यह ब्लॉग खोजें

मंगलवार, 20 मार्च 2018

सुकन्या के सवाल से राजा परेशान



एक बार की बात है राजा अपने मंत्रियों के साथ भ्रमण के लिए निकले। रास्ते में उनको एक जगह बहुत ही भीनी सुगंध का अहसास हुआ। उन्होंने अपने मंत्रियों से कहा, जाकर पता लगाएं कि उत्तर दिशा में कौन सा गांव या कस्बा है जहां से मुझे मालपुए जैसी खुशबू आ रही है और मुझे खाने के लिए लालायित कर रही है। तभी राजमंत्री ने कहा कि अवश्य राजन, मैं कल की सिपाहियों को भेजकर इस जगह का पता लगवाता हूं। दूसरे दिन राजमंत्री विपिन बिहारी ने सभी सिपाहियों को बुलाया और राजा की इच्छा बताई। सभी सिपाही दोपहर में ही उत्तर दिशा की तरफ निकल गए। भीनी खुशबू का अहसास उनको भी हुआ। सांझ होते- होते वह एक जंगल में थे और उस जंगल में पेड़ फलों से लदे थे। उनकी खुशबू दूर तक बिखरी थी। संतरे, मौसमी, बेर के अलावा कुछ ऐसे फल भी थे जिनको उन्होंने पहले कभी देखा नहीं था। उनका स्वाद तो खीरे जैसा था पर आकार कद्दू जैसा। बेल भी कद्दू जैसी थी। बेर इतना मीठा। देर न करते हुए सिपाहियों ने फटाफट फल चुने और नगर को लौट आए। राजा को उन्होंने अपना प्रणाम निवेदित किया और फलों की टोकरी राजा के पास रख दी। राजा ने कहा इतनी मेहनत करके तुम लौटे हो बोलो क्या इनाम दूं। तभी एक सिपाही ने सकुचाते हुए कहा राजन बस ये एक छोटा सा कद्दू दे दीजिए। सुकन्या इसे देखकर खुश हो जाएगी। और इसका स्वाद पाकर वह आपको धन्यवाद देगी आखिर आपके कारण ही तो उसे यह फल खाने को मिलेगा।

राजा ने कहा तुम लोगों को कोई दिक्कत तो नहीं हुई। तभी दूसरा सिपाही बोला, जहां यह फल लगे हैं वहां भीषण जंगल है। हम तो सुगंध खोजते-खोजते वहां पहुंच गए। पर वह जंगल बहुत घना है। उसके आसपास कोई आबादी भी नहीं है इसीलिए कोई इन फलों के बारे में न जान सका। जंगली जानवरों की आवाजें हमें डरा रहीं थी। इसीलिए हम जल्दी लौट आए। तीसरा सिपाही बोला, वहां आसपास पानी भी नहीं था।

ठीक है, कहकर राजा ने सबको विदा कर दिया। रात के भोजन के बाद जैसे ही राजा ने फलों का स्वाद चखा उनको वह स्वाद एकदम नया और अच्छा लगा। बहुत सारे फल तो उन्होंने अपने जीवन में पहली बार देखे। वह सोचने लगा कि काश यह सारे फल के पेड़ उसके बागान में भी होते? राजा के आदेश का पालन करते हुए हर रोज सिपाही वहां जाते और फल लेकर आते। सिपाही एकदम डरे- डरे रहते पर अपने मन की बात नहीं कह पाते।

सुकन्या कोअपने पिता राधेश्याम का व्यवहार बदला-बदला नजर आने लगा था। अब वह न तो उससे प्यार करता न कहानी सुनाता। उसने देखा जब उसके पापा घर से बाहर जाते हैं तो उनके मन में उदासी होती है। जाते समय वह उसका माथा चूमते हैं। पर वह हंसी गायब है। आखिर उसके पापा को हुआ क्या है? वह कहां जाते हैं? छोटी सी सुकन्या के मन में कई तरह के सवाल उठने लगे।

एक दिन जब उसके पापा जा रहे थे। उसने उनका हाथ थाम लिया और बोली कि मैं भी साथ चलूंगी पापा। कहां? वहीं जहां आप जाते हैं, वह बोली। तुम वहां नहीं जा सकती। वह जगह तुम्हारे लिए नहीं है। जंगल है वहां। जंगली जानवर घूमते रहते हैं किस क्षण हमला बोल देंगे पता नहीं। अब तो वह किसी पेड़ पर हाथ भी नहीं लगाने देते। मेरे दोस्त को जानवरों ने लहूलुहान कर दिया है। पर राजा को तो हर रोज फल चाहिए। क्या करूं बेटी। पता नहीं कब जानवर हमला कर दें। आदमी के साथ तो बहादुरी दिखाई जा सकती है पर जानवरों के साथ तो मौत का सामना करना पड़ता है। इसीलिए जिद मत करो।

ठीक है तो आप मुझे राजा जी के पास तो ले जा सकते हैं।

उनसे क्या काम है तुमको।

मैं उनके राज्य की प्रजा हूं। मिलना चाहती हूं बस। यह तो मेरा अधिकार है पापा। आप मुझे उनसे मिलवा दीजिए बस। बच्ची की जिद के आगे उसकी एक न चली और वह उसे लेकर राजदरबार में चला गया। राजा को बच्चों से बहुत प्यार था। सुकन्या को उसने बड़े प्यार से अपनी गोदी में बिठाया और आने का कारण पूछा। सुकन्या ने राजा से सीधा सवाल किया कि राजा के लिए सबसे ज्यादा जरूरी क्या है? उसे सबसे ज्यादा प्यारा कौन होता है? राजा ने कहा आप जैसे बच्चे और अपनी प्रजा से ज्यादा राजा को किसी से प्रेम नहीं होता। तभी सुकन्या ने कहा कि राजा जी लेकिन आप तो ऐसे नहीं हैं? अगर आप अपनी प्रजा से प्यार करते तो अपने सिपाहियों को क्यों मरवाना चाहते क्योंकि राज्य की रक्षा तो सिपाही ही करते हैं। सुकन्या की बात सुनकर राजा हैरान रह गये। बोला यह तुमसे किसने कहा कि मैं अपने सिपाहियों को मरवाना चाहता हूं। वह तो कोई मूर्ख राजा होगा, जो ऐसा करेगा।

सुकन्या बोली, आपको पता है जो सिपाही जंगल से आपके लिए फल लेकर आते हैं वह वहां जंगली जानवरों से कैसे खुद को बचाते हैं। आप तो राजाजी रसीले फलों को खाकर ही खुश हैं उनको लाने के लिए अपने जीवन की बाजी लगाने वाले सिपाहियों से आपको प्यार नहीं और न हीं बच्चों से। जरा अपने सिपाही राधाकृष्ण की बांह तो देखिए। और जब राजा ने राधाकृष्ण को बुलवाया तब तक राधाकृष्ण मर चुका था। विपिन बिहारी उसकी लाश लेकर सामने खड़ा था।

राजा को अपनी करनी पर बहुत दु:ख हुआ। उन्होंने सुकन्या से कहा, सचमुच तुम सुकन्या हो जिसने मुझे पदभ्रष्ट होने से बचा लिया। पर मीठे फल खाने पर ऐसा कलंक लगेगा यह मैंने सोचा भी नहीं था।


राजा गहरे पश्चाताप में डूब गया। उसका विश्वासपात्र सिपाही राधाकृष्ण दुनिया काे अलविदा कह चुका था और उसकी बेटी उससे सवाल कर रही थी। वह क्या उत्तर दे। राजा एक सभा का आयाेजन करवाया और वहां सभी के सामने अपना अपराध कबूल किया। उसने कहा मेरे प्यारे नागरिकाें मुझे नहीं पता था कि फलाें काे लेकर मेरा यह शाैक इतना घातक हाेगा। मैं ताे उसके स्वाद में इतना डूब गया कि मैंने अपने सैनिकाें की बात पर भी ध्यान नहीं दिया। मुझे अफसाेस है। दुःख है कि मेरे इस वेवजह के शाैक के कारण मेरा प्यारा राधाकृष्ण अब दुनिया में नहीं रहा। मैं अपराधी हूं और दंड का भागी भी। मैं चाहता हूं िक आप यह तय करें कि मुझे क्या दंड देना चाहिए।

राजा की इस बात का किसी ने काेई उत्तर नहीं दिया। सारी प्रजा सिर झुकाए खड़ी रही। राजा काे दंड देने का साहस भला किसके पास... तभी भीड़ का चीरती हुई एकऔरत सामने आई। आेह यह ताे राधाकृष्ण की पत्नी है। राजा ने पहचानने की काेशिश करते हुए कहा.. तभी भीड़ में से एक व्यक्ति निकला बाेला नहीं राजन यह उनकी मां हैं। राजाने फिर से अपनी बात कही और दंड का विधान पूरा करने के लिए... तभी राधाकृष्ण की मां बाेली क्या तुम मेरा बेटा लाैटा सकते हाे. क्या तुम इस बच्ची का पिता लाैटा सकते हाे क्या तुम इसकी मां का सुहाग लाैटा सकते हाे। राजन आपके लिए यही दंड है िक आप मेरा बेटा इसके पिता और इसकी मां के पति काे लाैटाएं ताकि हमारे घर की राेटी चलती रहे मेरी पाेती काे पिता का प्यार नसीब हाे और बहू काे पति मिले। इस बुढ़ापे में मैं अपने बेटे के बिना कैस् जी सकती हूं मेरा बेटा मुझे मिल जाए..



तभी भीड़ में से किसी ने कहा कि कैसी बात कर रही हैं। यह कैसे लाैटाया जा सकता है.. मरे हुए काे जिंदा करने के लिए भगवान के अलावा और काेई रास्ता नहीं। काेई भी व्यक्ति इसके लिए तैयार नहीं हाे सकता.. सबका अपना घर परिवार है.. आप राजा से और कुछ मांग लाे कुछ और दंड दे दाे।किसी ने कहा राजन आज से आप फल खाना छाेड़ दें... किसी ने कहा कि सुकन्या की पढाई निशुल्क करवा दें..

कई सारे सुझाव आए पर दंड तय न हाे सका। सुकन्या राे राेकर राजा की गाेद में ही साे गई। सपने में उसने देखा काेई पैगंबर आया है और उसने कहा है कि अभी अपने पापा काे शमशान मत ले जाना। शाम काे चिता नहीं जलाते। सपना देखकर डर से वह उठी ताे उसने एक अजीब सा नजारा देखा...


सुकन्या जब तक जागी तब तक उसकी मां आ गई थी। उसने राजा काे पहले प्रणाम किया और फिर अपनी बेटी का हाथ पकड़कर वह भी भीड़ का हिस्सा हाे गई थी। सभी लाेग अपनी अपनी तरह से दंड का प्रस्ताव रख चुके थे। सिर्फ सुकन्या और उसकी मां ही बची थी। अब राजा ने सुकन्या की मां से भी वहीं सवाल पूछा और बताया कि तुम्हारी सास ने क्या दंड दिया है। इस बीच भीड़ में भी खुसरपुसर शुरू हाे गई थी। काैन सुकन्या की मां से शादी करेगा। काैन सुकन्या की दादी का बेटा बनकर रहेगा और काैन सुकन्या का पिता बनकर। लाेग इस विवाह के लिए तैयार नहीं थे और डर रहे थे कि कहीं राजा उनसे यह निवेदन न कर बैठे। अगर एेसा हाे गया ताे वह ताे राजा काे मना नहीं कर पाएंगे। भयंकर दुःख और पीड़ा झेलती हुई सुकन्या की मां काे अपनी सास का यह दंडविधान सही नहीं लगा पर उन्हाेने उसके लिए और उसकी बेटी के लिए उन दाेनाें के भविष्य के लिए इतना साेचा यह साेचकर उसकी रुलाई फूटने ही वाली थी पर उसने किसी तरह खुद काे राेक लिया। उसे अपने अच्छे दिन याद आ गए जब वह और राधेश्याम एक साथ खेत पर जाते थे,काम करते थे। कभी फसल अच्छी ताे कभी चाैपट हाे जाती थी। तब वह कहता था सब ईश्वर का खेल है री... दुःखी न हाे ना आसूं बहा .. बस प्रार्थना कर..

उसने प्रार्थना करनी शुरू कर दी। जैसे उसे साहस आ गया हाे कुछ कहने का। वह बाेली,महाराज काे मेरा प्रणाम.. आप हमारे राजा है आपका इस तरह शाेक में डूब जाना ठीक ना हाेवे है। मेरा पति इसका पिता और इनका बेटा अब न रहा.. यह सच है। माैत ताे काल हाेवे है जी। जिसके सिर पर बैठ जावे.. पर माता जी का दंड हमें ठीक ना लागे। मैं किसी और का सुहाग ना पहनू और ना मेरी छाेरी किसी गैर मर्द काे बाप बाेले। चाहे आप ही क्याें ना हाे जी। जितना साथ था हम जिए। दर्द दिल में हाेवे हैं। माता जी के बेटे काेई न बन पावेगा। काेई ना... आपके लिए दंड देने का साहस करना भी पाप है। क्याेंकि आपने जानबूझकर ताे ना किया। बस स्वाद लग लगा लग गया.. अब कि करे,, आप इतना कर दाे सरकार कुछ जमीन देकर उसमें फलाें का बगीचा बनवा लाे। आप ताे दूरदूर देश राजा काे जानते हाे वहां से बढिया फलाें और फूलाें के पाैधे मंगवा लाे। मैं देखभाल कर दूंगी। बगीचे का नाम मेरे पति के नाम का हाेना चाहिए। मेरी छाेरी की पढ़ाई का खर्च उठाना पड़ेगा तब तक कि पेड़ाें में फल न लग जावे। फिर हम इनकी बिक्री कर देंगे। आप जब तक फल खाते रहेंगे तब तक मेरा पति आपकाे याद आवेगा। मैं खुद ही सबकाे संभाल लूंगी। चिंता की काेई बात ना..


सभा में सन्नाटा छा गया। दूर खड़ी उसकी सास अब उसके पास आ गई थी बाेली मुझे अपने छाेरे से ज्यादा मान ताे तुझपे है री.. बाेली काैन कहवे है मेरा छाेरा मर गया। आज से मेरी बींदड़ी ही मेरा छाेरा है और इस छाेरी का बाप। तभी सभा में राधाकृष्ण अमर रहे हमारी भाैजाई जिंदाबाद के नारे लगने लगे। दूसरे दिन सुबह जब राधाकृष्ण काे अंतिम संस्कार के लिए ले जाने लगे ताे सुकन्या भी अपनी मां के साथ गई। आज सुकन्या ने अपने पिता काे मुखाग्नि दी। राधाकृष्ण की अंतिम विदाई में हर आदमी आैरत शामिल हुए।

special post

'me too' (मैं भी)-खयालात- सदन झा

आजकल वैश्विक स्तर पर 'me too' (मैं भी) अभियान चल रहा है। लड़कियां, महिलाएं, यौन अल्पसंख्यक तथा यौनउत्पीड़ित पुरुष हर कोई अपने साथ...