इस बार चलते हैं दक्षिण मध्य भारत में स्थित तेलंगाना राज्य के एक छोटे से कस्बे नारायणपेट, जिला नारायणपेट, राजधानी हैदराबाद। इस बार अपने साथ आपको भी सैर कराने की वजह सिर्फ एक ही है जो हम पहनते-खाते- पीते हैं उसके इतिहास को भी थोड़ा टटोला जाए। नारायणपेट साड़ी की मांग अक्सर मेरे ग्राहक करते हैं।
नारायणपेट के पारंपरिक 'चौका' (चेक
पैटर्न) और इल्कल-शैली के 'गायत्री बॉर्डर' (Gayatri Border) का
मिलाजुला रूप इस समय फैशन जगत में छाया हुआ है।
नारायणपेट साड़ी की कहानी 400 साल
पुरानी
नारायणपेट साड़ी का इतिहास लगभग 400 वर्ष
पुराना है। 17वीं
शताब्दी (लगभग 1630 ई.) में
जब मराठा सम्राट छत्रपति शिवाजी महाराज इस क्षेत्र से गुजर रहे थे, तब उनके साथ आए कुछ बुनकर यहीं बस गए। इन बुनकरों ने
महाराष्ट्र की बुनाई कला को स्थानीय संस्कृति के साथ मिलाया, जिससे नारायणपेट साड़ियों का जन्म हुआ। इस अद्वितीय
विरासत के कारण नारायणपेट साड़ियों को भौगोलिक
संकेतक (GI Tag) भी प्राप्त हो चुका है।
क्या है गायत्री बॉर्डर
'गायत्री
बॉर्डर' जिसे कई
क्षेत्रों में 'इल्कल
गायत्री बॉर्डर' भी कहा
जाता है, मुख्य
रूप से धागे के काम (Thread-work) और मंदिर
की कलाकृति (Temple Motifs) से सजा
है। इसते बॉर्डर में त्रिकोणीय गोपुरम या 'रुद्राक्ष' के डिजाइन बुने जाते हैं, इससे
साड़ी में आध्यात्मिक और पारंपरिक लुक दिखता हैं। जहाँ नारायणपेट साड़ी की बॉडी
एकदम सरल या छोटे चेक वाली होती है, वहीं
इसका गायत्री बॉर्डर बेहद आकर्षक और गहरे विरोधाभासी (Contrast) रंगों में बनाया किया जाता है।
8 साड़ियां बुनी जाती हैं एक साथ
नारायणपेट साड़ियों की बुनाई 'पिट लूम'
(Pit Loom) पर की जाती है। इसके निर्माण में 'इंटरलॉक
वेफ्ट' (Interlock Weft) तकनीक का उपयोग होता है,
जिससे साड़ी का बॉर्डर और बॉडी आपस में मजबूती से
जुड़ जाते हैं। इस बुनाई की एक और बड़ी विशेषता यह है कि बुनकर एक बार में करघे पर
8 साड़ियों का ताना सेट करते हैं।
पल्लू है खास
नारायणपेट गायत्री बॉर्डर
साड़ियों में रंगों का चयन बेहद गहरा और भारतीय संस्कृति से प्रेरित होता है, जैसे—हल्दी पीला, सिंदूरी
लाल, रानी
पिंक, बोतल
ग्रीन और गहरा मैरून। इसका पल्लू, जिसे 'टोपा-तेन्नी' पल्लू भी कहा जाता है, उसमें
लाल और सफेद रंग की चौड़ी पट्टियाँ (Stripes)
होती हैं जो इसकी पहचान हैं।
पहनना है आसान
हल्की और ड्रेप करने में बेहद
आसान होने के कारण, महिलाएं बिना किसी परेशानी के पहन सकती हैं। आज की घरेलू और कामकाजी महिलाएं, नारायणपेट
गायत्री बॉर्डर साड़ी को शालीन और प्रोफेशनल लुक के लिए काफी पसंद कर रही हैं। घर
की पूजा में पहनना हो या ऑफिस में पार्टी हो यह साड़ी हर अवसर पर आपके बेहतर
बनाती है।
निष्कर्ष:
नारायणपेट गायत्री बॉर्डर साड़ी हमारे बुनकरों की
कड़ी मेहनत और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। कम बजट में एक रॉयल और एलिगेंट लुक
देने वाली यह साड़ी आज के सस्टेनेबल फैशन (Sustainable
Fashion) के दौर में भारतीय महिलाओं की पसंदीदा लिस्ट में शामिल
है।



