सोमवार, 16 अप्रैल 2018

#मैंअपराजिताकहानीप्रतियाेगिता - मंजू सिंह

हाँ सभी फ़र्ज़ पूरे हो गए | बच्चों को उनके पैरों पर खड़ा करने के लिए जितना कर सकी किया| सब के लिए बहुत जी मर ली | सभी ने तो अपनी ज़िन्दगी में जो चाहा वो किया | मैं ही कभी मन की नहीं कर पायी जब भी चाहा अपने लिए कुछ तब परिवार की कोई न कोई ज़िम्मेदारी पाँव की बेड़ी बन गयी | उदय भी तो मंझधार में छोड़ गए मुझे | वो भी ऐसे समय जब मुझे उनकी सबसे ज़्यादा ज़रुरत थी | उन्होंने भी तो मन की करने में कोई कसर नहीं छोड़ी | तब गए तो आज तक मुड कर नहीं देखा | न कभी मेरी न बच्चों की सोची | क्या पैसे से ही सारी ज़िम्मेदारियाँ पूरी हो जाती हैं ? क्या बच्चों की ज़िन्दगी में पिता की कोई अहमियत नहीं होती ? हे भगवान ये सब कहाँ से घूमने लगा दिमाग में ! नहीं अब और नहीं निभा दिन अपनी ज़िम्मेदारियाँ मैंने अकेले ही | उदय भी तो अपनी दुनिया अलग बसाये मस्त हैं | तो फिर मैं ही क्यों ? कल रात ही तो मुझे चमकते जुगनुओं ने राह दिखाई थी नयी | और आज यह सब | नहीं अब नहीं अब मुझे भी जीना है अपने लिए अपनी ख़ुशी के लिए अपने सपनों के लिए | मैंने अपने सर को एक ज़ोरदार झटका दिया मानों ऐसा करने से हर फालतू की बात को दिमाग से झटक कर दूर फेंक दूँगी | कोशिश ज़रूर करूंगी | शादी से पहले फैशन डिजाइनिंग का कोर्स किया था कितने अरमान थे कितने सपने थे कि मैं अपना लेबल लॉन्च करूंगी | लेकिन गृहस्थी में एक बार जकड़ी तो सब सपने धरे के धरे रह गए | अब करूंगी , ज़रूर करुँगी | किसी भी नयी शुरुआत के लिए कभी देर नहीं होती | और फिर रुझान तो मेरा कभी टूटा ही नहीं | इसी चक्कर में कंप्यूटर भी तो सीख लिया था मैंने |
       आज मेरी ज़िन्दगी कि नयी सुबह है | आज से ही नयी ज़िन्दगी कि आगाज़ होगा | सब कुछ बहुत आसान लग रहा था लेकिन अब सोच रही हूँ तो समझ ही नही आ रहा कि कौन सा सिरा कहाँ से पकड़ूँ | अरे हाँ याद आया ऋतु है न | हम दोनों ने एक साथ ही तो ट्रेनिंग ली थी | सोशल मीडिया पर तो उसके डिजाइन देखती ही रहती हूँ फोन नम्बर भी मिल जायेगा कॉल करती हूँ उसे | "हेलो " "कौन पुन्नो ? " उसने हेलो कहते ही मुझे पहचान लिया चार साल पहले ही मिली थी पर ज़्यादा बात नहीं होती थी | "वाह पहचान लिया" "कैसे नहीं पहचानती ,और बता आज इस नाचीज़ को कैसे याद किया ? तुझे तो कभी फुर्सत ही नहीं मिली अपने घर से " "क्या यार ताना मत मार अब छोटी उम्र में शादी हो गयी थी मेरी और फिर न चाहते हुए भी चार बच्चे | क्या करती दो बेटियों के बाद सबको बेटा चाहिए था | मेरी तो चलती ही नहीं थी तुझे पता है |" "हाँ पता है यार फिर तेरे ट्विन्स हो गए " "हम्म अब मैं फ्री हूँ सोच रही हूँ अपने शौक पूरे कर लूँ ।" "अरे वाह मेरी बिल्ली | चल फिर मिलते हैं किसी दिन ।" "किसी दिन क्या इसी संडे मिलते हैं ।" "चल ठीक है कनाट प्लेस मिलते हैं अपनी पुरानी जगह |" "डन,ओके बाय " ऋतु से बात करने के बाद जैसे मेरे सपनों को पंख लग गये । सोचा आज बुधवार है तब तक थोड़ा अपना हुलिया ठीक कर लूँ | ऋतु से मिलना है कहेगी क्या ओल्ड फैशन के कपडे पहने हैं फैशन डिज़ाइनर| हाहाहा | पार्लर भी जाना है | ऋतु से बात करके मैं नयी ऊर्जा से भर गयी थी झट से अपॉइंटमेंट ली और पार्लर गयी | अपना हेयर स्टाइल बदलवाया सबसे पहले नए स्टाइल के बाल अच्छे लगेंगे | फिर उन्हें कह दिया कि मेरा मेकओवर कर दो | मुझे खुद को नए रूप में देखना है | बस फिर क्या था उन्होंने मेरा रंग रूप ही बदल दिया | खुद को आईने में देखा तो देखती ही रह गयी | क्या मैं आज भी इतनी सुन्दर दिख सकती थी कभी सोचा क्यों नहीं मैंने !! अगला दिन मैंने शॉपिंग के लिए रखा | अपने लिए आज के फैशन के हिसाब से कपडे खरीदे | घर आकर सोचा यह सब तो हो गया अब थोड़ा लैपटॉप की सुध लेनी होगी खुद को आज के फैशन ट्रेंड से अपडेट तो कर लूँ न | बस संडे तक कैसे समय निकला पता भी नहीं चला | अपनी पुरानी जगह ठीक समय पर दोनों मिले | खाया पीया मस्ती की और पुराने दिन याद किये | दोस्तों की बातें भी कीं | फिर मुद्दे की बात शुरू की | "अच्छा बाकी छोड़ अब ये बता मैं अपना बिज़नेस कैसे शुरू करूँ ?" वह हंसने लगी और बोली, “ देख जल्दी मत कर इतनी | ऐसा कर पहले मेरे साथ ही आजा | काफी सालों से तू टच में नहीं है तो ठीक रहेगा | फिर कर लेना काम शुरू |” “ठीक है तो बता कब से आऊं ?” “कल से ही आजा |” अरे वाह कल से ही ? चल फिर कल ११ बजे मिलते हैं | घर आकर मैंने सपने बुनना शुरू कर दिया | सोचा नहीं था कि नयी ज़िन्दगी इतनी जल्दी शुरू हो जायेगी | अगले ही दिन से मेरी ठहरी हुई ज़िन्दगी में रवानी आ गयी | काम में मन लगा तो मैं सारे दुःख भूलने लगी | अब तो बस हंसी, ख़ुशी पार्टियों का दौर , मीटिंग्स यही सब रहने लगा | ऋतू के दोस्तों से भी मुलाकात होने लगी फ्रेंड सर्किल अच्छा हो गया | ऋतू के साथ मैंने भी ज़ुम्बा क्लास ज्वाइन कर ली |
       आह ! कहाँ दुखों में डूबी थी मैं ! मेरी ज़िन्दगी इतनी पास थी लेकिन कभी सोचा ही नहीं | सबकी ख़ुशी में ही बिता दिया जीवन | अभी उम्र ही क्या है | १८ की ही तो थी जब शादी हो गई थी | ५२ की उम्र भी कोई उम्र है निराश होने की | पार्टियां अटेंड करते करते ऋतू के और मेरे म्यूच्यूअल फ्रेंड अभिजीत से काफी बातें होने लगीं | वे भी मेरी ही तरह अकेले थे | बच्चे तो कभी थे ही नहीं उनके और पत्नी की असमय मृत्यु हो चुकी थी | एक दिन वे बोले "देखो हम दोनों ही उम्र के उस पड़ाव पर हैं जहाँ शारीरिक से ज़्यादा मानसिक रूप से किसी साथी की ज़रुरत होती है | " मैं समझ रही थी उनका मतलब "आगे आगे उम्र बढ़ेगी और आपस में हम एक दूसरे का दुःख भी बाँट सकेंगे | मन की बात कहने सुनने को कोई चाहिए होगा |" "आपकी बात समझ रही हूँ लेकिन बच्चे ----" "देखो बच्चे अपनी दुनिया में खोये हुए हैं | तुम कब तक अकेली रहोगी । अब अपने लिये सोचो । वैसे बात करके देखो ,आजकल के बच्चे बहुत प्रोग्रेसिव सोच के हैं | मेरे हिसाब से उन्हें कोई ऐतराज़ नहीं होगा |" " मुझे थोड़ा समय चाहिए | बच्चों से ज़रूर बात करूंगी तभी कोई फैसला लूंगी |" |"मुझे कोई जल्दी नहीं है और  तुम इंकार भी कर दोगी तो मुझे बुरा नहीं लगेगा |" मुलाकात के बाद घर लौटने पर मन में अजीब सी हलचल थी | एक अपराध बोध था मन में कि क्या इस उम्र में यह सब---फिर सोचा सारी ज़िन्दगी अकेले ही तो काट दी । उदय ने कब परवाह की मेरी। और फिर दुनिया दो चार दिन बोल कर चुप हो ही जायेगी । जानती हूं यह कोई छोटा कदम नहीं है लेकिन मेरे जुगनू अब भी मुझसे कुछ कह रहे हैं । बहुत सोच समझ कर मन में आया कि अपनी बेटियों से तो मैं बात कर ही सकती थी | मैंने चारों बच्चों को घर बुलाया | और अपनी बात कह डाली | आश्चर्य की बात है कि बेटियां खुश हो गयीं | मुझे लगता नहीं था कि वे मेरे लिए इतनी भावुक हो जाएँगी | पर बच्चे तो बच्चे होते हैं वे व्यस्त ज़रूर हैं पर मुझे बहुत प्यार करते हैं | " मां वी आर वैरी हैप्पी फॉर यू | गो अहेड |" मीना ने कहा | बेटे थोड़े झिझक रहे थे पर बहुओं ने हामी भर दी | सब खुश थे | और अगले ही महीने कोर्ट मेरिज की बात भी तय हो गयी | अभिजीत भी तैयार थे मैंने उन्हें बच्चों से मिलाया | शादी का दिन भी आया सभी बच्चे ऋतु और उसका परिवार और अभिजीत के परिवार के कुछ लोगों कि मौजूदगी में शादी हो गयी | सभी बच्चों ने मिलकर पार्टी अरेंज की | शादी के बाद जब सब चले गए तो बच्चों ने अभिजीत से कहा , “थैंक्यू पापा | सारा जीवन पापा के लिए तरसे अब आप मिल गए हैं | वी आर सो लक्की ! “ अभिजीत भी अपने लिए पहली बार पापा सम्बोधन सुनकर भावुक हो गए | और बच्चों को गले से लगा लिया | माहौल थोड़ा भारी हो गया था तो अभिजीत ने कहा, ”चलो अब मेरे फैशन हाउस को भी मालकिन मिल जायेगी | सब ने ठहाका लगाया |” मुझे आज अपने भीतर किसी तरह का अपराध बोध नहीं होना चाहिए आखिर उदय ने तो मुझे दुखों की आग में इतने बरस पहले झोंक ही दिया था न !
मुझे भी हक़ है , अपने हिस्से का एक मुट्ठी आस्मां मुझे भी तो चाहिए

बढ़ता जा रहा माइग्रेन का मर्ज- डा. दीपिका शर्मा


नव्या राजपूत 20 साल की हैं। दो साल पहले उन्हें हल्का सिर दर्द शुरू हुआ। लेकिन इन दो साल में यह दर्द अब असह्य हो चुका है। नव्या कहती हैं कि अब तो ऐसा लगता है जैसे कोई सिर में हथौड़े मार रहा हो। अक्सर यह दर्द कई घंटों रहता है और इस दौैरान उन्हें बुरी तरह चक्कर आते हैं। वह पसीने से तरबतर हो जाती हैं या फिर तेज ठंड लगने लगती है। इस दर्द से वह इतनी बेबस हो जाती हैं कि उन्हें लेटना पड़ता है। नव्या माइग्रेन की शिकार हैं।
पुरुषों की तुलना में महिलाएं माइग्रेन की ज्यादा शिकार हैं। माइग्रेन के अटैक के दौरान मरीज आवाज और रोशनी के प्रति अति संवेदनशील हो जाता है। मरीज की आंखों के सामने तेज रोशनी सी आती दिखती है तो कभी तारे चमकने लगते हैं। ऐसा लगता है जैसे चारों और तेज पटाखे फूट रहे हों। आंखों के सामने तरह-तरह की ज्यामितीय आकार बनने लगते हैं और वे अपनी तेज रोशनी और चकाचौंध से मरीज को हलकान कर देते हैं।
मरीज के इर्द-गिर्द चलने वाला यह तेज रोशनी और आवाज का खेल 20 मिनट से लेकर एक घंटे तक चल सकता है। इसमें मरीजों के लिए एक ब्लाइंड स्पॉट पैदा करता है और ऐसा लगता है कि उनकी आंखें हमेशा के लिए खराब हो जाएगी।
  माइग्रेन एक तरह का ब्रेन डिसऑर्डर हैजो सेरोटोनिन लेवल में उतार-चढ़ाव की वजह से पैदा होता है। माइग्रेन का अटैक कई कारणों से होता है। इनमें भोजन की कमीकिसी खास खाद्य पदार्थ के इस्तेमाल  मसलन चॉकलेटडेयरी प्रोडक्ट्सखट्टे फल या ऐसी चीजें जिनमें मोन्सोडियम ग्लूटामेट हो। मासिक धर्म से जुड़े हार्मोनल परिवर्तन की वजह सेमीनोपॉज के दौरान परिवर्तन से माइग्रेन हो सकता है। गर्भनिरोधक गोलियोंसोने में गड़बड़ीगर्दन या गले के दर्द या लगातार कंप्यूटर पर बैठ कर काम करने से माइग्रेन का दर्द पैदा हो सकता है। 
÷माइग्रेन का दर्द और इलाज
शुरुआती हल्के सिर दर्द में एस्पीरिन या पारासिटामोल इसे ज्यादा बढऩे से रोक सकती हैं। कुछ मामलों में एंटी माइग्रेन दवा सुमाट्रिप्टेन कारगर हो सकती है। चिकित्सकों का कहना है कि माइग्रेन के इलाज के लिए सिर्फ एक पद्धति पर निर्भर रहना जरूरी नहीं है। इसमें आयुर्वेदिकएलौपैथी और होम्योपैथीतीनों का इस्तेमाल किया जा सकता है।  योग और टहलने से भी फायदा होता है।

प्यारा रिश्ता सास बहू का- साेमा सुर

बेटी,बहू ,पत्नी और मॉ की जिम्मेदारियों को निभाने के बाद अब मेरी सास बनने की बारी है। बेटे ने अपने लिए जीवनसाथी ढूंढ ली है। सोचा था, उसके लिए लड़की मै ढूंढगी पर फिर मैने खुद को समझाया कि मै भी तो उसकी पसंद की ही लड़की ढूंढती। अच्छा है उसने ही चुन ली, वरना हमारे पड़ोसी शर्मा जी को अपने बेटे के लिए 2 साल तक लड़की ढूंढनी पड़ी थी। जब सुधा (हमारी होने वाली बहू) को पहली बार देखा तो बड़ी खुशी हुई कि मेरे बेटे ने इतनी अच्छी लड़की पसंद की। लेकिन ये खुशी थोड़ी देर मे ही काफूर हो गयी। मेरी बहन ने सुनते ही कहा," बस.... दीदी, सुंदर लड़कियाँ तो अपने रूप रंग के घमंड मे ही रहती है।" मैने कहा,"नही नहीं बहुत पढ़ी लिखी, MNC मे जॉब करने वाली है सुधा।" इतना सुनते ही वो बोली फिर तो दीदी आप को किचन से कभी छुट्टी नही मिलने वाली । सुधा को देखकर जितनी खुशी हुई थी बहन की बातो से ठंडी हो गई । फिर शुरू हुई शादी की  shopping। मेरा बेटा जिसने कभी अपनी शर्ट नही खरीदी थी, बड़े शौक से सुधा के कपड़े खरीदने लगा। मुझे बहुत अच्छा लगा, चलो जिम्मेदार हो रहा है मेरा बेटा । पर साथ मे गई मेरी बेटी ने हँसकर कहा," देखा मॉ, भाई को तो कभी हमारे लिए कपड़े लेने नही आये अब तो सुधा के complexion से match करके dresses ले रहा है।" अचानक ही मन उदास हो गया सच ही तो कह रही है बेटी ,जब भी shopping के लिए कहती तो वो हमेशा बहाने बना देता था । मै क्या करूँगा जा कर ? मेरे समझ नही आता। कितना time लगाते हो आप लोग । ये सारी बातें सुनने से अच्छा था कि मै अकेले ही चली जाया करती थी। और देखो तो अब कैसे कर रहा shopping, office से leave लेकर। बस अब तो रोज की बाते हो गयी जो भी सुनता बेटे की शादी होगी मेरे लिए उनकी आँखो मे तरस साफ दिख जाता । और सबकी बाते सुन सुन कर मेरे मन मे सुधा के लिए  प्यार से ज्यादा नफरत घर करने लगी । मुझे भी अब लगने लगा बहु मेरे बेटे को मुझसे दूर कर देगी । ये बाते मै किसी से कह नही पी रही थी क्योकि मन तो ये जानता था कि मै गलत हूँ । अब शादी को सिर्फ 2दिन बचे थे । करने को इतना काम था पर मन ही नही कर रहा था कुछ करने को।  शाम को बेटे ने आकर बताया मॉ सुधा बहुत upset है , मुझे कुछ बता नही रही आपसे बात करना चाहती  है। मैने कहा ठीक है । मै उससे मिलने चली गयी। उसने मेरे पैर छु़ये फिर गले से लिपट गई एक छोटे से बच्चे की तरह। काफ़ी देर तक इधर उधर की बाते करने के बाद वो बोली ,"मम्मी  जी मै बहुत परेशान हूँ । जो भी मिलता है वो डरा जाता है, सास ये कहेंगी, सास वो कहेंगी । सास को ये बात पसंद होगी सास को वो बात नापसंद होंगी । मुझे बहुत डर लग रहा है । मै तो आपकी बेटी बनकर आपके घर आना चाहती हूँ। जब मै गलती करूँ आप मुझे डाँटे । जब मै कुछ अच्छा करूँ आप खुश हो जाएं। जैसे मैं अपनी मॉ को हर बात बताती हूँ वैसे ही आपको भी बताऊँ  । मैने उसे आगे कुछ भी कहने नही दिया । उसका हाथ थामकर  कहा," बेटा ऐसा ही होगा। न तो तू मेरी बहु होगी ,न तो मै तेरी सास । तू एक मॉ के घर से दुसरे मॉ के पास आ रही है ।" वो फिर से मुझसे लिपट गई।  
घर वापस आते हुए मै सोच रही थी कि जैसा मेरे साथ हो रहा था वही सब सुधा के साथ भी हो रहा है। मेरे बेटे के पैदा होने  के बाद से ही मैंने सोच रखा था जो भी गलत मेरे साथ हुआ था वो मै अपनी बहू के साथ नही करूँगी पर  मै उसी रास्ते पर चलने लगी थी । हमारे हितैषी अनजाने ही पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो कर अपनी सोच हम पर थोप देते है। 
 कोई भी बहु घर तोड़ने का सोच कर शादी नही करती और न तो कोई सास, बहु को सताने को ही जीवन का ध्येय समझती है । हम पहले से ही अपनी सोच बना लेते है बहु है तो ऐसा ही करेगी , सास है तो ऐसा ही करेगी । फिर गलतफहमियों की वजह से वही सारी बातें सच  हो जाती है। पर मैने अपने आप से और सुधा से वादा किया है, मै गलतफहमियो की वजह से हमारे इस प्यारे से रिश्ते को खराब नही होने दूँगा । 
ये कहानी हर बहु और सास की है , क्या ये आपकी भी कहानी है ??? अगर है तो comments जरूर करे ।

रविवार, 15 अप्रैल 2018

सिलेब्रिटी से मिलिए-नृत्य के बिना जीवन निष्प्राण है- सुनंदा नायर



 माेहिनीअट्टम जैसे पारंपरिक और शास्त्रीय नृत्य की वजह से से पूरी दुनिया में लाेकप्रिय सुनंदा नायर से आप सभी परिचित हैं। पिछले सप्ताह मैंने उनका एक साक्षात्कार लिया। पेश है उसी के अंश--
 सुनंदा जी बताएं नृत्य में सबसे खास क्या है.
 नृत्य में सबसे खास है भावभंगिमा, ताल और संयाेजन। यह तब ज्यादा अच्छे से हाे पाता है जब आपगीत के बाेल काे समझते हैं।
 आपने बहुत साे नृत्य सीखे हैं। मैं यह जानना चाहती हूं कि आपने शुरूआत कैसे की.
मैं एक मलयाली परिवार में पैदा हुई और छह साल की उम्र में मैंने पंडित दीपक मजूमदार से भरतनाट्यम की शिक्षा लेनी शुरू की। फिर कुछ साल बाद केरल के पारंपरिक नृत्य थियेटर में कथकली सीखने लगी। पं. मजूमदार से मैं भरतनाट्यम सीखती थी। उन्हीं की प्रेरणा से मैं मोहिनीअट्टम से जुड़ी। पं. मजूमदार जुहू (मुंबई) स्थित नालंदा नृत्य कला महाविद्यालय में नृत्य गुरू विदुषी कनक रैले जी से मोहिनीअट्टम सीखते थे। एक दिन उन्होंने मुझसे कहा कि तुम केरल की होकर भी अपनी शुद्ध नृत्य-कला क्यों नहीं सीखती? मैं समझ गई कि उनका इशारा मोहिनीअट्टम की तरफ था। मैं मोहिनीअट्टम सीखना चाहती थी लेकिन मन में यह आशंका भी थी कि कनक रैले जी मुझे शिष्या के रूप में स्वीकार करेंगी या नहीं। मैंने गुरूजी से पूछा-क्या वे मुझे सिखाएंगी? वे मुझे कनक रैले जी से मिलाने ले गए और सच कहूं तो उस दिन से मेरा जीवन बदल गया। मैंने भरतनाट्यम और कथकली सीखा जरूर था लेकिन उस वक्त तक नृत्य मेरी रुचि मात्र ही थी। कनक रैले जी की शिष्या बनना मेरे लिए एक बड़ा गौरव था। लेकिन तब भी मैं दो-तीन महीने इसी दुविधा में घिरी रही कि नृत्य मेरी रुचि मात्र है या मैं इसमें अपना भविष्य तलाश सकती हूं। आखिर मैंने तय किया, अब मोहिनीअट्टम ही मेरी जिंदगी है।...फिर मैं इसकी गहन लयात्मकता, सुकोमलता में डूबती चली गई।
माेहनी अट्टम में क्या खास है.
 मोहिनीअट्टम एक मादक नृत्य है। इसमें सिर्फ नायक-नायिका के विरह व्यथा की ही नहीं बल्कि उनके बेहद अंतरंग क्षणों की भी अभिव्यक्ति होती है। प्रस्तुति के दौरान मोहिनीअट्टम का वैशिष्ट्य साफ झलकता है। इसकी नृत्य-प्रस्तुति एक वृत्त के भीतर होती है। यह वृत्त बड़ी खूबसूरती के साथ नृत्यांगना के हर मूवमेंट के बीच एक सुंदर समन्वय स्थापित करता है।
नृत्य के लिए केरल खास क्याें है.
केरल में एक प्राचीन मंदिर है उसकी विशेषता नृत्य है। सदियों तक केरल के मंदिरों में देवदासियां इसे प्रस्तुत करती थीं। बाद में कई दशकों तक यह नृत्य उपेक्षित रहा। अब नई पीढ़ी केरल की पारंपरिक विरासत पर फिर से अपना ध्यान केंद्रित कर रही है। वैसे केरल के सामाजिक जीवन में नृत्य का बड़ा स्थान है। मैं साेचती हूं कि कृष्ण की बाललीला, रामायण की कथा जैसे लोकप्रिय प्रसंगों पर मोहिनीअट्टम की नृत्य-संरचना तैयार की जाए तो यह आम लोगों के बीच ही नहीं, बच्चों के बीच भी लोकप्रिय हो सकता है। तभी यह जनमानस तक पहुंचेगा।


पर्दे में रहने दाे पर्दा न उठाआे- अंतिमा सिंह



दोस्तों आज मैं आपसे कुछ ऐसी बाते शेयर कर रही हूं जिसमें आपकी सहमति और असहमति कुछ भी हाे सकती है। हाे सकत है मेरी बातें पुराने जमाने की लगे ... आजकल समाज मे आधुनिकता के नाम पर सब कुछ खुला होता जा रहा है कहीं सोशल मीडिया पर फिल्मी सितारे और हमारे युवा सैनेटरी पैड हाथ मे लेकर सेल्फी पोस्ट कर कर बहुत गर्व महसूस कर रहे है ..
कहीं टीवी पर न्यूज़ चैनल के बीच मे कंडोम के ऐड में उनके तरह तरह के फ्लेवर बता कर मॉडल अपनी बोल्डनेस का परिचय दे रही है ..
.कहीं सीरियल में हनीमून के अंतरंग दृश्यों को बच्चों के सामने परोसा जा रहा है कहीं रियलिटी शो में गर्लफ्रैंड को वैलेंटाइन डे पर कैसे प्रपोज़ किया जाए इसका लाइव प्रसारण हो रहा है ...
कहीं क्रिकेट के बीच मे कोकाकोला पी कर लड़कियों को इम्प्रेस करना दिखाया जा रहा है कहीं परफ्यूम के एड में बैडरूम के सीन को दिखाया जा रहा है ..

..क्या ये सब हमारे समाज के लिए सही है क्या इतना खुलापन हमारे बच्चों पर बुरा असर नही डालता आजकल के बच्चों का दिमाग वैसे भी पुराने जमाने के मुकाबले तेज़ चलता है हर घर मे टीवी , मोबाइल , लैपटॉप है ज्यादातर घरो में अनलिमिटेड इंटरनेट कनेक्शन और केबल टीवी उपलब्ध है हम अपने छोटे बच्चों को इससे दूर नही रख सकते...

पहले ज़माने में तो सिर्फ कुछ समय के लिए दूरदर्शन उपलब्ध होता था उसमें भी केवल ज्ञानवर्द्धक प्रोग्राम और सीरियल आते थे जिसमें बच्चों और बड़ो को केवल पारिवारिक बाते और संस्कार दिखाए जाते थे इसी कारण उस सदी में क्राइम का रेट कम रहा ...
हमारे मातापिता हमसे कुछ बाते छिपा कर रखते थे ऐसा नही की वो हमें ज्ञान से वंचित रखना चाहते थे ,बल्कि हमारे बड़ो का मानना था कि कुछ बाते पर्दे में ही रहनी चाहिए वक़्त आने पर और एक उम्र के बाद ही अगर ये बाते धीरे धीरे सामने आए तो ही समाज के लिए सही है
कुछ लोगो को पढ़कर लग सकता है कि मेरे विचार बहुत पुराने ख्यालो के है लेकिन दोस्तो कुछ बातें एक उम्र के बाद ही सामने लायी जाए तो हमारे लिए और समाज के लिए दोनो के लिए बेहतर है ...
आप ही बताइए क्या एक 4 या 5 साल के बच्चे को कॉन्डोम के बारे में जानना आधुनिकता है? एक 4 साल का बच्चा व्हिस्पर की एड देखकर सवाल करे कि मम्मी ये क्या है ? तो उसको बताना और समझना  मुश्किल होगा ।
अगर वो सैनिटरी पैड के साथ सेल्फी लेने को जिद करे या वो उसे पकड़कर खेले तो क्या ये आपको अच्छा लगेगा ? ...उसका बालमन अभी इतना विकसित नही हुआ कि उसे महिलाओं के पीरियड के बारे में ज्ञान दिया जाए ....
आजकल छोटे छोटे बच्चे टीवी या फिल्मों में अश्लीलता भरे विज्ञापन या गाने देखकर उनकी तरफ आकर्षित होते है क्योंकि उनके मन मे जिज्ञासा होती है कि ये सब क्या होता है तभी तो आजकल स्कूलों में भी 5 या 7 साल के बच्चे अपने ही उम्र के बच्चे के साथ यौन शोषण करते पाए गए है....
इसलिए इतना खुलापन हमारे समाज के बच्चो और युवा पीढ़ी को गलत दिशा की ओर ले जा रहा है इसी खुलेपन और आधुनिकता के कारण आजकल टीनएज लड़के लडकिया सेक्स की तरफ आकर्षित होकर अपनी जिंदगी से खिलवाड कर रहे है छोटी उम्र की लड़कियां गर्भनिरोधक गोलियों का सेवन बेझिझक कर रही है ...
इतने खुलेपन और आजादी के कारण ही समाज मे एक संस्कार विहीन पीढ़ी तैयार हो रही है ...
ये सब आधुनिकता नही बल्कि हमारी संस्कृति और संस्कारो के साथ खिलवाड़ है ...
आप ही बताइए जब सब कुछ एक पर्दे में था तब समाज के लोग ज्यादा संस्कारी और रिश्तों को समझने वाले थे
या अब जब लोग हाथ मे कंडोम और व्हिस्पर के पैकेट लेकर सड़को और कॉलेज कैंपस में घूम रहे है ,सोशल मीडिया पर अपनी सेल्फी पोस्ट कर के मॉडर्न होने का दिखावा कर रहे है ...
जरूरी नही की ये सब बातें चिल्ला चिल्ला कर समाज के सामने लायी जाए इन सब बातों की जानकारी सही उम्र आने पर भी बताई जा सकती है जैसे उनकी उम्र के मुताबिक उनके सिलेबस में ऐसे टॉपिक को शामिल किया जाए, जिस प्रकार सरकार प्लस पोलियो कार्यक्रम चलाती है उसी प्रकार घर घर जाकर महिलाओं और बच्चीयों को मुफ्त सैनेटरी पैड दिए जाएं ..
गली मोहल्लों में मोबाइल वैन द्वारा मासिक धर्म और गर्भ निरोधक उपायों के बारे में शिक्षाप्रद लघु नाटिका दिखाई जाए ...
जब प्लस पोलियो जैसा बड़ा अभियान भारत मे सफलता से चलाया जा सकता है तो फिर मुफ्त सैनेटरी पैड योजना गांव और शहरों में क्यों नही सफलता से चलाई जा सकती ...
केवल आधुनिकता का दिखावा कर समाज के कुछ लोग अपनी पब्लिसिटी के लिए समाज मे अश्लीलता परोस रहे है अब ये आपको सोचना है कि आप के बच्चो के लिए क्या सही है अंत मे मै तो यही कहना चाहूंगी कि
" पर्दे में रहने दो परदा ना उठाओ .....
आपके सकरात्मक और नकरात्मक दोनों कॉमेंट का दिल से स्वागत है .

शनिवार, 14 अप्रैल 2018

#मैंअपराजिताकहानीप्रतियाेगिता-दर्शना बांठिया

#मैंअपराजिताकहानीप्रतियाेगिता
 


जूगुनू को टिमटिमाते हुए देखकर कई विचार उमड़ने लगे ।मन ही मन सोचा कि मैंने अपने जीवन को कितना सार्थक अर्थ दिया है।पहले रिया के पिताजी को कम उम्र में ही हृदय रोग हो गया,इस कारण,उनकी सेवा-सुश्रुषा में अपने लिए कभी समय ही नहीं निकाल पाई, फिर 4 बच्चों की परवरिश करना आसान थोड़ी है,कभी किसी की पढ़ाई का खर्चा आ जाता, किसी को नए कपड़ें चाहिए होते...तो किसी की नई-नई फरमाइशें ,सब को खुश रखना बहुत बडी़ जिम्मेदारी थी।सिलाई-कढाई में इतनी आमदनी भी नहीं होती कि सबकी फरमाइशे पूरी कर सकूँ,जरूरतें पूरी हो जाती,वहीं बहुत है।
खैर अब सब जिम्मेदारी पूरी हो चुकी है,सब अपनी राहें तय कर चुके है।
आज सुबह-सुबह ही वो अपने पति की तस्वीर के आगें खड़ी हो गई,और एकटक निहारते हुए सोचने लगी ,कि उनके पति हमेंशा कहा करते थे,"तुम बहुत अच्छी कविता, कहानी,और नजम लिखती हो,हम तो तुम्हारें लेखन के दीवाने है।"
उन बातों को सोचते हुए ही उनके होंठों पर मुस्कान आ गई।
आज कई दिनों बाद वो मुस्कुराई है.उन्हें लगा कि मेरे बच्चों ने अपनी रूचि,स्वभाव व आदतों को हमेशा सर्वोपरि रखा....और अपने सपने पूरे किए ,भले ही दुनिया ने उनकी प्रतिभा को शुरू-शुरू में नकारा,कभी उन पर हँसे,कभी पीठ पीछे उनकी बुराईयाँ की ....,पर उन्होंने अपनी राहें कभी नहीं बदली..।आज मुझे खुशी है कि सबने अपनी मंजिलें पा ली है।
पर मैंने अपने शौक को हमेशा दबायें रखा.इतना समय हो गया, कुछ भी नहीं लिख पाई । अब मुझे भी अपने शौक व रूचि को आगे बढा़ना है।अपने लेखन को आगे बढा़ने का प्रयास करना है,इससे ही मुझे सच्ची खुशी मिलेगी.
. जीवन में अपनी रूचि को सबके सामने लाना ही ,उनका लक्ष्य बन गया। उनके मन में उम्मीद की नई लहरें उठने लगी,और अपनी पुरानी डायरी खोलकर उसमें नये रंग भरना शुरू कर दिया:-
उम्मीद
" उम्मीद वक़्त का बहुत बड़ा सहारा है "
"है उम्मीद तो हर लहर किनारा है "।।

#मैंअपराजिताकहानीप्रतियाेगिता 1

सुबह सुबह वह इसी साेच के साथ उठी कि आज से वह अपनी जिंदगी काे नया रंग देगी। पता नहीं ईश्वर ने कितना जीवन दिया है इसलिए वह अपने सपनाें काे हकीकत में बदलेंगी। रिया, मीना, प्रतीक और संज्ञान भी ताे है सब ने अपनी जिंदगी का एक टुकड़ा अपने लिए भी रखा है। अभी हाल ही में संज्ञान काे पुरस्कार मिलाऔर उसने कितने खूबसूरत तरीके से उसका जश्न मनाया। जबिक उसकी बीवी काे उसके इन सारे कामकाज में काेई दिलचस्पी नहीं। उसे ताे शायरी समझ ही नहीं आती। जाती थी ना पहले संज्ञान के साथ ध्यान हमेशा घड़ी में रहता था। पर संज्ञान ने शायरी का जुनीन न छाेड़ा और आज देखाे। और यह प्रतीक जब देखाे तब घर के कचरे में से कुछ न कुछ बनाता नजर आता। उसकी बीवी ने पानी की पुरानी बाेतल फैंक दी और वह उठा कर ले आया। उसकी बीवी काे कचरा पसंद नहीं और प्रतीक काे कचरा सहजने में मजा आता है। पुरानी बाेतल से उसने बहुत खूबसूरत पाट बनाए हैं । फेसबुक में कल उसकी पाेस्ट देखी हैरान हूं। बदला नहीं प्रतीक। रिया और मीना ने भी कहां बदला खुद का। रिया ताे वैसी ही बिंदास है नपहले डरती थी और न अब। हम कहते थे पुलिस में चले जा। पर वह पुलिस में ताे नहीं गई पर विधायक बन गई।हर समय लाेगाें से घिरी रहती है। शहर में उसका नाम है। बदनामी भी मिलती है। पर उसका अपना स्पेस ताे है ना। मीना के बारे में भी सुन ही लाे। उसकी एक अजीब सी आदत थी। दब भी सहेलियाें में झगड़ा हाेता ताे वह जिसने झगड़ा किया उसके साथ हाे लेती। उससे बार बार पूछती कि तूने एेसा किया क्याें। हम उससे नाराज हाेते। लेकिन वह चाेर की हमदर्द बन जाती। पिछले दिनाें एेेसे ही एक किताब पर नजर पड़ी अपराध के भीतर की तलछट लेखिका का नाम देखा मीना। तुरंत प्रकाशक काे फाेन करके मीना का नंबर मांगा।
इस एक महीने से मैं इसी पशाेपेश में हूं कि सबने अपना आकाश चुन लिया मैं ही अंधेरे में क्यूं रहूं। जुगनू ताे अंधेरे में ही टिंटिमाते है। कल रात कई जुगुनू मेरा आत्मविश्वास बढ़ा रहे थे.........


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अब कहानी का विस्तार आप दें। यही है प्रतियाेगिता

सुनहरा समय -मंजू सिंह


जीवन की भागदौड़ में कब ज़िन्दगी मुटठी की रेत की मानिंद हाथों से फिसल जाती है,पता ही नहीं चलता .घर बाहर की उलझनें ,बच्चो की ज़रूरतें,उनकी पढ़ाई,शादी और न जाने क्या-क्या ! यह सब करते बालों में कब सफेदी आ गयी,चेहरे की लकीरें कब गहरी हुईं और बूढी हड्डियों ने कब जवाब देना शुरू कर दिया, पता नहीं ! अपने मन की कब सुनी ,कब समझी ,कब की- याद नहीं .कभी घर और बच्चों के अलावा कुछ सूझा ही नहीं .
जी हाँ ! अधिकतर लोगों की यही कहानी होती है . हमारे देश में एक मध्यम वर्गीय परिवार में माता-पिता ऐसे ही ज़िन्दगी गुज़ार देते हैं और एक दिन आता है जब वे अपनी सभी ज़िम्मेदारियों का निर्वाह करने के बाद रिटायर हो जाते हैं .दफ्तर के लोग साठ वर्ष का होने पर जब गले में माला पहनाकर घर छोड़ने आते हैं तब एक परंपरा के अनुसार नाते-रिश्तेदारो को इकट्ठा कर दावत दी जाती है खूब नाच-गाना होता है .अच्छा लगता है कि चलो सब कामो से मुक्ति मिली आखिर कितने लोग होते हैं जिन्हें यह दिन देखना नसीब होता है.
अगले ही दिन एक खालीपन इंसान को घेरने लगता है.भीतर कहीं अपने बेकार हो जाने का एहसास सर उठाने लगता है.ऐसा लगता है जैसे आस –पास की हर नज़र घूर रही है .घर के एक फालतू सामान बन जाते हैं हम .एक अवसाद सा मन में घर करने लगता है .यही वह समय होता है जब हमे सँभलने की आवश्यकता होती है |
रिटायरमेंट के बाद का समय कैसे बिताये इसकी योजना बनाने की सोचें आप कोई निरर्थक सामान नहीं हैं .आपने अपना पूरा जीवन दिया है घर को और घर के सदस्यों को, अब बारी है आपकी .बचा हुआ जीवन सुख-चैन से अपने मन मुताबिक जीने की. आखिर ज़िन्दगी न मिलेगी दोबारा .अपनी कुछ धनराशि को अपने घूमने-फिरने के लिए अवश्य रखें यदि पति-पत्नी दोनों ही काम-काजी हों तो रिटायरमेंट आगे-पीछे होता है जब तक दोनों रिटायर न हो जाएँ तब तक छुटियों का भरपूर आनंद लें
अपनी दिनचर्या में सुबह शाम सैर और व्यायाम के लिए समय अवश्य निकालें याद रहे स्वस्थ्य हज़ार नियमित.अपनी दवा आदि के समय का ध्यान रखिये
अपने शौक जो आप अपनी व्यस्तता के चलते कभी पूरे नहीं कर पाए उनके विषय में सोचिये और समय निकालकर कुछ न कुछ अवश्य करिये.आप अपना बाग़बानी का शौक पूरा कर सकते हैं यदि जगह है तो कहने ही क्या घर की उगी ताज़ा सब्ज़ी का आनंद और स्वाद तो अलग होगा ही साथ ही आप मिलावटी नकली रंगी हुई सब्ज़ी खाने से भी बच जायेंगे।

यदि आप अपना पुस्तक-प्रेम निभाना चाहते हैं तो पढ़िए-कहते हैं की पुस्तक से अच्छा और सच्चा साथी और कोई नहीं होता पुस्तकें आपको दुनिया के कई नए स्थानों. की सैर कराएंगी और नए लोगों से भी मिलवाएंगी आप चाहें तो ह लिखने का शौक भी पूरा कर सकते हैं अपने मन की बात जो आप कभी न कह पाए हों अपनी कलम को कहने दीजिये न ! वैसे यदि आप टेक्नोलॉजी से परिचित हैं तो आपके लिए अन्य कई विकल्प खुल जाते हैं आप एंड्राइड के माध्यम से बहुत कुछ सीख या कर सकते हैं अपने पुराने मित्रों एवं सम्बन्धियों से एक बार फिर संपर्क साध सकते हैं यह काफी रोमांचक और प्रसन्नता देने वाला होगा . अपने बच्चों व्नातीपोतों से सीख सकते हैं .एक नयी दुनिया के द्वार खुल जायेंगे आपके लिए .
ज़िन्दगी की उलझनों और आपा-धापी में हमारे रिश्तों के धागे कुछ कमज़ोर पड़ जाते हैं लोगों की हमेशा यह शिकायत ही रहती है कि अब हम स्वार्थी हो गए हैं अपने में मगन रहनेवाले हो गए हैं किसी से कोई मतलब ही नहीं रखते....तो इन मीठे उलाहनों पर भी ध्यान देने और सब की शिकायत मिटने का अच्छा समय है अब आपके पास सबसे मिलिए जूलिये और पुराने समय कि यादें ताज़ा करिये सब के साथ मिलकर तीज-त्योहारों का आनंद लीजिये नाचते- गाते, हँसते- खेलते जीवन व्यतीत कीजिये उम्र बस एक नंबर है आप दिल से युवा महसूस करेंगे .स्वस्थ्य भी अच्छा रहेगा .
नयी पीढ़ी के लोगों के साथ विचारों कि कश- म- कश में उलझकर अपना और बच्चों का जीवन मुश्किल कर लेते हैं हम कभी-कभी .यदि आप उनकी सहूलियतों का ध्यान रखेंगे,उनकी भावनाओं को समझेंगे तो वे कभी आपसे विमुख न होंगे और जीवन आसान हो जायेगा .
एक अंतिम किन्तु आवश्यक बात,अपनी जमा-पूंजी में से कुछ बच्चों को अवश्य दें इससे आपसी प्यार और विश्वास बढ़ेगा,परंतु अपने लिए एक ऐसी राशि अवश्य रखें जिसके सहारे आपका शेष जीवन सरलता से बीत जाये और बच्चों को भी यह आशा रहे कि सेवा करेंगे तो मेवा मिलेगा ...अन्यथा न लें,ऐसी सोच प्रायः देखने को मिलती है वैसे इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि हम अपने बच्चों पर भरोसा न करें .उनपर पूरा भरोसा रखें.आपसी सहयोग से चलें और यह तो कदापि न समझें कि अब तो जीवन थोड़ा ही बचा है काट लेंगे जैसे-तैसे यह सोचकर बैठे रहेंगे कि अब तो बस कुछ ही दिन जीना है यूँही काटलें,बुढ़ापे में कैसा घूमना और कैसा आनंद .तो जीवन सिमटकर और छोटा तथा कठिन हो जायेगा .
जीवन जीने के लिए है जियो जीभर के .

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2018

उर्वशी बन सकती हैं मिसेज इंडिया


   लंदन में कलर्स टीवी और बैंड वर्क द्वारा आयोजित मिसेज इंडिया यूके 2018’ स्पर्धा के फाइनल राउंड में उर्वशी सालारिया चावला ने अपनी जगह बनाई है। इसका ग्रैंड फिनाले 15 अप्रैल को लंदन के हिल्टन टॉवर ब्रिज होटल में आयोजित किया जाएगा।
 यूनाइटेड किंगडम में रहने वाली एशियाई विवाहित महिलाओं के लिए मिसेज इंडिया यूके एक अनूठी सौंदर्य प्रतियोगिता है। इस साल इस प्रतियाेगिता में  उर्वशी सालारिया चावला ने भी हिस्सा लिया है।
काैन है उर्वशी
 उर्वशी मेकअप इंडस्ट्री की एक सफल उद्यमी हैं और भारत में एक ब्यूटी स्टूडियो का मालिक है।लंदन में एशियाई दुल्हनों के मेकअप की एक सम्मानित कलाकार हैं। पत्रकारिता में स्नातकविमानन उद्योग में काम कर चुकी एवं एक सौंदर्य ब्लॉगर उर्वशी सालारिया चावला फिलहाल ब्रिटेन में रहने वाली शादीशुदा एशियाई महिलाओं का बड़े प्लेटफार्म पर प्रतिनिधित्व करती हैं। शादी करने के बाद से उर्वशी सालारिया चावला चार वर्षों से लंदन में रह रही हैं। इतना ही नहींउर्वशी सालारिया चावला एक पर्यावरणविद् भी हैंजो जलवायु परिवर्तन के बारे में जागरूकता फैलाने में विश्वास रखती हैं। वह कई पौधरोपण अभियान का संचालन कर चुकी हैं और डब्ल्यूडब्ल्यूएफ अर्थ आॅवर अभियान जैसे पर्यावरण संबंधी गतिविधियों से भी स्वयंसेवी के तौर पर जुड़ी हुई हैं। उर्वशी एक उद्देश्य के लिए सौंदर्य’ की अवधारणा में विश्वास करती हैं। वह मिसेज इंडिया यूके 2018’ स्पर्धा में 30 अन्य मल्टीटैलेंटेड फाइनलिस्ट के साथ प्रतिस्पर्धा करेंगी।
क्या इस प्रतियाेगिता का उद्देश्य
 उल्लेखनीय है कि मिसेज इंडिया यूके’ प्रतियोगिता का मकसद एशियाई विवाहित महिलाओं को सशक्त बनाने  के हिसाब से किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए उचित अवसर प्रदान कराना है। यह प्रतियोगिता अपने मेंटर्स की मदद से विदेशों में भारतीयों की विविध संस्कृतियों के बीच संबंधों को सीखनेआत्मविकासआत्मविश्वास और आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए प्रेरित करता है। उर्वशी और मिसेज इंडिया यूके’ प्रतियोगिता की अन्य सभी प्रतियोगी फिलहाल विभिन्न सलाहकारों के साथ गहन प्रशिक्षण के दौर से गुजर रही हैं।  इस प्रशिक्षण के दौरान इन प्रतिभागियों के लिए फिटनेसकैटवॉकएक्टिंगफोटोशूट जैसे कई सेशंस हैं।
क्या कहती हैं उर्वशी
 उर्वशी बताती है, ‘हमारे मेंटर्स ने हमारी इस प्रशिक्षण यात्रा के दौरान हर किसी की सहायता करने के साथ ही खुद पर ध्यान केंद्रित करने के टिप्स बताने  में मदद कर रहे हैं। इतना ही नहींवे ऑनलाइन सेशंस के माध्यम से भी हमें सलाह उपलब्ध करा रहे हैं।’ उल्लेखनीय है कि सुंदरता शारीरिक नहींमानसिक और दिल से होना चाहिए’ के सिद्धांत पर यकीन करने वाली उर्वशी ने हाल ही में मिसेज इंडिया यूके’ की उपटाइटल मिसेज इंडिया ग्लैमरस’ खिताब जीता है।

बेटे की चाहत- कमलेश आहूजा

माँ का नाम आते ही मन श्रद्धा और प्रेम से भर जाता है .वैसे तो माता पिता दोनों ही बच्चों के लिए अहम होते है ,किंतु कहीं ना कहीं माँ बच्चों के दिल के ज़्यादा क़रीब होती है ..,उनका दुःख दर्द बिना कहे ही भाँप लेती है.
मीना के बड़े बेटे रोहित की १२वी बोर्ड की परीक्षाएँ शुरू होने वाली थी ..रोहित पढ़ने में बहुत होशियार था ......हमेशा कक्षा में अव्वल आता था.इस बार तो उसने पूरे वर्ष बहुत मेहनत की थी ...वह इंजीनियर बनना चाहता था,ओर इसके लिए उसके पास मात्र एक ही विकल्प था कि १२वी बोर्ड की परीक्षा में उसके अच्छे अंक आएँ....क्योंकि उस समय प्रवेश परीक्षाओं का प्रावधान नहीं था .
सब कुछ ठीक चल रहा था ...परीक्षा शुरू होने में शेष दो दिन रह गए थे ...मीना बेटे के साथ बैठी थी,क्योंकि मीना ने भी रसायनशास्त्र में एम.एस सी. की थी तो बेटे को जहाँ कही दिक़्क़त होती ...वह मदद करती .अचानक पति के ऑफ़िस से फ़ोन आया कि उनकी तबियत बिगड़ गयी थी और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया है .मीना को तो मानो काटो तो ख़ून नहीं ,ऐसी हालत हो गयी बेचारी की.बेटा भी घबरा गया और रोने लगा .बेटे को रोते देखकर ....मीना ने अपने आपको सम्भाला ओर रोहित को ढाँढस बँधाने लगी..."बेटा सब ठीक हो जाएगा.मैं हूँ ना,तुम केवल अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो".रोहित की पूरी परीक्षा के दौरान मीना के पति के दो मेजर ऑपरेशन हुए ,उसका एक पांव घर में व एक अस्पताल में रहता ....पर उसने अपने आत्मविश्वास को कम नहीं होने दिया.....बड़े धैर्य के साथ दोनों बच्चों को अकेले सम्भाला.सदैव चेहरे पर मुस्कान लिए रहती ओर रोहित को भी प्रोत्साहित करती रहती.....परीक्षाएँ समाप्त हो गयी......मीना के पति भी सकुशल अस्पताल से घर आ गए .कुछ ही दिन में रोहित का रिज़ल्ट आ गया .....उसने अपने विद्यालय में सर्वाधिक अंक प्राप्त करके प्रथम स्थान पाया साथ ही राज्य स्तर पर भी मेरिट में स्थान पाया...मीना और उसके पति तो ख़ुशी के मारे फूले नहीं समा रहे थे .... सब लोग बधाई दे रहे थे ......और सारा श्रेय रोहित को दे रहे थे।
रोहित के विद्यालय मे ऐसे बच्चों को सम्मानित करने के लिए एक कार्यक्रम का आयोजन रखा गया ,जिन्होंने १२वी बोर्ड की परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करके विद्यालय का नाम रोशन किया था.अविभावको को भी बुलाया गया था .
मीना रोहित के साथ सबसे आगे की पंक्ति में बैठी थी. कार्यक्रम शुरू हुआ ....... कुछ औपचारिकतायों के बाद स्टेज पर रोहित को बुलाया गया .......प्रिन्सिपल व मुख्यअतिथि ने रोहित की पीठ थपथपाई ओर हाथ में माइक थमाते हुआ कहा ...."बेटा अपनी सफलता का श्रेय आप किसको देना चाहोगे..?" रोहित ने माइक हाथ में लिया.पहले थोड़ा नर्वस हो गया पर जल्दी ही उसने अपने को संभाल लिया और बोला- " मेरी सफलता के पीछे मेरी माँ का समर्पण है ....सब के लिए ये सामान्य सी बात हो, किंतु माँ के लिए वो समय किसी चुनौती से कम नहीं था .एक तरफ़ पापा का ऑपरेशन करवाना तो दूसरी ओर मेरी परीक्षा सुचारू रूप से सम्पन्न करवाना ....उस कठिन समय में भी उन्होंने अपना मनोबल बनाए रखा और मेरा भी उत्साह बनाए रखा.......जिसके पास ऐसी ममतामयी,धैर्यशाली माँ हो वो जीवन की हर कठिन से कठिन परीक्षा में सफल हो सकता है.मैं ईश्वर से यही प्रार्थना करता हूँ कि वो हर जन्म में मुझे ऐसी ही माँ दे........!! ".रोहित की आँखों में आँसू आ गए.वहाँ उपस्थित सभी अभिभावक भी रोहित की बातें सुनकर भावुक हो गए.
 कहानी से सीख-कठिन समय में यदि माता पिता अपना धैर्य बनाये रखते हैं और बच्चों को भी प्रोत्साहित करते रहते हैं, तो वह बच्चों के लिए प्रेरणा बन जाते हैं. यही प्रेरणा उन्हें सफलता की ओर ले जाती है। और भविष्य के निर्माण में उनकी सहायक बनती है.यही इस कहानी का भाव है।

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