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बुधवार, 5 अप्रैल 2017

दिल जीतना भी एक कला है- अपनी बात




अगर हम संवाद के टूल्स की बात करें तो हमारी रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ी आपसी बातचीत भी अब आमने सामने बैठकर नहीं होती। मोबाइल फोन ने हमारी उस निजता को अपनी गिरफ्त में ले लिया हे। जब हम मिलते हैं, बात करते हैं तो सामने वाले का चेहरा देखकर खुद पर नियंत्रण रख सकते हैं। लेकिन जब सामने कोई चेहरा ही नहीं हो तो हमारा खुद पर से कंट्रोल ही गायब हो जाता है। आक्रामकता, निर्दयता, घृणा, क्रोध आज हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा बनते जा रहे हैं।

आज के समय में हमारे समाज से एक दूसरे के प्रति प्यार औैर सहनशीलता देखने को नहीं मिलती।  चाहे सोशल मीडिया हो या टीवी पर डिबेट या फिर आपस में साधारण बातचीत ही क्यों न कर रहे हों जहां आपकी बात और सोच को समर्थन नहीं मिलता वहीं लोग दूसरे व्यक्ति, मजहब या धारणा के प्रति जहर उगलने लगते हैं।  इंसान की यह सोच एकदम गलत है कि सिर्फ वह ही संबधित विषय में पूर्ण जानकारी रखता है और वह कभी गलत हो ही नहीं सकता,  इस तरह के रवैये से घमंड आता है जिससे कि इंसान का खुद का नैतिक पतन हो जाता है।

वह लोग जो अपनी सोच और अपने फंडे दूसरों पर थोपते हैं और जबरदस्ती उनका पालन करवाते हैं उन्हें यह सोचना चाहिए कि अगर आप किसी से भी कोई कार्य करवाना चाहते हैं तो उसके लिए सबसे पहले आप उसका दिल जीतें। सिर्फ पैसा और पाॅवर होने से ही आप अपनी बात नहीं मनवा सकते हैं।

अगर आप सहनशील हैं, उदार हैं तो आपको लोग बेवकूफ समझने लगते हैं। जबकि  सहनशीलता के भाव का होना आपकी अच्छाई और आपके चारित्रिक ताकत को दर्शाता है।  आक्रामकता यदि किसी अन्याय के प्रति दिखाई जाए तो उसे किसी हद तक न्यायसंगत माना जा सकता है लेकिन यदि यह सिर्फ इसलिए दर्शाई जाए क्योंकि सामने वाला आपकी सोच से इत्तेफाक नहीं रखता तो यह गलत होगा। माना जाता है कि नैतिक शिक्षा हमको मानवीयता से रूबरू कराती है और एक शिक्षित व्यक्ति को मानवीय व्यवहार करना चाहिए।
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हम सब चाहते हैं कि हमारे घर, समाज, देश दुनिया में शांति रहे तो हमें आक्रामकता  से निपटना होगा। अभी भी देर नहीं हुई है, कम से कम शुरूआत तो करें।  आपसी प्रेम और सहनशीलता ही एकमात्र तरीका है जिससे हम चाहें तो ईश्वर को भी प्राप्त कर सकते हैं।

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