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गुरुवार, 12 जुलाई 2012

बड़े खतरे के आगे छोटे को अनदेखा कर देने में ही भलाई है / अमृता गोस्वामी



दो मित्र चंपू व बिल्लू घूमते-घूमते जंगल के रास्ते निकल गए...जंगल बहुत घना था... मित्रों ने तेज-तेज चलना शुरू किया ताकि जल्दी वहां से बाहर निकला जा सके... अभी वे कुछ ही आगे बढ़े थे कि शेर की भयंकर गर्जना से उनका हृदय कांप उठा... इससे पहले कि शेर उनके सामने आए वे उससे बचने का उपाय सोचने लगे... उन्हें कोई उपाय सूझता तब तक शेर की गर्जना  बहुत करीब आ चुकी थं । जान बचाने के लिए चंपू ने आसपास देखा वहां उसे एक सूखे कुएं के अलावा और कुछ भी दिखाई न दिया।  चंपू ने बिल्लू से कहा-अब इस कुएं में कूदने के अलावा शेर से बचने का और कोई रास्ता नहीं है। बिल्लू  घबराया और बोला-यह भी कोई उपाय हुआ... कुएं में कूदने से हम मर सकते हैं।  चंपू ने कहा-भाई सोचने का समय नहीं है कुएं में कूदने के बाद एक चांस बचने का भी है जबकि यहां खड़े रहे तो सिर्फ मौत ही तय है। बिल्लू कुछ बोलता कि उसे शेर अपने ठीक सामने ही आता दिखाई दिया... चंपू बिना कुछ सोचे कुएं में कूद गया...  शेर कुछ और आगे आया बिल्लू थोड़ा पीछे हटा... शेर कुछ और आगे आया... बिल्लू  थोड़ा और पीछे हटा... शेर और आगे आता कि बिल्लू ने भी कुएं में छलांग लगा दी।   कुएं के अंदर पास ही लगे एक बड़े पेड़ से गिरी हुई ढेरों पत्तियां पड़ी हुईं थी जिसके कारण चंपू व बिल्लू को कुएं में कूदने पर भी ज्यादा चोट न आई। शेर ने कुछ देर कुएं के आसपास चक्कर काटे और वापस चला गया। चंपू व बिल्लू कुएं के अंदर एक दूसरे का हाथ पकड़े बैठे थे... शेर के जाने की आहट पाकर बिल्लू बोला- ‘‘अब कुएं से निकलने का उपाय सोचना चाहिए। चंपू ने कहा-जिस तरह शेर से बचने का तरीका हम निकाल पाए वैसे ही यहां से निकलने का भी कुछ न कुछ उपाय मिल ही जाएगा। 
थोड़ी ही देर में सुबह हो गई। दोनों मित्रों ने कुएं के अन्दर से बचाव के लिए आवाज लगाना शुरू किया। तभी चंपू की निगाह कुएं में नीचे की ओर आ रही रस्सी पर पड़ी... शायद किसी ने उनकी आवाज को सुन लिया था और वह उन्हें निकालने के लिए रस्सी नीचे भेज रहा था...।  कुएं के बाहर से आवाज आई-‘‘रस्सी पकड़ो और ऊपर आ जाओ। दोनों मित्र रस्सी के सहारे ऊपर आ गए... उन्होंने देखा कुछ ग्रामीण जो वहां से गुजर रहे थे उन दोनों को बचाकर बहुत खुश थे।

बिल्लू चंपू से बोला-आज यदि मैनें भय के कारण तुम्हारी बात न मानी होती तो अपनी जान गंवा बैठता। चंपू ने कहा-हां! जब जान पर बनी हो तो बड़ी कठिनाई से बचने के लिए छोटी कठिनाई को अनदेखा करना पड़ता है।


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