अंजलि के लिए वह दिन सबसे खौफनाक था। इस दिन तो वह अपने अरमानों की डोली सजाए आई थी। कई सपने थे कई उम्मीदें। पर... वह वक्त जब अंजलि ने अपना मायका, अपने सपने और अपनी पूरी पहचान समेटकर मानव के नाम कर दी थी। उसे लगता था कि वह मानव की सांसों की आहट भी पहचानती है। लेकिन आज लगता है जैसे किसी अजनबी के साथ समय गुजारा।
त्याग, प्यार
और अटूट विश्वास की धज्जियां उड़ गई।
उस रात अंजलि कमरे के फर्श पर
बैठकर दीवार घड़ी की सुइयों को टिक-टिक करते देखती रही। समय .. उसका मन एक ऐसी
कुरुक्षेत्र की जमीन बन चुका था, जहाँ
वह खुद ही से लड़ रही थी। उसका मन उससे चीख-चीखकर सवाल कर रहा था— इतने साल उसने यूं
ही बर्बाद कर दिए? उसका हर वादा,
उसकी फिक्र... सब एक झूठ था? उसे बस एक पैसा कमाने वाली लड़की चाहिए थी। एटीएम... तुम
इतनी अंधी कैसे हो गईं कि उसकी परछाईं तक को नहीं पहचान
पाईं?"
सुबह की पहली किरण के साथ, अंजलि ने अपनी आँखों के आँसू पोंछे और घर के मंदिर
में जाकर बैठ गई जहाँ उसका अटूट विश्वास था। पर आज वहाँ भी सन्नाटा था। फिर भी उसने दिया
जलाया अपनी बेटी के लिए। आखिर वह अपना दर्द किससे कहे। उसने पेशवर मदद ली। अपनी
निजा बातें वह किसी से भी साझा नहीं करना चाहती थी। पेशेवर ने कहा, पहले चाय कापी
कुछ पी लो फिर बात करते हैं। उसने कहा,
जब कोई मिट्टी का बर्तन टूटता है, तो आवाज होती है। लेकिन जब किसी स्त्री का विश्वास
टूटता है, तो भीतर
एक गहरा सन्नाटा छा जाता है। तुम इस सन्नाटे को अपने अंदर क्यों छिपाए बैठी हो?"
मुझे दर्द इस बात का नहीं है कि उसने मुझे नहीं
समझा... मुझे तकलीफ इस बात की है कि आज भी
मैं एक अजनबी के साथ कैसै रह रही हूं । सुनो...
जब तुम नदी में पूरी शिद्दत से तैरती हो, और अचानक नदी अपना रास्ता बदल ले, तो क्या कसूर तुम्हारा होता है? नहीं! कसूर नदी के स्वभाव का है। स्त्री जब खुद के
लिए खड़ी होगी, तो अपना
एक नया और मजबूत जहान बना सकती है। अपनी शक्ति को पहचानो।
पेशेवर से बात करने के दौरान उसका फोन
बज रहा था। स्क्रीन पर 'माँ' का नाम चमक रहा था। अंजलि ने एक गहरी सांस ली, अपने गले के भारीपन को साफ किया और चेहरे पर एक झूठी
मुस्कान ओढ़कर फोन उठाया।
"हाँ
माँ, प्रणाम.
हाँ, मैं
बिल्कुल ठीक हूँ। मानव? हाँ, वह भी ठीक हैं, ऑफिस
गए हैं। अरे नहीं माँ, कोई
परेशानी नहीं है..."
फोन रखते ही अंजलि का कलेजा मुंह
को आ गया। वह डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर ढह गई और सिसक सिसक कर रोने लगी।
माता-पिता के सामने अपनी जिंदगी को 'खुशहाल' दिखाना उसके लिए दुनिया का सबसे मुश्किल काम बनता जा
रहा था। वह उन्हें कैसे बताती कि जिस बेटी की खुशहाली की वे दुआएं मांगते हैं, उसकी दुनिया अंदर से पूरी तरह उजड़ चुकी है?
अंजलि को वे दिन याद आने लगे जब
उन्होंने अपनी गृहस्थी बसानी शुरू की थी। किराए का घर था और उन्हेंने अपना घर भी बुक कर लिया था।
अंजलि ने अपनी अच्छी-खासी नौकरी सिर्फ इसलिए छोड़ दी थी ताकि वह मानव के करियर को
संभाल सके, घर संभाल
सके और उसके सपनों को उड़ान दे सके। उसने अपनी हर छोटी-बड़ी ख्वाहिश का गला घोंटा
था। उसने अपनी पसंद के कपड़े नहीं खरीदे, अपनी
सहेलियों से मिलना छोड़ दिया, यहाँ
तक कि अपनी उन किताबों को भी बक्से में
बंद कर दिया जो कभी उसकी जान हुआ करती थीं।
उसने सोचा था—"मानव कामयाब
हो जाएगा, तो हमारे
सारे सपने पूरे हो जाएंगे।"
अंजलि का मन अब एक नए और गहरे दर्द से चीखने
लगा—"मैंने जिसके लिए अपने माता-पिता का घर छोड़ा, अपने सुनहरे सपने कुर्बान किए, उसने मुझे क्या दिया?
और मैं आज इतनी बेबस हूँ कि अपनी मां, अपने पिता को अपना यह रोना सुना भी नहीं सकती। अगर
उन्हें पता चला कि उनकी लाडली इस हाल में है, तो
उनका बूढ़ा दिल यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाएगा।"
अंजलि ने महसूस किया कि वह चारों
तरफ से दीवारों में कैद हो चुकी है। एक तरफ वह इंसान था जिसके साथ संघर्ष किया पर
वह अजनबी निकला, और दूसरी
तरफ वे माता-पिता थे जिनसे वह बेपनाह मोहब्बत करती थी पर उन्हें अपना दर्द बता
नहीं सकती थी।
तभी अंजलि की नजर कमरे के कोने
में रखे उस धूल भरे बक्से पर पड़ी, जिसमें
उसके कॉलेज के दिनों के कलर्स और कैनवास रखे थे। उसने उठकर उस बक्से को खोला। धूल
हटाकर जब उसने अपनी पुरानी पेंटिंग्स देखीं, तो
उसे लगा जैसे उसकी खुद की खोई हुई पहचान उसे पुकार रही हो।
अंजलि को प्रोफेशनल की बात याद
आई—"जब तुम खुद के लिए खड़ी होगी, तो
अपना एक नया जहान बना सकती हो।"
उसने अपने आंसू पोंछे। उसने तय
किया कि वह अपने माता-पिता को रोकर कमजोर नहीं करेगी, बल्कि खुद को इतना मजबूत बनाएगी कि एक दिन वे उस पर
गर्व कर सकें। उसने अपनी छुपी हुई कला को, अपने
उन सपनों को जिन्हें दफन कर दिया था, दोबारा
जिंदा करने का फैसला किया। दर्द अब भी सीने में था,
पर अब उसमें बेबसी नहीं, बल्कि चुपचाप अपनी एक नई दुनिया खड़ी करने की जिद थी।
अंजलि के सामने अब सच का वह सिरा
आ चुका था, जो पहले
धुंधला था। मानव का वह 'अजनबी' बर्ताव उस
साये के कारण था जो शादी के वक्त से आज तक उनके बीच खड़ा रहा—उसकी माँ, प्रमिला जी।
उस शाम, अंजलि रसोई में चाय बना रही थी, तभी उसने लॉबी में प्रमिला जी और मानव की फुसफुसाहट
सुनी।
प्रमिला जी रोते हुए कह रही थीं, "मानव, अंजलि का मन अब इस घर में नहीं लगता। वह हर बात पर
मुझसे चिढ़ती है। मैं तो गाँव छोड़कर तेरे भरोसे यहाँ आई थी, पर अगर मैं ही इस घर में पराई हूँ, तो मुझे कहीं छोड़ आ।"
मानव ने व्याकुल होकर माँ के पैर
पकड़ लिए, "नहीं
माँ! तुम कहीं नहीं जाओगी। यह घर तुम्हारा है। अंजलि अगर तुम्हें खुश नहीं रख सकती, तो उसे अपनी गलती माननी होगी। मेरे लिए तुम्हारी
खुशी से बढ़कर कुछ नहीं है।"
रसोई के दरवाजे के पीछे खड़ी
अंजलि के हाथ से चाय का बर्तन छूटते-छूटते बचा। उसका दिल टूट कर बिखर गया। जिस पति
के करियर के लिए उसने अपनी अच्छी-खासी नौकरी छोड़ दी थी, वह आज अपनी माँ के बुने जाल में फंसकर अंजलि को ही
कसूरवार मान रहा था।
अंजलि ने अपने आँसू पोंछे। उसे
समझ आ गया था कि इस घर में उसका संघर्ष किसी बाहरी विलेन से नहीं, बल्कि 'ममता
के इस चक्रव्यूह' से है।
वह अपने माता-पिता को यह सब बताकर उन्हें दुखी नहीं कर सकती थी, क्योंकि उनके लिए मानव एक आदर्श दामाद था।
अंजलि अपनी पेंटिंग के बक्से के
पास जाकर बैठ गई। उसने कैनवास पर एक ऐसी चिड़िया का चित्र बनाया जो सोने के पिंजरे
में बंद थी, लेकिन
उसका रुख खुले आसमान की तरफ था। अंजलि ने खुद से कहा, "मैं अब और नहीं रोऊँगी। अगर मानव
अपनी माँ के जाल से निकलना नहीं चाहता, तो
मैं भी इस जाल में घुट-घुट कर नहीं मरूँगी। मुझे अपने पैरों पर खड़ा होना ही
होगा।"
उसने चुपचाप इंटरनेट पर नौकरियों
के लिए आवेदन (Apply) करना
शुरू कर दिया। अब वह मानव से बहस नहीं करती थी, न
ही सास की बातों पर कोई प्रतिक्रिया देती थी। उसका यह मौन, उसकी कमजोरी नहीं,
बल्कि उसके भीतर सुलग रहे एक नए आत्मसम्मान की
शुरुआत थी।
यह मोड़ अंजलि के संघर्ष की पूरी
तस्वीर बदल देता है। अब उसे समझ आ गया कि जिस कड़वाहट और अजनबीपन को वह सात साल से
झेल रही थी, उसकी
जड़ें आज की नहीं, बल्कि
बहुत पुरानी और गहरी थीं। यह लड़ाई सिर्फ एक पति-पत्नी के बीच की नहीं थी, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे एक स्वार्थी व्यवहार
और चालाकी के चक्रव्यूह की थी।
अंजलि के पैरों तले की जमीन खिसक
गई थी, जब उसे
प्रमिला जी (उसकी सास) के अतीत का पूरा सच मालूम हुआ। मानव की माँ प्रमिला जी, आज ७५ साल की बुजुर्ग थीं। जब वे केवल १८ साल की थीं, तब उनकी शादी अंजलि के ससुर जी से हुई थी। शादी के
तुरंत बाद, उन्होंने
बड़ी चतुराई से अपने सीधे-साधे पति को अपने जाल में फंसाया और गाँव से लेकर शहर आ
गईं।
शहर आने के बाद प्रमिला जी ने
अपने ससुराल, सास-ससुर
और किसी भी रिश्तेदार से कोई नाता नहीं रखा। वे अपने पति को भी उनकी खुद की माँ के
खिलाफ भड़काकर रखती थीं। अंजलि के ससुर जी इतने सीधे-साधे इंसान थे कि वे अपनी
पत्नी की हर बात मानते रहे, अपना
गाँव-घर छोड़ दिया और अपने माता-पिता को भी। प्रमिला जी ने पूरी जिंदगी अपने पति को उनके
परिवार से अलग रखा और अंत में जब ससुर जी का देहांत हुआ, तब प्रमिला जी ७५ साल की उम्र में विधवा हुईं।
अब अंजलि को पूरा खेल समझ आ गया
था। प्रमिला जी को इस बात का कोई पछतावा नहीं था कि उन्होंने एक हंसते-खेलते परिवार
को उजाड़ दिया था। बल्कि, अब वे
वही पुराना खेल अपने बेटे मानव के साथ खेल रही थीं। जो उन्होंने सालों पहले अपने
पति के साथ किया था, वही अब
वे मानव के दिमाग में अंजलि के खिलाफ जहर घोलकर कर रही थीं। वे मानव को अंजलि से
पूरी तरह अलग कर देना चाहती थीं ताकि मानव सिर्फ उनके नियंत्रण में रहे।
अंजलि ने दीवार पर लगी ससुर जी की
पुरानी तस्वीर को देखा। उसे लगा कि अगर वह आज चुप रही, तो मानव की हालत भी उसके सीधे-साधे ससुर जी जैसी हो
जाएगी। वह भी पूरी जिंदगी अपनी माँ के झूठे जाल में फंसा रहेगा और अपनी पत्नी की
खुशियाँ कभी नहीं देख पाएगा।
उस रात अंजलि कमरे में गई, जहाँ मानव और प्रमिला जी बैठे थे। अंजलि के चेहरे पर
अब कोई डर या आंसू नहीं था। उसके कदमों में एक ठोस हिम्मत थी।
उसने मानव के सामने प्रमिला जी के
गाँव के कुछ पुराने कागजात और ससुर जी की एक पुरानी डायरी रख दी, जो उसे बक्से की सफाई करते वक्त मिली थी।
अंजलि ने सीधे मानव की आँखों में
देखकर कहा, "मानव, तुम कहते हो ना कि मैं तुम्हारी माँ का सम्मान नहीं
करती? आज ज़रा
अपनी माँ के अतीत का इतिहास पढ़ो। १८ साल की उम्र में शादी करके जो औरत शहर आई, उसने अपने सीधे-साधे पति को उनके माता-पिता के खिलाफ
भड़काया। तुम्हारे दादा-दादी तड़प-तड़प कर मर गए,
लेकिन तुम्हारी माँ ने तुम्हारे पिता को गाँव नहीं
जाने दिया। और आज, ७५ साल
की उम्र में भी इनके भीतर का वह लालच और असुरक्षा शांत नहीं हुई है। जो खेल
इन्होंने तुम्हारे पिता के साथ खेला, वही
खेल आज ये मेरे और तुम्हारे साथ खेल रही हैं!"
मानव ने गुस्से में कहा, "अंजलि! तुम मेरी माँ पर..."
"चुप
रहो मानव!" अंजलि की आवाज पूरे कमरे में गूँज उठी। "मैंने तुम्हारे लिए
अपने सपने, अपनी
नौकरी, अपने
माता-पिता की खुशियाँ सब कुर्बान कर दीं। तुम्हारे संघर्ष में मैं तुम्हारे साथ
खड़ी रही क्योंकि मैं तुमसे सच्चा प्यार करती थी। लेकिन तुम्हारी माँ तुम्हें एक
कठपुतली बनाकर रखना चाहती हैं। वे तुम्हें अंजलि का पति नहीं, सिर्फ अपना गुलाम देखना चाहती हैं।"
प्रमिला जी ने हमेशा की तरह रोने
का नाटक शुरू किया, "मानव!
देख यह क्या कह रही है..."
लेकिन इस बार अंजलि रुकी नहीं।
उसने प्रमिला जी से कहा, "अम्मा, आपने अपनी पूरी जिंदगी नफरत और अलगाव में बिता दी।
अपने पति को उनके परिवार से दूर रखा, और
अब आप अपने बेटे का घर उजाड़ना चाहती हैं? याद
रखिए, इतिहास
खुद को दोहराता है, लेकिन
मैं आपके इस चक्रव्यूह का हिस्सा नहीं बनूँगी।"
अंजलि ने अपना बैग उठाया, जिसमें उसकी पेंटिंग के ब्रश और कुछ जरूरी कागजात
थे। उसने मानव से कहा, "मानव, मैं इस घर को छोड़कर जा रही हूँ। अपने माता-पिता को
मैं कभी नहीं बताऊँगी कि तुम्हारी गलती क्या थी। मैं उनसे कहूँगी कि मुझे करियर
में आगे बढ़ना था। मैं तुम्हें कोई सजा नहीं दे रही। सजा तो तुम खुद को दे रहे हो।
जिस दिन तुम्हारी आँखों से अपनी माँ की इस झूठी ममता का पर्दा हटेगा, उस दिन तुम्हें समझ आएगा कि उस औरत को खो दिया जो तुम्हारे लिए अपनी जान दे
सकती थी।"
अंजलि बिना पीछे मुड़े घर से बाहर
निकल गई। रात की ठंडी हवा उसके चेहरे को छू रही थी। उसका मन अब पूरी तरह शांत था।
खुद से होने वाले सारे सवाल अब खत्म हो चुके थे। उसे समझ आ गया था कि गलती उसकी
अच्छाई में नहीं थी, बल्कि
सामने वाले की फितरत में थी।
पीछे घर में, पहली बार मानव सन्नाटे में खड़ा अपनी माँ के रोने की
आवाज सुन रहा था, लेकिन आज
उसके आँसुओं में ममता नहीं, बल्कि एक
अजीब सा खोखलापन दिखाई दे रहा था। अंजलि के शब्द मानव के दिमाग में हथौड़े की तरह
बज रहे थे।
अंजलि ने रेलवे स्टेशन की तरफ कदम
बढ़ा दिए। सुबह की पहली किरण के साथ वह अपने सपनों की एक नई उड़ान भरने वाली थी—एक
ऐसी दुनिया जहाँ कोई अजनबी नहीं था, जहाँ
सिर्फ उसका आत्मसम्मान और उसकी अपनी पहचान थी।
