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मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

क्या माता-पिता और बच्चों में जनरेशनगैप होता है- अनुजा भट्ट


  अशिक्षा के कारण सकारात्मक सोच विकसित नहीं होती और समाज रुढिग़त मान्यताओं का ही पालन करता चला जाता है।  ऐसे में शिक्षित  युवा उन मान्यताओं को नहीं मानते और दोनों पीढिय़ों में विरोध पैदा हो जाता है। सबसे पहला विरोध जातिगत होता है। रुढिग़त समाज जाति से बाहर जाने के बारे में सोच भी नहीं सकता और शिक्षित युवा के लिए जाति कोई समस्या नहीं। पर जैसे-जैसे समाज शिक्षित होता जा रहा है जनरेशन गैप भी कम हुआ है। क्योंकि शिक्षा के कारण संवाद का रास्ता खुला है। वह हर विषय पर बात कर सकते हैं , तर्क कर सकते हैं और एक दूसरे के कामकाज में मदद कर सकते हैं।
  लेकिन जहां समाज शिक्षित नहीं है वहां  माता -पिता और बच्चों के विचारों में विरोधाभास है। यह विरोधाभास कई किस्म का है। पहला जैसा कि मैंने कहा जातिगत। माता-पिता के लिए जाति से बाहर शादी करना संभव नहीं है। और बच्चे के लिए शादी में जातिगत भिन्नता कोई मसला नहीं। यहां समानता का आधार शिक्षा और उसके आधार पर बना स्टेट्स  है। माता-पिता के लिए जाति में समानता जरूरी है।
 दूसरा है जीवनमूल्य। दरअसल यह लड़ाई वैचारिक न होकर जीवनमूल्यों की है। जो जीवनमूल्य पुरानी पीढ़ी के लिए धरोहर की तरह थे वह आज की पीढ़ी ने नकार दिए हैं। उन्मुक्त विचार और जीवन शैली को अपनाती इस पीढ़ी को मीडिया और इंटरनेट ने तैयार किया है। जिसकी वजह से उपभोक्तावादी सोच का विकास हो रहा है और संवेदनशीलता, स्नेह और ममता जैसे भावनात्मक संवेग समाप्त हो रहे हैं। रिश्तों में आई दरार की मुख्य वजह यही है। गांव में रिश्तों को लेकर और भी बदतर स्थिति  है। चूल्हे-चौके अलग है और इसकी वजह संयुक्त परिवार में सबके साथ न्याय न हो पाना है। रिश्ते बिना ईमानदारी के नहीं चलते। उसमें अगर खोट, बेमानी, निजी स्वार्थ आ जाए तो वह परिवार को तो खत्म करते ही हैं, समाज के लिए भी खतरनाक होते हैं क्योंकि समाज जन से ही बना है। उपभोक्तावाद, जातिवाद, भौतिकतावाद  का असर गांव में भी दिखाई दे रहा है। सब अपने बारे में सोचने लगे।
 मैं और मेरा परिवार(पति-पत्नी और बच्चे) से शुरू हुआ सफर अब लिव इन की ओर जा रहा है। पहले  सामूहिक परिवार टूटे और अब माता-पिता अकेले हैं। माता-पिता और बच्चों के संबंध सहज नहीं हैं। महानगर और गांव में रहने वाले बच्चों की सोच में अंतर है।  इसकी मुख्य वजह समाज में हर वर्ग के लिए शिक्षा के समान अवसर न होना भी है। इसी वजह से वह अपनी परंपरागत, जटिल, रुढिगत सोच को बदल नहीं पाते क्योंकि उनकी सोच विकसित नहीं होती। फिर भी गांव में शिक्षा के प्रति जागरुकता आई। अशिक्षित माता-पिता अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं। पढ़ाई के लिए घर से दूर भेज रहे हैं।
 दरअसल यह ट्रांजिशन का दौर है। चारों तरफ से इंफॉर्मेशन ओवर लोड हो रहा है। पैरंट्स और बच्चों दोनों को ही समझ नहीं आ रहा है कि इन सब के बीच कैसे रिएक्ट करें।  पहले बच्चे ज्यादा होते थे और अब एक या दो से ज्यादा नहीं है। संयुक्त परिवार थे और अब एकल परिवार हैं। संयुक्त परिवार में बच्चा बहुत सारे लोगों से कुछ न कुछ सीखता था। अच्छा और बुरा दोनो। अब एकल परिवारों में बच्चे मां-बाप को ही देखते हैं और जाने-अनजाने उन्हीं से सीख लेते हैं। कामकाज की व्यस्तता और माता-पिता दोनों के कामकाजी होने से बच्चों को वक्त नहीं मिल पाता।  इसीलिए बाहरी रूप से देखने पर लगता है कि संवादहीनता की वजह पीढ़ी का अंतराल हो सकती है। जबकि इसकी असली वजह समय का अभाव है। लेकिन मातापिता कितने भी  व्यस्त रहें बच्चों को अनुशासन में  रखना जरूरी है। बच्चों को यह जताना जरूरी है कि हम तुमसे बड़े हैं और तुम्हारा ख्याल रख सकते हैं। जब तक तुम बालिग नहीं हो जाते तब तक तुम हमारी जिम्मेदारी हो और तुमको हमारी बात माननी  होगी। जब तक पैरंट्स एक अथॉरिटी के तौर पर बच्चों के सामने बात नहीं रखेंगे तब तक वह बात की अहमियत नहीं समझेंगे।

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