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सोमवार, 14 सितंबर 2026

पौधे लगाएं , पेट्स और बच्चों का भी ख्याल रखें-अनुजा भट्ट


 आपने भी अपना आशियाना बना लिया है, तो सबसे पहले मेरी ओर से आपको बहुत-बहुत बधाई। मैं चाहती हूं कि आपका घर हरा-भरा और जीवंत हो। आजकल जिस तरह के घरों में हम रहते हैं, वहां ज़मीन पर गमले रखने के लिए जगह न होती। इसका एक आसान समाधान है: इनडोर हैंगिंग प्लांट्स (घर के अंदर लटकने वाले पौधे)।

पौधे लगाने के तरीके को भी मैं एक स्किल की तरह देखती हूं। हर स्किल सीखने का क्रम बिगिनर, इंटरमीडिएट, एडवांस और एक्सपर्ट होता है। अगर आप बिगनर हैं तो शुरुआत करने के लिए सही पौधे का चुनाव करना मुश्किल हो सकता है। आपके घर के लिए कौन सा पौधा सबसे अच्छा है? उसे कितनी रोशनी की ज़रूरत होगी? किस तरह के गमले का इस्तेमाल करना चाहिए? क्या यह पालतू जानवरों और बच्चों के लिए सुरक्षित है?  
मेरी तरह आपके मन के भीतर भी कई सवाल हो सकते हैं। इन सवालों का उत्तर जानने के लिए मैंने थोड़ी रिसर्च की, कुछ किताबों को टटोला और जो जानकारी मिली उसे आपसे साझा कर रही हूं।

सही इनडोर हैंगिंग प्लांट चुनना

 जब आप घर के अंदर लटकाने के लिए सबसे अच्छे पौधे ढूंढ रहे हों, तो आपको सबसे पहले कुछ बातों का पता लगाना होगा:

आपके पौधे को किस तरह की रोशनी पसंद आएगी?

उसकी ज़रूरतों का ध्यान रखने के लिए आपके पास कितना समय होगा?

जब आप अपनी ज़रूरतों के हिसाब से सही पौधे का चुनाव कर लें, तो आप खरीदारी कर सकते हैं। नीचे दस तरह के पौधों के बारे में बताया गया है जिनसे आप शुरुआत कर सकते हैं।

1. इंग्लिश आइवी (English Ivy)

रोशनी की ज़रूरत: तेज़ अप्रत्यक्ष (bright indirect) से सीधी रोशनी

पानी की ज़रूरत: हफ़्ते में एक बार

पालतू जानवरों के लिए सुरक्षित: नहीं

 वैज्ञानिक रूप से 'हेडेरा हेलिक्स' (Hedera helix) के नाम से जानी जाने वाली यह चमकदार, गहरे हरे रंग की बेल सिर्फ़ स्कूलों के कैंपस को ढंकने के लिए नहीं है। असल में, यह हैंगिंग प्लांट के तौर पर ज़्यादा बेहतर है और इसकी देखभाल करना भी बहुत आसान है। इसे मध्यम मात्रा में पानी और मध्यम रोशनी की ज़रूरत होती है—अगर आप इसे कम रोशनी वाली जगह पर लटकाना चाहते हैं, तो हर कुछ महीनों में इसे किसी दूसरे पौधे के साथ बदलें।

2. बॉस्टन फर्न

रोशनी की ज़रूरत: कम

पानी की ज़रूरत: हफ़्ते में दो बार

पालतू जानवरों के लिए सुरक्षित: हाँ

नेफ्रोलेपिस एक्सल्टेटा, या बॉस्टन फर्न, देखने में पंख जैसा और आकर्षक लगता है, लेकिन कम नमी वाली जगहों पर भी इसकी देखभाल करना काफ़ी आसान है। यह हवा को साफ़ करता है और पालतू जानवरों के लिए सुरक्षित है, इसलिए परिवारों के लिए यह एक बेहतरीन विकल्प है।

3. बर्ड्स नेस्ट फर्न

रोशनी की ज़रूरत: कम से तेज़ इनडायरेक्ट रोशनी

पानी की ज़रूरत: हफ़्ते में दो बार

पालतू जानवरों के लिए सुरक्षित: हाँ

यह हरा-भरा और ट्रॉपिकल पौधा कम से मध्यम रोशनी में अच्छा रहता है। इसकी देखभाल करना आसान है, यह पालतू जानवरों के लिए सुरक्षित है और इसे थोड़ी ज़्यादा नमी पसंद है—इसलिए इसे खिड़की वाले बाथरूम या किचन में रखें। इसे *Asplenium nidus* भी कहा जाता है। इसका नाम इसलिए ऐसा है क्योंकि इसकी नई पत्तियाँ खुलने से पहले छोटे पक्षी के अंडे जैसी दिखती हैं। जितनी ज़्यादा रोशनी इसे मिलेगी, इसकी पत्तियाँ उतनी ही ज़्यादा घुमावदार होंगी। अच्छी बात यह है कि बर्ड्स नेस्ट फर्न कम रोशनी में भी अच्छी तरह पनपता है, इसलिए अगर आप घर के किसी अंधेरे कोने को रोशन करना चाहते हैं, तो इसे चुन सकते हैं। कभी भी इसके बीच में या ऊपरी हिस्से (क्राउन) में पानी न डालें क्योंकि इससे यह सड़ सकता है; पानी हमेशा पत्तियों के नीचे और मिट्टी में डालें।"

 4. स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स

रोशनी की ज़रूरत: तेज़ इनडायरेक्ट रोशनी

पानी की ज़रूरत: हर दो से तीन हफ़्ते में एक बार

पालतू जानवरों के लिए सुरक्षित: नहीं

 इस खूबसूरत सक्यूलेंट पौधे पर गोल-गोल दाने सिर्फ़ दिखने में अच्छे नहीं लगते—असल में इनमें पानी भरा होता है । अच्छी बात यह है कि इन लटकने वाले पौधों की देखभाल करना आसान है और इन्हें घर में बस ऐसी जगह चाहिए जहाँ इनडायरेक्ट धूप आती ​​हो। ये ऊँची छत वाली जगहों के लिए बहुत अच्छे हैं, क्योंकि इनकी बेलों को फैलने के लिए काफ़ी जगह मिल जाती है। लेकिन जानकारी के लिए बता दें कि यह पौधा थोड़ा ज़हरीला होता है, और अगर इंसान या पालतू जानवर इसे खा लें, तो उन्हें थोड़ी-बहुत बीमारी (पेट की तकलीफ़ और त्वचा में जलन) हो सकती है।

 5. स्पाइडर प्लांट

रोशनी की ज़रूरत: कम से तेज़ इनडायरेक्ट रोशनी

पानी की ज़रूरत: हर दो से चार हफ़्ते में एक बार

पालतू जानवरों के लिए सुरक्षित: हाँ

इसकी सुंदर और पतली पत्तियाँ इसे लटकाने के लिए एक बेहतरीन विकल्प बनाती हैं, और कम देखभाल की ज़रूरत के कारण, यह नए लोगों के लिए भी बहुत अच्छा है।  "यह अनोखा पौधा मध्यम से तेज़ इनडायरेक्ट रोशनी में अच्छा रहता है, इसकी देखभाल करना बहुत आसान है और यह पालतू जानवरों के लिए भी सुरक्षित है।" इस पौधे में छोटे-छोटे 'स्पाइडरेट्स' (छोटे स्पाइडर प्लांट) उग सकते हैं। इन्हें काटकर पानी में रखने पर नई जड़ें निकल आती हैं और फिर इन्हें मिट्टी में लगाया जा सकता है। आप इन नए छोटे पौधों को परिवार और दोस्तों के साथ भी बांट सकते हैं! जितने ज़्यादा पौधे, उतनी ज़्यादा खुशी।

 6. फिलोडेंड्रॉन हार्टलीफ

रोशनी की ज़रूरत: कम से लेकर तेज़, लेकिन सीधी धूप नहीं (indirect light)

पानी की ज़रूरत: हफ़्ते में एक बार

पालतू जानवरों के लिए सुरक्षित: नहीं

अगर आप भी एक ऐसा घना लटकने वाला पौधा चाहते हैं जिसकी देखभाल में ज़्यादा मेहनत न लगे, तो 'फिलोडेंड्रॉन कॉर्डेटम ग्रीन' आपके लिए एकदम सही है। "तेज़ी से बढ़ने वाले दिल के आकार के ये पौधे कम से लेकर तेज़, लेकिन सीधी धूप न पड़ने वाली जगहों पर अच्छी तरह पनपते हैं और इनकी देखभाल करना बहुत आसान है।" ये लगभग किसी भी माहौल में अच्छी तरह बढ़ते हैं, इसलिए आप इन्हें कहीं भी (जैसे आपके घर में) लगा सकते हैं। और अच्छी बात यह है  ये पौधे बीच-बीच में मिट्टी के सूख जाने पर भी खराब नहीं होते। "बस अच्छी तरह पानी दें और वापस लटका दें।"

7. बेबीज़ टीयर्स

रोशनी की ज़रूरत: तेज़ लेकिन सीधी नहीं (ब्राइट इनडायरेक्ट)

पानी की ज़रूरत: हफ़्ते में एक बार

पालतू जानवरों के लिए सुरक्षित: हाँ

बेबीज़ टीयर्स (जिसे हेलक्सिन सोलेइरोली भी कहते हैं) टेरारियम में आम तौर पर पाए जाते हैं क्योंकि इनकी पत्तियाँ नाज़ुक और छोटी होती हैं और तने पतले होते हैं। लेकिन अगर आप इसे हैंगिंग प्लांटर में लगाएँ, तो यह बहुत अच्छी तरह बढ़ेगा; इसकी बेलें तेज़ी से फैलती हैं और गमले के किनारे से नीचे लटकती हैं। इसे नमी वाली जगह पसंद है और यह सूखना पसंद नहीं करता, इसलिए इसे ऐसी बाथरूम में रखें जहाँ खिड़की हो।

8. बरोज़ टेल

रोशनी की ज़रूरत: सीधी धूप

पानी की ज़रूरत: हर दो हफ़्ते में एक बार

पालतू जानवरों के लिए सुरक्षित: हाँ

बरोज़ टेल, यानी सेडम मॉर्गनियनम (जिसे कभी-कभी डोंकी टेल भी कहते हैं), 'स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स' की तरह ही एक सक्यूलेंट है। इसकी अनोखी, मोटी पत्तियों की थोड़ी ज़्यादा देखभाल करनी पड़ती है, लेकिन यह मेहनत बेकार नहीं जाती: गर्मियों में इसमें कभी-कभी फूल आते हैं, और इसके सिरों पर गुलाबी से लाल रंग के फूल खिलते हैं। इसे पूरी धूप में उगाना सबसे अच्छा रहता है, इसलिए अच्छी ग्रोथ के लिए इसे बहुत धूप वाली जगह या दक्षिण की ओर खिड़की वाले कमरे में रखें। सर्दियों को छोड़कर, जब इसे कम पानी की ज़रूरत होती है, इसे ठीक-ठाक मात्रा में और नियमित रूप से पानी देना चाहिए। और इसकी पत्तियों के बारे में: ये काफ़ी नाज़ुक होती हैं और आसानी से टूट सकती हैं, इसलिए इसे सही जगह पर रखें।

 9. सिल्वर सैटिन पोथोस

रोशनी की ज़रूरत: कम से तेज़ लेकिन सीधी नहीं (ब्राइट इनडायरेक्ट)

पानी की ज़रूरत: हर दो हफ़्ते में एक बार

पालतू जानवरों के लिए सुरक्षित: नहीं

सिल्वर सैटिन पोथोस (सिंडैप्सस पिक्टस) घर के अंदर लटकाने के लिए एक बेहतरीन विकल्प है—इसकी पत्तियाँ सुंदर और चितकबरी होती हैं और बेलें नीचे लटकती हैं। इसे "कम से तेज़ लेकिन सीधी नहीं रोशनी वाली जगहें पसंद हैं और यह हैंगिंग प्लांट के तौर पर बहुत सुंदर लगता है क्योंकि इसकी पैटर्न वाली सिल्वर-हरी पत्तियाँ नीचे लटकती हैं।" इसे सामान्य से गर्म तापमान और नमी वाली मिट्टी पसंद है, लेकिन मिट्टी बहुत गीली नहीं होनी चाहिए (इसे बहुत ज़्यादा पानी से भरा न रखें)। पोथोस आपको बता देगा कि उसे क्या चाहिए: अगर पत्तियाँ पीली होने लगें, तो समझ जाएँ कि आपने बहुत ज़्यादा पानी दे दिया है, और अगर वे कड़क या भूरी हो जाएँ, तो उसे बहुत ज़्यादा सीधी धूप मिल रही है। हवा साफ़ करने वाले इसके फ़ायदों का लाभ उठाने के लिए, इसे अपने बेडरूम में उस जगह के पास लटकाएँ जहाँ आप सोते हैं। स्पाइडर प्लांट की तरह ही, आप इसे भी दूसरों के साथ बांट सकते हैं:  “इसकी छोटी सी कटिंग लें और दूसरों को भी यह पौधा दें। इन्हें उगाना बहुत आसान है।”

10. एयर प्लांट्स

रोशनी की ज़रूरत: सीधी रोशनी

पानी की ज़रूरत: हफ़्ते में एक या दो बार

पालतू जानवरों के लिए सुरक्षित: हाँ

एयर प्लांट्स शायद घर के अंदर लटकने वाले सभी पौधों में सबसे कम देखभाल वाले होते हैं—इन्हें मिट्टी की भी ज़रूरत नहीं होती। बस हफ़्ते में एक बार पानी दें (चाहे भिगोकर या स्प्रे करके) और इन्हें सूखने न दें, ये आपकी जगह की खूबसूरती बढ़ा देंगे। 

पौधे लाइन भी उपलब्ध हैं। अगर आप आन लाइन पौधे खरीदना चाहते हैं तो हमें बताएं या  फिर आपके घर के आसपास जो नर्सरी हो वहां से भी खरीद सकते हैं। पौधों के बारे में आप किताब पढ़ना चाहते हैं तो भी मुझे बताएं। मैं आपको किताब और उसके प्रकाशक का नाम और पता शेयर कर दूंगी।

 

 

 

 

 

 

सोमवार, 7 सितंबर 2026

बाथरूम के साथ बाथरोब के भी बदले डिजाइन- अनुजा भट्ट

हमारी आधुनिक सोच हमारे घर के डिजाइन के साथ-साथ हमारे पहनावे में भी बदलती है। आज हमारे घर के बाथरूम नई टेक्नोलॉजी से सुसज्जित है, फिर चाहे वह बाथटब हो या वाशिंग मशीन। ठीक इसी तरह बाथरोब के डिजाइन भी बदल रहे हैं। यह एक तरह के तौलिए का आधुनिक और आरामदेह संस्करण है।


बाथरोब  तरोताजा महसूस करने और शाही अंदाज का अनुभव करने का एक बेहतरीन मौका भी है। सूती  बाथरोब अपनी प्राकृतिक कोमलता और पानी सोखने की बेहतरीन क्षमता के कारण सबसे ज्यादा पसंद किए जाते हैं। आइए अब डिजाइन के बारे में जानें।

· वॉफल वीव पैटर्न में कपड़े की सतह पर छोटे-छोटे चौकोर डिजाइन बने होते हैं जो देखने में बेहद आधुनिक हैं और आपको स्पा में होने का अहसास देते हैं।  इनका फेब्रिक बहुत हल्का है और आप खुद को बहुत कंफर्टेबल महसूस करते हैं। गर्मियों के मौसम के लिए यह सबसे बेहतरीन विकल्प है।

· टेरी टॉवल फिनिश डिज़ाइन में कपड़े के दोनों तरफ छोटे-छोटे सूती धागों के लूप्स  उभरे होते हैं, ठीक हमारे घर के पारंपरिक तौलिए की तरह। यह थोड़ा भारी और फूला हुआ दिखता है। यह डिज़ाइन पानी को सबसे तेज़ी से सोखता है, इसलिए नहाने या पूल से निकलने के तुरंत बाद पहनने के लिए सबसे बेस्ट है।

· वेलूर कॉटन फिनिश डिज़ाइन में बाथरोब के बाहरी हिस्से के लूप्स को काट दिया जाता है, जिससे बाहरी सतह मखमली और चमकदार हो जाती है, जबकि अंदर का हिस्सा तौलिए जैसा ही रहता है। यह दिखने में बेहद रॉयल, प्रीमियम है जो सर्दियों में हल्की गर्माहट भी देता है।

किस तरह के प्रिंट की मांग है

 कॉटन में ये डिज़ाइन्स बहुत चलते हैं:

· क्लासिक स्ट्राइप्स  इसमें वर्टिकल (खड़ी) या हॉरिजॉन्टल (आड़ी) धारियां होती हैं। सफेद रंग के साथ नेवी ब्लू, ग्रे या पेस्टल रंगों की धारियां सदाबहार हैं और सुंदर लगती हैं। पुरुषों में डार्क स्ट्राइप्स और महिलाओं में सॉफ्ट पेस्टल स्ट्राइप्स काफी पसंद की जाती हैं।

· फ्लोरल और बोटैनिकल प्रिंट्स हल्के कॉटन (जैसे मलमल या कैंब्रिक कॉटन) पर फूलों, पत्तियों और बेलों के सुंदर प्रिंट्स होते हैं। जयपुर के ट्रेडिशनल हैंड-ब्लॉक प्रिंट वाले कॉटन रोब आज बहुत मशहूर हैं, जो महिलाओं को एक फ्रेश और समर-फ्रेंडली लुक देते हैं।

· कंट्रास्ट पाइपिंग इसमें बाथरोब का बेस कलर पूरी तरह से सादा होता है (जैसे वाइट, ब्लैक या ग्रे), लेकिन उसके कॉलर, पॉकेट और आस्तीन (Sleeves) के किनारों पर एक अलग रंग की पतली पट्टी  सिली होती है। 
· ज्यामितीय प्रिंट्स  इसमें छोटे चेक या एब्सट्रैक्ट डिज़ाइन्स होते हैं। यह मॉडर्न लुक वाले यूनिसेक्स बाथरोब के लिए एक बेहतरीन विकल्प है।

कट और नेकलाइन डिज़ाइन्स 

बाथरोब का कॉलर और कट उसके पूरे कम्फर्ट और लुक को बदल सकता है।

 किमोनो स्टाइल  यह जापानी किमोनो ड्रेस से प्रेरित है। इसमें कोई मुड़ा हुआ कॉलर नहीं होता, यह गर्दन के पास बिल्कुल फ्लैट और सीधा होता है। यह हल्का होता है और गर्मियों में लाउंज करने के लिए बहुत आरामदायक है।

· शॉल कॉलर  इसमें गर्दन के पीछे से लेकर छाती तक एक गाउन की तरह मुड़ा हुआ मोटा और चौड़ा कॉलर होता है। यह गले को अच्छी कवरेज, लग्जरी लुक और सर्दियों में गर्माहट देता है।

· हुडेड डिज़ाइन  इसमें बाथरोब के पीछे सिर ढकने के लिए एक टोपी (Hood) जुड़ी होती है। यह डिज़ाइन उन लोगों के लिए बेस्ट है जो शावर के बाद अपने गीले बालों को सुखाना और सिर को ठंड से बचाना चाहते हैं।

  क्या फिटिंग में अंतर होता है

महिलाओं के बाथरोब इन्हें आराम के साथ-साथ स्टाइल को ध्यान में रखकर डिज़ाइन किए जाता हैं। ये कंधों से थोड़े कम चौड़े होते हैं और कमर के पास से शरीर की बनावट के अनुसार हल्के फिटेड होते हैं। ये शॉर्ट (घुटने से ऊपर), मिडी (घुटने तक) और मैक्सी (टखनों तक) जैसी विभिन्न लंबाइयों में आते हैं।

पुरुषों के बाथरोब मुख्य रूप से क्लासिक और लूज-फिट बनाए जाते हैं। ये कंधों से काफी चौड़े, ढीले-ढाले और लंबे (घुटनों से नीचे तक) होते हैं ताकि उठने-बैठने में पूरी आजादी और सही कवरेज मिले। इनमें नेवी ब्लू, डार्क ग्रे और ब्लैक जैसे गहरे रंग ज्यादा चलते हैं।

 यूनिसेक्स और कपल बाथरोब यह रोब इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि पुरुष और महिला दोनों पर अच्छे लगें। ये अक्सर न्यूट्रल रंगों (जैसे वाइट, बेज या ग्रे) में आते हैं और इनमें साइज थोड़े ढीले रखे जाते हैं, जिन्हें कमर पर दी गई एडजस्टेबल बेल्ट से फिट किया जाता है। इन्हें कपल गिफ्ट के रूप में देना भी काफी लोकप्रिय है।
अधिक जानकारी के लिए आप हमारे फेसबुक ग्रुप में जाएं यहां आपको हमारे प्रोडक्ट तस्वीरें दिख जाएंगी। आप खरीद सकते हैं

शनिवार, 5 सितंबर 2026

महिलाओं की पहली पसंद बन रहा है टोटे बैग

   घर से बाहर निकलने से पहले जो सबसे ज्यादा जरूरी बात है वह है अपने सामान की देखभाल करना और उनको सुरक्षित रखना। इसके लिए हमें एक पर्स या एक बैग की जरूरत होती है, जिसमें हम सभी जरूरी सामान रख सकें। बाहर  ले जाना है तो जरूरी है कि देखने में भी सुंदर हो  ताकि हम उसे अपनी पर्सनेलिटी से मैच करता देख सकें।  चीज़ें छोटी हाें या बड़ी हमारी पर्सनेलिटी का हिस्सा होती हैं।  कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जो अपनी उपयोगिता और बेहतरीन लुक के कारण हमेशा के लिए लोगों की पसंद बन जाती हैं। इन्हीं में से एक है क्विल्टेड टोटे बैग।  कॉलेज जाने वाली लड़कियों से लेकर कॉर्पोरेट महिलाओं और सेलिब्रिटीज तक के दिलों में  इसने अपनी एक खास जगह बनाई है।  आप इस तरह के बैग के बारे में जानना चाहते हैं.....

  टोटे बैग अन्य बैग से अलग क्यों है?

 टोटे बैग  ऊपर से खुला हुआ बैग होता है जिसमें दो समानांतर (parallel) हैंडल होते हैं। जब इस पारंपरिक टोटे बैग पर 'क्विल्टिंग' (Quilting) तकनीक का उपयोग किया जाता है, तो इसे क्विल्टेड टोटे बैग कहते हैं।
क्विल्टिंग एक ऐसी कला है जिसमें कपड़े की दो या दो से अधिक परतों को एक साथ सिलकर एक गद्देदार  पैटर्न  में बनाया जाता है। 

 स्टूडेंट्स इतना पसंद क्यों कर रहे हैं?

इसके कई मुख्य कारण हैं जिसमें सबसे पहला है लग्ज़री और एलिगेंट लुक,आराम दायक अहसास, और खूब सारी जगह का होना। चूंकि ये बैग्स गद्देदार होते हैं, इसलिए इन्हें कंधे पर लटकाना बेहद आरामदायक होता है। जब आप बैग में भारी लैपटॉप या किताबें रखती हैं, तो इसके चौड़े और सॉफ्ट क्विल्टेड हैंडल्स आपके कंधों पर दबाव या दर्द नहीं होने देते। इसके साथ ही इसका पफी और थिक मटेरियल अंदर रखे नाजुक सामान जैसे लैपटॉप, आईपैड, चश्मा या मेकअप प्रोडक्ट्स को सेफ रखता है। यह एक तरह से आपके गैजेट्स के लिए कुशन का काम करता है।

क्या है मैटीरियल

बाज़ार में क्विल्टेड टोटे बैग कई तरह के मटेरियल्स में उपलब्ध हैं, जिन्हें आप अपनी ज़रूरत के हिसाब से चुन सकते हैं।नायलॉन और पॉलिएस्टर  बैग्स सबसे हल्के और वॉटर-रेसिस्टेंट (पानी प्रतिरोधी) होते हैं। इन्हें साफ़ करना बेहद आसान होता है और ये कैज़ुअल या जिम लुक के लिए बेस्ट माने जाते हैं। फॉक्स लेदर या वेगन लेदर बैग, अगर आप ऑफिस या किसी फॉर्मल मीटिंग के लिए बैग ढूंढ रहे हैं, तो लेदर फिनिश वाला क्विल्टेड टोटे सबसे अच्छा विकल्प है। यह आपके फॉर्मल सूट्स या ड्रेसेस के साथ बेहद क्लासी और प्रोफेशनल लगता है। मखमली या साटन बैग को  पार्टियों या शाम के फंक्शन्स के लिए डिज़ाइन किया जाता है। इनकी चमक इन्हें खास दिखाती है।

स्टाइल से करें कैरी

 यह 'वर्सटाइल' है, यानी इसे कई तरह के आउटफिट्स के साथ कैरी किया जा सकता है।ऑफिस और कॉलेज लुक के लिए एक ब्लैक, बेज या ऑलिव ग्रीन कलर का लेदर क्विल्टेड टोटे चुनें। इसे ट्राउजर्स, ब्लेज़र या फॉर्मल शर्ट के साथ पेयर करें। यह आपके लुक को मैच्योर और सोफिस्टिकेटेड लुक देगा।
कैज़ुअल लुक के लिए आजकल 'पफर टोटे बैग्स'  ट्रेंड में हैं। आप इसे ओवरसाइज़्ड हुडी, जॉगर्स या डेनिम जींस और स्नीकर्स के साथ कैरी कर सकते हैं। यह आपको एक कूल और एफर्टलेस लुक देता है।
शॉपिंग या वीकेंड आउटिंगके लिए जाना है तो एक वाइब्रेंट या पेस्टल कलर (जैसे पेस्टल पिंक या मिंट ग्रीन) का नायलॉन क्विल्टेड बैग आपके वीकेंड ड्रेसेस या शॉर्ट्स के साथ बहुत फंकी और फ्रेश लुक देगा।

क्या खरीदारी का मन  रहा है

यदि आप अपने लिए एक परफेक्ट क्विल्टेड टोटे बैग खरीदने की सोच रहे हैं, तो यह चेकलिस्ट आपके लिए आकार (Size): अगर आपको लैपटॉप (14 या 15 इंच) कैरी करना है, तो बैग के डाइमेंशन्स ज़रूर चेक करें। रोजाना के छोटे सामान के लिए मीडियम साइज का बैग सही रहता है।
ज़िप क्लोजर (Zip Closure): कई टोटे बैग्स ऊपर से खुले होते हैं या उनमें सिर्फ एक मैग्नेटिक बटन होता है। सुरक्षा के लिहाज से हमेशा मुख्य कम्पार्टमेंट में ज़िप (Zipper) वाला बैग ही प्राथमिकता पर रखें।
पॉकेट्स कितनी चाहिए?अधिक जानकारी के लिए आप हमारे फेसबुक ग्रुप में जाएं

शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

नारायणपेट और गायत्री बॉर्डर साड़ी- एक छोटे से कस्बे की लंबी दास्तान

 

Narayanapet cotton saree, gayetri border

इस बार चलते हैं दक्षिण मध्य भारत में स्थित तेलंगाना राज्य के एक छोटे से कस्बे नारायणपेट, जिला नारायणपेट, राजधानी हैदराबाद। इस बार अपने साथ आपको भी सैर कराने की वजह सिर्फ एक ही है जो हम पहनते-खाते- पीते हैं उसके इतिहास को भी थोड़ा टटोला जाए। नारायणपेट साड़ी की मांग अक्सर मेरे ग्राहक करते हैं।

 नारायणपेट के पारंपरिक 'चौका' (चेक पैटर्न) और इल्कल-शैली के 'गायत्री बॉर्डर' (Gayatri Border) का मिलाजुला रूप  इस  समय फैशन जगत में छाया हुआ है।

नारायणपेट साड़ी की कहानी 400 साल पुरानी

नारायणपेट साड़ी का इतिहास लगभग 400 वर्ष पुराना  है। 17वीं शताब्दी (लगभग 1630 ई.) में जब मराठा सम्राट छत्रपति शिवाजी महाराज इस क्षेत्र से गुजर रहे थे, तब उनके साथ आए कुछ बुनकर यहीं बस गए। इन बुनकरों ने महाराष्ट्र की बुनाई कला को स्थानीय संस्कृति के साथ मिलाया, जिससे नारायणपेट साड़ियों का जन्म हुआ। इस अद्वितीय विरासत के कारण नारायणपेट साड़ियों को भौगोलिक संकेतक (GI Tag) भी प्राप्त हो चुका है।

क्या है गायत्री बॉर्डर

'गायत्री बॉर्डर' जिसे कई क्षेत्रों में 'इल्कल गायत्री बॉर्डर' भी कहा जाता है, मुख्य रूप से धागे के काम (Thread-work) और मंदिर की कलाकृति (Temple Motifs) से सजा है। इसते बॉर्डर में त्रिकोणीय गोपुरम या 'रुद्राक्ष' के डिजाइन बुने जाते हैं, इससे साड़ी में आध्यात्मिक और पारंपरिक लुक दिखता हैं। जहाँ नारायणपेट साड़ी की बॉडी एकदम सरल या छोटे चेक वाली होती है, वहीं इसका गायत्री बॉर्डर बेहद आकर्षक और गहरे विरोधाभासी (Contrast) रंगों में बनाया किया जाता है।

8 साड़ियां बुनी जाती हैं एक साथ

नारायणपेट साड़ियों की बुनाई 'पिट लूम' (Pit Loom) पर की जाती है। इसके निर्माण में 'इंटरलॉक वेफ्ट' (Interlock Weft) तकनीक का उपयोग होता है, जिससे साड़ी का बॉर्डर और बॉडी आपस में मजबूती से जुड़ जाते हैं। इस बुनाई की एक और बड़ी विशेषता यह है कि बुनकर एक बार में करघे पर 8 साड़ियों का ताना सेट करते हैं।

पल्लू है खास

नारायणपेट गायत्री बॉर्डर साड़ियों में रंगों का चयन बेहद गहरा और भारतीय संस्कृति से प्रेरित होता है, जैसे—हल्दी पीला, सिंदूरी लाल, रानी पिंक, बोतल ग्रीन और गहरा मैरून। इसका पल्लू, जिसे 'टोपा-तेन्नी' पल्लू भी कहा जाता है, उसमें लाल और सफेद रंग की चौड़ी पट्टियाँ (Stripes) होती हैं जो इसकी पहचान हैं।

पहनना है आसान

हल्की और ड्रेप करने में बेहद आसान होने के कारण, महिलाएं  बिना किसी परेशानी के पहन सकती हैं। आज की  घरेलू और कामकाजी महिलाएं,  नारायणपेट गायत्री बॉर्डर साड़ी को शालीन और प्रोफेशनल लुक के लिए काफी पसंद कर रही हैं। घर की पूजा में पहनना हो या ऑफिस में पार्टी हो यह साड़ी हर अवसर पर आपके बेहतर बनाती है।

निष्कर्ष:
नारायणपेट गायत्री बॉर्डर साड़ी हमारे बुनकरों की कड़ी मेहनत और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। कम बजट में एक रॉयल और एलिगेंट लुक देने वाली यह साड़ी आज के सस्टेनेबल फैशन (Sustainable Fashion) के दौर में भारतीय महिलाओं की पसंदीदा लिस्ट में शामिल है।

 

मंगलवार, 1 सितंबर 2026

जन्माष्टमी, साड़ियाें में भी समाएं हैं कृष्ण – डा. अनुजा भट्ट

पिछवाई साड़ी और कन्हाई की कहानी


भारत का एक मशहूर राज्य है राजस्थान। मैं यहां से कई तरह के संग्रह आपके लिए लाती हूं। इसी तरह भारत के हर राज्य की कला और कलाकार से जुड़ने का अवसर भी मुझे मिलता है। यह सारा काम काफी श्रमसाध्य है पर मुझे आनंद आता है। मुझे यहां कई कहानियां और किवदंतियां मिलती है। जैसे जैसे राह चलती हूं ईश्वर और फैशन की गलियां पुकारने लगती हैं। आप जब कभी राजस्थान गए होंगे तब आपने नाथद्वारा में श्रीनाथ मंदिर अवश्य देखा होगा। राजस्थान के नाथद्वारा में भगवान श्रीनाथ जी का मंदिर काफी लोकप्रिय जो है ।

श्रीनाथ जी मंदिर राजस्थान के राजसमंद जिले के नाथद्वारा शहर में स्थित है। यह उदयपुर से 50 किमी. और डबोक एयरपोर्ट से 58 किमी. दूरी पर स्थित है।

किंवदंती और इतिहास

श्रीनाथजी के स्वरूप या दिव्य रूप को स्वयं प्रकट कहा गया है। पौराणिक कथा के अनुसार ,

रविवार, 30 अगस्त 2026

दीवार और कील — अनुजा भट्ट



एक दीवार हूँ मैं... जिस पर कील नहीं ठुकती,
ऊपर से एकदम सपाट सी दिखाई देने वाली सड़क,
या फिर कोई पगडंडी,
या यूँ ही कोई बेनाम सा मैदान...
न हरियाली, ना पेड़, एकदम सुनसान!

 नीचे एकदम भुरभुरी थी ज़मीन,
जैसे कोई दीवार हो... जिसकी सीलन बाहर नहीं दिखाई देती,
पर कोई कील उसे भुरभुरा कर, भीतर की रेत फर्श पर उड़ा देती है।
धरती और दीवार पर टंगी कील, जैसे एक स्त्री में बदल जाती है,
और वह स्त्री कोई और नहीं... मैं हूँ!
वेदना से उठी मेरी चीख, दुःख के बादल इकट्ठे करती है,
मैं बुदबुदाती हूँ— अभी ही यह सब होना था?
अभी-अभी ही तो मैंने एक सपना बुना था,
और उसे बादलों में टांग देने की सोच रही थी...
बादल जहाँ-जहाँ उड़ें, मेरे सपने को भी अपने साथ लेते जाएँ,
और जब, जहाँ बारिश होगी...
मेरा सपना भी उस-उस जगह अपनी हकीकत की दास्तान लिख आएगा!
पर यह उदासी जम गई है... मिट्टी दरक गई है,
दरक गई मिट्टी की परतों के साथ, यह उदासी भीतर जम गई है।
जितना मैं इसकी परतों को हटाती हूँ,
यह और ज़्यादा जम जाती है।


गुरुवार, 27 अगस्त 2026

महेश्वर: नर्मदा की लहरों में संस्कृति भी है और आधुनिकता भी





इतिहास, आध्यात्मिकता और कला का अनोखा संगम है महेश्वर, जहां इतिहास भी है, आध्यात्मिकता भी और कला  भी। 
नर्मदा नदी के पावन तट पर बसा यह शहर अपनी ऐतिहासिक इमारतों के साथ ही साथ दुनिया भर में प्रसिद्ध महेश्वरी साड़ियों के लिए भी जाना जाता है।

    कैसी है शहर की खुशबू
महेश्वर भारत के मध्य प्रदेश राज्य के खरगोन  जिले में स्थित है।  इंदौर शहर से लगभग 90 किलोमीटर दक्षिण और खरगोन जिला मुख्यालय से मात्र 56 किलोमीटर दूर है यह शहर। जिसके किनारे बहुत ही सुंदर और भव्य घाट है। पत्रकारिता के काेर्स के लिए जब मैं भोपाल गई तो वहां मेरे सहपाठियों में नीलेश तायल भी थे। वह मेरे साथ नवभारत टाइम्स में प्रशिक्षण के लिए भी आए। साथ काम करते हुए हम बहुत बार अपने घर को याद करते हैं। मैं उसे नैनीताल के बारे में बताती और वह खरगौन के बारे में। उसके पास अपने शहर की यादें थी और मेरे पास अपने शहर की।  उनसे ही जाना मैंने सबसे पहले खरगौन  के बारे में और उस शहर से आसपास की कथाओं के बारे में।
 कथाएं जो हमें जीवन देती हैं
 सहस्रार्जुन से अहिल्याबाई तक महेश्वर का इतिहास  बहुत दिलचस्प लगा मुझे ।  पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह शहर हयवंशी राजा सहस्रार्जुन की राजधानी था। कहा जाता है कि सहस्रार्जुन ने रावण तक को पराजित कर दिया था। बाद में ऋषि जमदग्नि को प्रताड़ित करने के कारण भगवान परशुराम ने सहस्रार्जुन का वध यहीं किया था। शंकराचार्य और पंडित मण्डन मिश्र का विश्व प्रसिद्ध और ऐतिहासिक शास्त्रार्थ इसी पावन भूमि पर हुआ था।
बहुत बाद में यह शहर मराठा साम्राज्य की महान, न्यायप्रिय और कला-प्रेमी शासिका देवी अहिल्याबाई होल्कर की राजधानी बना। उन्होंने ही महेश्वर को अपनी संस्कृति और कला का मुख्य केंद्र बनाया।
आज महेश्वरी साड़ी महिलाओं की पहली पसंद बनी हुई है, आज मैं आपको इसके इतिहास के बारे में बताती हूं। 
सन 1767 के आसपास, रानी अहिल्याबाई होल्कर ने मालवा और सूरत से विशेष शिल्पकारों और बुनकरों को महेश्वर बुलाया। उन्होंने कारीगरों को 9 गज की एक विशेष साड़ी बनाने का आदेश दिया, जिसकी डिजाइन उन्होंने खुद तैयार की थी।
शुरुआत में ये साड़ियाँ केवल शाही मेहमानों और रिश्तेदारों को उपहार में दी जाती थी  लेकिन बाद में रानी को लगा कि यह एक कुटीर उद्योग हो सकता है और इससे  हज़ारों परिवारों को रोज़गार दिया जा सकता है।
महेश्वरी साड़ी की खासियत क्या है?
किलों और घाटों से प्रेरित बॉर्डर: महेश्वरी साड़ियों के बॉर्डर पर बनी डिज़ाइनें महेश्वर के किले की दीवारों, ईंटों और नर्मदा नदी के घाटों की नक्काशी से प्रेरित होती हैं।
चटाई बॉर्डर: चटाई के पैटर्न के अनुसार  बुना गया बॉर्डर।
चमेली बूटा: चमेली के सुंदर फूलों का पैटर्न।
ईंट बॉर्डर: किले की दीवारों की ईंटों जैसी ज्यामितीय (geometric) बनावट।
हीरा बॉर्डर: हीरे के आकार की बारीक डिज़ाइन्स।
रीवर्सिबल बॉर्डर (बुगड़ी बॉर्डर): यह  साड़ी की सबसे अनोखी बात है। इसका बॉर्डर दोनों तरफ एक जैसा होता है, यानी आप इसे सीधा या उल्टा, दोनों तरफ से पहन सकती हैं।
विशिष्ट पल्लू डिज़ाइन: इसके पल्लू में 5 पट्टियाँ होती हैं (3 रंगीन और 2 जरी की लाइनें), जो इसे बहुत ही क्लासी लुक देती हैं।
बॉडी पैटर्न्स: साड़ी का बीच का हिस्सा या तो सादा होता है या फिर उसमें 'चांदतारा' (छोटे चांद-तारे) या महीन धारियां और चेक (घारड़ी) बने होते हैं।
कैटेगिरी - चंद्रकला, बैंगनी चंद्रकला, चंद्रतारा, बेली और पारबी।
फैब्रिक और रंग पारंपरिक रूप से महेश्वरी साड़ियों में केवल लाल, मैरून, काले, हरे और बैंगनी जैसे गहरे रंगों का ही इस्तेमाल होता था। लेकिन आज के मॉडर्न फैशन के साथ इसमें लाइट पेस्टल कलर्स और सोने-चांदी के धागों (Zari) का बेहद खूबसूरत कॉम्बिनेशन मिलने लगा है।
सिल्क और कॉटन (Silk-Cotton) के बेहतरीन ब्लेंड और बेहद हल्के वजन के कारण यह साड़ी हर मौसम के लिए आरामदायक है। आप इसे किसी कैज़ुअल आउटिंग से लेकर शादी-पार्टी जैसे फॉर्मल इवेंट्स में भी शान से कैरी कर सकती हैं।
साड़ी देखभाल भी मांगती है
चूंकि यह एक प्रीमियम हैंडलूम साड़ी है, इसलिए इसके रखरखाव पर थोड़ा ध्यान देना ज़रूरी है: साड़ी को पहली बार हमेशा ड्राई क्लीन (Dry Clean) के लिए ही भेजें। इसके बाद आप इसे घर पर किसी माइल्ड डिटर्जेंट के साथ हाथों से धो सकती हैं। इन साड़ियों को धोने के लिए हमेशा ठंडे पानी का ही इस्तेमाल करें, गर्म पानी से इसके धागे खराब हो सकते हैं।

इस तरह हमने जाना महेश्वर सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास और टेक्सटाइल आर्ट का जीता-जागता संग्रहालय है। यहाँ के राजराजेश्वर मंदिर, अहिल्याेश्वर मंदिर, और नर्मदा के घाट मन को शांति देते हैं, तो वहीं यहाँ की साड़ियाँ भारत की समृद्ध कला का अहसास कराती हैं। 

मंगलवार, 25 अगस्त 2026

लंदन फोर्ट- चांदनी चौक की चमक और ठुलकुड़ा का विरह




चमक सफलताओं की होती है और दर्द में हम ताउम्र भींगते हैं। हमारे भीतर अपनों के आँसू और विरह की चीखें भी दफन हो जाती हैं। हमारे दादाजी का जीवन एक ऐसी ही कहानी है, जहाँ एक तरफ दिल्ली के चांदनी चौक के रसूख दार लोग उनको प्रभावित कर रहे थे तो दूसरी तरफ देश की राजनीति उनको सम्मोहित ।उधर हमारे पुश्तैनी घर 'ठुलकुड़ा' के एक शांत कोने में बिखरा एक गहरा सन्नाटा भी था।
कहानी को थोड़ा सा पीछे ले जाती हूँ। मेरे परदादा त्रिलोचन भट्ट जी की ससुराल छाना गांव में थी और उनकी सास थी ज्योली के पंतों की बेटी। त्रिलोचन जी की 6 संताने थीं: 4 बेटे और 2 बेटियां। मेरे दादाजी भाइयों में सबसे छोटे और बहनों में बीच के थे। पढ़ाई-लिखाई के मामले में वे अपने अन्य भाइयों की तुलना में मध्यम दर्जे के थे। लेकिन उनके भीतर कुछ बड़ा करने की, गाँव की सीमाओं को लांघने की तीव्र और अदम्य महत्वाकांक्षा थी। उनकी बड़ी बहन का विवाह श्री हीरा बल्लभ पंत जी के साथ हुआ था, जिनका एक ही बेटा था— नाम था दीप चंद्र पंत।" मेरे दीप ताऊजी के बेटे दिनेश दद्दा बताते हैं , हम लोगों का गांव नैनीताल के नौकुचियाताल में शिलोटी पंत नाम का है पर हम लोग 250-300 साल पहले खूंट गांव से आए थे और फिर अल्मोड़ा पोखरखाली में बस गये। वर्ष 1958 में हम रानीधारा आ गए। मेरे पिता श्री दीप चंद्र पंत जी के चाचा का नाम घनानंद पंत था, जिन्होंने 'कुमाऊँ मोटर ओनर्स यूनियन लिमिटेड' (KMOU) की शुरुआत में अपना अहम योगदान दिया था; यह बात 1915 के आसपास की है।"
मेरे दादा जी की दूसरी बहन की शादी श्री नित्यानंद पांडे जी के साथ हुई थी, जो ढोली गाँव का एक प्रतिष्ठित पांडे परिवार था। नित्यानंद जी धनी मानी व्यक्ति थे। उनके एक बेटे श्री दया किशन पांडे थे जो मशहूर वकील और विधायक रहे।
मेरे दादा दी बहुत कम उम्र में ही अपना गाँव बिषाड़ छोड़कर दिल्ली आ गए थे और कांग्रेस से जुड़ गए थे। यह वह दौर था जब देश आज़ादी की नई इबारत लिख रहा था। भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने दिल्ली में एक बड़ा राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया था, जिसमें हमारे दादाजी ने सक्रिय भागीदारी की थी। उस सम्मेलन में दादाजी की नेहरू जी के साथ एक ऐतिहासिक तस्वीर खींची गई, जो अगले दिन देश के प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार 'हिंदुस्तान टाइम्स' (Hindustan Times) में प्रमुखता से प्रकाशित हुई।
नियति का खेल देखिए, वक्त का पहिया घूमा और कालांतर में सालों बाद, दादाजी की पोती—यानी मैंने—उसी 'हिंदुस्तान टाइम्स' अखबार में अपनी पेशेवर नौकरी की शुरुआत की। जब मैं दफ्तर की उन मेज़ों को देखती थी, तो मुझे अहसास होता था कि इतिहास की कड़ियाँ किस तरह अदृश्य रूप से हमें अपने पूर्वजों से जोड़ देती हैं।
दिल्ली में दादाजी ने ज्योतिष और कर्मकांड के काम को अपनी आजीविका का मुख्य आधार बनाया। चांदनी चौक के बड़े-बड़े रसूखदार 'मुनार' (स्वर्णकार/सुनार) समाज के लोग उनके मुख्य यजमान बन गए। दादाजी का यह कारोबार बहुत फला-फूला। वे दिल्ली के संभ्रांत समाज के एक जाने-माने ज्योतिषी बन गए, लेकिन इस कारण वे बेहद व्यस्त रहने लगे। उनका गाँव आना-जाना बहुत कम हो गया।
दिल्ली से कमाया हुआ पैसो से गाँव में भी वे अपने उन्हीं सुनार यजमानों की तरह ग्रामीणों को ज़रूरत पड़ने पर कर्ज (पैसे) देते थे या उनके गहने व ज़मीन गिरवी रख लेते थे। बही-खातों और लेन-देन की यह पूरी दास्तान आज भी हमारे पास एक 'पांडुलिपि' (Manuscript) के रूप में महफ़ूज़ है।
लेकिन दिल्ली की इस चमक की एक बहुत भारी और दर्दनाक कीमत हमारे पुश्तैनी घर में चुकाई जा रही थी। दादाजी का रहन-सहन और उनका आर्थिक स्तर ईर्ष्या का भी कारण थे। सन्1930 में जब हमारी बड़ी दादी (हरिप्रिया ) के गर्भ से पहले बेटे (हमारे ताऊजी) का जन्म हुआ, तब दादाजी दिल्ली में ही व्यस्त थे। उन दिनों संचार के साधन नहीं थे। दादाजी को भेजा गया टेलीग्राम (तार) उन्हें बहुत देर से मिला। वे तुरंत गाँव नहीं पहुँच सके।
पति की अनुपस्थिति गाँव की महिलाओं के बीच में शक और संदेहसे उपजी काना फूंसी लगातार मेरी बड़ीदादी को कितना तकलीफ देती होगी यह सोचकर लिखते हुए भी मेरे हाथ कांप रहे हैं। उस समय कम उम्र में ही शादी हो जाती थी। पहला मासिक ससुराल में ही होता था। पहले मासिक के बाद जब 5 दिन पूरे हो जाते तो सत्यनारायण की कथा होती।
इस तरह सोचती हूं तो मेरी बड़ी दादी 14 साल में मां बनी होगी। भीतर से कितना डर रहा होगा, ऊपर से समाज के ताने। कितनी टूट गई होगी। उनकी हर सुबह और हर शाम छींटाकसी के बीच गुज़रती थी—"तेरा पति तो तेरे साथ रहता ही नहीं, वह तो दिल्ली रहता है। इतनी दौलत का क्या फायदा, जब आदमी ही पास न हो"। उनके सीधे-सरल मन में यह बात बैठ गई कि उनका पति उनसे इतना विमुख कैसे हो सकता है? वे अवसाद के उस गहरे दलदल में धंस गईं जहाँ से बाहर निकलने का उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझा।
और फिर वह खौफनाक दिन आया। जिस दिन हमारे ताऊजी ने इस दुनिया में अपनी आँखें खोली थीं, उसके ठीक बाद, बड़ी दादी ने कमरे के एक कोने में रखे एक सुंदर से पालने में उस नवजात शिशु को बहुत दुलार से लिटाया। उन्होंने बच्चे को भरपेट दूध पिलाया, उसे चूमा, और फिर एक गहरे, मौन विलाप के साथ खुद को एक कमरे में बंद कर लिया। अपने अकेलेपन, विरह और समाज के तानों से हारकर, उन्होंने अपने ऊपर आग लगा ली। जब तक लोग दरवाज़ा तोड़कर भीतर पहुँचते, बड़ी दादी इस नश्वर संसार को छोड़कर जा चुकी थीं। पालने में लेटा वह नन्हा बच्चा अपनी माँ के इस दर्दनाक बलिदान से अनजान, चुपचाप सो रहा था।
बड़ी दादी के असमय चले जाने के बाद, ठुलकुड़ा के उस सूने कमरे में एक नवजात शिशु की रोने की आवाज़ गूँज रही थी। हमारे ताऊजी, माँ के आँचल और उनके दूध से महरूम हो चुके थे। माँ की चिता की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि इस नन्हे बच्चे की भूख शांत करने का एक बड़ा संकट पूरे कुटुंब के सामने खड़ा था।
उस दौर में डिब्बे का दूध या आधुनिक विकल्पों का कोई नामोनिशान नहीं था। ऐसे कठिन समय में बिषाड़ गाँव और आस-पास के परिवारों की इंसानियत जाग उठी। गाँव की जिन माताओं के अपने छोटे बच्चे थे, वे आगे आईं। वे बारी-बारी से ठुलकुड़ा आतीं और अनाथ हो चुके हमारे ताऊजी को अपनी गोद में लेकर ममता का दूध पिलाती थीं।
ताऊजी जब बड़े हुए, तो वे बड़े गर्व और भावुकता से अक्सर यह संस्मरण सुनाया करते थे—"मैंने किसी एक माँ का नहीं, बल्कि इस गाँव की सोलह माताओं का दूध पीकर अपना जीवन पाया है"। यह वाक्य कुमाऊँ की उस सांझी लोक-संस्कृति का साक्षात प्रमाण था, जहाँ पूरा गाँव विपत्ति के समय एक परिवार बन जाता था।
लेकिन इस कहानी का एक और पहलू था, जो हमारे दादाजी के अनोखे और स्वाभिमानी चरित्र को उजागर करता है। जब दादाजी दिल्ली से वापस लौटे, तो वे अपनी पत्नी को खोने के गहरे दुख से टूट चुके थे। पर वे एक व्यावहारिक और नफासतपसंद व्यक्ति थे। उन्होंने देखा कि गाँव की महिलाओं ने उनके बेटे को दूध पिलाकर उसका जीवन बचाया है। दादाजी का स्वाभिमानी चरित्र यह बर्दाश्त नहीं कर सकता था कि वे किसी का यह उपकार मुफ़्त में लें या किसी के अहसान तले दबे रहें।
उन्होंने एक बेहद अजीब लेकिन पारदर्शी रास्ता चुना। जिन माताओं ने ताऊजी को अपना दूध पिलाया था, दादाजी उन परिवारों को अपना 'कर्ज़दार' मानने लगे। उन्होंने अपनी उसी पुरानी बही-खाते की पांडुलिपि (Manuscript) को उठाया, जिसमें वे लेन-देन का हिसाब रखते थे। उन्होंने बाकायदा पन्नों पर दर्ज किया कि किस परिवार की महिला ने उनके बच्चे को कितनी बार और कितने समय तक दूध पिलाया है।
दादाजी ने इस ममतामयी उपकार की कीमत चुकाने का फैसला किया। जिन परिवारों ने उनसे पहले से कोई कर्ज ले रखा था, दादाजी ने उनके बही-खाते से कर्ज के धन को काट दिया और उन्हें ऋणमुक्त कर दिया। जिन पर कोई कर्ज नहीं था, उन्हें उन्होंने बाकायदा धन के रूप में पारिश्रमिक या सहायता राशि चुकाई। इस अनूठे लेन-देन का ब्योरा आज भी हमारे परिवार की उस ऐतिहासिक पांडुलिपि के पन्नों पर दर्ज है।
इस जिंदगीनामा में आगे आप पढ़ेंगे और भी कई किस्से जो आपको भावुक कर देंगे।
पापा, कल एकादशी है। आपको गए हुए 4 माह हो जाएंगे पर यह जिंदगीनामा लिखते हुए लगता है ,
आप आराम कुर्सी में बैठे हैं और मैं तख्त पर।
बाहर बारिश हो रही है।
पेड़-पौधे भीग रहे हैं, साथ में भीग रही हूँ मैं भी।
आपको बारिश पसंद थी ना, पापा?
मुझे भी पसंद है।
उत्तराखंड के इतिहास के बारे में जानना चाहते हैं तो पढ़े यह किताब
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