आधुनिक लाइफस्टाइल ब्लॉग: फैशन, संस्कृति, कहानियों और संस्मरणों का अनूठा संगमआज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हम अक्सर अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और उन छोटी-छोटी खुशियों को भूल जाते हैं जो हमारे जीवन को असल मायने में खूबसूरत बनाती हैं। लाइफस्टाइल का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि हम क्या पहनते हैं या हम कहाँ घूमते हैं, बल्कि इसका गहरा संबंध हमारी सोच, हमारे साहित्य और हमारी विरासत से भी है। यदि आप भी एक ऐसे मंच की तलाश में हैं जहाँ आधुनिकता और परंपरा का एक खूबसूरत संतुलन देखने को मिले, तो यह आपके लिए है।
शनिवार, 22 अगस्त 2026
लंदन फोर्ट- क्या है 'एकार धोती' का रहस्य
शुक्रवार, 21 अगस्त 2026
चातुर्मास कहता है आप फिट रहिए
28 अगस्त को सावन का महीना समाप्त हो जाएगा। मान्यता है कि सनातन परंपरा में चातुर्मास (आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक की अवधि) को आत्म-साधना, संयम और शुद्धि का सबसे पवित्र समय है। भगवान विष्णु के चार महीने की योग निद्रा में लीन होने की यह अवधि जितनी पौराणिक और आध्यात्मिक है, उतनी ही वैज्ञानिक और तार्किक भी है।
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भगवान की योग निद्रा बनाम सूर्य-पृथ्वी की स्थिति सनातनी दृष्टिकोण
कहानी
बलि की वजह से सभी देवता बहुत दुखी थे। दुखी देवता अपनी माता अदिति के पास पहुंचे और अपनी समस्या बताई। इसके बाद अदिति ने पति कश्यप ऋषि के कहने पर एक व्रत किया, जिसके शुभ फल से भगवान विष्णु ने वामन देव के रूप में जन्म लिया।
वामन देव ने छोटी उम्र में ही दैत्यराज बलि को पराजित कर दिया था। बलि अहंकारी था, उसे लगता था कि वह सबसे बड़ा दानी है। विष्णु जी वामन देव के रूप में उसके पास पहुंचे और दान में तीन पग धरती मांगी।
अहंकार बलि ने सोचा कि ये तो छोटा सा काम है। मेरा तो पूरी धरती पर अधिकार है, मैं इसे तीन पग भूमि दान कर देता हूं।
बलि वामन देव को तीन पग भूमि दान देने के लिए संकल्प कर रहे थे, उस समय शुक्राचार्य ने उसे रोकने की कोशिश की। दरअसल, शुक्राचार्य जान गए थे कि वामन के रूप में स्वयं भगवान विष्णु हैं। शुक्राचार्य ने बलि को समझाया कि ये छोटा बच्चा नहीं है, ये स्वयं विष्णु हैं, ये तुम्हें ठगने आए हैं। तुम इन्हें दान मत दो। ये बात सुनकर बलि बोला कि अगर ये भगवान हैं और मेरे द्वार पर दान मांगने आए हैं तो भी मैं इन्हें मना नहीं कर सकता हूं।
ऐसा कहकर बलि ने हाथ में जल का कमंडल लिया तो शुक्राचार्य छोटा रूप धारण करके कमंडल की दंडी में जाकर बैठ गए, ताकि कमंडल से पानी ही बाहर न निकले और राजा बलि संकल्प न ले सके। वामन देव शुक्राचार्य की योजना समझ गए। उन्होंने तुरंत ही एक पतली लकड़ी ली और कमंडल की दंडी में डाल दी, जिससे अंदर बैठे शुक्राचार्य की एक आंख फूट गई और वे तुरंत ही कमंडल से बाहर आ गए। इसके बाद राजा बलि ने वामन देव को तीन पग भूमि दान करने का संकल्प ले लिया। राजा के संकल्प लेने के बाद वामन देव ने अपना आकार बड़ा कर एक पग में पृथ्वी और दूसरे पग में स्वर्ग नाप लिया। इसके बाद उन्होंने राजा से कहा कि अब मैं तीसरा पग कहां रखूँ? ये सुनकर राजा बलि का अहंकार टूट गया। तब बलि ने कहा कि तीसरा पग आप मेरे सिर पर रख सकते हैं।
बलि की दान वीरता देखकर वामन देव प्रसन्न हुए और उसे पाताल लोक का राजा बना दिया और चाह माह तक उनके द्वारपाल बने।
जठराग्नि का मंद होना और एक समय भोजन का नियमसनातनी दृष्टिकोण
निषेध खाद्य पदार्थ: पाप से मुक्ति या संक्रामक रोगों से बचाव
सनातन धर्म में चातुर्मास के चारों महीनों में कुछ खास चीजों को खाने की सख्त मनाही है। इसका वैज्ञानिक आधार सीधे तौर पर जीव विज्ञान (Biology) से जुड़ा है:
श्रावण (सावन) साग और हरी पत्तेदार सब्जियां वर्जित हैं। बारिश के कारण पत्तों पर कीड़े-मकोड़े, बैक्टीरिया और फंगस सबसे ज्यादा पनपते हैं। इन्हें खाने से पेट में संक्रमण और कीड़े होने का खतरा रहता है।
भाद्रपद (भादों) दही और मट्ठा पीना निषेध है। इस मौसम में दही शरीर में 'वात' और 'कफ' दोष को बढ़ाता है। नमी वाले वातावरण में दही जल्दी दूषित होता है, जिससे जोड़ों में दर्द, गैस और कफ की समस्या हो सकती है।
आश्विन (क्वार) दूध का त्याग करने की सलाह दी जाती है। बारिश में मवेशी (गाय-भैंस) जो चारा चरते हैं, वह अक्सर गीला और संक्रमित होता है। संक्रमित चारा खाने से दूध की गुणवत्ता प्रभावित होती है, जो मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
कार्तिक दालें (उड़द, चना आदि) और द्विदल (दो भाग वाले अनाज) वर्जित हैं। मौसम में ठंडक की शुरुआत होने के कारण इस समय भारी दालें गैस, कब्ज और अपच (Indigestion) पैदा करती हैं।
मौन, मंत्र जाप और मानसिक स्वास्थ्य चातुर्मास में मौन व्रत रखने, क्रोध न करने और ईश्वर की भक्ति में मन लगाने का विधान है।वै मानसून के मौसम में धूप की कमी के कारण शरीर में 'मेलाटोनिन' और 'सेरोटोनिन' जैसे हार्मोन्स का संतुलन बिगड़ जाता है, जिससे सुस्ती, उदासी और डिप्रेशन (Seasonal Affective Disorder) होने की संभावना बढ़ती है। सुबह जल्दी उठना, ध्यान (Meditation), मौन और कीर्तन करने से मस्तिष्क में सकारात्मक तरंगें (Alpha Waves) पैदा होती हैं, जो मानसिक तनाव को दूर कर मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाती हैं।
निष्कर्ष
इसलिए चातुर्मास अंधविश्वास नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीने का एक बेहतरीन लाइफस्टाइल गाइड (Lifestyle Guide) है। जहां सनातनी पद्धति मन को ईश्वर से जोड़कर आध्यात्मिक तृप्ति देती है, वहीं इसका वैज्ञानिक आधार शरीर को मौसमी बीमारियों से बचाकर दीर्घायु प्रदान करता है। वास्तव में, यह चार महीने स्वयं को 'रिबूट' और 'रिचार्ज' करने की एक अद्भुत प्राकृतिक चिकित्सा (Naturopathy) है।
सोमवार, 17 अगस्त 2026
चंदेरी: शिशुपाल के साम्राज्य से आधुनिक रैंप तक का सफर- डा. अनुजा भट्ट
महाभारत की वह पौराणिक कथा तो आपने सुनी ही होगी, जो चेदिराज शिशुपाल और भगवान श्रीकृष्ण के प्रसंग के बिना अधूरी है। आज जिस चंदेरी को हम दुनिया भर में इसके वैभवशाली फैशन और पर्यटन के लिए जानते हैं, वह कभी महाभारत काल में चेदि राज्य के राजा शिशुपाल की राजधानी 'शुक्तिमती' थी।
इतिहास और भूगोल का संगम
इस प्राचीन साम्राज्य की भौगोलिक सुंदरता को तराशने का काम करती थी यहाँ की जीवनदायिनी 'केन नदी'। आज की केन नदी को प्राचीन समय में कर्णावत, श्वेनी, कैनास और शुक्तिमति जैसे खूबसूरत नामों से जाना जाता था। मध्य प्रदेश के कटनी ज़िले में विंध्याचल की कैमूर पर्वतमाला से निकलने वाली यह नदी पन्ना के जंगलों से कई धाराओं को समेटती हुई, अंत में उत्तर प्रदेश के बांदा ज़िले में यमुना नदी में जाकर मिल जाती है।शिशुपाल की वही ऐतिहासिक राजधानी 'चंदेरी' आज भी भारत के मानचित्र पर एक गौरवशाली स्थान रखती है। लेकिन इतिहास के पन्नों से निकलकर मेरा मन तो शिशुपाल की उस पौराणिक कथा पर अटक सा गया है, जहाँ से इस शहर की किस्मत की बुनावट शुरू हुई थी। चलिए, इतिहास और भूगोल के इस ताने-बाने के बीच, मेरे साथ सुनिए शिशुपाल की अमर गाथा...
नियति का ताना-बाना: एक विचित्र जन्म और आकाशवाणीरिश्तों के ताने-बाने को देखें तो शिशुपाल भगवान श्रीकृष्ण की बुआ (वासुदेव जी की बहन) और चेदिराज दमघोष का पुत्र था। इस नाते वह रिश्ते में कौरवों और पांडवों का भाई भी लगता था। लेकिन शिशुपाल का जन्म आम बच्चों जैसा नहीं, बल्कि अत्यंत विचित्र और अलौकिक था। जब उसने आँखें खोलीं, तो उसके तीन नेत्र और चार हाथ थे। अपने नवजात शिशु के इस डरावने और असामान्य रूप को देखकर माता-पिता गहरे असमंजस और चिंता में डूब गए। लोक-लाज और भय के कारण उन्होंने भारी मन से इस विचित्र बालक को त्यागने का फैसला कर लिया।लेकिन नियति को तो कुछ और ही मंजूर था। जैसे ही वे उसे त्यागने बढ़े, तभी एक गूंजती हुई आकाशवाणी हुई—"इस बालक का त्याग मत करो। जब सही समय आएगा, तो इसके ये अतिरिक्त हाथ और आँख अपने आप गायब हो जाएंगे।" मगर इस दिलासे के साथ ही आकाशवाणी ने एक खौफनाक भविष्यवाणी भी कर दी। उसने चेताया कि—"जिस व्यक्ति की गोद में बैठते ही इस बच्चे के अतिरिक्त अंग गायब होंगे, वही व्यक्ति भविष्य में इसका काल (मृत्यु का कारण) बनेगा।"रिश्तों की बुनावट: 100 अपराधों का दान और सुलगती दुश्मनीसमय का चक्र बीता और एक दिन भगवान श्रीकृष्ण अपनी बुआ के घर चेदी नगरी आए। वहाँ आँगन में नन्हा शिशुपाल खेल रहा था। उसे देखकर श्रीकृष्ण के मन में अगाध स्नेह जागा और उन्होंने मुस्कुराते हुए उस बालक को अपनी गोद में उठा लिया। गोद का स्पर्श पाते ही एक चमत्कार हुआ—शिशुपाल की वह अतिरिक्त तीसरी आँख और दोनों हाथ पल भर में ओझल हो गए।इस अलौकिक दृश्य को देखकर शिशुपाल के माता-पिता के चेहरे का रंग उड़ गया; उन्हें वह खौफनाक आकाशवाणी याद आ गई कि श्रीकृष्ण ही उनके बेटे का काल हैं। भय से काँपती माँ ने तुरंत श्रीकृष्ण से अपने पुत्र के जीवन की भीख माँगी। अपनी बुआ को गहरा दुःख न देते हुए और विधि के अटूट विधान का सम्मान करते हुए, श्रीकृष्ण ने एक अभूतपूर्व वचन दिया। उन्होंने कहा—"बुआ, मैं शिशुपाल की सौ (100) गलतियों को पूरी तरह क्षमा कर दूँगा, लेकिन याद रहे, 101वाँ अपराध होते ही उसे अपने कर्मों का दंड भोगना होगा।"प्रेम, प्रतिशोध और राजसूय यज्ञ का मंचयही शिशुपाल बड़ा होकर विदर्भ देश की राजकुमारी रुक्मिणी से विवाह का स्वप्न देख रहा था। लेकिन इस कहानी में एक और खूबसूरत मोड़ था; रुक्मिणी मन ही मन द्वारकाधीश श्रीकृष्ण को अपना सर्वस्व मान चुकी थीं। रुक्मिणी के भाई, राजकुमार रुक्मी को श्रीकृष्ण का यह रिश्ता स्वीकार नहीं था और वह अपनी बहन की शादी जबरन शिशुपाल से कराना चाहता था। जब प्रेम पर संकट आया, तो श्रीकृष्ण रुक्मिणी की पुकार पर स्वयं विदर्भ पहुँचे और उन्हें उनके ही महल से ससम्मान अपने रथ पर ले आए।अपनी होने वाली वधू का इस तरह जाना शिशुपाल के अहंकार पर सबसे गहरी चोट थी। इस घटना ने उसके मन में श्रीकृष्ण के प्रति ईर्ष्या और शत्रुता की ऐसी आग सुलगा दी जो कभी ठंडी नहीं हुई। इसी सुलगते प्रतिशोध के बीच, जब हस्तिनापुर में युधिष्ठिर को युवराज घोषित किया गया और इंद्रप्रस्थ में भव्य 'राजसूय यज्ञ' का आयोजन हुआ, तो देश-विदेश के प्रतापी राजाओं को आमंत्रित किया गया। इस ऐतिहासिक और भव्य आयोजन के गवाह बनने के लिए वासुदेव, श्रीकृष्ण और चेदिराज शिशुपाल भी एक ही छत के नीचे एकत्रित हुए, जहाँ नियति अपना अंतिम खेल रचने वाली थी...अंतिम न्याय: सुदर्शन चक्र और अहंकार का अंतराजसूय यज्ञ के उस भव्य और गरिमय मंच पर आखिरकार शिशुपाल का सामना भगवान श्रीकृष्ण से हो गया। यज्ञ की परंपरा के अनुसार, जब महाराज युधिष्ठिर ने अग्रपूजा के लिए श्रीकृष्ण का सर्वोच्च आदर-सत्कार किया, तो सभा में बैठे शिशुपाल के भीतर सुलग रही ईर्ष्या की आग भड़क उठी। श्रीकृष्ण को मिला यह सम्मान उसके अहंकार को बर्दाश्त नहीं हुआ और वह भरी सभा में सबके सामने मर्यादा की सारी सीमाएं लांघकर भगवान श्रीकृष्ण को कटु वचन और गालियाँ देने लगा।पूरी सभा सन्न थी, लेकिन द्वारकाधीश श्रीकृष्ण के चेहरे पर एक असीम शांति थी; वे शांत मन से आयोजन को देखते रहे। शिशुपाल इसे श्रीकृष्ण की कमजोरी समझ बैठा और लगातार उनका घोर अपमान करता रहा। श्रीकृष्ण अपनी बुआ को दिए उस 'सौ अपराधों' के वचन से बंधे थे, इसलिए वे शांत रहकर एक-एक करके उसकी गलतियों को सहते रहे और मन ही मन उसकी गिनती करते रहे।जैसे ही शिशुपाल के मुख से सौ (100) अपशब्द पूरे हुए और उसके अहंकार ने सीमा पार करते हुए 101वाँ अपशब्द निकाला, वैसे ही क्षमा का समय समाप्त हो गया। श्रीकृष्ण की उंगली से छूटा अलौकिक 'सुदर्शन चक्र' बिजली की गति से हवा में लहराया और पलक झपकते ही शिशुपाल की गर्दन धड़ से अलग हो गई। इस तरह, उस भव्य आयोजन के बीच चंदेरी के राजा शिशुपाल की कहानी और उसकी शत्रुता का हमेशा के लिए अंत हो गया।साम्राज्यों की बिसात और जौहर की अमर गाथाचंदेरी का अतीत सिर्फ महाभारत कालीन राजा शिशुपाल की कथा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह शहर सदियों तक महाशक्तियों की रणभूमि रहा है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो यहाँ की रणनीतिक स्थिति के कारण इस मिट्टी पर गुप्त, प्रतिहार, गुलाम, तुगलक, खिलजी, afghan, गौरी, राजपूत और सिंधिया सहित नौ बड़े राजवंशों ने शासन किया और अपनी संस्कृतियों की छाप छोड़ी।यहाँ के इतिहास का सबसे शौर्यमयी और हृदयविदारक अध्याय तब लिखा गया, जब मुगल शासक बाबर ने चंदेरी पर आक्रमण किया। बाबर की फतह की खबर सुनते ही, चंदेरी के तत्कालीन राजपूत राजा मेदनी राय की पत्नी महारानी मणीमाला के नेतृत्व में 1,600 वीर क्षत्राणियों ने अपने सतीत्व और सम्मान की रक्षा के लिए एक साथ धधकती अग्नि में 'जौहर' कर लिया। चंदेरी के भव्य किले में स्थित जौहर कुंड के पत्थरों का बदला हुआ रंग आज भी उस महान बलिदान और वीरांगनाओं के रक्त-तर्पण की कहानी बयां करता है।भव्य धरोहरें और पत्थरों पर उकेरा गया सौंदर्यआज एक सैलानी के रूप में जब आप चंदेरी पहुँचते हैं, तो करीब 70 मीटर ऊँची पहाड़ी पर शान से खड़ा ऐतिहासिक चंदेरी का किला सबसे पहले पर्यटकों को अपनी ओर लुभाता है। इसके अलावा वास्तुकला के बेजोड़ नमूने जैसे कौशक महल, शांत परमेश्वर तालाब, रहस्यमयी बूढ़ी चंदेरी, शहजादी का रोजा (किला), ऐतिहासिक जामा मस्जिद, रामनगर महल, सिंहपुर महल, विशाल बत्तीसी बावड़ी और यहाँ का आधुनिक म्यूजियम इस शहर को जीवंत इतिहास का खुला पन्ना बना देते हैं।थूबोन जी: 12वीं शताब्दी का आध्यात्मिक वैभवचंदेरी के इस वस्त्र और ऐतिहासिक वैभव के बीच एक गहरा आध्यात्मिक कोना भी सुरक्षित है। चंदेरी से महज़ 22 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है—'अतिशय तीर्थ क्षेत्र थूबोन जी'। 12वीं शताब्दी में महान दानी पाड़ाशाह द्वारा निर्मित यह पवित्र जैन तीर्थ क्षेत्र अपने आँचल में 26 भव्य जैन मंदिरों का वैभव समेटे हुए है। पाड़ाशाह वही दूरदर्शी पुरुष थे जिन्होंने बजरंगगढ़, सिरोंजी और देवगढ़ के प्रसिद्ध मंदिरों का निर्माण करवाकर वहाँ भी मूर्तियों की प्रतिष्ठा कराई थी। थूबोन जी के इन शांत और अलौकिक मंदिरों में जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ से लेकर चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी तक की अत्यंत प्राचीन और चमत्कारी मूर्तियां विराजित हैं, जो यहाँ आने वाले हर मन को आत्मिक शांति से भर देते हैं।भूगोल और प्रकृति का घेराशिशुपाल के उस गौरवशाली अतीत से निकलकर यदि हम आज के भौगोलिक ताने-बाने को देखें, तो चंदेरी शहर मध्य प्रदेश के अशोकनगर जिले की एक बेहद खूबसूरत तहसील है। चारों ओर से विंध्याचल की हरी-भरी पहाड़ियों से घिरा यह ऐतिहासिक शहर आज भी बेतवा नदी के दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में अपनी सुध-बुध खोए खड़ा है। आज जिसे हम बेतवा कहते हैं, प्राचीन काल में उसे 'वेत्रवती' नाम से पूजा जाता था। मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के कुम्हारागाँव से निकलने वाली और भोपाल, विदिशा, झाँसी, ललितपुर से होती हुई उत्तर प्रदेश में यमुना से मिलने वाली यह नदी सदियों से इस पूरे क्षेत्र के सौंदर्य और संस्कृति को सींचती आई है।चंदेरी साड़ी: आठ सौ साल पुराना बुनावट का जादूपहाड़ियों और नदियों के इस संगम के बीच, आज चंदेरी के कण-कण में हथकरघा (Handloom) का संगीत गूंजता है। यह शहर सदियों से अपने हाथ से बुनी अनूठी साड़ियों के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है, जिन्हें आज दुनिया 'चंदेरी साड़ियों' के नाम से जानती है। यहाँ आने वाले पर्यटक आज भी तंग गलियों के पारंपरिक घरों में बुनकरों को जादुई तरीके से ताने-बाने को बुनते देख सकते हैं और अपनी पसंद की साड़ियों की लाइव खरीदारी कर सकते हैं।चंदेरी के इस वस्त्र-वैभव का इतिहास बेहद राजसी रहा है। एक दौर था जब पूरे मध्य भारत (मालवा, इंदौर, ग्वालियर, बांदा, गढ़ाकोटा, बानपुर, चरखारी, शाहगढ़, रायगढ़) में काशी की बनारसी साड़ियों का चलन बेहद कम था। उस समय ग्वालियर और इंदौर के राजघरानों की आभिजात्य (Elite) महिलाएं सिर्फ और सिर्फ चंदेरी की पारदर्शी, हल्की और चमकदार साड़ियाँ पहनना पसंद करती थीं। यहाँ तक कि स्वयं वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई भी चंदेरी साड़ियों की मुरीद थीं।चंदेरी की शाही पगड़ी: राष्ट्रभक्ति और शहादत का ताजलेकिन चंदेरी का हुनर सिर्फ साड़ियों तक सीमित नहीं था; इसकी सबसे बड़ी और हैरान कर देने वाली ख्याति यहाँ बनने वाली 'शाही पगड़ियों' में थी। पिछले 800 सालों से भारत के तमाम राज परिवारों के बीच चंदेरी की पगड़ी आकर्षण और मान-सम्मान का सबसे बड़ा केंद्र रही है। छत्रपति शाहूजी महाराज, ग्वालियर के महाराजा सिंधिया, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और वडोदरा के राजा सहित दक्षिण भारत एवं महाराष्ट्र के तमाम छोटी-बड़ी रियासतों के राजाओं के लिए विशेष पगड़ियाँ इसी चंदेरी की धरती पर तैयार की जाती थीं।इन पगड़ियों को बनाने और ले जाने की कला भी किसी रहस्य से कम नहीं थी। राजाओं का एक विशेष, बेहद गोपनीय दस्ता कड़ी सुरक्षा और चाक-चौबंद व्यवस्था के बीच इन पगड़ियों को चंदेरी से राजा के महलों तक पहुँचाता था।इस गौरवमयी इतिहास का सबसे भावुक और वीर प्रसंग भी इसी चंदेरी की पगड़ी से जुड़ा है। देशभक्ति की प्रतिमूर्ति रानी लक्ष्मीबाई चंदेरी की कला पर इतना अटूट विश्वास करती थीं कि वे अपनी एक खास सहेली को विशेष रूप से चंदेरी भेजकर शाही पगड़ी मँगवाती थीं। जब उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ इतिहास का सबसे भीषण युद्ध लड़ा और जब मातृभूमि की रक्षा करते हुए वे शहीद हुईं, तब भी अंग्रेजों की गोलियों और तलवारों के बीच उनके मस्तक को सुशोभित कर रहा था—चंदेरी के बुनकरों के हाथों से बना वही राजसी साफा, वही चंदेरी की पगड़ी...।इतिहास के कैनवास पर बॉलीवुड का नया रंगसमय का पहिया घूमा और आज चंदेरी का यही रहस्यमयी और खूबसूरत मिजाज देश के सबसे बड़े फिल्म उद्योग यानी बॉलीवुड को भी अपना दीवाना बना रहा है। चंदेरी के प्राचीन मकान, ऐतिहासिक गलियाँ, किले और हथकरघा की आवाज अब दुनिया के सामने बड़े पर्दे पर चमक रही है। यहाँ 'स्त्री', 'सुई धागा' जैसी सुपरहिट फिल्मों के साथ-साथ कई बड़ी वेब सीरीज़ों की शूटिंग भी हो चुकी है। बॉलीवुड के इस ग्लैमर ने चंदेरी के पारंपरिक कपड़ों और पर्यटन को एक वैश्विक पहचान देने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है।आधुनिक रैंप पर सदियों का गौरव: वैश्विक पहचान का नया दौरशिशुपाल के पौराणिक साम्राज्य से शुरू हुआ चंदेरी का यह सफर आज दुनिया के सबसे बड़े फैशन रैंप और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुँच चुका है। सदियों पुराना यह ताना-बाना आज सिर्फ एक कपड़ा नहीं, बल्कि भारत की जीवित विरासत का सबसे चमकदार प्रतीक है।आज देश-विदेश के बड़े-बड़े फैशन डिजाइनर्स चंदेरी सिल्क की इस पारंपरिक बुनावट को आधुनिक वेस्टर्न और इंडो-वेस्टर्न परिधानों के साथ जोड़कर वैश्विक मंचों पर पेश कर रहे हैं। अपनी हल्की बुनावट, राजसी चमक और पारदर्शी लुक के कारण चंदेरी सिल्क आज पेरिस, न्यूयॉर्क और मिलान जैसे अंतरराष्ट्रीय फैशन वीक्स में अपनी धाक जमा रहा है। आज जब कोई आधुनिक महिला या बॉलीवुड की हस्तियाँ गर्व से चंदेरी साड़ी या स्कार्फ पहनती हैं, तो वे अनजाने में ही सही, लेकिन राजा शिशुपाल के इतिहास, वीरांगना लक्ष्मीबाई के शौर्य और चंदेरी के बुनकरों की सदियों पुरानी तपस्या को अपने साथ जीवंत रखती हैं।समय बदल गया, साम्राज्य बदल गए, लेकिन चंदेरी की हथकरघा की आवाज और उसकी राजसी चमक आज भी उतनी ही अमर है—जो कल भी राजाओं का मान थी और आज भी वैश्विक फैशन का गौरव है।यात्रा की राह: मालवा-बुंदेलखंड की दहलीज पर बसा चंदेरीमालवा और बुंदेलखंड की ऐतिहासिक सीमाओं पर स्थित चंदेरी शहर तक पहुँचना बेहद आसान और सुविधाजनक है। यह शहर न केवल मध्य प्रदेश के प्रमुख केंद्रों से सीधे जुड़ा है, बल्कि इसकी सीमाएं उत्तर प्रदेश को भी आपस में जोड़ती हैं।यदि दूरियों के गणित को देखें, तो चंदेरी की भौगोलिक स्थिति कुछ इस प्रकार है:
- ललितपुर रेलवे स्टेशन (उत्तर प्रदेश): चंदेरी के किले से महज़ 37 किमी (सबसे नज़दीकी और प्रमुख रेलवे लिंक)
- भोपाल (मध्य प्रदेश की राजधानी): चंदेरी से करीब 210 किमी
- ग्वालियर (ऐतिहासिक हवाई अड्डा और शहर): चंदेरी से लगभग 220 किमी
यदि आप देश के किसी भी कोने से चंदेरी आने का मन बना रहे हैं, तो सबसे सुगम रास्ता 'नई दिल्ली - भोपाल मुख्य रेलवे लाइन' है। पर्यटक ट्रेन के माध्यम से उत्तर प्रदेश के प्रमुख व्यापारिक शहर ललितपुर स्टेशन तक आ सकते हैं। ललितपुर से चंदेरी की दूरी महज़ 37 किलोमीटर है, जिसे स्थानीय बसों, टैक्सियों या निजी वाहनों के ज़रिए बेहद आसानी से और कम समय में तय किया जा सकता है।
सोमवार, 3 अगस्त 2026
बारिश के माैसम में बात करेंगे फैशन की - डा. अनुजा भट्ट
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रिमझिम फुहार हाे और पार्टी करने का मन हाे खाने पीने का सब बंदोबस्त हाे ताे बस एक सवाल परेशान कर देता है । आज पहने क्या। ताे दाेस्ताें जब माैसम में इतनी ताजगी हाे और हरियाली बिखरी हो तो ग्रीन कलर फ्रेशनेस का प्रतीक मान लेने में हर्ज ही क्या है। यह वैसे भी मॉनसून के लिए परफेक्ट माना जाता है। साथ ही हर तरह के कॉप्लेक्शन पर यह कलर सूट करता है। अगर आपको वॉर्म टोन वाले कलर्स ज्यादा पसंद हैं तो आप मस्टर्ड ग्रीन, खाकी और डार्क ग्रीन के शेड्स पहन सकती हैं और अगर कूल टोन वाले कलर्स पसंद हैं तो ब्राइट ग्रीन या पैरट ग्रीन कलर के ऑप्शन्स पर जाएं। वाइट या येलो जैसे ब्राइट कलर्स के साथ भी आप ग्रीन को मिलाकर पहन सकती हैं।
चॉकलेट ब्राउन की बात करूं तो एक वक्त था जब चॉकलेट ब्राउन को सिर्फ ट्रेंच कोट या बूट्स के कलर के तौर पर ही देखा जाता था लेकिन आज के समय में यह कलर यूथ को काफी पसंद आ रहा है। खासकर अगर आप मॉनसून के सीजन में किसी पार्टी में जा रही हैं तो चॉकलेट ब्राउन कलर की मैक्सी पार्टी ड्रेस आपके लिए क्लासी ऑप्शन है।
तो आपकी क्या राय है। इस तरह के ढ़ेर सारे आप्शंस के लिए आप हमारे फेसबुक ग्रुप में क्लिक कर सकते हैं।
रविवार, 2 अगस्त 2026
लंदन फोर्ट डायरी-बिषाड़ की गूँज और दक्षिण का आगमन
आज एकादशी है। पापा को हमसे दूर गए आज पूरे तीन महीने हो गए हैं। लेकिन पापा, आप कहाँ गए? आप तो हर बार की तरह मेरी स्मृतियों में लौट आते हैं—कोई किस्सा, कोई कहानी या कोई ऐतिहासिक घटना बनकर। मुझे अब समझ आता है कि आपकी सुनाई हर कहानी के पीछे सदियों पुराना एक इतिहास छिपा था। यह लेखन महज़ अतीत को खंगालना नहीं, बल्कि खुद को जानने और अपनी जड़ों को समझने की व्याकुल कोशिश है।
हमारे समाज में बहुत सारी सुंदर प्रथाएँ हैं, तो कुछ कुप्रथाएँ भी हैं। इन सबके पीछे कई सदियों की दास्तानें छिपी हैं, जो कभी लोककथाओं में अपना वजूद तलाशती हैं, तो कभी लोक संगीत की विरह-धूनों में पिघलती रहती हैं। आखिर हम कौन हैं? कहाँ से आए हैं? हमारे पूर्वज कौन थे? यह सवाल ही हमारी इस खोज को मुकम्मल बनाता है।
बम राजाओं का क्रूर दौर और सोर घाटी
हमारी कहानी शुरू होती है १३वीं से १५वीं शताब्दी के मध्यकाल के आस-पास। यह वह दौर था जब महान कत्यूरी राजवंश का पतन हो चुका था और उत्तराखंड के इतिहास में 'बाम' (या बम) राजा पिथौरागढ़ की सोर घाटी के मध्ययुगीन शासक के रूप में उभर रहे थे। 'बाम' नाम सुनने में थोड़ा अटपटा ज़रूर लगता है, इसलिए कयास लगाए जाते हैं कि यह शायद 'ब्रह्म' शब्द का अपभ्रंश रहा हो। मुमकिन है कि वे खुद को उच्च कुल का या दैवीय शक्तियों से प्रेरित शासक सिद्ध करने के लिए इस नाम का प्रयोग करते हों। कुछ इतिहासकार इन्हें पश्चिमी नेपाल के डोटी राजपरिवार व रैका राजाओं के सामंतों की शाखा मानते हैं, तो कुछ इन्हें कत्यूरी राजाओं के ही वंशज कहते हैं।
ये राजा पूरी तरह सामंती और विलासी थे, जो मौसम के हिसाब से अपना ठिकाना बदलते थे। जब पहाड़ों में कड़ाके की ठंड पड़ती और आम जनता ठिठुरती रहती, तब ये राजा सुख-सुविधा के लिए घाटी से नीचे रामेश्वर और बैलोरकोल चले जाते थे। इतिहास में इनके नाम भी बड़े निराले दर्ज हैं—कर्किल बम, काकिल बम, चनारी बम, आर्की बम, ज्ञानी बम, शक्ति बम, विजय बम और हरी बम।
ये बम शासक जितने विलासी थे, न्याय प्रणाली में उतने ही क्रूर और आदिम भी थे। उनके दरबार में अपराध सिद्ध करने के लिए वैज्ञानिक साक्ष्यों के बजाय 'दैवीय परीक्षाओं' (दिव्य परखाओं) का सहारा लिया जाता था।
· गोला-दीप: उबलते हुए तेल में नंगे हाथ डालकर कड़ाही की तली से सिक्का निकालना।
· कढ़ाई-दीप: लाल-गर्म लोहे की छड़ या कुल्हाड़ी को नंगे हाथों से छूना।
यदि व्यक्ति का हाथ नहीं जलता था, तभी उसे निर्दोष माना जाता था।
श्री विश्वशर्मा: दक्षिण से सोर घाटी का ऐतिहासिक सेतु
इसी निरंकुश और सामंती काल के दौरान पिथौरागढ़ के सोर क्षेत्र में भट्ट ब्राह्मणों का आगमन होता है, जो उत्तराखंड के इतिहास की एक युगांतकारी सांस्कृतिक घटना बनती है। इसके साथ ही पहाड़ी शैली में दक्षिण की लोककलाओं (कोल्लम/ऐपण), खान-पान और सुरों का अद्भुत समागम शुरू होता है। धार्मिक अनुष्ठानों में रुढ़िवादिता की जगह शास्त्रार्थ और बौद्धिक टिप्पणियों को एक बड़ा फलक मिलता है और पहाड़ों में शिक्षा का द्वार खुलता है।
इस महान क्रांति के सूत्रधार थे—श्री विश्वशर्मा (विश्व शर्मा)। वे कोई योजना बनाकर नहीं निकले थे, बल्कि तीर्थाटन (तीर्थ यात्रा) के उद्देश्य से घूमते हुए सुदूर दक्षिण द्रविड़ देश (दक्षिण भारत) से काशी के रास्ते होते हुए कुमाऊं की सोर घाटी पहुँचे थे। जब वे यहाँ पहुँचे, तो तत्कालीन बम राजाओं से उनकी भेंट हुई। राजा उनकी अगाध विद्वत्ता और वेदों के गूढ़ ज्ञान से इतने मंत्रमुग्ध हुए कि उन्होंने विश्वशर्मा को यहीं ठहरने का राजकीय न्यौता दे डाला।
विश्वशर्मा के लिए यह निर्णय लेना अत्यंत कठिन था। उनके लिए यहाँ की वेशभूषा, खान-पान, रहन-सहन और बर्फीली भौगोलिक परिस्थितियाँ बिल्कुल नई और अनजानी थीं। उन्होंने विचार करने के लिए समय माँगा, अपने परिवार से संवाद किया, लेकिन तब तक वे कुमाऊं की अलौकिक सुंदरता और हिमालय के शांत वातावरण में अपना दिल हार चुके थे। अंततः उन्होंने यहीं रहने का फैसला किया। वे उत्तराखंड के इतिहास में एकमात्र ऐसे दक्षिण भारतीय मूल के भट्ट ब्राह्मण माने जाते हैं, जो मध्यकाल में यहाँ आकर रचे-बसे थे।
बिषाड़ गाँव: एक कुल की जागीर से वटवृक्ष बनने तक
बाम राजाओं ने श्री विश्वशर्मा की विद्वत्ता के सम्मान और उनके जीवन निर्वाह के लिए पिथौरागढ़ के पास स्थित 'बिषाड़ गाँव' उन्हें जागीर (भूमि दान) के रूप में भेंट कर दिया। यही वह पावन भूमि है जहाँ से हमारे कुल की शुरुआत हुई। बिषाड़ गाँव में बोया गया यह सांस्कृतिक बीज समय के साथ एक विशाल वटवृक्ष में बदल गया। कालांतर में इस कुल की शाखाएं कुमाऊं के पल्लू, खेतीखान, पांडेखोला, रामनगर, काशीपुर से होती हुई आज देश-दुनिया के अन्य हिस्सों तक विस्तृत हो चुकी हैं।
आगे चलकर इस कुल के विद्वान राजदरबारों में प्रतिष्ठित अधिकारी और मुख्य सलाहकार बने। इन भृगुवंशी और विश्वामित्र गोत्रीय ब्राह्मणों को क्षेत्र के सबसे प्रसिद्ध और जागृत धार्मिक स्थलों—रामेश्वर और थलकेदार—के आचार्य (मुख्य पुरोहित) होने का गौरव भी प्राप्त हुआ। आज भी जब मैं अपने परिवार के रहन-सहन और रस्म-रिवाजों को देखती हूँ, तो मुझे स्पष्ट रूप से उनमें सुदूर दक्षिण भारत की वह पवित्र झलक साफ दिखाई देती है, जिसे श्री विश्वशर्मा सदियों पहले अपने साथ लेकर आए थे।
पिछले अंक
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साल दर साल और एक अजनबी चेहरा- एक कहानी
अंजलि के लिए वह दिन सबसे खौफनाक था। इस दिन तो वह अपने अरमानों की डोली सजाकर आई थी। कई सपने थे, कई उम्मीदें। पर... वह वक्त जब अंजलि ने अपना मायका, अपने सपने और अपनी पूरी पहचान समेटकर मानव के नाम कर दी थी। उसे लगता था कि वह मानव की सांसों की आहट भी पहचानती है। लेकिन आज लगता है जैसे किसी अजनबी के साथ समय गुजारा।
त्याग, प्यार और अटूट विश्वास की धज्जियां उड़ गईं।
उस रात अंजलि कमरे के फर्श पर बैठकर दीवार घड़ी की सुइयों को टिक-टिक करते देखती रही। समय .. उसका मन एक ऐसे कुरुक्षेत्र की जमीन बन चुका था, जहाँ वह खुद ही से लड़ रही थी। उसका मन उससे चीख-चीखकर सवाल कर रहा था— इतने साल उसने यूं ही बर्बाद कर दिए? उसका हर वादा, उसकी फिक्र... सब एक झूठ था? उसे बस एक पैसा कमाने वाली लड़की चाहिए थी। एटीएम... तुम इतनी अंधी कैसे हो गईं कि उसकी परछाईं तक को नहीं पहचान पाईं?"
सुबह की पहली किरण के साथ, अंजलि ने अपनी आँखों के आँसू पोंछे और घर के मंदिर में जाकर बैठ गई जहाँ उसका अटूट विश्वास था। पर आज वहाँ भी सन्नाटा था। फिर भी उसने अपनी बेटी के लिए दिया जलाया। आखिर वह अपना दर्द किससे कहे, उसने पेशेवर मदद ली। अपनी निजी बातें वह किसी से भी साझा नहीं करना चाहती थी। पेशेवर ने कहा, पहले चाय कापी कुछ पी लो फिर बात करते हैं। उसने कहा, जब कोई मिट्टी का बर्तन टूटता है, तो आवाज होती है। लेकिन जब किसी स्त्री का विश्वास टूटता है, तो भीतर एक गहरा सन्नाटा छा जाता है। तुम इस सन्नाटे को अपने अंदर क्यों छिपाए बैठी हो?"
मुझे दर्द इस बात का नहीं है कि उसने मुझे नहीं समझा... मुझे तकलीफ इस बात की है कि आज भी मैं एक अजनबी के साथ कैसे रह रही हूँ। सुनो...
जब तुम नदी में पूरी शिद्दत से तैरती हो, और अचानक नदी अपना रास्ता बदल ले, तो क्या कसूर तुम्हारा होता है? नहीं! कसूर नदी के स्वभाव का है। स्त्री जब खुद के लिए खड़ी होगी, तो अपना एक नया और मजबूत जहान बना सकती है। अपनी शक्ति को पहचानो।
पेशेवर से बात करने के दौरान उसका फोन बज रहा था। स्क्रीन पर 'माँ' का नाम चमक रहा था। अंजलि ने एक गहरी सांस ली, अपने गले के भारीपन को साफ किया और चेहरे पर एक झूठी मुस्कान ओढ़कर फोन उठाया।
"हाँ माँ, प्रणाम. हाँ, मैं बिल्कुल ठीक हूँ। मानव? हाँ, वह भी ठीक हैं, ऑफिस गए हैं। अरे नहीं माँ, कोई परेशानी नहीं है..."
फोन रखते ही अंजलि का कलेजा मुँह पर आ गया। वह डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर ढह गई और सिसक सिसक कर रोने लगी। माता-पिता के सामने अपनी जिंदगी को 'खुशहाल' दिखाना उसके लिए दुनिया का सबसे मुश्किल काम बनता जा रहा था। वह उन्हें कैसे बताती कि जिस बेटी की खुशहाली की वे दुआएं मांगते हैं, उसकी दुनिया अंदर से पूरी तरह उजड़ चुकी है?
अंजलि को वे दिन याद आने लगे जब उन्होंने अपनी गृहस्थी बसाना शुरू किया था। किराए का घर था और उन्होंने अपना घर भी बुक कर लिया था। अंजलि ने अपनी अच्छी-खासी नौकरी सिर्फ इसलिए छोड़ दी थी ताकि वह मानव के करियर को संभाल सके, घर संभाल सके और उसके सपनों को उड़ान दे सके। उसने अपनी हर छोटी-बड़ी ख्वाहिश का गला घोंटा था। उसने अपनी पसंद के कपड़े नहीं खरीदे, अपनी सहेलियों से मिलना छोड़ दिया, यहाँ तक कि अपनी उन किताबों को भी बक्से में बंद कर दिया जो कभी उसकी जान हुआ करती थीं।
उसने सोचा था—"मानव कामयाब हो जाएगा, तो हमारे सारे सपने पूरे हो जाएंगे।"
अंजलि का मन अब एक नए और गहरे दर्द से चीखने लगा—"मैंने जिसके लिए अपने माता-पिता का घर छोड़ा, अपने सुनहरे सपने कुर्बान किए, उसने मुझे क्या दिया? और मैं आज इतनी बेबस हूँ कि अपनी मां, अपने पिता को अपना यह रोना सुना भी नहीं सकती। अगर उन्हें पता चला कि उनकी लाडली इस हाल में है, तो उनका बूढ़ा दिल यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाएगा।"
अंजलि ने महसूस किया कि वह चारों तरफ से दीवारों में कैद हो चुकी है। एक तरफ वह इंसान था जिसके साथ संघर्ष किया पर वह अजनबी निकला, और दूसरी तरफ वे माता-पिता थे जिनसे वह बेपनाह मोहब्बत करती थी पर उन्हें अपना दर्द बता नहीं सकती थी।
तभी अंजलि की नजर कमरे के कोने में रखे उस धूल भरे बक्से पर पड़ी, जिसमें उसके कॉलेज के दिनों के कलर्स और कैनवास रखे थे। उसने उठकर उस बक्से को खोला। धूल हटाकर जब उसने अपनी पुरानी पेंटिंग्स देखीं, तो उसे लगा जैसे उसकी खुद की खोई हुई पहचान उसे पुकार रही हो।
अंजलि को प्रोफेशनल की बात याद आई—"जब तुम खुद के लिए खड़ी होगी, तो अपना एक नया जहान बना सकती हो।"
उसने अपने आंसू पोंछे। उसने तय किया कि वह अपने माता-पिता को रोकर कमजोर नहीं करेगी, बल्कि खुद को इतना मजबूत बनाएगी कि एक दिन वे उस पर गर्व कर सकें। उसने अपनी छिपी हुई कला को, अपने उन सपनों को जिन्हें दफन कर दिया था, दोबारा जिंदा करने का फैसला किया। दर्द अब भी सीने में था, पर अब उसमें बेबसी नहीं, बल्कि चुपचाप अपनी एक नई दुनिया खड़ी करने की जिद थी।
अंजलि के सामने अब सच का वह सिरा आ चुका था, जो पहले धुंधला था। मानव का वह 'अजनबी' बर्ताव उस साये के कारण था जो शादी के वक्त से आज तक उनके बीच खड़ा रहा—उसकी माँ, प्रमिला जी।
उस शाम, अंजलि रसोई में चाय बना रही थी, तभी उसने लॉबी में प्रमिला जी और मानव की फुसफुसाहट सुनी।
प्रमिला जी रोते हुए कह रही थीं, "मानव, अंजलि का मन अब इस घर में नहीं लगता। वह हर बात पर मुझसे चिढ़ती है। मैं तो गाँव छोड़कर तेरे भरोसे यहाँ आई थी, पर अगर मैं ही इस घर में पराई हूँ, तो मुझे कहीं छोड़ आ।"
मानव ने व्याकुल होकर माँ के पैर पकड़ लिए, "नहीं माँ! तुम कहीं नहीं जाओगी। यह घर तुम्हारा है। अंजलि अगर तुम्हें खुश नहीं रख सकती, तो उसे अपनी गलती माननी होगी। मेरे लिए तुम्हारी खुशी से बढ़कर कुछ नहीं है।"
रसोई के दरवाजे के पीछे खड़ी अंजलि के हाथ से चाय का बर्तन छूटते-छूटते बचा। उसका दिल टूटकर बिखर गया। जिस पति के करियर के लिए उसने अपनी अच्छी-खासी नौकरी छोड़ दी थी, वह आज अपनी माँ के बुने जाल में फंसकर अंजलि को ही कसूरवार मान रहा था।
अंजलि ने अपने आँसू पोंछे। उसे समझ आ गया था कि इस घर में उसका संघर्ष किसी बाहरी विलेन से नहीं, बल्कि 'ममता के इस चक्रव्यूह' से है। वह अपने माता-पिता को यह सब बताकर उन्हें दुखी नहीं कर सकती थी, क्योंकि उनके लिए मानव एक आदर्श दामाद था।
अंजलि अपनी पेंटिंग के बक्से के पास जाकर बैठ गई। उसने कैनवास पर एक ऐसी चिड़िया का चित्र बनाया जो सोने के पिंजरे में बंद थी, लेकिन उसका रुख खुले आसमान की तरफ था। अंजलि ने खुद से कहा, "मैं अब और नहीं रोऊँगी। अगर मानव अपनी माँ के जाल से निकलना नहीं चाहता, तो मैं भी इस जाल में घुट-घुट कर नहीं मरूँगी। मुझे अपने पैरों पर खड़ा होना ही होगा।"
उसने चुपचाप इंटरनेट पर नौकरियों के लिए आवेदन (Apply) करना शुरू कर दिया। अब वह मानव से बहस नहीं करती थी, न ही सास की बातों पर कोई प्रतिक्रिया देती थी। उसका यह मौन, उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसके भीतर सुलग रहे एक नए आत्मसम्मान की शुरुआत थी।
यह मोड़ अंजलि के संघर्ष की पूरी तस्वीर बदल देता है। अब उसे समझ आ गया कि जिस कड़वाहट और अजनबीपन को वह सात साल से झेल रही थी, उसकी जड़ें आज की नहीं, बल्कि बहुत पुरानी और गहरी थीं। यह लड़ाई सिर्फ एक पति-पत्नी के बीच की नहीं थी, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे एक स्वार्थी व्यवहार और चालाकी के चक्रव्यूह की थी।
अंजलि के पैरों तले की जमीन खिसक गई थी, जब उसे प्रमिला जी (उसकी सास) के अतीत का पूरा सच मालूम हुआ। मानव की माँ प्रमिला जी, आज ७५ साल की बुजुर्ग थीं। जब वे केवल १८ साल की थीं, तब उनकी शादी अंजलि के ससुर जी से हुई थी। शादी के तुरंत बाद, उन्होंने बड़ी चतुराई से अपने सीधे-साधे पति को अपने जाल में फंसाया और गाँव से लेकर शहर आ गईं।
शहर आने के बाद प्रमिला जी ने अपने ससुराल, सास-ससुर और किसी भी रिश्तेदार से कोई नाता नहीं रखा। वे अपने पति को भी उनकी खुद की माँ के खिलाफ भड़काकर रखती थीं। अंजलि के ससुर जी इतने सीधे-साधे इंसान थे कि वे अपनी पत्नी की हर बात मानते रहे, अपना गाँव-घर छोड़ दिया और अपने माता-पिता को भी। प्रमिला जी ने पूरी जिंदगी अपने पति को उनके परिवार से अलग रखा और अंत में जब ससुर जी का देहांत हुआ, तब प्रमिला जी ७५ साल की उम्र में विधवा हुईं।
अब अंजलि को पूरा खेल समझ आ गया था। प्रमिला जी को इस बात का कोई पछतावा नहीं था कि उन्होंने एक हंसते-खेलते परिवार को उजाड़ दिया था। बल्कि, अब वे वही पुराना खेल अपने बेटे मानव के साथ खेल रही थीं। जो उन्होंने सालों पहले अपने पति के साथ किया था, वही अब वे मानव के दिमाग में अंजलि के खिलाफ जहर घोलकर कर रही थीं। वे मानव को अंजलि से पूरी तरह अलग कर देना चाहती थीं ताकि मानव सिर्फ उनके नियंत्रण में रहे।
अंजलि ने दीवार पर लगी ससुर जी की पुरानी तस्वीर को देखा। उसे लगा कि अगर वह आज चुप रही, तो मानव की हालत भी उसके सीधे-साधे ससुर जी जैसी हो जाएगी। वह भी पूरी जिंदगी अपनी माँ के झूठे जाल में फँसा रहेगा और अपनी पत्नी की खुशियाँ कभी नहीं देख पाएगा।
उस रात अंजलि कमरे में गई, जहाँ मानव और प्रमिला जी बैठे थे। अंजलि के चेहरे पर अब कोई डर या आंसू नहीं था। उसके कदमों में एक ठोस हिम्मत थी।
उसने मानव के सामने प्रमिला जी के गाँव के कुछ पुराने कागजात और ससुर जी की एक पुरानी डायरी रख दी, जो उसे बक्से की सफाई करते वक्त मिली थी।
अंजलि ने सीधे मानव की आँखों में देखकर कहा, "मानव, तुम कहते हो ना कि मैं तुम्हारी माँ का सम्मान नहीं करती? आज ज़रा अपनी माँ के अतीत का इतिहास पढ़ो। १८ साल की उम्र में शादी करके जो औरत शहर आई, उसने अपने सीधे-साधे पति को उनके माता-पिता के खिलाफ भड़काया। तुम्हारे दादा-दादी तड़प-तड़प कर मर गए, लेकिन तुम्हारी माँ ने तुम्हारे पिता को गाँव नहीं जाने दिया। और आज, ७५ साल की उम्र में भी इनके भीतर का वह लालच और असुरक्षा शांत नहीं हुए हैं। जो खेल इन्होंने तुम्हारे पिता के साथ खेला, वही खेल आज ये मेरे और तुम्हारे साथ खेल रही हैं!"
मानव ने गुस्से में कहा, "अंजलि! तुम मेरी माँ पर..."
"चुप रहो मानव!" अंजलि की आवाज पूरे कमरे में गूँज उठी। "मैंने तुम्हारे लिए अपने सपने, अपनी नौकरी, अपने माता-पिता की खुशियाँ सब कुर्बान कर दीं। तुम्हारे संघर्ष में मैं तुम्हारे साथ खड़ी रही क्योंकि मैं तुमसे सच्चा प्यार करती थी। लेकिन तुम्हारी माँ तुम्हें एक कठपुतली बनाकर रखना चाहती हैं। वे तुम्हें अंजलि का पति नहीं, सिर्फ अपना गुलाम देखना चाहती हैं।"
प्रमिला जी ने हमेशा की तरह रोने का नाटक शुरू किया, "मानव! देख, यह क्या कह रही है..."
लेकिन इस बार अंजलि रुकी नहीं। उसने प्रमिला जी से कहा, "अम्मा, आपने अपनी पूरी जिंदगी नफरत और अलगाव में बिता दी। अपने पति को उनके परिवार से दूर रखा, और अब आप अपने बेटे का घर उजाड़ना चाहती हैं? याद रखिए, इतिहास खुद को दोहराता है, लेकिन मैं आपके इस चक्रव्यूह का हिस्सा नहीं बनूँगी।"
अंजलि ने अपना बैग उठाया, जिसमें उसकी पेंटिंग के ब्रश और कुछ जरूरी कागजात थे। उसने मानव से कहा, "मानव, मैं इस घर को छोड़कर जा रही हूँ। अपने माता-पिता को मैं कभी नहीं बताऊँगी कि तुम्हारी गलती क्या थी। मैं उनसे कहूँगी कि मुझे करियर में आगे बढ़ना था। मैं तुम्हें कोई सजा नहीं दे रही। सजा तो तुम खुद को दे रहे हो। जिस दिन तुम्हारी आँखों से अपनी माँ की इस झूठी ममता का पर्दा हटेगा, उस दिन तुम्हें समझ आएगा कि उस औरत को खो दिया जो तुम्हारे लिए अपनी जान दे सकती थी।"
अंजलि बिना पीछे मुड़े घर से बाहर निकल गई। रात की ठंडी हवा उसके चेहरे को छू रही थी। उसका मन अब पूरी तरह शांत था। खुद से होने वाले सारे सवाल अब खत्म हो चुके थे। उसे समझ आ गया था कि गलती उसकी अच्छाई में नहीं थी, बल्कि सामने वाले की फितरत में थी।
पीछे घर में, पहली बार मानव सन्नाटे में खड़ा अपनी माँ के रोने की आवाज सुन रहा था, लेकिन आज उसके आँसुओं में ममता नहीं, बल्कि एक अजीब सा खोखलापन दिखाई दे रहा था। अंजलि के शब्द मानव के दिमाग में हथौड़े की तरह बज रहे थे।
अंजलि ने रेलवे स्टेशन की तरफ कदम बढ़ा दिए। सुबह की पहली किरण के साथ वह अपने सपनों की एक नई उड़ान भरने वाली थी—एक ऐसी दुनिया जहाँ कोई अजनबी नहीं था, जहाँ सिर्फ उसका आत्मसम्मान और उसकी अपनी पहचान थी।
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