रविवार, 2 अगस्त 2026

लंदन फोर्ट डायरी-बाम, बम या ब्रह्म से जागीर में मिला गांव है बिषाड़



ज एकादशी है। पापा को गए आज 3 माह हो गए। पर पापा, जैसे हर बार याद दिलाते हो कोई किस्सा-कहानी या फिर घटनाएं। हर किस्सा- कहानी के पीछे छिपा है एक इतिहास। बहुत बार यह खुद को जानने-समझने की कोशिश भी होती है। हमारे समाज में बहुत सारी प्रथाएं और कुप्रथाएं भी है और इन सबके पीछे छिपी हैं कई सदियों की दास्तानें। कभी लोककथा या फिर लोक संगीत की धुन में अपना विरह गाती हैं, कभी अपना वजूद तलाशती हैं।
आखिर हम कौन हैं.. कहां से आए हैं… हमारे पूर्वज, कौन है, ..यह सवाल ही इन कहानियों की तस्दीक करता है। बिषाड़ की कहानी शुरू होती हैं 13 वीं से 15 वीं शताब्दी के आसपास। इस समय कत्यूरी राजवंश का पतन हो चुका था और
उत्तराखंड के इतिहास में बाम (या बम) राजा पिथौरागढ़ की सौर घाटी (सोर क्षेत्र) के मध्ययुगीन शासक के रूप में उभरे थे। यह नाम सुनने में थोड़ा अटपटा से लगता है इसलिए कयास यह भी है कि कहीं यह या ब्रह्म का अपभ्रंश तो नहीं है, जिसका प्रयोग वे खुद को उच्च कुल का या दैवीय शक्तियों से प्रेरित शासक सिद्ध करने के लिए करते हों। कुछ कहते हैं कि पश्चिमी नेपाल के डोटी राजपरिवार व रैका राजाओं के सामंत उनकी ही एक शाखा हैं। तो कुछ इन्हें कत्यूरी राजाओं के वंशजों की एक शाखा भी मानते हैं। जो भी हो, यह राजा मौसम के हिसाब से अपना काम करते थे। ठंड के महीनों में घाटी से नीचे रामेश्वर और बैलोरकोल चले जाते थे। चाहे आम जनता ठंड में ठिठुरती रहे। राजाओं के नाम भी निराले थे जैसे कर्किल बम, काकिल बम, चनारी बम, आर्की बम, ज्ञानी बम, शक्ति बम, विजय बम और हरी बम ।
इन्हीं राजाओं के शासनकाल के दौरान पिथौरागढ़ के सोर क्षेत्र में भट्ट ब्राह्मणों का आगमन होता है। उनका आना एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और ऐतिहासिक घटना बनता है। पहाड़ी शैली में दक्षिण की लोककलाएं और धुन समाने लगते हैं। रहन-सहन और खान-पान बदलता है। धार्मिक अनुष्ठान में रुढ़िवादिता की जगह शास्त्रीय मतमतांतर को व्याख्याकार और टिप्पणीकार एक बड़ा फलक देते हैं। शिक्षा का द्रार खुलता है। श्री विश्व शर्मा तो यूं ही घूमते हुए तीर्थाटन के लिए दक्षिण द्रविड़ देश (दक्षिण भारत) से सोर घाटी (पिथौरागढ़) आए थे। जब वह यहां पहुंचे तो तत्कालीन सोर क्षेत्र के बम राजाओं से उनकी मुलाकात हुई। वह उनकी विद्वत्ता और वेदों के ज्ञान से प्रसन्न हुए और उनको यही ठहरने का न्यौता भी दे डाला। विश्वशर्मा के लिए यह निर्णय लेना आसान नहीं था। सब कुछ उनके लिए अलग था। रहन-सहन, वेशभूषा और भौगोलिक स्थितियाँ भी। उन्होनें समय मांगा परिवार से बात की पर तब तक वह कुमाऊं की सुंदरता में खुद को खो बेठे थे। और फिर यहीं के होकर रह गए। इन्हें उत्तराखंड का एकमात्र दक्षिण भारतीय मूल (दक्षिण द्रविड़ देश) का भट्ट ब्राह्मण माना जाता है, जो मध्यकाल में काशी के रास्ते होते हुए कुमाऊं पहुंचे थे। बम राजाओं ने भट्ट ब्राह्मणों के निर्वाह और सम्मान के लिए पिथौरागढ़ के पास स्थित बिषाड़ गांव उन्हें जागीर (भूमि दान) के रूप में भेंट कर दी। आज भी हमारी बहुत सारी रस्म रिवाज में दक्षिण भारत की झलक है।
हमारे गांव के बारे में जानने के लिए आप इस लिंक को भी देख सकते हैं।
बिषाड़ गांव से शुरू होकर इस कुल की शाखाएं कालांतर में कुमाऊं के पल्लू, खेतीखान, पांडेखोला, रामनगर, काशीपुर और देश के अन्य हिस्सों में विस्तृत हो गईं। आगे की कहानी में हम पाते हैं कि वह दरबार में राज्य कर्मचारी और सलाहकार बनाए गए। इन भृगु वंशी और विश्वामित्र गोत्रीय ब्राह्मणों को क्षेत्र के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों, जैसे रामेश्वर और थल केदार, के आचार्य होने का गौरव भी मिला।
स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार, पिथौरागढ़ क्षेत्र के कई ऐतिहासिक नौले (पारंपरिक जल स्रोत) और किलों का निर्माण इन्हीं बम शासकों द्वारा करवाया गया था। कुछ स्थानीय इतिहासकारों का मानना है कि पिथौरागढ़ शहर में स्थित पुराने किले (जिसका जीर्णोद्धार बाद में गोरखाओं ने किया) की नींव या उसका शुरुआती ढांचा मूल रूप से बम राजाओं के शासनकाल के दौरान ही रक्षात्मक चौक के रूप में तैयार किया गया था।
लेकिन यह बम शासक बहुत क्रूर भी थे। उनके समय में विवादों को सुलझाने के लिए दिव्य परखाओं (जैसे गर्म कुल्हाड़ी छूना या उबलते तेल में हाथ डालना) की प्रथा का प्रचलन था जो उस दौर के सामंती समाज का असली चेहरा दिखाता है। लोक-कथाओं में वर्णन आता है कि उनके दरबार में अपराध सिद्ध करने के लिए वैज्ञानिक साक्ष्यों के बजाय 'दैवीय परीक्षाओं' का सहारा लिया जाता था, जैसे:गोला-दीप: उबलते हुए तेल में हाथ डालकर कड़ाही की तली से सिक्का निकालना। कढ़ाई-दीप: लाल-गर्म लोहे की छड़ या कुल्हाड़ी को नंगे हाथों से छूना। यदि व्यक्ति का हाथ नहीं जलता था, तभी उसे निर्दोष माना जाता था। मैं इसे एक क्रूर और आदिम न्याय प्रणाली के युग के रूप में दर्ज करती हूं। आज भी मुझे ऐसी खबरें पढ़ने को मिलती हैं, विचलित करती हैं। मेरी आस्था पर प्रहार करती हैं।
लंदन फाेर्ट के पिछले अंक आप इस लिंक में पढ़ सकते हैं




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