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सोमवार, 27 सितंबर 2010

जब मां से पूछी जाए जाति

डा. अनुजा भट्ट
एक अरब से ज्यादा आबादी वाले देश में जाति आज भी सबसे बड़ी सचाई है। यहां किसी का मूल्यांकन उसकी विद्वता, ज्ञान से न होकर उसकी जाति से होता है इसलिए हर जाति अपना एक झंडा तैयार करती है और उस झंडे के नीचे उन लोगों को देखना चाहती है जो उसी जाति के हों।
आज सरोगेट मां के रूप में भारत में एक बाजार विकसित हो रहा है इस बाजार में मोलभाव करने के लिए ऐसे दंपति खड़े हैं जो संतान उत्पन्न नहीं कर सकते पर संतान चाहते हैं इसीलिए वह स्पर्म यानी शुक्राणु खरीदना चाहते हैं ताकि गोद भरी जा सके। और उनके घर पर भी नन्हें बच्चे की किलकारी गूंजे। हमारे देश में नि:संतान दंपतियों को शुक्राणु दान के जरिए अपनी गोद भरने में कोई एतराज नहीं है लेकिन इससे पहले वह शुक्राणुओं का जाति प्रमाणपत्र हासिल कर लेना चाहते हैं। दान के शुक्राणुओं के माध्यम से संतान चाहनेवाले दंपति इस प्रक्रिया में जाने से पहले यह पक्का कर लेना जरूरी समझते हैं कि दानकर्ता अपनी जाति का है या नहीं। फर्टिलिटी क्लीनिक उनकी इस इच्छा को पूरा भी कर रहे हैं। क्योंकि ऐसा करने के लिए उनके पास स्थानीय लोगों का दबाव है। वह चाहते हैं कि अगर इस संतान की मां या पिता नहीं हूं तो जिस व्यक्ति के शुक्राणु लिए जाए या जो सरोगेट मदर बने वह मेरी जाति की हो।
इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि आज की युवा पीढी भी जाति के प्रति कितनी आग्रही है। जाति के प्रति अभी नजरिया यही है कि यह आपकी पहचान है । जाति के बिना आपकी पहचान खत्म हो जाती है। इसके विपरीत यदि आप छोटी जाति के हैं तो भी आप सामाजिक दुराग्रह के शिकार हो सकते हैं। इसकी जड़ में हमारे लोकतंत्र की विफलता है। इसी कारण सामंती शक्तियों का वर्चस्व बना रहता है। हिंदी प्रदेशों में जातिगत जहर ज्यादा है। यहां जाति का प्रयोग झंडे की तरह से होता है लोग उसी डाक्टर के पास जाना चाहते हैं जो उसकी जाति का हो। दलित डाक्टर के पास सवर्ण जाति का मरीज दिखाने नहीं जाता यानी की जाति का भी मूल्य है। राजनीति में भी प्रचार के तौर पर जाति का प्रयोग सबसे ज्यादा होता है उसी जाति के स्टार को बुलाया जाता है। यह एक घृणित बात है।
क्या जाति के इस जहर को कम किया जा सकता है और बच्चे को ईश्वर का रूप माना जा सकता है जिसकी कोई जाति नहीं होती? क्या हम कह सकते है जाति न पूछो साधु की पूछ लीजियो ज्ञान ।
वागीशा कंटेंट प्रोवाइडर कंपनी
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