एक दीवार हूँ मैं... जिस पर कील नहीं ठुकती,
ऊपर से एकदम सपाट सी दिखाई देने वाली सड़क,
या फिर कोई पगडंडी,
या यूँ ही कोई बेनाम सा मैदान...
न हरियाली, ना पेड़, एकदम सुनसान!
नीचे एकदम भुरभुरी थी ज़मीन,
जैसे कोई दीवार हो... जिसकी सीलन बाहर नहीं दिखाई देती,
पर कोई कील उसे भुरभुरा कर, भीतर की रेत फर्श पर उड़ा देती है।
पर कोई कील उसे भुरभुरा कर, भीतर की रेत फर्श पर उड़ा देती है।
धरती और दीवार पर टंगी कील, जैसे एक स्त्री में बदल जाती है,
और वह स्त्री कोई और नहीं... मैं हूँ!
वेदना से उठी मेरी चीख, दुःख के बादल इकट्ठे करती है,
मैं बुदबुदाती हूँ— अभी ही यह सब होना था?
और वह स्त्री कोई और नहीं... मैं हूँ!
वेदना से उठी मेरी चीख, दुःख के बादल इकट्ठे करती है,
मैं बुदबुदाती हूँ— अभी ही यह सब होना था?
अभी-अभी ही तो मैंने एक सपना बुना था,
और उसे बादलों में टांग देने की सोच रही थी...
बादल जहाँ-जहाँ उड़ें, मेरे सपने को भी अपने साथ लेते जाएँ,
और जब, जहाँ बारिश होगी...
मेरा सपना भी उस-उस जगह अपनी हकीकत की दास्तान लिख आएगा!
और उसे बादलों में टांग देने की सोच रही थी...
बादल जहाँ-जहाँ उड़ें, मेरे सपने को भी अपने साथ लेते जाएँ,
और जब, जहाँ बारिश होगी...
मेरा सपना भी उस-उस जगह अपनी हकीकत की दास्तान लिख आएगा!
पर यह उदासी जम गई है... मिट्टी दरक गई है,
दरक गई मिट्टी की परतों के साथ, यह उदासी भीतर जम गई है।
जितना मैं इसकी परतों को हटाती हूँ,
यह और ज़्यादा जम जाती है।
दरक गई मिट्टी की परतों के साथ, यह उदासी भीतर जम गई है।
जितना मैं इसकी परतों को हटाती हूँ,
यह और ज़्यादा जम जाती है।

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