बुधवार, 22 दिसंबर 2010

सिर्फ भाषा के उस्ताद नहीं उदय


बटरोही
उदय प्रकाश को साहित्य अकादमी का सम्मान दिया जाना कई मायनों में महत्वपूर्ण है। साहित्य और संस्कृति से जुड़े सम्मान किसी व्यक्ति को नहीं, एक तरह से सामाजिक मूल्यों की स्वीकृति के रूप में व्यवस्था द्वारा अपने समाज को सौंपे जाते हैं, ताकि उस विधा से जुड़े बाकी लोग बिना हिचक अपनी बात लोगों तक पहुंचा सकें। जाहिर है, इस प्रक्रिया में सामाजिक विकास और विस्तार को सकारात्मक गति मिलती है और संस्कृति के विभिन्न पक्षों से जुड़े लोगों के मन में स्वार्थी लोगों द्वारा फैलाई जा रही व्यर्थ की उलझनें दूर होती हैं और वे अपने सपनों के अनुरूप निर्द्वंद्व ढंग से अपना पक्ष प्रस्तुत कर पाते हैं।
उदय प्रकाश की पुरस्कृत रचना ‘मोहनदास’ को महाकाव्यात्मक कहानी कहा गया है। यह एक दुराग्रही कथन है। हिंदी में शायद आरंभ से ही यह एक आम प्रवृत्ति दिखाई देती है कि लेखक को किसी एक विधा के स्टीरियो-टाइप की तरह पेश किया जाता है और उसके बाकी योगदान को भुला दिया जाता है। मसलन, जयशंकर प्रसाद के लिए कहा जाता है कि वह मूलत: नाटककार हैं, अज्ञेय मूलत: कवि और प्रेमचंद मूलत: उपन्यासकार हैं। ऐसे मूल्यांकन में अमूमन लेखक की रचनाओं के अपने पक्ष को भुला दिया जाता है। कोई भी रचना समाज के कारण है, और रच जाने के बाद हर अच्छी रचना समाज को समझने और उसके अंतर्विरोधों से मुक्ति दिलाने में मदद करती है।
अज्ञेय के बाद उदय प्रकाश पहले ऐसे रचनाकार हैं, जिन्होंने अनेक विधाओं में समान अधिकार और संबंधित विधा की शर्तों के आधार पर लिखा है। अनेक लोगों ने उन्हें भाषा और शैली के उस्ताद के रूप में देखा है, मगर वह इतने ही कतई नहीं हैं। अपने समय के सामाजिक सरोकारों, राजनीतिक-सांस्कृतिक घटनाक्रमों के प्रति जितनी पैनी नजर उदय प्रकाश की है, हिंदी में शायद ही किसी और की हो। अज्ञेय अनेक बार आत्ममुग्ध रचनाकार दिखाई देने लगते हैं और प्रेमचंद अपने समाज की गतिविधियों के प्रति खीझे हुए व्यक्ति, मगर उदय की खीझ और उनकी टिप्पणियां समाज या स्वयं को संशोधित करने वाली नहीं, एक ऐसे जागरूक नागरिक की प्रतिक्रियाएं हैं, जिसकी एक जागरूक समाज अपने साहित्यकार से अपेक्षा करता है। इस रूप में इस बार का साहित्य अकादेमी सम्मान कोई विशिष्ट सामाजिक घटना न होकर एक आम सामाजिक प्रतिक्रिया जैसा लग रहा है। बावजूद इसके, इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इस सम्मान के पीछे भी प्रायोजित राजनीति रही होगी। साहित्य को जब हम सामाजिक कर्म की अभिव्यक्तिमानते हैं, तो उन विसंगतियों से कैसे इनकार कर सकते हैं, जो समाज में मौजूद हैं।
जब मैं हंगरी में भारत सरकार की ओर से विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में भेजा गया था, तो वहां हिंदी की मुख्यधारा के साहित्य की जानकारी देने के लिए पाठक्रम बनाने की बात आई। वहां हर सेमेस्टर में पाठ्यक्र्तम का निर्माण छात्र और अध्यापक मिलकर करते थे। पहली ही बैठक में विद्यार्थियों ने बता दिया था कि वे एक तो कबीर को पढ़ेंगे और मुझसे कहा गया कि हिंदी के किसी ऐसे लेखक को मैं चुनूं, जो समकालीन लेखन का प्रतिनिधित्व करता हो। विचार-विमर्श के बाद कबीर के कुछ पद, पचास साखियां और उदय प्रकाश की कहानी ‘वारेन हेस्टिंग्स का सांड’ उस सेमेस्टर में पढ़ाई गईं। मुझे आज भी लगता है कि भारतीय समाज में औपनिवेशिक आधुनिकता के प्रवेश के बाद निर्मित हुए सांस्कृतिक ऊहापोह और विडंबनाओं को जितने प्रभावशाली और दो-टूक ढंग से यह कहानी प्रस्तुत करती है, वैसा उदाहरण इससे पहले हिंदी लेखन में नहीं मिलता। खास बात यह कि यह कहानी उनके लेखन का इस तरह का नया प्रस्थान नहीं है। इससे पूर्व वह ‘तिरिछ’, ‘चौवन तोले का करघन’, ‘पाल गोमरा का स्कूटर’ आदि कहानियों में इसकी शुरुआत कर चुके थे। ‘वारेन हेस्टिंग्स...’ के बाद भी वह ‘और अंत में प्रार्थना’, ‘मोहनदास’ और ‘पीली छतरी वाली लड़की’ आदि तमाम कहानियों में अपने समय के ऊहापोह को पूरी तल्खी के साथ रेखांकित करते रहे। उदय उन विरल लेखकों में हैं, जो अपने समय के सामाजिक घटनाक्रम और उसमें सामाजिक हस्तक्षेप के समानांतर अपना एक स्वतंत्र लोक रचते हैं। उनके समय को जानने-समझने के लिए जितनी सहायक उनकी कहानियां हैं, उतना खुद उनका समाज नहीं

सोमवार, 20 दिसंबर 2010

स्त्री के बोल्ड स्टेटमेंट्स की फोटोकॉपी- नेम प्लेट



डॉ. अनुजा भट्ट

चर्चित कथाकार क्षमा शर्मा का कहानी संग्रह नेम प्लेट स्त्री के मन की खिड़कियां खोलता है। यह स्त्री के मन के बदलाव, उसके भीतर की उथल पुथल और धीरे धीरे साहसी हो जाने की अविरल कथा है। दादी मां के बटुए में जहां लडक़ी के दुनिया में न आने के लिए तमाम तरह के प्रयोजन हैं, छद्म हैं, वह अगली सदी की एक लडक़ी तक आते आते समाप्त हो जाते हैं। आदर्शवाद और उपयोगितावाद की छड़ी बहस में आदर्शवादी अपना मूल्यांकन करता है। वह यह सोचता है कि हर किसी व्यक्ति के लिए आदर्श की अपनी परंपरा है आपके विचार से किसी का प्रभावित होना जरूरी नहीं है।
इन कहानियों में एक बात बार बार रेखांकित होती है वह है पुरूष द्रारा स्त्री को बार बार ठगा जाना। उसे अपनी वस्तु समझना। और ऐसा एकाधिकार रखना जैसे वह उसके पिंजरे में बंद हो वह चाहे तो फडफ़ड़ाए, वह चाहे तो आवाज करे। और अगर वह न चाहे तो उसके होने तक का अहसास न हो। जैसे स्त्री उसके कोट में लगा रुमाल हो जिसे सब देखें। कहानियों में पुरुष का यह अहं भाव स्त्री के बार-बार आड़े आता है पर हर बार स्त्री उसे ऐसे झटक देती है जैसे उसकी साड़ी पर अभी अभी कोई कीड़ा गिरा हो। हंसी शब्द को लेखिका बहुत ही प्रतीकात्मक तरीके से व्यक्त करती हैं। जोर से हंसी में कई दंभ ध्वस्त हो जाते हैं। यह हंसी हर कहानी में है। हंसकर बात टाल दी जैसी अभिव्यंजना तो कई बार पढऩे को मिलती है पर हंसकर किसी के दंभ को चकनाचूर कर देना और रिश्ते के अर्थ और गरिमा के साथ न्याय करना अपने आप में एक नया प्रयोग है। छद्मधारी पुरुष को कहानी में आई नायिकाएं ऐसी पट्खनी देती हैं कि दूध का जला छांछ को भी फूंकफूंक कर पीने लगे। प्रेम की कोमल भावनाओं के अलावा गंदगी जैसी कहानियां भी है जो कामकाजी और गैरकामकाजी स्त्री की सोच के अंतर को प्रकट करती हैं। बूढ़ी औरत का दर्द है तो फादर जैसी कहानी में पिता के न होने के क्या अर्थ हो सकते हैं इसका भी विश्लेषण है। यह बहुत सुंदर कहानी है। इस संग्रह की सबसे खूबसूरत कहानी है बेघर। एक तरफ प्रेम की भावना जो किसी भी बंधन को नहीं मानती और उसको पाने के लिए हर रिश्ते को झुठला देती है। हर किसी से मुंह मोड़ लेती है पर प्रेम को नहीं खोती। लेकिन उसको पा लेने के बाद वह खुद को इतने सारे बंधनों में जकड़ लेती है अपने भीतर इतने सारे बदलाव लाती है कि यह सोच पाना कठिन हो जाता है कि इसका असली रूप यह है या फिर वह जो 25 साल तक उसने जिया। असली रूप कौन सा है। प्रेम को बचाए रखने और मेरा निर्णय सही था को दूसरों के सामने साबित करने के लिए आखिरकार कितना बदलाव लाती है एक स्त्री । सिर्फ इसीलिए ताकि यह समाज मुंह न खोल सके। न उस स्त्री के सामने और न ही उसके परिजनों के सामने। कितने सारे डर समा जाते हैं एक स्त्री के मन में। पर पुरुष.. उसका प्रेम, उसकी भावनाएं सिर्फ और सिर्फ स्त्री की देह टटोलती हैं। और उस देह के लिए वह फिर से अपना संसार बसा लेता है।
नेम प्लेट इस संग्रह की महत्वपूर्ण कहानी है। यह एक ऐसे लडक़े की कहानी है जिसकी दोस्त बनने के लिए हर लडक़ी एक मुकाबला करती है। वह हर समय लड़कियों से घिरा रहता है और लड़कियों को उससे कोई डर नहीं है। उसे भी मालूम है कि वह लड़कियों में कितना चर्चित है। इसीलिए वह किसी लडक़ी की किसी बात को गंभीरता से नहीं लेता पर वह यह जताने की कोशिश करता है कि वह उनके प्रति बहुत गंभीर है। लेकिन कहानी अंत में आकर निर्मला पर ऐसे टिकती है कि बस आप हैरान रह सकते हैं एक अजीब सी हंसी आपको पूरे दिन गुदगुदा सकती है।
स्त्री के अलग अलग रूपों को व्यक्त करती और कुछ नया सोचने को विवश करती यह कहानियां एक ताजगी लिए हुए हैं। एक लडक़ी से लेकर प्रौढ़ होती स्त्री के मन के खिड़कियों पर यह एकाएक प्रवेश कर जाती है। जिसमें विराधोभास भी है, पर प्रेम भी है। नानी और पोती हो या सास बहू विचारों में भले अलग हो और हो सकता है कि विचार के स्तर पर दोनों एक दूसरे को पसंद न करते हो पर संवेदना के स्तर पर इतना जुड़े हैं कि पोती कमरे में सिर्फ इसीलिए ताला लगा देती है कि कहीं उसकी नानी फिर से खो न जाए। बहू अपनी सारी बातें कह देने के बाद भी अपनी भावी सास को चुंबन देती है। बच्ची अपने पागल दोस्त के लिए रोटी रखती है। और एक मां कभी नहीं चाहती कि उसके बच्चे को कोई कहे न्यूड का बच्चा। एक बुजुर्ग को परिवार से बेदखल कर देने के बाद एक लडक़ी ही अपने घर ले आती है उसके लिए वह अनमोल है जो न उसका पति है न बाप। न कोई रिश्ता। फिर भी एक चीज है वह है संवेदना।
हमें इसी संवेदना की तलाश है यह संवेदना चाहे आदर्श की चाशनी में डूबी हो या फिर आधुनिकता की चम्मचों में लिपटी हो। क्योंकि संवेदना विहीन समाज से किसी को कुछ भी नहीं मिलेगा।
लेखिका- क्षमा शर्मा, कहानी संग्रह- नेम प्लेट, मूल्य -80 रु। प्रकाशक- राजकमल प्रकाशक, नई दिल्ली।



गुरुवार, 25 नवंबर 2010

फूल जो हंसते है
  फूल जो खुशबू देते हैं
  जिनसे आप बात कर सकते है
 जिंदगी की खुशियों को याद रख सकते हैं
 फूल जो आपके मन के तार किसी से जोड़ देते हैं
 खुद आपके होंठ बन जाते हैं
 फिर हम शब्दहीन हो जाते हैं
 इसीलिए फूलों को कैद करके रखती हूं मैं
  अपने कैमरे में
 क्योंकि यह मेरे लिए प्यार की निशानी है
 फूल,काले अंगूर और मिठाई का डिब्बा
 मेरी जिंदगी की एक जीवंत कथा है



  

मंगलवार, 9 नवंबर 2010

शालीन होते कालीन, ये फर्श का मामला है

 
अनुजा भट्ट
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पहले घरों में कारपेट बिछाना केवल अमीरों के लिए मुमकिन था। कारपेट महंगे होने की वजह से लोग इन्हें खरीदने से बचते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। बाजार में अब तरह-तरह की वैरायटी के कारपेट मिल जाएंगे, जो सस्ते होने के साथ सुन्दर भी हैं। बाजार में कैसे-कैसे कालीन इस समय उपलब्ध हैं, आइये देखते हैं एक नजर
घर में कालीन होना पहले सम्पन्नता की निशानी माना जाता था। ये कालीन उच्च वर्ग के लोगों के घरों में ही मिलते थे। महंगे होने की वजह से मध्य वर्ग के लोग इन्हें खरीद नहीं पाते थे। लेकिन पिछले कुछ समय से कालीन निर्माण के क्षेत्र में क्रांति सी आ गई है। इनका निर्माण अब देश में कई जगहों पर होने लगा है। पहले ये हाथ से बनाए जाते थे, अब इनका निर्माण मशीनों से होता है। यही वजह है कि अब ये कई तरह की वैरायटी में मिलने लगे हैं। कीमत कम होने की वजह से अब इनका प्रचलन मध्य वर्ग में भी खूब होने लगा है। एक से बढ़ कर एक कालीन बाजार में उपलब्ध हैं। अगर आप सस्ता कालीन चाहते हैं तो वह भी आपको अच्छी वैरायटी का मिल जाएगा।
कहां कहां बनते हैं कालीन
भारत में जम्मू-कश्मीर का नाम कालीन निर्माण के क्षेत्र में सबसे ऊपर है। इसके साथ राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात और हरियाणा में भी उम्दा किस्म व डिजाइन के कालीन तैयार हो रहे हैं। कालीन की कई किस्में हैं। हाथ से बने ऊनी कालीन, सिल्क से बने कालीन, सिंथेटिक कालीन, फर वाले कालीन, हाथ से बनी ऊनी दरियां- इन सबकी बाजार में भारी मांग है।  इंडियन इंस्टिट्य़ूट ऑफ कारपेट टेक्नोलॉजी ने हाल ही में एक डिजाइन स्टूडियो का गठन किया है, जिसकी मदद से कारपेट के बुनने, उसके कलर कॉम्बिनेशन के लिए सीएडी सिस्टम भी लगाए गए हैं, ताकि उच्च कोटि का कारपेट तैयार किया
जा सके।
कैसे-कैसे कालीन
बाजार में आजकल डिजाइनर कालीन की धूम है। परंपरागत वूलन कालीन की बजाय नए-नए डिजाइनों के सिल्क, सिंथेटिक व मखमली कालीन बाजार में छाए हुए हैं। सिल्क कालीन वजन में हल्के हैं और इनके डिजाइन में खास वैरायटी भी है। इन दिनों इनमें जियोमेट्रिकल डिजाइन की सबसे ज्यादा डिमांड है। इन्हें आमतौर पर बेड की साइड में या सोफे के सेंटर में इस्तेमाल किया जाता है।  इनकी कीमत 6 हजार से लेकर 18 हजार रुपये तक है। ईरान का मखमली कालीन और सिंथेटिक कालीन भी पसंद किया जा रहा है। इनकी कम से कम कीमत 12 हजार है। इसके अलावा, सिंथेटिक कालीन की भी लोगों के बीच अच्छी डिमांड है। ये कीमत में तो कम होते ही हैं, साथ ही घर में भी आसानी से धुल जाते हैं। ये 8 हजार से 18 हजार रुपये तक की कीमत के होते हैं। सेंट्रल टेबल के नीचे इस्तेमाल होने वाले ये कारपेट 800 से लेकर 1500 रुपये में भी मिल जाते हैं। बच्चों के कमरों के लिए विभिन्न काटरून कैरक्टर्स और खिलौनों के प्रिंट वाले कालीन इन दिनों खूब बिक रहे हैं। रूम के फर्नीचर और कर्टेन से मैच करते ये कालीन आपको कई तरह के शेप में मिल जाएंगे। ये साइज के मुताबिक लगभग चार हजार रुपये की प्राइज रेंज से मिलना शुरू होते हैं। इन डिजाइंस के कालीन ज्यादातर बेल्जियम और जर्मनी के होते हैं। ये ज्यादातर ब्राइट कलर्स में होते हैं। ऐसे में इसकी कीमत ज्यादा होना स्वाभाविक है। बाजार में इन दिनों वूलन कालीन की मांग कम है। कुछ साल पहले तक वूलन कारपेट ही ट्रैंड में थे। इसका मुख्य कारण गर्मी का लगातार बढ़ते जाना है।
पेंटिंग बनी कालीन
अभी हाल ही में एक ऐसी प्रदर्शनी भी लगाई गई, जिसमें पेंटर से लेकर फैशन डिजाइनरों तक की कृतियों को बुनकरों ने अपनी कला के रंग में ढाल दिया।  न्यूजीलैंड में ऊन से बुने गए कालीनों में मकबूल फिदा हुसैन, सैयद हैदर रजा, रामकुमार, जहांगीर सबावाला, वैकुंठम, सेनका सेनानायके, मनीष पुष्कले, जयश्री बर्मन, परेश मैती, योगेश महीड़ा जैसे चित्रकार थे तो फैशन डिजाइनर रितु कुमार, मनीष अरोड़ा, जेजे वलाया जैसे डिजाइनरों की कृतियां भी थीं। पुरस्कृत बुनकरों ने इनको बुना था। रजा की पेटिंग पर बने कालीनों की कीमत 5 लाख  रुपये थी तो योगेश महीड़ा  की कृति पर बने कालीन की कीमत 35 हजार रुपये। रामकुमार की कृति पर बना कालीन 5 लाख का था। फैशन डिजाइनरों की कृतियों की कीमत कम थी। रोहित बल और रितु कुमार की कृति पर बने कालीन की कीमत 35 हजार रुपये थी।
कालीन नई रंगत के
लेदर से तैयार कालीन की भी एक खास वर्ग में अच्छी डिमांड है। ये मशीन से बनते हैं और इनमें सिंथेटिक मटीरियल का प्रयोग होता है। ये दिखने में भी बेहद अट्रैक्टिव होते हैं। भारतीय मार्केट में छाए कालीनों में कोरिन्थिया बाथ रग, मिलेफ्लेयर मैट, मून गेज, फ्लम बॉर्डर, माउस रग और सेवीलेड प्लेड कालीनों का भी अच्छा-खासा मार्केट है। कोरिन्थिया बाथ रग का डिजाइन डायमंड पैटर्न पर आधारित होता है।
मिलफ्लोर मैट का डिजाइन पूरी तरह बॉटेनिकल थीम पर आधारित होता है। यह कालीन पूरी तरह कॉटन से बना होता है। मून गेज कालीन नायलॉन से बना होता है। इसमें हाथ से कढ़ाई की जाती  है।

रविवार, 10 अक्टूबर 2010

बीमारी की गिरफ्त में कारपोरेट सेक्टर


अनुजा भट्ट

भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए युवा सबसे बड़ी ताकत हैं। किसी भी संगठन में काम करने के लिए जरूरी है कि वहां के कर्मचारी स्वस्थ हों। अगर उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता तो संगठन भी कमजोर होता है क्योंकि काम समय पर नहीं हो पाता। दिनचर्या के ठीक न होने से और खानपान के संतुलित न होने की वजह से कई सारी बीमारियां होने का खतरा बना रहता है। पहले दिल की बीमारी 50 की उम्र के आसपास अपनी गिरफ्त में लेती थी, लेकिन अब 18 से लेकर 30 साल के युवा इसकी चपेट में हैं।
एसोचैम की रिपोर्ट कॉरपोरेट वर्कफोर्स-क्रॉनिक एंड लाइफस्टाइल डिसीजिज’, में कहा गया है कि आईटी, आईटी से जुड़े दूसरे सेवा क्षेत्रों, मीडिया, वित्तीय सेक्टर, बीपीओ और केपीओ में काम करने वाले दिल की बीमारियों, थकान और दूसरी क्रॉनिक बीमारियों मसलन, डायबिटीज, सांस और कैंसर के शिकार हो रहे हैं।
कार्यस्थल नीतियों में थोड़े से बदलाव - मसलन दफ्तर के अंदर या बाहर धूम्रपान पर रोक लगाकर, कैंटीन के मेन्यू में ज्यादा से ज्यादा फल और सब्जियों को शामिल करके, जिम खोलकर या कुछ अन्य तरीके से शारीरिक गतिविधियों को बढ़ावा देकर कर्मचारियों की सेहत को काफी सुधारा जा सकता है। इससे आए दिन स्वास्थ्य कारणों से कर्मचारियों की गैरहाजिरी में भारी गिरावट आ सकती है।

तेजी से भागती-दौड़ती दुनिया में पेशेवर लोगों को अपनी आरामदायक जीवनशैली व खानपान की गलत आदतों के चलते अपनी सेहत पर बहुत से खतरे झेलने पड़ते हैं। मेदांता मेडिसिटी हॉस्पिटल में इलैक्ट्रोफिजियोलॉजी व पेसिंग प्रभाग के अध्यक्ष डॉ. बलबीर सिंह के अनुसार, चार कारक हैं जो हमारी सेहत पर असर डालते हैं आनुवांशिकता, स्वास्थ्य, काम काज का माहौल और जीवनशैली। जीवनशैली में शामिल हैं खानपान व व्यायाम का पैटर्न तथा तनाव से निपटने की व्यक्तिगत क्षमता।
युवाओं में कसरत की कमी व लापरवाही के साथ उनके रहन-सहन के अनियमित तरीके तथा काम व जीवन के बीच बिगड़ता संतुलन, उन्हें रोगी बनाने के लिए बहुत हद तक जिम्मेदार हैं।
न्यूट्रीशियनिस्ट डॉ. शिखा शर्मा कहती हैं कि भारतीयों का भोजन पारंपरिक रूप से ही ऐसा होता है कि उसमें कैलोरीज की भरमार रहती है और उसके ऊपर से बर्गर, पिज्जा, पेस्ट्री, फ्रैंच फ्राई, सॉफ्ट ड्रिंक आदि जैसे फास्ट फूड मिल कर हमारी खुराक को और बिगाड़ रहे हैं, और फिर हम कसरत भी नहीं करते। धूम्रपान व मद्यपान की आदत को भी कई पेशेवरों ने अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लिया है। वे धीमे-धीमे निकोटीन व ऐल्कोहल के आदी होते चले जाते हैं और अपने जीवन को संकट में डाल लेते हैं। ये विषैले पदार्थ रक्त में घुल कर और कई तरह की विसंगतियां उत्पन्न करते हैं। यह देखा गया है कि ऐल्कोहल दिल के बाएं वेंट्रिकल को दबाता है। गौरतलब है कि बायां वेंट्रिकल ही खून को पम्प करता है। जब दिल का यह हिस्सा दबता है तो दो घटनाएं होती हैं: खून को कोशिकाओं तक पहुंचाने के लिए दिल को बहुत सख्ती से खून पम्प करना पड़ता है और कोशिकाओं व ऊतकों को अपने कार्य के लिए पर्याप्त रक्त नहीं मिल पाता। इसके अलावा, धूम्रपान से शरीर पर कई विपरीत असर पड़ते हैं, जैसे दिल की धड़कन बढ़ना, रक्तचाप में इजाफा और इससे दिल के रक्त आपूर्ति की भीतरी पंक्ति क्षतिग्रस्त हो जाती है जिसका परिणाम ऐंडोथीलियल डायसफंक्शन के रूप में होता है, जिससे व्यक्ति को कोरोनरी धमनी की बीमारी होने का जोखिम बढ़ जाता है।
युवाओं में कसरत की कमी, जीवनशैली की अनियमितता और काम-जीवन में बढ़ता असंतुलन उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल रहा है- डॉ. बलबीर सिंह, मेदांता हॉस्पिटल
भारतीय भोजन में कैलोरीज की भरमार होती है, उसके ऊपर फास्ट फूड की अधिकता हमारी खुराक को बिगाड़ रहे हैं- डॉ. शिखा शर्मा, न्यूट्रीशियनिस्ट
अपनी जीवनशैली को बनाएं हेल्दी

कार्डियोलॉजिस्ट और जस्ट फॉर हार्ट के फाउंडर-डायरेक्टर डॉ. रवींद्र जे कुलकर्णी के खास टिप्स-
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ताजा सब्जी, फल, मेवों का भरपूर सेवन करें।
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टोंड दूध, बिना चर्बी वाले मांस या अंडे की सफेदी करे खान-पान में शामिल करें।
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नमक, कैफीन (चाय, कॉफी)और एल्कोहल की मात्र की सीमित करें।
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रोजाना टहलने की दिनचर्या बनाएं। अपनी सामान्य चाल से रोजाना एक-दो किलोमीटर जरूर चलें।
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दफ्तर में काम करने के दौरान ब्रेक लें। हर दिन दो बार सुबह-शाम पांच मिनट के लिए शरीर को हिलाएं-डुलाएं।
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आपका ब्लड प्रेशर आदर्श यानी 115-75 होना चाहिए। अपने वजन पर ध्यान रखें।
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डिब्बाबंद और जंक फूड से परहेज करें।

मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010

सेहत तीस के बाद


 सेहत तीस के बाद
जीवन में 30वां बसंत आते ही किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य और पारिवारिक जीवन में एक स्थिरता और परिपक्वता आने लगती है। लेकिन यही वह उम्र भी है, जब कामकाज से लेकर घर-परिवार तक नई जिम्मेदारियां उठाने का समय शुरू हो जाता है। ऐसे में अपनी सेहत के बारे में नए सिरे से सोचने और उसे संवारने की जरूरत होती है।
30 की उम्र शुरू होते ही मांसपेशियों का द्रव्यमान कम होने लगता है। उसी तरह 40 की उम्र में हड्डियों का द्रव्यमान कम होने लगता है। मांसपेशियों में लचीलापन घटने लगता है। पहले की तुलना में हड्डियों के टूटने की आशंका  ज्यादा बढ़ जाती है। लेकिन व्यवस्थित दिनचर्या, व्यायाम और संतुलित खान-पान से आपको ज्यादा फिट, फुर्तीला और स्वस्थ रख सकता है।
सही खानपान- पूरे दिन में तीन से पांच बार थोड़ी-थोड़ी मात्रा में खाएं। आपका भोजन ऐसा होना चाहिए, जो आपको तीन-चार घंटे तक भूख न लगने दे। आप ब्राउन ब्रेड और सब्जी ले सकते हैं। ब्रेड से आपको जटिल कार्बोहाइड्रेट मिलता है, जो लंबे समय तक ऊर्जा देता रहता है। हर आहार में अलग-अलग समूह के तीन चीजें जरूर शामिल करें। मसलन  दाल, सब्जी रोटी या फल, दही और अंकुरित चना। 
सक्रिय रहें- सही खानपान से अपना वजह स्थिर रख सकते हैं। लेकिन अपने जोड़ों और मांसपेशियों को व्यायाम के जरिये लचीला और मजबूत बनाते  रहें। एक शारीरिक व्यायाम की बजाय अलग-अलग गतिविधि आजमाएं। व्यायाम से मांसपेशियों का द्रव्यमान घटने की रफ्तार कम तो होगी ही शरीर में कैलोरी संतुलन भी बना रहेगा।

तनाव रहित रहना सीखें-  ज्यादातर लोग मशीन की तरह काम करते हैं। वे ब्रेक नहीं लेते। ब्रेक लेना सीखें। इससे काम से जुड़ा तनाव खत्म हो जाएगा। लंबे असाइनमेंट के हर दिन मनपसंद संगीत सुनें। किताबें पढ़ें या अपनी मनपसंद गतिविधि में शामिल हों।
हेल्थ चेक-अप जरूरी - 30 की उम्र के बाद लिपिड प्रोफाइल या नियमित शुगर चेक-अप जरूरी है। इससे पता चलेगा कि आपके शरीर के अंदर क्या हो रहा है। किसी भी अस्वाभाविक परिवर्तन का पता चल सकेगा और उसका उपचार जल्द शुरू हो जाएगा।
लोचदार शरीर जरूरी - वजन घटाने या मांसपेशियां मजबूत करने वाले ज्यादातर लोग शरीर को लोचदार बनाना भूल जाते हैं। शरीर के सही वजन के साथ इसका लचीला होना भी जरूरी है। इसलिए ऐसे व्यायाम पर ध्यान दें, जिससे शरीर लचीला रहे। लचीला शरीर ज्यादा ऊर्जा भरा होता है। 30 की उम्र में आप इन चीजों पर ध्यान देकर खुद को लंबे समय तक स्वस्थ और सक्षम रख सकते हैं।





रविवार, 5 सितंबर 2010

रिश्तों को स्ट्रांग बनाने के छह फंडे




अनुजा भट्ट

शादी-प्यार, विश्वास, देखभाल और आदर पर आधारित होती है। अगर इनमें से कोई एक चीज गायब है तो समझिए शादी दिक्कत में है। क्या परफेक्ट मैरिज की परिभाषा तय की जा सकती है? मनोवैज्ञानिक डॉ. भावना बर्मी कहती हैं,आज के समय में परफेक्ट मैरिज जैसी कोई परिभाषा नहीं बनाई जा सकती। हर व्यक्ति के लिए इसके मायने भी अलग-अलग हैं। यह इस सोच पर निर्भर करता है कि कोई अच्छे दांपत्य जीवन के बारे में क्या सोचता है। हालांकि अच्छा दांपत्य जीवन 100 फीसदी संभव है। अगर इन बातों पर गौर किया जाए-

प्रतिबद्धता (कमिटमेंट)

किसी भी दांपत्य रिश्ते में एक-दूसरे के प्रति कमिटमेंट बेहद जरूरी है। इसके तहत दोनों पति-पत्नी को अपने रिश्ते के संबंध में एक साझा मूल्य और लक्ष्य की ओर बढ़ना होता है। आज जब समय की कमी है तो यह कौशल बेहद जरूरी है। संवाद का का मतलब यह नहीं कि आपसे पूछा जाए कि तुम्हारा दिन कैसे बीता। संवाद का मतलब है कि आपसी विचारों और भावनाओं को साझा करना। जोड़ों में यह बात स्वाभाविक तौर पर शुरू में नहीं भी आ सकती है लेकिन आपको इसकी ओर लगातार प्रयास करना होगा। एक बार शुरू कर दिया तो आपको इसमें आनंद आने लगेगा। बहस के दौरान धैर्य बनाए रखना, समझदारी से काम लेना और एक-दूसरे के प्रति सद्भाव बनाए रखना जरूरी है।

बहस के दौरान आप एक-दूसरे का तर्क नहीं सुनते। हमेशा दूसरा तर्क तैयार रखते हैं। विवाद छोटी से लेकर बेहद बुनियादी चीजों को लेकर हो सकता है। जब भी आपको आपके पार्टनर से शिकायत हो उसे सही संवाद शैली में व्यक्त करना आना चाहिए। संकट के समय आप कैसे संवाद करेंगे, इस पर काफी कुछ निर्भर करता है। आप सही संवाद शैली का इस्तेमाल करते हैं तो आपके पार्टनर के साथ चाहे आपकी कितनी भी मतभिन्नता हो आप उससे जुड़ाव महसूस करेंगे। नकारात्मक मुद्दों पर ही स्वस्थ तरीके से बात हो सकती है।

समय दीजिये

आजकल की भागदौड़ की जिंदगी में पति-पत्नी एक-दूसरे को दिए जाने वाले समय के मामले में समझौता कर लेते हैं। उन्हें लगता है नहीं भी दिया तो क्या है। पति-पत्नी के लिए बेहद जरूरी है कि वे एक-दूसरे के साथ समय बिताएं। आप साथ-साथ सप्ताहंत के काम करें, कोई फिल्म देखें, रोमांटिक डिनर करें, मूवी देखने जाएं। इस क्वालिटी टाइम से आप एक-दूसरे के प्रति ज्यादा संतोष और सुरक्षित महसूस करेंगे। काम और घर के बीच संतुलन बिताएं। बहुत से लोग दफ्तर में घर और घर में आफिस के बारे में सोचते रहते हैं। पति-पत्नी के रिश्ते में ख्रराब समय भी आता है। लेकिन ऐसी चीजों को हल्के में लेना भी सीखना चाहिए। विवादों को खींचने के बजाय उन्हें सुलझाना और कुछ चीजों को हंसी में उड़ाना बेहतर रहता है।

आदर और आजादी

जरूरी नहीं कि पति-पत्नी के शौक एक ही हों। एक ही दोस्त हों। पसंद-नापसंद भी एक हों। आजकल हम ज्यादा से ज्यादा पतियों को हाउस डैड की भूमिका में देख रहे हैं। अगर आप कोई चीज साथ-साथ कर रहे हैं तो उसमें भी एक-दूसरे को आजादी देने की पूरी गुंजाइश रखें। अगर दंपती अपनी दांपत्य जीवन को सुखी और लंबा बनाए रखने के प्रति प्रतिबद्ध हैं तो वे मतभेदों के बावजूद बीच का रास्ता निकाल लेते हैं।



यौन नजदीकी और रोमांस

यौन नजदीकी और रोमांस किसी भी दांपत्य जीवन का ऑक्सीजन है। कई बार हम रिश्तों में बुरा वक्त गुजार रहे हों तो हम बेहद थकेऔर दुखी महसूस करते हैं। अपनी व्यस्त जिंदगी में इस संकेत को नजरअंदाज कर देते हैं। अचानक देखेंगे कि आपसे शारीरिक संपर्क की इच्छा कम होने लगी है।

आपको लग सकता है कि पार्टनर थका हुआ है या बरसों साथ रहने की वजह से यौनेच्छा में कमी आ गई है। ऐसे समय में हमें रोमांस की जरूरत होती है। ऐसे में पार्टनर का ध्यान आकर्षित करने का तरीका काम आ सकता है। मसलन कोई ऐसा ड्ेस पहनें जो आपका पार्टनर नोटिस करे। कोई छोटा सा उपहार ही दें,चाहे गुलाब का छोटा फूल हो, पत्नी को कोई अंगूठी । कैंडिल लाइट डिनर। वह करें जो आपके पार्टनर को अच्छा लगता है। याद रखें पति-पत्नी के रिश्ते में सेक्स को अहमियत न देना एक बड़ी दरार पैदा करना है, जिसे पाटना काफी मुश्किल होता है और कभी-कभी असंभव है। देह एक बड़ी सचाई है, इससे इनकार न करें।

रिश्ते में चुप्पी ठीक नहीं

मनोवैज्ञानिक समीर पारिख कहते हैं रिश्ते बनाने से ज्यादा कठिन रिश्ते निभाना है। किसी भी व्यक्ति के मन को जानना आसान नहीं है। रिश्ते में चुप्पी ठीक नहीं है। आप सोच रहे हैं कि काम के बोझ से साथी आपसे ज्यादा बात नहीं करता। लेकिन साथी कम बात कर रहा है या चुप्पी साधे हुए है तो यह ब्रेक-अप के संकेत हो सकते हैं। आप पाएंगी आप ही उसे कॉल कर रही हैं, जबकि वह ऑफिस में लोगों से मेल-जोल बढ़ाने में लगा है। वह आपको फोन नहीं क रता और यह भी नहीं बताता कि वह कहां हैं या घर कब पहुंचेगा। परस्पर संवाद के जरिए एक-दूसरे को समझा जा सकता है इसीलिए यदि आपके रिश्ते में संवादहीनता की स्थिति आ रही है तो संभल जाइए और संवाद की कोशिश कीजिए।

हो सकता है पहले लड़ाई या बहस हो पर संबंध में मौन सबसे खतरनाक है। संवादों से आप जान सकते हैं कि सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। अगर संबंधों में खटास है तो पुरुष मुंह से ज्यादा कुछ नहीं कहता है। पुरुष इसलिए भी नहीं कहते हैं कि हो सकता है कि महिला को बुरा लगे या वह लड़ना-झगड़ना शुरू कर दे। मौखिक तौर पर संबंधों को तोड़ने में वे माहिर नहीं होते। लेकिन अगर सेक्स में अरुचि दिख रही है तो समझिए कि गड़बड़ शुरू हो गई है।

छोटी-छोटी बातें

जिन चीजों का पहले आपके जीवन में महत्व नहीं था, अब वे चीजें आपके बीच झगड़े और बहस का मुद्दा बन रही हैं। मसलन बिल कौन जमा करेगा। बाथरूम में कौन कितना समय बिताता है। या छोटे-मोटे सामान कौन लाएगा। अगर आप दोनों का मूड खराब है तो छोटी-छोटी बातें भी बवाल बन जाती हैं।

ऐसे में जरूरत इस बात की है कि आपस में काम बांट लें। ऐसे मौके पर किसी भी प्रकार की बहस से बचें क्योंकि बेवजह की बहस आपके रिश्तों में और खटास भर देगी। जहां तक हो सके छोटी-छोटी बातों को नजर अंदाज करें। साथ ही जिस बात से आपके साथी को गुस्सा आता है उस काम को न करने में ही भलाई है। अगर कोई पुरुष चाहे वह दुनिया का सबसे विनम्र और स्वीट व्यक्ति हो, बहस के बाद सॉरी नहीं कहेगा। रिश्तों मेंअहम को बीच में न लाएं। यदि आपका साथी आपसे बात नहीं कर रहा तो आप अपनी तरफ से पहल करें। आपकी बढ़ाया एक कदम आपके रिश्तों को नया जीवन दे सकता है।

समझ लीजिए बजने वाली है खतरे की घंटी

घर से भागे, दोस्तों में रमे

डॉ.अरुण कुमार

मनोवैज्ञानिक

संबंध टूटने से पहले जो संकेत दिखाई देते हैं, उसमें प्रमुख हैं पहला-एक-दूसरे के प्रति दिलचस्पी न लेना, भावनात्मक लगाव का कम होना। शारीरिक और भावनात्मक संपर्क में गिरावट दो ऐसे लक्षण हैं, जो कमजोर रिश्ते में गिरावट के सबसे आम संकेत हैं। आपकी जिंदगी में आपके पार्टनर की दिलचस्पी का कम होने का मतलब चीजें गलत दिशा में जाने लगी हैं। सोशल गेदरिंग, साथ में खाना खाना और लेट नाइट फिल्म देखना, वह सब जो आप पहले करते थे, अब कम होने लगा है। आपका पार्टनर यह सब साथ-साथ करने का विरोध करने लगा है। धीरे-धीरे वह आपकी जिंदगी में अपनी दिलचस्पी कम लेने लगा है। मसलन वह आपसे नहीं पूछेगा फलां चीज के बारे में क्या विचार है? या आज ऑफिस कैसा रहा? या तुमने अपना दिन कैसे बिताया।

कुछ शारीरिक लक्षण दिखने शुरू हो जाते हैं मसलन नींद न आना, बेचैनी रहना, रात को उठकर कोई काम करने लगना, फिल्म देखना, अकेलापन पसंद करना है। लोगों की भूख मर जाती है, खाना कम हो जाता है या फिर वह बहुत खाने लगता है। वह छोटी सी छोटी बात पर तूफान खड़ा करा करना। ऐसा लगता है कि वह लड़ने के मूड में है और बहाना तलाश रहा है।

खुद से पूछती हैं कई सवाल

डॉ. विनीता मेहरोत्रा झा

यह ऐसा सवाल है, जो महिलाएं अपने आप से पूछने से डरती हैं, जब तक कि असलियत उनके सामने न आ जाए। दांपत्य जीवन में संबंधों में कठिनाई का दौर शुरू होते ही महिलाओं के दिमाग में यह सवाल गूंजने लगता है। क्या वह अब भी मुझसे प्यार करता है? क्या मुझमें उसकी दिलचस्पी खत्म हो गई है? क्या उसका प्यार बांटने के लिए दूसरा भी है? वह रात-दिन इस सवालों में उलझीं रहती हैं।

दोस्तों की राय को नकारें नहीं

रचना सिंह



रिलेशनशिप काउंसलर

पारिवारिक सदस्य और दोस्त आपके रिश्तों में आ रही गड़बड़ी को सबसे पहले पहचान लेते हैं। चूंकि आप साथी के सकारात्मक चीजों में विश्वास करते हैं और लड़ाई-झगड़े से बचना चाहते हैं इसलिए इस निर्णय पर पहुंचने में देर हो जाती है। लेकिन परिवार के लोग और नजदीकी दोस्त बता देंगे कि गड़बड़ शुरू होने के संकेत मिलने लगे हैं। लेकिन उन्हें नकारने के बजाय सच्चाई को स्वीकार करना सीखें। इससे आपको संबंधों को पूरी तरह बिगड़ने से पहले सुधारने का मौका मिल जाएगा।

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

अपने घर का मेकओवर- -अनुजा भट्ट

जीवन के लिए रोशनी चाहिए। पेड़-पौधे भी बिना रोशनी के विकसित नहीं हो पाते। कम रोशनी में पढऩे वाले बच्चों की आंखें कमजोर हो जाती हैं। जिन छोटे बच्चों को रोशनी नहीं मिलती वह कमजोर हो जाते हैं, यह तथ्य है। विटामिन डी हमारे लिए बहुत जरूरी है। लेकिन प्राकृतिक के साथ कृत्रिम रोशनी की भी जरूरत होती है। अंधेरे में तो पक्षी रह सकते हैं मनुष्य नहीं । फिर भला कौन सुनना चाहेगा, क्या तुम उल्लू हो? अब अपने क्या अपने घर के बारे में भी कोई ऐसी बात नहीं सुनना चाहेगा जिससे उसकी कम समझ का पता चलता हो। वह अपने साथ-साथ अपने घर के मेकओवर के बारे में भी जानना चाहता है। मेकओवर की इसी श्रृंखला में प्रस्तुत है घर की रोशनी- एक घर तभी सुविधाजनक लगता है जब उसमें संतुलन हो । यह संतुलन हर जगह नजर आना चाहिए फिर चाहे वह कमरों को लेकर हो या फिर फर्नीचर से जुड़ा हो। इसके अलावा जो सबसे महत्वपूर्ण है, और जिस पर हम ध्यान नहीं देते वह है घर की रोशनी ।
अमूमन घर की रसोई, बाथरूम, बालकनी, सीढिय़ों में हम कम रोशनी का इस्तेमाल करते हैं। इसके पीछे हमारी सोच है कि यहां रोशनी की ज्यादा जरूरत नहीं । हमारा यह सोचना गलत है। इन जगहों पर पर्याप्त रोशनी की जरूरत होती है क्योंकि इनका संबंध हमारे स्वास्थ्य और सुरक्षा दोनों से जुड़ा है। रोशन करें घर साराआजकल अलग-अलग अलग कमरों के लिए विभिन्न डिजाइनों की लाइट्स का चलन है। लाइट्स के लिए डिजाइन का चुनाव करते समय घर की थीम, कलर और इंटीरियर को ध्यान में रखा जाता है। इसके अलावा कमरों के आकार प्रकार पर भी ध्यान दिया जाता है। रोशनी के प्रभाव से घर को छोटा या बड़ा दिखाया जा सकता है।
 रोशनी आपके मूड को दर्शाती है। अलग अलग रंग अलग मूड को प्रकट करता है। इन दिनों एक ही कमरे में कई तरह की लाइट लगाने का फैशन है जिसे रिमोट कंट्रोल से ऑफ या ऑन कर सकते हैं। नए ट्रेंड्स में लंबी लाइट्स बिजली की कम खपत वाली लाइट्स जैसे एल इ डी, सी एफ एल, टी 5 ट्यूब्स सजावटी लैंप के लिए प्रयोग में लाई जा रही हैं । इनको लगाने का खर्च ज्यादा है पर बिजली का खर्च ज्यादा नहीं है। 60 वाट के बल्ब से जो रोशनी मिलती है वह 15 वाट के सीएफएल से भी मिल जाती है। लाइट्स लकड़ी की फिनिंशिंग में ज्यादा पसंद की जा रही है। नए ट्रेंडस के रूप में कांपेक्ट लाइट्स पसंद करने वालों की संख्या ज्यादा है। कांपेक्ट के लिए स्टील और ग ्लास का प्रयोग किया जा रहा है।
 कार्नर लाइट्स में अब कॉर्नर स्टैंड की बजाय लंबी लाइट्स का चलन बढ़ा है। लकड़ी या धातु के फ्रेम का ट्रेंड बरकरार है पर शेड्स के लिए कपड़े की जगह कागज और बांस ने ले ली है। ट्यूब लाइट और छोटी और बड़ी ऑटोमेटिक लाइट बालकनी और दरवाजे पर अभी भी अपनी जगह बनाए हुए है। झूमर झूमे झूमकरशेंडलियर भी अब ड्राइंगरूम अलावा अन्य कमरों में दिखाई दे रहा है। हां, पर इसका वह परंपरागत रूप बदल गया है। अब भारी भरकम शेंडलियर की जगह छोटे छोटे झूमरों ने ले ली है जिसमें नग नगीनों की जगह पर अब छोटे छोटे रंगीन बल्ब और घंटियां है। यह घुमावदार होने के अलावा अब सपाट डिजाइन में भी है, जिसमें नक्काशी की जगह या तो पेंटिंग ने ले ली है या फिर यह गहरे रंगों में पेंट हैं। सतरंगी ज्यादा चल रहे हैं।
 लाइटिंग के बाद सबसे जरूरी हैं - लैंपशेड्स। लैंपशेड्स खरीदते समय इस बात का ध्यान रखें कि वह बहुत ज्यादा बड़े न हों ताकि दूसरे कमरे में इनको आसानी से लगाया जा सके। आजकल अंडाकार, आयताकार, पिरामिड, चौकोर, त्रिकोण सभी तरह के डिजाइन हैं। लिविंग रूम में टेबल लैंप कॉर्नर टेबल के साथ लगाएं। जहां पर टेबल लैंप रखा हो वहीं पर सोफा रखें ताकि बैठकर पढ़ा जा सके। फ्लोर लैंप का प्रयोग अतिरिक्त लाइट के लिए किया जाता है यहां भी चौकोर, गोलाकार या ज्यामितिक डिजाइन है । लाइट्स ऐसी हंै जिससे फर्श गर्म न हो और पैर जले नहीं। रंगबिरंगे पत्थरों के बीच जलती हुई ये लाइट्स बहुत सुंदर लगती हैं। रंग से भरें रोशनी कोअभी भी अधिकतर घरों में सफेद और पीली लाइट्स का ही प्रयोग किया जाता है, जबकि बहुत सारे रंगों की लाइट्स बाजार में है। हमें उनका प्रयोग करना चाहिए क्योंकि हर रंग का अपना एक प्रभाव होता है। जैसेे वर्कप्लेस में सफेद रंग ठीक है पर बेडरूम में भी यह रंग नहीं जंचता। सुंदर घर को रखें सुरक्षितकिस कमरे के लिए कितनी रोशनी की जरूरत है इसका आकलन करने के बाद लाइट्स लगाई जाती हैं, ताकि घर को भव्य बनाया जा सके। लाइट्स का चुनाव करने से पहले सोचना चाहिए कि लाइट्स कहां लगाई जा रही हंै, क्या वह उपयुक्त जगह है पानी का रिसाव तो वहां पर नहीं होता, जो लाइट्स लगार्ई गई है वह ठीक से काम कर रही है या नहीं, आपके कमरे को कितनी रोशनी चाहिए, क्योंकि हर कमरे की जरूरत अलग होती है उससे ज्यादा या कम लगाने से नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। वह कमरे के तापमान बढ़ा देती हैं इससे बिजली की खपत भी ज्यादा होती है।बॉक्स लाइट्स तीन तरह की हैं 1- फंक्शनल लाइट- इसका प्रयोग घर के लिए नहीं किया जाता है। यह अधिक्तर सुरंग बनाने के समय उपयोग में लाई जाती है। 2- टास्क लाइट- टेबल और फ्लोर लैंप के लिए उपयोग में लाई जाती है।


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