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शुक्रवार, 28 सितंबर 2018

हेयर कलर करवाती हैं क्या....


युवाओं में बालों को रंगने का चलन तेजी से बढ़ा है, लेकिन कई बार आपका यह शौक चिंता का विषय भी बन सकता है। अमेरिका और यूरोप में बालों में कलर कराने वाले लोगों में कैंसर के लक्षण पाए गए, जिससे यह साफ हुआ कि बालों को रंगना कैंसर का कारण भी बन सकता है। हेयर डाई को कई रसायनों से मिलाकर तैयार किया जाता है, इन रसायनों के संपर्क में आने से कैंसर का खतरा बढ़ता है। एक अध्‍ययन से यह भी सामने आया कि जिन महिलाओं ने 1980 से पहले हेयर डाई का इस्‍तेमाल शुरू किया, उन्‍हें हेयर डाई न लगाने वाली महिलाओं के मुकाबले 30 फीसदी कैंसर होने का खतरा ज्‍यादा था।

कलर करने के लिए आपको यह पता होना चाहिए कि बालों में कैसा कलर करें, मसलन कौन सा रंग आप पर सूट करेगा या कौन सा रंग आपके बालों के लिए सही रहेगा आदि। इस लेख के जरिए हम आपको दे रहे हैं कुछ ऐसी जानकारी जिससे आप बालों में कलरिंग के नुकसान के बारे में जान सकते हैं।
बालों में कलरिंग के नुकसान
हेयर डाई से ल्‍युकेमिया या लिम्‍फोमा होने का खतरा बढ़ता है। साथ ही इसे मूत्राशय कैंसर के खतरे से जोड़ कर भी देखा गया है।
डॉक्‍टरों के मुताबिक गर्भवती महिलाओं का बिना चिकित्‍सीय सलाह के हेयर डाई का इस्‍तेमाल नहीं करना चाहिए। हेयर कलर आपकी सेहत के साथ ही नवजात को भी नुकसान पहुंचा सकता है।
परमानेंट हेयर कलर कराने के बाद कई बार लोगों में त्‍वचा संबंधी परेशानियों को देखा गया है। इसलिए आप स्‍थायी हेयर कलर की बजाय टेम्‍परेरी कलर कराएं तो बेहतर होगा।
बालों को कलर कराते समय यह सुनिश्‍चित कर लें कि कौन सा कलर आपके बालों के लिए सही रहेगा, इस मामले में जरा सी लापरवाही आपके अच्छे बालों को नुकसान पहुंचा सकती है।
बालों को कलर करवाने से पहले आपको एलर्जी का भी ध्यान रखना चाहिए, कई बार कुछ कलर या डाई बालों को नुकसान पहुंचा सकती है। ऐसे में यदि आपको अमोनियायुक्‍त डाई सूट न करें तो आप प्रोटीन युक्‍त डाई का प्रयोग भी कर सकते हैं। इसके लिए आप हेयर एक्सपर्ट या ब्यूटी पार्लर में जाकर परामर्श भी ले सकते हैं।
हेयर कलर कराने वालों को कुछ समय बाद त्वचा संबंधी दिक्कतों जैसे बालों की कोमलता में कमी, बाल जल्दी सफेद होना आदि का भी साममा करना पड़ता है। हेयर कलर में मिला अधिक अमोनिया बालों के लिए नुकसानदायक हो सकता है। इससे आपके सिर से सारे बाल भी गायब हो सकते हैं।
बालों को घर पर कलर करने के दौरान ब्रश और हाथों में दस्तानों का प्रयोग जरूर करें और अपनी आखों का खासतौर पर ध्यान रखें। यह आपकी आंखों को नुकसान पहुंचा सकता है, इसलिए पहली बार किसी अनुभवी या
प्रोफेशनल व्यक्ति से कलर करवाना चाहिए।
बालों को कलर करने से पहले उन्हें धोकर सुखा लें और बालों को कंघी के एक सिरे से उठाते हुए कलर करें। इससे आपके बालों के टूटने का खतरा कम रहेगा।
यदि आपकी दिनचर्या व्यस्त हैं तो आपको हल्‍का हेयर कलर इस्तेमाल करना चाहिए। इससे आपके बालों को ज्‍यादा नुकसान नहीं होगा।
साभार- आेनली माई हेल्थ डॉटकाम

गुरुवार, 27 सितंबर 2018

मिलिए अपनी सेहत के रखवाले से- रेनु दत्त

आंवले के नियमित उपयोग से कई शारीरिक समस्याएं ठीक की जा सकती है। आंवले को कच्चा, सुखाकर या जूस निकाल कर इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें किसी तरह के केमिकल नहीं मिले होते है इसलिए स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है। बात करते हैं इसके गुणों के बारे में।
तनाव या नींद नहीं आने की समस्या में इसका सेवन लाभदायक होता है।
आँखों की ज्योति के लिए और चश्मा हटाने में बहुत लाभदायक है।
हमारे शरीर में बहुत सारे हानिकारक तत्व इक्ट्ठे हो जाते हैंं और इसके सेवन से उन्हें बड़ी आसानी से बाहर किया जा सकता है।
लीवर और ब्लैडर को सही तरीके से काम करने में मदद करता है इसके लिए आप रोजाना सुबह खाली पेट आंवले के रस का उपयोग करें।
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इसके सेवन से मेटाबोलिज्म में सुधार आता है और मोटापे को भी कंट्रोल करने में मदद मिलती है।
इसका सेवन रोगप्रतिरोधक क्षमता को ब-सजय़ा देता है जिससे रोगों से बचाव की क्षमता में वृद्धि होती है।
इसका सेवन बालों के लिए वरदान हो सकता है।
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चुकंदर के सेहत के लाभ
चुकंदर के रूप में प्रकृति ने हमारे शरीर की जरुरत के अनुसार हर तरह के गुणों से भरपूर फल हमें दिया है। इसकी सबसे खास बात है कि इस फल को एनीमिया में सबसे अधिक गुणकारी माना जाता हैै।
इसके अंदर प्रचुर मात्रा में कार्बोहाइड्रेट पाया जाता है इसलिए यह उर्जा का बेहतरीन स्त्रोत है। कार्बोहाइड्रेट हमारे शरीर के ऊर्जा के स्तर में इजाफा करता है जिसकी वजह से हमे थकान की समस्या नहीं होती है।
सफेद चुकंदर का इस्तेमाल फोड़े और जलन जैसी समस्या में भी किया जा सकता है। इसके बेतरीन स्वास्थ्य लाभ के लिए सफेद चुकंदर को पानी में उबालकर और छानकर अलग कर लें और उसका इस्तेमाल फोड़े और मुहांसे के लिए कर सकते हैं।
खसरा और बुखार की वजह से हो सकता है आपकी त्वचा खराब हो गयी हो तो चुकंदर के इस्तेमाल से आप उसे भी ठीक कर सकते है।
इस से हमारे पाचनतंत्र को सकारात्मक रूप से प्रभावित करने वाले कारकां को उतेजना मिलती है जिसकी वजह से पाचनतंत्र भी बेहतर हो जाता है।
इसमें आयरन की भी प्रचुर मात्रा होती है इसको खाने से हमारे खून के अंदर पाए जाने वाली लाल रक्त
कोशिकाएं एक्टिव रहती हैं। एनिमिया होने पर डाक्टर भी इसका सेवन करने की सलाह देते हैं। रक्त की व्याधिओं के लिए यह सबसे उत्तम फल है। जिस से शरीर में नया खून बनने की क्रिया को बल मिलता है।
इसके सेवन से शरीर पर आई विभिन्न चोट और घाव भरने में भी मदद मिलती है और हमारी चोट जल्दी ठीक हो जाती है।
कब्ज जैसे रोगों में भी यह लाभदायक है।
रक्तचाप को नियमित करने में भी यह सहायक होता है।
चुकंदर का सेवन बवासीर में भी उतम होता है।
यह न केवल आपकी आंतरिक शक्ति को ब-सजय़ाता है साथ ही मांसपेशियों को भी मजबूत बनाता है। के लिए भी सही होता है।
इसमें प्रचुर मात्र में पोटेशियम, मैग्नेशियम, आयरन, विटामिन बी6 सी, फोलिक एसिड भी होता है । इसके अलावा इसमें प्रचुर मात्रा में शक्तिदायक एंटीआक्सीडेंट होते हैं जो आपके शरीर को विभिन्न रोगों से लड़ने में आपकी मदद करते है।
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बुधवार, 26 सितंबर 2018

फूल गोभी और पत्ता गोभी से बनाएं लजीज पकवान -नीरा कुमार

पत्ता गोभी, फूल गोभी और ब्रोकली बहुत पौष्टिक होते हैं। लेकिन आप ज्यादातर इनकी सब्जी ही बनाती होंगी। अगर आप चाहें तो इनसे कई तरह के स्वादिष्ट-चटपटे व्यंजन भी बना सकती हैं। इसीलिए इस बार हम आपके लिए लेकर आए हैं, पत्ता गोभी, फूल गोभी और ब्रोकली से बने कुछ डिफरेंट डिशेज की रेसिपी।
चटपटी पत्ता गोभी 
 सामग्रीबारीक कटी पत्ता गोभी: 3 कप
हरे मटर के दाने: 1 कप
बारीक कटा गाजर: 1/2 कप
काली मिर्च: 15 नग
चीनी: 1/2 टी स्पून
मस्टर्ड ऑयल: 2 टेबल स्पून
हल्दी पावडर: 1/2 टी स्पून
बारीक कटा अदरक-हरी मिर्च: 2 टी स्पून
मेथी दाना: 1 टी स्पून
नींबू का रस: 1 टी स्पून
नमक: स्वादानुसार
कटा हरा धनिया: 1 टेबल स्पून
विधिएक कड़ाही में तेल गर्म करें।
उसमें मेथीदाने का तड़का लगाएं, फिर कुटी काली मिर्च, अदरक, हरी मिर्च, हल्दी पावडर, मटर और गाजर डालकर तीन मिनट तक ढंक कर मंदी आंच पर पकाएं।
मटर और गाजर गलने पर कटी पत्ता गोभी डाल कर मिलाएं। अब नमक और चीनी डालें।
पांच मिनट तक मंदी आंच पर ढंक कर पकाएं। ध्यान रहे पत्ता गोभी थोड़ी क्रिस्पी रहनी चाहिए।
अच्छी तरह भूनने के बाद नीबू का रस डाल कर गैस बंद कर दें।
सर्विंग डिश में सब्जी पलटें और ऊपर से कटा हरा धनिया बुरक कर सर्व करें।
फूल गोभी कोरमा
 सामग्रीकद्दूकस की हुई फूल गोभी: 3 कप
बारीक कटी अदरक-हरी मिर्च: 2 टी स्पून
मेथी दाना: 1/2 टी स्पून
हल्दी पावडर: 1/4 टी स्पून
लाल मिर्च पावडर: 1/2 टी स्पून
धनिया पावडर: 1 टी स्पून
गर्म मसाला: 1/2 टी स्पून
दरदरी कुटी सौंफ: 1/2 टी स्पून
रिफाइंड ऑयल: 1 टेबल स्पून
नमक: स्वादानुसार
थोड़ा सा कटा हरा धनिया: सजाने के लिए
विधिकड़ाही में तेल गर्म करके मेथी दाने का तड़का लगाएं, फिर अदरक हरी मिर्च, फूल गोभी डालकर कुछ देर पकाएं।
हल्दी पावडर, धनिया पावडर, मिर्च पावडर और नमक डालकर एकसार करें।
गोभी गलने पर गर्म मसाला, दरदरी सौंफ और हरा धनिया डालकर अच्छी तरह मिक्स करें।
नान या परांठे के साथ फूल गोभी कोरमा सर्व करें।
नीरा कुमार जानी मानी कुकरी एक्सपर्ट हैं।

रविवार, 23 सितंबर 2018

चाय के साथ फैशन की जुगलबंदी- डा. अनुजा भट्ट

लोककलाओं का विशेष महत्व हैं। इस दौर में फैशन और फिल्म से जुड़े हर व्यक्ति की निगाहें लोककला को लेकर बेहद संजीदा है। और जब बात अपने देश की हो तो यह तो वैसे भी अपनी विविध संस्कृतियों के लिए जाना जाता है। अलग अलग पहनावा, आभूषण, खान पान, संगीत, भाषा का अद्भुत समागम हमें सबसे जोड़कर रखता है। समय समय पर बनने वाली क्षेत्रीय फिल्में, रंगमंच, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सिनेमा इसे फैशन के साथ जोड़कर पूरी दुनिया के लिए सहज सुलभ बना देते हैं। सिने तारिक प्रियंका चोपड़ा जब असम घूमने गई तो उन्होंने वहीं का परंपरागत परिधान मेखला-चादर पहना और वहीं के पारंपरिक आभूषण भी पहने। उनकी यह तस्वीर सोशल मीडिया पर छाई रही। यह देखकर यह जानना मुझे दिलचस्प लगा कि आखिरकार असम का फैशन ट्रेंड क्या है। किस तरह के परिधानों की मांग है और आभूषणों की क्या- क्या खास विशेषताएं हैं। वैसे तो असम अपनी संस्कृति , पारंपरिक नृत्य बिहू और अनेक कलाओं के लिए प्रसिद्ध है, परंतु इसकी अनोखी वस्त्र कला लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। असम का रेशमी कपड़ा तो पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है जिसे मूंगा सिल्क के नाम से जाना जाता है।

जब से साड़ी पहनने के तोर तरीके में बदलाव आया है तब से यह युवाओं के आकर्षण का केंद्र भी बन गया है। आज साड़ी कई तरह के पहनी जा रही है। भारत में तो वैसे भी साड़ी कई तरह से पहनी जाती रही हैं पर अब इसे पहनने का अंदाज परंपरा से एकदम जुदा है। कहीं यह लैगिंग के साथ ते कहीं सलवार और जींस के साथ पहली जा रही रही है। साड़ी का हर अंदाज बहुत खूबसूरत है। यह एक ऐसा भारतीय वस्त्र है, जिसे हर कद-काठी की महिला बड़ी ही सहजता से पहन सकती है और ख़ूबसूरत लग सकती है।

असम की साड़ी पहनने का भी अंदाज अपने आप में अलग है। इसमें पल्लू अलग से होता है जिसे चादर कहते हैं। मेखला को साया यानी पेटीकोट के साथ पहना जाता है और साड़ी की ही तरह प्लेट्स यानी चुन्नटें डाली जाती हैं। पर इसके पल्लू को इसके साथ जेड़ना पड़ता है। आइए जानते हैं इस २-पीस साड़ी के विषय में कुछ विशेष तथ्य।

इस पारंपरिक साड़ी को विशेषकर रेशमी धागों से बुना जाता है, हालांकि कभी कभी हमे यह साड़ी कपास के धागों से बुनी हुई भी मिल सकती है, तो कभी कभी इसे कृत्रिम रेशों से भी बुना जाता है। इस साड़ी पर बनी हुई विशेष आकृतियाँ (डिज़ाइन्स) को केवल पारंपरिक तरीक़ों से ही बुना जाता है, तो कभी कभी मेखला और चादर के छोर पर सिला जाता है। इस पूरी साड़ी के तीन अलग अलग हिस्से होते हैं, ऊपरी हिस्से के पहनावे को चादर और निचले हिस्से के पहनावे को मेखला कहते हैं। “मेखला” को कमर के चारों ओर लपेटा जाता है। “चादर” की लंबाई पारंपरिक रोज़मर्रा में पहने जाने वाली साड़ी की तुलना में कम ही होती है। चादर साड़ी के पल्लू की तरह ही होती है, जिसे मेखला के अगल-बगल में लपेटा जाता है। इस २-पीस साड़ी को एक ब्लाउज़ के साथ पहना जाता है। एक विशेष तथ्य यह भी है, कि मेखला को कमर पर लपेटते वक़्त उसे बहुत से चुन्नटों(प्लीट्स) में सहेजा जाता है और कमर में खोंस लिया जाता है। परंतु, पारंपरिक साड़ी पहनने के तरीक़े के विपरीत, जिसमें चुन्नटों को बाएँ ओर सहेजा जाता है, मेखला की चुन्नटों को दायीं ओर सहेजा जाता है।

फैशन डिजाइनर नंदिनी बरूआ कहती हैं कि वैसे तो यह पारंपरिक २-पीस साड़ी आज भी आसाम के हर छोर में पहनी जाती है पर जब से यह फैशन वीक जैसे कार्यक्रमों का हिस्सा बनी इसकी मांग बढ़ गई है। अब इसमें विभन्न तरह के रंगों और रेशों का प्रयोग किया जा रहा है। सूती और सिल्क के कपड़े के अलावा अब और भी तरह के कपड़ों का प्रयोग हम कर रहे हैं। स्थानीय रेशमी धागों के अलावा बनारसी रेशम, कांजीवरम और शिफॉन के रेशों का भी प्रयोग भी आज कल होने लगा है। जोर्जेट,क्रेप, शिफॉन से बनी २- पीस साड़ियों के अत्यधिक चलन की वजह यह है कि यह पहनने में हल्के होते हैं साथ ही इनकी कीमत भी कम होती है।

सिर्फ साड़ी ही नहीं अब बुनकरों द्रारा तैयार किए गए परंपरागत कपड़ों से आधुनिक परिधान भी बनाए जा रहे हैं जिसमें स्कर्ट से लेकर गाउन, जैकेट, सलवार सूट, फ्राक शामिल है। अंतर इतना है कि इसके मोटिफ एकदम पारंपरिक है। यही इसकी अलग पहचान है।

परिधान हों और उसके साथ आभूषण न हों तो सारी सजधज का मजा किरकिरा हो जाता है इसलिए यदि आप असम के फैशन को अपना रहे हैं तो साथ में वहीं के परंपरागत लेकिन आधुनिक आभूषण पहनें।

असम में स्वर्ण आभूषणों की एक मनमोहक परंपरा रही है। असमी आभूषणों में वहां की प्रकृति, प्राणी और वन्य जीवन के अलावा सांगीतिक वाद्यों से भी प्रेरणा ग्रहण की जाती है। गमखारु एक प्रकार की चूडियां होती हैं जिनपर स्वर्ण का पॉलिश होता है और खूबसूरत फूलों के डिजाईन होते हैं। मोताबिरी एक ड्रम के आकार का नेकलेस होता है जिसे पहले पुरुषों द्वारा पहना जाता था लेकिन अब इसे स्त्रियां भी पहनती है। असम के उत्कृष्ट स्वर्ण आभूषणों की कारीगरी मुख्य रूप से जोरहाट जिले के करोंगा क्षेत्र में होती है, जहां प्राचीन खानदानों के कुशल कलाकार के वंशजों की दुकानें है. यह जानना रोचक है कि असम के आभूषण पूरी तरह हस्तनिर्मित होते हैं, भले ही वे स्वर्ण के हों या अन्य धातुओं के. यहाँ के पारंपरिक आभूषणों में डुगडुगी, बेना, जेठीपोटई, जापी, खिलिखा, धुल, और लोकापारो उल्लेखनीय हैं. ये आभूषण प्रायः 24 कैरट स्वर्ण से बनाए जाते है।
कंठहार – गले में पहनने वाले हार की विस्तृत श्रृंखला यहां मिलेगी जिसके अगल अलग नाम है। हर नाम की अपनी एक खास विशेषता है। हार को मोती की माला में पिरोया जाता है। यह महीन मोती काला, लाल, हरा, नीला,सफेद जैसे कई रंगां मे उपलब्ध है। बेना, बीरी मोणी, सत्सोरी, मुकुट मोणी, गजरा, सिलिखा मोणी, पोआलमोणी, और मगरदाना जैसे नाम कंठहार के लिए ही है।

अंगूठी-इसी तरह अंगूठी के भी कई नाम हैं। जैसे- होरिन्सकुआ, सेनपाता, जेठीनेजिया, बखारपाता, आदि।

कंगन- गमखारुस, मगरमुरिआ खारु, संचारुआ खारु, बाला, और गोटा खारु. शादी ब्याह में पहने जाने वाले खास वैवाहिक आभूषणों के नाम हैं

ठुरिया, मुठी-खारु, डूग-डोगी, लोका-पारो, करूमोणी, जोनबीरी, ढोलबीरी, गाम-खारु, करू, बाना, और गल-पाता।

असम का एक सबसे प्रचलित और उल्लेखनीय आभूषण है, कोपो फूल (कर्णफूल). इसकी बनावट ऑर्किड से मिलती-जुलती है, जबकि इसका बाहरी भाग दो संयुक्त छोटी जूतियों के आकार का होता है, जिसकी बनावट फूलों जैसी होती है। गामखारु, गोलपोटा और थुरिया सबसे मंहगे आभूषण माने जाते हैं।

संक्षेप में कहें तो असम के फैशन में अभी भी वहां की लोककला के गूंज सुनाई देती है। ढोलक और वीणा के स्वर के साथ तालमेल बिठाती आभूषण की खनक भी सुनाई देती है। कृषि के औजारों को आभूषण के डिजाइन में ढालना और संगीत से सुर में बांध देना यही है असम का फैशन...
मेरा यह लेख आज के जनसत्ता में प्रकाशित है
लिंक
http://epaper.jansatta.com/1827968/लखनऊ/23-September-2018#page/16/1


जीवन में लाएगा बदलाव यह दाे अक्षर का शब्द- दर्शना बांठिया

कहते है क्षमा मांगने वाले से बड़ा क्षमा करने वाला होता है।
क्षमा वाणी के दिन हम सब से क्षमा मांगते है ,पर वास्तव में क्षमा क्या है ......इससे ही व्यक्ति अनजान रहता है ।
क्षमा मेरे नजरिए से क्या है :-
क्या है क्षमा......?
किसी दूसरे की गलतियों की लगी धूल को अपने दिल की परत से साफ कर देना...।
या किसी पराये द्वारा भी की गयी भूल को हंस कर टाल देना और उसे भी अपना बना लेना
क्या है क्षमा .......?
अपने मन में किसी कारण वश भरे हुए गुबार को निकाल कर हल्के और आनंदित हो जाना।
या अपने अंदर पैदा हुयी अंहकार की आग को,विनम्रता रुपी जल से धो डालना।।
क्या है क्षमा........?
किसी बड़े द्वारा दिये हुये अपमान के घूंट को ये सोचकर जी जाना कि वो आपसे बडे़ है ,और किसी छोटे द्वारा की गयी उद्दण्डता को नजरअंदाज कर अपने बड़प्पन को साबित करना।।

कहने को तो सिर्फ दो अक्षर का ये शब्द है ,पर अगर इसे गहराई से समझ लिया जाये और जीवन में उतारने का प्रयास कर लिया जाये तो इंसान अपने मनोवैज्ञानिक स्तर को बहुत ऊपर उठा सकता है ,न जाने कितने अपराध होने से पहले ही रूक सकते है,न जाने कितने टूटे रिश्तें फिर से जुड़ सकते है।।
तो आइए इस बार हम सभी से हृदय से वास्तविक क्षमा याचना करते है।

शनिवार, 22 सितंबर 2018

स्मृति शेष- विष्णु खरे की दो कविताएं

हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि और हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष विष्णु खरे अब हमारे बीच नहीं रहे। उनका निधन साहित्य जगत में एक अपूरणीय क्षति है। अपने विशद अध्ययन और विपुल साहित्य से हिंदी जगत को अनमोल संपदा देने वाले खरे की ये हैं 2 प्रमुुख कविताएं...

कहो तो डरो...
कहो तो डरो कि हाय यह क्यों कह दिया
न कहो तो डरो कि पूछेंगे चुप क्यों हो

सुनो तो डरो कि अपना कान क्यों दिया
न सुनो तो डरो कि सुनना लाजिमी तो नहीं था

देखो तो डरो कि एक दिन तुम पर भी यह न हो
न देखो तो डरो कि गवाही में बयान क्या दोगे

सोचो तो डरो कि वह चेहरे पर न झलक आया हो
न सोचो तो डरो कि सोचने को कुछ दे न दें

पढ़ो तो डरो कि पीछे से झाँकने वाला कौन है
न पढ़ो तो डरो कि तलाशेंगे क्या पढ़ते हो

लिखो तो डरो कि उसके कई मतलब लग सकते हैं
न लिखो तो डरो कि नई इबारत सिखाई जाएगी

डरो तो डरो कि कहेंगे डर किस बात का है
न डरो तो डरो कि हुक़्म होगा कि डर

अक्स.....

आईने में देखते हुए
इस तरह इतनी देर तक देखना
कि शीशा चकनाचूर हो जाये-
फिर भी इतना मुश्किल नहीं

वह शीशे में
यूँ और इतना देखना चाहता है
कि बिल्लौर में तिड़कन तक न आये
सिर्फ़ जो दिख रहा है वह पुर्जा-पुर्जा हो जाए
और जो देख रहा है वह भी
फिर भी एक अक्स बचा रहे
जिसका वह है उसे जाने कैसे देखता हुआ
अमर उजाला से साभार.

शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

सुंदरता के राज दादी मां के पास - अनामिका अनूप तिवारी

खूबसूरत स्वस्थ त्वचा की चाह किसे नहीं होती, चाहे स्त्री हो पुरुष खूबसूरत दिखने की चाह सबके अंदर होती है, महिलाएं हज़ारों रूपये ब्यूटी पार्लर और महंगे ब्यूटी प्रॉडक्ट्स में खर्च कर देती है लेकिन फिर भी संतुष्ट नहीं होती, लेकिन कुछ घरेलू उपायों से आप की त्वचा मुलायम, चमकदार और स्वस्थ हो सकती है।
"उबटन" सौंदर्य निखारने की सबसे प्राचीनतम विधि हैं, जिसे घरेलु स्त्रियों से लेकर रानी महारानियाँ भी अपनी सौंदर्य को बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करती थी।
"उबटन" का नाम सुनते ही दादी नानी के बनाये उबटन की याद आ जाती है, पहले शादी ब्याह में एक दो महीने पहले ही होने वाली दुल्हन को उबटन लगाया जाता था जिससे की विवाह वाले दिन दुल्हन चाँद का प्रतिरूप लगे।
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पीली सरसों या तिल का उबटन-सरसो का उबटन बहुत प्राचीन समय से चली आ रही है।

पीली सरसों या तिल को हलके आंच पर भून कर दूध के साथ पीस कर बारीक पेस्ट बना ले।

इस पेस्ट को चेहरे, हाथ एवं पैरों में लगायें सूखने पर हलके हाथों से छुड़ाये।
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सरसो या तिल का उबटन- शुष्क त्वचा पर चमत्कारिक रूप से असर करता है, चेहरे की नमी बनाए रखता है और त्वचा को चमकदार और मुलायम बनाये रखता है।
फूलों का उबटन- फूलों का उबटन प्राचीन समय में रानी महारानियोँ के लिए विशेष रूप से तैयार किये जाते थे।

इस उबटन को बनाने के लिए, गुलाब, गेंदे, लैवेंडर और पारिजात के फूलों को सुखा कर पाउडर बना लेते है।

इस मिश्रण को गुलाब जल, कच्चा दूध या दही के साथ पेस्ट बना कर चेहरे पर लगाये सूखने पर चेहरें को ठंडे पानी से धो ले।

फूलों का उबटन विशेषतः मिश्रित त्वचा के लिए ज्यादा लाभकारी है। ये खुशबुदार उबटन चेहरे पर निखार के साथ कसाव भी लाती है, चेहरे के दाग धब्बों को भी दूर करने में सहायक है।
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दही बेसन का उबटन- दही बेसन का उबटन भी दादी नानी के ज़माने से चली आ रही है।

दही, बेसन और हल्दी का गाढ़ा लेप बनाये उसमे 2/3 बुँदे तिल का तेल मिलाये और इस लेप को चेहरे और हाथ, पैरों पर लगाये सूखने पर उँगलियों की सहायता से मसल कर छुड़ा ले जिस से की त्वचा पूरी तरह से साफ़ हो जायें इसके बाद गुनगुने पानी से अच्छे से धो ले।

ये उबटन चेहरे को साफ, मुलायम और चमकदार बनाती है, चेहरे के दाग धब्बो को पूरी तरह से साफ़ कर त्वचा पर निखार लाती है।
संतरे और नींबू के छिलके का उबटन-यह उबटन हर प्रकार की त्वचा के लिए लाभकारी है।

ये उबटन चेहरे की झाई की समस्या, दाग, झुर्रियां और चेहरे पर आयी कालिमा को दूर करता है।

इसको बनाने के लिए संतरे और नींबू के छिलकों को धूप में सुखा ले, अच्छे से सुख जाने पर महीन पाउडर बना ले।

हर रोज़ इस मिश्रण को कच्चे दूध या गुलाब जल में पेस्ट बना कर चेहरे पर लगाये सूखने पर हलके गुनगुने पानी से चेहरे को धो ले।

इस उबटन को आप नियमित रूप से लगा सकती है, अगर त्वचा पर मुहांसे की समस्या है तो इस में नीम की पत्तियों को सुखा कर पावडर बनाये और फिर संतरे ,नींबू के मिश्रण में मिला कर लगाये।

उबटन स्नान करने से 1 घंटा पहले लगाये या फिर रात में सोने से पहले भी लगा सकते है।

उबटन का इस्तेमाल नियमित रूप से करने से त्वचा में निखार तो आता है त्वचा संबंधी समस्याओं से भी मुक्ति मिलती है।

साबुन की जगह उबटन को दे और बनाये खुद को खूबसूरत और स्वस्थ त्वचा की मालकिन।
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गुरुवार, 20 सितंबर 2018

काैन से तेल में खाना पकाती हैं आप- प्रीति बिष्ट

हम भारतीय जिस तरह के भोजन का सेवन करते है उसे बिना तेल के बनाना संभव नहीं है। अक्सर बिना तेल के भोजन का सेवन हम तभी करते है जब हमारा स्वास्थ्य ठीक न हो या शुगर जैसी स्वास्थ्य समस्या में किया जाने वाला कोई परहेज़ न हो। सरल भाषा में तेल न सिर्फ हमारे भोजन को बल्कि हमारे स्वास्थ्य पर भी सीधा असर डालता है। इसलिए सही तेल का चुनाव करना बेहद जरूरी है। आइए जानते हैंः

खाना बनाने की पद्धति चाहे जैसी हो हम उसमें कभी थोड़ा तो कभी ढेर सारा तेल इस्तेमाल अवश्य करते हैं। तेल भोजन के स्वाद को तो बढ़ाता है, साथ ही यह हमारे स्वास्थ्य में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आपको यकीन नहीं होगा मगर यह सच है कि डायटीशियन भी डायटिंग करने वालों को तेल का सेवन एकदम बंद करने की सलाह कभी नहीं देते है। हालांकि उन्हें तेल का सेवन बहुत कम मात्रा में करना होता है।
तेल न सिर्फ शरीर को एनर्जी प्रदान करता है बल्कि ये फैट में अवशोषित होने वाले विटमिन्स जैसे - के, ए, डी, ई के अवशोषण में सहायक होता है। ये प्रोटीन और कार्बोहाइडेट के मैटाबोलिज़्म को भी तेज़ कर इनके पाचन में मदद करता है।
अति है खराब: ़
चाहे कोई चीज आपके लिए कितनी ही अच्छी क्यों न हो मगर अति किसी भी चीज़ की अच्छी नहीं होती है। तेल का अधिक मात्रा में सेवन करने से एलडीएल यानी खराब कोलेस्टाॅल का स्तर  बढ़ाता है जोकि हृदय संबंधी समस्याओं को जन्म देता है। इसलिए तेल का संतुलित मात्रा में सेवन करे।
सही का चुनाव:
आप जिस तरह से खाना बनाना चाहते है तेल का चुनाव उसी के अनुसार करें।
ऽ तलने के लिए - जिस तेल को आप तेज आंच पर भी पका सकते है उसका प्रयोग हमेशा तलने के लिए करना चाहिए। रिफाइंड आॅयल जैसे सूरजमुखी आदि का प्रयोग करें।
ऽ हल्का फ्राई और खाना बनाने के लिए - आॅलिव आॅयल, मूंगफली या राई का तेल प्रयोग कर सकते है।
आवश्यक फैटी एसिड:
तेल में मोनोसैच्युरेटिड फैट्स या पाॅलीअनसैच्युरेटिड फैट्स होते है। मोनोसैच्युरेटिड फैट्स शरीर में एलडीएल यानी खराब कोलेस्टाॅल को कम करता है और एचडीएल यानी अच्छे कोलेस्टाॅल को बढ़ाता है। आॅलिव आॅयल, सरसों, मूंगफली का तेल आदि इसी श्रेणी में आते है। इसके अलावा पाॅलीअनसैच्युरेटिड फैट्स एलडीएल के स्तर को तो कम करता ही है मगर यदि इसका सेवन अधिक किया जाएं तो ये एचडीएल को भी कम करने लगता है। इसमें सोयाबीन, बिनौला, तिल का  तेल आदि आते है।
यदि आप चाहते है कि आप संतुलित तेल का चुनाव करें तो आपको दोनों प्रकार के तेलों का चुनाव करना होगा। हर सप्ताह बदल-बदल कर इनका प्रयोग करें। पर ध्यान रहें कि इन दोनों  तेलों को एक साथ न मिलाएं।
महत्वपूर्ण तथ्य:
ऽ तेज आंच पर तेल को न जलाएं। यदि आप इस तलने के लिए प्रयोग किए गए तेल का दुबारा प्रयोग करना चाहते हे तो इसे छान लें और इसे ठंडा करने बाद ही स्टोर करें। अगर आप तेल को छानकर साफ नहीं करते है तो इसमें बचे खाने के अवशेष से रैनसिडिटी हो सकती है। ऐसे तेल का प्रयोग करने से कैंसर जैसी समस्या के होने की आशंकाएं बढ़ सकती है।
ऽ तेल की उम्र बढ़ाने के लिए उसे एक विशेष प्रक्रिया से तैयार किया जाता है। जिसमें तेल में हाइड्रोजन को मिलाया जाता है। इसे हाइड्रोजैनेटिड या पार्शली हाइड्रोजैनेटिड आॅयल कहा जाता है। इसका प्रयोग करने से एलडीएल का स्तर बढ़ता है और हार्ट अटैक आने की आशंकाएं बहुत बढ़ जाती ह। इसलिए फूड लेबल देखकर ही इनका चुनाव करें।
ऽ रिफाइंड आॅयल का अर्थ है तेल को ऐसी प्रक्रिया से निकालना जिससे तेल का स्वाद, रंग साफ हो जाएं। और जब इसकी अशुद्धियां दूर की जाती है तब इसे फिल्टर किया जाता है। जब इसे दो बार फिल्टर किय जाता है तब इसे डबल फिटर्ड आॅयल कहा जाता है। मगर इस पूरी प्रक्रिया में तेल के मिनरल, बीटाकैरोटिन और विटमिन ई भी नष्ट हो जाते है। अनरिफाइंड आॅयल प्राकृतिक होते है और इनमें उन बीज का स्वाद भी रहता है जिनसे इन्हें बनाया गया है। मगर कई बार इनका प्रभाव इतना अधिक होता है कि सब्जी या भोजन में तेल के स्वाद आने लगता है।
आप कौन से तेल का चुनाव करेंगे ये अब आप पर है।

बुधवार, 19 सितंबर 2018

चाट के शाही अंदाज- नीरा कुमार

चाट के नाम पर मुँह में पानी आना जैसे मुहावराें का सही अर्थ पता चलता है ताे इसकी लाेकप्रियता का अंदाज इस बात से लग जाता है कि गली का नाम ही पड़ जाता है चाट वाली गली। साइनबाेर्ड पर अक्सर आपने देखा- पढा हाेगी चाट वाली गली के सामने। आज में आपकाे एेसी ही कुछ खास चाट की विधि बता रही हूं जाे आपका स्वाद और सेहत दाेनाें बदल देंगे।
मैक्सिकन कार्न चाट

सामग्री :
उबले कार्न 1 कप
बारीक कटी लाल पत्तागोभी 2 बड़े चम्मच
बारीक कटी हरी बंदगोभी 2 बड़े चम्मच
बारीक कटी प्याज 1 बड़ा चम्मच
बारीक कटी हरी शिमलामिर्च 1 बड़ा चम्मच
बारीक कटा टमाटर 1 बड़ा चम्मच
टोमैटो कैचप 1 बड़ा चम्मच, नमक
चाट मसाला और जीरा पाउडर स्वादानुसार
थोड़ी सी सेकी हुई पापड़ी या खाखरा

विधि :
उबले कार्न में उपरोक्त लिखी सभी सामग्री मिलाएं और ऊपर से सेकी हुई पापड़ी या खाखरा छोटे टुकड़ों में तोड़ कर डालें।
बढिय़ा मैक्सिकन चाट तैयार है।


मटर की चाट

सामग्री : सफेद मटरा 250 ग्राम
खाने वाला सोडा 1/4 छोटा चम्मच
हल्दी पाउडर 1/4 छोटा चम्मच
दालचीनी 1 इंच टुकड़ा
साबुत बड़ी इलायची 1 नग
लौंग 4 नग
बारीक कतरा प्याज ½ कप
बीजरहित क्यूब में कटा टमाटर ½ कप
बारीक कतरा अदरक
हरीमिर्च 1 बड़ा चम्मच
इमली का गाढ़ा पल्प 2 बड़े चम्मच
बारीक कतरा हरा धनिया 2 बड़े चम्मच
चाट मसाला
नमक
जीरा पाउडर
लालमिर्च पाउडर स्वादानुसार
हरी चटनी
मीठी चटनी आवश्यकतानुसार
विधि :
मटरा को साफ करके पानी से धोएं और चार कप पानी व खाने वाले सोडे के साथ रात भर भिगो दें।
सबेरे पानी से अच्छी तरह धोएं।
मटरा में दो कप पानी, लौंग, इलायची, दालचीनी, हल्दी पाउडर और थोड़ा सा नमक डालकर प्रेशरकुकर में गलने तक पकाएं।
इस मटर में से दालचीनी, लौंग और बड़ी इलायची निकाल लें।
बाकी सभी सामग्री मिलाएं और सर्विंग प्लेट में मटरा रखें, ऊपर से खट्टी मीठी चटनी डालकर सर्व करें।
नीरा कुमार एक जानी मानी कुकरी विशेषज्ञ हैं। कुकरी से जुड़े सवाल आप हमारे मैं अपराजिता के पेज पर पूछ सकते हैं। आपके सवालाें का स्वागत हैं।
mainaparajita@gmail.com

मंगलवार, 18 सितंबर 2018

मनाेविज्ञान से मनाेरंजन तक शबाना की चर्चा हर तरफ

जन्मदिन मुबारक हाे

शबाना आजमी हिंदी सिनेमा की ऐसी मंझी हुई अदाकारा हैं जो खुद को हर अभिनय के अनुरूप उसी साँचे ढल जातीं हैं। उन्होंने हिंदी फिल्मों में तरह तरह के रोल अदा किये हैं। वह आज भी फिल्मों में सक्रिय हैं। एक अभिनेत्री होने के साथ-साथ शबाना आजमी सामाजिक कार्यों में भी समान रूप से जुडी रहतीं हैं। शबाना आजमी हिंदी सिनेमा के मशहूर लेखक,संगीतकार जावेद अख्तर की पत्नी हैं।


उनके पिता मशहूर शायर, कविकार थे। उनकी माँ का नाम शौकत आजमी था, जोकि इंडियन थिएटर की आर्टिस्ट थीं। मां से विरासत में मिली अभिनय-प्रतिभा को सकारात्मक मोड़ देकर शबाना ने हिन्दी फिल्मों में अपने सफर की शुरूआत की।

पढ़ाई
शबाना ने अपनी शुरुआती पढ़ाई क़्वीन मैरी स्कूल मुंबई से की है। उन्होंने मनोविज्ञान (Psychology) में स्नातक किया है. उन्होंने स्नातक की डिग्री मुंबई के सेंट जेवियर कॉलेज से ली है. शबाना आजमी ने एक्टिंग का कोर्स फिल्म एंड टेलिविजन इंस्टिटीयूट ऑफ इंडिया (Film and Television Institute of India), पुणे से किया है।

शादी
शबाना आजमी की शादी हिंदी सिनेमा के मशहूर संगीतकार जावेद अख्तर से हुई है। जावेद अख्तर पहले से शादी-शुदा थे, लेकिन शबाना के प्यार में उन्होंने अपनी पहली पत्नी हनी ईरानी को तलाक देकर अभिनेत्री शबाना से निकाह कर लिया। और उनकी यह जोड़ी आज भी लोग के लिए मिसाल है।

करियर
शबाना आजमी ने अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत वर्ष 1973 में श्याम बेनेगल की फिल्म 'अंकुर' से की थी। इस फिल्म की सफलता ने शबाना आजमी को बॉलिवुड में जगह दिलाने में अहम भूमिका निभाई। अपनी पहली ही फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल हुआ।

फिल्म अकुंर के बाद 1983 से 1985 तक लगातार तीन सालों तक उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया. अर्थ, खंडहर और पार जैसी फिल्मों के लिए उनके अभिनय को राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया।

उस दौर में शबाना ने खुद को ग्लैमरस अभिनेत्रियों की भीड़ से स्वयं को अलग साबित किया। अर्थ, निशांत, अंकुर, स्पर्श, मंडी, मासूम, पेस्टॅन जी में शबाना आजमी ने अपने अभिनय की अमिट छाप दर्शकों पर छोड़ी। अमर अकबर एंथोनी, परवरिश, मैं आजाद हूं जैसी व्यावसायिक फिल्मों में अपने अभिनय के रंग भरकर शबाना आजमी ने सुधी दर्शकों के साथ-साथ आम दर्शकों के बीच भी अपनी पहुंच बनाए रखी।

प्रयोगात्मक सिनेमा के भरण-पोषण में उनका योगदान उल्लेखनीय है। फायर जैसी विवादास्पद फिल्म में शबाना ने बेधड़क होकर अपनी अभिनय प्रतिभा का प्रमाण दिया वहीं, बाल फिल्म मकड़ी में वे चुड़ैल की भूमिका निभाती हुई नजर आई। यदि मासूम में मातृत्व की कोमल भावनाओं को जीवंत किया तो वहीं, गॉड मदर में प्रभावशाली महिला डॉन की भूमिका भी निभाकर लोगो को हैरत मे डाल दिया। भारतीय सिनेमा जगत की सक्षम अभिनेत्रियों की सूची में शबाना आजमी का नाम सबसे ऊपर आता है।

प्रसिद्ध फ़िल्में
अंकुर, अमर अकबर अन्थोनी , निशांत, शतरंज के खिलाडी, खेल खिलाडी का,हिरा और पत्थर , परवरिश, किसा कुर्सी का, कर्म, आधा दिन आधी रात, स्वामी ,देवता ,जालिम ,अतिथि ,स्वर्ग-नरक, थोड़ी बेवफाई स्पर्श अमरदीप ,बगुला-भगत, अर्थ, एक ही भूल हम पांच, अपने पराये ,मासूम,लोग क्या कहेंगे, दूसरी दुल्हन गंगवा,कल्पवृक्ष, पार, कामयाब ,द ब्यूटीफुल नाइट, मैं आजाद हूँ, इतिहास,मटरू की बिजली का मंडोला।
 फिल्मी बीट से साभार

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