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मंगलवार, 28 अगस्त 2018

परेशान न हाें अपने हाइपर एक्टिव बच्चे से- डा. अनुजा भट्ट

हाइपर एक्टिव बच्चों को खेलकूद व आउटडोर एक्टिविटी में ज्यादा से ज्यादा व्यस्त रखें
 बहुत ज्यादा बोलने वाला, छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करने वाला, काफी शरारती और जिद्दी  बच्चों को हाइपर एक्टिव कहा जाता है। अभिभावक बच्चे को कंट्रोल में करने के लिए अक्सर डांट-फटकार व मारपीट का सहारा लेते हैं। इससे आपके बच्चे में नकारात्मक सोच आ जाती है और वह पहले से भी ज्यादा गलत व्यवहार करने लगता है। सवाल उठता है कि आखिरकार आजकल बच्चे इतने शैतान और उदंड कैसे बन रहे हैं।
 मनाेवैज्ञानिक भावना बर्मी कहती हैं, मॉडर्न लाइफस्टाइल की वजह से बच्चों का मानसिक व शारीरिक विकास भी प्रभावित हो रहा है। पढ़ाई से लेकर खेलकूद तक हर फील्ड में उन पर कॉम्पिटिशन में आगे निकलने का दबाव बढ़ रहा है। इसके अलावा शहरों में एकल परिवार की वजह से भी बच्चे अकेलेपन से जूझ रहे हैं। इन सब कारणों से बच्चे गुस्सैल, चिड़चिड़े या यूं कहें कि हाइपर एक्टिव हो रहे हैं। हम अपने बच्चे की गलत आदतों की अनदेखी  कर रहे हैं यह  नहीं हाेना चाहिए। इसकी जगह उसके कारणों को जानकर उसे दूर करने की कोशिश करनी चाहिए।  अगर आपका बच्चा भी हाइपर एक्टिव है ताे इन बाताें पर अमल करें।
  •  डीप ब्रीदिंग लेना सिखाएं-उस बच्चे को डीप ब्रीदिंग सिखाई जाए। यह गहरी सांस इस तरीके से हो कि वह नाक से सांस को शरीर के अंदर ले और मुंह से छोड़े। इसका असर यह होगा कि आपको फ्रस्टेटेट बच्चे को डील करने में आसानी होगी। 
  •  बच्चे के साथ ज्यादा समय बिताएं – अगर आप चाहते हैं कि आपका बच्चा अच्छे से व्यवहार करे, तो जरूरी है कि उसके साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताएं। उन्हें ज्यादा प्यार दें। इससे उन्हें अच्छा महसूस होगा। इसके अलावा बच्चे को धैर्य से रहना सिखाइए।
  • दूसरों के सामने न डांटें – अक्सर पैरेंट्स हाइपर एक्टिव बच्चे के स्वभाव को बदतमीजी मानकर बार-बार उसे दोस्तों और रिश्तेदारों के सामने ही डांटने लगते हैं। लंबे समय तक ऐसा करना बच्चे की मानसिकता, आत्मविश्वास और दोस्तों व रिश्तेदारों के साथ उनके व्यवहार पर नकारात्मक असर डालता है। बच्चे के आसपास ऐसा माहौल बनाएं जिससे वह अपनी हाइपर एक्टिविटी से बाहर आ सके। यदि उसे किसी काम से रोकना है, तो दूसरों के सामने डांटकर न रोकें। बेहतर है कि उसे अकेले में समझाएं।
  • बच्चे के मन का विश्लेषण करते रहें - अगर आपका बच्चा ज्यादा हाइपर एक्टिव है, तो उसके मन की स्थिति का विश्लेषण करने के लिए मनोचिकित्सक की सलाह लें। दरअसल हाइपर एक्टिव बच्चों के लक्षण एडीएचडी (अटेंशन डेफिसिट हाइपर एक्टिविटी डिसऑर्डर) से काफी मिलते हैं। इस स्थिति में बच्चे के आत्मसम्मान पर भी प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा आसपास के लोगों के साथ उसके संबंध भी प्रभावित होते हैं। एडीएचडी एक दिमागी जैविक बीमारी है, जिसका इलाज दवाओं द्वारा किया जा सकता है। ऐसे में जरूरी है कि आप बच्चे के ऊपर खास ध्यान दें।
  •  प्यार और समय दें -ऐसे बच्चों को मां-बाप अपने पास बैठाकर सहलाएं। यानी उनके माथे को हाथों से दबाएं, कांधे को हल्का प्रेस करें। माता-पिता का यह टच बच्चों के प्रति बहुत सेंसेटिव होता है। यह उनके लिए रिलेक्सिंग टच होता है।   ऐसे बच्चों को कंट्रोल करने का सबसे बेहतर तरीका ये है कि आप उसे बहुत प्यार दें, इससे वह शांत हो जाएंगे। जब उनका मूड ज्यादा खराब हो तो उन्हें गले लगा लीजिए और फिर समझाइए।
  • सही से बच्चे की बात सुनें – ऐसे बच्चों की बात को सुनना बहुत जरूरी है। कई बार वह ध्यान आकर्षित करने के लिए कुछ कहना चाहते हैं, लेकिन जब कोई उनकी बात नहीं सुनता तो वह और हाइपर हो जाते हैं। ऐसे में जरूरी है कि आप उनकी बात सुनें। इससे वह शांत रहेंगे और आपकी बात भी मानेंगे। 
  • खेलकूद व आउटडोर एक्टिविटी में रखें व्यस्त – हाइपर एक्टिव बच्चों को खेलकूद व आउटडोर एक्टिविटी में ज्यादा से ज्यादा व्यस्त रखें। ऐसे बच्चे को डांस या आर्ट क्लास में भी भेज सकते हैं। इससे उसकी अतिरिक्त शारीरिक ऊर्जा व्यय होगी और साथ ही आत्म अभिव्यक्ति और सामाजिक व्यवहार का विकास होगा।
  • कुछ नया खरीदकर दें - बच्चे का मन बहलाने के लिए कुछ नई चीज खरीदकर गिफ्ट करें। नई चीज को पा कर वह दूसरी बातें भूल जाएगा और खुश रहेगा।
  • पालतू जानवर लाएं – बच्चे को जो भी पालतू जानवर अच्छा लगता है, उसके लिए वह खरीदकर ले आएं। नया दोस्त देखकर व उसके साथ खेलने में उसकी बदमाशियां कम हो जाएंगी।
  • हर गतिविधि पर रखें नजर – हाइपर एक्टिव बच्चे की हर गतिविधि पर नजर रखना जरूरी है। रूटीन से उसके स्कूल टीचर से मिलते रहें। इससे बच्चे के व्यवहार को समझने में मदद मिलेगी। टीचर को वजह बताते हुए उसे आगे वाली सीट पर बिठाने व समय-समय पर कुछ गिफ्ट देने का अनुरोध कर सकते हैं। इससे वह खुश रहेगा।
  • क्रिएटिव बनाएं-एक बॉक्स हमेशा अपने घर में तैयार रहना चाहिए। इस बॉक्स में क्लै आर्ट, कलर्स, पेंसिल्स या अन्य क्रिएटिविटी वाली चीजें रखना चाहिए। ताकि बच्चा इस बक्से के साथ ही लंबे समय तक बिजी रहे।
  •  रिलैक्स प्लेस पर एक्टिविटी कराएं-आपके घर में एक जगह ऐसी होनी चाहिए जिसे हम रिलैक्सेशन की जगह कह सकते हैं। यह कोई छोटी बालकनी हो सकती है, जहां आराम कुर्सी रखी हो। ध्यान रखें यह ऐसी जगह हो जहां एक्टिविटी कम से कम और रिलैक्स ज्यादा मिले। 
  •  टाइम टेबल फॉलो कराएं-ऐसे बच्चों के लिए एक टाइम टेबल को फॉलो करना बहुत जरूरी है। यह मिलिट्री रूल जैसा नहीं होगा, लेकिन उनके सोने, खाने, उठने, नहाने, खेलने का समय निर्धारित रहेगा तो उनसे डील करना आसान होगा। 
  •  शुगर और कोल्ड ड्रिंक्स से दूर रखें-बच्चों की डाइट मॉनीटरिंग और उनका शुगर इनटेक कंट्रोल करना जरूरी है। यदि हम उन्हें ज्यादा स्वीट्स दे रहे हैं तो उनकी एक्टिविटी का लेवल बढ़ने लगता है। शुगर कोटेड सप्लीमेंट्स और कोल्ड ड्रिंक्स से उनको दूर रखें। 
  •  विटामिन दिखाएं असर-हाइपर एक्टिव बच्चाें के लिए 4 तरह के विटामिन बहुत असरदार हाेते हैं  विटामिन बी 3, बी 6, बी 12 और विटामिन सी। विटामिन सी  हमें रसीले फल जैसे नींबू, संतरा, माैसमी में  मिलता है। इसी तरह दूध और अंडे, मक्खन, मछली में हमें विटामिन 12 मिलता है।   मूंगफली, बादाम, अखराेट में हमें विटामिन 6 मिलता है।
  • यह भी पढ़ें https://mainaparajita.blogspot.com/2018/08/blog-post_21.html?spref=

सोमवार, 27 अगस्त 2018

जब नींद न आए....... तब पढ़िए लिविंग द हैल्दी लाइफ


स्वस्थ शरीर के लिए पौष्टिक आहार और व्यायाम के साथ रोज रात को कम से कम सात घंटे की नींद लेना भी खासा जरूरी है। हालांकि काम के तनाव और भविष्य की चिंताओं के चलते ज्यादातर लोगों की रात का अधिकतर हिस्सा करवटें बदलने में गुजर जाता है। ब्रिटेन की मशहूर आहार विशेषज्ञ जेसिका सेपल ने इसी के मद्देनजर अपनी  किताब‘लिविंग द हेल्दी लाइफ’ में गहरी नींद के आगोश में ले जाने वाले पांच उपाय सुझाए हैं।

काम का तनाव घर साथ न ले जाएं

सेपल के मुताबिक दफ्तर में रोज कुछ नया और अनोखा करने का दबाव तनाव को जन्म देता है। हालांकि काम का तनाव दफ्तर में ही छोड़करआने में भलाई है। इसे घर साथ ले जाने पर शरीर में स्ट्रेस हार्मोन‘कॉर्टिसोल’ और ‘एड्रिनालिन’ का स्त्राव बढ़ जाता है, जो न सिर्फ नींदमें खलल डालता है, बल्कि हार्ट अटैक, स्ट्रोक और कैंसर से मौत का खतरा भी बढ़ाता है।

डिनर में दाल, अंडा, चिकन खाएं

प्रोटीन युक्त आहार नींद की गुणवत्ता सुधारने में कारगर माना जाता है।विभिन्न अध्ययनों में इसे स्लीप हार्मोन ‘मेलाटोनिन’ का उत्पादन बढ़ानेमें असरदार पाया गया है। इसलिए डिनर में दाल, अंडा, चिकन,पालक, बींस, सोया उत्पाद जरूर शामिल करें। आप चाहें तो चावलऔर चीज का सेवन भी बढ़ा सकते हैं। फैट की मौजूदगी के चलते येखाद्य वस्तुएं शरीर में सुस्ती पैदा करती हैं।

8 बजे के बाद फोन से दूरी बना लें

स्मार्टफोन, लैपटॉप, कंप्यूटर, टीवी और टैबलेट की स्क्रीन से निकलनेवाली नीली रोशनी ‘मेलाटोनिन’ का उत्पादन बाधित करती है। लिहाजाबिस्तर पर जाने से एक-डेढ़ घंटे पहले ही गैजेट से दूरी बना लें। मोबाइलबंद न कर सकें तो ‘साइलेंट मोड’ पर डाल दें। यही नहीं, सोते समयफोन को पहुंच से दूर रखें, ताकि बार-बार मैसेज आने के ख्याल केचलते नींद में खलल न पैदा हो।

नहाने से तन-मन की थकान मिटेगी

बकौल सेपल, अच्छी नींद के लिए तन-मन की थकान मिटना बेहदजरूरी है। ऐसे में सोने से पहले गुनगुने पानी में नमक मिलाकर स्नानकरें। अपनी पसंदीदा किताब के कुछ पन्ने पढ़ें। दिल को सुकून पहुंचानेवाला धीमा संगीत सुनें। लौंग, इलायची और तुलसी से बनी मसाला चायका सेवन करें। गुनगुने दूध में दालचीनी मिलाकर पीना और बादामखाना भी बेहद फायदेमंद है।

साेने से पहले कमरे में अंधेरा कर दें 

 सोने से पहले कमरे में अंधेरा और ठंडक कर लें। पैरों को ऊपर करके दीवार पर टिकाएं। धीरे-धीरे सांस लेते हुए लगभग 10मिनट तक इसी मुद्रा में लेटे रहें। हो सके तो तकिये पर मोगरे, गुलाब या लैवेंडर की खुशबू वाला परफ्यूम छिड़कें।

शनिवार, 25 अगस्त 2018

मेला - ममता कालिया

मकर संक्रांति से एक दिन पूर्व पहुँच गईं चरनी मासी। पहले कभी उसके घर आई नहीं थीं। पर उन्होंने पता ठिकाना ढूँढ निकाला। अंकल चिप्स की छोटी-सी डायरी में उनके पोते के हाथ की टेढी-मेढी लिखावट में दर्ज था 'सत्य प्रकाश' २२७ मालवीय नगर इलाहाबाद। उनके साथ चमडे का एक बडा-सा थैला, बिस्तरबंद और कनस्तर उतरा। और उतरीं उन जैसी ही गोलमटोल उनकी सत्संगिन, प्रसन्नी।

स्टेशन से चौक के, रिक्शे वाले ने माँगे चार, मासी ने दे डाले पाँच रुपए। तीरथ पर आई हैं, किसी का दिल दुखी न हो। पुन्न कमा लें। इतनी ठंड में दो सवारी खींच कर लाया है रिक्शेवाला।

चाय पानी के बाद उनके लिए कमरे का एक कोना ठीक किया गया तो बोली 'रहने दे घन्टे भर बाद स्वामी जी के आश्रम में जाना है।'

सत्य ने कहा, ''थोडे दिन घर में रह लो मासी, वहाँ बड़ी ठंड है।''
''तीरथ करने निकली हैं, गृहस्थ विच नहीं रहना।''
''अच्छा मासी यह बताओ आप तीरथ पर क्यों निकली हो?"

''ले मैं क्या पहली बार निकली हूँ। सारे तीरथ कर डाले मैंने-हरद्वार, ऋषिकेश, बद्रीनाथ, केदारनाथ, पुष्करजी, गयाजी, नासिक, उज्जैन। बस प्रयाग का यह कुम्भ रह गया था, वह भी पूरन हो जाएगा।''

''मासी आप इतने तीरथ क्यों करतीं हो?''
''ले पाप जो धोने हुए।''
भानजे की आँखों में शरारत चमकी, ''कौन से पाप आपने ने किए हैं?' सत्ते (सत्य प्रकाश) मासी से सिर्फ़ छह साल छोटा था। नानके में उसका बचपन इसी मासी को छकाते, खिझाते बीता था।

चरनी मासी हँस पडीं, एकदम स्वच्छ दाँतों वाली भोली-भाली निष्पाप हँसी। जब वे निरुत्तर होने लगती हैं तो स्वामी जी की भाषा बोलने लगती हैं, ''पाप सिर्फ़ वही नहीं होता जो जानकर किया जाय। अनजाने भी पाप हो जाता है, उसी को धोने।''

अनजाने पाप में उनके स्वामी जी के अनुसार बुरा बोलना, बुरा देखना, बुरा सुनना जैसे गांधीवादी निषेध हैं।
सत्ते की पत्नी चारू साइंस की टीचर है। उसने कहा, ''मासी आप से भी तो लोग अनजाने में कभी बुरा बोले होंगे। जैसे जीरो से जीरो कट जाता है, पाप से पाप नहीं कट सकता क्या?''
''पाप से पाप और मैल ने मैल नहीं कटता। पाप की काट पुण्य है, जैसे मैल की काट साबुन।''
''मलमल धोऊँ दाग नहीं छूटे'' जैसे भजन के बारे में आप क्या सोचती हैं?''
''छोटे मोटे तीरथ पर यह मुश्किल आती होगी, प्रयाग का महाकुम्भ तो संसार में अनोखा है। तुम गरम पानी से नहाने वाले क्या जानो।'' मासी ने आर्यां दी हट्टी के लड्डुओं का पैकेट पीपे में से निकाला और चारू के हाथ में दिया और कहा,
''तीरथ अमित कोटि सम पावन।
नाम अखिल अध नसावन।''

चारु सोचने लगी 'दसियों बरस तो मैं इन्हें जानती हूँ, जगत मासी हैं ये। हर एक के दुख में कातर, सुख में शामिल! न किसी से बैर न द्वेष, पडोस में सबसे बोलचाल, रिश्तेदारों में मिलनसार, परिवार में आदरणीय, यहाँ तक कि बहुएँ भी कभी इनकी आलोचना नहीं करतीं। ऐसी प्यारी चरनी मासी कुम्भ पर कौन से पाप धोने आई हैं कि घर की सुविधा छोड वहाँ खुले में रहेंगी।''
पर मासी नहीं मानी। सूरज डूबने से पहले चली गईं।

पेशे से पत्रकार है सत्ते मगर दोस्तियाँ उसकी हर महकमें में है। इसलिए जब एस.पी. कुम्भ ने कहा, ''कवरेज'' आपके रिपोर्टर करते रहेंगे, एक दिन खुद आकर छटा तो देख जाएँ तो सबकी बाँछें खिल गईं। अभी मेला क्षेत्र में प्रवेश भी नहीं किया था सत्या और चारू ने कि मेले का समां नजर आने लगा। सोहबतिया बाग से संगम जाने वाले मार्ग पर भगवे रंग की एम्बैसडर गाडियाँ दौड रहीं थीं। पाँच सितारा आध्यात्म पेश करने वाले, विशाल जटाजूट धारण किए साधू संत, फकीर रंग बिरंगे यात्रियों के रेले में अलग नज़र आ रहे थे। दूर से संगम तट पर असंख्य बाँस बल्ली के चंदोवे तने हुए थे। कहीं रजाई में बैठे हुए भी ठिठुर रहे थे लोग, कहीं मेले में ठंडे कपडो में बूढे, जवान, अधेड स्त्री पुरुष और बच्चे एक धुन में चले जा रहे थे। सबसे अच्छा दृश्य था किसी टोले का सड़क पार करने का उपक्रम। सब एक दूसरे की धोती कुरते का छोर पकड़ कर रेलगाडी के डिब्बों की तरह चल रहे थे।

शुक्रवार, 24 अगस्त 2018

पका पपीता, प से पपीता, क्या है पपीता-चयनिका शर्मा

पपीता खाना सेहत के लिए फायदेमंद होता है। इसमें भरपूर मात्रा में विटामिन ए पाया जाता है जो शरीर को कई बीमारियों से दूर रखने का काम करते हैं। रोजाना पपीते का सेवन करने से पेट की बीमारियां दूर हो जाती है।  पपीता डायबिटीज रोगियों के लिए बहुत फायदेमंद होता है।
♥विटामिन ए की कमी दूर करता है
अगर आपके शरीर में विटामिन ए की कमी है तो पपीते का सेवन इस प्रॉब्लम को दूर कर सकता है।

♥डायबिटीज में फायदेमंद
पपीता खाना डायबिटीज रोगियों के लिए भी काफी फायदेमंद होता है। इससे डायबिटीज कंट्रोल में रहती
है।
♥वजन को करता है कम
अगर आप भी मोटापे की समस्या से परेशान है तो रोजाना पपीते का सेवन करें।
♥इम्यून सिस्टम मजबूत बनाता है
पपीते और इसके बीजों में काफी मात्रा में विटामिन ए है, जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली यानि इम्यून सिस्टम को मजबूत बनता है।
♥कब्ज से छुटकारा
पपीते में ऐसे एंजाइम और फाइबर होते हैं, जो पाचन तंत्र को ठीक रखते है और पेट में गैस नहीं बनने देते। इससे आपको कुछ समय में ही कब्ज और पेट दर्द से छुटकारा मिल जाता है।
♥ब्रैस्ट फीडिंग में फायदेमंद
ब्रैस्ट फीडिंग करवाने वाली महिलाओं को ज्यादा न्यूट्रिशंस की जरूरत पड़ती है। ऐसे में पपीते का सेवन शरीर में एंजाइम की कमी को पूरा करके दूध बढ़ाने में मदद करता है।
♥गठिया में फायदेमंद
पपीते से बनी ड्रिंक गठिया रोग में भी फायदेमंद होता है। इसे बनाने के लिए सबसे पहले 2 लीटर पानी उबाल लें। इसके बाद पपीते को धोकर और इसके बीज निकालकर पानी में 5 मिनट तक उबालें। इसके बाद इसमें 2 चम्‍मच ग्रीन टी की पत्‍तियां डालें और थोड़ी देर के लिए उबालें। अब इसे छानकर पीएं।
♥लीवर के लिए फायदेमंद
पपीते का सेवन लीवर के लिए भी बहुत फायदेमंद होता है। यह लीवर को मजबूती देता है। पीलिया होने से लीवर को काफी नुकसान पहुंचता है। ऐसे में पपीता खाने से पीलिया के रोगियों को काफी फायदा पहुंचता है।
♥यूरिन इंफेक्शन से मुक्ति
महिलाओं को अक्सर यूरिन इंफेक्शन की समस्या हो जाती है। ऐसे में इस समस्या को दूर करने के लिए आपको पपीते का सेवन करना चाहिए। पपीता इंफेक्शन की समस्या को दूर करके बैक्टीरिया को बढ़ने से रोकता है।

सावधानियां-⧪पपीते में माैजूद एंटी आक्सीडेंट्स की अधिक मात्रा से कि़डनी में स्टाेेंस बढ़ जाते हैं।

⧪पपीते में माैजूद पपाइन से खून पतला हाे सकता है इसलिए जिसकी सर्जरी हुई है वह पपीता न खाएं

⧪इसमें फाइबर्स हाेता है जिनकाे डायरिया हुआ है वह इसे न खाएं।

गुरुवार, 23 अगस्त 2018

जिसे छूने से भी डरते थे उसे पहनते हैं अब नवाब भी- डा. अनुजा भट्ट



सियूँण, कंडली नामक पाैधा उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रो में पाया जाता है! इस पौधे को जहाँ कुमाऊ मंडल में सियूँण के नाम से जाना जाता है वही गढ़वाल में इस कंडली कहते है! इस पौधे पर हाथ लगते ही एक करंट सा लगता जैसे बिच्छू ने काटा हो ! तभी हिंदी में इसे बिच्छू घास के नाम से भी जाना जाता है!

रूरल इंडिया क्राफ्ट संस्था और उत्तरकाशी जिले के भीमतल्ला में जय नंदा उत्थान समिति हस्तशिल्प उत्पाद बनाने का काम करती हैं। चमोली जिले के मंगरौली गांव में इन संस्थाओं ने बिच्छू घास के रेशे से हाफ जैकेट, शॉल, बैग, स्टॉल बनाए हैं। उद्योग विभाग के निदेशक सुधीर चंद्र नौटियाल कहते हैं, नेचुरल फाइबर को बढ़ावा देने के लिए सरकार व विभाग हर संभव प्रयास कर रहा है।
जंगलों में उगने वाली बिच्छू घास यानी हिमालयन नेटल (स्थानीय भाषा में कंडाली) से उत्तराखंड में जैकेट, शॉल, स्टॉल, स्कॉर्फ व बैग तैयार किए जाने की खबरे आ रही हैं। चमोली व उत्तरकाशी जिले में कई समूह बिच्छू घास के तने से रेशा (फाइबर) निकाल कर विभिन्न प्रकार के उत्पाद बना रहे हैं। अमेरिका, नीदरलैंड, न्यूजीलैंड, रूस आदि देशों को निर्यात के लिए नमूने भेजे गए हैं। इसके साथ ही जयपुर, अहमदाबाद, कोलकाता आदि राज्यों से इसकी भारी मांग आ रही है।
ऐसे तैयार होता है कपड़ा
उत्तराखंड के सभी जिलों में बिच्छू घास प्राकृतिक रूप से उगती है। तने को सूखाने के बाद मशीन में प्रोसेसिंग की जाती है। इसके बाद धागा बनता है। 3 से 5 किलो बिच्छू घास से एक किलो धागा निकलता है। इसमें प्रति मीटर 600 से 700 रुपये की लागत आती है। रेशा मुलायम होने से कपड़ा तैयार करने में काफी मेहनत करनी पड़ती है। बिच्छू घास के रेशे से बनी जैकेट की कीमत 1,700 से 1,800 रुपये तक है।
नहीं मिल रहा पर्याप्त कच्चा माल
रूरल इंडिया क्राफ्ट संस्था के बचन सिंह रावत कहते हैं, बिच्छू घास की प्रदेश में व्यावसायिक खेती नहीं होती है। ऐसे में कच्चा माल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। जबकि इन उत्पादों की भारी मांग है। मंगरौली गांव में कंडाली के रेशे से उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। देश के कई राज्यों के कारोबारियों ने ऑर्डर देने के लिए संपर्क किया है। उद्योग विभाग की ओर से जैकेट को निर्यात करने के लिए उसके नमूने विदेश भेजे गए हैं। उनका कहना है कि सरकार प्रदेश में नेचुरल फाइबर को बढ़ावा देती है, तो इससे लोगों को रोजगार मिलने की ज्यादा संभावना है। देहरादून के शेरपुर में 120 महिलाओं को संस्था की ओर से इसका प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
पराबैंगनी किरणों से बचाता है यह जैकेट
बिच्छू घास से तैयार रेशा पराबैंगनी किरणों से बचाता है। इसके रेशे से बनी जैकेट को गर्मी व सर्दी दोनों ही मौसम में पहना जा सकता है। साथ ही यह देखने में दूसरे जैकेट से आकर्षक लगता है।







बुधवार, 22 अगस्त 2018

जब आएं अचानक मेहमान क्या खिलाएंगी आप- नीरा कुमार


अकसर हर गृहिणी के समक्ष त्योहारों में यह समस्या आ जाती है कि उस ने अपने परिवार के सदस्यों के हिसाब से खाना बनाया होता है और अचानक 1-2 मेहमान आ जाते हैं. ऐसे में भोजन की मात्रा कम पड़ जाती है. मगर अब परेशान होने की जरूरत नहीं है. यदि आप के समक्ष भी इस तरह की परेशानी आ जाए तो इन टिप्स को अपना कर आप अपनी समस्या से छुटकारा पा सकती हैं.

– अगर आप ने पनीर की तरी वाली सब्जी बनाई है तो थोड़े मखाने तल कर थोड़ी सी टोमैटो प्यूरी व सूखे मसालों के साथ 3-4 मिनट पकाएं और बनी सब्जी में मिला दें. बढि़या सब्जी ज्यादा मात्रा में तैयार हो जाएगी.

– फ्रोजन मटर फ्रीजर में रखे हों तो कुनकुने पानी में डालें. फिर और आलू, मंगोड़ी, पनीर आदि सब्जी में मिला दें.

– उबले आलू हों तो मसल कर किसी भी ग्रेवी वाली सब्जी में मिला दें अथवा थोड़ा दही डाल कर दही आलू बना लें. इस के अलावा बेसन व दही फेंट कर मिलाएं और कढ़ी वाला झोल तैयार कर लें.

– कढ़ी वाले झोल को यों ही सर्व कर सकती हैं या इस में उबले आलू के टुकड़े कर के

डाल दें.

– अरहर, धुली मूंग, धुली उड़द या धुली मसूर की दाल बनी है पर लगता है कम पड़ेगी, तो प्याज, टमाटर का तड़का बनाएं. उस में 2 चम्मच बेसन डाल कर भून लें, साथ ही कोई पत्तेदार सब्जी हो तो वह भी. बस दाल में तड़का लगा दें. दाल की मात्रा बढ़ जाएगी.

– दाल कोई भी हो हरे पत्तेदार साग ज्यादा मात्रा में डालना चाहें तो अदरक, हरीमिर्च व हींग का तड़का लगा कर छौंक दें. 5 मिनट में तैयार पत्तेदार सब्जी को दाल में डाल दें. साग वाली दाल तैयार हो जाएगी.

– उबले आलू कम हों तो उन्हें हाथ से अच्छी तरह मैश कर टोमेटो प्यूरी व हींगजीरे का तड़का तथा सांभर पाउडर और इमली का रस डाल कर आलू वाला सांभर तैयार कर लें. यह चावल व परांठों दोनों के साथ स्वादिष्ठ लगेगा.

– छोलों की मात्रा कम हो तो उन में कच्चा बारीक कटा टमाटर, प्याज व धनियापत्ती डाल कर मिला दें. छोलों की मात्रा बढ़ जाएगी. आलू को भी छोटेछोटे क्यूब्स में तल कर छोलों में मिला सकती हैं.

– पके चावलों की मात्रा कम हो तो खूब सारे प्याज, जीरे, टमाटर व करीपत्ता का तड़का तैयार कर चावलों में मिला दें.

– दही की मात्रा कम हो तो खूब सारा सलाद बारीक काटें और उस में दही फेंट कर डाल दें. बढि़या सब्जी वाला रायता तैयार हो जाएगा.

– यदि कुछ भी समझ में न आए तो सब से अच्छा है आटे में बेसन, अदरक लहसुन पेस्ट व मिर्च मसाले डालें और दही डाल कर गूंध लें. खस्ता पराठे अचार के साथ सर्व करें.

मंगलवार, 21 अगस्त 2018

बच्चाें को सिखाएं अनुशासन- अनुजा भट्ट


शरारत करने पर पेरेंट्स बच्चों को सजा देते है और कारण पूछे जाने पर कहते है ” ऐसा करना जरुरी होता है नहीं तो बच्चे बिगड़ जाऐंगें। जबकि ऐसा नहीं है अगर आप चाहे तो बिना सजा दिए भी बच्चे से सही व्यवहार करने की उम्मीद कर सकते है ।

एक बात का हमेशा ध्यान रखें कि अनुभव उम्र के साथ-साथ होता है। बच्चे के पास उतनी जानकारी नहीं होती जितनी आपके पास अनुभव से आई है इसलिए हो सकता है उन्हें नहीं पता कि किस तरह की स्थिति में किस तरह से पेश आना है ऐसे में अगर आप गुस्से में आकर उन्हें सजा देते है तो आप उन्हें यही सन्देश देते है कि जो कमजोर है और छोटे है उन्हें आदर कम देना चाहिए। बच्चे बड़ी जल्दी सीखते है और अगर इस तरह की गलतफहमी को वो सीखते है तो उनके बड़े होने पर उनका ऐसा व्यवहार आपके लिए शर्मिंदगी की वजह बन सकता है। ऐसे में आप उसे सही और गलत के बीच का फर्क बताएं और उसे सिखाएं कि किसी खास तरह की स्थिति से कैसे निपटा जाये और अगली बार बच्चा जब ये सीख लेता है तो उसे इसके लिए कुछ प्रोत्साहन दें।

सजा देने से अगर कोई सुधरता तो जेल से बाहर आने के बाद कोई भी अपराधी कुख्यात नहीं रह जाता और वो आदर्श होता। इसलिए आप इस बात का हमेशा ध्यान रखें कि बच्चे को सजा देकर आप बस केवल अपना गुस्सा उस पर उतार रहे है।

अगर आप बच्चे को बात बात पर डांटते है और मारते है तो बच्चे और आपके बीच एक दीवार खड़ी हो जाती है “डर की दीवार”। यह आपके बच्चे को आपसे उसके जीवन से जुडी कुछ बातें या उसके अनुभव आपसे शेयर करने से रोकती है इसलिए हमेशा इस बात का ध्यान रखें। हो सकता है आपका बच्चा कोई ऐसी गलती करे जिसके लिए आपको बहुत बुरा लगे लेकिन फिर भी संयम बरतते हुए उसके साथ सही और गलत के बारे में खुल कर बात करें। सजा देने की जल्दबाजी की अपेक्षा आप उसे प्यार से चीजों के बीच में फर्क समझाएं और एक ऐसा रिश्ता कायम करें जिसमे अगर आपका बच्चा कुछ गलत भी करता है तो भी आपको बता पायें।

बड़ो की तरह बच्चांे को बहुत अधिक सिखाने की जरुरत नहीं होती है अगर आप थोडा स्मार्ट तरीके से उनके साथ पेश आते है तो बच्चांे में उनके आस पास के माहौल से सीखने की क्षमता हम बड़ो से कंही अधिक होती है। अगर आप उनके साथ सम्मान से पेश आते है तो वो भी ये सीखते है कि छोटों के साथ भी सम्मान से पेश आना चाहिए। ऐसे में आप बिना किसी अधिक मेहनत के जिन्दगी के कई महत्वपूर्ण पाठ उन्हें सिखा सकते हैं।


सोमवार, 20 अगस्त 2018

समय से खाएं ,बीमारी भगाएं- डा. दीपिका शर्मा


फाेटाे क्रेडिट- श्यामली बरूआ तालुकदार
मैं जब भी आप जैसे दाेस्ताें से मिलती हूं ताे  सबसे पहला सवाल करती हूं आपने खाना खा लिया.. यह उस वक्त पर निर्भर करता है कि मैं किसके बारे में बात कर रही हूं। अक्सर मैं  पाती हूं कि खाने पीने में लाेग समय का ख्याल नहीं रखते। लंच के समय  ब्रेकफास्ट और ब्रेकफास्ट के समय वह नींद में हाेते हैं। अक्सर लाेगाे का टाइमटेबिलसही से मैनेज नहीं हाेता। देर रात में साेना, शिफ्ट ड्यूटी जैसे बहुत से कारण है जिसके कारण मेरे सवाल आपने खाना खा लिया का सही जवाब नहीं मिलता।
आज बात डिनर की करती हूं। डिनर के टाइम का ध्यान रखें। रात में हल्का खाना खाना हेल्थ के लिए बेहतर होता है। आपने कभी जानने की कोशिश की है कि डिनर इतना महत्वपूर्ण क्यों है ? कई शोध में यह बात सामने आयी है कि आप कब, क्या, कितना और कैसे खाते हैं इसका अपके हेल्थ पर असर पड़ता है। कुछ शोध तो इस बात को भी कहते हैं कि खान-पान का सीधा असर इंसान के मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है।

ऐसा नहीं है कि आप खाने में पोषक तत्व खूब खाते हैं तो वह आपके स्वास्थ्य को बेहतर रखेगा। खाने के समय का अगर सही से ध्यान न रखा जाय तो पोषक तत्व भी नुकसान पहुंचाते हैं। सुबह का ब्रेकफास्ट जहां अपको पूरे दिन की ऊर्जा देता है तो रात का डिनर दिन भर की कमियों की खाना-पूर्ति करता है। मैं आपकाे रात के डिनर के बारे में कुछ खास बातें बताती हूं।
रात में खाना खाने में अक्सर लोग लेट कर देते हैं। हाल ही में हुए एक शोध में यह बात सामने आई है कि जो लोग रात में देर से डिनर करते हैं वो एक उम्र के बाद कई तरह की बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। इसलिए रात का खाना टाइम से खाना चाहिए।
ज्यादातर लोगों को देखा गया है कि रात में खाना खाते ही लोग बेड पर चले जाते हैं। एक सर्वे के मुताबिक जो लोग रात में खाना खाते ही सोने चले जाते हैं वो बहुत जल्द मोटापा के शिकार हो जाते हैं जो बाद में डायबिटीज जैसी बीमारियों के भी शिकार होते हैं।
अगर आप रात के समय ऑयली और मसालेदार खाना खाते हैं तो उससे आपका वजन बढ़ सकता है। रात के समय हल्का खाना नहीं खाने से पाचन क्रिया पर भी असर पड़ता है। रात को ऐसा खाना खाने से नींद भी सही से नहीं आती है और बेचैनी बनी रहती है।
रात के समय हल्का खाना खाने से ब्लड शुगर भी नियंत्रण में रहती है। कोशिश करनी चाहिए कि खाना खाने के एक-दो घंटे बाद ही सोने जाएं।
रात को हल्का खाना खाने से सुबह के समय शरीर हल्का रहता है और एनर्जी लेवल भी बना रहता है. इसके सा‍थ ही यह मूड को भी बेहतर रखने में मददगार होता है।
रात को बहुत मसालेदार और ऑयली खाना खाने वालों को अक्सर गैस और कब्ज की समस्या हो जाती है जो स्वास्थ्य संबंधी अन्य परेशानियों की वजह बनती हैं। अगर आप ऐसी किसी भी समस्या से बचना चाहते हैं तो रात को हल्का भोजन करना ही आपके लिए फायदेमंद होगा।

रविवार, 19 अगस्त 2018

गाेल्ड बनाने वाली महिला आखिर काैन है... डा. अनुजा भट्ट


भारतीय सिनेमा के इतिहास पर गौर करें तो पाएंगे कि पहले नाममात्र की कुछ महिला निर्देशक हुआ करती थीं। इनमें अपर्णा सेन और दीपा मेहता जैसी फिल्मकारों का नाम लिया जा सकता है। लेकिन आज इस लिस्ट में नई पीढ़ी की महिला फिल्मकारों की लिस्ट थोड़ी लंबी हो चुकी है। मेघना गुलजार, गाैरी शिंदे,जाेया अख्तर, काेंकणा सेन, अलंकृता श्रीवास्तव, गुरिंदर चढ्ढा केबाद ये गाेल्ड बनाने वाली महिला के बारे में आइए जानते हैं...


इन दिनाें हर जगह गाेल्ड फिल्म की चर्चा है।   एेसे में  हर काेई यह जानना चाहता है  कि आखिर गाेल्ड बनाने वाली यह महिला काैन है. इस महिला का नाम है रीमा कागती। इनका जन्म गुवाहटी, असम में हुआ था।उन्होंने मुंबई स्थित सोफिया कॉलेज से इंग्लिश लिट्रेचेर में स्नातक की डिग्री हासिल की है। साथ ही उन्होंने सोफिया कॉलेज से सोशल कम्युनिकेशन में परा-स्नातक की डिग्री ली है।
आज  रीमा कागती एक भारतीय फिल्म निर्देशक और स्क्रीनराइटर हैं। रीमा कागती ने अपने करियर की शुरुआत बतौर सहायक निर्देशक की। इस दौरान उन्होंने हिंदी सिनेमा के कई दिग्गज निर्देशकों के साथ काम किया, जिसमे फरहान अखतर(दिल चाहता है), आशुतोष गोविरकर (लगान)हनी इरानी (अरमान), मीरा नायर (वैनिटी फेयर) शामिल हैं।
  हिंदी सिनेमा में उन्हाेंने बताैर  निर्देशक फिल्म हनीमून ट्रेवल्स प्राइवेट लिमिटेड से डेब्यू किया था। इसके बाद रीमा ने फिल्म तलाश निर्देशित की, इस फिल्म में मुख्य भूमिका में आमिर खान, करीना कपूर और रानी मुखर्जी नजर आयीं थी, फिल्म बॉक्स-ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुई थी। वर्ष 2016 में रीमा ने फिल्म गोल्ड पर काम करना शुरू किया। फिल्म में मुख्य भूमिका में अक्षय कुमार, फरहान अख्तर, कुनाल कपूर और मौनी रॉय मुख्य भूमिका में हैं।फिल्म में खिलाड़ियों को हॉकी की ट्रेनिंग भारतीय हॉकी कप्तान संदीप सिंह द्वारा दी गयी है।





शनिवार, 18 अगस्त 2018

कहां हाे उर्मिला- प्रीति मिश्रा

स्वाति गुप्ता की पेंटिंग.
 प्रकृति और स्त्री दाेनाें ही सुंदर हैं पर समाज इनकी कद्र नहीं करता.

छोटे से कद की, उम्र यही कोई पचास से पचपन साल, चेहरे पर झुर्रियां प्रौढ़ावस्था की कहानी कह रही थीं, बालों पर सफेदी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही थी। पर सक्रिय इतनी कि किशोरवय भी शर्मा जाएं, कभी-कभी हम सबको ये लगता था कि क्या ये कभी थकती नहीं है, बहू के साथ घरेलू कामों में कदम से कदम मिला कर चलती थीं ।

हमने सुना था कि 7 साल की उम्र में ही वह ससुराल आ गई थी, शायद 2-3 साल की थी तभी उनकी माँ का देहावसान हो गया था, पिता ने किसी तरह से उनके हाथ पीले कर अपनी जिम्मेदारियों से मुक्ति पा कर वैराग्य का जीवन धारण कर लिए। मात्र 7 साल की उम्र से ही उनका वो जीवन शुरू हुआ जो इस समय में 25 साल में भी जल्दी लगता है। संयुक्त परिवार छः भाइयों की सबसे बड़ी भाभी थी तो जिम्मेदारियां भी बड़ी थी, सब कुछ सिर झुका कर मानना और चुप रहना उनका जीवन बन चुका था, बोलती भी किसके दम पर माँ ने तो मर कर साथ छोड़ा था, पर पिता ने अपनी जिम्मेदारियों से भागना उचित समझा बिना ये सोचे कि बिटिया पर क्या गुजरेगी। उनका मायका और उनकी ससुराल सब वही थी। स्वभाव से बहुत सरल, खाना ऐसा बनाना कि होटल का शेफ भी फेल हो जाए, पर पता नहीं क्यों ससुराल में लोग उनसे कभी खुश नहीं होते, हमेशा उनकी ही बुराई सबसे पसंदीदा विषय रहता था, देवरों की शादी होती गई, देवरनिया आती गई, और उन पर काम का बोझ बढ़ता गया, अब वो उस घर में बहू ना हो कर एक नौकरानी बन कर रह गयी।

कभी तो हमें लगता था कि ये कुछ बोलती क्यों नहीं। पर उनका चुप तो बस चुप । फेस्टिवल पर अक्सर हमने देखा था कि सबको खिला कर तृप्त करने वाली जब खुद खाने बैठती तो झगड़े शुरू कर दिए जाते और वो भूखे पेट ही सो जाती या फिर बहते हुए अश्रुधारा के साथ कौर को निगल लिया जाता था, पर फिर भी चुप और सास ऐसी कि इस बात को लेकर सुनाने से बाज ना आए कि छोटी बहुओं को समय पर नाश्ता खाना दिया कि नहीं । कभी देवर तो कभी पति द्वारा हाथ उठा दिए जाने पर भी वो हमेशा की तरह चुप और हद तो तब हो गई जब देवर द्वारा डण्डे के प्रहार से रक्तरंजित हुई वो अपने ही परिवार द्वारा दोषी ठहराई गई औऱ महीनों तक किसी भी सदस्य ने उनसे बात नहीं की, एक अंधेरी कोठरी में पड़ी उनका करुण क्रदन ऐसा लग रहा था जैसे वो बड़ी कातरता से अपनी माँ को पुकार रही हों पर फिर भी चुप |

पति भी ऐसा जो कभी बीवी की तरफदारी नहीं करता क्योंकि वह पत्नी का गुलाम नहीं बनना चाहता था । ऐसा लगता था कि जैसे वो बोलना भूल चुकी हैं । दुनिया उनकी तारीफ करता सम्मान देता पर अपने परिवार में ही उपेक्षित । शायद ही उन्हें कभी बाहर जाते हुए देखा हो, क्योंकि सास को पसंद नहीं था कभी चली भी जाती तो घर में बवंडर मच जाता । बस कभी-कभी मन्दिर के सामने उन्हें रोता हुआ पाया, हो सकता है ईश्वर से माँ ना होने का दुःख बयां करती रहीं होंगी अपने आँसुओ के द्वारा ।

उनका संघर्ष उनके अपनों से था, उनके पास वो कोई नहीं था जिससे वो शिकायत करती, जिससे जी भर कर अपना दुःख बयां करती, जी भर कर रोती, ऐसा कोई हाथ नहीं था जो उनके सिर पर फेरा जाता। शायद वो चुप ही रहती जिंदगी भर अगर उनकी बच्ची के साथ इतना बुरा ना हुआ होता, एक दुर्घटना ने उनकी बेटी के पति को उससे छीन लिया शादी के साल भर के अंदर ही बेटी का विधवा हो जाना बहुत बुरा था । 1 साल के अंदर पति की मृत्यु के लिए सब उनकी बेटी को ही जिम्मेदार मानने लगे और उसे अभागिनी, पति को खा गई शब्द बाणों से बेधने लगे, जब उन्होंने देखा कि बेटी भी चुपचाप सारी बातों को सुन लेती है तो उन्होंने सोच लिया कि अब उनकी चुप्पी तोड़ने का समय आ गया है । समाज के द्वारा मारे गए हर ताने का वो बहुत मजबूती से जवाब देती। एक दिन जब परिवार के लोगों ने ही बेटी पर उंगली उठाई तो उनके अंदर जमा हुआ बरसों का लावा निकल पड़ा उन्होंने अपनी बेटी से रोष भरे शब्दों में कहा- "मैं चुप इसलिए थी कि, मेरी माँ नहीं थी, तुम्हारे पास माँ है, मैंने इतना संघर्ष इसलिए किया ताकि तुम मजबूत हो, मैं डरती थी कि अगर मैं बोलूँगी तो कोई मजबूती से मेरे पीछे ना होगा, पर तेरे पीछे मैं हूँ। मैं रिश्तों के चक्रव्यूह में हमेशा अर्थहीन और महत्वहीन रही पर तू अर्थहीन नहीं रहेगी, मैं माँ ना होने के दर्द से सदैव जूझती रही हूँ पर तेरी माँ है तेरे साथ और तेरे संघर्ष में भी । बस - अब दूसरी उर्मिला नहीं, तू सबके सवालों का मुंहतोड़ जबाव दे वो मत कर जो मैंने किया, तभी मेरा संघर्ष पूर्ण होगा |

इसके बाद सबको उनके चुप रहने का आशय समझ में आया । उनका संघर्ष अपने में बेमिसाल था, और उसी में तप कर वो मजबूत हो गयी थी। अब वो बिल्कुल चुप नहीं थी क्योंकि अब उनका संघर्ष उनके लिए नहीं उनकी बेटी के लिए था ।

ऐसी ही है हमारी उर्मिला!!!

ऐसे लेख जो हमारी जीवनशैली को प्रभावित करते हैं, विचार को समृद्ध करते हैं,जीवन के इंद्रधनुषी रंग हैं

वारली कला में जीवन और फैशन साथ साथ हैं- डॉ अनुजा भट्ट

लाल गेरू रंग की दीवारों पर सफेद रंग से चित्रित साधारण वारली आकृतियाँ अप्रशिक्षित आँखों को कुछ खास नहीं लग सकती हैं। लेकिन करीब स...

पोस्ट हमारी ,पसंद आपकी- मैं अपने पाठकों का दिल से सम्मान करती हूं ।