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गुरुवार, 10 अक्टूबर 2024

विदा - कविता- डा. अनुजा भट्ट



विदा

मैं , मैं नहीं एक शब्द है

हुंकार है

प्रतिकार है



मैं का मैं में विलय है

इस समय खेल पर कोई बात नहीं

फिर भी...

सच में मुझे क्रिक्रेट में कोई रूचि नहीं

फिर भी

मैं सचिन तंडेलुकर की गेंद की तरह उछलना चाहती हूं

टप्पे पर टप्पे मार कर हवा के उस अंतिम छोर पर पहुंचकर

धरती में गिर जाना चाहती हूं

अनगिनत गेंदों से नहीं असंख्य शब्दों से खेलती और जीती उन क्षणों को

खुद और पूरी कायनात के साथ

मैं लेना चाहती हूं अब विदा

न्यूटन का सिद्धांत मुझे प्रिय है

हालांकि मैं विज्ञान के बारे में ज्यादा जानती नहीं

पर शोध से हर रोज गुजरती हूं

फिर भी

अपनी मुट्ठी में भींचकर कोई रूमाल

सर्द रात और कंपकंपाती ठंड में

पसीने से तरबतर हो

ऐसा है मेरा ख्वाब

मैं उस ख्वाब को अपनी उंगुलियों में

महसूस करते हुए

मुट्ठी में भर लेना चाहती हूं

निचोड़ कर रख देना चाहती हूं रूमाल

रूमाल जिसके चार कोने हैं

चार दिशाएं हैं

और चारों दिशाओं की साझेदार एक पोटली है

पोटली जिसमें सिक्के जमाते हैं कुछ

पोटली जिसमें सुदामा ने जमाए तंडुल

सिक्के जमाने वाले और तंडुल जमाने वाले सुदामा में मेरी कोई रूचि नहीं

मुझे न विपन्नता के गीत पसंद हैं

और न संपन्नता के किस्से

मुझे बस सचिन की तरह

अपने मानिंद एक गेंद चाहिए

जिसके हर टप्पे पर टप्पे पर टप्पे पर टप्पे पर

घूमते हुए वह हवा के साथ उछले

उसी को लपकने के लिए उठे हाथ

पर वह गिरे धरती पर

धरती पर

धरती पर

सचिन ने गेंद चूमी कई कई बार

मैं चूमना चाहती हूं

शब्द कई कई बार

सचिन को गेंद को स्पर्श करते दुलराते कई कई बार देखा मैंने

मैं शब्दों को दुलराना चाहती हूं

ओम ही ओम हैं

जिसे जन्मा था प्रकृति ने

प्रकृति की कोख में पहला नाद ओम है

स्त्री की कोख में पहला नाद मां

उस पहली बार सुने शब्द को

मैं अपनी आत्मा के किसी सूक्ष्म से सूक्ष्म कण में

अपनी ही प्राणवायु से खींचकर गर्भ में पुनःस्थापित कर

मैं विदा लेना चाहती हूं

बाकि उसके बाद के सब निरर्थक संवेदनहीन शब्दों को

मैं पोटली में सिक्के और तंडुल की तरह

खुद से अलग कर देना चाहती हूं

हवा में गूंजते इन शब्दों में

अब आक्सीजन नहीं रही

जो प्राणवायु की उम्मीद दे सके

उम्मीद ही तो आपको कमजोर बनाती है

मैं उम्मीद की उस विपरीत धारा में

नाउम्मीद का शपथपत्र भरना चाहती हूं

मैं विदा लेना चाहती हूं।

गुरुवार, 3 अक्टूबर 2024

नवरात्रि - नाै व्यंजन, भक्ति शक्ति और जायका



साबूदाना वड़ा






सामग्री
साबूदाना- 1/2 कप
उबला आलू- 1
भूनी हुई मूंगफली- 1/3 कप
जीरा- 1/2 चम्मच
कद्दूकस किया अदरक- 1 चम्मच
बारीक कटी हरी मिर्च- 1 चम्मच
बारीक कटी धनिया पत्ती- 2 चम्मच
नीबू का रस- 1 चम्मच
तेल- तलने के लिए

विधिसाबूदाना को धो लें और लगभग एक 1/3 कप पानी में चार से पांच घंटे तक डुबोकर रखें। जब साबूदाना सारा पानी सोख ले तो उसमें तेल के अलावा अन्य सभी सामग्री डालकर मिलाएं। मिश्रण को आठ हिस्सों में बांटें और उसे गोल आकार दें। कड़ाही में तेल गर्म करें और वड़ा को सुनहरा होने तक पकाएं। टिश्यू पेपर पर रखें ताकि अतिरिक्त तेल निकल जाए। हरी चटनी के साथ गर्मागर्म सर्व करें।

नवरात्रि आलू



सामग्रीआलू- 4
तेल- तलने के लिए
ऑरिगेनो- 1 चम्मच
नीबू का रस- 1 चम्मच
सेंधा नमक- स्वादानुसार
लाल मिर्च पाउडर- 1/2 चम्मच
(काली मिर्च पाउडर भी डाल सकते हैं)

विधिआलू को धो लें और आधे इंच लंबे और आधे इंच चौड़े टुकडे़ में काट लें। आलू के इन टुकड़ों को बर्फ वाले पानी में आधे घंटे के लिए डुबोकर रखें। जब आलू को तलना हो, उससे ठीक पहले उन्हें पानी से निकालें और टिश्यू पेपर की मदद से पानी को पूरी तरह से सुखा लें। कड़ाही में तेल गर्म करें और आलू के टुकड़ों को सुनहरा होने तक तलें। आलू के टुकड़ों को लगातार पलटती रहें। आलू को कड़ाही से निकालें और उन्हें टिश्यू पेपर पर रखें ताकि अतिरिक्त तेल निकल जाएं। तले हुए आलू पर ऑरिगेनो, लाल मिर्च पाउडर, नमक और नीबू का रस छिड़कें। सर्व करें।

मोतिया पुलाव



सामग्रीसामक के चावल- 2 कप
टमाटर- 1
हरी मिर्च- 2
कटी हुई धनिया पत्ती- 2 चम्मच
पनीर- 1 कप
खोया- 1/2 कप
सिंघाड़े का आटा- 2 चम्मच
घी- 4 चम्मच
सेंधा नमक- स्वादानुसार

विधिसामक के चावल को धोकर कुछ देर के लिए किसी अखबार पर फैला दें ताकि अतिरिक्त पानी हट जाए। अब एक चम्मच घी गर्म करें और सामक के चावल को हल्का सुनहरा होने तक भूनें। सेंधा नमक और दो कप पानी डालें। पानी में एक उबाल आने के बाद आंच कम करें और चावल पकाएं। गैस ऑफ करें और चावल को 10 से 12 मिनट तक ढककर रखें। टमाटर के बीज निकालें और उसे काट लें। हरी मिर्च भी काट लें। खोया को मैश करें और उसमें एक चम्मच सिंघाड़े का आटा और पनीर डालकर आटे की तरह गूंदें। आटे की बहुत ही छोटी-छोटी लोई बनाएं और उस पर सिंघाड़े का आटा लगाएं। बचे हुए घी को कड़ाही में गर्म करें और उसमें पनीर और खोया बॉल्स को सुनहरा होने तक तलें। पनीर बॉल्स, कटे टमाटर, हरी मिर्च और धनिया पत्ती को तैयार पुलाव में डालकर मिलाएं और खीरे के रायते के साथ सर्व करें।

मखाने की खीर



सामग्रीदूध- 5 कप
मखाना- 1 कप
चीनी-1 चम्मच
जायफल पाउडर- 1/4 चम्मच
केसर- चुटकी भर
घी- 1 चम्मच
कटा हुआ पिस्ता- गार्निशिंग के लिए

विधिपैन में घी गर्म करें और उसमें मखाना डालकर उसे दो से तीन मिनट तक भूनें। गैस ऑफ करें और मखाने को दरदरा पीस लें। नॉनस्टिक पैन में दूध डालें और जब उसमें एक उबाल आ जाए तो मखाना उसमें डालें और दो से तीन मिनट तक पकाएं। चीनी, जायफल पाउडर और केसर डालकर अच्छी तरह से मिलाएं। गैस ऑफ करें। पिस्ता से गार्निश करें और सर्व करें।

फलाहारी पनीर



सामग्री
छोटे टुकड़ों में कटे पनीर- 250 ग्राम
कटी हुई धनिया पत्ती- 4 चम्मच
अदरक- एक गांठ
हरी मिर्च- स्वादानुसार
मलाई- 1 कप
दूध- आधा कप
सेंधा नमक- स्वादानुसार
घी- 1 चम्मच

विधिटमाटर को हल्का-सा उबाल कर छिलका उतार लें और टमाटर, अदरक और मिर्च का पेस्ट तैयार कर लें। मलाई और दूध को एक बर्तन में डालकर अच्छी तरह से फेंट लें। कड़ाही में घी गर्म करें और धीमी आंच पर टमाटर वाले पेस्ट को सुनहरा होने तक भूनें। स्वादानुसार नमक भी मिला दें। अब कड़ाही में फेंटी हुई मलाई को डालें। मलाई का रंग बदलने तक उसे चलाती रहें। जब मलाई और मसाला अच्छी तरह से फ्राई हो जाए, तो उसमें पनीर के टुकड़े डाल दें। अच्छी तरह मिक्स करके गैस ऑफ कर दें। धनिया पत्ती से गार्निश कर सर्व करें।

केले का चिप्स



सामग्रीतेल- तलने के लिए
काली मिर्च पाउडर- 1/2 चम्मच
सेंधा नमक- स्वादानुसार
कच्चा केला- 6

विधिकेले का छिलका उतारें। बर्फ वाले ठंडे पानी में नमक डालें और केले को उसमें 10 मिनट के लिए रखें। केले को पतले-पतले स्लाइस में काटकर पानी में ही डालें। कटे हुए केले को पानी में 10 मिनट और रहने दें। कड़ाही में तेल गर्म करें। केले के टुकड़ों को पानी से निकालकर किसी कपड़े पर रखें ताकि केले से सारा पानी हट जाए। तेज गर्म तेल में केले के टुकड़ों को डालें और तल लें। ऊपर से सेंधा नमक और काली मिर्च पाउडर डाल कर पेश करें।



लौकी की खीर



सामग्रीकद्दूकस किया घीया- 1 कप
दूध- 1 लीटर
चीनी- 1 कप
इलायची पाउडर- 1/2 चम्मच
मेवे- 2 चम्मच

विधिदूध को लगभग 20 मिनट तक धीमी आंच पर बीच-बीच में चलाते हुए उबालें। कद्दूकस किया हुआ घीया डालें और दूध के गाढ़ा होने तक पकाएं। चीनी डालकर मिलाएं और पांच मिनट और पकाएं। इलायची पाउडर और मेवे डालकर मिलाएं। गैस ऑफ करें और सर्व करें।



नारियल बर्फी



सामग्रीघी- 1 चम्मच

कद्दूकस किया नारियल- 3/4 कप

बूरा- 5 चम्मच

खोया- 2 चम्मच

केसर- चुटकी भर

पीला फूड कलर- कुछ बूंद

विधिघी और नारियल को माइक्रोवेव सेफ बर्तन में डालकर माइक्रोवेव में एक मिनट तक पकाएं। बूरा (चीनी का पाउडर) डालकर मिलाएं और माइक्रोवेव में सबसे ऊंचे तापमान पर दो मिनट पकाएं। खोया, दूध, केसर और फूड कलर डालकर मिलाएं और माइक्रोवेव में दो मिनट और पकाएं। मिश्रण को चिकनाई लगी किसी प्लेट में डालें और चम्मच के पीछे वाली साइड की मदद से फैलाएं। जब बर्फी थोड़ी ठंडी हो जाए तो उसे फ्रिज में कम-से-कम एक घंटे के लिए रखें। बर्फी के आकार में काटें और सर्व करें।

कुट्टू के दही बड़े



सामग्री
कुट्टू का आटा- 1 कटोरी
दही- 1 किलो
घी या तेल- आवश्यकतानुसार

हरी चटनी की सामग्री
धनिया पत्ती, हरी मिर्च और सेंधा नमक

मीठी सोंठ की सामग्री
इमली, चीनी, सेंधा नमक, काली या लाल मिर्च

विधिकुट्टू के आटे को एक बर्तन में डालकर उसका घोल तैयार करें और उसे10 मिनट तक छोड़ दें। 10 मिनट बाद उसमें दही डालकर अच्छी तरह से फेंट लें। घोल को उतना ही पतला रखें, जितना दाल के बड़े बनाते वक्त रखते हैं। कड़ाही में घी या तेल गर्म करें और बड़े तैयार करें। सारे बड़े तैयार करने के बाद उन्हें तेज गर्म पानी में डालें। इससे बड़े से अतिरिक्त तेल निकल जाएगा। बाकी आधा किलो दही को एक बर्तन में डालकर अच्छी तरह से फेंट लें और उसमें नमक और मिर्च पाउडर मिला दें। धनिया पत्ती को धोकर उसकी चटनी तैयार करें और उसमें सेंधा नमक और नीबू डालें। हरी चटनी तैयार है। इमली को दो-तीन घंटे पहले पानी में भिगो दें। अब उसको हाथ से मसलकर बीज को निकाल दें। इमली के गूदे को एक पैन में डालकर उसे चीनी, नमक और मिर्च के साथ पकाएं। अब बड़ों को पानी से निकालें। फेंटा हुआ दही उसके ऊपर डालें। उसके ऊपर हरी चटनी और मीठी सोंठ डालकर सर्व करें।

साभार- दैनिक हिंदुस्तान

नवरात्रि का आरंभ जीवन में लयताल का प्रारंभ

शारदीय नवरात्र 3 अक्टूबर दिन गुरुवार से शुरू हो रहे हैं। इस बार नवरात्र 3 से लेकर 11 अक्टूबर तक है और 12 अक्टूबर को दशहरा मनाया जाएगा। हिन्दू पंचांग के अनुसार शरद नवरात्रि अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होते हैं और विजयादशमी के पहले नवमी तक चलते हैं। इन नौ दिनों तक मां दुर्गे के नौ अलग- अलग रूपों - मां शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और मां सिद्धिदात्री की उपासना की जाती है।

इस बार नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना नीचे दीए गई इन तिथियों और दिन को होगी-

किस दिन किसकी पूजा
3 अक्टूबर को प्रतिपदा पर माता शैलपुत्री
4 अक्टूबर को द्वितीया पर ब्रह्मचारिणी
5 अक्टूबर को तृतीया पर चंद्रघंटा का पूजन
6 व 7 अक्टूबर को चतुर्थी पर माता कुष्मांडा का पूजन
8 अक्टूबर को पंचमी तिथि पर स्कंदमाता का पूजन
9 अक्टूबर को षष्ठी तिथि पर मां कात्यायनी का पूजन
10 अक्टूबर को सप्तमी तिथि पर माता कालरात्रि का पूजन
11 अक्टूबर को अष्टमी और नवमी दोनों पर माता महागौरी व सिद्धिदात्री का पूजन किया जाएगा
नवरात्रि का महत्व-
हिन्दू धर्म में किसी शुभ कार्य को शुरू करने और पूजा उपासना के दृष्टि से नवरात्रि का बहुत महत्व है। एक वर्ष में कुल चार नवरात्र आते हैं। चैत्र और आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक पड़ने वाले नवरात्र काफी लोकप्रिय हैं और इन्हीं को मनाया जाता है। इसके अलावा आषाढ़ और माघ महीने में गुप्त नवरात्रि आते हैं जो कि तंत्र साधना करने वाले लोग मनाते हैं। लेकिन सिद्धि साधना के लिए शारदीय नवरात्रि विशेष उपयुक्त माना जाता है। इन नौ दिनों में बहुत से लोग गृह प्रवेश करते हैं, नई गाड़ी खरीदते हैं साथ ही विवाह आदि के लिए भी लोग प्रयास करते हैं। क्योंकि मान्यता है कि नवरात्रि के दिन इतने शुभ होते हैं इस दौरान कोई भी शुभ कार्य करने के लिए लग्न व मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती।

शनिवार, 7 सितंबर 2024

गजानन के मस्तक पर विराजमान है गजासुर- डा. अनुजा भट्ट

कौन है गजासुर

आपने पिता पुत्र के बहुत से संवाद सुने होंगे। पर आज मैं आपको शिव और गणेश की बातचीत बता रही हूं ।

पिता पुत्र संवाद

भीतर कौन जा रहा है

बाहर कौन खड़ा है

मैं गणेश हूं पार्वती का पुत्र

मैं महादेव हूं पार्वती का पति मुझे जाने दो

मेरी मां स्नान कर रही हैं और भीतर किसी को भी प्रवेश की अनुमति नहीं है आपको प्रतीक्षा करनी होगी

समय मेरी प्रतीक्षा करता है मैं किसी की प्रतीक्षा नहीं करता।

परंतु आप तब तक भीतर नहीं जा सकते जब तक मैं यहां खड़ा हूं

यदि तुम पार्वती के पुत्र हो तो मैं तुम्हारा पिता हूं। तुम आज्ञा का अर्थ नहीं जानते

मैं आपका मार्ग रोककर अपनी मां का आज्ञा का पालन कर रहा हूं

मेरा त्रिशूल तुमको मार सकता है

मेरा दंड आपको चोट पहुंचा सकता है

संवाद लंबा है इसलिए मूल कहानी पर चलते हैं

शिव त्रिशूल से वार कर देते है. दंड अपना असर नहीं दिखा पाता। गणेश का मस्तक धड़ से अलग हो जाता है।

पार्वती चीख पड़ी।

मौत का सन्नाटा पसर गया।

पार्वती यानी प्रकृति का क्रोध चरम पर था। वह हिंसक हो उठी थीं। महादेव आपने गणेश को नहीं मुझे मार डाला है। अब मैं खुद को मार दूंगी

महादेव ने समझाया तुम ऐसा नहीं कर सकती

हुंकार उठी पार्वती क्यों नहीं।

या तो गणेश को जीवन दीजिए या फिर विनाश देखिए

महादेव के गणों ने कहा दक्ष की तरह ही समाधान निकाला जाए।

उत्तर दिशा में मिलने वाले पहले पशु का सिर

उसी से गणेश को जीवनदान मिलेगा पर वह इसके लिए तैयार होना चाहिए

तब विष्णु भगवान बोले वह तैयार हो जाएगा। आपने गजासुर को वरदान दिया था।

आपने गजासुर को वरदान दिया था उसके मस्तक ही हमेशा पूजा की जाएगी। वह सिर गणपति की शोभा बनेगा। जैसे ही गजासुर का मस्तक गणेश के धड़ से लगाया गया अपनी सूड़ से उसने पार्वती के प्रणाम किया।

पछतावा महादेव के चेहरे से दिख रहा था । उन्होंने घोषणा की अब ये गणेश अग्र देवता होंगे और सबसे पहले इनकी पूजा की जाएगी। इनका एक नाम गजानन होगा और दूसरा विनायक....
 कौन है गजासुर
 गजासुर महिषासुर का पुत्र था  जिसका वध मां  दुर्गा  ने किया था। गजासुर भी अपने पिता की तरह अत्याचारी  था। अपने पिता के वध के बदला लेने के लिए उसने घनघोर तपस्या की।  उसे वरदान मिला उसके मस्तक की हमेशा पूजा की जाएगी।




बुधवार, 4 सितंबर 2024

उनके टाइम पास से बनते हैं एंटीकपीस.. आपका टाइमपास क्या है दोस्त.. डा अनुजा भट्ट


क्या पैसा कमाना आपकी चाहत है। इस चाहत को अपने हुनर के जरिए हकीकत में बदला जा सकता है। अगर आप समय की नब्ज टटोल पाएं और अपने मन में यह विचार जमा लें कि कोई भी काम छोटा बड़ा नहीं होता हमारी सोच छोटी बड़ी हो सकती है, तो आपको पैसा कमाने से कोई नहीं रोक सकता। मैं हर रोज अलग अलग तरह की महिलाओं से मिलती हूं। उनसे खूब बातें करती हूं। खूब सीखती भी हूं और जीवन में आशावादी रहती हूं।

आज मुझे कुछ गुजराती महिलाएं मिली। जिन्होंने सड़क किनारे पटरी पर अपनी दुकान सजायी हुई थी। वह मुझे आवाज दे रही थी मैडम जी ले लो। मैंने कहा अभी लेना नहीं है, तो एक महिला बोली मत लीजिए पर देख तो लीजिए। मुझे भी टाइम पास करना था तो मैं भी बैठ गई उनके साथ। गजब के आत्मविश्वास के साथ वह अपनी कहानी सुनाने लगी। उनमें से कोई भी गरीब नहीं थी। उनका मूल मंत्र था टाइम मेनेजमेंट.. जब खेती का काम नहीं तब कसीदाकारी और फिर खुद ही बनाए सामान को बेचने की जिम्मेदारी भी। उनके साथ मैंने बिना चीनी की चाय और खास गुजराती नमकीन खाई। और इसी के साथ शुरू हुआ गप गल्प का किस्सा.. जब मैंने कहा, मैं तो आज टाइम पास कर रही हूं आपका टाइमपास क्या है तो एक महिला ने हँसते हुए कहा जो आपके घर को सुंदर बनाता है।

हम सब महिलाएं अपनी संस्कृति और रीतिरिवाज के बारे में जितना जानती हैं उनको क्राफ्ट के रूप में पेश करती हैं। फिर चाहे वह दीवार पर लटकाने वाली वस्तुएँ, रजाई, शादी के कपड़े, स्कर्ट और ब्लाउज़ (घाघरा चोली), बच्चों के कपड़े, अपने पतियों द्वारा पहने जाने वाले शर्ट (कुर्ते), स्कार्फ़...कुछ भी हो । कुछ हस्तनिर्मित वस्तुओं को पूरा करने में महीनों लग जाते हैं क्योंकि हमें घर के काम और खेती भी करनी होती है। हम सब गुजरात के कच्छ इलाके से हैं। यहां सब एक साथ ही रहते हैं। आपको बताऊं मोटे तौर पर कच्छ में 7 तरह की कढ़ाई की जाती है - जाट, सूफ, खारेक, रबारी, अहीर, पक्को।

पक्को का काम गुजरात, उत्तर-पश्चिम भारत के कच्छ क्षेत्र में सोढ़ा, राजपूत और मेघवाल समुदाय की महिलाएं करती हैं ।रूपांकन में आम तौर पर ज्यामितीय और पुष्प होते हैं, कभी-कभी शैलीबद्ध आकृतियां भी बनाई जाती हैं । रूपांकनों को पारंपरिक रूप से पहले चाक से खींचा जाता है, और फिर मैरून या लाल, गहरे हरे, सफेद या पीले रंग से बनाया जाता है। अक्सर बटनहोल सिलाई के साथ काम किया जाता है। चेन स्टिच का उपयोग करके काले, सफेद या पीले रंग में आउटलाइनिंग की जाती है।

इसी तरह मुतवा कसीदाकारी मुतवा जाति की महिलाओं द्वारा की जाने वाली कढ़ाई है। मुतवा एक मुस्लिम जाति है जो सिंध-पाकिस्तान के क्षेत्र से आकर कच्छ के रेगिस्तानी क्षेत्र "बन्नी" में बस गई। उनके एक संप्रदाय को मालधारी भी कहते हैं।
इसी तरह जाट कढ़ाई भी जाट समुदाय की महिलाएं करती हैं। यह एक चरवाहा समुदाय है जो सदियों पहले पश्चिमी एशिया से भारत में आकर बसा था। जाट महिलाएँ आम तौर पर पूरे कपड़े को पूर्व-नियोजित ज्यामितीय डिज़ाइन में कवर करने के लिए क्रॉस स्टिच कढ़ाई का उपयोग करती हैं। वे अपने काम में बड़े पैमाने पर दर्पण का भी उपयोग करती हैं। सूफ़ कढ़ाई कच्छ के सोधा, राजपूत और मेघवाल समुदायों द्वारा की जाती है। उनके द्वारा डिज़ाइन कपड़े के पीछे की तरफ साटन सिलाई का उपयोग करके विकसित किए गए बड़े पैमाने पर ज्यामितीय पैटर्न हैं। सूफ़ काम करने के लिए गहरी नज़र, गणित और ज्यामिति का ज्ञान होना ज़रूरी है। सूफ़ रूपांकनों में मोर, मंडला आदि जैसे कारीगरों के जीवन से लयबद्ध पैटर्न शामिल हैं और इनका उपयोग परिधान, बेडस्प्रेड, वॉल हैंगिंग, रजाई, तोरण और कुशन कवर जैसी चीज़ें बनाने के लिए किया जाता है।

खरेक कढ़ाई सोधा, राजपूत और मेघवाल समुदायों द्वारा की जाती है। कारीगर कपड़े पर ज्यामितीय पैटर्न की रूपरेखा बनाते हैं और फिर साटन सिलाई के बैंड के साथ रिक्त स्थान भरते हैं जो सामने से ताने और बाने के साथ काम किए जाते हैं।

रबारी कढ़ाई कच्छ के रबारी समुदायों द्वारा की जाती है जो मुख्य रूप से पशुपालक खानाबदोश समुदाय हैं जो मवेशी पालते हैं। उनके द्वारा निर्मित डिजाइन बोल्ड हैं और आमतौर पर पौराणिक कथाओं और दैनिक जीवन से प्राप्त होते हैं। कपड़े पर आउटलाइन चेन स्टिच में बनाई जाती है और फिर बटनहोल सिंगल चेन, हेरिंगबोन टांके का उपयोग करके बारीकी से भरी जाती है। आमतौर पर रबारी कढ़ाई के लिए काले रंग का आधार उपयोग किया जाता है। अहीर कढ़ाई एक कपड़े पर चौकोर चेन स्टिच का उपयोग करके फ्रीहैंड डिज़ाइनों की रूपरेखा बनाकर और फिर बंद हेरिंगबोन सिलाई का उपयोग करके भरकर की जाती है। कढ़ाई के इस रूप में दर्पण का भी बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है।

उनसे बातचीत कर लगा सचमुच कितनी बातें हैं जो हम नहीं जानते। समाज जाति धर्म और कर्म हमारी कला को कितना जीवंत बनाता है यह सब इस बात का प्रमाण हैं। वास्तव में, कला संस्कृतियों और जीवन के रंगों का सार दर्शाती हैं। एक सम्मोहन पैदा करती हैं। जैसा आज इन महिलाओं ने किया। धन्यवाद मुकुंदनी सुकुंदनी....अब तुम कब और किस मोड़ पर मिलोगी पता नहीं पर तुम्हारी हँसी चाय पीने का खास अंदाज और नमकीन का चटपटापन याद रहेगा।

मंगलवार, 20 अगस्त 2024

बगरू बागोरा में है रंगाे की बहार आप पहनेंगे बारबार-डॉ. अनुजा भट्ट

राजस्थानी रंग और फैशन का संग

 राजस्थान का एक छोटा सा गाँव बगरू जयपुर से 32 किलोमीटर पूर्व में स्थित है। यह ब्लाक प्रिंटिंग की अपनी पारंपरिक प्रक्रिया के लिए जाना जाता है। बगरू के 'छीपा' राजस्थान के सवाई माधोपुर, अलवर, झुंझुनू और सीकर जिलों से यहाँ आकर बसे और लगभग 300 साल पहले इसे अपना घर बना लिया। बगरू शब्द 'बागोरा' से लिया गया है, जो एक झील में एक द्वीप का नाम है । जहाँ मूल रूप से शहर बसाया गया था।

कम से कम 400 वर्षों से बगरू छीपा का घर रहा है - एक कबीला जिसका नाम या तो एक गुजराती शब्द से आया है जिसका अर्थ है "छपना" या नेपाली भाषा के दो शब्दों के संयोजन से आया है 'छी' यानी रंग चढ़ाना और 'पा' यानी थोड़ी देर धूप में रहना। जब आप यहां से गुजरते हैं तो आपको यह परिभाषा सही लगती है। जब आप छीपा मोहल्ला पहुंचते हैं ताे आप एक अलग तरह की भीनी भीनी खुशबू से राेमांचित हाेते हैं। यह खुशबू है कपड़ाें पर तारी हाे चुके रंगाें की। जी हां ,कपड़े की खुशबू से यहाँ की हवा सुर्ख होती है; जमीन और कंक्रीट की दीवारें अलग अलग रंगाें से सजी है जिसमें नारंगी, नीला और गुलाबी ज्यादा से है। यह दृश्य आपको बांध लेता है।

 आइए मिलते हैं विजेंद्र जी से। विजेंद्र, छीपा की इस सामुदायिक परंपरा को जारी रखे हुए है। पांचवीं पीढ़ी के डायर और मास्टर प्रिंटर, विजेंद्र जिनकाे सब प्यार से विजु बुलाते हैं बगरू टेक्सटाइल्स के संस्थापक हैं - एक कंपनी जो कपड़े रंगने और छपाई का व्यवसाय कई पीढ़ियाें से करती आई है। 2007 में अपने पिता की मृत्यु के बाद उन्हाेंने अपने पिता के काम काे संभाला। संभालते समय जाे बात सबसे पहले उनके जेहन में आई वह थी स्थानीय लाेगाें काे पलायन से कैसे राेका जाए। विजू ने स्थानीय परिवारों को रोजगार देने और राजस्थानी ब्लॉक प्रिंटिंग के लिए नया बाजार विकसित करने के लिए एक प्लान तैयार किया। इस प्लान में कई चीजाें काे शामिल किया गया।

सबसे पहले आसापास सागवान (सागौन), शीशम (भारतीय रोज़वुड) के पेड़ लगाए गए। इन पेड़ाें के लगाने की एक खास वजह भी थी। जैसा कि मैंने बताया यहां प्रिटिंग का काम हाेता है और इसके लिए ब्लाक का प्रयाेग किया जाता है। ब्लाक बनाने के लिए खास तरह की लकड़ी के प्रयाेग हाेता है और यह लकड़ी इन पेड़ों से ही मिलती है। किसी भी एक उद्याेग को विकसित करने के लिए उसके साथ और भी बहुत सारी जरूरतें होती हैं। कम से कम सोलह परिवार नियमित रूप से मास्टर प्रिंटर, खरीदार, ब्लॉक कार्वर, धोबीवालों (कपड़े धोने वाले लोगों) के रूप में काम करते हैं। बगरू टेक्सटाइल्स के मुनाफे का एक हिस्सा पूरे छीपा समुदाय के लिए सामुदायिक पहल करता है। ब्लॉक शॉप ने गाँव में फिर से संगठित होने, स्वास्थ्य क्लीनिकों को प्रायोजित करने, परिवारों के लिए फिल्टर पानी प्रदान करने के लिए अपना कार्यक्रम विकसित किया है।

वुडब्लॉक नक्काशी

छीपा प्रिंटर प्रिंट डिजाइन में रंगों और आकृतियों की संख्या के आधार पर कितने ब्लॉक बनाने है यह तय करता है। आम तौर पर, एक प्रिंटर पहले बैकग्राउंड ब्लॉक को स्टैम्प करता है, उसके बाद एक आउटलाइन ब्लॉक (रेख) होता है। औसतन, एक प्रिंटर को हाथ से मुद्रित कपड़े बनाने के लिए कम से कम 4 या 5 ब्लॉक की आवश्यकता होती है। एक ही ब्लॉक को तराशने और तैयार करने में एक या दो दिन का समय लग सकता है क्योंकि स्थानीय लकड़ियों का चयन और मसाला बनाना भी इसी प्रक्रिया में शामिल है। प्रत्येक पैटर्न डिजाइन के लिए ब्लॉक की भूमिका विशिष्ट है।

बगरू में, ब्लॉक बनाते समय सागवान (सागौन), शीशम (भारतीय रोज़वुड), या रोहिड़ा टीक या मारवाड़ टीक जैसी लकड़ियों का उपयोग करते हैं। शीशम की सापेक्ष कठोरता जटिल या विस्तृत रूपांकनों के अनुकूल होती है।
एक बार ब्लॉक के डिज़ाइन को कागज पर स्केच किया जाता है और ब्लॉक को आकार में काट दिया गया है, पैटर्न सीधे लकड़ी पर खींचा जाता है। कार्वर ड्रिल, छेनी, हथौड़े, नाखून से ब्लॉक पर पैटर्न को बनाता है। बगरू में किसी भी छपाई वाले के क्वार्टर में चले जाइए, आप अक्सर एक ही उपकरण देखेंगे: एक लंबी टेबल, ब्लॉक (निश्चित रूप से), और एक रोलिंग ट्रॉली जिसमें एक डाई ट्रे और कुछ अन्य आइटम होते हैं।

पारंपरिक बगरू प्रिंट क्रीम पृष्ठभूमि पर गहरे (या रंगीन) पैटर्न का उपयोग करते हैं। पैटर्न बनाने में, पुष्प, पशु और पक्षी के रूपों के साथ ज्यामितीय रूपों को अपनाया गया  है। ब्लॉक प्रिंटिंग तकनीक  में पैटर्न में व्यवस्थित रूप से
दोहराया जाता है।  इसे पुष्प बूटी कहते हैं। बगरू प्रिंट में आमतौर पर देखे जाने वाले बूटों में गैंदा, गुलाब, बादाम, कमल और बेल शामिल हैं। ये रूपांकन पूरे कपड़े पर अलग-अलग आकार और संयोजन में दिखाई देते हैं जिस पर उन्हें मुद्रित किया जाता है। अन्य डिज़ाइनों में छोटे जाली पैटर्न होते हैं, जो पुष्प रूपांकनों से बने होते हैं।
  आपको बताते चलूं कि बगरू टेक्सटाइल्स के फैब्रिक का उपयोग ब्लॉक शॉप, बीस्टी थ्रेड्स, मौली माहोन, पेनी सेज, और रेख एंड दत्ता जैसे अंतर्राष्ट्रीय ब्रांडों द्वारा किया गया है । भारतीय ब्लॉक प्रिंटिंग एक वैश्विक डिजाइन प्रवृत्ति के रूप में उभर रही है। वोग और न्यूयॉर्क टाइम्स में भी इसकी चर्चा हुई है।

शनिवार, 17 अगस्त 2024

गधा नहीं हैं आप जो सारा बोझ आपके कंधे पर हो-डा. अनुजा भट्ट



अगर आप जानते हैं कि आप दवाब में हैं और फिर भी आपके लिए नहीं कहना संभव नहीं, तो जान लीजिए आपका इस्तेमाल किया जाता रहेगा। आप यह महसूस करते हैं कि सामने वाला कितनी चतुराई से अपनी बेबसी और मजबूरी के बहाने गढ़कर आपकी जेब में सेंध लगा रहा है। आप अपना तनाव अपनी हताशा को खुद ओढ़ लेते हैं या फिर आपका बच्चा ही आपका साफ्ट टारगेट हो जाता है। जहां आप अपनी हताशा और निराशा का गुब्बारा फोड़ते हैं। उसे जलील करते हैं। उसके साथ आक्रामक होते हैं। जबकि सबसे ज्यादा जिम्मेदार आपको उसके लिए होना चाहिए क्योंकि आप ही उसके जन्मदाता हैं वह आप पर ही निर्भर है।

जहां आपको ना कहना चाहिए वहां आप हां कहते हैं और जहां हां वहां आप ना कहते हैं। यह विरोधाभास सबसे ज्यादा आपकी सेहत को प्रभावित करता है और आप बीमार हो जाते हैं। गधा नहीं हैं आप जो सारा बोझ आपके कंधे पर हो।

क्या आप अक्सर अपनी क्षमता से ज़्यादा काम अपने ऊपर ले लेते हैं? क्या आप अक्सर उन कामों के लिए सहमत हो जाते हैं जिन्हें आप नहीं करना चाहते? क्या आपके लक्ष्य पीछे छूट रहे हैं।अगर ऐसा है, तो अपने जीवन में लोगों के साथ “नहीं” कहना और सीमाएँ तय करना सीखना होगा।अगर आप लगातार दूसरों के हर अनुरोध को स्वीकार करते हैं, तो आप मानसिक रूप से बर्नआउट का अनुभव कर सकते हैं। 
बर्नआउट के निम्नलिखित लक्षण हो सकते हैं:
आपके जीवन में आनंद की कमी । लगातार काम के दवाब के कारण आराम करने का समय न होना। थकावट, चिड़चिड़ापन, चिंता, खुद की देखभाल की कमी, उत्पादकता में कमी, प्रेरणा की कमी, अवसाद , नकारात्मक ,शीघ्र क्रोध, संबंधों में शुष्कता।

जब आप इतनी सारी परेशानियों से जूझ रहे हैं तो इसका सीधा असर सबसे पहले आपके परिवार और आपकी नौकरी पर पड़ेगा। मन और नाव दोनो एक जैसे हैं, डावाडोल होते देर नहीं लगती।

दूसरों की मदद करने के लिए खुद को बर्नआउट तक पहुँचने देना ठीक नहीं। "नहीं" कहना सीखना और खुद को और अपने मूल्यों को प्राथमिकता देना आपके मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। यह दूसरों के साथ संबंधों को खराब नहीं करता बल्कि बेहतर बना सकता है। आपका यह भ्रम है कि आपके ना कहने से वह नाराज हो जाएगा। आपका ना कहना उसे वैकल्पिक विचार पैदा करेगा। आप पर निर्भरता खत्म करेगा।

'नहीं' कहना सीखना क्यों महत्वपूर्ण है?

प्रत्येक व्यक्ति के पास दिन के 24 घंटे होते हैं, जिनमें से सोने या आराम करने के लिए भी समय चाहिए। यदि आप अक्सर दूसरों के अनुरोधों पर "हाँ" कहते हैं, तो आप शायद खुद से "नहीं" कह रहे हैं। आप थके हैं सोना चाहते हैं पर उस हां के कारण आप फिर से काम पर लग जाते हैं। उदाहरण के लिए, शायद आप अक्सर देर तक रुकते हैं जब आपका बॉस आपको ओवरटाइम करने के लिए कहता है और अपने बच्चे के बास्केटबॉल गेम को मिस कर देता है।

जब आप खुद की कीमत पर दूसरों की मदद करने के लिए सहमत होते हैं, तो आप उनकी इच्छाओं और ज़रूरतों को अपनी ज़रूरतों से ज़्यादा प्राथमिकता देते हैं। हालाँकि कभी-कभी दया, सहानुभूति और सहायता प्रदान करना सकारात्मक हो सकता है, लेकिन यह तब ख़तरनाक हो सकता है जब आप अपनी ज़रूरतों के बावजूद ऐसा करते हैं।

"नहीं" कहने का फ़ायदा यह है कि आप अपनी मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक ज़रूरतों का ख्याल रखने के लिए समय निकाल सकते हैं। इसके अलावा, आप दूसरों को दिखा सकते हैं कि वे आपका फ़ायदा नहीं उठा सकते या आपसे हर समय 100% साथ रहने की उम्मीद नहीं कर सकते, क्योंकि आप भी इंसान हैं।

बर्नआउट, अत्यधिक तनाव और चिंता गंभीर स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को जन्म दे सकती है। इस कारण से, इससे पहले कि यह आपके स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाले, अपने अत्यधिक तनाव को दूर करना आवश्यक हो सकता है।

अगर आपको लोगों के अनुरोध पर मना करने में परेशानी होती है, तो उत्तर देने में देरी करना सीखकर अपने लिए समय खरीदें। अगर किसी को तुरंत जवाब देने की ज़रूरत नहीं है, तो आप कुछ इस तरह का वाक्य इस्तेमाल कर सकते हैं, "मैं जाँच करूँगा और कल आपसे संपर्क करूँगा।" अगर आप अक्सर उसी समय किसी एहसान के लिए सहमत हो जाते हैं, तो यह रणनीति आपको यह सोचने का समय देती है कि क्या आप अनुरोध को स्वीकार करना चाहते हैं। यह आपको अस्वीकार करने या वैकल्पिक व्यवस्था तैयार करने के लिए आत्मविश्वास पैदा करती है।

दूसरों को आपके कार्यों और आपने उनके अनुरोध को क्यों अस्वीकार किया, के बारे में विवरण की आवश्यकता नहीं है। आपको अस्वीकार करने या सीमा निर्धारित करने के लिए किसी कारण के बताने की भी आवश्यकता नहीं है। क्योंकि हां या ना कहना आपका निजी चुनाव है। इसके लिए बिना कोई बहाना बनाए किसी के अनुरोध को अस्वीकार किया जा सकता है।

"मुझे खेद है। मैं कल आपकी मदद करने में असमर्थ हूँ। मेरे पास पाँच अपॉइंटमेंट हैं और मुझे नहीं लगता कि मेरे पास समय होगा।" इस तरह कहकर हम उसे सफाई क्यों दें।

हमें कहना होगा “नहीं, मैं कल ऐसा नहीं कर सकता।”

जब आप अपनी सीमाओं के लिए कोई कारण न बताने का अभ्यास करते हैं, तो यह दूसरों को दिखाता है कि आप एक बहाने के कारण नहीं, बल्कि एक और इंसान होने के नाते सम्मान के पात्र हैं। अगर वे पूछते हैं कि आप मदद क्यों नहीं कर सकते, तो अपनी सीमा दोहराते हुए कहें, “मैं कल मदद नहीं कर सकता।”

अगर उनके लिए अस्वीकृति या अपनी योजनाओं में बदलाव एक चुनौती है, तो यह उनकी जिम्मेदारी है कि वे इससे निपटना सीखें। अगर वे मानसिक रूप से आप पर निर्भर हैं, तो आपको उन्हें बैकअप योजना बनाने में मदद करने की ज़रूरत नहीं है।

माफ़ी मत मांगो

अगर आप लोगों को खुश करने में संघर्ष करते हैं, तो आप किसी के अनुरोध को अस्वीकार करने पर दोषी महसूस कर सकते हैं। आपको डर हो सकता है कि वे अब आपको पसंद नहीं करेंगे या आपसे नाराज़ हो जाएँगे। इस डर के कारण आप किसी अनुरोध को अस्वीकार करने पर माफ़ी माँग सकते हैं। हालाँकि, माफ़ी माँगना उल्टा हो सकता है।

सीमाएँ निर्धारित करना स्वस्थ है और एक इंसान के तौर पर आपके अधिकार में है। अगर आप अपने स्थान, शरीर, सामान और ऊर्जा के लिए सीमाएँ निर्धारित कर रहे हैं और किसी दूसरे व्यक्ति को नियंत्रित करने का प्रयास नहीं कर रहे हैं, तो आपको बिना किसी बहाने के 'नहीं' कहने का अधिकार है। जब आप माफ़ी मांगते हैं, तो आप खुद को और दूसरे व्यक्ति को यह संदेश दे सकते हैं कि 'नहीं' कहना गलत है।

उत्तर देने से पहले खुद को समय देना मददगार हो सकता है, इसका एक और कारण यह है कि इससे आपको यह सोचने का मौका मिलता है कि आप किस बात पर सहमत हो रहे हैं। कुछ मामलों में, कोई व्यक्ति आपसे ऐसी प्रतिबद्धताएँ माँग सकता है जिसके लिए आपके पास जितना समय और ऊर्जा है, उससे ज़्यादा समय और ऊर्जा की ज़रूरत होती है। अगर आपको बहुत जल्दी सहमत होने की आदत है, तो हो सकता है कि आप अनुरोध के हर पहलू को न समझ पाएँ।

अगर आप अनिश्चित हैं, तो सवाल पूछें और सहमत या असहमत होने से पहले ज़्यादा जानकारी जुटाएँ। जानें कि आपसे क्या अपेक्षित हो सकता है। दूसरों को जवाब देने में जल्दबाजी न करने दें। अगर वे आप पर दबाव डाल रहे हैं या ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे कि आप "उनके ऋणी हैं," तो अपने मानसिक स्वास्थ्य को बचाने के लिए मना करना सबसे अच्छा हो सकता है।

किसी अनुरोध को स्वीकार करने से पहले, अपने मूल्यों और प्राथमिकताओं पर विचार करें। प्राथमिकताएं स्थापित करने और केंद्रित रहने से आप उन कुछ क्षेत्रों में अपना सर्वश्रेष्ठ दे पाएंगे, बजाय इसके कि आप हर किसी के लिए सब कुछ बनने की कोशिश में खुद को बहुत अधिक फैला लें।

अगर आप समझौता करने का कोई तरीका अपना सकते हैं, तो आप शायद "नहीं" कहना न चाहें। उदाहरण के लिए, अगर कोई दोस्त आपसे शुक्रवार की रात को अपने बच्चों की देखभाल करने के लिए कहता है ताकि वे बाहर जा सकें, लेकिन आप उपलब्ध नहीं हैं, तो आप शनिवार की रात को उसके बच्चों की देखभाल करने की पेशकश कर सकते हैं। अगर किसी की मदद करना आपके लिए ज़रूरी है और आपको कोई आपत्ति नहीं है, तो कोई विकल्प सुझाकर इसे बेहतर बनाने पर विचार करें।

किसी अनुरोध को अस्वीकार करना या सीमाएँ निर्धारित करना व्यवहार में सिद्धांत से ज़्यादा प्रबंधकीय लग सकता है। इस कारण से, जब आप अकेले हों तो अभ्यास करना मददगार हो सकता है। अपने अलग-अलग उत्तरों का अभ्यास करें। यह कहने का अभ्यास करें, “मुझे इस बारे में आपसे बात करनी होगी,” और “मैं उपलब्ध नहीं हूँ।”

अगर आपका दोस्त आपको “नहीं” कहना सीखने में मदद करता है, तो उनसे अपने साथ रोलप्ले करवाएँ। वे आपसे कुछ ऐसे अनुरोध कर सकते हैं जो आप अक्सर सुनते हैं, और आप विनम्रता से मना करने का अभ्यास कर सकते हैं। जितना अधिक आप अभ्यास करेंगे, यह उतना ही आसान हो जाएगा।

मेरे पास अभी समय नहीं है.

पूछने के लिए धन्यवाद, लेकिन मैं ऐसा करने में असमर्थ हूं।

मैं ऐसा करना पसंद करूंगा, लेकिन अन्य प्रतिबद्धताओं पर भी मुझे ध्यान देने की आवश्यकता है।

नहीं धन्यवाद।

मुझे इसमें कोई रूचि नहीं है।

मैं उस दिन व्यस्त हूं.

चलो किसी और समय के लिए योजना बनाते हैं।

मैं उस दिन कुछ और करने जा रहा हूं।

मेरा शेड्यूल अभी पूरा भरा हुआ है।

इन विचारों को लें और इन्हें तब तक बदलते रहें जब तक आपको ऐसा तरीका न मिल जाए जिससे आप आवश्यकता पड़ने पर आत्मविश्वास के साथ “नहीं” कह सकें।

किसी के अनुरोध को अस्वीकार करना, खासकर यदि आप उनके करीब हैं, तो आपको पहली बार में गलत लग सकता है। इस बात पर विचार करने के लिए समय निकालें कि आप क्यों मानते हैं कि आप अपने जीवन में लोगों के साथ सीमाएँ निर्धारित नहीं कर सकते।

कुछ लोग सीमाएँ निर्धारित करने से डरते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि दूसरे लोग उन्हें पसंद नहीं करेंगे। दूसरों को यह चिंता हो सकती है कि वे अपने दोस्तों या सहकर्मियों को खो देंगे। हालाँकि, स्वस्थ लोग आपकी सीमाओं को स्वीकार करेंगे। यदि वे आपकी सीमाओं को स्वीकार नहीं करते हैं, तो वे आपका अनादर कर रहे होंगे।

याद रखिए गधा नहीं हैं आप जो सारा बोझ आपके कंधे पर हो.

मंगलवार, 13 अगस्त 2024

आखिर ननद ने क्याें कराया कीर्तन- डा. अनुजा भट्ट



घाट से आते समय एक अलग सी अनुभूति हो रही थी। छूट गया सब कुछ... आज पंक्ति में क्रम बदल गया था। दीपक सबसे आगे फिर मैं उसके बाद मेरा देवर देवरानी और फिर मां। हमारे साथ साथ निताई बंधु दुःख का संगीत बजा रहे थे। घर पहुंचे तो ननद ने हमारे पांव धुलवाएं। उसके बाद हम सब घर के नीचे पंडाल में इक्ट्ठा हुए। मेरी ननद और मेरी देवरानी की भाभी और दीदी ने सूजी बनाई। फल और सूजी का हलवा खाना था। उसके बाद रस्में हुई। जिसमें किसी ने कपड़ा किसी ने लिफाफा दिया। वह सब एक रजिस्टर में भी दर्ज होता रहा। व्यक्तिगत रूप से मुझे यह रस्म पसंद नहीं।

उसके बाद मेरी ननद और ननदोई जी ने कीर्तन का आयोजन किया था। आप कह सकते हैं कि मेरी ननद ने ही क्यों कराया कीर्तन। आप भी तो करा सकते थे। इसके पीछे रामायण का दर्शन है। रामवनवास के बाद जब राम सीता और लक्ष्मण चले जाते हैं तो उनके वियोग में राजा दशरथ की मृत्यु हो जाती है। राम की बड़ी बहन अपने भाईयों और भाभी के आने तक दिया जलाती है। उनका रास्ता देखती है और कीर्तन करती है। वह अपने भाईयों की कुशलक्षेम जानना चाहती है और पिता के शोक से दृवित हैं। इस तरह यह परंपरा चली आ रही है। अंतिम श्राद्ध में पोते की जगह हमारे यहां नाती को महत्व दिया गया है। मेरे भांजे ने अंतिम श्राद्ध की सारी रस्में की।

कीर्तन के लिए सभी कलाकार बाहर से आए थे। जिनको निताई बंधु कहते हैं। निताई बंधुओं ने अपने लिए खुद भोजन तैयार किया। यह भोजन शुद्ध शाकाहारी था। रात 12 बजे के बाद संकीर्तन शुरू हुआ। मृदंग की पूजा चंदन के लेप और फूलों की माला से की गई । उसके बाद कीर्तन शुरू हुआ। खोल, झाल, वीणा, पखावज, मृदंग के साथ इनकी संगीत प्रस्तुति अद्भुत थी। कभी यह बैठकर और कभी खड़े होकर कीर्तन करते। इनकी वेशभूषा कृष्ण की थी। रात 12 बजे से शुरू हुआ वह कीर्तन सुबह तक चला। जिसमें शांता की कहानी से लेकर राधा कृष्ण की विरह गीत थे। उनके कीर्तन के दौरान और उसके साथ प्रकट होने वाले वास्तविक सहज सात्विक भावों जैसे आंसू, आनंद, कांपना, पसीना आना आदि को समझाना कठिन है।
बांग्ला भाषा में अधिकार न होते हुए वह गीत दिल को छू रहा था। वेदना के चरम तक ले जाने के लिए संगीत का जादू मैं महसूस कर रही थी। सबकी आंखें सजल थी। भीतर तक समाया दुःख फूट रहा था, रिस रहा था। मेरी ननद उसे तो होश ही नहीं था। वह दशरथ के रूप में बाबा और शांता के रूप में खुद को महसूस कर रही थी। उसके बाबा विदा ले चुके थे.. चुपचाप....

अधिक्तर परिवार में शादी के बाद लड़की के महत्व की अनदेखी की जाती है। पर इस तरह की रीति नीति और परंपरा से बेटिया कभी पराई नहीं होती। उनको पराया होना भी क्यों चाहिए। बेटियां परिवार की छाया होती है। मैं मानती हूं कि परिवार की धुरी बेटियां ही होती हैं। कीर्तन को सुनने के बाद मेरे मन में इसे जानने की जिझासा हुई कि आखिर यह कीर्तन है क्या..

संस्कृत क्रिया 'कृत' का अर्थ है प्रशंसा करना। श्रीमद्भागवत के 10वें स्कंद में भगवान के अपनी 'लीलाभूमि' वृंदावन में प्रवेश का सुंदर वर्णन है: बारहपीदं नतावरवपुः कर्णयोः कर्णिकारम
बिभ्रद्वासः कनककपिसं वैजयन्तीम च मालं
रंध्रं वेणोरधरसुधाया पूरणं गोपीवृन्दैर-
वृन्दारण्यं स्वपदरामणं प्रविसादगीताकृतिः।

अंतिम शब्द 'कृति' स्तुति को दर्शाता है और इसी से कीर्तन की उत्पत्ति हुई है। कीर्तन का पूरा कालानुक्रमिक इतिहास उपलब्ध नहीं है। उत्तर बंगाल के पहाड़पुर में सोमापुर 'बिहार' के पुराने पुरातात्विक खंडहर इस तथ्य के मूक प्रमाण हैं कि उस समय के क्षयग्रस्त बौद्ध धर्म का उस प्रांत में बहुत प्रभाव था। समय बीतने के साथ इन बौद्धों ने रहस्यमय और गुप्त अनुष्ठानों और पंथों को अपना लिया। इन पंथों के अनुयायियों का उल्लेख वैष्णव साहित्य में पासंदी के रूप में किया गया है। लगभग 1000 वर्ष पहले लुईपाद जैसे बौद्ध आचार्य कीर्तन जैसा कुछ करते थे। भिक्षु और भिक्षुणियाँ विभिन्न इलाकों में कीर्तन करते थे। चीन में कोई फोंग आयरन मंदिर, जिसका निर्माण 900 और 1280 ई. के बीच हुआ था, में बंगाल में प्रचलित कीर्तन का एक चित्र है, जो भगवान श्री चैतन्य के दिनों में किए जाने वाले कीर्तन का सटीक प्रतिरूप है।

श्री चैतन्य और नित्यानंद को संकीर्तन का रचयिता माना जाता है। कहा जाता है कि पुरी के महाराज गजपति प्रतापरुद्र ने जब संकीर्तन सुना तो अपने मुख्य दरबारी से पूछा 'यह कौन सा संगीत है?' उनके दरबारी पंडित सर्वभौम भट्टाचार्य ने समझाया कि भगवान चैतन्य ने इसे बनाया है। चैतन्य भागवत में उल्लेख है कि गया से लौटने पर भगवान श्री चैतन्य हरिनाम के पीछे पागल हो गए थे। उनके टोल, धार्मिक विद्यालय के विद्यार्थियों ने उनसे कहा कि प्रभु, हम भी आपके साथ कीर्तन करना चाहते हैं लेकिन हमें यह करना नहीं आता, कृपया हमें सिखाइए। तब भगवान चैतन्य ने हाथ की ताली के साथ गाया: हरये नमः कृष्ण यादवाय नमः, गोपाल गोविंदा राम श्री मधुसूदन। इस प्रकार भारत में संकीर्तन शुरू हुआ। उन्होंने सलाह दी कि कृष्णनाम महामंत्र है।
कीर्तन की पाँच शैलियाँ हैं: १. राजशाही के गरेरहाट परगना के खेतड़ी नामक स्थान के निवासी, एक महान वैष्णव भक्त नरोत्तमदास द्वारा प्रवर्तित कीर्तन को 'गरनहाटी' के नाम से जाना जाता है। २. ​​मनोहरसाही परगना से बर्दवान जिले में 'मनोहरसाही' आया, जिसे आचार्य श्रीनिवास ने प्रवर्तित किया और नरोत्तमदास के समकालीन ज्ञानदास, बलरामदास ने इसका प्रचार किया। ३. बर्दवान जिले के ही रानीहाटी से 'रेनेटी' आया, जिसे इसी तरह आचार्य श्रीनिवास ने प्रवर्तित किया और बाद में वैष्णवदास और उद्धवदास द्वारा लोकप्रिय बनाया गया। ४. मिदनापुर जिले के मंदारन से 'मंदारिनी' आई। ५. 'झारखंडी' झारखंड से आया।

भगवान गौरांग पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने पंद्रहवीं शताब्दी के मध्य में बंगाल, असम और उड़ीसा में संकीर्तन योग के प्रचार का बीड़ा उठाया था। 18वीं शताब्दी के मध्य तक बंगाल में कीर्तन-गायन का प्रचलन था, 19वीं शताब्दी के मध्य में जैसोर में जन्मे मधुसूदन कान नामक एक बहुत ही सिद्ध पुरुष ने राधा-कृष्ण लीला पर कई पदों की रचना की और अपने परिवार के पुरुष और महिला सदस्यों के साथ धाप गाते थे। वर्तमान समय में धाप कीर्तन के नाम से एक प्रकार का कीर्तन गाया जाता है। इसे आमतौर पर महिलाओं द्वारा गाया जाता था। श्राद्ध समारोहों के दौरान जब ब्राह्मण, पंडित, विद्वान और विशिष्ट अतिथियों को आमंत्रित किया जाता है, तो ऐसा धाप कीर्तन किसी प्रसिद्ध गायिका द्वारा गाया जाता था। समय के साथ, इन महिला गायकों का स्थान धीरे-धीरे पुरुषों ने ले लिया। बंगाल में पंचथुपी, मोइनादल, श्रीखंडा, नवद्वीप जैसी जगहें आज भी कीर्तन के लिए प्रसिद्ध हैं। नवद्वीप में हर साल फाल्गुनी पूर्णिमा पर भगवान श्री गौरांग के जन्मोत्सव पर धुलौत नामक समारोह के दौरान विभिन्न स्थानों से कीर्तन दल एकत्रित होते हैं और कीर्तन गाते हैं।

कीर्तन में एक खास विशेषता यह है कि पदावली कीर्तन गाते समय, गायक रचना की छिपी हुई सुंदरता या छिपे हुए अर्थ को स्पष्ट करने या सामने लाने के लिए, उसमें अपना अलंकरण जोड़ सकता है और आमतौर पर ऐसा करता भी है। इसे आखर कहते हैं । बंगाल में कीर्तन के कई प्रकार हैं, पाला कीर्तन, श्यामा संगीत, पार्वती और नाम कीर्तन। कीर्तन सामान्यतः खोल, झाल, वीणा, पखावज, मृदंग तथा अन्य संगीत वाद्यों के साथ गाए जाते हैं। पाला कीर्तन बंगाल का सबसे प्राचीन कीर्तन है। वे लय के साथ पद्य में लिखे गए हैं। उनमें से अधिकांश भगवान कृष्ण के जीवन-इतिहास से संबंधित हैं। वे सोलहवीं शताब्दी के दौरान रामप्रसाद, चंडीदास, विद्यापति द्वारा लिखे गए थे। पाला कीर्तन कई भागों में विभाजित है। वे हैं: बालकांड, यशोदा-गोपाल, रास लीला, गोपीविरह आदि।

वैष्णव कुछ विशेष अवसरों पर इस कीर्तन को कोरस में गाते हैं। खोल और झाल मुख्य संगत हैं। श्यामा संगीता या माँ काली का गीत शाक्तों, शक्ति के उपासकों के लिए विशेष कीर्तन है। वे शिव संगीत भी गाते हैं। पार्वती कीर्तन विभिन्न स्वरों में गाया जाता है। विशेष रूप से, इसे सुबह-सुबह भैरवी धुन में गाया जाता है। इसे प्रभात फेरी में भी गाया जाता है। आरती के दौरान, वे खोल और अन्य संगीत वाद्ययंत्रों के साथ नृत्य करते हैं और हरि बोल गाते हैं।

कीर्तन को दो शीर्षकों के अंतर्गत वर्गीकृत किया जा सकता है: १. नामकीर्तन और २. लीलाकीर्तन या रसकीर्तन। भगवान के नामों को राग में गाने को नामकीर्तन कहा जाता है। नौ प्रकार की भक्ति में मुख्य साधना नामकीर्तन है।
नामसंकीर्तन का मुख्य उद्देश्य प्रेम प्राप्त करना है और वैष्णव पंथ का मुख्य उद्देश्य इस प्रेम को उत्पन्न करना है। ऐसा कहा जाता है कि जब भगवान चैतन्य प्रेम में डूबे हुए नामसंकीर्तन करते थे तो उनके साथ हजारों लोग होते थे।
ऐसा गायन दिन और रात के समय के उपयुक्त राग और रागिनियों के अनुसार किया जाता है, जैसे सुबह के समय भैरवी, दोपहर में 'बागश्री', शाम को 'पूर्वी' या 'यमन कल्याण', रात में 'बेहग'।

नमस्कार कीर्तन में सामान्यतः भगवान का नाम गाया जाता है, जैसे, 'हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे; हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।' किन्तु चूँकि बंगाल के वैष्णव श्री चैतन्य को भगवान का अवतार मानते हैं, इसलिए वे कभी-कभी 'श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानंद, हरे कृष्ण हरे राम श्री राधे गोविंदा' या 'निताई गौर राधे श्याम, हरे कृष्ण हरे राम' गाते हैं। भगवान श्री चैतन्य और नित्यानंद ने नामसंकीर्तन द्वारा बंगाल को प्रेम से सराबोर कर दिया; इसलिए वे संकीर्तन के जनक के रूप में जाने जाते हैं। भगवान चैतन्य की शिक्षाओं में सबसे महान है: सत्ये यद् ध्यायतो विष्णुं त्रेतायं यजतो मखैः; द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद् हरिकीर्तनात्। जब मन भगवान की ओर आकृष्ट होता है, तब हृदय एक निःस्वार्थ, आनंदमय अवस्था का अनुभव करता है और इसे रति कहते हैं। जब यह रति अधिक प्रबल हो जाती है तो उसे प्रेम कहते हैं।

भगवान कृष्ण के विभिन्न समयों और विभिन्न परिस्थितियों और तरीकों से किए गए कार्यों को लीला कहते हैं। ऐसी लीला पर रचित और गाया गया कोई भी गीत लीलाकीर्तन या रसकीर्तन कहलाता है। भगवान गौरांग के अनुसार लीलारस का रसास्वादन बहुत ही घनिष्ठ लोगों के साथ करना चाहिए, जबकि हरिनाम संकीर्तन का प्रचार और अभ्यास सामान्य लोगों के बीच करना चाहिए। यदि भगवान का नाम किसी को आनंद देता है तो यह स्वाभाविक है कि भगवान के गुणों और उनकी लीलाओं का गायन भी उसे उतना ही आनंद देगा। च जो कुछ भी हृदय को आनंद से भर देता है, उसे रस कहते हैं। चूँकि भगवान के कार्यों को सुनने से हृदय आनंद में लीन हो जाता है, इसलिए लीला कीर्तन को रसकीर्तन भी कहा जाता है।

कीर्तन में 64 प्रकार के रस होते हैं। आमतौर पर ज्ञात नौ रसों के अलावा भक्तों द्वारा स्वीकार किए गए पाँच प्राथमिक रस हैं। ये पाँच हैं: १. संता (संतुलन), २. दास्य (सेवा), ३. सख्य (घनिष्ठता, मित्रता), ४. वात्सल्य (पुत्रवत स्नेह) और ५. माधुर्य (प्रेम, सौम्य)। इनमें से पहला योगियों के लिए अधिक उपयुक्त है और शेष चार स्वाद और प्रवृत्ति के अनुसार भक्तों को बहुत प्रिय हैं। मुख्यतः पदावली भगवान कृष्ण की लीला पर आधारित हैं। उनके भजन पहले से ही प्रचलन में थे, लेकिन भगवान श्री चैतन्य ने कृष्ण लीला को उच्च स्थान दिया। वास्तविक कीर्तन में कृष्ण लीला से पहले गौरचंद्रिका का गायन किया जाता है।

कीर्तन गायक को न केवल एक अच्छा संगीतकार होना चाहिए, बल्कि उसे विद्वान भी होना चाहिए, अन्यथा लीला में अनुपयुक्त रसों को मिला सकता है।बंगाली संकीर्तन की सामूहिक गायन की इस तरह की शैली और व्यापकता में गायक और श्रोता दोनों अपने गालों पर बहते आंसुओं के साथ भगवान को पुकारते हैं ऐसे उदाहरण भारतीय संगीत को छोड़कर अन्यत्र दुर्लभ हैं।

वैष्णव साहित्य में पदावली का स्थान बहुत ऊँचा है, जो भगवान कृष्ण की लीलाओं से संबंधित काव्य और गीतों का मिश्रण है। ये पदावली आमतौर पर वैष्णव भक्तों और संत पुरुषों जैसे जयदेव, चंडीदास, विद्यापति, ज्ञानदास, गोविंददास और अन्य द्वारा रचित हैं। वर्तमान युग में रवींद्रनाथ टैगोर, शिशिर कुमार घोष ने भी सुंदर पदावली का उपहार दिया है; पदावली की उत्कृष्टता और उदात्तता मन को वास्तविक भाव से जोड़ने की उनकी शक्ति में निहित है जो काव्य, छंद, लय या सुर से परे है। यदि साहित्यिक दृष्टि से देखा जाए तो पदावली गीत हैं, संगीत की दृष्टि से कीर्तन हैं और आध्यात्मिक मानक से ये भगवान के भजन हैं। महाराष्ट्र के संत तुकाराम ने अपने एक अभंग में आकर्षक ढंग से कहा है कि जैसे जाह्नवी (गंगा) का पवित्र जल भगवान के चरणों से नश्वर संसार में आया है, वैसे ही कीर्तन का प्रवाह मनुष्यों के हृदय से निकलकर भगवान के चरणों तक पहुँचता है। ये दोनों प्रवाह पवित्र करने वाले हैं।


गुरुवार, 8 अगस्त 2024

वारली कला में जीवन और फैशन साथ साथ हैं- डॉ अनुजा भट्ट


लाल गेरू रंग की दीवारों पर सफेद रंग से चित्रित साधारण वारली आकृतियाँ अप्रशिक्षित आँखों को कुछ खास नहीं लग सकती हैं। लेकिन करीब से देखने पर आपको पता चलेगा कि वारली में आँखों से दिखने वाली चीज़ों से कहीं अधिक है। यह केवल एक कला रूप नहीं है, बल्कि महाराष्ट्र और गुजरात की सीमाओं के आसपास के पहाड़ों और तटीय क्षेत्रों से वारली (वरली) जनजातियों के लिए जीवन का एक तरीका है। लगभग 3000 ईसा पूर्व उत्पन्न इस कला रूप में एक रहस्यमय आकर्षण है। अन्य रोजमर्रा की गतिविधियों के जटिल ज्यामितीय पैटर्न फैशन डिजाइनरों और घरेलू सजावट ब्रांडों के बीच काफी लोकप्रिय हैं जिसमें तरह तरह के फूल, शादी की रस्में, शिकार के दृश्य शामिल हैं। गुजरात और महाराष्ट्र राज्यों के लोगों के मन में निश्चित रूप से इस कला के प्रति भावनात्मक लगाव है । उन्हाेंने इसे आघुनिक जीवन शैली के उत्पादों पर लोकप्रिय होने से बहुत पहले ही ग्रामीण स्कूलों और घरों की दीवारों सजाना शुरू कर दिया था। सरल, फिर भी खूबसूरती से नाजुक पैटर्न आधुनिक कला का आधार बने।

बेहद खूबसूरत

यह जनजाति पेंटिंग के लिए चावल के पेस्ट, पानी और गोंद जैसे बुनियादी सामग्रियों का इस्तेमाल करती रही है, जो सफेद रंग के लिए इस्तेमाल की जाती है । बांस की एक लकड़ी को रेशेदार बनाकर ब्रश के रूप में प्रयाेग किया जाता है। यह सरल आकर्षण ही है जिसने अनीता डोंगरे और जेम्स फेरेरा जैसे डिजाइनरों को अपने संग्रह में इन चित्रों का उपयोग करने के लिए आकर्षित किया है। सेल फोन, स्माइली और इमोटिकॉन्स के युग से बहुत पहले आविष्कार की गई, वारली पेंटिंग न केवल अपने देहाती आकर्षण के कारण आपके दिल को छूती हैं, बल्कि वे एक ज्वलंत कहानी भी बताती हैं। इस प्राचीन कला का आकर्षण ऐसा है कि आज यह कई होटलों की लॉबी और कमरों को भी गर्व से सजाती है। इन चित्रों में कुछ ऐसा है जो हमें कला के पीछे के समय और भावना में वापस ले जाता है - चाहे वह अंतिम संस्कार का दृश्य हो या आदिवासी देवताओं की पूजा करने का कार्य। आज, वारली कला न केवल बैंगलोर, चेन्नई और दिल्ली जैसे महानगरों में लोकप्रिय है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लोकप्रिय है।

रोज़मर्रा की ज़िंदगी में वारली

कला प्रेमी जब अपनी जड़ों की ओर वापसी करते हैं तो जीवन के हर हिस्से में गर्व के साथ वारली रूपांकनों का प्रदर्शन करते हैं। परंपरागत रूप से, यह पेंटिंग लाल गेरू की पृष्ठभूमि पर सफ़ेद रंग से की जाती है और ये दो ही रंग इस्तेमाल किए जाते हैं। लेकिन, आजकल, कपड़ों, घर की सजावट या अन्य कलात्मक रूपों पर इन कलात्मक रूपांकनों को दोहराने के लिए कई तरह के रंगों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

इस कला से प्रेरणा लेने वाले सभी लोगों की जीवनशैली में यह इस कदर छायी हुई है कि हम सब इसकी समृद्धि से मोहित है। चमकीले रंग के छाते से लेकर कॉफी मग और चाय के कप, देहाती दीवार घड़ियाँ, दीवारों के लिए सजावट और स्टेशनरी तक - वारली लगभग हर जगह है और यह यहीं नहीं रुकता। वारली की कला हर भारतीय फैशन डिजाइनर की नई पसंदीदा है। रंग-बिरंगे स्कार्फ और कुर्तियों के बॉर्डर को सजाने से लेकर शानदार जूट और रेशम की साड़ियों को सजाने तक, वारली ने रैंप पर हमेशा के लिए अपना दबदबा बना लिया है।

सिर्फ़ कला ही नहीं

वारली कला कुछ हद तक हमें पर्यावरण के प्रति जागरूक होने और जीवन की सरल चीज़ों में आनंद खोजने के बारे में सोचने पर मजबूर करती है। वारली लोग काफ़ी सरल जीवन जीते हैं। पहले, वे प्रकृति की पूजा करते थे और भोजन और रोज़मर्रा की ज़िंदगी के लिए प्रकृति पर निर्भर रहते थे। वे प्रकृति को नुकसान पहुँचाने या ज़रूरत से ज़्यादा लेने में विश्वास नहीं करते थे। वारली लोग प्रकृति और मनुष्य के बीच सामंजस्य में विश्वास करते हैं और ये विश्वास अक्सर उनकी पेंटिंग में झलकता है।

यह विचारधारा आज हमारे जीवन के लिए भी सही है। बहुत से शहरी लोग अब जहाँ तक संभव हो तकनीक से दूर रहकर, स्वच्छ भोजन करके, हथकरघा अपनाकर और प्राचीन रीति-रिवाजों और परंपराओं के पीछे के विज्ञान को करीब से देखकर एक न्यूनतम जीवन शैली अपना रहे हैं। इसलिए, यह बहुत आश्चर्य की बात नहीं है कि वारली जैसी पारंपरिक कलाएँ हमारे समाज में वापस आ रही हैं और हमें जीवन के सरल सुखों की याद दिला रही हैं। जनजातियों ने ज्ञान प्रदान करने के लिए वारली चित्रकला का भी उपयोग किया है। आज, यह चित्रकला के अन्य रूपों के बीच ऊँचा स्थान रखती है, जिसमें जिव्या माशे और उनके बेटे बालू और सदाशिव जैसे महाराष्ट्रीयन कलाकार इस कला रूप को जीवित रखने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। वास्तव में, माशे को इस कला रूप को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाने के लिए 2011 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया था।
हालांकि लोकप्रिय रूप से स्टिक फिगर के रूप में जाना जाता है, यह ध्यान रखना दिलचस्प होगा कि वारली पेंटिंग में कोई सीधी रेखा का उपयोग नहीं किया जाता है। वे आम तौर पर टेढ़ी-मेढ़ी रेखाएँ, बिंदु, वृत्त और त्रिकोण होते हैं। मानव और पशु शरीर को दो त्रिभुजों द्वारा दर्शाया जाता है जो सिरे पर जुड़े होते हैं। उनका अनिश्चित संतुलन ब्रह्मांड के संतुलन का प्रतीक है, अनिवार्य रूप से अनुष्ठानिक, वारली पेंटिंग आमतौर पर विवाहित महिलाओं द्वारा शादी का जश्न मनाने के लिए बनाई जाती थीं। हालाँकि इनमें से बहुत सी पेंटिंग प्रजनन और समृद्धि से जुड़े अनुष्ठानों पर आधारित हैं, लेकिन उनमें हमेशा यथार्थवाद का स्पर्श होता है। चित्रों का उपयोग वारली जनजातियों की झोपड़ियों को सजाने के लिए भी किया जाता था, जो आमतौर पर गाय के गोबर और लाल मिट्टी के मिश्रण से बनाई जाती थीं।

दिलचस्प बात यह है कि इन चित्रों का केंद्रीय रूपांकन शिकार, मछली पकड़ने और खेती, त्योहारों और नृत्यों, पेड़ों और जानवरों के दृश्यों को चित्रित करता है। अनुष्ठानिक चित्रों के अलावा, अन्य वारली चित्र गांव के लोगों की दिन-प्रतिदिन की गतिविधियों को चित्रित करते हैं। अधिकांश वारली चित्रों के महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक "तरपा नृत्य" है - तारपा एक तुरही जैसा वाद्य यंत्र है, जिसे अलग-अलग पुरुषों द्वारा बारी-बारी से बजाया जाता है। जब संगीत बजता है, तो पुरुष और महिलाएं अपने हाथ मिलाते हैं और तारपा वादकों के चारों ओर घेरा बनाकर घूमते हैं। नर्तकियों का यह चक्र जीवन चक्र का भी प्रतीक है। हममें से कई लोग सोच सकते हैं कि एक कला रूप को लेकर इतना हंगामा क्यों है जो खुद को दो रंगों तक सीमित रखता है। लेकिन यह क्लासिक सादगी ही है जो इस कला को अव्यवस्था से अलग करती है।

कला को जीवित रखना

जबकि इस डिजिटल युग में इस तरह की कलाओं का अस्तित्व बचा पाना मुश्किल हो रहा है, कुछ विचारशील लोग परंपरा को जीवित रखने के लिए अपना योगदान दे रहे हैं। ऐसा ही एक प्रेरक स्थल ठाणे जिले का गोवर्धन इको विलेज है जो वारली कलाकारों को अपनी कला प्रदर्शित करने के लिए विभिन्न मंच प्रदान करके इस कला को जीवित रखने का प्रयास करता है।

फरवरी 2016 में, जापानी कलाकारों के एक समूह ने कला को जीवित रखने के प्रयास में पालघर जिले के गंजद गाँव को गोद लिया। जापान के सामाजिक कलाकारों का यह समूह दीवारों पर पेंटिंग को बढ़ावा देने के लिए गाय के गोबर, मिट्टी और बांस की छड़ियों से झोपड़ियाँ भी बना रहा है। दहानू एक और गाँव है जो वारली कला को जीवित रखने में कामयाब रहा है। अतिशयता की दुनिया में, सादगी एक दुर्लभ वस्तु है और यह कला रूप उस विश्वास को जीवित रखता है।

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शुक्रवार, 2 अगस्त 2024

शिवरात्रि शिवजी और उनकी सवारी की कहानी- डॉ अनुजा भट्ट

नंदी की कहानी

शिव के एक गण का नाम है नंदी। जिस तरह गायों में कामधेनु श्रेष्ठ है उसी तरह बैलों में नंदी श्रेष्ठ है। आमतौर पर खामोश रहने वाले बैल का चरित्र उत्तम और समर्पण भाव वाला बताया गया है। इसके अलावा वह बल और शक्ति का भी प्रतीक है। बैल को मोह-माया और भौतिक इच्छाओं से परे रहने वाला प्राणी भी माना जाता है। यह सीधा-साधा प्राणी जब क्रोधित होता है तो सिंह से भी भिड़ लेता है। यही सभी कारण रहे हैं जिसके कारण भगवान शिव ने बैल को अपना वाहन बनाया।

पौराणिक कथा अनुसार शिलाद ऋषि ने शिव की तपस्या के बाद नंदी को पुत्र रूप में पाया था। नंदी को उन्हों वेदादि ज्ञान सहित अन्य ज्ञान भी प्रदान किया। एक दिन शिलाद ऋषि के आश्रम में मित्र और वरुण नाम के दो दिव्य संत पधारे और नंदी ने पिता की आज्ञा से उनकी खूब सेवा की। जब वे जाने लगे तो उन्होंने ऋषि को तो लंबी उम्र और खुशहाल जीवन का आशीर्वाद दिया लेकिन नंदी को नहीं। तब शिलाद ऋषि ने उनसे पूछा कि उन्होंने नंदी को आशीर्वाद क्यों नहीं दिया?

तब संतों ने कहा कि नंदी अल्पायु है। यह सुनकर शिलाद ऋषि चिंतित हो गए। पिता की चिंता को नंदी ने भांप कर पूछा क्या बात है तो पिता ने कहा कि तुम्हारी अल्पायु के बारे में संत कह गए हैं इसीलिए चिंतित हूं। यह सुनकर नंदी हंसने लगा और कहने लगा कि आपने मुझे भगवान शिव की कृपा से पाया है तो मेरी उम्र की रक्षा भी वहीं करेंगे आप क्यों नाहक चिंता करते हैं। इतना कहते ही नंदी भुवन नदी के किनारे शिव की तपस्या करने के लिए चले गए। कठोर तप के बाद शिवजी प्रकट हुए और कहा वरदान मांगों वत्स। तब नंदी के कहा कि मैं ताउम्र आपके सानिध्य में रहना चाहता हूं।

नंदी के समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने नंदी को पहले अपने गले लगाया और उन्हें बैल का चेहरा देकर उन्हें अपने वाहन, अपना दोस्त, अपने गणों में सर्वोत्तम के रूप में स्वीकार कर लिया। भगवान शिव के हर मदिर में नंदी जी विराजमान हैं। ऐसा कहा जाता है कि जहां नंदी नहीं होते हैं वहां शिव जी का निवास भी नहीं होता है। वहीं, जब भी हम दर्शन करने के लिए शिवालय जाते हैं तो नंदी की प्रतिमा के कान में अपनी मनोकामना जरूर कहते हैं। यह सदियों से चली आ रही मान्यता भी है और साथ ही, भगवान शिव द्वारा दिया गया नंदी जी को एक वरदान भी, लेकिन क्या आपको पता है कि नंदी के कौन से कान में कहनी चाहिए अपनी इच्छा। भगवान शिव ने नंदी जी को जो वरदान दिया था उसके अनुसार, अगर शिव पूजन करने के बाद मौन रखते हुए नंदी के पास जाकर उनके बाएं कान में जो व्यक्ति अपनी इच्छा कहेगा वह अवश्य पूरी होगी।

चूंकि पवित्र बैल भगवान शिव का वाहन और द्वारपाल है, इसलिए उन्हें उनके मंदिरों में एक मूर्ति के रूप में रखा जाता है। आमतौर पर, आप उन्हें अपने अंगों को मोड़कर बैठे हुए देखेंगे।नंदी ने धर्म रुपी दाहिने पैर को बाहर रखा है। अर्थात धर्म के महत्व को दर्शाता है। जबकि काम और मोक्ष रूपी पैर को अंदर रखते हुए यह संदेश दिया है कि धर्म का जीवन में महत्वपूर्ण स्थान होना चाहिए।  वह घंटी के साथ एक हार पहनता है और रंग में या तो काला या सफेद होता है।  मुकुट और मालाएं उनके सुंदर परिधान और गहनों को सुशोभित करती हैं। 

देवी पार्वती ने नंदी को श्राप दिया था, लेकिन क्यों?
 एक बार, भगवान शिव और देवी पार्वती कैलाश पर्वत पर पासा का खेल खेल रहे थे। अनुमान लगाइए कि अंपायर कौन था? कोई और नहीं बल्कि नंदी। भले ही देवी ने खेल जीत लिया, लेकिन उन्होंने भगवान शिव को विजेता घोषित कर दिया। इससे देवी पार्वती क्रोधित हो गईं और उन्होंने उसे श्राप दे दिया। नंदी ने अनुरोध किया कि श्राप हटा लिया जाए, यह दावा करते हुए कि उसके कार्य भगवान के प्रति उसके प्रेम से प्रेरित थे। फिर उसने कहा कि नंदी श्राप से मुक्त हो सकता है यदि वह अपने पुत्र, भगवान गणेश की उनके जन्मदिन पर पूजा करे। पवित्र हिंदू महीने भाद्रपद की चतुर्दशी को नंदी ने भगवान गणेश की पूजा की और प्रायश्चित के रूप में उन्हें हरी दूब भेंट की। तब से,अधिकांश भक्त हर साल गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश को हरी दूब का प्रसाद चढ़ाते हैं।
आप अपने घर पर छोटे शिवलिंग के साथ नन्हा नंदी भी रख सकते हैं उनकी पूजा कर सकते हैं।
 आपको यह कहानी कैसी लगी ....

  






मंगलवार, 30 जुलाई 2024

कविता-दहलीज पर कदमों का क्रास-डॉ अनुजा भट्ट



दहलीज पर कदमाें का क्रास
एक पांव दहलीज के बाहर जा रहा है
सपनाें की उड़ान और कशमकश के बीच
आसमान में उड़ती पतंग काे देख रही 
हाथ में डोर लिए एक।
 युवा और किशाेराें के बीच स्वतंत्रता दिवस की परेड
खुद काे रील बनते देख बेबस है
उधर माझा और पतंग
चीन और भारत
उम्मीद और हादसा में बदल रहा है। 
 इस बीच यह कविता लिखी जा रही है।
 दूसरा  पांव दहलीज के भीतर आ रहा है
अपने भीतक दर्द और बेबसी के छींटे लिए 
 अपनी जिद और शर्ताें के बीच
समन्वयविहीन रिक्त स्थान की तलाश में
 वक्त कहता है 
 अब इस रिक्तता काे
 मन के कोने में
 मंदिर के दिये में
 ईश्वर को अर्पित पुष्प में
गरीब की झोली में
 आंखों में काजल की जगह बसा लाे।
दाेनाे पांव आपस में टकरा रहे हैं
दाेनाे पांव अपनी यात्रा में डगमग हैं
दाेनाें की साेच में जमीन आसमान का अंतर है
एक के लिए मुखर हाेना
 असंसदीय और अमानवीय भाषा है
दूसरे के लिए विश्वधरती पर सृजित 
एक नई स्त्री का आगमन है।
एक कदम और दूसरा कदम
कदमताल मिलाती पंद्रह अगस्त की उस झांकी से
 जा मिला है जहां यह दाेनाें की  निर्थक हैं।
रील में तो हैं रियल में नहीं।


सोमवार, 29 जुलाई 2024

घर के सजाने के मेरे 5 मंत्र – डॉ. अनुजा भट्ट

घर सजाने के 5 मेरे मंत्र

मैं चाहती हूं मेरा घर मुझे हमेशा जीवंतता का अहसास कराएं। मैं खुद को प्रकृति के नजदीक रखना पसंद करती हूं। बहुत बार ये कर पाती हूं और बहुत बार असफल भी हो जाती हूं। पौधें सूख जाते हैं तो अच्छा नहीं लगता। इस बार इतनी गर्मी पड़ी कि मेरे लगाए पौधें सूख गए। फिर मैंने कुछ और प्रयोग किए।

आज जब ट्रेंड सेटर्स कहते हैं कि घर के अंदरूनी हिस्सों में फूलों की सजावट की वापसी हो रही है, तब मुझे हंसी आती है। मैं मानती हूं कि फूलों की सजावट कभी खत्म नहीं हुई या इसका आकर्षण कभी खत्म नहीं हुआ। समय-समय पर, फूलों ने घर की जगहों को जीवंत करने और उनमें नई जान डालने का मार्ग प्रशस्त किया है। चाहे वह एकल फूलों के गुच्छे हों, या अलग अलग फूलों के गुच्छे आपके घर को ताज़गी और नए रूप से सजाने के लिए उनके साथ बहुत कुछ कर सकते हैं।

अगर आपके पास ताजे फूल नहीं हैं ते आप घर की सजावट के लिए फ्लोरल प्रिंट और पैटर्न का इस्तेमाल कर सकती हैं। विंटेज फ्लोरल का आकर्षण अभी भी एक क्लासिक है और उन लोगों के बीच पसंदीदा है जो मिनिमलिस्टिक सजावट पसंद करते हैं। नए जमाने के, समकालीन फ्लोरल डेकोर में प्रिंट, मिक्स-मैच पैटर्न, शामिल है। मैं आपको यहाँ अपने रूचि और व्यक्तिगत शैली के अनुसार फ्लोरल प्रिंट से सजाने के पाँच शानदार तरीके बता रही हूं, ताकि आप अपने इंटीरियर को नए फ्लोरल मोटिफ, असंख्य रंगों और लुभावने प्रकृति-प्रेरित पैटर्न से सजा सकें।

1. फ्लोरल वॉलपेपर और वॉल आर्ट- फ्लोरल प्रिंट से किसी भी दीवार को नया रूप दिया जा सकता है। अगर आप विंटेज लुक की तलाश में हैं, तो आप अपनी दीवार के फ्लोरल प्रिंट वॉलपेपर का विकल्प चुन सकते हैं। आपके बिस्तर की पिछली दीवार फ्लोरल वॉलपेपर या फ्लोरल वॉल आर्ट के लिए आदर्श है। और, लिविंग स्पेस के लिए, आप अपनी पसंद और मूड के अनुसार कोने की दीवार या बीच की दीवार चुन सकते हैं। हालाँकि, जब आप फ्लोरल वॉलपेपर या वॉल आर्ट के लिए जा रहे हों, तो आपके द्वारा चुने गए रंग और पैटर्न आपके घर की सजावट और व्यक्तिगत पसंद के अनुरूप होने चाहिए। इसलिए, अगर आप गहरे रंग पसंद करने वाले व्यक्ति हैं, तो आप गहरे रंगों में बोल्ड फ्लोरल प्रिंट चुन सकते हैं। लेकिन, अगर आप मिनिमलिज्म में ज़्यादा रुचि रखते हैं, तो पेस्टल शेड्स ज़्यादा उपयुक्त रहेंगे।

2. फ्लोरल फर्निशिंग- फ्लोरल डेकोरेशन आइडियाज़ में, सबसे आसान और सुपर-किफ़ायती तरीका है फर्निशिंग। अगर आप फ्लोरल बेडरूम डेकोर के लिए जा रहे हैं, तो हैंड ब्लॉक प्रिंटेड फ्लोरल बेडशीट क्लासिक हैं जिन्हें आप बिल्कुल भी मिस नहीं कर सकते। आप रजाई, दोहर और दूसरे फ्लोरल लिनेन के साथ फ्लोरल टच को बढ़ा सकते हैं। लिविंग रूम और दूसरी जगहों के लिए, आप फ्लोरल कुशन कवर, टेबल रनर और मैट के साथ प्रयोग कर सकते हैं और यहां तक ​​कि अपने सोफ़ा सिटिंग एरिया में फ्लोरल रग का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। याद रहे फ्लोरल प्रिंट के प्रकार और आकार का चयन करते समय अपनी व्यक्तिगत पसंद न भूलें।

3. फ्लोरल फिक्सचर- अगर आप फ्लोरल प्रिंट और पैटर्न के साथ अपने घर की सजावट चाहते हैं, तो अपने अपहोल्स्ट्री, पर्दों और ब्लाइंड्स में फूलों की खूबसूरती को शामिल करने के कुछ तरीके बताती हूं। समकालीन आधुनिक फ्लोरल प्रिंट और पैटर्न के साथ, फ्लोरल सोफा सेट, डाइनिंग टेबल चेयर और पर्दों में बहुत सारे विकल्प उपलब्ध हैं। हालाँकि, यह फ्लोरल में एक स्थायी और दीर्घकालिक निवेश है, इसलिए आपको कुछ महत्वपूर्ण बातों को ध्यान में रखना चाहिए जैसे कि आप किस तरह के फ्लोरल प्रिंट का उपयोग करना चाहते हैं, कपड़े की स्थायित्व और अनुभव, रंग संयोजन आदि के बारे में गंभीरता से विचार करें।

4. फ्लोरल एक्सेसरीज़- छोटे-छोटे डेकोरेशन जिसमें फ्लोरल प्रिंट हो उनसे भी आप सजावट कर सकती हैं। उदाहरण के लिए, दीवार पर कुछ फूलों की पेंटिंग लगाने से फूलों को महसूस कर सकते हैं, लेकिन यह नियम हर जगह फिट नहीं होता। फूलों की लाइटिंग एक और एक्सेसरी है जो आपके घर की सजावट में एक नाजुक स्पर्श जोड़ देगी और आपके स्थान को जीवंत बना देगी। फूलों की टेबल एक्सेसरीज, मेटल आर्ट आइटम, मिरर, आदि, आपके लिविंग स्पेस में विंटेज फ्लोरल या कंटेम्पररी फ्लोरल एलिगेंस की सही मात्रा जोड़ सकते हैं।

5. कुछ असली फूलों को शामिल करें। अब, फूलों के साथ काम करने का सबसे आसान और ताज़ा तरीका है प्राकृतिक तरीके से काम करना। मेरा कहना है कि आपको केवल फूलों के प्रिंट और पैटर्न की आवश्यकता क्यों है, जब आप उन्हें असली में पा सकते हैं। है न? अपने घर की सजावट में अधिक पौधे शामिल करें और देखें कि यह आपके माहौल को जीवंत बनाने में कितना कमाल करते हैं। यह न केवल आपके घर को ताज़गी प्रदान करते हैं बल्कि इनडोर पौधे हवा को शुद्ध करने, मूड को आराम देने और तनाव को दूर करने का काम भी कर सकते हैं। कुछ इनडोर पौधों के अलावा, आप अपनी बालकनी, बगीचे या छत के बगीचे में कई तरह के फूल खिलने वाले पौधे भी लगा सकती हैं। मेरा विश्वास करें, वे आपके घर की शैली और आपके माहौल को और भी बेहतर बना देंगें। जीवन में निरंतर प्रयोग करें। मेरी आपको सलाह है घर की सजावट में चाहे वह फ्लोरल हो या कुछ और भी, नई चीजों को आजमाने से न डरें। आपको मेरा ब्लाद कैसा लगा यह जरूर बताइएगा। हमारे प्रोडक्ट के लिए हमारे फेसबुक समूह से भी जुड़िए। वहां ढेरों विकल्प आपका इंतजार कर रहे हैं।

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रविवार, 28 जुलाई 2024

नील छवि एक रिश्ता दर्द भरा- महाश्वेता देवी- समीक्षा डॉ अनुजा भट्ट

सुप्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी जी की पुण्य तिथि पर                                  जी पुण्यतिथि

महाश्वेता देवी का उपन्यास नील छवि आज के समाज की विसंगति को दर्शाता है । इस विसंगति की मुख्य वजह है ऐसी महत्वाकांक्षा जिसे बिना पैसे के हासिल किया जा सके और उसके लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहा जाए। ऐसी महत्वाकांक्षी लोग फिर न रिश्तों को देखते हैं और न ही व्यक्ति की संवेदना को। सिर्फ पैसों की खनक सुनाई देती है और जब यह पैसों की खनक न सुनाई दे तो सारे रिश्ते खतम हो जाते है। नील छवि में ऐसी दो विचारधाराएं हैं। एक के लिए रिश्तों का अर्थ है और वह उनको बनाए रखने के लिए कुछ भी कर सकता है और दूसरी विचारधारा में पैसे के लिए किसी से भी कभी भी रिश्ता जोड़ा या तोड़ा जा सकता है। महत्वाकांक्षा के लिए स्त्री किसी भी हद तक जाती है तो अपनी पहचान को बनाने के लिए जोखिम भरे काम को करने वाला पुरुष भी है। इन दोनों के बीच में संतान है जिसका किसी भी तरह का कोई भी संस्कार विकसित नहीं हो पाता और वह दिशाविहीन जीवन की ओर कदम बढ़ाते बढ़ाते लडख़ड़ाने लगती है और एक दिन गायब हो जाती है। तब जाकर स्त्री पुरूष यानी उसके माता पिता को अहसास होता है।
पुरूष स्वाबलंबी है पर महत्वाकांक्षी नहीं पर समाज के लोग उसे महच्वाकांक्षी बनाने पर तुले है और उसके बहाने कई तरह के व्यापार कर रहे हैं। लेकिन वह हमेशा हाशिए में खड़े लोगों की मदद करता है चाहे वह कोई भी क्यों न हों। उसका स्वभाव खोजी है और वह हर रोज कुछ नया खोजने के लिए कई तरह की सुरंगों से गुजरता है। पर जब खोजी पत्रकारिता के जरिए वह अपनी बेटी को ढूंढ रहा होता है जो ब्लू फिल्म बनाने वाले गिरोह में फंस गई है तब वह सवाल करता है कि हम सब अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए या अपने सपनों को पूरा करने की जिद में अपने बच्चों से कितने दूर हो गए है हमारे पास उनके लिए समय नहीं है और वह भटक रहे हैं। हम उनको पैसा दे रहे हैं उनके मंहगे शौक पूरे कर रहे हैं, उनको पूरी आजादी दे रहे हैं पर क्या परवरिश का यह तरीका ठीक है?
कहानी के ताने बाने इतने सघन है कि पढ़ते हुए लगता है जैसे आप कोई फिल्म देख रहे हैं। कहीं भी लोच नहीं एकदम कसी हुई कहानी।
यर्थाथवादी और भावुकतावादी दो व्यक्तित्व जब मिलते हैं तो किस तरह का जीवन होता है यह इस उपन्यास को पढक़र जाना जा सकता है जहां एक व्यक्ति रिश्तों को असहमति के बाद भी महसूस करता है और दूसरा व्यक्ति रिश्ते का अर्थ समझ ही नहीं पाता और जब समझ आती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। संतान के लिए माता पिता दोनो के कर्तव्य हैं पर कानून संतान को मां के हवाले करता है और पिता संतान से दूर हो जाती है। रह जाती है सिर्फ मां । ऐसे में पिता अपनी भावनात्मक मजबूती को कैसे बनाए यह सवाल भी बड़ी शिद्दत के साथ उठाया गया है। क्या पिता का अपनी संतान पर कोई हक नहीं कि वह उसकी परवरिश के बारे में सोचे। इस उपन्यास में पिता अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करता है और अपनी जान को जोखिम में डालकर अपनी बेटी को उस गिरोह से निकाल लाता है। वह अपनी बेटी की सुरक्षा, उसकी भावनाओं के लिए इतना ज्यादा संवेदनशील है कि वह वहां से सारी सीडी भी लेकर आता है जिसमें उसकी बेटी है। वह अपनी पत्नी से किसी से भी इन बातों का जिक्र करने से मना करता है। घर के मान, बेटी की इज्जत की उसको परवाह है। वह उसे मुख्यधारा में लाने की कोशिश करता है उसका इलाज करवाता है। उससे मुक्त नहीं होना चाहता। वह अपनी बेटी से नाराज नहीं बल्कि उसे ग्लानि है कि उसके कदम अगर बहके तो उसके लिए यह समाज जिम्मेदार है जो भौतिकतावादी रहन सहन को महत्व देता है जहां भावनाओं का नहीं पैसे का असर है। इसकी वजह से उसकी पत्नी प्रभावित हुई और उसे लगा कि पैसा ही सबकुछ है। इसके लिए उसने अपने पति को छोड़ दिया। जिन लोगों का साथ उसने चुना उन्हीं लोगों ने उसकी बेटी को अपना निशाना बनाया। वह यह सब समझ नहीं पाई क्योंकि उसे बस पैसे कमाने थे। उसने बहुत पैसे कमाएं। बेटी को उसने बहुत सारे पैसे दिए पर समय नहीं। इच्छाएं उसके मन में भरी पर प्रेम नहीं। इसी प्रेम की तलाश में उसकी संतान भटक गई।
यह उपन्यास वस्तुतः हमारे आधुनिक नगरीय समाज की खोखली होती नैतिक मान्यताओं और बीभत्स स्थितियों का बड़ा ही मार्मिक चित्रण प्रस्तुत करता है। ‘ड्रग्स’ और ‘ब्लू फ़िल्म’ किस तरह हमारे आधुनिक समाज की जड़ों को खोखला कर रहे हैं, इसका बेहद तीखा और यथार्थपरक चित्रण इस रचना में किया गया है। इसके अलावा पत्रकारिता, कला-जगत, और तथाकथित उच्चवर्गीय जीवन की विषमताओं और विडम्बनाओं का साक्षात्कार है ।
कथा में उत्तेजना, जिज्ञासा और आतंक का वातावरण अन्तिम पृष्ठ तक व्याप्त रहता है। एक अत्यन्त पठनीय, रोचक तथा विचारोत्तेजक कृति। आपको मौका लगे तो इस उपन्यास को जरूर पढ़ें।
नील छवि
महाश्वेता देवी राधाकृष्ण प्रकाशन

शुक्रवार, 26 जुलाई 2024

साड़ी का भी ख्याल रखिए- डा. अनुजा भट्ट


बहुत बार हम मंहगी साड़ी खरीद लेते हैं पर उसके रखरखाव के बारे में नहीं जानते इस कारण साड़ी खराब भी हाे जाती है और उससे ज्यादा हमारी भावनाएं आहत हाेती है। साड़ी के साथ महिलाओं का गहरा लगाव हाेता है। इसलिए मैंने साेचा कि आपसे इस बारे में थाेड़ी बातचीत की जाए। हमारे पास ऐसे प्राेडक्ट है जाे आपकी उलझन सुलझा सकते हैं।
साड़ी की गुणवत्ता बनाए रखना उसकी लंबी इम्र सुनिश्चित करने और जटिल डिज़ाइन को संरक्षित करने के लिए महत्वपूर्ण है।
1. साड़ी को हाथ से धोएं:साड़ियों को हल्के डिटर्जेंट और ठंडे पानी का उपयोग करके हाथ से धोना चाहिए। गर्म पानी या कठोर डिटर्जेंट का उपयोग करने से बचें क्योंकि वे कपड़े और डिज़ाइन को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

2. साड़ी को बहुत अधिक देर तक भिगोकर न रखें क्योंकि इससे उसका रंग उड़ सकता है और वह फीकी पड़ सकती है।

3. सीधी धूप से बचाएं: साड़ियों को छाया में सुखाना चाहिए और सीधी धूप से दूर रखना चाहिए क्योंकि धूप के संपर्क में आने से रंग फीका पड़ सकता है।

4. कम तापमान पर इस्त्री करें: साड़ी को कम तापमान पर इस्त्री करें ताकि कपड़े और डिज़ाइन को नुकसान न पहुंचे। डिज़ाइन पर सीधे इस्त्री करने से बचें क्योंकि इससे वे फट सकते हैं या छिल सकते हैं।

5. साड़ी को सही तरीके से स्टोर करें: साड़ी को ठंडी, सूखी जगह पर सीधी धूप से दूर रखें। साड़ी को प्लास्टिक की थैलियों में रखने से बचें क्योंकि वे कपड़े को सांस लेने नहीं देती हैं। इसके बजाय, साड़ी को सूती या मलमल के बैग में रखें।

6. साड़ी को सावधानी से संभालें: कलमकारी साड़ियों को सावधानी से संभालना चाहिए क्योंकि डिज़ाइन नाज़ुक होते हैं और आसानी से खराब हो सकते हैं। साड़ी पहनते समय उसे खींचने या खींचने से बचें।

हमारे पास आर्गनाइजर हैं आप खरीद सकते हैं। विवरण इस प्रकार है-
CM में आयाम: - लंबाई (45) x चौड़ाई (35) x ऊंचाई (18) CM | इंच में आयाम: लंबाई (17.71) x चौड़ाई (13.77) x ऊंचाई (7.08) इंच
पैकेज में शामिल: 4 बड़े साड़ी कवर; मटीरियल: कॉटन हवा पार होने योग्य फ़ैब्रिक.
क्लियर विजिबिलिटी और इंस्टेंट लुक के लिए पारदर्शी फ्रंट विंडो.
लंबे जीवन उच्च गुणवत्ता वाली साड़ी कवर बैग आपकी महंगी और पसंदीदा साड़ियों को व्यवस्थित करने में मदद करता है।
धूल, नमी और पतंगों से अपनी पसंदीदा सिल्क/कॉटन साड़ी को रोकें।
कॉटन साड़ी कवर: सोल साड़ी कवर / बैग उच्च गुणवत्ता वाले 250 GSM टिकाऊ कॉटन मटीरियल से बना है. यह कपड़े का है ताकि आप गंदे होने पर धोने के बाद इसका उपयोग कर सकें। कपास सामग्री प्लास्टिक और भंडारण उद्देश्य के लिए गैर बुना जैसी अन्य सामग्री पर अत्यधिक बेहतर है। मटीरियल सॉफ्ट है और यह आपकी कीमती साड़ी, ड्रेस, लहंगा और अन्य ऑउटफिट की सुरक्षा करता है।
क्लोज़र और स्टिचिंग: ये साड़ी कवर मेटल रनर के साथ ज़िप क्लोज़र के साथ आता है। बैग की सिलाई प्रशिक्षित महिलाओं के साथ की जाती है।
साइज़ और मात्रा: बैग 16 X 14 इंच का है और पैकेज में कुल 12 यूनिट कवर है।
देखभाल: साड़ी बैग धोने योग्य और पुन: प्रयोज्य हैं इसलिए नियमित भंडारण उपयोग के लिए आपको कुछ समय बाद कवर धोने की आवश्यकता होती है। हल्के डिटर्जेंट का उपयोग करें और गर्म पानी का उपयोग न करें। धोने के बाद कृपया बैग को आयरन करें ताकि यह फ्रेश लुक में आए।


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गुरुवार, 25 जुलाई 2024

निर्मला सीतारमन को पंसद है बनारसी साड़ी

 

देश की पहली महिला वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बजट के साथ ही अपने देश की संस्कृति और कला का भी प्रतिनिधित्व करती हैं। कला कारीगरी और फैशन के रूझान पर भी उनकी नजर उतनी ही सक्रिय है जितनी बजट पर।  निर्मला सीतारमण का वित्त मंत्री के रूप में ये लगातार सातवां बजट रहा है. हर बार उनकी साड़ी आकर्षण का केंद्र बनती है। इस बार उन्होंने बनारसी सिल्क  की ऑफ व्हाइट कलर की साड़ी पहनी जिसके साथ डार्क पर्पल कलर का ब्लाउज पहना है. जिसपर गोल्डन जरी का काम  है।

 दरअसल सीतारमन काे काशी और कांची दोनों जगह बहुत पसंद है। कार्यक्रम में शिरकत करते समय अधिक्तर वह साड़ी में ही नजर आती हैं। साड़ी पहनने का तरीका उनका एक जैसा ही रहता है।   बेहतरीन डिजाइन के कारण  बनारसी साड़ी उनकी पसंदीदा साड़ी है। साथ ही गर्मियों में बहुत कंफर्टेबल रहती है. इसकी पहचान इसके मुलायम और चमकदार सिल्क धागों से होती है. साड़ी के पल्लु के किनारों को छुने से इसकी पहचान आसानी से की जा सकती है।
बनारसी सिल्क साड़ी में क्या है खास?
बनारसी सिल्क साड़ी अट्रैक्टिव लुक देती है. साथ ही ये साड़ी तपती गर्मी के दौरान आराम भी देती है. बनारसी सिल्क साड़ी उत्तर-प्रदेश के बनारस, चंदौली, आजमगढ़, जौनपुर, मिर्जापुर और संत रविदास नगर जिले में बनाई जाती हैं. इसे बनाने के लिए कच्चा माल बनारस से आता है. कई साड़ियों को बनाने के लिए शुद्ध सोने की जरी का उपयोग किया जाता है. जिसके कारण उसकी कीमत बहुत बढ़ जाती है. लेकिन आजकल बाजार में नकली चमकदार जरी का काम की हुई साड़ी भी मिल जाती है.
बनारसी साड़ियों की एक और खासियत है कि ये भारतीय संस्कृति की पहचान और शान का प्रतीक मानी जाती है. बनारसी सिल्क साड़ियों का निर्माण उच्च गुणवत्ता और मजबूत कपड़े से होता है. इसे कारीगरों द्वारा हाथ से बनाया जाता है. इसमें कई तरह के माेटिफ और पैटर्न हाेते हैं। बूटी, बूटा, बेल, जाल, जंगला और कोनिया शामिल हैं.
बनारसी सिल्क साड़ी के प्रकार
बनारसी सिल्क बहुत तरह की होती है. जिसमें कॉटन बनारसी साड़ी, बनारसी सिल्क साड़ी, तुस्सर बनारसी साड़ी, काटन बनारसी साड़ी और ऑरंगजा बनारसी साड़ी शामिल है. हर एक साड़ी भी अपनी विशेषता होती है. कृपया हमारे फेसबुक समूह से जुड़े। खरीददारी करें।
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कलमकारी साड़ी और आपका स्टाइल- डॉ अनुजा भट्ट


जब भी हम साड़ी या कोई ड्रेस पहनते हैं ताे सबसे पहले यह सवाल जरूर आता है कि इसके साथ क्या अच्छा लगेगा। खासकर अगर आप काेई कलात्मक साड़ी पहन रही हाें ताे। आज मैं आपकाे कलमकारी साड़ी के साथ आप पर कौन सा स्टाइल जचेंगा इस पर बात करूंगी। सच कहूं तो कलमकारी साड़ी को स्टाइल करना एक मज़ेदार और रचनात्मक प्रक्रिया हो सकती है, क्योंकि ये साड़ियाँ एक्सेसरीज़ के लिए बहुत सारे विकल्प प्रदान करती हैं ।


 आभूषण: कलमकारी साड़ियाँ अक्सर काफी रंगीन और इसके डिजाइन बहुत सघन हाेते हैं इसलिए हलके आभूषण पहनें । आप लुक को पूरा करने के लिए छोटे झुमके या स्टड, एक साधारण हार और एक कंगन या चूड़ी पहन सकती हैं। वैकल्पिक रूप से, आप अपने पहनावे में झुमके या पारंपरिक दक्षिण भारतीय आभूषण भी पहन सकते हैं।

फुटवियर: कलमकारी साड़ी के साथ आप कई तरह के फुटवियर पहन सकती हैं। आजकल डिजाइनर जूतियां बहुत पसंद की जा रही हैं। इसमें राजस्थानी से लेकर पंजाबी तक के कई डिजाइन मिल जाते हैं। इसे माेजरी भी कहते हैं। इसके अलावा स्लाइडर में भी ट्रेंड में है। ज्यादातर फ्लैट-हील, बैकलेस और ओपने टो होते हैं. इस तरह की चप्पल पहनने में बेहद हल्की और दिखने में काफी अट्रैक्टिव होती हैं. स्लाइडर कैजुअल और अट्रैक्टिव लूक देने में मदद करते हैं. हील्स साड़ी काे खास बना देती है। हाई-हील होने के कारण इस तरह के फुटवियर आपको लंबा दिखाने में मदद करते हैं. हालांकि हील्स पहनने में उतने आरामदायक नहीं होते पर पहने जाने पर ये आपके आउटफिट को काफी खूबसूरत बना सकते हैं.

 मेकअप- आप ब्लश, न्यूट्रल लिप कलर और हलका आई मेकअप कर सकती हैं। मेकअप से पहले अपने चेहरे पर मॉइश्चराइजर जरूर लगाएं। इससे आपके चेहरे पर मेकअप का पर्फेक्ट लुक आता है। मॉइश्चराइजर से आपकी त्वचा सॉफ्ट और चमकदार भी बनती है। मॉइश्चराइजर लगाने से पहले चेहरे को पहले अच्छे से साफ जरूर करें। इसके बाद ही मेकअप के आगे के स्टेप्स अपनाएं।
दूसरे स्टेप में सही बेस का प्रयोग करना जरूरी है। इसके लिए आप लाइट फाउन्डेशन, सीसी या बीबीसी क्रीम का इस्तेमाल कर सकते हैं। आजकल मार्किट में इस तरह की कई क्रीम मौजूद है, जिसे लगाने पर एकदम नेचुरल लुक आता है। इसे अपने चेहरे पर ब्यूटी ब्लेंडर की मदद से लगा सकते हैं। ध्यान रहे कि अगर आप किसी गर्म या नमी वाली जगह पर रहती हैं तो हेवी फाउंडेशन का यूज करने से बचें। चेहरे पर हो रहे डार्क सर्कल्स, दाग-धब्बे या पिंपल्स को प्राइमर और कंसीलर लगाकर छुपाया जा सकता है। कंसीलर और प्राइमर को अपने स्किन के टोन से हल्का लाइटर लें। अगर आप किसी ऐसी जगह जा रहे हैं जहां आपको काफी लंबे समय तक रहना है तो इन दोनों का इस्तेमाल करना काफी अच्छा रहेगा।
लाइट मेकअप के लिए फेस टोन का कॉम्पैक्ट लगाना भी जरूरी है। इसके इस्तेमाल से आपका चेहरा नेचुरल लुक का लगता है। इसके अलावा अगर आप ब्लश लगाना पसंद करती हैं तो ज्यादा चमकदार या डार्क रंग का ब्लश का इस्तेमाल न करें। हल्के रंग के ब्लश से लाइट मेकअप लगता है। ध्यान रहे कि ब्लश को सिर्फ चेहरे के एक चीकबोन्स से दूसरे तरफ के चीकबोन्स तक लगाना है। इसके अलावा गर्दन, माथे और नाक के नथुने पर भी आप इसे हल्का सा लगा सकती हैं।
मेकअप में सबसे अहम स्टेप आई मेकअप माना जाता है। आईशैडो, आइ लाइनर और काजल लगाने से आंखों की सुंदरता और बढ़ती है। हालांकि, जब आप लाइट मेकअप कर रही हैं तो इस बात का ध्यान रखें कि आईशैडो के कलर हल्के या न्यूड हो। आजकल बाजारों या ऑनलाइन में आपको आसानी से न्यूड कलर के शैड्स मिल सकते हैं. वहीं, आई लाइनर थोड़ा पतला लगाएं। इससे आपकी आंखे काफी आकर्षक लगेंगी। इसके बाद आंखों पर भी पतला काजल लगाएं. मस्कारा का इस्तेमाल न करें, इससे लाइट की बजाए हैवी लुक लगेगा।
लाइट मेकअप के दौरान डार्क कलर की लिपिस्टिक लगाने की बजाए लाइट शैड या न्यूड शैड की लिपिस्टिक का इस्तेमाल करें। इससे आपका चेहरा काफी अच्छा निखरेगा। अगर आप लिपिस्टिक लगाना पसंद नहीं करती हैं तो लिप ग्लॉस भी लगा सकती हैं, इससे आपके होंठ नेचुरल लगेंगे।
 हेयरस्टाइल: अपनी व्यक्तिगत पसंद और अवसर के आधार पर, आप अपने बालों को कई तरह से स्टाइल कर सकते हैं। एक साधारण लो बन या साइड ब्रेड आपके लुक में एक खूबसूरत टच जोड़ सकता है। आप अपने बालों को ढीले कर्ल या लहरों में भी खुला छोड़ सकती हैं ताकि अधिक कैज़ुअल लुक मिल सके।
ब्लाउज़: आप अपनी कलमकारी साड़ी के साथ जो ब्लाउज़ पहनती हैं, वह प्लेन और डिजाइनर दाेनाे हाे सकते हैं।

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मंगलवार, 23 जुलाई 2024

बायस्कोप से लेकर जादोपटिया की कहानी तक - डा. अनुजा भट्ट

 


अपने बचपन की हल्की सी स्मृतियों में मुझे बायस्कोप की याद है। एक बड़ा सा डिब्बा नुमा यंत्र जो हाथ से चलता था और उसमें कई तरह के रंगीन कागज का प्रयोग होता था। ये रंगीन कागज चमकीले होते थे। उस यंत्र में एक गोलाकार छेद होता था। यह छेद उतना ही बड़ा होता था जिसमें आप अपना चेहरा टिका सकें। उस बक्से के अंदर चित्रों का एक रोल लगा होता था। बक्से के बाहर एक हैंडल होता था। यह हैंडल उसी तरह का था जैसा जूस वाले अंकल के जूसर का था। अंकल जिस तरह जूस निकालकर देते उसी तरह बायस्कोप वाले अंकल भी हमारे चेहरे को फंसाकर बाहर से उसी तरह घुमाते औऱ अंदर चित्र घूमने लगते। इस तरह से चित्र देखने का यह मेरा पहला अनुभव था। तब क्या पता था कि स्क्राल शब्द हमारी जिंदगी में इतना घुलमिल जाएगा कि हमारी उंगलियां सुबह से शाम स्क्राल ही करती रहेंगी।

 मुझे यह देखकर हैरानी हुई कि किस तरह चीजें एक जगह से दूसरी जगह जाकर बदलती तो जरूर है पर स्थायी ढांचा एक ही होता है। जादोपटिया की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। मैं आपको जादोपटिया की कहानी सुनाऊं इससे पहले कुछ बातें करना भी जरूरी है। 'जादोपटिया' शब्द का अर्थ है जादूई चित्रकार। जादोपटिया कला को संथाल समाज का पुश्तैनी पेशा कहा जा सकता है। हरियाणा के सुरजकुंड मेले में जब झारखंड को थीम स्टेट बनाया गया था, वहां जादोपटिया को प्रदर्शित किया गया था। झारक्राफ्ट के माध्यम से इसे बेचा भी जा रहा है।

दरअसल, जादो संथाल में चित्रकार को कहा जाता है. इन्हें पुरोहित भी कहते हैं. ये कपड़े या कागज को जोड़कर एक पट्ट बनाते हैं फिर प्राकृतिक रंगों से उसमें चित्र उकेरते हैं. जादो द्वारा कपड़े या कागज के छोटे–छोटे टुकड़ों को जोड़कर तैयार पट्टों को जोड़ने के लिए बेल की गोंद का प्रयोग किया जाता है। प्राकृतिक रंगों की चमक बनाए रखने के लिए बबूल के गोंद भी मिलाया जाता है। चित्र को उकेरने के लिए लाल, पीला, हरा, काला, नीला आदि रंगों का प्रयोग किया जाता है। खास बात यह कि ये रंग प्राकृतिक होते हैं हरे रंग के लिए सेम के पत्ते, काले रंग के लिए कोयले की राख, पीले रंग के लिए हल्दी, सफेद रंग के लिए पिसा हुआ चावल आदि का प्रयोग किया जाता है. रंगों को भरने के लिए बकरी के बाल से बनी कूची या फिर चिडि़या के पंखों का प्रयोग करने की परंपरा है।  प्रकृति से प्राप्त जल-आधारित रंग जादोपटिया कारीगरों द्वारा अपने स्क्रॉल को चित्रित करने के लिए उपयोग किया जाने वाला माध्यम था। लाल रंग आमतौर पर धार्मिक और पौराणिक चित्रों में प्रयोग किया जाता है। सफेद रंग उपयोग करने के बजाय यह उसे "खाली" के रूप में छोड़ देते हैं।

  आज हम पट्टा पेंटिंग को जादोपतिया पेंटिंग की विविधता के रूप में वर्गीकृत कर सकते हैं। लंबी स्क्रॉल पेंटिंग को पट्टा पेंटिंग या पटचित्र के नाम से जाना जाता है। झारखंड से पैटकर पेंटिंग, पश्चिम बंगाल औऱ उड़ीसा से पट्टचित्र इसी तरह की पेंटिंग का विकास है। पश्चिम बंगाल में, पटचित्र-चित्रकारी समुदायों को पटुआ के नाम से जाना जाता है। इन्हें झारखंड में पाटीदार, पाटेकर या पैटकर के नाम से भी जानते हैं। पद्य, पटचित्र का स्रोत है। पद्य या पद दो पंक्तियों की छंदबद्ध कविता है। पैतकर पेंटिंग की कथात्मक स्क्रॉल शैली पांडुलिपि से ली गई है, जिसका उपयोग राजाओं द्वारा अन्य राजाओं को संदेश देने के लिए किया जाता था।

  चित्रों के जरिए इस कहानी में मिथक, साथ ही आदिवासी जीवन, अनुष्ठान की बातें बतायी जाती हैं। चित्रित विषय की प्रस्तुति कथा या गीत के रूप में लयबद्ध कर की जाती है । चित्रकारी के लिए बनाया जानेवाला यह पट्ट पांच से बीस फीट तक लंबा और डेढ़-दो फीट चौड़ा होता है। इसमें कई चित्रों का संयोजन होता है। चित्रों में बॉर्डर का भी प्रयोग होता है। चित्रकला का विषय सिद्धू-कान्हू, तिलका मांझी, बिरसा मुंडा जैसे शहीदों की शौर्य गाथा के अलावा रामायण, महाभारत, कृष्ण लीला भी होती है।

मृत्यु का शोक औऱ उम्मीद की कहानी है यह

जादोपतिया चित्रकार उन घरों में जाते थे जहाँ पहले किसी की मृत्यु हो गई थी। सभी लोग एक बैठक में जमा हे जाते हैं। गांव समुदाय और बिरादरी के लोग इसमें शामिल होते हैं।  सब लोगो के आसन ग्रहण करने के बाद जादोपतिया चित्रकार अपना आसन ग्रहण करते हैं। उसके बाद एक जादोपतिया चित्रों का एक रोल लेकर उसे घुमाता जाता है एक के बाद एक चित्र आता रहता है और दूसरा कथावाचक कहानी सुनाता है। यह कहानी, एक मृत व्यक्ति की है जिसकी आंखों में पुतली को नहीं चित्रित किया है।  कथावाचक परिवार को उसकी पीड़ा के बारे में बताया है और उसकी मुक्ति के लिए  पुतली (चक्षु दान) दान का अनुरोध करता है। कहानी सुनने के बाद सब उसे दान देते हैं और आत्मा की मुक्ति की प्रार्थना करते हैं। इसके बाद जादोपतिया अपनी एड़ी पर बैठ जाता है और अपने स्क्रॉल खोलता है। वह बताता है कि  मृत व्यक्ति स्वर्ग में खुश है। यह जानकर परिवार संतुष्ट हो जाता है।  इस कथा का या इस तरह  की रीतिनीति का मूलतत्व यह है कि ऐसा करने से शोक मनाने वालों को उनके दुख से उबरने में मदद मिल सके। इस उपाय का जब अच्छा प्रभाव पड़ा तो इन चित्रकारों का नाम जादोपटिया पड़ गया। संथाल मृतक के जले हुए अवशेषों को पवित्र दामोदर नदी में बहाते हैं।  अस्थि चुनने के लिए संथाल जादोपटिया को दामोदर की यात्रा करने के लिए आमंत्रित करते हैं।

 

 

सोमवार, 22 जुलाई 2024

साड़ी और गाड़ी का मेल हो जाए तो बल्ले बल्ले- अनुजा भट्ट

    आपको जानकर आश्चर्य होगा कि आटोमोबाइल फैशन ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी है। यह युवाओं की पसंद बनता जा रहा है। अब एक सवाल आपसे है दोस्तों। आप में से कौन कौन गाड़ी चलाना पसंद करता है। आपके पास कौन से मॉडल की गाड़ी है। मैं देख रही हूं कि भारत के बढ़ते कार बाजार में कार खरीदने वालों की संख्या में महिलाओं का हिस्सा तेजी से बढ़ रहा है। ऑटो बिक्री आंकड़ों में पिछले पांच सालों में महिलाओं की संख्या कार खरीदने के मामले में बढ़ी है। इन महिलाओं में 35 साल से कम उम्र की ज्यादातर महिलाएं शामिल हैं। साथ ही महिलाएं लग्जरी कार खरीदने में भी पीछे नहीं हैं। महंगी और लग्जीरियस कार खरीदने वाली महिलाओं की संख्या में बढ़ोतरी देखी गई है।

 महिलाएं ज्यादातर ऑटो गियर शिफ्ट और क्लच लेस मॉडल पसंद करती हैं. वहीं ऑटोमोबाइल कंपनियां भी महिलाओं को ध्यान में रखते हुए कार के मॉडल्स और डिजाइन में कुछ-कुछ बदलाव करने लगी हैं। जब आप  गाड़ी को लेकर इतनी जुनूनी है तो मैं आपको बता दूं कि आपकी चाहत का ख्याल मैंने भी रखा है। फैशन की दुनिया में आटोमोबाइल प्रिंट पसंद किए जा रहे हैं। फ्रेबिक से लेकर रेडीमेड गार्मेंट तक में इस तरह के प्रिंट की मांग है। होम डेकोर में भी इस तरह के प्रिंट का प्रयोग होता है। कार से लेकर मोटरसाइकिल, हवाई जहाज से लेकर आटोरिक्शा तक के प्रिंट मिल जाएगें। प्रिंट में सभी मॉडल की गाड़ियां मिल जाएंगी। बच्चे भी इस तरह की चीजें पसंद कर रहे हैं। फैशन हमारी जिंदगी को बहुत पास से देखता है। हमारी मानसिकता, हमारे सपने सब फैशन के कैमरे में क्लिक हो जाते हैं। अगर आप भी इस तरह का फैशन पसंद करती हैं तो यह खरीद सकती हैं।

शनिवार, 20 जुलाई 2024

आपको भी पसंद हैं ना तांत साड़ियां- डा. अनुजा भट्ट

यह मैं कोई अनोखी बात नहीं कह रही हूं कि भारत विविधता भरा देश है बोली भाषा खानपान सब कुछ अलग-अलग है। हम सब इस बात के जानते हैं। लेकिन हम महसूस तब करते हैं जब हम आपस में अलग अलग लोगों से मिलते हैं। चीजों के प्रति उनकी संवेदनशीलता को महसूस करते हैं। मसलन खानपान तो अलग है ही, खाने और पकाने का तरीका भी अलग अलग है। पहनने का तरीका भी अलग है। हम किसी भी चीज को किसी भी तरह पहन खा लेते हैं अगर हम उन सब तथ्य और सूचनाओं से अंजान हैं। कभी कभी बड़ी बेवकूफी भी कर जाते हैं जैसे किसी आध्यात्मिक मोटिफ न पहचान कर हम उसे अपनी डाइनिंग टेबल के कवर पर सजा देते हैं। जैसा कि आप जानते ही हैं कि मैं पिछले 4 सालें से फैशन और कला पर काम कर रही हूं और आनलाइन प्रोडक्ट खरीदती बेचती और बनवाती हूं। इस दौरान कला कलाकार क्राफ्ट से जुड़े लोगों से संपर्क हुआ और बहुत सारी जानकारियां हासिल हुई। सच कहूं तो बहुत आनंद आ रहा है। मैं सोचा कि क्यों न यह जानकारियां आपसे साझा करूं। आप इन सूचनाओं को और सटीक भी बना सकते हैं।

आज मैं बात कर रही हूं तांत साड़ी की। भारत के बंगाल राज्य में मुख्य रूप से  पहनी जाने वाली तांत साड़ियां आज पूरी दुनिया में पहनी जा रही हैं। मेरे विदेश में रह रहे मित्र अक्सर इस तरह की साड़ियां मुझसे मंगवाते रहते हैं। अगर अपने देश की बात करूं तो यह भारतीय उपमहाद्वीप में गर्म और आर्द्र जलवायु के लिए सबसे आरामदायक साड़ी मानी जाती है।

तांत शब्द का अर्थ बंगाल में हथकरघा है जो सूती साड़ियों और धोती आदि जैसे अन्य वस्त्र बुनता है। बंगाल के बुनाई के इतिहास 15 वीं शताब्दी से माना जा सकता है। पहली बार शांतिपुर में हथकरघा लगा  और वहाँ से यह अन्य स्थानों तक फैल गया। 16वीं-18वीं शताब्दी के दौरान मुगल शासन के दौरान भी बुनाई की कला फलती-फूलती रही। बुनाई की प्रक्रिया में कार्यरत लोगों ने इसके लिए प्रशिक्षण भी लिया। और मुगल दस्तकारों से जामदानी बुनाई सीखी। 

  बुनाई की यह प्रक्रिया ब्रिटिश शासन से लेकर बंगाल विभाजन तक जारी रही और बुनाई की प्रक्रिया में निरंतर सुधार होता रहा। बंगाल विभाजन के बाद, बांग्लादेश से हिंदू बुनकर भारत चले आए और बुनकरों को तांत साड़ी की पारंपरिक बुनाई शैली से परिचित कराया।

 

 इस समय यह साड़ियां सबसे ज्यादा भारत के पश्चिम बंगाल राज्य के नदिया ज़िले में शांतिपुर  और फुलिया  और हुगली जिले में धानीखली बेगलपुर और अटपुर में बन रही हैं। साड़ियों के नाम भी इससे जुड़ गए हैं बुनाई की "फुलिया तंगेल" शैली शांतिपुर और फुलिया में आए प्रवासी तंगेल बुनकरों की देन है। इन साड़ियों में भारी बॉर्डर, फूलों के डिज़ाइन और कई पैस्ले और कलात्मक रूपांकनों की झलक मिलती है। इसका पल्लू और बार्डर ही इसकी विशेषता है। इसे फ्लोरल, पैस्ले और अन्य डिजाइन के साथ बुना जाता है।

बनती कैसे हैं साड़ियां-तांत साड़ी कपास से बनी होती है, जो अन्य साड़ियों की तुलना में बेहतरीन ड्रेप होती है। इस छह गज की साड़ी को बनने में 6-7 दिन लगते हैं। तांत साड़ी की कीमत अलग-अलग प्रकार की तांत साड़ियों और बुनाई प्रक्रिया में इस्तेमाल किए गए कपड़े और रूपांकनों के साथ भिन्न हो सकती है।

 तांत साड़ी की बुनाई की प्रक्रिया मिलों से कपास के धागों के बंडलों को साफ करने से शुरू होती है। फिर उन्हें धूप में सुखाया जाता है, ब्लीच किया जाता है, फिर से सुखाया जाता है और अंत में उन्हें उबलते रंगीन पानी में डुबोकर रंगा जाता है। एक बार डुबाने के बाद, उन्हें और मजबूत और महीन कपड़े में बदलने के लिए स्टार्च किया जाता है। कपड़े के धागों को बुनाई करघे में डालने के लिए बांस के ड्रम का भी इस्तेमाल किया जाता है।

 प्रत्येक तांत साड़ी के शरीर, पल्लू और बॉर्डर पर एक अनूठा पैटर्न होता है। ये पैटर्न एक कलाकार द्वारा बनाए जाते हैं, जो फिर नरम कार्डबोर्ड को छेदता है और उन पर डिज़ाइन को स्थानांतरित करता है। फिर कार्डबोर्ड को करघे से लटका दिया जाता है। एक बार यह सेट-अप हो जाने के बाद, बुनाई की प्रक्रिया शुरू होने के लिए तैयार हो जाती है। सबसे छोटी तांत साड़ियों को 10-12 घंटों में बुना जा सकता है। अधिक जटिल रूपांकनों वाली साड़ी को पूरा होने में संभवतः पाँच या छह दिन लग सकते हैं।

कैसे पहनें- बंगाली तांत साड़ी को स्टाइल करना आसान और अधिक सुविधाजनक है। कॉटन तांत साड़ी के साथ एक क्लासी ब्लाउज हमेशा सहजता से जंचता है। आप अपने लुक के ग्लैमर को बढ़ाने के लिए क्रॉप टॉप, बोट नेक ब्लाउज, हॉल्टर नेक या ट्यूब ब्लाउज भी ट्राई कर सकती हैं।

एक आकर्षक एक्सेसरी तांत साड़ी के लिए जरूरी है। ऑक्सीडाइज्ड ज्वेलरी हमेशा सबसे अच्छी लगती है, चाहे वह कैजुअल इवेंट हो या कोई बड़ा इवेंट। याद रखें, कम ही ज़्यादा है, इसलिए हमेशा किसी भी लुक को ग्रेस और ग्लोरी के साथ उभारने के लिए सिंपल ज्वेलरी ही चुनें। अपने एथनिक लुक को पूरा करने के लिए क्लच बैग जोड़ें।

 साड़ी का रखरखाव 

  •  तांत साड़ियां वजन में हल्की और कुछ हद तक पारदर्शी होती हैं, यही कारण है कि उन्हें धोने में उचित देखभाल की आवश्यकता होती है।
  • इन साड़ियों को धोने से पहले इन्हें ठंडे पानी में सेंधा नमक मिलाकर भिगो दें। यह तकनीक रंग को फीका होने से बचाती है।
  • तांत साड़ियों को धोने के लिए हल्के डिटर्जेंट का उपयोग करने का प्रयास करें ताकि कोई भी रसायन इन साड़ियों की बनावट को नुकसान न पहुंचा सके।
  • अपनी सूती तांत साड़ी की कुरकुरापन और कठोरता बनाए रखने के लिए धोते समय स्टार्च का उपयोग करने पर विचार करें।
  • एक बार धुल जाने के बाद साड़ी को छायादार जगह पर लटका दें और पूरी तरह सूखने दें।
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कापीराइट अनुजा भट्ट

 

Special Post

बाथरूम के साथ बाथरोब के भी बदले डिजाइन- अनुजा भट्ट

हमारी आधुनिक सोच हमारे घर के डिजाइन के साथ-साथ हमारे पहनावे में भी बदलती है। आज हमारे घर के बाथरूम नई टेक्नोलॉजी से सुसज्जित है,...