मंगलवार, 27 मार्च 2018

चिट्ठियां- नजर द्विवेदी

पाँवों में लगती रहं बस बेड़ियाँ .
मंज़िलें पाती गयीं बैसाखियाँ ..

चाँद उतरा जा के किसके बाम पर .
हम तो खोले ही रहे ये खिड़कियाँ ..

ख़ून पी कर भी कभी बुझती नहीं .
तिश्नगी कैसी है तेरी कुर्सियाँ ..

हो गया सुल्तान तो कब का शहीद .
राह तकती ही रहीं शहज़ादियाँ ..

ख़्वाब, हसरत, प्यार जब सब ले गये .
क्या करूँगा मैं तुम्हारी चिट्ठियाँ ..

पी के पानी सो गया बूढ़ा किसान .
रोज़ मिलती ही कहाँ हैं रोटियाँ ..

अधजली हमको मिलीं उड़ती हुई ,
हमने तो दफ़्तर में दी थीं अर्ज़ियाँ ..

ये जो मलबा सा तुम्हें आता "नज़र" .
गूँजती थीं कल यहाँ किलकारियाँ ..

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