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गुरुवार, 24 सितंबर 2026

मंदिर के पैसे से क्या किया ताऊ जी ने.......


कल परिवर्तनी एकादशी थी —पापा हमसे दूर चले गए। आज पूरे पाँच महीने हो गए हैं। 
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की इस एकादशी को 'परिवर्तनी' कहने के पीछे एक पौराणिक मान्यता है। कहा जाता है कि चातुर्मास में क्षीरसागर में योगनिद्रा में लीन भगवान विष्णु इस पावन दिन अपनी करवट बदलते हैं, इसीलिए इसे 'परिवर्तनी' या 'पार्श्व एकादशी' के नाम से जाना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन स्वरूप की विशेष पूजा की जाती है।वामन अवतार और लक्ष्मी जी की चतुर योजनाकथा के अनुसार, भगवान वामन ने महर्षि कश्यप और माता अदिति के पुत्र के रूप में अवतार लिया था। उस समय असुरराज बलि (भक्त प्रह्लाद के पौत्र) ने अपने अदम्य तप और बाहुबल से तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल) पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया था। देवताओं को विवश होकर भगवान विष्णु की शरण में जाना पड़ा। तब श्रीहरि ने एक बौने ब्राह्मण (वामन) का वेष धारण किया और राजा बलि के पास पहुंचे, जो उस समय नर्मदा तट पर भव्य यज्ञ कर रहे थे।भगवान वामन ने राजा बलि से दान में केवल तीन पग भूमि मांगी। हालांकि, बलि के कुलगुरु शुक्राचार्य ने पहचान लिया था कि यह साक्षात भगवान विष्णु हैं और उन्होंने बलि को सचेत भी किया, लेकिन दानी बलि अपने वचन से पीछे नहीं हटे। जैसे ही दान का संकल्प पूरा हुआ, वामन भगवान ने विराट रूप धारण कर लिया। उन्होंने पहले पग में पूरी पृथ्वी नाप ली और दूसरे पग में अंतरिक्ष व स्वर्गलोक। अब जब तीसरा पैर रखने के लिए कोई स्थान नहीं बचा, तो वचनों के पक्के राजा बलि ने झुककर अपना सिर आगे कर दिया।भगवान ने अपना तीसरा पैर बलि के मस्तक पर रखा, जिससे वे पाताल लोक में चले गए। बलि की इस अटूट वचनबद्धता और दानशीलता से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें पाताल का राजा बनाए रखा और उनसे वर मांगने को कहा। बलि ने वरदान में मांगा कि भगवान स्वयं उनके द्वारपाल बनें और विष्णु जी ने इसे स्वीकार कर लिया।कथा आगे बढ़ती है कि जब माता लक्ष्मी अपने पति को खोजते हुए पाताल लोक पहुंचीं, तो उन्होंने देखा कि सृष्टि के पालनहार वहां राजा बलि के द्वार पर पहरा दे रहे हैं। माता लक्ष्मी ने एक चतुराई भरी योजना बनाई। वे एक साधारण स्त्री का रूप धरकर बलि के महल में पहुंचीं और उनसे सहायता मांगी। राजा बलि ने उन्हें शरण दी और अपने राजमहल में ससम्मान रखा। बाद में माता लक्ष्मी ने राजा बलि को रक्षासूत्र बांधकर उन्हें अपना भाई बना लिया। इस अगाध स्नेह से अभिभूत होकर बलि ने कहा, "बहन! तुम्हें जिस भी चीज की आवश्यकता हो, निसंकोच मांग लो।" तब माता लक्ष्मी ने कहा, "यदि आप देना ही चाहते हैं, तो मेरे पति (द्वारपाल) को इस बंधन से मुक्त कर दीजिए।" एक बहन के लिए इससे बड़ा उपहार और क्या हो सकता है।

यह तो एक पौराणिक गाथा थी, परंतु जीवन के रंगमंच पर जो कथाएं मैं आपसे साझा करती हूं, वे हमारे परिवार की जीवंत और सत्य घटनाएं हैं। पिछली बार मैंने आपको 'ठुलकुड़ा' (बड़ी दादी) के विरह की मर्मस्पर्शी दास्तान सुनाई थी, आइए आज उसी सफर के अगले पड़ाव पर चलते हैं।बड़ी दादी की उस असमय त्रासदी के बाद, नन्हे ताऊजी को संभालने के लिए पापा की बड़ी बुआ आगे आईं। ताऊजी उस समय मात्र छह महीने के थे, जब बुआ उन्हें अपने साथ अल्मोड़ा ले गईं। ताऊजी का शुरुआती बचपन बुआ के घर के आंगन में बड़े दुलार के साथ बीता। बाद में, दादाजी ने दूसरा विवाह किया, जिससे मेरे पापा, मेरी बुआ और मेरे चाचा का जन्म हुआ। हमारे चाचा ने बचपन में ही वैराग्य की राह चुन ली और साधुओं की संगति में चले गए। उन्होंने साधु-वेश में पूरे देश का भ्रमण किया और वे कई भाषाएँ बोल सकते थे। उधर, पापा और बुआ अपनी मां के साथ बिषाड़ गांव में बड़े हो रहे थे। जब पापा महज चार-पांच वर्ष के थे, तब उनके नाना उन्हें अपने साथ ले गए—यह प्रसंग आप पहले  पढ़ चुके हैं। 
आगे चलकर मिडिल स्कूल की पढ़ाई पापा ने अल्मोड़ा से की। चूंकि ताऊजी बचपन से ही बुआ के पास रह रहे थे, इसलिए दोनों बच्चों की पढ़ाई और परवरिश का पूरा भार अपनी बहन पर डालना दादाजी को उचित नहीं लगा। इसलिए उन्होंने पापा की पढ़ाई-लिखाई के लिए अपनी नानी से सहायता मांगी। उनकी नानी की एक भतीजी थीं—हरिप्रिया पंत, जो अल्मोड़ा के ही ज्योली गांव के पंत परिवार की बेटी थीं। उनके पिता का नाम दुर्गा दत्त पंत था। उनके पिता यानी मेरे दादा जी की नानी के भाई..इस प्रकार, अपने ननिहाल के बाद वर्ष 1946-47 के आसपास पापा दादाजी की नानी की उसी भतीजी (हरिप्रिया पंत) के घर आ गए। जो बाशभीरा में रहते थे। (ताऊजी पहले से पोखरखाली में रह ही रहे थे।) यह कुमाऊं का एक अत्यंत प्रतिष्ठित और शिक्षित ब्राह्मण परिवार था, जो समाज में 'बैरती के पांडे' के नाम से विख्यात था।
पापा ने अपनी इंटरमीडिएट (12वीं) तक की शिक्षा इसी घर में रहकर पूरी की। पढ़ाई में इतने मेधावी  होने के कारण गणित और भौतिक विज्ञान में (विशेष योग्यता) प्राप्त की। पापा को जितना लगाव विज्ञान और गणित से था, उतना ही गहरा प्रेम साहित्य और सिनेमा से भी था। सिनेमा का चस्का तो ऐसा था कि कभी-कभी परीक्षा से ठीक एक दिन पहले वे अपनी पुरानी किताबें रद्दी में बेच आते थे ताकि फिल्म का टिकट खरीद सकें। परीक्षा की पूर्व संध्या पर फिल्म देखना उनके लिए तनावमुक्त होने का एक अनूठा तरीका था। जब उनके सहपाठी  पढ़ रहे होते, पापा तब सिनेमाहॉल के अंधेरे में सुकून तलाश रहे होते थे। स्कूली दिनों में तो उन्होंने यह साहस नहीं किया, परंतु कॉलेज पहुंचते-पहुंचते फिल्म देखना उनका एक ऐसा शौक बन गया जिसे 'जुनून' कहा जा सकता है। दिलीप कुमार और वहीदा रहमान की रूपहले पर्दे की जोड़ी उन्हें बेहद प्रिय थी, और चरित्र अभिनेताओं में ए.के. हंगल उनके पसंदीदा थे।
एक बार जब मैंने पापा से उनके बचपन के उस घर और माहौल के बारे में पूछा जहां रहकर उन्होंने पढ़ाई की थी, तो वे मुस्कुराकर बोले, "मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी 'बड़े भाई साहब' पढ़ लो, हमारी कहानी हूबहू वैसी ही थी।" बाद में जब मैंने यही बात हरिप्रिया पंत जी की बहू से पूछी, तो उन्होंने भी इस पर मुहर लगाते हुए कहा, "तुम्हारे पापा ने बिल्कुल सच कहा था।"
बैरती के उस परिवार में जो बड़े भाई (जगदीश जी) थे, वे स्वभाव से बेहद उदार, सरल और स्नेही थे, परंतु पढ़ाई-लिखाई में उनका मन रत्ती भर भी नहीं लगता था। इसके विपरीत, छोटे भाई (शिव दत्त) इतने कुशाग्र बुद्धि थे कि किताब के किसी भी कोने से कुछ भी पूछ लो, उन्हें सब जुबानी याद रहता था। छोटा भाई हमेशा कक्षा में प्रथम आता, पर बड़े भाई को अपने अनुत्तीर्ण (फेल) होने का कोई मलाल नहीं होता था; वे तो छोटे भाई की सफलता में ही अपनी खुशी ढूंढ लेते थे।पढ़ते-पढ़ते एक समय ऐसा आया जब दोनों ने साथ में मिडिल की परीक्षा दी। पूरे परिवार और समाज को विश्वास था कि छोटा भाई कीर्तिमान रचेगा और बड़े भाई का तो परिणाम पहले से तय माना जा रहा था। परंतु, जब परिणाम आया तो सब स्तब्ध रह गए! परिणाम बिल्कुल उलट था। जगदीश जी (बड़े भाई) उत्तीर्ण हो गए और छोटा भाई ... पूरे मोहल्ले में बड़े भाई की सफलता के लड्डू बंटे, परंतु बड़े भाई के चेहरे पर कोई उल्लास नहीं था। छोटे भाई के कारण उनके सहृदय दिल को गहरा आघात लगा था। खैर, अगले वर्ष छोटे भाई ने पूरी परीक्षा में टॉप किया और बड़े भाई की राह भी धीरे-धीरे आसान होती चली गई। आगे चलकर जगदीश जी को लखनऊ सचिवालय में एक अच्छी सरकारी नौकरी मिली, जहां उनका परोपकारी स्वभाव और सामाजिक सेवा की भावना वैसी ही बनी रही जैसी बचपन में थी। उन्होंने वहां न जाने कितने ही प्रवासियों और जरूरतमंदों की नौकरियां लगवाईं और उनके रहने-खाने का प्रबंध किया। छोटे भाई शिवदत्त पांडे जिनको पापा आदर से शिबन दा कहते थे इंजीनियर बने।,, मैं जैसा अक्सर कहती हूं मेरे पापा का गणित बहुत अच्छा था , वह मुंहजुबानी सवाल हल कर लेते थे पर उसकी वजह शिबन दा ही थे वह उनके भाई भी थे और मेंटर भी। पापा जीवनपर्यन्त उनको याद करते रहे।
उन दिनों अल्मोड़ा शहर में पानी की भारी किल्लत हुआ करती थी। पापा अक्सर याद करते थे कि कैसे वे परिवार के अन्य सदस्यों के साथ पानी के लिए मीलों दूर पैदल जाया करते थे। उस दौर में बिजली की चकाचौंध नहीं थी, इसलिए रात के सन्नाटे में लालटेन की मद्धम डिबरी की रोशनी में ही पढ़ाई करनी पड़ती थी। भले ही तब भौतिक सुख-सुविधाएं नगण्य थीं और जीवन अत्यंत कठिन था, परंतु लोगों के आपसी संबंध और जीवन-मूल्य बहुत ऊंचे थे।समय का चक्र ऐसा घूमा कि आगे चलकर बैरती के उन भाइयों में से छोटे भाई की बेटी और मेरे पापा की बड़ी बेटी , दोनों ही डॉक्टर बनीं। दोनों ने केजीएमसी लखनऊ से अपनी शिक्षा पूरी की और आज भी उनके बीच एक अटूट और गहरी मित्रता है। सचमुच, ईश्वर जीवन के ताने-बाने में कुछ ऐसे अदृश्य धागे पिरो देता है, जिससे मनुष्य अपनी जड़ों की सुगंध को ताउम्र महसूस करता रहता है।
हमारे ताऊजी सचमुच एक देवता-स्वरूप पुरुष थे—अत्यंत दयालु, करुणा की प्रतिमूर्ति और अगाध स्नेह बरसाने वाले। वे स्वभाव से बेहद भावुक थे। प्रतिदिन नियम से 'रामचरितमानस' का पाठ करना उनकी दिनचर्या का नहीं, बल्कि उनकी आत्मा का हिस्सा था। वे मानस की प्रत्येक चौपाई को भीतर तक महसूस करते थे। पाठ करते समय जैसे ही श्री राम के वनवास, केवट प्रसंग या त्याग का कोई भी मार्मिक दृश्य आता, ताऊजी की आंखें सजल हो उठतीं और वे बच्चों की तरह सुबकने लगते थे।एक बार मानस-पाठ के दौरान भगवान राम का वह प्रसंग आया, जहां वे पिता की आज्ञा से दूर तपोवन में रहकर अपने दिवंगत पिता का श्राद्ध कर रहे हैं। ताऊजी को इस तरह सुबकता देख मैंने धीरे से पास जाकर पूछा, "ताऊजी! क्या हुआ? आप रो क्यों रहे हैं?" उन्होंने अपनी भीगी आंखें पोंछते हुए बेहद रुंधे गले से कहा, "आज पापा बहुत याद आए..." वे हमारे दादाजी को हमेशा 'पापा' कहकर ही पुकारते थे। जन्म देते ही मां को खो देने वाले और बचपन से पिता के साये से दूर रहने वाले उस बड़े बेटे के सीने में पिता की स्मृति एक स्थायी कसक बनकर धड़कती थी।दोनों भाइयों के बचपन की सबसे हसीन मुलाकातें अल्मोड़ा के प्रसिद्ध कौतिक (मेलों) में हुआ करती थीं। उस समय वे पढ़ाई कर रहे थे, इसलिए जेब अक्सर खाली ही रहती थी। एक बार मेले की रंग-बिरंगी भीड़ के बीच, मेरे पापा ने एक दुकान पर सजी मिठाई को देखकर बड़े चाव से ताऊजी से कहा, "भैया! मुझे यह चीज खानी है।" ताऊजी ने अपने छोटे भाई की आंखों में छिपी उस मासूम लालसा को पढ़ लिया, परंतु उस क्षण उनकी जेब बिल्कुल खाली थी। उन्होंने बहुत भारी मन से छोटे भाई को सहलाते हुए कहा, "इस बार तो नहीं रे प्यारे, पर अगली बार मैं तुम्हें यह जरूर खिलाऊंगा।" [छोटा भाई तो बालक था, कहकर भूल गया, पर बड़े भाई का दिल बेचैन हो उठा। जब वे बुआ के घर लौटे, तो उनका ध्यान घर के भीतर बने छोटे से आलय (मंदिर) पर गया, जहां बुआ ने पूजा और भगवान के चढ़ावे के कुछ पैसे रखे हुए थे। ताऊजी दबे पांव मंदिर में गए और चुपके से वहां रखे कुछ पैसे उठा लाए। सांसारिक दृष्टि से यह एक 'चोरी' थी, लेकिन इस चोरी में कोई लोभ, स्वार्थ या पाप नहीं था; इसमें तो केवल एक बड़े भाई की बेबसी और अपने छोटे भाई के प्रति उमड़ता अगाध वात्सल्य था। उन्होंने मन ही मन ईश्वर से बड़े मासूम भाव से कहा होगा, "हे प्रभु! मुझे अपने 'प्यारे' की इच्छा पूरी करनी है। मेरे छोटे भाई को उसकी मनपसंद चीज मिलनी ही चाहिए।" वे मेरे पापा को लाड से हमेशा 'प्यारे' ही कहते थे।अगली बार जब मेला लगा, तो ताऊजी पूरे अधिकार और गर्व के साथ पापा को उसी दुकान पर ले गए और उन्हें उनकी मनपसंद चीज भरपेट खिलाई। छोटे भाई के चेहरे पर तैरती वह निष्पाप मुस्कान देखकर बड़े भाई का सीना गर्व से चौड़ा हो गया था।परंतु, शाम को जब बुआ ने पूजा करते समय चढ़ावे के पैसे गायब होते देखे, तो वे समझ गईं। उन्होंने ताऊजी से कड़क लेकिन भीतर ही भीतर स्नेह से भीगी आवाज में कुमाऊंनी में पूछताछ की:बुआ: "मन्दिर बटि पैस तुम्ले काड़ छी ना?" (मंदिर से पैसे तुमने ही निकाले ना?) बुआ: "सांच-सांच बता!" (सच-सच बता!) बुआ: "फैल त्यार कमीज में कि लग रौ?" (फिर तेरी कमीज पर यह क्या लगा है?) बुआ: "यो त जलेबी लाग्यो छ।" (यह तो जलेबी का दाग लगा है।) तब ताऊजी ने बिना किसी भय के, सत्य और प्रेम से भरकर उत्तर दिया:ताऊजी: "हाँ मैंलेई काड़ छी। भुल आयो छियो। हमुले मिलबेर जलेबी खा। भगवान क पैस लेण में क्यै पाप नई लाग्द।" (हां, मैंने ही निकाले थे। भाई आया था। हम दोनों ने मिलकर जलेबी खाई। भगवान का पैसा भाई के लिए लेने में कोई पाप नहीं लगता।) [यह कहते हुए ताऊजी ने पलकें झुका लीं, पर उनके चेहरे पर कोई ग्लानि या डर नहीं था, क्योंकि वह 'चोरी' प्रेम के मंदिर की सबसे पवित्र इबादत थी।......
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शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

नारायणपेट और गायत्री बॉर्डर साड़ी- एक छोटे से कस्बे की लंबी दास्तान

 

Narayanapet cotton saree, gayetri border

इस बार चलते हैं दक्षिण मध्य भारत में स्थित तेलंगाना राज्य के एक छोटे से कस्बे नारायणपेट, जिला नारायणपेट, राजधानी हैदराबाद। इस बार अपने साथ आपको भी सैर कराने की वजह सिर्फ एक ही है जो हम पहनते-खाते- पीते हैं उसके इतिहास को भी थोड़ा टटोला जाए। नारायणपेट साड़ी की मांग अक्सर मेरे ग्राहक करते हैं।

 नारायणपेट के पारंपरिक 'चौका' (चेक पैटर्न) और इल्कल-शैली के 'गायत्री बॉर्डर' (Gayatri Border) का मिलाजुला रूप  इस  समय फैशन जगत में छाया हुआ है।

नारायणपेट साड़ी की कहानी 400 साल पुरानी

नारायणपेट साड़ी का इतिहास लगभग 400 वर्ष पुराना  है। 17वीं शताब्दी (लगभग 1630 ई.) में जब मराठा सम्राट छत्रपति शिवाजी महाराज इस क्षेत्र से गुजर रहे थे, तब उनके साथ आए कुछ बुनकर यहीं बस गए। इन बुनकरों ने महाराष्ट्र की बुनाई कला को स्थानीय संस्कृति के साथ मिलाया, जिससे नारायणपेट साड़ियों का जन्म हुआ। इस अद्वितीय विरासत के कारण नारायणपेट साड़ियों को भौगोलिक संकेतक (GI Tag) भी प्राप्त हो चुका है।

क्या है गायत्री बॉर्डर

'गायत्री बॉर्डर' जिसे कई क्षेत्रों में 'इल्कल गायत्री बॉर्डर' भी कहा जाता है, मुख्य रूप से धागे के काम (Thread-work) और मंदिर की कलाकृति (Temple Motifs) से सजा है। इसते बॉर्डर में त्रिकोणीय गोपुरम या 'रुद्राक्ष' के डिजाइन बुने जाते हैं, इससे साड़ी में आध्यात्मिक और पारंपरिक लुक दिखता हैं। जहाँ नारायणपेट साड़ी की बॉडी एकदम सरल या छोटे चेक वाली होती है, वहीं इसका गायत्री बॉर्डर बेहद आकर्षक और गहरे विरोधाभासी (Contrast) रंगों में बनाया किया जाता है।

8 साड़ियां बुनी जाती हैं एक साथ

नारायणपेट साड़ियों की बुनाई 'पिट लूम' (Pit Loom) पर की जाती है। इसके निर्माण में 'इंटरलॉक वेफ्ट' (Interlock Weft) तकनीक का उपयोग होता है, जिससे साड़ी का बॉर्डर और बॉडी आपस में मजबूती से जुड़ जाते हैं। इस बुनाई की एक और बड़ी विशेषता यह है कि बुनकर एक बार में करघे पर 8 साड़ियों का ताना सेट करते हैं।

पल्लू है खास

नारायणपेट गायत्री बॉर्डर साड़ियों में रंगों का चयन बेहद गहरा और भारतीय संस्कृति से प्रेरित होता है, जैसे—हल्दी पीला, सिंदूरी लाल, रानी पिंक, बोतल ग्रीन और गहरा मैरून। इसका पल्लू, जिसे 'टोपा-तेन्नी' पल्लू भी कहा जाता है, उसमें लाल और सफेद रंग की चौड़ी पट्टियाँ (Stripes) होती हैं जो इसकी पहचान हैं।

पहनना है आसान

हल्की और ड्रेप करने में बेहद आसान होने के कारण, महिलाएं  बिना किसी परेशानी के पहन सकती हैं। आज की  घरेलू और कामकाजी महिलाएं,  नारायणपेट गायत्री बॉर्डर साड़ी को शालीन और प्रोफेशनल लुक के लिए काफी पसंद कर रही हैं। घर की पूजा में पहनना हो या ऑफिस में पार्टी हो यह साड़ी हर अवसर पर आपके बेहतर बनाती है।

निष्कर्ष:
नारायणपेट गायत्री बॉर्डर साड़ी हमारे बुनकरों की कड़ी मेहनत और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। कम बजट में एक रॉयल और एलिगेंट लुक देने वाली यह साड़ी आज के सस्टेनेबल फैशन (Sustainable Fashion) के दौर में भारतीय महिलाओं की पसंदीदा लिस्ट में शामिल है।

 

गुरुवार, 27 अगस्त 2026

महेश्वर: नर्मदा की लहरों में संस्कृति भी है और आधुनिकता भी





इतिहास, आध्यात्मिकता और कला का अनोखा संगम है महेश्वर, जहां इतिहास भी है, आध्यात्मिकता भी और कला  भी। 
नर्मदा नदी के पावन तट पर बसा यह शहर अपनी ऐतिहासिक इमारतों के साथ ही साथ दुनिया भर में प्रसिद्ध महेश्वरी साड़ियों के लिए भी जाना जाता है।

    कैसी है शहर की खुशबू
महेश्वर भारत के मध्य प्रदेश राज्य के खरगोन  जिले में स्थित है।  इंदौर शहर से लगभग 90 किलोमीटर दक्षिण और खरगोन जिला मुख्यालय से मात्र 56 किलोमीटर दूर है यह शहर। जिसके किनारे बहुत ही सुंदर और भव्य घाट है। पत्रकारिता के काेर्स के लिए जब मैं भोपाल गई तो वहां मेरे सहपाठियों में नीलेश तायल भी थे। वह मेरे साथ नवभारत टाइम्स में प्रशिक्षण के लिए भी आए। साथ काम करते हुए हम बहुत बार अपने घर को याद करते हैं। मैं उसे नैनीताल के बारे में बताती और वह खरगौन के बारे में। उसके पास अपने शहर की यादें थी और मेरे पास अपने शहर की।  उनसे ही जाना मैंने सबसे पहले खरगौन  के बारे में और उस शहर से आसपास की कथाओं के बारे में।
 कथाएं जो हमें जीवन देती हैं
 सहस्रार्जुन से अहिल्याबाई तक महेश्वर का इतिहास  बहुत दिलचस्प लगा मुझे ।  पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह शहर हयवंशी राजा सहस्रार्जुन की राजधानी था। कहा जाता है कि सहस्रार्जुन ने रावण तक को पराजित कर दिया था। बाद में ऋषि जमदग्नि को प्रताड़ित करने के कारण भगवान परशुराम ने सहस्रार्जुन का वध यहीं किया था। शंकराचार्य और पंडित मण्डन मिश्र का विश्व प्रसिद्ध और ऐतिहासिक शास्त्रार्थ इसी पावन भूमि पर हुआ था।
बहुत बाद में यह शहर मराठा साम्राज्य की महान, न्यायप्रिय और कला-प्रेमी शासिका देवी अहिल्याबाई होल्कर की राजधानी बना। उन्होंने ही महेश्वर को अपनी संस्कृति और कला का मुख्य केंद्र बनाया।
आज महेश्वरी साड़ी महिलाओं की पहली पसंद बनी हुई है, आज मैं आपको इसके इतिहास के बारे में बताती हूं। 
सन 1767 के आसपास, रानी अहिल्याबाई होल्कर ने मालवा और सूरत से विशेष शिल्पकारों और बुनकरों को महेश्वर बुलाया। उन्होंने कारीगरों को 9 गज की एक विशेष साड़ी बनाने का आदेश दिया, जिसकी डिजाइन उन्होंने खुद तैयार की थी।
शुरुआत में ये साड़ियाँ केवल शाही मेहमानों और रिश्तेदारों को उपहार में दी जाती थी  लेकिन बाद में रानी को लगा कि यह एक कुटीर उद्योग हो सकता है और इससे  हज़ारों परिवारों को रोज़गार दिया जा सकता है।
महेश्वरी साड़ी की खासियत क्या है?
किलों और घाटों से प्रेरित बॉर्डर: महेश्वरी साड़ियों के बॉर्डर पर बनी डिज़ाइनें महेश्वर के किले की दीवारों, ईंटों और नर्मदा नदी के घाटों की नक्काशी से प्रेरित होती हैं।
चटाई बॉर्डर: चटाई के पैटर्न के अनुसार  बुना गया बॉर्डर।
चमेली बूटा: चमेली के सुंदर फूलों का पैटर्न।
ईंट बॉर्डर: किले की दीवारों की ईंटों जैसी ज्यामितीय (geometric) बनावट।
हीरा बॉर्डर: हीरे के आकार की बारीक डिज़ाइन्स।
रीवर्सिबल बॉर्डर (बुगड़ी बॉर्डर): यह  साड़ी की सबसे अनोखी बात है। इसका बॉर्डर दोनों तरफ एक जैसा होता है, यानी आप इसे सीधा या उल्टा, दोनों तरफ से पहन सकती हैं।
विशिष्ट पल्लू डिज़ाइन: इसके पल्लू में 5 पट्टियाँ होती हैं (3 रंगीन और 2 जरी की लाइनें), जो इसे बहुत ही क्लासी लुक देती हैं।
बॉडी पैटर्न्स: साड़ी का बीच का हिस्सा या तो सादा होता है या फिर उसमें 'चांदतारा' (छोटे चांद-तारे) या महीन धारियां और चेक (घारड़ी) बने होते हैं।
कैटेगिरी - चंद्रकला, बैंगनी चंद्रकला, चंद्रतारा, बेली और पारबी।
फैब्रिक और रंग पारंपरिक रूप से महेश्वरी साड़ियों में केवल लाल, मैरून, काले, हरे और बैंगनी जैसे गहरे रंगों का ही इस्तेमाल होता था। लेकिन आज के मॉडर्न फैशन के साथ इसमें लाइट पेस्टल कलर्स और सोने-चांदी के धागों (Zari) का बेहद खूबसूरत कॉम्बिनेशन मिलने लगा है।
सिल्क और कॉटन (Silk-Cotton) के बेहतरीन ब्लेंड और बेहद हल्के वजन के कारण यह साड़ी हर मौसम के लिए आरामदायक है। आप इसे किसी कैज़ुअल आउटिंग से लेकर शादी-पार्टी जैसे फॉर्मल इवेंट्स में भी शान से कैरी कर सकती हैं।
साड़ी देखभाल भी मांगती है
चूंकि यह एक प्रीमियम हैंडलूम साड़ी है, इसलिए इसके रखरखाव पर थोड़ा ध्यान देना ज़रूरी है: साड़ी को पहली बार हमेशा ड्राई क्लीन (Dry Clean) के लिए ही भेजें। इसके बाद आप इसे घर पर किसी माइल्ड डिटर्जेंट के साथ हाथों से धो सकती हैं। इन साड़ियों को धोने के लिए हमेशा ठंडे पानी का ही इस्तेमाल करें, गर्म पानी से इसके धागे खराब हो सकते हैं।

इस तरह हमने जाना महेश्वर सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास और टेक्सटाइल आर्ट का जीता-जागता संग्रहालय है। यहाँ के राजराजेश्वर मंदिर, अहिल्याेश्वर मंदिर, और नर्मदा के घाट मन को शांति देते हैं, तो वहीं यहाँ की साड़ियाँ भारत की समृद्ध कला का अहसास कराती हैं। 

ऐसे लेख जो हमारी जीवनशैली को प्रभावित करते हैं, विचार को समृद्ध करते हैं,जीवन के इंद्रधनुषी रंग हैं

मंदिर के पैसे से क्या किया ताऊ जी ने.......

कल परिवर्तनी एकादशी थी —पापा हमसे दूर चले गए। आज पूरे पाँच महीने हो गए हैं।  भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की इस एकादशी को 'परिवर्तनी' क...

पोस्ट हमारी ,पसंद आपकी- मैं अपने पाठकों का दिल से सम्मान करती हूं ।