कल परिवर्तनी एकादशी थी —पापा हमसे दूर चले गए। आज पूरे पाँच महीने हो गए हैं।
यह तो एक पौराणिक गाथा थी, परंतु जीवन के रंगमंच पर जो कथाएं मैं आपसे साझा करती हूं, वे हमारे परिवार की जीवंत और सत्य घटनाएं हैं। पिछली बार मैंने आपको 'ठुलकुड़ा' (बड़ी दादी) के विरह की मर्मस्पर्शी दास्तान सुनाई थी, आइए आज उसी सफर के अगले पड़ाव पर चलते हैं।बड़ी दादी की उस असमय त्रासदी के बाद, नन्हे ताऊजी को संभालने के लिए पापा की बड़ी बुआ आगे आईं। ताऊजी उस समय मात्र छह महीने के थे, जब बुआ उन्हें अपने साथ अल्मोड़ा ले गईं। ताऊजी का शुरुआती बचपन बुआ के घर के आंगन में बड़े दुलार के साथ बीता। बाद में, दादाजी ने दूसरा विवाह किया, जिससे मेरे पापा, मेरी बुआ और मेरे चाचा का जन्म हुआ। हमारे चाचा ने बचपन में ही वैराग्य की राह चुन ली और साधुओं की संगति में चले गए। उन्होंने साधु-वेश में पूरे देश का भ्रमण किया और वे कई भाषाएँ बोल सकते थे। उधर, पापा और बुआ अपनी मां के साथ बिषाड़ गांव में बड़े हो रहे थे। जब पापा महज चार-पांच वर्ष के थे, तब उनके नाना उन्हें अपने साथ ले गए—यह प्रसंग आप पहले पढ़ चुके हैं।
पापा ने अपनी इंटरमीडिएट (12वीं) तक की शिक्षा इसी घर में रहकर पूरी की। पढ़ाई में इतने मेधावी होने के कारण गणित और भौतिक विज्ञान में (विशेष योग्यता) प्राप्त की। पापा को जितना लगाव विज्ञान और गणित से था, उतना ही गहरा प्रेम साहित्य और सिनेमा से भी था। सिनेमा का चस्का तो ऐसा था कि कभी-कभी परीक्षा से ठीक एक दिन पहले वे अपनी पुरानी किताबें रद्दी में बेच आते थे ताकि फिल्म का टिकट खरीद सकें। परीक्षा की पूर्व संध्या पर फिल्म देखना उनके लिए तनावमुक्त होने का एक अनूठा तरीका था। जब उनके सहपाठी पढ़ रहे होते, पापा तब सिनेमाहॉल के अंधेरे में सुकून तलाश रहे होते थे। स्कूली दिनों में तो उन्होंने यह साहस नहीं किया, परंतु कॉलेज पहुंचते-पहुंचते फिल्म देखना उनका एक ऐसा शौक बन गया जिसे 'जुनून' कहा जा सकता है। दिलीप कुमार और वहीदा रहमान की रूपहले पर्दे की जोड़ी उन्हें बेहद प्रिय थी, और चरित्र अभिनेताओं में ए.के. हंगल उनके पसंदीदा थे।
एक बार जब मैंने पापा से उनके बचपन के उस घर और माहौल के बारे में पूछा जहां रहकर उन्होंने पढ़ाई की थी, तो वे मुस्कुराकर बोले, "मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी 'बड़े भाई साहब' पढ़ लो, हमारी कहानी हूबहू वैसी ही थी।" बाद में जब मैंने यही बात हरिप्रिया पंत जी की बहू से पूछी, तो उन्होंने भी इस पर मुहर लगाते हुए कहा, "तुम्हारे पापा ने बिल्कुल सच कहा था।"
बैरती के उस परिवार में जो बड़े भाई (जगदीश जी) थे, वे स्वभाव से बेहद उदार, सरल और स्नेही थे, परंतु पढ़ाई-लिखाई में उनका मन रत्ती भर भी नहीं लगता था। इसके विपरीत, छोटे भाई (शिव दत्त) इतने कुशाग्र बुद्धि थे कि किताब के किसी भी कोने से कुछ भी पूछ लो, उन्हें सब जुबानी याद रहता था। छोटा भाई हमेशा कक्षा में प्रथम आता, पर बड़े भाई को अपने अनुत्तीर्ण (फेल) होने का कोई मलाल नहीं होता था; वे तो छोटे भाई की सफलता में ही अपनी खुशी ढूंढ लेते थे।पढ़ते-पढ़ते एक समय ऐसा आया जब दोनों ने साथ में मिडिल की परीक्षा दी। पूरे परिवार और समाज को विश्वास था कि छोटा भाई कीर्तिमान रचेगा और बड़े भाई का तो परिणाम पहले से तय माना जा रहा था। परंतु, जब परिणाम आया तो सब स्तब्ध रह गए! परिणाम बिल्कुल उलट था। जगदीश जी (बड़े भाई) उत्तीर्ण हो गए और छोटा भाई ... पूरे मोहल्ले में बड़े भाई की सफलता के लड्डू बंटे, परंतु बड़े भाई के चेहरे पर कोई उल्लास नहीं था। छोटे भाई के कारण उनके सहृदय दिल को गहरा आघात लगा था। खैर, अगले वर्ष छोटे भाई ने पूरी परीक्षा में टॉप किया और बड़े भाई की राह भी धीरे-धीरे आसान होती चली गई। आगे चलकर जगदीश जी को लखनऊ सचिवालय में एक अच्छी सरकारी नौकरी मिली, जहां उनका परोपकारी स्वभाव और सामाजिक सेवा की भावना वैसी ही बनी रही जैसी बचपन में थी। उन्होंने वहां न जाने कितने ही प्रवासियों और जरूरतमंदों की नौकरियां लगवाईं और उनके रहने-खाने का प्रबंध किया। छोटे भाई शिवदत्त पांडे जिनको पापा आदर से शिबन दा कहते थे इंजीनियर बने।,, मैं जैसा अक्सर कहती हूं मेरे पापा का गणित बहुत अच्छा था , वह मुंहजुबानी सवाल हल कर लेते थे पर उसकी वजह शिबन दा ही थे वह उनके भाई भी थे और मेंटर भी। पापा जीवनपर्यन्त उनको याद करते रहे।
उन दिनों अल्मोड़ा शहर में पानी की भारी किल्लत हुआ करती थी। पापा अक्सर याद करते थे कि कैसे वे परिवार के अन्य सदस्यों के साथ पानी के लिए मीलों दूर पैदल जाया करते थे। उस दौर में बिजली की चकाचौंध नहीं थी, इसलिए रात के सन्नाटे में लालटेन की मद्धम डिबरी की रोशनी में ही पढ़ाई करनी पड़ती थी। भले ही तब भौतिक सुख-सुविधाएं नगण्य थीं और जीवन अत्यंत कठिन था, परंतु लोगों के आपसी संबंध और जीवन-मूल्य बहुत ऊंचे थे।समय का चक्र ऐसा घूमा कि आगे चलकर बैरती के उन भाइयों में से छोटे भाई की बेटी और मेरे पापा की बड़ी बेटी , दोनों ही डॉक्टर बनीं। दोनों ने केजीएमसी लखनऊ से अपनी शिक्षा पूरी की और आज भी उनके बीच एक अटूट और गहरी मित्रता है। सचमुच, ईश्वर जीवन के ताने-बाने में कुछ ऐसे अदृश्य धागे पिरो देता है, जिससे मनुष्य अपनी जड़ों की सुगंध को ताउम्र महसूस करता रहता है।
हमारे ताऊजी सचमुच एक देवता-स्वरूप पुरुष थे—अत्यंत दयालु, करुणा की प्रतिमूर्ति और अगाध स्नेह बरसाने वाले। वे स्वभाव से बेहद भावुक थे। प्रतिदिन नियम से 'रामचरितमानस' का पाठ करना उनकी दिनचर्या का नहीं, बल्कि उनकी आत्मा का हिस्सा था। वे मानस की प्रत्येक चौपाई को भीतर तक महसूस करते थे। पाठ करते समय जैसे ही श्री राम के वनवास, केवट प्रसंग या त्याग का कोई भी मार्मिक दृश्य आता, ताऊजी की आंखें सजल हो उठतीं और वे बच्चों की तरह सुबकने लगते थे।एक बार मानस-पाठ के दौरान भगवान राम का वह प्रसंग आया, जहां वे पिता की आज्ञा से दूर तपोवन में रहकर अपने दिवंगत पिता का श्राद्ध कर रहे हैं। ताऊजी को इस तरह सुबकता देख मैंने धीरे से पास जाकर पूछा, "ताऊजी! क्या हुआ? आप रो क्यों रहे हैं?" उन्होंने अपनी भीगी आंखें पोंछते हुए बेहद रुंधे गले से कहा, "आज पापा बहुत याद आए..." वे हमारे दादाजी को हमेशा 'पापा' कहकर ही पुकारते थे। जन्म देते ही मां को खो देने वाले और बचपन से पिता के साये से दूर रहने वाले उस बड़े बेटे के सीने में पिता की स्मृति एक स्थायी कसक बनकर धड़कती थी।दोनों भाइयों के बचपन की सबसे हसीन मुलाकातें अल्मोड़ा के प्रसिद्ध कौतिक (मेलों) में हुआ करती थीं। उस समय वे पढ़ाई कर रहे थे, इसलिए जेब अक्सर खाली ही रहती थी। एक बार मेले की रंग-बिरंगी भीड़ के बीच, मेरे पापा ने एक दुकान पर सजी मिठाई को देखकर बड़े चाव से ताऊजी से कहा, "भैया! मुझे यह चीज खानी है।" ताऊजी ने अपने छोटे भाई की आंखों में छिपी उस मासूम लालसा को पढ़ लिया, परंतु उस क्षण उनकी जेब बिल्कुल खाली थी। उन्होंने बहुत भारी मन से छोटे भाई को सहलाते हुए कहा, "इस बार तो नहीं रे प्यारे, पर अगली बार मैं तुम्हें यह जरूर खिलाऊंगा।" [छोटा भाई तो बालक था, कहकर भूल गया, पर बड़े भाई का दिल बेचैन हो उठा। जब वे बुआ के घर लौटे, तो उनका ध्यान घर के भीतर बने छोटे से आलय (मंदिर) पर गया, जहां बुआ ने पूजा और भगवान के चढ़ावे के कुछ पैसे रखे हुए थे। ताऊजी दबे पांव मंदिर में गए और चुपके से वहां रखे कुछ पैसे उठा लाए। सांसारिक दृष्टि से यह एक 'चोरी' थी, लेकिन इस चोरी में कोई लोभ, स्वार्थ या पाप नहीं था; इसमें तो केवल एक बड़े भाई की बेबसी और अपने छोटे भाई के प्रति उमड़ता अगाध वात्सल्य था। उन्होंने मन ही मन ईश्वर से बड़े मासूम भाव से कहा होगा, "हे प्रभु! मुझे अपने 'प्यारे' की इच्छा पूरी करनी है। मेरे छोटे भाई को उसकी मनपसंद चीज मिलनी ही चाहिए।" वे मेरे पापा को लाड से हमेशा 'प्यारे' ही कहते थे।अगली बार जब मेला लगा, तो ताऊजी पूरे अधिकार और गर्व के साथ पापा को उसी दुकान पर ले गए और उन्हें उनकी मनपसंद चीज भरपेट खिलाई। छोटे भाई के चेहरे पर तैरती वह निष्पाप मुस्कान देखकर बड़े भाई का सीना गर्व से चौड़ा हो गया था।परंतु, शाम को जब बुआ ने पूजा करते समय चढ़ावे के पैसे गायब होते देखे, तो वे समझ गईं। उन्होंने ताऊजी से कड़क लेकिन भीतर ही भीतर स्नेह से भीगी आवाज में कुमाऊंनी में पूछताछ की:बुआ: "मन्दिर बटि पैस तुम्ले काड़ छी ना?" (मंदिर से पैसे तुमने ही निकाले ना?) बुआ: "सांच-सांच बता!" (सच-सच बता!) बुआ: "फैल त्यार कमीज में कि लग रौ?" (फिर तेरी कमीज पर यह क्या लगा है?) बुआ: "यो त जलेबी लाग्यो छ।" (यह तो जलेबी का दाग लगा है।) तब ताऊजी ने बिना किसी भय के, सत्य और प्रेम से भरकर उत्तर दिया:ताऊजी: "हाँ मैंलेई काड़ छी। भुल आयो छियो। हमुले मिलबेर जलेबी खा। भगवान क पैस लेण में क्यै पाप नई लाग्द।" (हां, मैंने ही निकाले थे। भाई आया था। हम दोनों ने मिलकर जलेबी खाई। भगवान का पैसा भाई के लिए लेने में कोई पाप नहीं लगता।) [यह कहते हुए ताऊजी ने पलकें झुका लीं, पर उनके चेहरे पर कोई ग्लानि या डर नहीं था, क्योंकि वह 'चोरी' प्रेम के मंदिर की सबसे पवित्र इबादत थी।......
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