बार आपने मुझे शब्दों की गहराई समझाते हुए कहा था—"शब्दों में भी वजन होता है। जब कविता लिखो, तो शब्दों को हल्का और वाक्यों को छोटा रखो। वजनी शब्दों को लेख के लिए बचाकर रखो।" मैंने तब यूँ ही पूछ लिया था—"कहानी के लिए क्या करूँ पापा?" आपने कहा था—"दृश्य की तरह लिखो।" मैं आज आपकी उसी सीख को पन्नों पर उतारने की कोशिश कर रही हूँ, पापा। तो सुनो, अब आगे की कथा...

सोर घाटी में वैष्णव लहर और श्री संप्रदाय का प्रभाव


आठवीं से बारहवीं सदी के मध्यकाल में उत्तराखंड की धरती पर वैष्णव धर्म का व्यापक असर था। कत्यूरी राजाओं ने बैजनाथ, द्वाराहाट और चमोली में भव्य मंदिरों की स्थापना शुरू की थी, जिनकी मूर्तिकला में वैष्णवी प्रभाव साफ झलकता है। एक दौर ऐसा भी आया जब वैष्णव धर्म मानो राष्ट्र का मुख्य धर्म बन गया था। यह लहर वैसी ही थी, जैसे प्राचीन काल में यूनानी राजदूत हेलियोडोरस (ई.पू. २००) ने विदिशा (भेलसा) में गरुड़ स्तंभ बनवाया था और खुद को गर्व से 'परम भागवत' कहा था। पाणिनि के काल से भी पहले, तैत्तिरीय आरण्यक के 'विष्णु गायत्री' मंत्र में विष्णु, नारायण और वासुदेव का स्पष्ट उल्लेख मिलता है:

"नारायणाय विद्महे वासुदेवया धीमहि तन्नो विष्णु प्रचोदयात्।"

हमारे पूर्वज और तारादत्त जी के बड़े भाई, प्रेम बल्लभ जी इसी गायत्री मंत्र के परम उपासक थे। वैष्णवों के चार प्रमुख संप्रदायों (श्री, हंस, ब्रह्म और रुद्र) में से हमारा परिवार 'श्री संप्रदाय' को मानता है, जिसे आज रामानुज संप्रदाय के नाम से जाना जाता है। इस संप्रदाय के अनुयायी 'श्री वैष्णव' कहलाते हैं। इनका दार्शनिक सिद्धांत 'विशिष्टाद्वैत' है और ये भगवान लक्ष्मी-नारायण की सात्विक उपासना करते हैं।

अन्यारी देवी: वैष्णव कुल में शाक्त कुलदेवी का रहस्य


इस परम वैष्णव पृष्ठभूमि के बीच हमारी अपनी एक कुलदेवी भी हैं—माँ अन्यारी देवी। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में माँ को समर्पित प्राचीन थान (मंदिर) हैं। मन में अक्सर यह जिज्ञासा उठती है कि एक शुद्ध शाकाहारी, वैष्णव कुल में, जहाँ लहसुन-प्याज तक वर्जित है, वहाँ अंधकार की अधिष्ठात्री देवी 'अन्यारी' को कुलदेवी के रूप में क्यों चुना गया?

उत्तराखंड की लोककथाओं और शाक्त मान्यताओं के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में माँ आदिशक्ति परब्रह्म के रूप में प्रकट हुईं। समय, विकारों और विपरीत परिस्थितियों के अनुसार माँ ने अलग-अलग रूप धारण किए। इन्हीं में से अंधकार को नियंत्रित करने वाला रूप 'अन्यारी देवी' (अंधेरी देवी) कहलाया और प्रकाश को समर्पित रूप 'उज्याली देवी' बना।

इस रहस्य को समझने के लिए हमें अपने पुरखों के समय और इतिहास को टटोलना होगा। मेरे भाई बताते हैं कि हमारे प्रतापी पूर्वज श्री तारादत्त भट्ट जी का जन्म सन् १८०२ में हुआ था। वे अपने समय में कुमाऊं क्षेत्र की एक अत्यंत सम्मानित और रसूखदार शख्सियत थे। तत्कालीन ब्रिटिश सरकार से उनके घनिष्ठ संबंध थे। प्रारंभिक ब्रिटिश काल में एक महत्वपूर्ण सरकारी पद संभालने वाले वे बिषाड़ गाँव के पहले व्यक्ति थे। सरकार ने उन्हें स्थानीय लोगों के आपसी विवादों को सुलझाने का न्यायिक अधिकार दिया था। उन्होंने ७८ वर्ष की आयु में अल्मोड़ा के झिझाड़ में अपनी वसीयत लिखी थी। पिथौरागढ़ के बिषाड़ में स्थित हमारा पुश्तैनी मकान 'ठुलकुड़ा' (बड़ा घर), चार गाँव की जागीर और अन्य संपत्तियाँ उन्हीं की मेहनत की बदौलत हैं। वह ऐतिहासिक कमरा, जहाँ बैठकर वे अपनी कचहरी लगाते थे और फैसले सुनाते थे, आज भी ठुलकुड़ा की इमारत में 'तारा भट्ट की कचहरी' के नाम से सुरक्षित है।

अंधकार में छिपी आस्था: इतिहास का एक साक्ष्य


तारादत्त जी के जन्म का वह दौर (सन् १८०२) और उससे पहले का समय मुग़ल हुकूमत के उतार-चढ़ाव और अत्याचारों से भरा था। लगभग ३३० वर्षों के उस दौर में देश के कई हिस्सों में हिंदुओं की धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रहार हुए, मंदिर तोड़े गए। इतिहासकारों और पारिवारिक जनश्रुतियों के अनुसार, संभवतः इसी दमनकारी समय में हमारे पुरखों ने अपनी आस्था को सुरक्षित रखने के लिए एक गुप्त मार्ग चुना।

अपने आराध्य की रक्षा के लिए उन्होंने घने जंगलों या एकांत कक्ष के अंधकार में, रात के समय पूजा करना प्रारंभ किया और अपनी कुलदेवी का नाम 'अन्यारी' रखा, जिसका कुमाऊँनी में अर्थ 'अंधकार' होता है।

चूँकि हमारे पूर्वज परम वैष्णव थे, इसलिए उन्होंने माँ अन्यारी की पूजा में पहाड़ों में प्रचलित पशु-बलि की कुप्रथा को कभी स्वीकार नहीं किया। माँ तामसी नाम के साथ पूजी ज़रूर गईं, पर उनकी पूजा पूरी तरह सात्विक रही—जहाँ बलि के स्थान पर आज भी केवल नारियल चढ़ाया जाता है। यह प्रसाद इतना पवित्र और गुप्त होता है कि इसे केवल हमारे कुटुंब के लोग ही ग्रहण करते हैं, बाहरी व्यक्ति को यह नहीं दिया जाता। इस प्रकार, अन्यारी देवी हमारी कुलदेवी तो हैं, पर उनकी पूजा और प्रसाद का तरीका विशुद्ध वैष्णवी है। यह व्यवस्था हमारे पूर्वजों की बुद्धिमत्ता का एक नायाब उदाहरण है, जिन्होंने विपरीत काल में भी अपनी वैष्णव मर्यादा और कुलदेवी की आस्था, दोनों को जीवित रखा।

नौएडा की इस शांत शाम में, अपनी इस डायरी को विराम देते हुए, मैं पापा को याद कर बृहदारण्यक उपनिषद की उसी प्रार्थना को दोहराती हूँ, जो शायद सदियों पहले मेरे पूर्वजों ने भी उस अंधकार भरे दौर में माँ अन्यारी के सामने दोहराई होगी:

"असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय।"
(हे माँ, मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो। मुझे अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो।



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(इस कथा को कहने में मेरे सहयात्री रहे हैं मेरे बड़े भाई निर्मल भट्ट जी, मदन भट्ट जी और डा. सुरेश चंद्र पंत जी)

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