चमक सफलताओं की होती है और दर्द में हम ताउम्र भींगते हैं। हमारे भीतर अपनों के आँसू और विरह की चीखें भी दफन हो जाती हैं। हमारे दादाजी का जीवन एक ऐसी ही कहानी है, जहाँ एक तरफ दिल्ली के चांदनी चौक के रसूख दार लोग उनको प्रभावित कर रहे थे तो दूसरी तरफ देश की राजनीति उनको सम्मोहित ।उधर हमारे पुश्तैनी घर 'ठुलकुड़ा' के एक शांत कोने में बिखरा एक गहरा सन्नाटा भी था।
कहानी को थोड़ा सा पीछे ले जाती हूँ। मेरे परदादा त्रिलोचन भट्ट जी की ससुराल छाना गांव में थी और उनकी सास थी ज्योली के पंतों की बेटी। त्रिलोचन जी की 6 संताने थीं: 4 बेटे और 2 बेटियां। मेरे दादाजी भाइयों में सबसे छोटे और बहनों में बीच के थे। पढ़ाई-लिखाई के मामले में वे अपने अन्य भाइयों की तुलना में मध्यम दर्जे के थे। लेकिन उनके भीतर कुछ बड़ा करने की, गाँव की सीमाओं को लांघने की तीव्र और अदम्य महत्वाकांक्षा थी। उनकी बड़ी बहन का विवाह श्री हीरा बल्लभ पंत जी के साथ हुआ था, जिनका एक ही बेटा था— नाम था दीप चंद्र पंत।" मेरे दीप ताऊजी के बेटे दिनेश दद्दा बताते हैं , हम लोगों का गांव नैनीताल के नौकुचियाताल में शिलोटी पंत नाम का है पर हम लोग 250-300 साल पहले खूंट गांव से आए थे और फिर अल्मोड़ा पोखरखाली में बस गये। वर्ष 1958 में हम रानीधारा आ गए। मेरे पिता श्री दीप चंद्र पंत जी के चाचा का नाम घनानंद पंत था, जिन्होंने 'कुमाऊँ मोटर ओनर्स यूनियन लिमिटेड' (KMOU) की शुरुआत में अपना अहम योगदान दिया था; यह बात 1915 के आसपास की है।"
मेरे दादा जी की दूसरी बहन की शादी श्री नित्यानंद पांडे जी के साथ हुई थी, जो ढोली गाँव का एक प्रतिष्ठित पांडे परिवार था। नित्यानंद जी धनी मानी व्यक्ति थे। उनके एक बेटे श्री दया किशन पांडे थे जो मशहूर वकील और विधायक रहे।
मेरे दादा दी बहुत कम उम्र में ही अपना गाँव बिषाड़ छोड़कर दिल्ली आ गए थे और कांग्रेस से जुड़ गए थे। यह वह दौर था जब देश आज़ादी की नई इबारत लिख रहा था। भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने दिल्ली में एक बड़ा राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया था, जिसमें हमारे दादाजी ने सक्रिय भागीदारी की थी। उस सम्मेलन में दादाजी की नेहरू जी के साथ एक ऐतिहासिक तस्वीर खींची गई, जो अगले दिन देश के प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार 'हिंदुस्तान टाइम्स' (Hindustan Times) में प्रमुखता से प्रकाशित हुई।
नियति का खेल देखिए, वक्त का पहिया घूमा और कालांतर में सालों बाद, दादाजी की पोती—यानी मैंने—उसी 'हिंदुस्तान टाइम्स' अखबार में अपनी पेशेवर नौकरी की शुरुआत की। जब मैं दफ्तर की उन मेज़ों को देखती थी, तो मुझे अहसास होता था कि इतिहास की कड़ियाँ किस तरह अदृश्य रूप से हमें अपने पूर्वजों से जोड़ देती हैं।
दिल्ली में दादाजी ने ज्योतिष और कर्मकांड के काम को अपनी आजीविका का मुख्य आधार बनाया। चांदनी चौक के बड़े-बड़े रसूखदार 'मुनार' (स्वर्णकार/सुनार) समाज के लोग उनके मुख्य यजमान बन गए। दादाजी का यह कारोबार बहुत फला-फूला। वे दिल्ली के संभ्रांत समाज के एक जाने-माने ज्योतिषी बन गए, लेकिन इस कारण वे बेहद व्यस्त रहने लगे। उनका गाँव आना-जाना बहुत कम हो गया।
दिल्ली से कमाया हुआ पैसो से गाँव में भी वे अपने उन्हीं सुनार यजमानों की तरह ग्रामीणों को ज़रूरत पड़ने पर कर्ज (पैसे) देते थे या उनके गहने व ज़मीन गिरवी रख लेते थे। बही-खातों और लेन-देन की यह पूरी दास्तान आज भी हमारे पास एक 'पांडुलिपि' (Manuscript) के रूप में महफ़ूज़ है।
लेकिन दिल्ली की इस चमक की एक बहुत भारी और दर्दनाक कीमत हमारे पुश्तैनी घर में चुकाई जा रही थी। दादाजी का रहन-सहन और उनका आर्थिक स्तर ईर्ष्या का भी कारण थे। सन्1930 में जब हमारी बड़ी दादी (हरिप्रिया ) के गर्भ से पहले बेटे (हमारे ताऊजी) का जन्म हुआ, तब दादाजी दिल्ली में ही व्यस्त थे। उन दिनों संचार के साधन नहीं थे। दादाजी को भेजा गया टेलीग्राम (तार) उन्हें बहुत देर से मिला। वे तुरंत गाँव नहीं पहुँच सके।
पति की अनुपस्थिति गाँव की महिलाओं के बीच में शक और संदेहसे उपजी काना फूंसी लगातार मेरी बड़ीदादी को कितना तकलीफ देती होगी यह सोचकर लिखते हुए भी मेरे हाथ कांप रहे हैं। उस समय कम उम्र में ही शादी हो जाती थी। पहला मासिक ससुराल में ही होता था। पहले मासिक के बाद जब 5 दिन पूरे हो जाते तो सत्यनारायण की कथा होती।
इस तरह सोचती हूं तो मेरी बड़ी दादी 14 साल में मां बनी होगी। भीतर से कितना डर रहा होगा, ऊपर से समाज के ताने। कितनी टूट गई होगी। उनकी हर सुबह और हर शाम छींटाकसी के बीच गुज़रती थी—"तेरा पति तो तेरे साथ रहता ही नहीं, वह तो दिल्ली रहता है। इतनी दौलत का क्या फायदा, जब आदमी ही पास न हो"। उनके सीधे-सरल मन में यह बात बैठ गई कि उनका पति उनसे इतना विमुख कैसे हो सकता है? वे अवसाद के उस गहरे दलदल में धंस गईं जहाँ से बाहर निकलने का उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझा।
और फिर वह खौफनाक दिन आया। जिस दिन हमारे ताऊजी ने इस दुनिया में अपनी आँखें खोली थीं, उसके ठीक बाद, बड़ी दादी ने कमरे के एक कोने में रखे एक सुंदर से पालने में उस नवजात शिशु को बहुत दुलार से लिटाया। उन्होंने बच्चे को भरपेट दूध पिलाया, उसे चूमा, और फिर एक गहरे, मौन विलाप के साथ खुद को एक कमरे में बंद कर लिया। अपने अकेलेपन, विरह और समाज के तानों से हारकर, उन्होंने अपने ऊपर आग लगा ली। जब तक लोग दरवाज़ा तोड़कर भीतर पहुँचते, बड़ी दादी इस नश्वर संसार को छोड़कर जा चुकी थीं। पालने में लेटा वह नन्हा बच्चा अपनी माँ के इस दर्दनाक बलिदान से अनजान, चुपचाप सो रहा था।
बड़ी दादी के असमय चले जाने के बाद, ठुलकुड़ा के उस सूने कमरे में एक नवजात शिशु की रोने की आवाज़ गूँज रही थी। हमारे ताऊजी, माँ के आँचल और उनके दूध से महरूम हो चुके थे। माँ की चिता की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि इस नन्हे बच्चे की भूख शांत करने का एक बड़ा संकट पूरे कुटुंब के सामने खड़ा था।
उस दौर में डिब्बे का दूध या आधुनिक विकल्पों का कोई नामोनिशान नहीं था। ऐसे कठिन समय में बिषाड़ गाँव और आस-पास के परिवारों की इंसानियत जाग उठी। गाँव की जिन माताओं के अपने छोटे बच्चे थे, वे आगे आईं। वे बारी-बारी से ठुलकुड़ा आतीं और अनाथ हो चुके हमारे ताऊजी को अपनी गोद में लेकर ममता का दूध पिलाती थीं।
ताऊजी जब बड़े हुए, तो वे बड़े गर्व और भावुकता से अक्सर यह संस्मरण सुनाया करते थे—"मैंने किसी एक माँ का नहीं, बल्कि इस गाँव की सोलह माताओं का दूध पीकर अपना जीवन पाया है"। यह वाक्य कुमाऊँ की उस सांझी लोक-संस्कृति का साक्षात प्रमाण था, जहाँ पूरा गाँव विपत्ति के समय एक परिवार बन जाता था।
लेकिन इस कहानी का एक और पहलू था, जो हमारे दादाजी के अनोखे और स्वाभिमानी चरित्र को उजागर करता है। जब दादाजी दिल्ली से वापस लौटे, तो वे अपनी पत्नी को खोने के गहरे दुख से टूट चुके थे। पर वे एक व्यावहारिक और नफासतपसंद व्यक्ति थे। उन्होंने देखा कि गाँव की महिलाओं ने उनके बेटे को दूध पिलाकर उसका जीवन बचाया है। दादाजी का स्वाभिमानी चरित्र यह बर्दाश्त नहीं कर सकता था कि वे किसी का यह उपकार मुफ़्त में लें या किसी के अहसान तले दबे रहें।
उन्होंने एक बेहद अजीब लेकिन पारदर्शी रास्ता चुना। जिन माताओं ने ताऊजी को अपना दूध पिलाया था, दादाजी उन परिवारों को अपना 'कर्ज़दार' मानने लगे। उन्होंने अपनी उसी पुरानी बही-खाते की पांडुलिपि (Manuscript) को उठाया, जिसमें वे लेन-देन का हिसाब रखते थे। उन्होंने बाकायदा पन्नों पर दर्ज किया कि किस परिवार की महिला ने उनके बच्चे को कितनी बार और कितने समय तक दूध पिलाया है।
दादाजी ने इस ममतामयी उपकार की कीमत चुकाने का फैसला किया। जिन परिवारों ने उनसे पहले से कोई कर्ज ले रखा था, दादाजी ने उनके बही-खाते से कर्ज के धन को काट दिया और उन्हें ऋणमुक्त कर दिया। जिन पर कोई कर्ज नहीं था, उन्हें उन्होंने बाकायदा धन के रूप में पारिश्रमिक या सहायता राशि चुकाई। इस अनूठे लेन-देन का ब्योरा आज भी हमारे परिवार की उस ऐतिहासिक पांडुलिपि के पन्नों पर दर्ज है।
इस जिंदगीनामा में आगे आप पढ़ेंगे और भी कई किस्से जो आपको भावुक कर देंगे।
पापा, कल एकादशी है। आपको गए हुए 4 माह हो जाएंगे पर यह जिंदगीनामा लिखते हुए लगता है ,
आप आराम कुर्सी में बैठे हैं और मैं तख्त पर।
बाहर बारिश हो रही है।
पेड़-पौधे भीग रहे हैं, साथ में भीग रही हूँ मैं भी।
आपको बारिश पसंद थी ना, पापा?
मुझे भी पसंद है।



