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मंगलवार, 25 अगस्त 2026

लंदन फोर्ट- चांदनी चौक की चमक और ठुलकुड़ा का विरह




चमक सफलताओं की होती है और दर्द में हम ताउम्र भींगते हैं। हमारे भीतर अपनों के आँसू और विरह की चीखें भी दफन हो जाती हैं। हमारे दादाजी का जीवन एक ऐसी ही कहानी है, जहाँ एक तरफ दिल्ली के चांदनी चौक के रसूख दार लोग उनको प्रभावित कर रहे थे तो दूसरी तरफ देश की राजनीति उनको सम्मोहित ।उधर हमारे पुश्तैनी घर 'ठुलकुड़ा' के एक शांत कोने में बिखरा एक गहरा सन्नाटा भी था।
कहानी को थोड़ा सा पीछे ले जाती हूँ। मेरे परदादा त्रिलोचन भट्ट जी की ससुराल छाना गांव में थी और उनकी सास थी ज्योली के पंतों की बेटी। त्रिलोचन जी की 6 संताने थीं: 4 बेटे और 2 बेटियां। मेरे दादाजी भाइयों में सबसे छोटे और बहनों में बीच के थे। पढ़ाई-लिखाई के मामले में वे अपने अन्य भाइयों की तुलना में मध्यम दर्जे के थे। लेकिन उनके भीतर कुछ बड़ा करने की, गाँव की सीमाओं को लांघने की तीव्र और अदम्य महत्वाकांक्षा थी। उनकी बड़ी बहन का विवाह श्री हीरा बल्लभ पंत जी के साथ हुआ था, जिनका एक ही बेटा था— नाम था दीप चंद्र पंत।" मेरे दीप ताऊजी के बेटे दिनेश दद्दा बताते हैं , हम लोगों का गांव नैनीताल के नौकुचियाताल में शिलोटी पंत नाम का है पर हम लोग 250-300 साल पहले खूंट गांव से आए थे और फिर अल्मोड़ा पोखरखाली में बस गये। वर्ष 1958 में हम रानीधारा आ गए। मेरे पिता श्री दीप चंद्र पंत जी के चाचा का नाम घनानंद पंत था, जिन्होंने 'कुमाऊँ मोटर ओनर्स यूनियन लिमिटेड' (KMOU) की शुरुआत में अपना अहम योगदान दिया था; यह बात 1915 के आसपास की है।"
मेरे दादा जी की दूसरी बहन की शादी श्री नित्यानंद पांडे जी के साथ हुई थी, जो ढोली गाँव का एक प्रतिष्ठित पांडे परिवार था। नित्यानंद जी धनी मानी व्यक्ति थे। उनके एक बेटे श्री दया किशन पांडे थे जो मशहूर वकील और विधायक रहे।
मेरे दादा दी बहुत कम उम्र में ही अपना गाँव बिषाड़ छोड़कर दिल्ली आ गए थे और कांग्रेस से जुड़ गए थे। यह वह दौर था जब देश आज़ादी की नई इबारत लिख रहा था। भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने दिल्ली में एक बड़ा राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया था, जिसमें हमारे दादाजी ने सक्रिय भागीदारी की थी। उस सम्मेलन में दादाजी की नेहरू जी के साथ एक ऐतिहासिक तस्वीर खींची गई, जो अगले दिन देश के प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार 'हिंदुस्तान टाइम्स' (Hindustan Times) में प्रमुखता से प्रकाशित हुई।
नियति का खेल देखिए, वक्त का पहिया घूमा और कालांतर में सालों बाद, दादाजी की पोती—यानी मैंने—उसी 'हिंदुस्तान टाइम्स' अखबार में अपनी पेशेवर नौकरी की शुरुआत की। जब मैं दफ्तर की उन मेज़ों को देखती थी, तो मुझे अहसास होता था कि इतिहास की कड़ियाँ किस तरह अदृश्य रूप से हमें अपने पूर्वजों से जोड़ देती हैं।
दिल्ली में दादाजी ने ज्योतिष और कर्मकांड के काम को अपनी आजीविका का मुख्य आधार बनाया। चांदनी चौक के बड़े-बड़े रसूखदार 'मुनार' (स्वर्णकार/सुनार) समाज के लोग उनके मुख्य यजमान बन गए। दादाजी का यह कारोबार बहुत फला-फूला। वे दिल्ली के संभ्रांत समाज के एक जाने-माने ज्योतिषी बन गए, लेकिन इस कारण वे बेहद व्यस्त रहने लगे। उनका गाँव आना-जाना बहुत कम हो गया।
दिल्ली से कमाया हुआ पैसो से गाँव में भी वे अपने उन्हीं सुनार यजमानों की तरह ग्रामीणों को ज़रूरत पड़ने पर कर्ज (पैसे) देते थे या उनके गहने व ज़मीन गिरवी रख लेते थे। बही-खातों और लेन-देन की यह पूरी दास्तान आज भी हमारे पास एक 'पांडुलिपि' (Manuscript) के रूप में महफ़ूज़ है।
लेकिन दिल्ली की इस चमक की एक बहुत भारी और दर्दनाक कीमत हमारे पुश्तैनी घर में चुकाई जा रही थी। दादाजी का रहन-सहन और उनका आर्थिक स्तर ईर्ष्या का भी कारण थे। सन्1930 में जब हमारी बड़ी दादी (हरिप्रिया ) के गर्भ से पहले बेटे (हमारे ताऊजी) का जन्म हुआ, तब दादाजी दिल्ली में ही व्यस्त थे। उन दिनों संचार के साधन नहीं थे। दादाजी को भेजा गया टेलीग्राम (तार) उन्हें बहुत देर से मिला। वे तुरंत गाँव नहीं पहुँच सके।
पति की अनुपस्थिति गाँव की महिलाओं के बीच में शक और संदेहसे उपजी काना फूंसी लगातार मेरी बड़ीदादी को कितना तकलीफ देती होगी यह सोचकर लिखते हुए भी मेरे हाथ कांप रहे हैं। उस समय कम उम्र में ही शादी हो जाती थी। पहला मासिक ससुराल में ही होता था। पहले मासिक के बाद जब 5 दिन पूरे हो जाते तो सत्यनारायण की कथा होती।
इस तरह सोचती हूं तो मेरी बड़ी दादी 14 साल में मां बनी होगी। भीतर से कितना डर रहा होगा, ऊपर से समाज के ताने। कितनी टूट गई होगी। उनकी हर सुबह और हर शाम छींटाकसी के बीच गुज़रती थी—"तेरा पति तो तेरे साथ रहता ही नहीं, वह तो दिल्ली रहता है। इतनी दौलत का क्या फायदा, जब आदमी ही पास न हो"। उनके सीधे-सरल मन में यह बात बैठ गई कि उनका पति उनसे इतना विमुख कैसे हो सकता है? वे अवसाद के उस गहरे दलदल में धंस गईं जहाँ से बाहर निकलने का उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझा।
और फिर वह खौफनाक दिन आया। जिस दिन हमारे ताऊजी ने इस दुनिया में अपनी आँखें खोली थीं, उसके ठीक बाद, बड़ी दादी ने कमरे के एक कोने में रखे एक सुंदर से पालने में उस नवजात शिशु को बहुत दुलार से लिटाया। उन्होंने बच्चे को भरपेट दूध पिलाया, उसे चूमा, और फिर एक गहरे, मौन विलाप के साथ खुद को एक कमरे में बंद कर लिया। अपने अकेलेपन, विरह और समाज के तानों से हारकर, उन्होंने अपने ऊपर आग लगा ली। जब तक लोग दरवाज़ा तोड़कर भीतर पहुँचते, बड़ी दादी इस नश्वर संसार को छोड़कर जा चुकी थीं। पालने में लेटा वह नन्हा बच्चा अपनी माँ के इस दर्दनाक बलिदान से अनजान, चुपचाप सो रहा था।
बड़ी दादी के असमय चले जाने के बाद, ठुलकुड़ा के उस सूने कमरे में एक नवजात शिशु की रोने की आवाज़ गूँज रही थी। हमारे ताऊजी, माँ के आँचल और उनके दूध से महरूम हो चुके थे। माँ की चिता की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि इस नन्हे बच्चे की भूख शांत करने का एक बड़ा संकट पूरे कुटुंब के सामने खड़ा था।
उस दौर में डिब्बे का दूध या आधुनिक विकल्पों का कोई नामोनिशान नहीं था। ऐसे कठिन समय में बिषाड़ गाँव और आस-पास के परिवारों की इंसानियत जाग उठी। गाँव की जिन माताओं के अपने छोटे बच्चे थे, वे आगे आईं। वे बारी-बारी से ठुलकुड़ा आतीं और अनाथ हो चुके हमारे ताऊजी को अपनी गोद में लेकर ममता का दूध पिलाती थीं।
ताऊजी जब बड़े हुए, तो वे बड़े गर्व और भावुकता से अक्सर यह संस्मरण सुनाया करते थे—"मैंने किसी एक माँ का नहीं, बल्कि इस गाँव की सोलह माताओं का दूध पीकर अपना जीवन पाया है"। यह वाक्य कुमाऊँ की उस सांझी लोक-संस्कृति का साक्षात प्रमाण था, जहाँ पूरा गाँव विपत्ति के समय एक परिवार बन जाता था।
लेकिन इस कहानी का एक और पहलू था, जो हमारे दादाजी के अनोखे और स्वाभिमानी चरित्र को उजागर करता है। जब दादाजी दिल्ली से वापस लौटे, तो वे अपनी पत्नी को खोने के गहरे दुख से टूट चुके थे। पर वे एक व्यावहारिक और नफासतपसंद व्यक्ति थे। उन्होंने देखा कि गाँव की महिलाओं ने उनके बेटे को दूध पिलाकर उसका जीवन बचाया है। दादाजी का स्वाभिमानी चरित्र यह बर्दाश्त नहीं कर सकता था कि वे किसी का यह उपकार मुफ़्त में लें या किसी के अहसान तले दबे रहें।
उन्होंने एक बेहद अजीब लेकिन पारदर्शी रास्ता चुना। जिन माताओं ने ताऊजी को अपना दूध पिलाया था, दादाजी उन परिवारों को अपना 'कर्ज़दार' मानने लगे। उन्होंने अपनी उसी पुरानी बही-खाते की पांडुलिपि (Manuscript) को उठाया, जिसमें वे लेन-देन का हिसाब रखते थे। उन्होंने बाकायदा पन्नों पर दर्ज किया कि किस परिवार की महिला ने उनके बच्चे को कितनी बार और कितने समय तक दूध पिलाया है।
दादाजी ने इस ममतामयी उपकार की कीमत चुकाने का फैसला किया। जिन परिवारों ने उनसे पहले से कोई कर्ज ले रखा था, दादाजी ने उनके बही-खाते से कर्ज के धन को काट दिया और उन्हें ऋणमुक्त कर दिया। जिन पर कोई कर्ज नहीं था, उन्हें उन्होंने बाकायदा धन के रूप में पारिश्रमिक या सहायता राशि चुकाई। इस अनूठे लेन-देन का ब्योरा आज भी हमारे परिवार की उस ऐतिहासिक पांडुलिपि के पन्नों पर दर्ज है।
इस जिंदगीनामा में आगे आप पढ़ेंगे और भी कई किस्से जो आपको भावुक कर देंगे।
पापा, कल एकादशी है। आपको गए हुए 4 माह हो जाएंगे पर यह जिंदगीनामा लिखते हुए लगता है ,
आप आराम कुर्सी में बैठे हैं और मैं तख्त पर।
बाहर बारिश हो रही है।
पेड़-पौधे भीग रहे हैं, साथ में भीग रही हूँ मैं भी।
आपको बारिश पसंद थी ना, पापा?
मुझे भी पसंद है।

शनिवार, 22 अगस्त 2026

लंदन फोर्ट- क्या है 'एकार धोती' का रहस्य

संस्कृति हमारी भाषा बोली के साथ-साथ गीत संगीत, दीवारों पर बने चित्र और हमारे चूल्हे की आग, भोजन के स्वाद में भी ज़िंदा रहती है। कभी भी कोई त्यौहार आता है, पापा बहुत खुश होते । वे बहुत उत्सवधर्मी थे। उनको पकवान पसंद थे, खासकर सिंगल और बड़े। पहाड़ी रायता, खीर भी उनकी पसंदीदा लिस्ट में शामिल थे। पर उन्हें मीठा बहुत पसंद था।
सोचती हूं जब हमारे पूर्वज विश्वशर्मा इस पहाड़ी धरती में आए होंगे तो कैसे उन्होंने तारतम्य बनाया होगा। कैसे भाषा सीखी होगी? पर उनका अपनी माटी का असर अब भी हमारी माटी की सुगंध में रचा बसा है। मेरे बहुत सारे दक्षिण भारतीय मित्र हैं। उनसे बात करते हुए मैं बार-बार खुद को टटोलने लगती हूँ। अपने भीतर कुछ खास सा महसूस होता है। सबसे बड़ी और हैरान करने वाली समानता है—मोटे अनाजों (Millets) के प्रति अगाध प्रेम। दक्षिण भारत में खाया जाने वाला 'रागी' ही उत्तराखंड में 'मंडुआ' कहलाता है। कर्नाटक का सबसे प्रसिद्ध ग्रामीण भोजन है 'रागी मुद्धे', जिसमें रागी के आटे को उबलते पानी में घोटकर गोल पिंड बनाए जाते हैं। उत्तराखंड में ठीक इसी विधि से मंडुए के आटे से 'बड़ी' (Baadi) बनाई जाती है। दोनों का स्वाद, दोनों का पोषण और बनाने का तरीका बिल्कुल एक जैसे हैं। इसी तरह दक्षिण भारत में उपवास में खाए जाने वाले मिलेट 'कुथिरवल्ली' को हमारे उत्तराखंड में 'झंगोरा' कहा जाता है। दक्षिण भारत में इसका पोंगल बनता है, तो हमारे यहाँ पहाड़ों में दूध और गुड़ के साथ इसकी 'झंगोरे की खीर' बनाई जाती है। दक्षिण भारत का मशहूर 'मेदु वड़ा' हमारे पहाड़ों में शुभ अवसरों पर बनने वाले 'उड़द के बड़ा' के रूप में दिखाई देता है। दोनों में ही बिना छिलके वाली उड़द की दाल को पीसकर मसाले मिलाकर डीप-फ्राई किया जाता है।
एक और महत्वपूर्ण बात हमारे श्री संप्रदाय से जुड़े इस वैष्णव कुल में भोजन को भगवान का 'यज्ञ प्रसाद' माना जाता था। इस सात्विक मर्यादा को बनाए रखने के लिए हमारी रसोई में शुद्धता के नियम बेहद कड़े थे। हमारी दादियाँ और माताएँ स्नान के बाद केवल 'एक वस्त्र' (एक कपड़े में शुद्ध होकर) ही चूल्हे पर बैठती थीं। जब तक खाना बन न जाए, वे किसी अन्य वस्तु या व्यक्ति को स्पर्श नहीं कर सकती थीं। कुमाऊँनी लोक-संस्कृति में इस परम शुद्ध और एकाग्र शारीरिक-मानसिक अवस्था को 'एकार धोती' कहा जाता था।
यह परंपरा शत-प्रतिशत सुदूर दक्षिण भारत के तमिल और कान्नड़ ब्राह्मण परिवारों की प्राचीन 'मड़ी' (Madi) प्रथा जैसी थी। मान्यता है कि स्नान के बाद शरीर में जो सकारात्मक ऊर्जा और शुद्धता आती है, वह किसी अशुद्ध स्पर्श से नष्ट न हो । मैंने माँ-नानी को बहुत लंबे समय तक इस 'एकार धोती' के कठिन नियमों का पालन करते हुए भोजन बनाते देखा है। खाना बनाते समय बात करना तक वर्जित था, ताकि मुँह की सूक्ष्म बूँदें भी भोजन की शुचिता को खंडित न कर सकें। बस मन ही मन लक्ष्मी-नारायण का नाम स्मरण किया जाता था।
पहाड़ी 'आलू के गुटके' और 'गुझिया' व तीखी 'भांग की चटनी' का तो कोई सानी नहीं। लोहे की कढ़ाई में जब शुद्ध सरसों का तेल गरम होता है, तो आलुओं में 'जख्या' का तड़का लगाया जाता है। जख्या के काले दाने गरम तेल में जाते ही 'चट-चट' की तीव्र ध्वनि के साथ चटकने लगते हैं।
भोजन का यह तरीका भी सुदूर दक्षिण भारत (तमिलनाडु और कर्नाटक) की रसोई से मेल खाता है, जहाँ आलू की सूखी सब्जी या सांबर-रसम की शुरुआत हमेशा 'काली राई' (Mustard Seeds) के चटकते हुए तड़के से होती है। जो काम दक्षिण में काली राई करती है, वही काम हमारे पहाड़ों में जख्या करता है।
वहीं, दक्षिण भारत के भोजन में जो स्थान 'नारियल की चटनी' (Coconut Chutney) का है, वही हमारे कुमाऊँ में भुने हुए भांग के दानों और तिल को सिल-बट्टे पर पीसकर बनाई जाने वाली भांग की चटनी का है। सोचती हूं जब हमारे पूर्वज श्री विश्वशर्मा दक्कन को छोड़कर हिमालय की इन ऊँची वादियों में आए, तो यहाँ नारियल मिलना बंद हो गया। लेकिन उनकी स्वाद-ग्रंथियों को भोजन के साथ वह गाढ़ी, खट्टी-तीखी चटनी खाने की आदत थी। हमारे पूर्वजों ने नारियल के विकल्प के रूप में पहाड़ों में मिलने वाले भांग के बीजों को खोज निकाला। अचरज देखिए, दोनों ही चटनी का गाढ़ापन (Texture) और स्वाद का संतुलन आज भी शत-प्रतिशत एक जैसा ही है।

रविवार, 2 अगस्त 2026

लंदन फोर्ट डायरी-बिषाड़ की गूँज और दक्षिण का आगमन


आज एकादशी है। पापा को हमसे दूर गए आज पूरे तीन महीने हो गए हैं। लेकिन पापा, आप कहाँ गए? आप तो हर बार की तरह मेरी स्मृतियों में लौट आते हैं—कोई किस्सा, कोई कहानी या कोई ऐतिहासिक घटना बनकर। मुझे अब समझ आता है कि आपकी सुनाई हर कहानी के पीछे सदियों पुराना एक इतिहास छिपा था। यह लेखन महज़ अतीत को खंगालना नहीं, बल्कि खुद को जानने और अपनी जड़ों को समझने की व्याकुल कोशिश है।

हमारे समाज में बहुत सारी सुंदर प्रथाएँ हैं, तो कुछ कुप्रथाएँ भी हैं। इन सबके पीछे कई सदियों की दास्तानें छिपी हैं, जो कभी लोककथाओं में अपना वजूद तलाशती हैं, तो कभी लोक संगीत की विरह-धूनों में पिघलती रहती हैं। आखिर हम कौन हैं? कहाँ से आए हैं? हमारे पूर्वज कौन थे? यह सवाल ही हमारी इस खोज को मुकम्मल बनाता है।

बम राजाओं का क्रूर दौर और सोर घाटी


हमारी कहानी शुरू होती है १३वीं से १५वीं शताब्दी के मध्यकाल के आस-पास। यह वह दौर था जब महान कत्यूरी राजवंश का पतन हो चुका था और उत्तराखंड के इतिहास में 'बाम' (या बम) राजा पिथौरागढ़ की सोर घाटी के मध्ययुगीन शासक के रूप में उभर रहे थे। 'बाम' नाम सुनने में थोड़ा अटपटा ज़रूर लगता है, इसलिए कयास लगाए जाते हैं कि यह शायद 'ब्रह्म' शब्द का अपभ्रंश रहा हो। मुमकिन है कि वे खुद को उच्च कुल का या दैवीय शक्तियों से प्रेरित शासक सिद्ध करने के लिए इस नाम का प्रयोग करते हों। कुछ इतिहासकार इन्हें पश्चिमी नेपाल के डोटी राजपरिवार व रैका राजाओं के सामंतों की शाखा मानते हैं, तो कुछ इन्हें कत्यूरी राजाओं के ही वंशज कहते हैं।

ये राजा पूरी तरह सामंती और विलासी थे, जो मौसम के हिसाब से अपना ठिकाना बदलते थे। जब पहाड़ों में कड़ाके की ठंड पड़ती और आम जनता ठिठुरती रहती, तब ये राजा सुख-सुविधा के लिए घाटी से नीचे रामेश्वर और बैलोरकोल चले जाते थे। इतिहास में इनके नाम भी बड़े निराले दर्ज हैं—कर्किल बम, काकिल बम, चनारी बम, आर्की बम, ज्ञानी बम, शक्ति बम, विजय बम और हरी बम।

ये बम शासक जितने विलासी थे, न्याय प्रणाली में उतने ही क्रूर और आदिम भी थे। उनके दरबार में अपराध सिद्ध करने के लिए वैज्ञानिक साक्ष्यों के बजाय 'दैवीय परीक्षाओं' (दिव्य परखाओं) का सहारा लिया जाता था। 
कुछ उदाहरण

· गोला-दीप: उबलते हुए तेल में नंगे हाथ डालकर कड़ाही की तली से सिक्का निकालना।

· कढ़ाई-दीप: लाल-गर्म लोहे की छड़ या कुल्हाड़ी को नंगे हाथों से छूना।
यदि व्यक्ति का हाथ नहीं जलता था, तभी उसे निर्दोष माना जाता था।
 मैं इसे इतिहास के एक क्रूर और अमानवीय युग के रूप में दर्ज करती हूँ। आज भी जब समाज के किसी कोने से ऐसी दकियानूसी खबरें पढ़ती हूँ, तो मेरा मन विचलित हो जाता है और यह मेरी आधुनिक आस्था पर एक गहरा प्रहार करता है। स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार, पिथौरागढ़ के कई ऐतिहासिक नौले (पारंपरिक जल स्रोत) और पुराने किले की रक्षात्मक चौकियाँ इन्हीं बम राजाओं ने बनवाई थीं, जिसका जीर्णोद्धार बाद में गोरखाओं ने किया।

श्री विश्वशर्मा: दक्षिण से सोर घाटी का ऐतिहासिक सेतु


इसी निरंकुश और सामंती काल के दौरान पिथौरागढ़ के सोर क्षेत्र में भट्ट ब्राह्मणों का आगमन होता है, जो उत्तराखंड के इतिहास की एक युगांतकारी सांस्कृतिक घटना बनती है। इसके साथ ही पहाड़ी शैली में दक्षिण की लोककलाओं (कोल्लम/ऐपण), खान-पान और सुरों का अद्भुत समागम शुरू होता है। धार्मिक अनुष्ठानों में रुढ़िवादिता की जगह शास्त्रार्थ और बौद्धिक टिप्पणियों को एक बड़ा फलक मिलता है और पहाड़ों में शिक्षा का द्वार खुलता है।

इस महान क्रांति के सूत्रधार थे—श्री विश्वशर्मा (विश्व शर्मा)। वे कोई योजना बनाकर नहीं निकले थे, बल्कि तीर्थाटन (तीर्थ यात्रा) के उद्देश्य से घूमते हुए सुदूर दक्षिण द्रविड़ देश (दक्षिण भारत) से काशी के रास्ते होते हुए कुमाऊं की सोर घाटी पहुँचे थे। जब वे यहाँ पहुँचे, तो तत्कालीन बम राजाओं से उनकी भेंट हुई। राजा उनकी अगाध विद्वत्ता और वेदों के गूढ़ ज्ञान से इतने मंत्रमुग्ध हुए कि उन्होंने विश्वशर्मा को यहीं ठहरने का राजकीय न्यौता दे डाला।

विश्वशर्मा के लिए यह निर्णय लेना अत्यंत कठिन था। उनके लिए यहाँ की वेशभूषा, खान-पान, रहन-सहन और बर्फीली भौगोलिक परिस्थितियाँ बिल्कुल नई और अनजानी थीं। उन्होंने विचार करने के लिए समय माँगा, अपने परिवार से संवाद किया, लेकिन तब तक वे कुमाऊं की अलौकिक सुंदरता और हिमालय के शांत वातावरण में अपना दिल हार चुके थे। अंततः उन्होंने यहीं रहने का फैसला किया। वे उत्तराखंड के इतिहास में एकमात्र ऐसे दक्षिण भारतीय मूल के भट्ट ब्राह्मण माने जाते हैं, जो मध्यकाल में यहाँ आकर रचे-बसे थे।

बिषाड़ गाँव: एक कुल की जागीर से वटवृक्ष बनने तक


बाम राजाओं ने श्री विश्वशर्मा की विद्वत्ता के सम्मान और उनके जीवन निर्वाह के लिए पिथौरागढ़ के पास स्थित 'बिषाड़ गाँव' उन्हें जागीर (भूमि दान) के रूप में भेंट कर दिया। यही वह पावन भूमि है जहाँ से हमारे कुल की शुरुआत हुई। बिषाड़ गाँव में बोया गया यह सांस्कृतिक बीज समय के साथ एक विशाल वटवृक्ष में बदल गया। कालांतर में इस कुल की शाखाएं कुमाऊं के पल्लू, खेतीखान, पांडेखोला, रामनगर, काशीपुर से होती हुई आज देश-दुनिया के अन्य हिस्सों तक विस्तृत हो चुकी हैं।

आगे चलकर इस कुल के विद्वान राजदरबारों में प्रतिष्ठित अधिकारी और मुख्य सलाहकार बने। इन भृगुवंशी और विश्वामित्र गोत्रीय ब्राह्मणों को क्षेत्र के सबसे प्रसिद्ध और जागृत धार्मिक स्थलों—रामेश्वर और थलकेदार—के आचार्य (मुख्य पुरोहित) होने का गौरव भी प्राप्त हुआ। आज भी जब मैं अपने परिवार के रहन-सहन और रस्म-रिवाजों को देखती हूँ, तो मुझे स्पष्ट रूप से उनमें सुदूर दक्षिण भारत की वह पवित्र झलक साफ दिखाई देती है, जिसे श्री विश्वशर्मा सदियों पहले अपने साथ लेकर आए थे।


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गुरुवार, 9 जुलाई 2026

लंदन फोर्ट वैष्णव भक्ति और अन्यारी देवी का रहस्य


२५ जून, गुरुवार। एकादशी। पापा को हमसे दूर गए आज पूरे दो महीने हो गए हैं। ठीक एक महीने पहले मैंने उन पर पहला स्मृति लेख लिखा था, जिसे पढ़कर आप सभी ने मुझे इसे जारी रखने की प्रेरणा दी। आप सभी का हृदय से आभार।

मेरी इस खोज की कथा में आज फिर राधेश्याम जी उपस्थित हैं। जी हाँ, वही राधेश्याम जी, जिन्हें मेरे पापा अपने अंतिम दिनों में बहुत याद कर रहे थे। वे पापा के मामा भी थे और सखा भी। वे उन्हें क्यों याद कर रहे थे, इसकी कई वजहें मैंने खोजीं, पर सबसे महत्वपूर्ण कड़ी मुझे मिली जाने-माने भाषाविद डॉ. सुरेश चंद्र पंत जी की एक टिप्पणी में। उन्होंने लिखा था:

"इस विवरण के बहुत से पात्रों को देखने का सौभाग्य मिला है। हरीनाथ ताऊजी गाँव के सबसे शालीन व्यक्तित्व थे। राधेश्याम दा परम वैष्णव भक्त थे। उनका वास्तविक नाम लक्ष्मी दत्त था, पर वे राधेश्याम नाम से ही प्रसिद्ध हुए। वे नित्य सुबह-शाम कई घंटे नाम संकीर्तन करते थे। सौम्य और मृदुल व्यवहार; जो एक बार मिल ले, कभी भूल न पाए। उन्होंने अपने बच्चों का नाम भी नारायण और नारायणी रखा था। मेरे पिताजी बताते थे कि अपने निधन से पहले राधेश्याम दा ने परिवार के कुछ लोगों को पोस्टकार्ड लिखकर बता दिया था कि अमुक दिन राधेश्याम नहीं रहेंगे। और अचरज देखिए, ठीक उसी दिन वे विदा हो गए। स्व. देवेंद्र जी (आपके पापा) को अपने निधन से पहले वही अविस्मरणीय व्यक्तित्व याद आया होगा, जिसकी अमिट छाप बचपन में ही उनके मन पर पड़ गई थी।"

निश्चित ही, मेरे पापा इस रहस्य को जानते होंगे। वे मन ही मन खुद से पूछते होंगे—"राधेश्याम को अपने अंत का अहसास पहले ही हो गया, मुझे क्यों नहीं हो पा रहा है?"

पापा, अब तो आप राधेश्याम जी से मिल लिए होंगे। वहाँ ऊपर आप दोनों का समय अच्छा कट रहा होगा। वे भी वैष्णव थे और आप भी। और देखिए न, आप गए भी तो एकादशी के ही पवित्र दिन पर। जहाँ भी हो, खुश रहना, पापा। इस बार हमारी शादी की सालगिरह भी बहुत सूनी रही। उसके ठीक अगले दिन आपका जन्मदिन होता है। काश! आप दो महीने और रुक जाते, तो पूरे ९० साल के हो जाते। आप केक खाते हुए कितने खुश होते थे, आपकी वह मासूम मुस्कान अब मेरी स्मृतियों की स्थायी पूँजी है।

आप हमेशा कहते थे—"कुछ भी हो जाए, लिखना मत छोड़ना।" मेरे पहले पाठक और सबसे पैनी नज़र वाले आलोचक आप ही थे। एक बार आपने मुझे शब्दों की गहराई समझाते हुए कहा था—"शब्दों में भी वजन होता है। जब कविता लिखो, तो शब्दों को हल्का और वाक्यों को छोटा रखो। वजनी शब्दों को लेख के लिए बचाकर रखो।" मैंने तब यूँ ही पूछ लिया था—"कहानी के लिए क्या करूँ पापा?" आपने कहा था—"दृश्य की तरह लिखो।" मैं आज आपकी उसी सीख को पन्नों पर उतारने की कोशिश कर रही हूँ, पापा। तो सुनो, अब आगे की कथा...

सोर घाटी में वैष्णव लहर और श्री संप्रदाय का प्रभाव


आठवीं से बारहवीं सदी के मध्यकाल में उत्तराखंड की धरती पर वैष्णव धर्म का व्यापक असर था। कत्यूरी राजाओं ने बैजनाथ, द्वाराहाट और चमोली में भव्य मंदिरों की स्थापना शुरू की थी, जिनकी मूर्तिकला में वैष्णवी प्रभाव साफ झलकता है। एक दौर ऐसा भी आया जब वैष्णव धर्म मानो राष्ट्र का मुख्य धर्म बन गया था। यह लहर वैसी ही थी, जैसे प्राचीन काल में यूनानी राजदूत हेलियोडोरस (ई.पू. २००) ने विदिशा (भेलसा) में गरुड़ स्तंभ बनवाया था और खुद को गर्व से 'परम भागवत' कहा था। पाणिनि के काल से भी पहले, तैत्तिरीय आरण्यक के 'विष्णु गायत्री' मंत्र में विष्णु, नारायण और वासुदेव का स्पष्ट उल्लेख मिलता है:

"नारायणाय विद्महे वासुदेवया धीमहि तन्नो विष्णु प्रचोदयात्।"

हमारे पूर्वज और तारादत्त जी के बड़े भाई, प्रेम बल्लभ जी इसी गायत्री मंत्र के परम उपासक थे। वैष्णवों के चार प्रमुख संप्रदायों (श्री, हंस, ब्रह्म और रुद्र) में से हमारा परिवार 'श्री संप्रदाय' को मानता है, जिसे आज रामानुज संप्रदाय के नाम से जाना जाता है। इस संप्रदाय के अनुयायी 'श्री वैष्णव' कहलाते हैं। इनका दार्शनिक सिद्धांत 'विशिष्टाद्वैत' है और ये भगवान लक्ष्मी-नारायण की सात्विक उपासना करते हैं।

अन्यारी देवी: वैष्णव कुल में शाक्त कुलदेवी का रहस्य


इस परम वैष्णव पृष्ठभूमि के बीच हमारी अपनी एक कुलदेवी भी हैं—माँ अन्यारी देवी। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में माँ को समर्पित प्राचीन थान (मंदिर) हैं। मन में अक्सर यह जिज्ञासा उठती है कि एक शुद्ध शाकाहारी, वैष्णव कुल में, जहाँ लहसुन-प्याज तक वर्जित है, वहाँ अंधकार की अधिष्ठात्री देवी 'अन्यारी' को कुलदेवी के रूप में क्यों चुना गया?

उत्तराखंड की लोककथाओं और शाक्त मान्यताओं के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में माँ आदिशक्ति परब्रह्म के रूप में प्रकट हुईं। समय, विकारों और विपरीत परिस्थितियों के अनुसार माँ ने अलग-अलग रूप धारण किए। इन्हीं में से अंधकार को नियंत्रित करने वाला रूप 'अन्यारी देवी' (अंधेरी देवी) कहलाया और प्रकाश को समर्पित रूप 'उज्याली देवी' बना।

इस रहस्य को समझने के लिए हमें अपने पुरखों के समय और इतिहास को टटोलना होगा। मेरे भाई बताते हैं कि हमारे प्रतापी पूर्वज श्री तारादत्त भट्ट जी का जन्म सन् १८०२ में हुआ था। वे अपने समय में कुमाऊं क्षेत्र की एक अत्यंत सम्मानित और रसूखदार शख्सियत थे। तत्कालीन ब्रिटिश सरकार से उनके घनिष्ठ संबंध थे। प्रारंभिक ब्रिटिश काल में एक महत्वपूर्ण सरकारी पद संभालने वाले वे बिषाड़ गाँव के पहले व्यक्ति थे। सरकार ने उन्हें स्थानीय लोगों के आपसी विवादों को सुलझाने का न्यायिक अधिकार दिया था। उन्होंने ७८ वर्ष की आयु में अल्मोड़ा के झिझाड़ में अपनी वसीयत लिखी थी। पिथौरागढ़ के बिषाड़ में स्थित हमारा पुश्तैनी मकान 'ठुलकुड़ा' (बड़ा घर), चार गाँव की जागीर और अन्य संपत्तियाँ उन्हीं की मेहनत की बदौलत हैं। वह ऐतिहासिक कमरा, जहाँ बैठकर वे अपनी कचहरी लगाते थे और फैसले सुनाते थे, आज भी ठुलकुड़ा की इमारत में 'तारा भट्ट की कचहरी' के नाम से सुरक्षित है।

अंधकार में छिपी आस्था: इतिहास का एक साक्ष्य


तारादत्त जी के जन्म का वह दौर (सन् १८०२) और उससे पहले का समय मुग़ल हुकूमत के उतार-चढ़ाव और अत्याचारों से भरा था। लगभग ३३० वर्षों के उस दौर में देश के कई हिस्सों में हिंदुओं की धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रहार हुए, मंदिर तोड़े गए। इतिहासकारों और पारिवारिक जनश्रुतियों के अनुसार, संभवतः इसी दमनकारी समय में हमारे पुरखों ने अपनी आस्था को सुरक्षित रखने के लिए एक गुप्त मार्ग चुना।

अपने आराध्य की रक्षा के लिए उन्होंने घने जंगलों या एकांत कक्ष के अंधकार में, रात के समय पूजा करना प्रारंभ किया और अपनी कुलदेवी का नाम 'अन्यारी' रखा, जिसका कुमाऊँनी में अर्थ 'अंधकार' होता है।

चूँकि हमारे पूर्वज परम वैष्णव थे, इसलिए उन्होंने माँ अन्यारी की पूजा में पहाड़ों में प्रचलित पशु-बलि की कुप्रथा को कभी स्वीकार नहीं किया। माँ तामसी नाम के साथ पूजी ज़रूर गईं, पर उनकी पूजा पूरी तरह सात्विक रही—जहाँ बलि के स्थान पर आज भी केवल नारियल चढ़ाया जाता है। यह प्रसाद इतना पवित्र और गुप्त होता है कि इसे केवल हमारे कुटुंब के लोग ही ग्रहण करते हैं, बाहरी व्यक्ति को यह नहीं दिया जाता। इस प्रकार, अन्यारी देवी हमारी कुलदेवी तो हैं, पर उनकी पूजा और प्रसाद का तरीका विशुद्ध वैष्णवी है। यह व्यवस्था हमारे पूर्वजों की बुद्धिमत्ता का एक नायाब उदाहरण है, जिन्होंने विपरीत काल में भी अपनी वैष्णव मर्यादा और कुलदेवी की आस्था, दोनों को जीवित रखा।

नौएडा की इस शांत शाम में, अपनी इस डायरी को विराम देते हुए, मैं पापा को याद कर बृहदारण्यक उपनिषद की उसी प्रार्थना को दोहराती हूँ, जो शायद सदियों पहले मेरे पूर्वजों ने भी उस अंधकार भरे दौर में माँ अन्यारी के सामने दोहराई होगी:

"असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय।"
(हे माँ, मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो। मुझे अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो।



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(इस कथा को कहने में मेरे सहयात्री रहे हैं मेरे बड़े भाई निर्मल भट्ट जी, मदन भट्ट जी और डा. सुरेश चंद्र पंत जी)

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