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सोमवार, 2 अप्रैल 2018

मैं ऐसा क्यों हूं, वैसा क्यों नहीं- नरजिस

हमें हमेशा से ऐसा लगता रहा है कि ये बीमारियां विदेशी हैं और हमारा इनसे कोई वास्ता नहीं। मनोविकार वगैरह क्या है वक्त के साथ धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा। हम दिमाग से जुड़ी परेशानियों के इलाज के लिए मनोचिकित्सक के पास से जाने का हर मौका टालते जाते है।
हनु रोजाना पार्क आने वाले बच्चों में अकेला ऐसा बच्चा है जिसके साथ कोई भी मां अपने बच्चे को खेलने की इजाजत नहीं देती। हनु भी कुछ कम नहीं है मौका मिलते ही छोटे बच्चों को चुटकी काटना, धक्का देना, दांत गड़ाना या थप्पड़ मारना शुरू कर देता है। बचने की लाख कोशिशों के बावजूद रोज हनु पार्क  में किसी-न-किसी के साथ ऐसा कर ही लेता था। घर मे भी उसे एक पल का चैन नहीं रहता। कुछ तोड़-फोड़, कुछ छिपाना, बात-बात पर चिढऩा, बड़े भाई से मारपीट उसकी मम्मी भी उसकी इन सब आदतो से परेशान थी।
वहीं छह साल की आस्था कभी चुप ही नहीं बैठती। क्लास में भी रोज किसी-न-किसी से उसकी लड़ाई रहती है। उसकी छोटी बहन के दोस्त घर आने से डरते क्योंकि, वो कभी उन्हें चांटा मारती,  कभी कुछ भी फेंक कर मारती। अपनी नानी को भी नहीं बख्शती। हनु और आस्था दोनों चैन से बैठने वाले बच्चों में नहीं है। शुरू में तो इनके मां-बाप को लगा कि ये थोड़े ज्यादा शरारती हैं लेकिन, स्कूल जाने के बाद उनकी ये शैतानियां और भी बढऩे लगीं। पढ़ाई में भी ऐसे बच्चे फिसडडी होचे हैं। हाल ये हुआ कि घर में भी शिकायत और स्कूल से भी शिकायत। ऐसे में किसी ने हनु की मम्मी को बाल मनोचकित्सक से मिलने की सलाह दी। हालांकि, उन्होंने वहां जाने के लिए बहुत मुशिकल से अपना दिलोदिमाग तैयार किया। वो यह मानने को तैयार ही नहीं थीं कि उनके बच्चे को कहीं कोई दिक्कत है।
दरअसल, हम हिन्दुस्तानी आसानी से ये मानने को तैयार नहीं होते कि उन्हें किसी किस्म का मनोविकार है। हमें हमेशा से ऐसा लगता रहा है कि ये बीमारियां विदेशी हैं और हमारा इनसे कोई वास्ता नहीं। मनोविकार वगैरह क्या है वक्त के साथ धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा। हम दिमाग से जुड़ी परेशानियों के इलाज के लिए मनोचिकित्सक के पास से जाने का हर मौका टालते जाते हैं।
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि एक हद के बाद बच्चे की शरारत, शरारत नहीं मनोविकार माना जाता है। ऐसा तब होता है जब बच्चे के शरीर का कोई एक हिस्सा जरूरत से ज्यादा काम करे या उसके शरीर की कोई कोशिका खास किस्म का हार्मोन पैदा करने लगे। इसका शिकार बच्चा अपने शरीर और दिमाग का ज्यादा इस्तेमाल करना शुरू कर देता है। मनोवैज्ञानिकों की भाषा में इस तरह के बच्चों को हाइपर एक्टिव चिल्ड्रन कहा जाता है।
मनोचिकित्सकों का मानना है कि इस किस्म के बच्चों में आम बच्चों के मुकाबले कुछ अलग आदतें दिखाई देती हैं। इनमें बेचैनी, हमेशा कुछ छूने और उलटने-पलटने की चाह और बिना कुछ सोचे समझे काम करने की चाह रहती है। हांलाकि, काफी ध्यान और लगातार बच्चे के बर्ताव में निगरानी के बाद ही इस बीमारी का पता लगाया जा सकता है। इसके लक्षण बचपन में ही दिखने लगते हैं लेकिन, पता चलते-चलते बच्चा चार-पांच साल का हो जाता है। कभी-कभी युवावस्था में अभिभावकों को इसका पता चलता है।
बच्चों में ये मनोविकार कैसे, कब और क्यों होता है इसके बारे में मनोवैज्ञानिकों की राय जुदा है। कुछ का मानना है कि ऐसा समय से पहले पैदा होने यानी प्रीमेच्योर डिलीवरी की वजह है जबकि कुछेक मानते हैं कि गर्भ में भू्रण के विकास पर पडऩे वाले विपरीत असर इसकी वजह है। बाल मनोवैज्ञानिक भानू शर्मा के मुताबिक घर का माहौल इसके लिए खासा जिम्मेदार है। मां-बाप के आपसी झगड़े, दादा-दादी या नाना-नानी के साथ मां-बाप के रिश्ते और बिखरते परिवार परेशानी और बढ़ा रहे हैं। छोटे परिवारों में पलने वाले बच्चों की मनोदशा से आज कोई भी अनजान नहीं है। इसकी एक और वजह भी बताई जाती है और वो है हेलीकॉप्टर पेरेटिंग यानी पूरे वक्त बच्चे के ईद-गिर्द साया बनकर हर हरकत पर नजर रखना।
हर बात में पश्चिमी देशों की अंधाधुंध नकल करने की हमारी आदत आज हमारे नौनिहालों पर भारी पड़ रही है। ज्यादातर मनोवैज्ञानिकों की राय है कि इसके इलाज के लिए दवाइयों के साथ-साथ खान-पान, व्यायाम और घर का सुकून भार माहौल खासा मायने रखता है। बच्चे के साथ मां-बाप और स्कूल के टीचिंग स्टाफ के बर्ताव में बदलाव की भी जरूरत है। मनोवैज्ञानिक सुनील मित्तल के मुताबिक सबसे ज्यादा जरूरूत है सब्र की। बच्चे को ठीक करने के लिए डॉक्टर भी सब्र और इच्छाशक्ति करने की सलाह देते हैं।
मां-बाप को चाहिए कि बच्चे का एक टाइम-टेबल तय करे, नंबर से ज्यादा उसकी मेहनत की तारीफ करें, घर और बाहर, दोस्तों की बीच उसके व्यवहार की निगरानी करें। अगर बच्चा गुस्सा है तो आप उसे अपना गुस्सा दिखाकर दबा दें इस सोच को बदलें। गुस्सा, गुस्से को बढ़ाता है न कि खत्म करता है। कोशिश करें कि बच्चा जब भी रोएं तो आप उसके पास हों। ऐसे समय उसे फौरन दिलासा की जरूरत होती है। बच्चा कुछ भी कहे उसे ध्यान से सुने और जो नहीं कह पा रहा है उसे भी समझने की जहमत करें। किसी भी रिश्ते की मजबूती के लिए बातचीत का सिलसिला हमेशा मददगार होता है। शुरूआती दौर से ही परेशानियों पर काम करना बच्चे की पूरी जिंदगी के लिए असरदार साबित होगा।

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