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शनिवार, 28 जुलाई 2018

मांइड बॉडी थेरेपी से दूर हाेगी बेचैनी- डा. अनुजा भट्ट

न्यूयार्क टाइम्स में छपी एक खबर के मुताबिक, काेलंबिया यूनिवर्सिटी के शाेधकर्ताआें का कहना है कि मेडीटेशन करने, आत्मनिरीक्षण करने और प्राणायाम करने से व्यग्रता के शिकार किशाेर बच्चाें में सकारात्मक असर पड़ता है। उनकी स्मृतिदाेश जैसी समस्या का निदान हाेता है। 
अगर आपके बच्चाें में भी बेचैनी की यह समस्या है ताे यहां आपको कुछ उपायों के बारे में बताने जा रहे हैं जिनकी मदद से आप उनकी बेचैनी, व्यग्रता को तुरंत कम कर सकते हैं।

मेडिटेशन करें: मेडिटेशन तुरंत मानसिक शांति प्रदान करने के लिए आवश्यक होता है इसलिए अगर तनाव होता है तो उसे कम करने के लिए योग और मेडिटेशन कर सकते हैं। जब भी  चिंता या बेचैनी महसूस हो, उसे ध्यान केंद्रित करने के लिए कहें। उसे मेडीटेशन की सही तरीका बताएं। जैसे सबसे पहले आप गहरी साँस लेना शुरू करें। गहरी साँसों से दिमाग शांत होता है और हमारे शरीर को आराम मिलता है। एक से पाँच तक गिनते हुए साँस अंदर लें, थोड़ी देर रुकें और फिर धीरे धीरे साँस छोड़े। इसको कई बार करें, इससे आप बेहतर महसूस करेंगे।

अपनी भावनाओं को स्वीकारें: उसे अपनी भावनाओं और चिंता को समझने और स्वीकारने में मदद करें। जैसे  आप उसे समझाएँ की चिंतित होना भी एक मानव स्वभाव का हिस्सा है और यह जल्दी ही ठीक हो जाएगा। ऐसा करने से उसका आत्मविश्वास बढ़ेगा और वह अपनी व्यग्रता से आसानी से निपट सकेंगा।

अपने विचारों को समझें:जब हमें चिंता होती है तब हमारे दिमाग में उल्टे-सीधे विचार आने लगते हैं। इन विचारों से हमारी चिंता और बेचैनी और अधिक बढ़ जाती है। उदाहरण के तौर पर: अगर आपको को कहीं सफर करना है तो आप सोचने लगते हैं की “कहीं मैं ट्रेन या बस मिस न कर दूँ” या “अगर मुझे टैक्सी नहीं मिली तो क्या होगा?” बच्चाें के साथ भी एेसा हाेता है। एेसे समय खुद से कुछ सवाल करने चाहिए जैसे:
क्या ये विचार सही हैं?
क्या ऐसा सच में हो सकता है?
क्या मैं ऐसी स्थिति का सामना कर पाऊँगा?
इन सवालों का जवाब देने से अपने विचारों पर काबू पाया जा सकता है और अत्यधिक चिंता से बचा जा सकता है।

सकारात्मक बातें सोचें:चिंताजनक स्थिति में मन में कई तरह के गलत विचार आते हैं। ऐसे में आशावादी और सकारात्मक बातें सोचने की कोशिश करनी चाहिए। जैसे आप कह सकते हैं“  चिंता के समय बुरे विचार आना स्वभाविक है लेकिन तुम पहले भी ताे एेसी परिस्थिति से बाहर निकल कर आए हाे। अपनी सफलता पर भराेसा रखाे।

वर्तमान पर ध्यान दें: चिंता होती है तो ज़्यादातर हम सब अपने भविष्य के बारे में सोचते हैं। ऐसे में  बच्चाें के लिए जरूरी है कि वह अपनी सोच को वर्तमान में लाएं।  वर्तमान पर ज़्यादा ध्यान देंगे तो स्थिति को अच्छे से संभाल पाएंगे। इन सब बाताें के अलावा यह भी शेयर करें-
किसी से बात करें: चिंताजनक स्थिति में किसी दोस्त,परिजन  से बात करने से मन हल्का होता है और आप बेहतर महसूस करते हैं। अपनी भावनाओं को अपने परिवार और मित्रों से अवश्य बाटें। जब आप चिंतित या बेचैन होते हैं तो आपकी सोचने और समझने की क्षमता कम हो जाती है। ऐसे में कोई दूसरा व्यक्ति आपकी परेशानी को आपसे बेहतर समझ सकता है। कई बार साधारण सी सलाह भी आपकी समस्या का समाधान कर सकती है।

मन को खुश करने वाला कोई काम करें: जब भी आपको बेचैनी या चिंता हो तो उसे कम करने के लिए आपको अपना ध्यान भटकाना चाहिए। ऐसे में आप गाना सुन सकते हैं या फिर ब्रीदिंग एक्सरसाइज कर सकते हैं जिससे आपका ध्यान भटके और आप उन चीजों के बारे में सोचना छोड़ दें जिनसे आपको चिंता होती है।

मीठा ना खाएं: जब लोगों को तनाव होता है तो वे अक्सर अच्छा महसूस करने के लिए मीठा खा लेते हैं। लेकिन मीठा खाने से एंग्जायटी और बढ़ जाती है क्योंकि इससे स्ट्रेस हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है इसलिए मीठा खाने की बजाय पानी पिएं।

खाली ना बैठें: जब आप किसी चीज को लेकर चिंतित होते हैं तो ऐसे में खाली ना बैठें। खाली बैठने पर आपका ध्यान बार-बार उन्हीं बातों पर जाता है जिससे आपको चिंता हो रही होती है इसलिए खाली बैठने की बजाय परिस्थितियों को सुधारने पर ध्यान दें।

शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

राेटी कपड़ा और मकान- डा. अनुजा भट्ट


राेटी, कपड़ा और मकान. मध्यमवर्ग के हसीन सपने में इससे ज्यादा और कुछ नहीं हाेता।  वह अपने जीवनभर की कमाई अपना घर बनाने में लगा देता है। कहते हैंअगर छत का जुगाड़ हाे जाए ताे बाकी और चीजाें का बंदाेबस्त करना आसान हाे जाता है इसलिए लाेग मकान बनाने या खरीदने काे प्राथमिकता देते हैं। किराए के घर में व्यक्ति खुद काे सुरक्षित महसूस महीं करता।  दूसरी महत्वपूर्ण बात यह भी है कि मकानाें का किराया भी लगातार बढ़ताजा रहा है। एेसे में बैंक लुभावने आफर के साथ ग्राहकाें  काे आकर्षित करते हैं। किराया देने से ज्यादा अच्छा ईएमआई देना लगता हैं। यहां कम से कम कल काे घर ताे अपना हो जाएगा। एेसे में लोग घड़ाघड़ मकान खरीदने में लग जाते हैं। हर शहर एक कंकरीटी शहर में तब्दील हाेता जा रहा है। हर जगह इमारतें खड़ी हैं। एक से एक बढ़कर आलीशान इमारतें। घर का रूपरंग भी बदल गया है। अपरार्टमेंट्स में हर तरह की सुविधा है। स्वीमिंग पूल से लेकर रेस्तरां,हाल जैसी सुविधाएं देकर माेटी रकम  वसूली जाती है।
 लेकिन पिछले 2 महीने ले लगातार मकान गिरने, छत गिरने, दीवार गिरने जैसी घटनाएं दहशत पैदा कर रही हैं। मकान कहीं से भी सुरक्षित नहीं हैं। भवन निर्माण में जाे सामग्री का  उपयाेग किया गया है वह बहुत खराब है। लाेगाें की मेहनत की जमापूंजी के साथ  खरीदे गए मकानमालिकाें के सात इस तरह का खिलवाड़ करने वालाें के लिए कठाेर सजा का प्रावधान जब तक नहीं हाेगा इस तरह की घटनाएं हाेती रहेंगी।
 भवन निर्माण  में उपयाेग में लाई जाने वाली  सामग्री की जांच जब तक बना हेराफेरी के  नहीं हाेगी जब तक कट कमीशन का खेल चलता रहेगी तब तक स्थितियां नहीं बदलेंगी।  रेड़ी में समान बेचने वाले से जब आप कहते हैं इतना मंहगा क्याें दे रहे हाे ताे वह तपाक से कहता है मुझे देना भी ताे पड़ता है। मैं अपने बच्चाें का पेट न पालूं।सब्जी बाजार  काे या हफ्ता बाजार हर  जगह पुलिस वाले सुरक्षा के लिए कम हफ्ता बाजारी के लिए ज्यादा घूमते हैं। यह ताे एक छाेटा सा उदाहरण है। बाकी तस्वीर ताे आप देक ही रहे हैं। मकान गिर रहे हैं सड़के टूट रही हैं जमीन धंस रही है....
राेटी कपड़ा और मकान की ख्वाइश भी दम ताेड़ रही है।

गुरुवार, 26 जुलाई 2018

भूखे रहकर भी मुस्कुराती थी लड़कियां- डा.अनुजा भट्ट

गरीब के रुदन के आंसुओ की आग हूँ, भूख के मजार पर जला हुआ चिराग हूँ|
मेरा गीत आरती नही है राज पट की, जगमगाती आत्मा है सोये राज घट की|
मेरा गीत झोपडी के दर्दो की जुबान है, भुखमरी का आइना है, आंसू का बयान है|
भावना का ज्वार भाटा जिये जा रहा हू मै, क्रोध वाले आंसुओ को पिए जा रहा हू मै|
मै स्वयं को आज गुनेहगार पाने लगा हू, इसलिए मै भुखमरी के गीत गाने लगा हू|
मुझे मेरा पूरा देश आज क्रुद्ध चाहिए, झोपडी की भूख के विरुद्ध युद्ध चाहिए|
कवि : हरी ओम पवार की यह कविता आज की घटना पर सीधा हस्तक्षेप करती है। एक तरफ बलात्कार की खबरें, मासूम बच्चियाें की जिंदगी के साथ खिलवाड़ ताे दूसरी तरफ भुखमरी से हुई तीन बच्चियाें की माैत की खबरें।हर खबर के केंद्र में हैं बच्चियां। याैन उत्पीड़न से लेकर खाने न मिलने तक। कैसा समाज है यह जहां लड़कियाें के प्रति इतना निर्मम रवैया है। खाने न मिलने से तड़प तड़प कर हुई इस माैत ने देश की तस्वीर समाने रख दी है। खाने के लिए पैसा नहीं है पर पिता अपन लिए शराब का जुगाड़ कर लेता है। क्या शराब मुफ्त में मिलती है। और अगर एेसा व्यक्ति जाे मुफ्त में शराब पिला सकता है। मुफ्त में खाना नहीं खिला सकता। हताशा के भंवर में शराब का तिलस्म कारगर हाे जाता है ताे हताशा के भंवर में फंसे व्यक्ति की एनजीआे मदद क्याें नहीं करते। उनके लिए उनके हिसाब से राेजगार के अवसर क्याें नहीं मुहैया करवाते।
रिक्शा चलाकर भी घर चलाया जा सकता है। बशर्ते आप खुद काे हताश के भंवर में न जाने दें और एेसे लाेगाें से सावधान रहे जाे आपकाे नशे का आदी बना रहे हैं। नशा आपके पूरे परिवार काे सड़क पर ला देता है और आप कुछ नहीं कर पाते। मैं एेसे बहुत से लाेगों काे जानती हूं जाे किसी फैक्ट्री में मजदूर है और नाैकरी के बाद सुबह शाम 2 घंटा रिक्शा चलाते हैं। बच्चाें काे पब्लिक स्कूल में पढ़ाते हैं और उनकी बीवी भी कामकाज करती हैं।

बहुत बार हम खबराें में देखते हैं कि रिक्शा वाले के बच्चे ने मेडिकल इंजीनियरिंग की परीक्षा पास की।
लेकिन जब हाैंसले ही पस्त हाे जाएं ताे फिर क्या हाे सकता है। इन सारी घटनाआें में शराब का रिश्ता सबसे अहं है। कभी अवसाद में शराब पी जाती है ताे कभी उत्तेजना के लिए। और दाेनाें में ही अपराधी यह कहकर छूटने का प्रयास करता है कि वह हाेश में नहीं था। लेकिन जनाब एेसा कहने से काम नहीं चलेगा। बच्चियां आपकाे कभी माफ नहीं करेंगी। न सरकार काे और न आपकाे। जिम्मेदारी ताे बनती है ना....

बुधवार, 25 जुलाई 2018

दर्द भरी कहानी का चित्रांकन- डा. अनुजा भट्ट

औरताें के दर्द की काेई सीमा नहीं हैं। हम राेज देख रहे हैं कि  कैसे छाेटी बच्चियाें से लेकर हर उम्र की महिला के साथ खाैंफनाक काम किए जा रहे हैं। हत्या से लेकर बलात्कार तक की घटनाएं हमें हम हर सुबह उदास कर जाती हैं और भीतर तक भर देती हैं दहशत. अपराधी बेकाबू है और हम उनकाे  कठाेर सजा दिलवा पाने में बेबस..
 एेसी स्थितियां  कलाकार के मन काे और अधिक दुःखी कर देती हैं। उसके पास रंगाें की  भाषा हाेती है। चित्रकार शशि कृष्णन नेअभी हाल ही में नाैएडा में अपनी एक प्रदर्शनी लगाई थी। जिसमें उन्हाेंने दर्द के एेसे ही दृश्याें काे साकार किया था जिसमें  हमें निर्भया के कई रूप देखने काे मिले।
 शशि का कहना था कि इस तरह की घटना ने उनकाे बहुत तकलीफ दी है। औरताें काे कई तरह के दर्द हैं जिनकी हम उपेक्षा कर देते हैं उनकी तकलीफें सुनने का वक्त नहीं है हमारे पास। पेंटिंग में कई जगह मुखाैटाें का प्रयाेग इसलिए किया गया है ताकि हम जान सकें उसका जीवन कितने किरदाराें में बंटा है और वह किस तरह दर्द और तकलीफ में भी सिर्फ मुस्कुराती है।
 पेंटिंग के लिए वह एक खास कैनवास का प्रयाेग करते हैं। जिसे पालीमर कहा जाता है। यह रंगाें काे करीब 5 मिनट में साेख लेता है। एेसे में चित्रकार काे बहुत कम समय में अपनी कल्पना काे रंग देने हाेते हैं। शशि अपनी सृजनात्मकता काे व्यक्त करने के लिए कई अलग तरह के रंग का प्रयाेग करते हैं  जाे सामान्यतः हमें दिखाई नहीं देते। पेंटिंग में एक अलग ही तरह के भूरे रंग का प्रयाेग किया गया है। वह रचना के साथ साथ रंगाें की भी खाेज करते हैं। रचना के साथ साथ रंगाें के प्रयाेग की दृष्टि से भी  उनकी कला एक नई छाप छाेड़ती है।

मंगलवार, 24 जुलाई 2018

डर्टी अंकल- डा.अनुजा भट्ट

 बच्चियाें के साथ  क्रूरता की सारी  हदें पार हाेती जा रही हैं और हम सिर्फ तमाशा देख रहे हैं। सचमुच एक तमाशा ही तो बन गए हैं हम। हम यानी बच्चियां, हम यानी लड़कियां हम यानी महिलाएं हम यानी मादा हम यानी स्त्री लिंग..
 स्कूल से लेकर कालेज, आफिस से लेकर बाजार, बस स्टेंड, आटाे स्टेंड, रेस्तरां, पब, हाेटल हर  जगह हम पर हमले हाे रहे हैं। हम  इंसान न हाेकर हवस मिटाने का एक साधन बन गए हैं। 6 माह की बच्ची भी इससे अछूती नहीं है। अपराध करने वालों की उम्र 10 साल से लेकर 80 साल तक है। माेबाइल पर अश्लील फिल्म देखकर 10 साल के 3 बच्चाें ने 8 साल की लड़की के साथ घिनाैनी हरकत की। यह खबर अभी हाल की ही है।  आखिर उन बच्चाें काे इतनी हिम्मत किसने दी। किसने दिए अवसर की वह माेबाइल पर फिल्म देखें।
 बच्चे जानते हैं कुछ नहीं हाेने वाला। वह सजा से भी नहीं डरते। उनकाे अपने माता- पिता की इज्जत से भी लेना देना नहीं क्याेंकि वह इज्जत शब्द के मायने ही नहीं जानते। उनकाे इस तरह ज्ञान देने वाले माता-पिता हाेते ताे वह शायद न एेसी फिल्म देखने का साहस कर पाते और न एेसा घिनाैना काम।
 हमारी बच्चियां दिनाेदिन घर में कैद हाेती जा रही हैं। हम उनकाे खेलने से भी वंचित करने लगे हैं। शायद एेसा समय न आ जाए कि हम उनकाे स्कूल भेजने से भी डरने लगे। लेकिन यह रास्ता नहीं है, समाधान नहीं है। आखिर हम अपनी बच्चियाें काे उनकी मंजिल पाने में बाधा कैसे दे सकते हैं।  वह भी एेसे समय में जब खेल से लेकर पढ़ाई हर जगह वह इस तमाम विषमताआेंके बावजूद अपनी शाेहरत कमा रही हैं।
डीपीएस की उस छाेटी सी बच्ची के हाथ में जब एक छाेटी सी गुड़िया और एक कैप वाला गुड़्डा  दिया गया ताे उसने कहा। कैप वाला गुड्डा नहीं हाे सकता वह ताे डर्टी अंकल है। वह डर्टी अंकल लाइफ गार्ड था।  इस घटना ने डीपीएस ग्रेटर नाेएडा काे पूरी दुनिया के सामने रख दिया है। लेकिन न यह स्कूल बंद हाेगा और न हीं कुछ और हाेगा। स्कूल बंद हाे जाने से वहां पढ़ रहे और बच्चाें का क्या हाेगा.. वह कहां जाएंगे। स्कूल बंद करना समाधान नहीं है। साेचना यह है कि इस तरह की घिनाैनी हरकताें पर लगाम कैसे लगाई जाए।  इस तरह के अपराधी काे कड़ी से कड़ी सजा जल्द से जल्द मिले।  मैं ताे चाहती हूं कि जाे भी इस तरह के कृत्य करें उसे नपुंसक बना दिया जाए।
  

सोमवार, 23 जुलाई 2018

मॉब लिंचिंग- खूंखार और बर्बर समाज की तरफ जा रहे हैं हम डा. अनुजा भट्ट


जीवनमूल्याें काे ठेंगा दिखाते हुए जिस तरह का समाज विकसित हाेता जा रहा है सच कहूं ताे डर लगने लगा है। भीड़ द्रारा हिंसा की खबरें लगातार बढ़ती जा रही हैं। सवाल यह है  कि आखिर भीड़ का इतना राैद्र रूप क्याें है। इतनी उत्तेजना और गुस्सा क्याें है. हम मारने पर क्याें तुले हैं। किसी की हत्या कर देना इतनी मामूली सी बात क्याें बनता जा रहा है।
अपराधाें की लिस्ट इतनी लंबी क्याें हाेती जा रही है। अगर आप किसी भी दिन अखबार काे ध्यान से देखें ताे पाएंगे कि अपराध की खबराें के आगे समाज सराेकार से जुड़ी खबरें एकदम हाशिए में हैं। समाज में अपनापन, प्यार, एक दूसरे के प्रति सद्भाव, विश्वास और आदर एकदम खत्म हाेता जा रहा है। क्या हाे सकती हैं इसकी वजहें। कुछ का कहना है कि जैसे जैसे हम तकनीक के रूप में विकसित हाेते जा रहे हैं मानवीय स्तर पर हम कमजाेर हाेते जाते हैं।  हमारे भीतर साझेदारी  समाप्त हाे गई है। हमें किसी की काेई जरूरत नहीं।
पासपड़ाैस शब्द गायब हाे गया है। माैहल्ला नहीं रहा। सब अपने फ्लैट में बंद हैं। आपके हाथ में चाबी और माेबाइल है ताे आप समझते हैं  कि सारी दुनिया आपकी मुट्ठी में है।  अगर यह दाेनाें चीजें आपके हाथ से छीन ली जाएं ताे आप चिल्लाने लगते हैं मारपीट करते है , जान भी ले सकते हैं। आप पड़ाैसी का नाम नहीं जानते। तकलीफ में गार्डरूम मे फाेन करते हैं। आसपास के अस्पताल की काेई एंबुलेंस आपके दरवाजे पर आ जाती है।
 पहले आपके घर में चीनी नमक खत्म हाेता था ताे पड़ाैस याद आता था अब आपकाे माेबाइल याद आता है। मेहमान के घर पहुंचने से पहले सामान घर पर है।
 आपकाे किसी की जरूरत महसूस नहीं हाेती जब तक आपके पास पैसे हैं। आपकाे लगता है सब कुछ खरीदा जा सकता है। एेसे में आपके भीतर ऊर्जा लगातार चार्ज रहती है। क्याेंकि उसका उपयाेग कैसे करना है यह आप भूल गए हैं। यह एक सकारात्मक ऊर्जा हाे सकती थी। किंतु नकारात्मक हाे गई। इसलिए कि इस ऊर्जा के लिए संवेदना साहचर्य और सहयाेग की जरूरत हाेती है। वह आपके भीतर पैदा ही नहीं हुई क्याेंकि आपके घर में अब न नमक ख्नतम हाेता है न चीनी। सच कहूं ताे लाेग आजकल घर में आना जाना पसंद नहीं करते। वह इसे  अपनी प्राइवेसी का हनन मानते हैं।
  आपके भीतर की यही उर्जा आपके गुस्से में तब्दील हाेती जा रही है। और आप इसे एेसे किसी भी जगह निकाल देने पर आमादा हैं, जहां से आपका काेई सराेकार नहीं। आप भीड़ में शामिल है, कभी आप पत्थर मारते हैं कभी जान लेते हैं। और बेकसूर काे मरने के लिए छाेड़ देते हैं।
आप चाहें ताे इस गुस्से काे प्यार में बदल सकते हैं। दुआ सलाम काे आदत में शामिल कर सकते हैं। बिना माेबाइल के कुछ समय जाना सीख सकते हैं। पड़ाैसी का दरवाजा खटखटा सकते हैं। मदद कर सकते हैं मदद मांग सकते हैं। उदारता आपकाे वह खुशी दे सकती है जाे आपकाे न मंहगी गाड़ी दे सकती हैं न मंहगे फाेन और न आपका स्टाइल स्टेट्स.।उदारता आपकाे वह दवा दे सकती है जाे किसी मैडिकल स्टाेर में नहीं मिलती। उदारता से बहुत लाभ है । सबसे पहला कि आपकाे वह कभी अकेला नहीं छाेड़ती।

गुरुवार, 19 जुलाई 2018

भगवान गणेश क्यों खाते हैं मोदक- रेनु दत्त

भगवान गणेश की मूर्तियों एवं चित्रों में उनके साथ उनका वाहन और उनका प्रिय भोजन मोदक जरूर होता है। शास्त्रों में कहा गया है कि भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए सबसे आसान तरीका है मोदक का भोग। गणेश जी को सबसे प्रिय मोदक है। गणेश जी का मोदक प्रिय होना भी उनकी बुद्धिमानी का परिचय है । गणेश जी का एक दांत परशुराम जी से युद्ध में टूट गया था। इससे अन्य\nचीजों को खाने में गणेश जी को तकलीफ होती है, क्योंकि उन्हें चबाना पड़ता है। मोदक काफी मुलायम होता है जिससे इसे चबाना नहीं पड़ता है। यह मुंह में जाते ही घुल जाता है और इसका मीठा स्वाद मन को आनंदित कर देता है ।भगवान गणेश को मोदक इसलिए भी पसंद हो सकता है कि मोदक प्रसन्नता प्रदान करने वाला मिष्टान है। मोदक के शब्दों पर गौर करें तो मोद का अर्थ होता है हर्ष यानी खुशी। भगवान गणेश को शास्त्रों में मंगलकारी एवं सदैव प्रसन्न रहने वाला देवता कहा गया है। वह कभी किसी चिंता में नहीं पड़ते। इसका कारण संभवत: मोदक है क्योंकि यह गणेश जी को हमेशा प्रसन्न रखता है। मोदक के इसी गुण के कारण गणेश जी सभी मिष्टानों में मोदक को अधिक पसंद करते हैंपद्म पुराण के सृष्टि खंड में गणेश जी को मोदक प्रिय होने की जो कथा मिलती है उसके अनुसार मोदक का निर्माण अमृत से हुआ है। देवताओं ने एक दिव्य मोदक माता पार्वती को दिया। गणेश जी ने मोदक के गुणों का वर्णन माता पार्वती से सुना तो मोदक खाने की इच्छा बढ़ गयी। अपनी चतुराई से गणेश जी ने माता से मोदक प्राप्त कर लिया। गणेश जी को मोदक इतना पसंद आया कि उस दिन से गणेश मोदक प्रिय बन गये। यजुर्वेद के अनुसार गणेश जी परब्रह्म स्वरूप हैं। लड्डू को गौर से देखेंगे तो उसका आकार ब्रह्माण्ड के समान है। गणेश जी के हाथों में लड्डू का होना यह भी दर्शाता है कि गणेश जी ने ब्रह्माण्ड को धारण कर रखा है। \

शुक्रवार, 18 मई 2018

तुलसी में है दवा भी दुआ भी- रेनु दत्त


तुलसी को हरिप्रिया भी कहते हैं अर्थात वह जगत के पालन पोषण करने वाले भगवान विष्णु की प्रिय हैं। भारतीय परंपरा में घर-आंगन में तुलसी का होना सुख एवं कल्याण के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है। सिर्फ हिंदु धर्म ही नहीं बल्कि अन्य धर्मों में भी इसके महत्व और गुणवत्ता को महत्व दिया गया है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी देखें तो तुलसी में कई ऐसे गुण होते हैं जो बड़ी-बड़ी जटिल बीमारियों को दूर करने और उनकी रोकथाम करने में सहायक है। इसकी जड़, तना, पत्तियां तथा बीज सभी उपयोगी होते हैं। इसमें कीटाणुनाशक अपार शक्ति हैं। इसको छू कर आने वाली वायु स्वच्छ और स्वास्थ्यवर्धक होती है। तुलसी दो रंगों में होती है यह दो रंग है हरा और कत्थई। दोनों का ही सेवन स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है।
तुलसी के  उपयोग
स्वास्थ्यवर्धक तुलसी
पानी में तुलसी के पत्ते डा
लकर रखने से यह पानी टॉनिक का काम करता है।
खाँसी अथवा गला बैठने पर तुलसी की जड़ सुपारी की तरह चूसें।
तुलसी की हरी पत्तियों को आग पर सेंक कर नमक के साथ खाने से खांसी तथा गला ठीक हो जाता है।
खांसी-जुकाम में तुलसी के पत्ते, अदरक और काली मिर्च से तैयार की हुई चाय पीने से तुरंत लाभ पहुंचता है।
फेफड़ों में खरखराहट की आवाज आने व खाँसी होने पर तुलसी की सूखी पत्तियाँ 4 ग्राम मिश्री के साथ लें।    तुलसी के पत्तों का रस, शहद, प्याज का रस और अदरक का रस चम्मच भर लेकर मिला लें। इसे आवश्यकतानुसार दिन में तीन-चार बार लें। इससे बलगम बाहर निकल जाता हैै।
श्वांस रोगों में तुलसी के पत्ते काले नमक के साथ सुपारी की तरह मुँह में रखने से आराम मिलता है।
शहद, अदरक और तुलसी को मिलाकर बनाया गया काढ़ा पीने से ब्रोंकाइटिस, दमा, कफ और सर्दी में राहत मिलती है।
तुलसी के पत्ते का रस 1-2 ग्राम रोज पिएं, बुखार नहीं होगा।
यदि मासिक धर्म ठीक से नहीं आता तो एक ग्लास पानी में तुलसी बीज को उबाले, आधा रह जाए तो इस काढ़े को पी जाएं, मासिक धर्म खुलकर होगा। मासिक धर्म के दौरान यदि कमर में दर्द भी हो रहा हो तो एक चम्मच तुलसी का रस लें।
तुलसी का रस शरीर पर मलकर सोयें, मच्छरों से छुटकारा मिलेगा।
प्रातःकाल खाली पेट 2-3 चम्मच तुलसी के रस का सेवन करें तो शारीरिक बल एवं स्मरण शक्ति में वृद्धि के साथ-साथ आपका व्यक्तित्व भी प्रभावशाली होगा।
तुलसी भोजन को शुद्ध करती है, इसी कारण ग्रहण लगने के पहले भोजन में डाल देते हैं जिससे सूर्य या चंद्र की विकृत किरणों का प्रभाव भोजन पर नहीं पड़ता।
खाना बनाते समय सब्जी पुलाव आदि में तुलसी के रस का छींटा देने से खाने की पौष्टिकता व महक दस गुना बढ़ जाती है।
तुलसी के नियमित सेवन से हीमोग्लोबीन तेजी से बढ़ता है, स्फूर्ति बनी रहती है।
तुलसी की सेवा अपने हाथों से करें, कभी चर्म रोग नहीं होगा।
सौंदर्यवर्धक तुलसी
तुलसी की पत्तियों का रस निकाल कर बराबर मात्रा में नीबू का रस मिलायें और रात को चेहरे पर लगाये तो झाइयां नहीं रहती, फुंसियां ठीक होती है और चेहरे की रंगत में निखार आता है।
तुलसी पत्रों को पीसकर चेहरे पर उबटन करने से चेहरे की आभा बढ़ती है।
दाद, खुजली और त्वचा की अन्य समस्याओं में तुलसी के अर्क को प्रभावित जगह पर लगाने से कुछ ही दिनों में रोग दूर हो जाता है।
चेहरे के मुँहांसे दूर करने के लिए तुलसी पत्र एवं संतरे का रस मिलाकर रात्रि को चेहरा धोकर अच्छी तरह
से लेप लगाएं, आराम मिलेगा।
तुलसी की सूखी पत्तियों को सरसों के तेल में मिलाकर दांत साफ करने से सांसों की दुर्गध चली जाती है।
उपयोग में सावधानियाँ
तुलसी की प्रकृति गर्म है, इसलिए गर्मी निकालने के लिये इसे दही या छाछ के साथ लें।    तुलसी के सेवन के बाद दूध भूलकर भी ना पियें, चर्म रोग हो सकता है।
तुलसी रस को अगर गर्म करना हो तो शहद साथ में ना लें। कारण गर्म वस्तु के साथ शहद विष तुल्य हो जाता है।
तुलसी के साथ दूध, मूली, नमक, प्याज, लहसुन, मांसाहार, खट्टे फल ये सभी का सेवन करना हानिकारक है।
तुलसी के पत्ते दांतो से चबाकर ना खायें, अगर खायें हैं तो तुरंत कुल्ला कर लें। कारण इसका अम्ल दांतों के एनेमल को खराब कर देता है।
तुलसी का पौधा जहां लगा हो वहा आसपास सांप बिच्छू जैसे जहरीले जीव नहीं आते।
तुलसी के पत्तों को रात्रि में नहीं तोड़ना चाहिए क्योंकि अंधेरे में इसकी विद्युत लहरें प्रखर हो जाती है।
तुलसी का पौधा दिन रात आक्सीजन देता है, प्रदूषण दूर करता है।

तुलसी का सान्निध्य सात्विकता और पुण्यभाव के साथ आरोग्य की शक्ति को भी बढ़ाता है। इन्हीं विशेषताओं के कारण तुलसी की माला कंठी आदि शरीर में धारण करने का विधान है। प्रत्येक घर में एक तुलसी का पौधा जरूर होना चाहिए। समाजसेवा का इससे अच्छा, सुलभ, सुगम और निशुल्क उपलब्ध होने वाला और क्या उपाय हो सकता है।



गुरुवार, 17 मई 2018

मोटापे से परेशान हैं तो जरूर खाएं लहसुन

सदियों पहले से लोग लहसुन का उपयोग चिकित्सा हेतु किया करते थे। इसके स्वाद के तीखेपन में भी बहुत सारे फायदे छुपे हैं। लहसुन में मैग्नीज, विटामिन बी6, विटामिन सी, सेलेनियम, फाइबर, काॅपर, पोटेशियम, फास्फोरस, आयरन और विटामिन बी1 पाया जाता है
लहसुन  के फायदे
ऽ शरीर में कमजोरी दूर करता है और  यह लाल रक्त कोशिकाओं के लिए बहुत फायदेमंद होता है
ऽ शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है और मौसमी बीमारियों से आपकी रक्षा करता है।
ऽ एंटीआॅक्सिडेंट ,एंटीबायोटिक होने के कारण इसका नियमित सेवन आपको कई तरह की असाध्य बीमारियों से सुरक्षित रख सकता है जिसमे दिल की बीमारीए उच्च रक्तचाप और कोलेस्ट्रोल के स्तर को नियमित करना शामिल है
ऽ डायरिया जैसे रोग से भी यह आपको बचाता है और नाश्ते में इसका सेवन आपकी सेहत के लिए फायदेमंद होता है।
ऽ         इसके नियमित सेवन से पाचन क्षमता में सुधार आता है और भूख भी बढ़ती है। यह आपकी पाचन शक्ति को मजबूत बनाता है।
ऽ उच्च रक्तचाप की समस्या को भी नियंत्रण में रखता है।
ऽ इसका सेवन ।स्रीमपउमत  और क्मउमदजपं जैसी बीमरियों से भी बचाता है।
ऽ एथलीट के खाने में सामान्य तौर पर यह शामिल होता है क्योंकि इससे ेजंउपदं और पाचन शक्ति बढ़ती हैै।
ऽ इसमें पोषक तत्व ज्यादा होते है और केलोरिज कम होती है  जिसकी वजह से मोटापे से ग्रस्त लोग  इसका इस्तेमाल अपनी फिटनेस के लिए कर सकते है ।







बुधवार, 16 मई 2018

कुछ इस तरह मिले दाेस्त- अनुजा भट्ट


मेरी अपने बिछड़े दाेस्ताें से मुलाकात बहुत अलग अलग  तरीके से हुई। कभी काेई रेलवेस्टेशन में मिला ताे कभी काेई बाजार में।  किसी ने अखबार या मैग्जीन में मेरे लेख पढ़कर मुझे खाेजा। कुछ मिले ताे कुछ फिर से खाे गए क्याेंकि उनका नंबर कभी खाे गया ताे कभी पता। लेकिन यादाें में वह हमेशा दस्तक देते रहे। इसी तरह कुछ दाेस्ताें काे मैं हमेशा याद रही। शुक्रिया.. फेसबुक ने ताे कमाल किया। नर्सरी के दाेस्ताें से भी मिलवा दिया।
  हर दाेस्त मेरे साथ अपने जीवन के कई तरह के पन्ने लेकर खड़ा था। हर पन्ने में एक अलग तरह की दास्तान थी। दुःख थे ताे सुख भी थे।  सभी ने अपने लिए रास्ते बनाए। इन सब दाेस्ताें में जिसके जीवन संघर्ष नें मुझे सबसे ज्यादा प्रेरित किया है उनमें एक नाम नूतन शर्मा का भी है।
 बात स्कूली दिनाें की है। हम सब सरकारी स्कूल में पढ़ते। राजकीय बालिका इंटर कालेज। आसमानी कुर्ता और सफेद सलवार कुर्ता हमारी ड्रेस थी। जूनियर सेक्शन में हम फ्राक पहनते थे। हमारी एक शिक्षका थी देवयानी जाेशी। वह अंग्रेजी पढ़ाती थीं।  अपने विषय की वह विद्वान महिला थी। कायदे से उनकाे किसी विश्व विद्यालय में प्राेफेसर  हाेना चाहिए था। वह इसकी एकदम उपयुक्त पात्र थीं।  हमारे शहर में हाई स्कूल तक ही कांवेंट स्कूल था। उसके बाद वहां के विद्यार्थी सरकारी स्कूल में आ जाते थे। एक तरफ हम सरकारी स्कूल के बच्चे जाे हिंदी हमारी माता है के साथ  बढ़े हाे रहे थे और दूसरी तरफ अचानक से आए ये विद्यार्थी। इनकी फाेज से हमारी अध्यापिका बहुत प्रभावित थी और उनकाे पढ़ाने में मजा आ रहा था। उनके सवाल पर आधे बच्चे दाएं बाएं देखते और आधे बच्चे अपने लंबे लंबे हाथ खड़े करते। आधे बच्चे  डरे और सहमें रहते ।  अंग्रेजी की कापी एकदम लाल रहती। 33 नंबर लाना भी  बड़ी बात। सरकारी बच्चे 45 से ज्यादा ला ही नहीं पाते... हर बच्चा सिर्फ अंग्रे जी पढ़ता। कभी सीढ़ियाें पर कभी मैदान पर। हर समय हर वक्त। पास जाे हाेना था। कुछ ने ताे अंग्रेजी विषय ही नहीं लिया। अंग्रेजी विषय ही छाे़ड़ दिया।
 अब बात करू नूतन की। नूतन का परिवार लड़कियाें काे पढ़ाने का हिमायती नहीं था। फिर भी नूतन काे पढ़ने की ललक थी। क्लास 6 से जहां अंग्रेजी पढ़ाई जाती हाे वहां 11 वीं शेक्सपियर का मर्चेंट आफ वेनिस दिमाग में साय साय करता था।  भरत काे पढ़ते हुए भी... हमारे भीतर अंग्रेजी साहित्य के प्रति एक खाैंफ था।  नूतन उससे लगातार जूझ रही थी। वह पढ़ना चाहती थी। पर अंग्रेजी में मेहनत करके भी वह 32 नंबर पाई। और फेल हाे गई। देवयानी मैडम ने उसका 1 नंबर नहीं बढ़ाया। बस इसी के साथ उसकी पढ़ाई भी बंद हाे गई। उसने स्कूल  आना बंद कर दिया।
 नूतन ने मुझे फेसबुक से खाेजा.. और उसके बाद की कहानी सुनाई।  स्कूल छाेड़नेके बाद ही उसकी शादी हाे गई। 18 साल में। उसके पति काे पढ़ने लिखने का शाैक  है। उसने भी अपने मन  की बात साझा की और हिचकी हिचकी भर राेई। उसके पति ने कहा काेई बात नहीं अब पढ़ाे। और उसकी पढ़ाई-लिखाई और टीचर्स ट्रेनिंग की व्यवस्था की। वह हास्टिल में रहकर पढ़ी। बहुत मेहनत की और आज अंग्रेजी की ही टीचर है।  सरकार द्वारा उसे बेस्ट शिक्षक का अवार्ड भी मिला है।
 भरे गले से उसने कहा मेरे पास अभी भी अपनी वह मार्कशीट है। जिसमें मैं फेल हाे गई थी। इस बार मैं अपनी उन टीचर से मिलने जा रही हूं अपनी मार्कशीट के साथ। जीं हा देवयानी जाेशी बहनजी से..इन छुट्टियाें में..

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