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गुरुवार, 16 मई 2013

मुक्ति की प्रार्थना

जब मेरे मामा की मृत्यु हुई तब मेरे नाना जिंदा थे। वह लोगों से कह रहे थे अच्छा हुआ उसे मुझसे पहले इसे मुक्ति मिल गई। किसी भी समाज का पिता यह चाहता है कि मेरे शव को मेरा पुत्र कंधा दे, मुझे मुखा िग ्न देकर विदा करे। पर मेरे नाना का यह उलट व्यवहार लोगों के लिए कानाफूंसी का विषय बनता जा रहा था।
जब मामा की मृत्यु हुई उस समय हम दीदी की शादी में लखनऊ गए हुए थे। पर मामा की डोली हमारे आने पर ही उठी। मैंने सुना मेरे कई रिश्तेदारों कह रहे थे, कैसे पिता हैं यह। बेटे का शोक होना चाहिए और यह .. ..
मैंने नाना के पास बैठते हुए उनकी हथेली मे अपनी हथेली टिकाई। वह कान कम सुनते थे इसलिए उनसे बात करने का मेरा यही तरीका था अन्य दिनों वह हासपरिहास में कहा करते मेरा हाथ मत तोड़ देना पर यह बेला हास परिहास की नहीं थी। वह लिखकर बात करते थे। मैंने लिखा आप यह सब क्या बोल रहे हैं लोग आपकी बात नहीं समझ रहे हैं। वह मेरी ओर देखने लगे। मैंने अपने होंठां पर उंगली रख ली। उन्होंने कहा अच्छा. और चुप हो गए। मैंने लिखा बाद में बात करेंगे। फिर मैंने लिखा आखिर आप ऐसा क्यों कह रहे हैं लोग आपकी बात का गलत अर्थ निकाल रहे हैं । नाना ने क्या लिखा आप भी पढि़ए -
मैं इसलिए ऐसा कह रहा हूं कि अगर वह जिंदा रहता और मैं मर जाता तो कौन उसकी देखभाल करता। मैं उसकी सेवा तो नहीं कर सकता और न उस तरह की देखभाल पर उसे देख तो सकता था। उसकी तकलीफ पर किसी को बुला तो सकता था। उसकी सेवा करवा सकता था। पर अब मैं ही कितने दिन रहूंगा इसका पता नहीं फिर मैं अपने बेटे को इस हाल में देखकर मर भी तो नहीं पाता उसे मुक्ति मिली और अब मुझे भी मुक्ति मिल जाएगी।
मैंने उसे बहुत तकलीफ दी वह इसलिए कि वह लाचार न बनें। और तेरे मामा ने वह सब कर दिखाया जो एक सामान्य आदमी भी नहीं कर सकता। उनकी बूढ़ी आंखों में अपने बेटे के लिए पहली बार आँसू थे। वह क्षमायाचना कर रहे थे। अपने बेटे के लिए प्रार्थना कर रहे थे। अपने बेटे के जीवट को सराह रहे थे। बिना पतझड़ के भी मेरे नाना बिखर रहे थे उनके मन के तार एक विषाद संगीत सुना रहे थे जिसके तार आज पहली बार बज रहे थे। नाना की कठोरता का कवच एक हिम पिंड बन गया था जहां वह पक्षाघात से अवसन्न पड़े बेटे की मुक्ति की प्रार्थना कर रहे थे।

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