यह ब्लॉग खोजें

गुरुवार, 12 जुलाई 2012



 मित्रों,
   जिंदगी में कब क्या हो जाए किसी को नहीं पता होता। ऐसा ही दिन था सोमवार।  सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था। दोपहर का वक्त था। यही 1 बजे का समय होगा। मेरे पति ऑफिस जा चुके थे। सोचा दोपहर का खाना खा लिया जाए और उसके बाद अपराजिता के नए अंक यानी जीवनशैली की तैयारी में जुटा जाए। मेटर आ चुका था और संपादन करना बाकी था। छिटपुट अनुवाद का काम बचा था।
हम खाना खाने बैठे ही थे कि  मैंने देखा बाबा यानी मेरे ससुर जी ठीक से खाना नहीं खा रहे हैं। मैंने पूछा क्या बात है? सब्जी क्यों नहीं खा रहे हैं? बोले मेरा खाना खाने  का मन नहीं कर रहा। लग रहा है गला घुट रहा है। मैं थोड़ा आराम करने के बाद खाना खा लूंगा। तुम लोग खाओ। वह जाकर लेट गए। वह हमेशा बिस्तर पर लेटते हैं पर उस दिन वह जमीन पर चटाई बिछाकर लेट गए। अचानक उनकी तबियत बिगडऩे लगी।
 मैंने कई डॉक्टरों को फोन लगाया पर किसी का फोन नहीं उठा। मुझे भी घबराहट होने लगी पर मैंने जाहिर नहीं की। अपने पति से अपने जीजाजी का नंबर मांगा। क्योंकि मेरे मोबाइल पर  नंबर सेव होने में दिक्कत आ रही थी। उन्होंने मुझे नंबर दिया हॉलचाल पूछा। मैंने बताया बाबा की तबियत ठीक नहीं है।  तभी मेरी दोस्त घर आई। मैंने उसे साथ लिया और अपने सोसायटी में डॉक्टर खोजने लगे। कोई भी डॉक्टर  उपलब्ध नहीं।  मैंने सोचा घर से बाहर तो निकलना ही होगा। अपनी बेटी को लाने की जिम्मेदारी किसी और को सौंपकर मैं दौड़ते हुए घर पहुंची। तेज दौडऩे ने सांस फूलने लगी। तो देखा गैस वाला खड़ा है । उसे देखकर गुस्सा आया  अब यह खुले पैसे मांगेगा और मुझको उलझाएगा। इसी बीच मेरे पति का फोन आया कि वह वापस  आ गए हैं और  स्थानीय अस्पताल  यथार्थ में हैं। हमें अंदेशा था शायद रक्तचाप बढ़ा हुआ  है। मेरे बाबा की तकलीफ बढ़ती जा रही थी। गैस वाला जिसे देख मैं झुंझला रही थी उसने ही रिक्शेवाले को भेजा। रिक्शा आया और मैं बाबा को लेकर अस्पताल के लिए निकल पड़ी। बाबा की परेशानी बढ़ती जा रही थी उनकी शर्ट पसीने से पूरी तरह भीग चुकी थी। वह कराह रहे थे और लगातार अपनी मां को याद कर रहे थे। बार बार हाथ जोड़ रहे थे। मैंने उनको पूरी कोशिश के साथ पकड़ लिया था। कितना दूर है बेटा बार-बार वह पूछते। रास्ते में अलग जाम। उनको भयंकर पीड़ा मे देखकर और कुछ न कर पाने की विवशता मुझे असहाय बना रही थी।  किसी तरह अस्पताल पहुंचे। उस दिन न जाने क्यों हमारे घर से  मात्र 1-2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यथार्थ बहुत दूर लगा। मेरे पति बाहर ही खड़े थे। डॉक्टर का बंदोबस्त उन्होंने कर रखा था। उनकी हालत देखकर डॉक्टर ने ईसीजी करवाया। रिपोर्ट देखकर  डॉक्टर नेतुरंत कैलाश या फोर्टिस जाने की सलाद दी और हिदायत दी जितना जल्दी हो सके इनको बड़े अस्पताल ले जाएं इनकी हालत बहुत नाजुक है।
 बाबा लगातार दर्द झेल रहे थे। मेरे पति से भी उनकी हालत देखी नहीं जा रही थी। बस हम जल्दी से जल्दी अस्पताल पहुंचना चाहते थे। कैलाश पहुंच गए। पति उनकी फाइल बनवावे लगे और मैं बाबा के साथ इमरजैंसी वार्ड में।  तुरंत ऑक्सीजन दी जाने लगी और उनका सीसीयू में ले जाया गया। प्राथमिक इलाज शुरू हो गया।  तभी डॉक्टर ने मुझे बुलाया और पूछा क्या इनके साथ हैं। कौन हैं आपके? मैंने बताया मेरे ससुर जी। कोई और भी है आपके साथ में मैंने कहा, हां मेरे पति आए हैं। क्या हुआ है इन्हें।
 डॉक्टरने कहा थोड़ी देर होती तो इनको बचा पाना संभव नहीं था। इनको हार्ट अटैक पड़ा है। क्या? मेरे मुंह से निकला। पर निर्विकार सा चेहरा बनाए डाक्टर ने कहा कि अभी और इसी वक्त इनका आपरेशन करना होगा। जिसमें 2.5 से लेकर 3 लाख का खर्च आएगा आप इतना पैसा 1 घंटे में जमा कर दीजिए।  तभी हम आपरेशन करेंगे। मेरे पति अवाक से डाक्टर का मुंह देखने लगे एक तरफ जिंदगी और मौत से जूझते पिता और दूसरी तरफ डॉक्टर का यह रवैया? इतनी बड़ी रकम वह कहां से लाएंगे।
 मेरे पास तो पैसा नहीं है? मेरे पति बोले।
 डॉक्टर ने उसी निर्विकार भाव से कहा तो पैसों की व्यवस्था तो आपको करनी पड़ेगी। आप अपने रिश्तेदारों से, दोस्तों से पैसा मांगें, फोन करें, इंतजाम कीजिए। 1 घंटे के अंदर। अच्छा आधा पैस अभी दे दीजिए। फिर 1 तो घंटे के बाद या ऐसा कीजिए 1 -1घंटे के बाद पैसा जमा करते जाइए जैसे जैसे पैसा आते जाए। सुबह तक हर हाल में पैसा जमा हो जाना चाहिए। चलिए मैं आपकी इतनी मदद कर सकती हूं कि आप लिखकर दे दीजिए कि मैं इस पैसे का  सुबह 8 बजे तक  जमा कर दूंगा। आप साइन कर दीजिए हम इलााज शुरू कर देते हैं।
 डॉक्टरों का यह रूप देखकर मन में अजीब सा होने लगा। पहली बार लगा कि इनको जान से ज्यादा पैसा चाहिए। अस्पताल नहीं यह दुकान है। सभी  डॉक्टरों का एक स्वर एक लय। जैसे इसकी तैयारी कराई गई हो। प्रशिक्षण दिया गया हो। खैर बाबा का ऑपरेशन हुआ। वह जिंदगी से युद्ध करते हुए विजयी हुए। और हम सब अपने बाबा को वापस पाकर बेहद खुश।  बाबा ने जिस तरह यद दर्द सहा मैं उसकी गवाह हूं। और यह दृश्य मैं जिंदगी में कभी भूल नहीं पाऊंगी। अपनी  मां के लिए दर्द हर उम्र में व्यक्ति महसूस करता है और मां से ज्यादा वह किसी के निकट नहीं होता इस सच्चाई से भी मैं रुबरु हुई। अपनी मां को याद करते हुए वह अपने दर्द को  बरर्दाश्त कर पाएं।  मेरे पति ने भी उसी दिन महसूस किया कि कोई शक्ति होती है जिसकी वजह से अनहोनी टल सकती है। यह आभासी शक्ति है।
 अपराजिता के कुछ अंक आप नहीं पढ़ पाएं आप सभी मित्रों और पाठकों को असुविधा हुई जिसका हमें खेद  है। शनिवार से फिर से आप पढ़ेंगे अपनी प्रिय पत्रिका अपराजिता।  विमर्श के अंक के साथ फिर उसी ताजगी के  साथ हम होंगे साथ- साथ। अनुजा





एक टिप्पणी भेजें

special post

'me too' (मैं भी)-खयालात- सदन झा

आजकल वैश्विक स्तर पर 'me too' (मैं भी) अभियान चल रहा है। लड़कियां, महिलाएं, यौन अल्पसंख्यक तथा यौनउत्पीड़ित पुरुष हर कोई अपने साथ...