शनिवार, 22 अगस्त 2026

लंदन फोर्ट- क्या है 'एकार धोती' का रहस्य

संस्कृति हमारी भाषा बोली के साथ-साथ गीत संगीत, दीवारों पर बने चित्र और हमारे चूल्हे की आग, भोजन के स्वाद में भी ज़िंदा रहती है। कभी भी कोई त्यौहार आता है, पापा बहुत खुश होते । वे बहुत उत्सवधर्मी थे। उनको पकवान पसंद थे, खासकर सिंगल और बड़े। पहाड़ी रायता, खीर भी उनकी पसंदीदा लिस्ट में शामिल थे। पर उन्हें मीठा बहुत पसंद था।
सोचती हूं जब हमारे पूर्वज विश्वशर्मा इस पहाड़ी धरती में आए होंगे तो कैसे उन्होंने तारतम्य बनाया होगा। कैसे भाषा सीखी होगी? पर उनका अपनी माटी का असर अब भी हमारी माटी की सुगंध में रचा बसा है। मेरे बहुत सारे दक्षिण भारतीय मित्र हैं। उनसे बात करते हुए मैं बार-बार खुद को टटोलने लगती हूँ। अपने भीतर कुछ खास सा महसूस होता है। सबसे बड़ी और हैरान करने वाली समानता है—मोटे अनाजों (Millets) के प्रति अगाध प्रेम। दक्षिण भारत में खाया जाने वाला 'रागी' ही उत्तराखंड में 'मंडुआ' कहलाता है। कर्नाटक का सबसे प्रसिद्ध ग्रामीण भोजन है 'रागी मुद्धे', जिसमें रागी के आटे को उबलते पानी में घोटकर गोल पिंड बनाए जाते हैं। उत्तराखंड में ठीक इसी विधि से मंडुए के आटे से 'बड़ी' (Baadi) बनाई जाती है। दोनों का स्वाद, दोनों का पोषण और बनाने का तरीका बिल्कुल एक जैसे हैं। इसी तरह दक्षिण भारत में उपवास में खाए जाने वाले मिलेट 'कुथिरवल्ली' को हमारे उत्तराखंड में 'झंगोरा' कहा जाता है। दक्षिण भारत में इसका पोंगल बनता है, तो हमारे यहाँ पहाड़ों में दूध और गुड़ के साथ इसकी 'झंगोरे की खीर' बनाई जाती है। दक्षिण भारत का मशहूर 'मेदु वड़ा' हमारे पहाड़ों में शुभ अवसरों पर बनने वाले 'उड़द के बड़ा' के रूप में दिखाई देता है। दोनों में ही बिना छिलके वाली उड़द की दाल को पीसकर मसाले मिलाकर डीप-फ्राई किया जाता है।
एक और महत्वपूर्ण बात हमारे श्री संप्रदाय से जुड़े इस वैष्णव कुल में भोजन को भगवान का 'यज्ञ प्रसाद' माना जाता था। इस सात्विक मर्यादा को बनाए रखने के लिए हमारी रसोई में शुद्धता के नियम बेहद कड़े थे। हमारी दादियाँ और माताएँ स्नान के बाद केवल 'एक वस्त्र' (एक कपड़े में शुद्ध होकर) ही चूल्हे पर बैठती थीं। जब तक खाना बन न जाए, वे किसी अन्य वस्तु या व्यक्ति को स्पर्श नहीं कर सकती थीं। कुमाऊँनी लोक-संस्कृति में इस परम शुद्ध और एकाग्र शारीरिक-मानसिक अवस्था को 'एकार धोती' कहा जाता था।
यह परंपरा शत-प्रतिशत सुदूर दक्षिण भारत के तमिल और कान्नड़ ब्राह्मण परिवारों की प्राचीन 'मड़ी' (Madi) प्रथा जैसी थी। मान्यता है कि स्नान के बाद शरीर में जो सकारात्मक ऊर्जा और शुद्धता आती है, वह किसी अशुद्ध स्पर्श से नष्ट न हो । मैंने माँ-नानी को बहुत लंबे समय तक इस 'एकार धोती' के कठिन नियमों का पालन करते हुए भोजन बनाते देखा है। खाना बनाते समय बात करना तक वर्जित था, ताकि मुँह की सूक्ष्म बूँदें भी भोजन की शुचिता को खंडित न कर सकें। बस मन ही मन लक्ष्मी-नारायण का नाम स्मरण किया जाता था।
पहाड़ी 'आलू के गुटके' और 'गुझिया' व तीखी 'भांग की चटनी' का तो कोई सानी नहीं। लोहे की कढ़ाई में जब शुद्ध सरसों का तेल गरम होता है, तो आलुओं में 'जख्या' का तड़का लगाया जाता है। जख्या के काले दाने गरम तेल में जाते ही 'चट-चट' की तीव्र ध्वनि के साथ चटकने लगते हैं।
भोजन का यह तरीका भी सुदूर दक्षिण भारत (तमिलनाडु और कर्नाटक) की रसोई से मेल खाता है, जहाँ आलू की सूखी सब्जी या सांबर-रसम की शुरुआत हमेशा 'काली राई' (Mustard Seeds) के चटकते हुए तड़के से होती है। जो काम दक्षिण में काली राई करती है, वही काम हमारे पहाड़ों में जख्या करता है।
वहीं, दक्षिण भारत के भोजन में जो स्थान 'नारियल की चटनी' (Coconut Chutney) का है, वही हमारे कुमाऊँ में भुने हुए भांग के दानों और तिल को सिल-बट्टे पर पीसकर बनाई जाने वाली भांग की चटनी का है। सोचती हूं जब हमारे पूर्वज श्री विश्वशर्मा दक्कन को छोड़कर हिमालय की इन ऊँची वादियों में आए, तो यहाँ नारियल मिलना बंद हो गया। लेकिन उनकी स्वाद-ग्रंथियों को भोजन के साथ वह गाढ़ी, खट्टी-तीखी चटनी खाने की आदत थी। हमारे पूर्वजों ने नारियल के विकल्प के रूप में पहाड़ों में मिलने वाले भांग के बीजों को खोज निकाला। अचरज देखिए, दोनों ही चटनी का गाढ़ापन (Texture) और स्वाद का संतुलन आज भी शत-प्रतिशत एक जैसा ही है।

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