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बुधवार, 28 मार्च 2012

कहानी: किस्सा मिठाईलाल का



(प्रकाश मनु- सुप्रसिद्ध कथाकार और समालोचक)
बिरजू में सौ अच्छाइयाँ हैंनटखट, प्यारा बच्चा है, सुंदर और भोला-भाला है। पर उसमें एक ही गड़बड़ है। वह मिठाइयों का इस कदर शौकीन है कि मन पर काबू नहीं रख पाता। यहाँ तक कि अगर कोई बच्चा कक्षा में भी मिठाई की बात छेड़ दे, तो उसका मन बेकाबू होने लगता है। सोचता है, अभी दौडकऱ मोटेलाल हलवाई की दुकान पर चला जाऊँ और जीभर मिठाइयाँ खा लूँ।
बेचारा बिरजू क्लास छोडकऱ जाए कैसे? पर फिर होता यह था कि पढ़ाई से उसका मन एकदम उचाट हो जाता। मैडम कुछ भी पढ़ा रही हों, वह तो बस अपनी सीट पर बैठा-बैठा होंठों पर जीभ फिराया करता। ताकि स्कूल की छुट्टी होते ही सीधे हलवाई मोटेलाल की दुकान पर जा पहुँचे और मन को खूब तृप्त करे।
बिरजू की इस चटोरपने की आदत को स्कूल के सब बच्चे जानते थे। वे कभी उसे मोटेलाल की दुकान पर रसगुल्ले और जलेबियाँ उड़ाते, तो कभी समोसे, कचौड़ी और गुलाबजामुन खाते देखते थे। यह देखकर सब बच्चे पीठ पीछे उस पर हँसते। और हाँ, सबने उसका नाम रख दिया थामिठाईलाल।
शुरू में बिरजू इस नाम से चिढ़ता, पर धीरे-धीरे वह खुद भी अपना यह नया नाम सुनकर खुश होता और आँखें मूँदकर हा-हा-हा करने लगता।
पर इससे बिरजू की मुश्किलें तो कम नहीं हो रही थीं। उसकी मुश्किल यह थी कि उसे रोज स्कूल में खर्चने के लिए पाँच रुपए मिलते थे। इतने कम पैसों में भला क्या आता? इसलिए वह लगातार दो-तीन दिन तक पैसे जमा करता और फिर तीसरे या चौथे दिन मोटेलाल की दुकान पर जाकर अपनी मनपसंद मिठाइयाँ खाता।
इस बीच किस तरह उसे अपने मन को काबू में करना पड़ता, इसका तो वर्णन ही मुश्किल है। बार-बार उसका मन हलवाई मोटेलाल की दुकान की ओर भागता और हर बार वह खुद को समझाता, नहीं, भला पाँच रुपए में क्या आएगा? अभी थोड़ा रुको।’’
बिरजू का सबसे बड़ा सपना तो यह था कि किसी दिन उसके सामने थाल भरकर ढेर-ढेर रसगुल्ले, गुलाबजामुन, जलेबी और बालूशाही आ जाएँ। वह मजे से बैठा-बैठा जी भरकर उन्हें खाए! लेकिन वह क्या करे? उसका यह सपना पूरा होने में ही नहीं आता था। यहाँ तक कि मम्मी घर पर गुलगुले और मीठी कचौडिय़ाँ बनाती हैं, तो भी बहुत माँगने पर ही उसे दो-चार कचौडिय़ाँ या गुलगुले फालतू मिलते हैं। मम्मी हर बार समझाती हैं, ज्यादा खाओगे तो खाँसी हो जाएगी।’’ और वह जीभ चटकारता रह जाता।
बिरजू कभी-कभी दिन में भी बैठा-बैठा सपने देखता था। उसका सबसे प्रिय सपना यह है कि वह एकाएक बड़ा हो गया है और खूब रुपए कमाने लगा है। तब वह एक दिन एक हजार रुपए में ढेर सारी मिठाइयाँ मँगाता है और अकेला सब की सब चट कर जाता है। जल्दी ही बिरजू का यह सपना टूट जाता है, लेकिन उसकी मीठी याद रह जाती है। तब वह मंद-मंद मुसकराता हुआ, हिसाब जोडऩे लगता है,भला एक हजार रुपए में कितनी मिठाइयाँ आ जाएँगी! क्या मैं खा लूँगा इतनी सारी?’’
फिर एक दिन बिरजू को ऐसा मौका मिला कि उसका सपना पूरा नहीं, मगर आधा-अधूरा तो सच हो ही गया। उसे एक हजार रुपए तो नहीं मिले, पर हाँ पचास रुपए का एक नोट जरूर नजर आ गया। फ्रिज के ऊपर कोने में एक किताब के नीचे रखा हुआ था। उसने उस नोट को दो-तीन बार देखा। पहले तो सुबह उठते ही। फिर अपनी बॉटल में फ्रिज से लेकर पानी भरते हुए। और आखिर में तब, जब वह अपना बस्ता सँभालकर स्कूल जाने लगा था। सुबह से पचास रुपए का वह नोट वहीं का वहीं पड़ा था और उसे ललचा रहा था। बिरजू समझ गया कि मम्मी इसे बिल्कुल भूल चुकी हैं।
लिहाजा स्कूल जाने से पहले उसने चुपके से नोट उठाया और अपने बैग के भीतर रख लिया। पापा उस समय घूमने गए थे, मम्मी रसोई में थीं। फिर भला उसे देखता कौन?
बिरजू ने पहली बार चोरी की थी, इसलिए उसे डर भी लग रहा था। पर फिर उसने सोचा, क्या पता, मम्मी-पापा को उसकी याद ही न आए!और वह बेधडक़ होकर स्कूल के लिए चल पड़ा। रास्ते भर वह यह हिसाब लगाता जा रहा था कि पचास रुपए में कितना कुछ आ जाएगा और आज वह मोटेलाल से लेकर कौन-कौन सी मिठाइयाँ खाएगा।
उस दिन स्कूल में उसकी पढ़ाई सचमुच नहीं हो पाई। कौन सी मैडम ने क्या पढ़ाया, क्या नहीं, उसे कुछ भी याद नहीं। याद रहता भी कैसे? उसे तो पूरे दिन किताब-कॉपियों में जलेबी, रसगुल्ले, गुलाबजामुन और बालूशाही की शक्लें नजर आती रही थीं। और वह मन ही मन हिसाब लगाता रहा था कि अगर पैसे बचे, तो वह रसमलाई की भी एक प्लेट जरूर खाएगा।
छुट्टी होते ही बिरजू के बेकाबू होते पैर मानो खूँटा तुड़ाकर मोटेलाल हलवाई की दुकान की ओर भागे। जाते ही उसने पचास रुपए का करारा नोट लहराते हुए मोटेलाल हलवाई को पकड़ाया और कहा, एक प्लेट रसगुल्ले, एक प्लेट गुलाबजामुन। जलेबी और बालूशाही भी जल्दी...जरा जल्दी!’’
मोटेलाल हवाई ने फटाफट मिठाइयाँ निकालकर प्लेट में सजाकर उसके आगे रख दीं। बिरजू तरंग में था। एक-एक कर मिठाइयाँ उड़ाता गया। पहले रसगुल्ले, फिर गुलाबजामुन, बालूशाही, जलेबियाँ...! फिर एक प्लेट कचौड़ी भी उसने मँगा ली।
मोटेलाल ने हँसकर कहा, अभी तो दस रुपए बच रहे हैं बच्चा!’’
हाँ, पहले कचौडिय़ाँ खा लूँ, फिर रसमलाई एक प्लेट देना। दस रुपए की है न?’’
ठीक है...ठीक है, खाओ। आज मम्मी ने पैसे ज्यादा दे दिए क्या बच्चा?’’
और क्या! मेरी मम्मी, पता है, कितना प्यार करती हैं मुझे।’’ बिरजू ने बेपरवाही से कहा। पर फिर अंदर ही अंदर उसे डर भी लगा। कहीं उसकी चोरी पकड़ी गई तो...?
घर लौटा तो बिरजू की अजीब हालत हो रही थी। एक ओर छककर मिठाई खा लेने का आनंद। दूसरी ओर मन में डर और घबराहट। बार-बार सोचता, कहीं मम्मी को पता चल गया तो बहुत बुरा होगा। और फिर मम्मी, पापा से भी कहेंगी, फिर...?
ठीक है, कहेंगी तो कहती रहें। मुझे क्या डर? कह दूँगा झाड़ू-सफाई करने वाले नौकर रामू ने उठाया होगा नोट...या फिर बरतन साफ करने वाली बाई ने।’’ सोचते ही बिरजू की चाल में अकड़ आ गई।
लेकिन घर पास आते ही उसकी घबराहट फिर बढऩे लगी। वह चोर की तरह घर में घुसा। फिर बस्ता एक ओर रखकर फ्रिज से निकालकर पानी पीने लगा। उसने कनखियों से देखा, वह किताब ज्यों की त्यों पड़ी थी, जिसके नीचे से उसने नोट निकाला था। इसका मतलब यह है कि मम्मी को कुछ नहीं पता।
इतने में मम्मी आईं तो बिरजू के मुँह से निकला, मम्मी...मम्मी, मैं खेलने जाऊँ?
क्यों मेरे बेटे? आज भूख नहीं है क्या? खाना नहीं खाएगा? मम्मी ने हैरान होकर पूछा।
हाँ, मम्मी, भूख नहीं है। बिरजू बोला। पर थोड़ी देर बाद ही वह अचकचा गया। सोचा, कहीं इससे मेरी मेरी पोल न खुल जाए। बोला, अच्छा, लाओ मम्मी। थोड़ा खा ही लेता हूँ।
पर मम्मी जैसे सब कुछ समझ गई थीं। पास आकर ध्यान से उसके चेहरे और शर्ट को देखते हुए बोलीं,कोई बात नहीं। अगर भूख नहीं है, तो रहने दो।
थोड़ी-थोड़ी भूख है मम्मी। ले आओ, खा ही लेता हूँ।’’ बिरजू बोला।
अच्छा! पचास रुपए की मिठाई से तेरा पेट नहीं भरा। तभी तो मैं कहती हूँ बेटे, मिठाई से पेट नहीं भरता, उसके लिए तो रोटी-सब्जी ही चाहिए।
पचास रुपए...! मिठाई? क्या कह रही हो मम्मी? बिरजू का स्वर लडखड़ा गया। होंठ खुश्क हो गए। लगा, बस, अब पोल खुलने ही वाली है।
अच्छा, बता तो, क्या-क्या आया पचास रुपए के नोट में? मम्मी हँसकर बोलीं, एक तो रसगुल्ले और गुलाबजामुन जो तेरी पहली पसंद है। और फिर जलेबी, कचौड़ी भी...रसमलाई भी तूने जरूर खाई होगी।
क्या...! क्या कह रही हो मम्मी? बिरजू ने मम्मी की बात का जवाब तो देना चाहा, पर उसे खुद अपना स्वर टूटता हुआ सा लगा।
अच्छा, क्या मैं ठीक नहीं कह रही? कहकर मम्मी ने बिरजू की आँखों में झाँका, तो उसकी आँखें झुकती चली गईं। मम्मी हँसकर बोलीं,अरे पागल, तू मम्मी से छिपाता है?...पर कहाँ तक छिपाएगा भला! तेरी यह शर्ट सब गवाही दे रही है। जल्दी-जल्दी खाने के चक्कर में तूने इस पर रसगुल्ले, गुलाबजामुन और जलेबी का शीरा गिरा लिया है और कचौड़ी की सॉस भी। यकीन न हो, तो खुद उतारकर देख ले!’’
अब बिरजू भला क्या कहता। टूटी-टूटी आवाज में बोला, गलती हो गई मम्मी! अब कभी नहीं खाऊँगा मिठाई।
अरे बिरजू, मिठाई खाओ, पर इतनी तो नहीं कि बीमार पड़ जाओ। अच्छा चल, अब मैंने फैसला किया है कि तुझे हर हफ्ते खुद ही एक दिन तेरी पसंद की मिठाई मँगाकर खिला दिया करूँगी।...ठीक है न!
ओह मम्मी! तुम कितनी अच्छी हो। फिर तो मुझे मोटेलाल हलवाई की दुकान पर जाने की जरूरत भी नहीं! वह बड़ा चंट है, ठग लेता है।

मम्मी बोलीं, चल अच्छा है, तूने खुद ही मान लिया। वरना मैं तो सुबह रमुआ को डाँटने की सोच रही थी। अब जा, बाहर जाकर खेल। दोपहर के तेरे खाने की छुट्टी! भूख लगे तो रात को खाना।
बिरजू अपना क्रिकेट का बल्ला सँभाले घर से निकला तो उसके होंठों से फुरफुराहट के साथ अजीब सा गाना निकलायम-यम-यम...या-या-या, कम-कम-कम मिठाई खा!
उसी समय उसके मन में आया, अब मोटेलाल हलवाई के यहाँ जाना बंद! तब तो शायद क्लास के बच्चे भी मुझे मिठाईलाल कहकर चिढ़ाना छोड़ देंगे।


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