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रविवार, 9 अप्रैल 2017

काैन हैं सामा चकवा- डा. अनुजा भट्ट



भाई बहन के प्रेम के प्रतीक के रूप में रक्षाबंधन और भाईदूज के अलावा अन्य त्यौहार भी हैं जोकि देश के विभिन्न हिस्सों में प्रचलित हैं।  पेश है मिथिला की प्रचलित सामा-चकवा कथा:-
सामा‘-चकवा भाई बहन के प्रेम पर आधारित है जो मिथिला की संस्कृति का प्रतीक है। सामा चकवा के बारे में प्रचलित है कि श्यामा श्री कृष्ण जी की बेटी थी और साम्ब श्यामा का नाई था। जिसे मैथली में मतभर्दया के नाम से जाना जाता है। दोनों में असीम स्नेह था। श्यामा का विवाह चारूदत्त नामक ऋषि से हुआ। श्यामा प्रकृतिप्रेमी थी और चिड़िया, फूल पत्तों से खेलती थी। श्री कृष्ण का मंत्री चुरक जिसे चुगला के नाम से जाना जाता था। चुगली करके श्रीकृष्ण के कान भरना शुरू किया जिससे श्रीकृष्ण ने क्रुद्ध होकर श्यामा को श्राप से पक्षी बना दिया। इधर चारूदत्त ने शिवजी को प्रसन्न कर पक्षी का रूप धारण कर लिया। दोनों चकवा-चकवी के नाम से जंगल में रहने लगे। चुरक ने दोनों को खत्म करने के लिए जंगल में आग लगवा दी लेकिन बारिश होने से दोनों बच गए। इधर सामा गुरूकल से शिक्षा ग्रहण करके लौटा तो उसे अपनी बहन के बारे में पता चला तो श्री कृष्ण को कठिन परिश्रम से मनाने में सफल रहा, तब श्रीकृष्ण ने कहा कार्तिक महीने में तुम्हारी बहन आयेगी और पूर्णिमा में लौट जाएगी। तब से यह पर्व कार्तिक षष्ठी के यानि छठ के खरना से शुरू होता है और पूर्णिमा के दिन खत्म होता हैं।
लोक कथाओं, लोक संस्कृतियों और लोक गीतों वाले विविधतापूर्ण देश में भाई-बहन के प्रेम को प्रदर्शित करता सामा चकवा एक ऐसा त्यौहार है जिसमें भारत की सांस्कृतिक विरासत की एक अलग झलक देखने को मिलती है।
उत्तरी बिहार के मिथिलांचल में सामा चकवा त्यौहार महत्वपूर्ण माना जाता है।  वैसे यह त्यौहार मुख्य रूप से उत्तरी बिहार के मिथिलांचल का पर्व है जहां गीत नाद के बिना कोई त्योहार पूरा नहीं होता. मिथिला की माटी में ऐसे ही गीत संगीत के माहौल में घर-घर में सामा खेले चलली.. बहनी संग सहेली.. हो जुग जुग जिय हो.. भैया जिय हो..जैसे लोक गीतों की गूंज हर साल कार्तिक शुक्ल पक्ष की सप्तमी से सात दिन तक सुनाई पड़ती है।
गोवा की राज्यपाल और मूलतरू बिहार से संबद्ध प्रख्यात साहित्यकार मृदुला सिन्हा का कहना है कि सामा चकवा मिथिला का एक अनोखा त्यौहार है जिसमें भाई बहन के संबंध की व्याख्या है। इसमें मायका और ससुराल के बीच के रिश्तों का बखान है। हालांकि इसे त्यौेहार नहीं खेल कहना उपयुक्त होगा।
उन्होंने कहा कि गांव की महिलाएं और लड़कियां कुछ मूर्तियां बनाकर अपने डाला में रखती हैं और उसमें दीया जलाती हैं। फिर वे अपनी-अपनी टोली में एकत्रित होकर मूर्तियों को लेकर खेत में चली जाती हैं और वहीं बैठकर गीत गाते हुए कुछ खेल खेलती हैं। भाई के प्रति अनुराग और विश्वास प्रकट करने का यह अनोखा तरीका है।
मृदुला सिन्हा ने कहा कि यह खेल सात दिन चलता है। कार्तिक पूर्णिमा की रात नदी या तालाब किनारे जाकर फिर खेल खेला जाता है और सामा (बहन) चकवा (भाई) और सभी मूर्तियों को जल में प्रवाहित कर दिया जाता है। उस दिन बहनों के साथ भाई भी वहां होता है। मैं भी यह खेल खेलती थी और गीत गाती थी। व्यस्त होने के बावजूद आज भी सामा का गीत गाती हूं

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